शनिवार, 27 दिसंबर 2025

सामाजिक बहिष्कार या जात बाहर करने की गलत प्रथा के का दुष्परिणाम भारत विभाजन और सनातन धर्मियों की जनसंख्या लगातार कम होना।

इस्लाम पन्थ के अनुयाइयों के लिए अलग देश पाकिस्तान की माँग कर पाकिस्तान बनवाने वाले मोहमद अला जिन्ना के दादा प्रेमजी भाई ठक्कर पोरबंदर के पास मोती पानेली गांव के  सनातन धर्म के अन्तर्गत लोहाना जाति के थे। प्रेमजीभाई ठक्कर द्वारा वेरावल शहर से मछली का व्यवसाय शुरू करने के कारण लोहाना जाति वालों ने प्रेमजीभाई ठक्कर को जाति  समाज से बहिष्कृत कर दिया अर्थात जात बाहर कर दिया। 
जिन्ना के पिता पुंजालाल ठक्कर गुजरात के काठियावाड़ में स्थानीय हिंदुओं के विरोध के बाद कराची में रहे थे। 
 बाद में उन्होंने गुजरात लौटना चाहा, लेकिन लोहाना जाति समाज ने स्वीकार नहीं किया।
इस पर नाराज होकर जिन्ना के दादा प्रेमजीभाई ठक्कर के बेटे अर्थात जिन्ना के पिता पुंजालाल ठक्कर ने आगा खान संप्रदाय का शिया इस्लाम अपना लिया।
इस समय जिन्ना छोटे थे और उनकी स्कूली शिक्षा कराची में ही हुई। जिन्ना का नाम मैट्रिक परीक्षा में एम जेड ठक्कर लिखा हुआ है। दसवीं के बाद में उनके पिता ने धर्म बदलकर जिन्ना का नाम भी बदला गया।

आचार संहिता का पालन करना अच्छा है लेकिन पालन करवाने के लिए दण्डाधिकार किसने दिया? मुझे तो किसी भी ग्रन्थ में नहीं दिखा कि, किसी आचार भ्रष्ट व्यक्ति को जनता दण्ड दे।
समाज ने राज्य और शासक की व्यवस्था इसीलिए की थी। दण्डधिकार केवल राज्य को ही था।
वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्रीरामचन्द्र जी ने भी बालि को कहा था कि, तुम अयोध्या सम्राट के क्षेत्र में रहते हो। और मुझे अयोध्या के सम्राट भरत की ओर से अयोध्या साम्राज्य क्षेत्र में होने वाले अपराध का दण्डाधिकार भतत के प्रतिनिधि के रूप में दिया गया है।
इसलिए अनुज वधू के अपराध के दण्ड स्वरूप तुम्हें मृत्यु दण्ड दिया गया।
हमसे तो यहुदी अधिक समझदार थे जिन्होंने यहुदी पन्थ के शब्बत (Shabbat) पर कार्य न करने और सिनेगॉग में जानवर की बलि (Sacrifice) देकर  याहवेह को समर्पित करने के लिए सिनेगॉग के वेदी पर  जलाया जाता था, जिसे  कोरबन (Korban)  कहते थे। उसका विरोध करने जैसे कार्यो के लिए क्रूस पर चढ़ा कर मृत्यु दण्ड प्रस्तावित कर रोमन सम्राट टिबेरियस (Tiberius) के अधीन यहुदिया प्रान्त का अधिकारी पोंटियस पिलातुस को सोप दिया। लेकिन यहुदियों ने स्वयम् क्रूस पर नहीं चढ़ाया।

सोमवार, 22 दिसंबर 2025

प्रयागराज गङ्गा और यमुना के सङ्गम मे सरस्वती नदी का गुप्त रूप सें सङ्गम क्यों मानते हैं।

सरस्वती नदी का मूल उद्गम स्थल भारत के उत्तराखण्ड राज्य में चमोली जिले मे बद्रीनाथ के निकट माणा गांव से तीन किलोमीटर दूर रूपण नाम के हिमनद (ग्लेशियर) से होता था। रूपण ग्लेशियर को अब सरस्वती ग्लेशियर भी कहा जाने लगा है। नैतवार में आकर यह हिमनद जल में परिवर्तित हो जाता था, फिर जलधार के रूप में आदिबद्री तक सरस्वती बहकर आती थी। यहाँ से निकल कर वर्तमान में केशव प्रयाग में सरस्वती और अलकनंदा का संगम होता है। फिर हिमाचल के सिरमौर क्षेत्र के दक्षिणी में उत्तराखण्ड सीमा से, पंजाब, हरियाणा मे  घघ्घर-हकरा नदी प्रणाली के साथ बहती हुई, पश्चिम राजस्थान मे अरावली पर्वतमाला के पश्चिम में बहती हुई, बीकानेर से होते हुए और गुजरात से होते हुए कच्छ के रण में अरब सागर में मिलती थी। अब घग्घर नदी सूख चुकी है जो पाकिस्तान में हकरा कहलाती है। राजस्थान की मरुभूमि में हनुमानगढ़ के पास रेत में लुप्त हो जाती है और कच्छ के रण में भूमि में समाकर अन्दर ही अन्दर बहते हुए अरब सागर में मिलती है।
सतलुज तथा यमुना की कुछ धाराएं सरस्वती नदी में आ कर मिलती थीं। इसके अतिरिक्त दो अन्य लुप्त हुई नदियाँ दृष्टावदी और हिरण्यवती भी सरस्वती की सहायक नदियां थीं। लगभग 1900 ईसा पूर्व इस क्षेत्र में भीषण भूकम्प आए, जिसके कारण जमीन के नीचे के पहाड़ ऊपर उठ गए भूगर्भी बदलाव के कारण घग्घर का पानी यमुना में चला गया। यमुना, सतलुज ने अपना रास्ता बदल दिया तथा दृष्टावदी नदी हरियाणा से हो कर बहती थी। उत्तर और पूर्व की ओर बहने लगी यमुना पहले चम्बल की सहायक नदी थी। लेकिन अब चम्बल नदी यमुना की सहायक नदी है दृष्टावदी नदी का पानी मिलने से दृष्टावदी नदी भी यमुना ही बनकर रह गई। इसी समय सरस्वती का जल भी यमुना में मिल गया। बहुत बाद में यमुना प्रयागराज में गंगा से जाकर मिली।  दृष्टावदी नदी के 2600 ईसा पूर्व सूख जाने के कारण सरस्वती नदी का जल पीछे की ओर चला गया और सरस्वती नदी भी लुप्त हो गयी। 
 जब वैदिक काल में सरस्वती नदी को सबसे प्रमुख और पवित्र नदी माना जाता था। सरस्वती नदी के किनारे हड़प्पा सभ्यता के 2335 गाँवों में विकसित हुई और 265 गाँव ही सिन्धु तट पर पाकिस्तान में हैं। 
लगभग 4000 से 3000 ईसा पूर्व में भूकम्प के कारण हरियाणा राजस्थान के कुछ क्षेत्र ऊंचे हो गये । इस कारण सरस्वती की सहायक नदियों यमुना और सतलुज में सरस्वती नदी का पानी चला गया। सरस्वती नदी के अवशेष आज भी भूमिगत रूप से बहते माने जाते हैं और पौराणिक कथाओं में इसका ज्ञान और वाणी की देवी के रूप में भी वर्णन है। 

  वैदिक काल में यह एक विशाल, बारहमासी नदी थी, जो गंगा जितनी ही महत्वपूर्ण थी, और इसके किनारे वैदिक सभ्यता फली-फूली।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और अन्य शोधों के अनुसार, यह नदी आज भी थार रेगिस्तान के नीचे भूमिगत रूप से बह रही है, जिसके निशान सैटेलाइट इमेजरी में देखे गए हैं। 

 ऋग्वेद में इसे 'नदीतमा' (सर्वश्रेष्ठ नदी) कहा गया है और यह ज्ञान की देवी का प्रतीक है, जो भगवान प्रजापति ब्रह्मा की पत्नी हैं।
सरस्वती के पानी के यमुना में मिलने के कारण प्रयागराज में गंगा, यमुना के साथ सरस्वती का संगम (त्रिवेणी) की पौराणिक मान्यता का है।
 महाभारत युद्ध के समय बलराम ने सरस्वती नदी के किनारे के तीर्थों की यात्रा की थी और सरस्वती नदी में कई तीर्थस्थलों का उल्लेख मिलता है।

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2025

परमात्मा का सङ्कल्प ॐ ही वेद है ।

वेदों की कभी रचना नहीं हुई।
क्यों कि, रचना त्वष्टा की ही (शक्ति) है। त्वष्टा और रचना संयुक्त रूप से हिरण्यगर्भ विश्वकर्मा हैं।
इसी कारण कुछ लोगों ने हिरण्यगर्भ ब्रह्मा को वेद वक्ता कहा।
यह सही भी है, सर्वप्रथम वाणी के रूप में वेदों का प्राकट्य हिरण्यगर्भ से ही हुआ। क्यों कि वाणी हिरण्यगर्भ की ही (शक्ति) है।
हिरण्यगर्भ ब्रह्मा ईश्वरीय सामर्थ्यवान देवों में अन्तिम कड़ी है। इसलिए कुछ लोगों ने कहा वेद ईश्वर की रचना है।
फिर स्मृति हुई कि, हिरण्यगर्भ तो अपर ब्रह्म नारायण की नाभि (केन्द्र) से प्रकट हुए। अर्थात हिरण्यगर्भ का मूल तो नारायण (श्रीहरि - कमला) है। तब याद आया कि,
कुछ का मानना है कि, वेद ब्रह्म के निश्वास है। क्योंकि, निश्वास मतलब उत्सर्जन - बाहर निकालना, छोड़ना।
जैसे ब्लेकहोल सब-कुछ निंगल लेता है, तो उससे रेडिएशन उत्सर्जित भी होता है।
ऐसे ही प्राकृतिक प्रलय में सब कुछ ब्रह्म मे समाहित हो जाता है और सृजन के समय ब्रह्म से ही उत्सर्जित होता है तो स्वाभाविक है कि, वेद अर्थात ज्ञान भी ब्रह्म से ही निकलेगा।
लेकिन कुछ लोगों ने जाना कि, वेद स्वयम् ब्रह्म ही है। वेद मन्त्रों को ब्रह्म कहा जाता है।
अर्थात परब्रह्म (विष्णु और माया) परमेश्वर का वेद (ज्ञान) के रूप में प्राकट्य ही ब्रह्म है।
फिर भी कुछ लोगों को सन्तोष नहीं हुआ। उन्होंने कहा नेति-नेति। यही अन्तिम सत्य नहीं है, और भी कुछ है।
पुछा गया कि, फिर क्या है? वेद (ज्ञान) क्या है तो उत्तर मिला वेद शब्द है, शब्द प्रमाण है। और प्रथम शब्द ॐ है। ॐ तरङ्ग है, ॐ नाद है, ॐकार है।
ॐ प्रथम ध्वनि है, प्रथम आकार है, प्रथम ज्ञान है। इसलिए वेदों को बीज रूप में ॐ (प्रणव) कहा जाता है। इस लिए वेदों को ब्रह्म कहते हैं क्योंकि वेद (ज्ञान) का विस्तार होता रहता है।
तो फिर ॐ का मूल क्या है? 
तब उत्तर मिला कि, ॐ संकल्प है, परमात्मा का सङ्कल्प ॐ है। इसी ॐ सङ्कल्प का ही विस्तार यह सब कुछ है। 
इसलिए कहा गया कि, ॐ खं ब्रह्म। ॐ बीज है, ॐ बीज मन्त्र है। यहाँ से/ यहीँ से विस्तार हुआ। 
अतः ॐ अर्थात परमात्मा का सङ्कल्प अर्थात परमात्मा का एक चौथाई भाग (पुरुष सूक्त देखें) ॐ है, जो प्रकट है, शेष तीन चौथाई अप्रकट ही रहता है। 
ॐ है, अर्थात ॐ का अस्तित्व है, अतः कहा गया है कि, ॐ तत् सत। ॐ प्रकाश स्वरूप चेतन तत्व है। उत्पत्ति का बीज ॐ है अतः ॐ आनन्द है। ॐ सच्चिदानन्द है। यही ॐ ज्ञान है। यही ॐ वेद है। ॐ तत्सत्।

शनिवार, 13 दिसंबर 2025

भारत की दासता का इतिहास।

वर्ष 550 ईसा पूर्व में पारसी मतावलम्बी करूष ने अफगानिस्तान और सिन्ध पर आक्रमण किया। और यहाँ पारसी मत का प्रचार-प्रसार किया। अफगानिस्तान बलुचिस्तान, उत्तर पश्चिम सीमा प्रान्त, सिन्ध और पञ्जाब में इनका प्रभाव आज तक है।

326 ईसापूर्व में अलेक्ज़ेण्डर यूनानी ने इरान, अफगानिस्तान बलुचिस्तान, उत्तर पश्चिम सीमा प्रान्त, सिन्ध और पञ्जाब पर आक्रमण किया और अपने क्षत्रपों को उत्तर पश्चिम सीमा प्रान्त, बलुचिस्तान क्षेत्र में क्षत्रपों को शासक बनाया।
और युनानी मत और संस्कृति का प्रचार-प्रसार किया । अफगानिस्तान, बलुचिस्तान, उत्तर पश्चिम सीमा प्रान्त, सिन्ध और पञ्जाब में इसका प्रभाव आज तक भी है। बाद में ये भी भारतीय संस्कृति में घुल-मिल गए और श्रीकृष्ण भक्ति का प्रचार-प्रसार किया।

तुर्क - शक- 120 ईसा पूर्व से 388 ईस्वी तक शकों चष्टान, रुद्रदामा ने सिन्ध पर आक्रमण किया और जीत कर शासन किया। पहले ये बौद्ध थे पर बाद में उत्तर भारत में शैव मत तथा उत्तर भारत में प्रचलित प्रायः अट्ठाईस से बत्तीस चान्द्रमासों के बाद एक अधिक मास वाला और 19 वर्षों, 122 वर्षों और 141 वर्षों में एक क्षय मास और क्षय मास के पहले और बाद में एक-एक अधिक मास वाला तिथि पत्रक का प्रचार-प्रसार किया। जो बाद में दक्षिण भारत में सातवाहन वंशीय राजाओं ने शालिवाहन शक और उत्तर भारत में कुषाण वंशीय क्षत्रपों ने शकाब्द के रूप में प्रचलित किया।

तुर्क - कुषाणों 60 ईस्वी से 240 ईस्वी तक कुषाणों ने आक्रमण कर मथुरा को राजधानी बनाकर मध्य भारत तक शासन किया। पहले ये भी पारसी और बौद्ध थे तथा बाद में श्रीकृष्ण भक्ति का प्रचार-प्रसार किया।

तुर्क - हूण - हुणों ने युरोप में बहुत मारकाट मचाई। फिर तुरमानशाह और मिहिरगुल ने  ईरान, अफगानिस्तान होते हुए उज्जैन तक आक्रमण कर उत्तर भारत में नाथ पन्थ-शैव मत का प्रचार-प्रसार किया।
उक्त युनानी, शक-कुषाण और हुणों को भारतियों ने अपना लिया और भारतीय करण कर दिया और इन्होंने वैष्णव सम्प्रदाय और शैव सम्प्रदाय अपना लिया।इसलिए लोग इन्हें प्रायः भूल गए।
लेकिन 
इराक-अरब, तुर्क, अफ़ग़ान के गुलाम वंश, खिलजी, तुगलक, लोदी, मुस्लिम आक्रांताओं ने अरबी संस्कृति, तुर्की, अरबी और फारसी भाषा को कभी नहीं छोड़ा। यहाँ तक कि, मंगोलिया से कजाकिस्तान में बसे चंगेज खान जो मंगोलिया का तन्त्र मतावलम्बी था, उसके वंशज तेमुर लङ्ग ने इस्लाम अपना कर और तुर्कों के मिश्रण से बने मुगल वंश के बाबर, हिमायु, अकबर, जहाङ्गीर, शाहजहाँ, ओरङ्जेब, और बहादुर शाह जफर तथा बङ्गाल तथा अवध के नबाब और दक्षिण के बहमनी वंश, हैदराबाद के निजाम, कर्नाटक मेसुर के हेदर अली और टीपू सुल्तान भी इस्लामी कट्टरवाद के अनुयाई रहे। मुस्लिमों ने कभी भारत, भारतीयता, भारतीय संस्कृति और भारतीय धर्म नहीं अपनाया।
इसलिए ये भारत में रहकर भी स्वयम् को अरबी ही समझते हैं। यहाँ तक कि, मुस्लिमों ने जिन भारतिय कलाकारों, किसानों, कारिगरो को जजिया लगाकर कर मुस्लिम बनाया, सम्पन्न लोगों को लूटकर मुस्लिम बनाया, महिलाओं का बलात्कार करके मुस्लिम बनाया, सूफियों ने छल-कपट पूर्ण तन्त्र का चमत्कार बतलाकर किसी भी प्रकार से जबरन मुसलमान बनाया उन भारतीय मुसलमानों ने भी अपने आप को सच्चा अरबी सिद्ध करने का प्रयत्न किया। और जो वापसी चाहते थे, उन्हें सनातन धर्मियों ने नहीं अपनाया।
 इस्लाम की इस प्रवृत्ति के कारण मुस्लिम पुरे विश्व में सदैव अलग-थलग रहे।
इसका लाभ पुर्तगीज, डच, फ्रेंच और ब्रिटिश लोगों ने लिया। युरोपीयों ने समझ लिया कि, भारतियों में मतों, पन्थों, सम्प्रदायों और राजाओं में अत्यधिक फूट है।
उक्त सभी युरोपियों ने 1498 से 1857 तक युरोपीय व्यापारिक कम्पनियों और 1857 के बाद भी मुख्यतः ब्रिटिश साम्राज्य और कुछ पुर्तगाल, फ्रांस और डचों के अधिकृत छोटे-छोटे राज्यों में यही क्रम जारी रहा।
युरोपीयों ने भारतियों को युरोपीय संस्कृति और ईसाईयत अपनाने के लिए भारत के गुरुकुल तो बन्द करा दिए लेकिन मदरसे चलने दिये। पारसियों को मान-सम्मान दिया, मुस्लिमों को विश्वास में लिया और बौद्धों और खालसाओं के विलगाव को बढ़ावा दिया। 
जैनों पर शायद इनका ध्यान नहीं गया और सनातनियों को ईसाई बनाने के लिए जातिप्रथा का लाभ लेकर फूट डाल कर, कृषको पर लगा बढ़ाकर और अपनी पसन्द की नील, सेब आदि व्यावसायिक फसलें लगवा कर, जमिदारों से भूमि छिन कर, राजाओं आपस में लड़वाकर फिर बन्दर बाट के माध्यम से दोनों पक्ष के राजाओं को आधीन कर, सन्धी से जोड़कर, गोद लेने का अधिकार छीन कर, ब्रिटिश मिलों का सस्ता कपड़े बेंच कर, सूत और रेशम के वस्त्रोद्योग पर प्रतिबन्ध लगा कर बन्द कर दिए।
आधुनिक मशनरियों के कारण बड़ई (सुथार) , लोहार, सोनार (सुनार) आदि विश्वकर्माओं को बेरोजगार कर दिया। फिर लोगों को अफ्रीका ले जाकर दास बना दिया। विश्वयुद्धों में जबरन सैनिक बना दिया। सभी प्रकार के प्रयास करके सनातन धर्मियों की जनसंख्या कम कर गये।

लेकिन 
1857 मे अधिकांश मुस्लिम रियासतों ने मुगल बादशाह बहादुर के नेतृत्व में कुछ क्षेत्रीय और छोटी-मोटी सनातनी रियासतों ने मिलकर इस्ट इण्डिया कम्पनी के विरुद्ध युद्ध छेड़ा जिसमें पञ्जाब के महाराजा रणजीत सिंह (खालसा रियासत), सिन्धियाँ की ग्वालियर रियासत जैसी मराठी रियासतों ने भाग नहीं लिया। उसके बाद स्थानीय स्तर पर छुट-पुट संघर्ष चलते रहे।
तभी अफ्रीका से लौटे गांधी जी ने 
1917 में गांधी जी का नील किसानों के अधिकारों के लिए चंपारण में भारत का पहला सफल सत्याग्रह किया और 
1918 गुजरात के खेड़ा जिले के किसानों के समर्थन में दुसरा सफल सत्याग्रह  किया। 
1920-22 में असहयोग आंदोलन; ब्रिटिश सरकार के साथ किसी भी सहयोग से इनकार करना, जिसमें विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और स्वदेशी पर जोर शामिल था इससे गांधी जी लगभग जन नेता बन गए। लेकिन गांधी जी गलती यह कर गये कि, चौरी-चौरा घटना के बाद इसे स्थगित कर दिया गया। इससे देशबन्धु चितरञ्जन दास जैसे वरिष्ठ नेता रुष्ट होकर अलग हो गये।
1930-34 में सविनय अवज्ञा आंदोलन , नमक कानून तोड़ने के लिए 'दांडी मार्च' से शुरू हुआ, इसने ब्रिटिश कानूनों का शांतिपूर्ण उल्लंघन किया.
1942 में भारत छोड़ो आंदोलन; "करो या मरो" के नारे के साथ, इसने ब्रिटिश शासन को तुरंत समाप्त करने की मांग की। जिसे अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन के नाम से जाना जाता है।
इन आंदोलनों ने समाज के सभी वर्गों, समुदायों और क्षेत्रों के लोगों - किसानों, मजदूरों, महिलाओं और छात्रों - को एक साथ स्वतंत्रता के एक साझा उद्देश्य के लिए एकजुट कर ब्रिटिश शासन पर दबाव बनाया। लेकिन गांधी जी गलती यह कर गये कि, विश्वयुद्ध में फंसे ब्रिटेन का सहयोग कर उनसे तदनुसार सहयोग की आशा की और  आन्दोलन ही स्थगित नहीं किया अपितु भारतियों को सेना में भर्ती होने का आह्वान किया। लेकिन मुस्लिमों ने गांधी जी की बात नहीं मानी।

खुदीराम बोस और महर्षि दयानन्द सरस्वती, श्रद्धानन्द जी से प्रेरित उस काल के आर्यसमाजी लाला लाजपतराय के अनुयाई सचिंद्रनाथ सान्याल द्वारा स्थापित नें साम्यवादी भारतीय क्रांतिकारी संगठन -- हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी का गठन किया। 

 पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल, श्री चन्द्रशेखर आजाद, श्री भगतसिंह, श्री राजगुरु, श्री अशफाक उल्ला खाँ जैसे लोगों ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचआरए) के सदस्य के रूप में अंग्रेजी सरकार को बहुत परेशान कर दिया था।
श्री चन्द्रशेखर आजाद ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन ( एचआरए ) का नाम हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन कर दिया। अर्थात नाम में सोशलिस्ट जोड़ दिया।
लेकिन 
पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल, श्री चन्द्रशेखर आजाद, श्री भगतसिंह, सुखदेव थापर, श्री शिवराम राजगुरु  के बलिदान के बाद हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन सङ्गठन की गतिविधियाँ लगभग ठप हो गई। राष्ट्रीय आन्दोलन कमजोर होने लगा।
( एचएसआरए ) नामक संगठन समाप्त होने के बाद सुभाष चन्द्र बोस ने अलग कर एक नवीन राजनीतिक दल फारवर्ड ब्लाक खड़ा किया। और बाद में जापान जाकर आजाद हिन्द फौज की स्थापना की।

गांधी जी और सुभाष चन्द्र बोस ---
उल्लेखनीय है कि, 
कोलकाता के स्वतन्त्रता सेनानी देशबंधु चित्तरंजन दास के कार्य से प्रेरित होकर श्री सुभाष चन्द्र बोस श्री बाबू  चितरञ्जन दास के साथ काम करना चाहते थे। इंग्लैंड से उन्होंने बाबू चितरञ्जन दास को पत्र लिखकर उनके साथ काम करने की इच्छा प्रकट की। भारत वापस आने पर रवींद्रनाथ ठाकुर की सलाह के अनुसार श्री  सुभाषचन्द्र बोस    सर्वप्रथम मुम्बई गये और महात्मा गांधी से मिले।
गांधी द्वारा 5 फरवरी 1922 को चौरी चौरा घटना के बाद असहयोग आंदोलन बंद कर दिया गया जिसके कारण 1922 में बाबू चितरञ्जन दास ने कांग्रेस के अन्तर्गत स्वराज पार्टी की स्थापना की।
सुभाष चन्द्र बोस ने भी जवाहरलाल नेहरू के साथ कांग्रेस के अन्तर्गत युवकों की इण्डिपेण्डेंस लीग शुरू की।
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने 3 मई 1939 को कांग्रेस के अन्दर ही फॉरवर्ड ब्लॉक के नाम से अपनी पार्टी की स्थापना की। कुछ दिन बाद गांधी जी ने सुभाष को कांग्रेस से ही निकाल दिया गया। बाद में फॉरवर्ड ब्लॉक अपने आप एक स्वतन्त्र पार्टी बन गयी। इस प्रकार हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के बाद पुनः एक क्रांतिकारी दल का उदय हुआ।
नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने 6 जुलाई 1944 को उन्होंने रंगून रेडियो स्टेशन से महात्मा गांधी के नाम एक प्रसारण जारी कर उन्होंने निर्णायक युद्ध में विजय के लिए उनका आशीर्वाद और शुभ कामनाएँ मांगी।

सार्वदेशक हिन्दू सभा ---
लाला लाजपतराय, मदन मोहन मालवीय द्वारा सार्वदेशक हिन्दू सभा सङ्गठन की स्थापना हरिद्वार में 1907 में की।
फिर 
राजनितिक दल के रूप में हरिद्वार में सर्वदेशक हिन्दू सभा की स्थापना 1915 लाला लाजपतराय, मदन मोहन मालवीय द्वारा की गई।

सार्वदेशिक हिन्दू सभा के अध्यक्ष ---
1915 से 1921 तक पण्डित मदन मोहन मालवीय सार्वदेशिक हिन्दू सभा के अध्यक्ष थे।

1921 से 1931 तक 
लाला लाजपत राय सार्वदेशिक हिन्दू सभा के अध्यक्ष रहे ।

1931 से 1937 तक
बालकृष्ण शिवराम मुञ्जे अध्यक्ष रहे।

अखिल भारतीय हिन्दू महासभा
1937 से 1943 तक अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के अध्यक्ष विनायक दामोदर सावरकर  रहे। 
विनायक दामोदर सावरकर ने सार्वदेशिक हिन्दू सभाका नाम हिन्दू महासभा नाम कर के इटली के फासिस्ट दल का अनुयाई बना दिया दिया।

1945 से 1946 तक डॉक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के अध्यक्ष रहे।
डॉक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने 21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली में भारतीय जनसङ्घ की स्थापना की और जो 06 अप्रैल 1980 से भारतीय जनता पार्टी कहलाती है।

 बालकृष्ण शिवराम मुञ्जे जो सार्वदेशिक हिन्दू सभा के 1931 – 37 तक अध्यक्ष रहे वे केशव बलराम हेडगेवार के राजनीतिक अनुयाई थे। लेकिन उसी समय केशव बलराम हेडगेवार आखिल भारतीय हिन्दू महासभा के उपसभापति रहे। 
केशव बलिराम हेडगेवार के राजनीतिक अनुयाई बालकृष्ण शिवराम मुंजे का योगदान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बनवाने में  बहुत अधिक रहा। संघ के संस्थापक और बालकृष्ण शिवराम मुंजे के राजनितिक गुरु  डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने अपने शिष्य बालकृष्ण शिवराम मुञ्जे को इटली के फासिस्ट दल के अनुसार सङ्गठन बनाने का प्रशिक्षण लेने इटली  भेजा। जब मुञ्जे दल का सञ्चालन का और शाखा लगाने का
प्रशिक्षण ले कर लौटे तब डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में 27 सितम्बर 1925 ईस्वी में भारत में वैसा ही सङ्गठन राष्ट्रीय स्वयम् सेवक सङ्घ की स्थापना की।
लेकिन 
सावरकर की हिन्दू महासभा गांधी जी जैसा जन आन्दोलन खड़ा नहीं कर पाई। यह टीस सावरकर और उसके अनुयायियों को सदैव खलती रहती है। इसलिए विनायक दामोदर सावरकर सदैव से ही गांधी जी का विरोध करते रहे।

 भारत की स्वतन्त्रता के उपरान्त जब महात्मा गांधी की हत्या हुई तब इसके बहुत से कार्यकर्ता इसे छोड़कर भारतीय जनसंघ में भर्ती हो गये। 


अखिल भारतीय हिन्दू महासभा को आम चुनाव में लोकसभा में 

1951 मे प्रथम लोकसभा में 4 सीटे मिली।
जनसंघ को 3 सीटें मिली।

1957 में दुसरी लोकसभा में 2 सीटे मिली।
जनसंघ को 4 सीटें मिली।

1962 में तीसरी लोकसभा में 1 सीटे मिली।
जनसंघ को 14 सीटें मिली।

1967 में चौथी लोकसभा में 1 सीटे मिली।
जनसंघ को 35 सीटें मिली।

1971 में पाँचवी लोकसभा में 1 सीटे मिली।
जनसंघ को 22 सीटें मिली।


1989 में नौवीं लोकसभा में 1 सीटे मिली।

रविवार, 7 दिसंबर 2025

भूमि पर देवता, गन्धर्व, अप्सरा, किन्नर, यक्ष, राक्षस, दैत्य, दानव, सूर, असुर, पिशाचों का स्थान।

इस लेख में बहुत सी जानकारियाँ है। जिन्हें मैरे लेखों में पढ़ा होगा।
कैलाश शिखर के पूर्व में ही देवताओं के वास स्थान स्वर्ग के राजा इन्द्र की राजधानी अमरावती पुरी भी है।
कश्यप ऋषि का तपस्या करने का क्षेत्र कश्यप सागर (केस्पियन सागर) से कश्मीर तक था। केस्पियन सागर से तिब्बत के झिंजियांग क्षेत्र तक था। इस पूरी पट्टी को तुर्किस्तान कहते हैं। इस क्षेत्र में दक्ष द्वितीय की तेरह पुत्रियों से महर्षि कश्यप की सन्तान बसी।
वर्तमान में इस क्षेत्र में टर्की, कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और
 झिजियांग क्षेत्र  कहलाता है। वर्तमान में झिजियांग क्षेत्र चीन का स्वायत्त क्षेत्र कहलाता है जहाँ उइगुर मुसलमान रहते हैं।
दक्ष द्वितीय की पुत्री अदिति और कश्यप ऋषि के पुत्र आदित्य देवता कहलाते हैं।

वर्तमान पाकिस्तान में हुंजा घाँटी में बाल्टित शहर जिसे करीमाबाद भी कहा जाता है एक और पुरानी बस्ती गणेश गांव है। किसी समय यह नगर उस क्षेत्र की राजधानी था। इस क्षेत्र के लोगों ने सबसे अन्त मेंं इस्लाम स्वीकारा इस लिए मुस्लिम इसे काफिरिस्तान कहते थे। यहाँ की महिलाएँ अत्यन्त सून्दर और अस्सी वर्ष की अवस्था में भी यूवती लगती है। इन्द्र के दरबार में नर्तकी अप्सराएँ होती थी इसकी तुलना गन्धर्व लोक के गन्धर्वों से करो।



बाल्टित शहर जिसे करीमाबाद के उत्तर में अफगानिस्तान के वाखान कॉरिडोर, उत्तर-पूर्व में झिंजियांग ( चीन का स्वायत्त क्षेत्र) और उत्तर-पश्चिम में पामीर की सीमा है।  

ब्रह्मा जी से उत्पन्न हेति और प्रहेति नामक दो राक्षसों ने जल की रक्षा का भार ग्रहण किया।
इन्हीं के साथ यक्ष भी जन्मे थे।

 कैरेबियन सागर और उत्तरी अटलांटिक महासागर के बीच स्थित हैती हिस्पानियोला द्वीप के पश्चिमी एक तिहाई हिस्से पर स्थित है। डोमिनिकन गणराज्य द्वीप के पूर्वी हिस्से में हैती की सीमा बनाता है। हैती के सबसे करीबी पड़ोसियों में पश्चिम में जमैका और उत्तर-पश्चिम में क्यूबा शामिल हैं। मतलब ये नीग्रो जाती के लोग हैं।
हेति में तेज नशा हल्का विष देकर मरा हुआ घोषित कर कबर में दफना कर फिर चुपके से कबर से निकाल कर उसे अपने वश में किया हुआ प्रेत (पिशाच) घोषित कर उसे जाम्बी कहा जाता है। उस जाम्बी से दास (गुलाम) जैसा कार्य लेने की परम्परा थी। अब वहाँ के शासन ने इस परम्परा को समाप्त कर दिया है।
अर्थात राक्षस नीग्रो जाती थी। पुराणों में यक्ष और राक्षस दोनों जातियों का बन्धु-बान्धव कहा गया है। सुकेतु यक्ष की पुत्री ताड़का यक्षिका से राक्षसी बनी। सम्भवतः यक्षिणी ताड़का का विवाह राक्षस जाति में हुआ था।
 कुबेर यक्ष है, और कुबेर की राजधानी अलकापुरी कैलाश पर्वत के उत्तर में तिब्बत में है। कैलाश पति शंकर जी यक्ष कुबेर के मित्र कहे जाते हैं। अर्थात यक्ष लोक  तिब्बत-चीन में है। 
यक्षिणियाँ नट विद्या में प्रवीण होती है। आज भी चीनी लोग जिम्नास्टिक में सबसे आगे हैं।
मतलब तिब्बती लोग यक्ष कहलाते थे।


 

 

 इराक के असीरिया के लोग स्वयम् को आज भी असूर कहते हैं अर्थात इराक की अरबी लोग असुर थे। उनके वंशज असम तरफ रहते हैं जो महिशासुर को अपना पूर्वज मानते हैं। हिरण्यकशिपु की बहन सिंहिंका असम की महारानी थी। जिसके वंशज श्रीलंका के सिंहल हैं।

सीरिया के निवासी स्वयम् को सूर कहते हैं।सुरसा के पुत्र नाग (सर्प) हूए। अर्थात आदम को बुद्धि वृक्ष का फल खाने को प्रेरित करने वाला नगाग सीरियाई था। सीरिया को शाम भी कहते हैं जहाँ के राजा यजीद ने कर्बला के मैदान में इमाम हुसैन को मारा था। इनके वंशज इराक के यजीदी प्राचीन ईरानी मग संस्कृति का अग्निहोत्री धर्म और ईरान के पारसी मत-पन्थ के निकट का मत- पन्थ मानते हैं। अर्थात देवासुर संग्राम सीरिया और असीरिया (इराक) के बीच हुआ युद्ध था।
नाग वंशी पश्चिम एशिया और मध्य एशिया (सीरिया) से आये।
आदम का जन्म दक्षिण पूर्व टर्की के युफ्रेटिस घाँटि में ईलाझी शहर में अदन वाटिका में हुआ था  और उसे नाग (सर्प) ने यहोवा के विरुद्ध भड़काया था। यह आपको बाइबल पुराना नियम उत्पत्ति नामक पुस्तक में (ओल्ड टेस्टामेंट की जेनिसिस) में मिल जाएगा।
यही नाग सूरसा पुत्र सीरियाई था। जो युफ्रेटिस घाँटि के निकट ही है।

हित्ती साम्राज्य दक्षिण पूर्व टर्की एशिया महाद्वीप में था। हित्ती शब्द आरामी भाषा में लिखित बाइबल पुराना नियम में है। मूलतः राजा खत्तुनस शासित होने के कारण यह क्षेत्र खत्ती साम्राज्य था। यहाँ के निवासी स्वयम् को चन्द्रवंशी क्षत्रिय मानते हैं। भारत में ये लोग स्वयं को खाती और खत्री कहते हैं।
वैवस्वत मनु की पुत्री इला और चन्द्रमा के पौत्र तथा बुध के पुत्र पुरुरवा को एल कहते हैं। याहवेह को भी एल कहते हैं।  
पुरुरवा ने इन्द्र सभा की नर्तकी (अप्सरा), इराक के उर नगर की वासी उर्वशी से अरब में प्रचलित संविदा विवाह ( मुताह विवाह) किया था। संविदा पूर्ण होने के पश्चात गर्भवती उर्वशी अपने मायके लौट गई। और पुत्र आयु को जन्म देकर, स्तनपान का समय पूर्ण होने पर पुरुरवा के पुत्र आयु (आदम) को  पुरुरवा को सोप कर छोड़कर  इन्द्र सभा में अपनी ड्यूटी पर लौट गई थी। पुरुरवा ने  आयु को स्वयम् अकेले पाला था। याहवेह ने आदम को पाला था। पुरुरवा - आयु और याहवेह आदम का सम्बन्ध चन्द्रमा से है। 
इतने सन्दर्भ अलग-अलग होते हैं, इनको जोड़ना पड़ता है।

शनिवार, 6 दिसंबर 2025

दक्ष प्रथम और दक्ष द्वितीय।

*दक्ष द्वितीय के वंश का वर्णन के अन्तर्गत स्वायम्भूव मनु के प्रथम पुत्र उत्तानपाद के वंश का संक्षिप्त वर्णन*।   
*3 - स्वायम्भुव मनु का मानव वंश वर्णन*
( प्रजापति ब्रह्माजी की मानस सन्तान ) (1) स्वायम्भुव मनु को उनकी पत्नी ( प्रजापति ब्रह्माजी की मानस सन्तान )शतरुपा से उत्तानपाद और प्रियव्रत दो पुत्र और प्रसूति और आकूति नामक दो कन्याएँ उत्पन्न हुई ।
*उत्तानपाद का वंश वर्णन*
 (2) उत्तानपाद - सुनीति से ध्रुव, और सुरुचि से उत्तम ।
(3) ध्रुव के शिष्टि और भव्य ।
(4) भव्य से शम्भु ।
(4) शिष्टि- सुच्छाया से रिपु, रिपुञ्जय,विप्र, वृकल और वृकतेजा ।
(5) रिपु वृहती से चाक्षुष ।
(6) चाक्षुष मनु नड़वला से कुरु, पुरु, शतधुम्न, तपस्वी,सत्यवान, शुचि, अग्निष्टोम, अतिरात्र, सुधुम्न, और अभिमन्यु ।
(7) कुरु - आग्नैयी से अङ्ग, सुमना, ख्याति, अङ्गिरा, और शिबि ।
(8) अङ्ग - सुनीथा से वैन ।
(9) वेन की जांघ के मन्थन से ( विन्ध्याचल के आदिवासी) निषाद । और वैन की दाहिनी भुजा के मन्थन से वैन्य पृथु ।
(10) पृथु से अन्तर्धान और वादी जन्मे। 
(11) अन्तर्धानशिखण्डनी से हविर्धान ।
 (12) हविर्धान - घीषणी से प्राचीनबर्हि, शुक्र, गय, कृष्ण, बृज और अजिन ।
(13) प्रजापति प्राचीनबर्हि - सुवर्णा से दस प्रचेता।
(14)( प्रचेता गण के यहाँ) कण्डु ऋषि - प्रम्लोचा अप्सरा की सन्तान मारिषा नामक (कन्या) से दक्ष द्वितीय ।
(15) दक्ष (द्वितीय) - असिन्की साठ कन्याएँ जन्मी।
 जिनमे सती (शंकर जी पहली पत्नी ) हुई।
उल्लेखनीय है कि, ब्रह्मा जी के मानस पुत्र दक्ष प्रथम की पत्नी प्रसुति ( जो स्वायम्भुव मनु की पुत्री थी उस प्रसूति ) से चौवीस कन्याएँ जन्मी थी।
इस प्रकार दोनो दक्ष में पन्द्रह पिढियों का अन्तर है।

बुधवार, 3 दिसंबर 2025

वेद और तन्त्र में अन्तर।

वेद और तन्त्र में अन्तर।

ऋग्वेद और एतरेय ब्राह्मण ग्रन्थ में विष्णु को परम पद कहा है। और कहा है कि, देवता भी विष्णु परम पद को (टकटकी लगाकर) देखते हैं।
तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्॥ ऋग्वेद 1/22/20
विष्णु के हाथ में नियति चक्र है । 90×4 =360 अरों का चक्र है। (चार गुणित नब्बे अर्थात 360अरोंं का संवत्सर चक्र है।)  तीनसौ साठ सायन सौर दिनों का संवत्सर ही नियति चक्र कहलाता है।
"चतुर्भि: साकं नवतिं च नामभिश्चक्रं न वृत्तं व्यतीँरवीविपत्। बृहच्छरीरो विमिमान ऋक्वभिर्युवाकुमार: प्रत्येत्याहवम् ॥" ऋग्वेद 01/155/06

जबकि तन्त्र में शंकर जी को महादेव के रूप में इष्ट और काली  तथा भैरव  उपास्य देवता हैं।

गायों के चरवाहे, अश्वपाल, और गजपालों के प्रमुख शंकर जी  पशुपति कहलाते हैं। क्योंकि वे महा विष विज्ञानी, और कुशल शल्य चिकित्सक थे। गवायुर्वेद, अश्वायुर्वेद, गजायुर्वेद आदि के विशेषज्ञ थे। इसलिए गोपाल, अश्वपति, गजपति सभी उनका आदर करते थे।
शंकजी सङ्गीत के वाद्ययन्त्रों, और भरत नाट्यम तथा धनुर्वेद के शस्त्रास्त्रों के विज्ञानी थे और हीमेन पर्सनेलिटी के वीर पुरुष थे। इसलिए प्रियपति कहलाये।
ईरान के मीढ संस्कृति के उपास्य होने से शंकर जी मीढीश कहलाते थे। मङ्गोलिया के प्रमथ गणों के नायक होने के कारण शंकर जी प्रमथेश कहलाते थे। इसके अलावा शंकर जी सुडान, इथियोपिया, सोमालिया, इरिट्रिया, केनिया और टर्की, लेबनान, इजराइल, जोर्डन, सीरिया , इराक, सऊदी अरब, यमन, ओमान आदि देशों में भी उपास्य देवता रहे हैं।
यमन और सऊदी अरब में काबा का शिवलिङ्ग, अव्राम/अब्राहम का शिवाई मत/सबाइन मत, सुलेमान की पत्नी शिवा (शिबा), बेबीलोन के बाल देवता जो नन्दी थे सीरिया के नाग माता सुरसा के पुत्र (नाग) / सूर , मिश्र के पिरामिडों का मृगशीर्ष नक्षत्र के तीन तारे और व्याघ की प्रतिकृत होना (ध्यातव्य है कि, मृगशीर्ष नक्षत्र का देवता सोम अर्थात चन्द्रमा है और व्याघ रुद्र का प्रतीक है) अब्राहमिक मत सेमेटीक (चान्द्र/ चन्द्र वंशी) कहलाते हैं।

लेकिन *वेदों में शंकर जी को* उनके अनुचर दस रुद्रों सहित ग्यारह रुद्रों को वेदों में *तैंतीस देवताओं में स्थान दिया गया। इष्ट देवों में स्थान नहीं दिया था।* 

 *वेदों में पञ्च महायज्ञ नित्य कर्म माने गए हैं। जिसके ब्रह्म यज्ञ के अन्तर्गत अष्टाङ्ग योग भी समाहित है। लेकिन प्रतिमा मूर्ति या चित्र में ईश्वर की धारणा करना निषिद्ध है।*
*न तस्य प्रतिमा अस्ति। शुक्ल यजुर्वेद 32/3* 

यज्ञ --- वेदों में *विष्णुअर्थ / विष्णु के निमित्त/ परमार्थ कर्म/ परम के लिए किए जाने वाले सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय निष्काम कर्म यज्ञ कहलाते हैं।* जिसमें देव यज्ञ में अग्निहोत्र होता है।
प्रत्येक निष्काम सत्कर्म, सात्विक तप, सात्विक साधना, निस्वार्थ दान आदि सब यज्ञ ही है जैसे विनोबा जी का भूदान यज्ञ, श्रमदान यज्ञ, विद्या दान यज्ञ आदि।
मतलब *यज्ञ में अग्निहोत्र आवश्यक नहीं है* ।

होम --- जैसे विवाह में लाजा होम अर्थात साल (धान) की *धानी जो दीपावली पर मिलती है उसको अग्नि में डालते हैं, या होली में नारियल आदि डालते हैं यह होम है।* 
हवन --- *आह्वाहित देवताओं को आहुति देना जैसे किसी विशेष व्रत में या किसी पर्व या त्यौहार पर या विवाह आदि संस्कारों में जो छोटा अग्निहोत्र कर्म होता है उसे हवन कहते हैं।* 

तन्त्र मत में *मठ व्यवस्था है। मठों में मन्दिर होते हैं जहाँ मूर्ति पूजा होती है।* 
वेदों में मूर्तिपूजा का विरोध है, शिष्णेदेवाः (लिङ्ग योनि पूजकों) का घोर विरोध किया गया है।
*ऋग्वेद सप्तम मण्डल/ सूक्त 21 मन्त्र 05 में कहा है कि,* 
*ऋषि वसिष्ठ इंद्र से शिश्नेदैवाः अर्थात लिङ्ग और भग (शिवलिङ्ग) की पूजा करने वाले यातुधान अर्थात (असुर, दैत्य दानव, आदि शत्रुओं से सुरक्षा की प्रार्थना कर रहे हैं।*
मन्त्र ---
*न यातव इन्द्र जुजुवुर्ना न वन्दना शविष्ठ वेद्यभि।न श्रीरर्द्धयो विष्णुनस्य जन्तोर्मा शिश्नदेवाः अपि गुऋतम् नः।।*
मन्त्र का अर्थ ---
*"हे बलवान इंद्र!* 
(दुष्ट, कृतघ्न, अधार्मिक, विलासी) *शिश्नेदैवाः अर्थात लिङ्ग और भग (शिवलिङ्ग) की पूजा करने वाले यातुधानों * अर्थात (असुर, दैत्य दानव, आदि) शत्रुओं से हमारी रक्षा कीजिए।*
*लिङ्गपूजक असूर लोग हमें परेशान न कर सकें; उन पर हमारी दृष्टि पड़ने, उनकी छाया पड़ने, उनके स्पर्श दोष से, हमारी समृद्धि को आधी न हो पाए। हे सर्वव्यापी विष्णु देव! उनसे हमारी रक्षा कीजिए।*
जबकि, *तन्त्र में लिङ्ग योनि पूजा आवश्यक है।* 

वेदों में  * गुण कर्म  आधारित वर्णाश्रम व्यवस्था है।* 
तन्त्र में *जन्म आधारित जातिप्रथा है।* 

 *वेदों में बालक और कन्याओं सबके लिए संस्कार आवश्यक कर्म है।  संस्कार से ही द्विज कहलाते हैं।* 
 *तन्त्र मत में स्त्रियों और शुद्धों का उपनयन संस्कार नहीं होता है। न वे यज्ञोपवीत धारण कर सकते हैं।* 

 *वेदिक मत में बालक और कन्याओं सबके लिए गुरुकुल शिक्षा और वेदाध्ययन तथा पञ्च महायज्ञ आवश्यक है।* 
जबकि *तन्त्र मत में शुद्रों और स्त्रियों को वेदाध्ययन, वैदिक मन्त्र जप का अधिकार नहीं है।* 
वेदों में *यज्ञों में, संस्करों मे प्रथम पूज्य अग्नि हैं।* 
जबकि *तन्त्र मत में प्रथम पूज्य विनायक लम्बोदर गजानन हैं।* 

वेदों में *गणराज्य का प्रमुख गणपति कहलाता है।  इसलिए व्यवहार में इन्हें प्रथम नागरिक, प्रथम पूज्य, प्रथम निमन्त्रण , प्रथम आमन्त्रण की पात्रता स्वाभाविक थी।*
समिति अर्थात राज्यसभा का सभापति सदसस्पति कहलाता है।

तन्त्र में  *विनायक गजानन को प्रथम पुज्य माना जाता है। विनायक गजानन को गणपति माना जाता है।* 

शंकर जी के *पिशाच गणो मे अष्ट विनायक भी हैं। इन अष्ट विनायकों में से एक लम्बोदर गजानन को पहले शंकर जी के प्रमथ गणों का गणपति और बादमे शंकर जी के सभी गणों का गणपति घोषित कर दिया गया। इसलिए लम्बोदर गजानन को शंकर जी के गणो में प्रथम पूज्य घोषित कर दिया गया।* 

 *श्री पाण्डुरङ्ग वामन काणे ने धर्मशास्त्र का इतिहास भाग -1 पृष्ठ 186 पर स्पष्ट लिखा है कि, अष्ट विनायक - 1 सम्मित, 2 उस्मित, 3 मित, 4 देवयजन, 5 शाल, 6 कटंकट, 7 कुष्माण्ड, और 8 राजपुत्र ये आठों पिशाच हैं और शिवगण हैं।* 

 *शंकर जी की शक्ति वेदों की उमा कहलाती है, जबकि तन्त्र में पहले सती थी फिर सती के दुसरे जन्म में पार्वती कहलाईं।* 

शंकर जी के मित्र तिब्बत निवासी यक्ष कुबेर निधिपति (धनाध्यक्ष) थे। इसलिए निधिपति यक्ष कुबेर को भी रुद्र माना जाता है। तन्त्र में कुबेर को रुद्रगण माना जाता है।

शंकर जी के पुत्र कार्तिकेय देव सेनापति थे। लेकिन तन्त्र में कार्तिकेय की तुलना में विनायक लम्बोदर गजानन का महत्व अधिक है।

 *तन्त्र एक वेद विरुद्ध व्यवस्था का नाम है। तन्त्र का मतलब सकाम कर्म। इसके लिए वेद मन्त्रों का प्रयोग किया जाए या स्मार्त, पौराणिक मन्त्र या तान्त्रिक मन्त्रों का प्रयोग किया जाए यह महत्वपूर्ण नहीं है ।किस भाव और किस उद्देश्य से मन्त्र का उपयोग किया गया है, इसका ही महत्व है।*
*वेदिक धर्म परमात्मा, परमेश्वर सर्वव्यापी विष्णु के प्रति पूर्ण समर्पण का नाम है।* 
*वहाँ कोई व्यक्तिगत माँग नहीं होती। इसलिए वेद मन्त्रों में हम ऐसा करे, हमें ऐसा प्रदान कीजिए, हमारी रक्षा करो ऐसी सामुहिक प्रार्थना है।*
अर्गलास्तोत्र के मन्त्र --- 
*रूपम् देहि, जयम् देहि, यशो देहि , द्विषोजहि जैसी नीजी मांग नहीं मिलेगी।*

 *आगम ग्रन्थोंक्त तन्त्र का समय मत अर्थात तुलनात्मक सात्विक तन्त्र* ---

सनातन धर्म में सर्वप्रथम दक्षिण भारत में अपनाया गया। भगवान आद्य शंकराचार्य जी ने स्मार्त मत चलाकर तन्त्र के समय मत को अपनाया। बाद में दक्षिण भारत के अलवार वैष्णव भक्तों के शिष्य रामानुजाचार्य ने भी अपनाया। (तमिल शब्द अलवार का  हिन्दी में अर्थ जो लीन है। ये अलवार भक्त शुद्र माने जाते हैं।) 
फिर तो यह सभी पन्थों और सम्प्रदायों ने अपने अपने आगम ग्रन्थ, आम्नाय , मठ और मठों में मन्दिर बना कर मूर्ति पूजा प्रारम्भ कर दी। 

* सभी पन्थों और सम्प्रदायों का एक ही तर्क है कि, समय मत तन्त्र सात्विक है, इसमें  स्तम्भन, आकर्षण, मोहन, वशिकरण, उच्चाटन, विद्वेषण और मारण आदि अभिचार कर्म और  मुद्रा, मदिरा, मत्स्य, मान्स और मैथुन आदि पञ्च मकार स्वीकार्य नहीं है। इसलिए यह हमें स्वीकार्य है। लेकिन उन्हें तन्त्र की उपर्युक्त वेद विरोधी मान्यताओं की परवाह इस लिए नहीं रही क्योंकि सभी पन्थों और सम्प्रदायों के आचार्य आर्यावर्त से बाहर दक्षिणापथ में जन्में।*

तन्त्र के *समय मत के अन्तर्गत वेदों के स्थान पर अलग-अलग पन्थों और सम्प्रदायों के अलग-अलग आगम ग्रन्थ और उनके आम्नाय बनाना, वर्ण के स्थान पर जातिप्रथा, आश्रम के स्थान पर मठाम्नाय के अनुसार प्रत्येक पन्थ और सम्प्रदाय के अलग-अलग  मठ बनाना, यज्ञ के स्थान पर इन्हीं मठों में मन्दिर बना कर अपने इष्टदेव की प्रतिमा या मूर्ति स्थापित कर जड़ मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा करके पूजन कर ईश्वर का कार्य स्वयम् मठाधीश को करने में समर्थ घोषित करना।  कर्म फलों के सञ्चित में से इस जन्म में भोगे जा सकने योग्य कर्म फलों के समुच्चय जिसे प्रारब्ध कहते हैं। प्रारब्ध तो सबको ही भोगना पड़ता है इस नीयत प्राकृतिक व्यवस्था के विरुद्ध इष्ट का नाम जप या कोई मन्त्र सिद्ध कर मनोवाञ्छित फल प्राप्त करने का भ्रम पालना, पञ्च महायज्ञ, अष्टाङ्ग योग साधना छोड़कर, हठयोग और नाम जप या मन्त्र जप करने से चार प्रकार के मोक्ष प्राप्त होना जैसी वेद विरुद्ध और विचित्र मान्यताएँ और कर्म स्वीकार किए गए।* 

शंकर जी की शक्ति पार्वती के सम्बन्ध में महाभारत में उल्लेख है कि,---
गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित महाभारत पञ्चम खण्ड,शान्ति पर्व/ मौक्ष पर्व/ अध्याय २८४ पृष्ठ ५१६६ या संक्षिप्त महाभारत का पृष्ठ १२८१ पर दक्षयज्ञ विध्वंस की कथा  में स्पष्ट लिखा है कि, शंकर जी ने पार्वती जी के रुष्ट होने पर उन्हें समझाया था कि, *सृष्टि के आदि में ही प्रजापति ने यज्ञ में रुद्र को भाग नहीं दिया जाने का आदेश दिया था। इसलिए दक्ष द्वितीय प्रजापति ने कनखल में हो रहे यज्ञ में मुझे निमन्त्रण नहीं देकर कोई गलती नहीं की।*
फिर भी पार्वती का क्रोध शान्त न होने के कारण शंकर जी स्वयम् पार्वती जी को लेकर कनखल (हरिद्वार) दक्ष द्वितीय के यज्ञ में  गये। दक्ष यज्ञ में पार्वती द्वारा रुद्र शंकर जी को नहीं बुलाने का विरोध किया । इसपर दक्ष द्वितीय ने पार्वती और शंकर जी के प्रति अपमान जनक व्यवहार किया । इससे रुष्ट होकर शंकर जी ने अपने गण वीरभद्र और भद्रकाली को  आह्वान किया (बुलाया)। फिर शंकर जी के आदेश पर वीरभद्र और भद्रकाली की सेना ने दक्ष यज्ञ विध्वंस कर दिया और दक्ष द्वितीय का सिर काट दिया।
यह देखकर देवताओं के परामर्श से प्रजापति ने संविधान संशोधन कर यज्ञ में रुद्र भाग निकालने की व्यवस्था की।
तब शंकर जी का क्रोध शान्त हुआ और देवताओं और प्रजापति के कहने पर दक्ष द्वितीय की शल्य चिकित्सा कर उनका सिर वापस जोड़ दिया। इस प्रक्रिया में दक्ष द्वितीय का चेहरा भेड़ जैसा दिखने लगा।
तत्पश्चात शंकरजी पार्वती को लेकर सहर्ष वापस कैलाश लौट गए। और देवता भी स्वधाम लौट गए। न दक्ष पुत्री को सती लिखा है, न सती के आत्मदाह का कोई उल्लेख है। बल्कि प्रसन्नता पूर्वक शंकर जी पार्वती सहित वापस कैलाश लौट जाते हैं। चूंकि सति के आत्मदाह का ही उल्लेख नहीं है तो,शंकर जी का विक्षिप्त की भांति सती के भस्मीभूत देह को कन्धे पर लटका कर पूरे भारत भर में घूमने का उल्लेख होने का प्रश्न ही नहीं है। जब शंकर जी सती का भस्मीभूत शरीर कन्धे पर लटका कर घुमाने का उल्लेख नहीं है तो श्रीहरि द्वारा सती के भस्मीभूत शरीर के इक्कावन टुकड़े करने के उल्लेख का प्रश्न ही नहीं है इसलिए जब सती की देह के बावन टुकड़े जहाँ-जहाँ गिरे वहाँ-वहाँ शक्तिपीठ बनने का उल्लेख भी नहीं होना स्वाभाविक ही है। मतलब महाभारत में कोई मनगढ़ंत गप नहीं होकर शुद्ध इतिहास लिखा है ।

जबकि तन्त्र में उल्लेख है कि, शंकर जी प्रजापति प्रथम द्वारा स्थापित धर्म मर्यादा के विरुद्ध तन्त्र मत के आविष्कारक थे।  दक्ष द्वितीय की पुत्री सती ने अपने पिता (दक्ष द्वितीय) की इच्छा के विरुद्ध तन्त्र मत के सृजेता और पालनकर्ता शंकर जी से विवाह किया।
इससे रुष्ट होकर दक्ष द्वितीय ने सती की अवहेलना करना शुरू कर दिया।
जब दक्ष द्वितीय ने कनखल में बड़े यज्ञ का आयोजन किया तो पुत्री सती और दामाद शंकर जी को नहीं बुलाया।
इससे क्रोधित होकर सती शंकर जी के आदेश की अवहेलना कर पिता दक्ष द्वितीय के यज्ञ में कनखल गई।
वहाँ श्री हरि, हिरण्यगर्भ ब्रह्मा, प्रजापति ब्रह्मा, इन्द्रादि देवताओं और पिता दक्ष प्रजापति द्वितीय  और आमन्त्रित देवताओं, ऋषियों और ऋत्विकों को क्रोध पूर्वक फटकार लगाई।
इससे दक्ष द्वितीय ने सती को डांटा और वापस लौटने का आदेश दिया। ऋषियों में दधीचि आदि शैवों ने सती का समर्थन किया। और श्री हरि, हिरण्यगर्भ ब्रह्मा, प्रजापति ब्रह्मा, इन्द्रादि देवताओं और दक्ष प्रजापति द्वितीय की घोर भर्त्सना की।
इस कारण विवाद बढ़ा और सती ने यज्ञ भङ्ग करने के उद्देश्य से यज्ञाग्नि से आत्मदाह कर लिया।
सती की देह जलकर भस्म हो गई। तो शंकर जी को सूचित किया, शंकर जी तत्काल आ गये और वीरभद्र का आह्वान किया। शंकर जी के आदेश से वीरभद्र और शिवगणों ने यज्ञाग्नि बुझा दी। ऋत्विकों और उपस्थित देवगणों और ऋषियों तथा दक्ष द्वितीय के साथ मारपीट, हत्या आदि शुरू कर दी। दक्ष द्वितीय की गर्दन काट दी।
फिर देवताओं और ऋषियों के निवेदन पर शंकर जी ने दक्ष द्वितीय को बकरे का सिर लगा दिया।
बकरे के सिर वाले दक्ष ने शंकर जी से क्षमा मांगी। तो शंकर जी ने बकरे के सिर वाले दक्ष को क्षमा कर वरदान दे दिये।
सभी देवता अपने-अपने धाम लौट गए।
दक्ष (द्वितीय) का सिर जोड़ कर वरदान के बाद (पता नहीं क्या हुआ कि,) शंकर जी अचानक विक्षिप्त हो गये और सती की भस्मीभूत देह उठाकर कन्धे पर लटका कर पूरे भारत वर्ष में घूमते फिरे।
फिर श्रीहरि ने शंकर जी के कन्धे पर लटकी सती की भस्मीभूत देह के चक्र से इक्कावन टुकड़े कर दिए।
ये टुकड़े जहाँ-जहाँ गिरे वहाँ-वहाँ बावन शक्तिपीठ बन गये।
टुकड़े भी इतने छोटे थे कि, कहीँ ओठ गिरा, तो कहीं कोहनी तो कहीं भग गिरी।

यह समझ नहीं आया कि, दक्ष द्वितीय को क्षमा करने तक शान्त हो चुके शंकर जी अचानक अशान्त होकर विक्षिप्त कैसे हो गये?
भस्मीभूत देह को उठाकर कन्धे पर कैसे लादा? फिर उस भस्मीभूत देह के इतने छोटे-छोटे टुकड़े क्यों किये?

तन्त्र मत में प्रचेताओं के पुत्र दक्ष द्वितीय की पुत्री सती का दक्ष यज्ञ में आत्मदाह करने का गलत उल्लेख, शंकर जी भस्मीभूत सती का शव कन्धे पर टांगकर तत्कालीन पूरे भारत भर में विक्षिप्तों की भांति भटकने का गलत उल्लेख, भगवान श्रीहरि द्वारा शंकर जी के कन्धे पर टंगे सती के भस्मीभूत देह के इक्कावन टुकड़े करने का गलत उल्लेख और सती के भस्मीभूत देह के टुकड़े जहाँ-जहाँ गिरे उन उन स्थानों पर बावन शक्तिपीठ बनाने का गलत उल्लेख,  हिमवान (हिमाचल) और (अर्यमा-स्वधा की पुत्री)  हिमवान की पत्नी मेनावती के गर्भ से पार्वती के रूप में सती का पुनर्जन्म होने का गलत उल्लेख, शंकरजी से विवाह करने हेतु पार्वती द्वारा घोर तपस्या करने का उल्लेख, शंकरजी को विवाह करने के लिए कामदेव द्वारा कामबाण चलाने पर रुष्ट होकर शंकर जी द्वारा कामदेव को भस्म कर देने का गलत उल्लेख;  इस प्रकार के अनेक गलत उल्लेख किये गये हैं। ऐसे ही और तन्त्र मत में शक्ति के बिना शिव को शव के समान माना जाने का मुर्खतापूर्ण तर्क दिया जाता है। इसलिए पुराणों के नाम से प्रचारित संस्कृत में लिखे गए परवर्ती साहित्य के ग्रन्थों के ये उल्लेख अग्राह्य एवम् त्याज्य हैं।

वेद विरुद्ध व्यवस्था को ही तन्त्र कहते हैं। एक मान्यता है कि, शंकर जी तन्त्र शास्त्र के जनक हैं; इसलिए तन्त्र मत के इष्ट देव माने जाते हैं। 
मतलब प्रथम दृष्टया ही झूठ का पुलिन्दा लगता है। फिर महाभारत में उल्लेखित सच्चा इतिहास जानकार भी शंकरजी और उमा पार्वती पर ऐसे घृणित झूठे मन गड़न्त आरोप लगाने का दुष्कृत्य क्यों किया गया।
फिर भी मन नहीं भरा तो शंकर जी जैसे महा विष विज्ञानी देवता को गंजेड़ी-भंडेड़ी और पत्नी को नग्न कर नचवाने का झूठा आरोप लगा दिया। लानत है ऐसे तान्त्रिकों को।
यह सब स्पष्ट करते हैं कि, कि, इस तन्त्र का आधार ही झूठा है। तन्त्र वैदिक रुद्र देवता शंकर जी की रचना हो यह कदापि सम्भव नहीं है। यह किसी अघोरी की रचना ही हो सकती है।
दुसरी मान्यता के अनुसार तन्त्र शुक्राचार्य की रचना है। शुक्राचार्य जी के पुत्र त्वष्टा ने की, युनान के पास क्रीट में शाक्त पन्थ की स्थापना की थी। त्वष्टा के पुत्र और शुक्राचार्य जी के पौत्र विश्वरूप ने मङ्गोलिया के तन्त्रधर्म के धर्मशास्त्र तन्त्र शास्त्र की रचना की थी।
भारत में तन्त्र शास्त्र का प्रचार अत्री और अनुसुया के पुत्र दत्तात्रेय ने किया । दत्तात्रेय के दो प्रमुख शिष्य थे मण्डला और जबलपुर का शासक कार्तवीर्य सहस्रार्जून तथा  लक्ष्यद्वीप का शासक रावण।

तन्त्र शास्त्र के समय मत में दुर्गा सप्तशती  मुख्य ग्रन्थ है। दुर्गा सप्तशती के प्रथम चरित्र में उल्लेख के अनुसार सृष्टि के आदि में मधु केटभ वध के लिए हिरण्यगर्भ ब्रह्मा ने योगनिद्रा का आश्रय लेकर सोये हुए नारायण को पुकारा तब नारायण की आंखों से योग निद्रा  प्रथक होकर नारायणी अत्यन्त कृष्ण वर्णा महाकाली स्वरूप में प्रकट हुई। 
ध्यातव्य है कि नारायण तथा नारायणी ही श्री हरि और पद्मासना गज सेविता कमला देवी के स्वरूप में प्रकट हुए। 
श्री हरि ने पाँच हजार वर्षों तक बाहु युद्ध कर मधुकेटभ का वध कर दिया।
दुर्गा सप्तशती के मध्यम चरित्र में महिशासुर से त्रस्त देवताओं द्वारा हिरण्यगर्भ ब्रह्मा जी के नेतृत्व में प्रजापति ब्रह्मा, इन्द्र, द्वादश आदित्य, अष्ट वसु और शंकर जी सहित एकादश रुद्र, और मनु सहित सहित तैंतीस देवताओं ने नारायण श्री हरि की शरण ग्रहण कर गुहार लगाई तो नारायण श्रीहरि ने अत्यन्त क्रोध किया और उनके शरीर से तेज प्रकट हुआ, साथ ही हिरण्यगर्भ ब्रह्मा, प्रजापति ब्रह्मा, इन्द्रादि सभी देवताओं के शरीर से भी तेज प्रकट हुआ। सभी तेज मिलकर एक देवी का स्वरूप प्रकट हुआ। जिसे सभी देवताओं ने वस्त्राभूषण और अपने-अपने अस्त्र-शस्त्रादि भेट किये।
फिर प्रजापति आदि सभी देवताओं ने उस देवी की स्तुति कर महिशासुर के वध की प्रार्थना की। फिर उन देवी ने सेना सहित महिशासुर का नाश कर दिया। शेष बचे दैत्य दानव असुर पाताल लोक लौट गए। देवताओं ने प्रसन्नता पूर्वक देवी की स्तुति की और भविष्य में भी ऐसी ही सहायता प्रदान करने की प्रार्थना की। देवी ने भी देवताओं को आश्वस्त किया।
दुर्गा सप्तशती के उत्तम चरित्र में शुम्भ निशुम्भ के उत्पातों से परेशान देवताओं ने हिमालय पर एकत्रित हो कर देवी को पुकारा। उसी समय वहाँ से गुजर रही भगवती पार्वती ने देवताओं से पुछा आप लोग किसकी प्रार्थना कर रहे हो? तभी भगवती पार्वती के शरीर कोश से अत्यन्त गोर वर्ण परम सुन्दरी कौशिकी देवी प्रकट हुई। और उन्होंने भगवती पार्वती को कहा देवी ये मेरी आराधना कर रहे हैं। इसके बाद गौरवर्णी पार्वती काली हो गई और हिमालय पर विचरण करने वाली कालिका या गढ़ कालिका कहलाई।
फिर देवताओं ने प्रसन्न होकर देवी कोशिकी की स्तुति की और शुम्भ निशुम्भ के आतंक से मुक्ति की प्रार्थना की।
इन्ही देवी की सहायतार्थ सभी देवताओं की शक्तियाँ आई जो सप्त मातृकाएं कहलाती है।
तथा चण्डिका शक्ति भी आई जिन्होंने शंकर जी को दूत बनाकर शुम्भ निशुम्भ को समझाने भेजा और शुम्भ निशुम्भ को सेना सहित पाताल लौट जाओ या मरने के लिए तैयार हो जाओ का सन्देश दिया, इसलिए वे शिव दूति कहलातीं हैं। ये अत्यन्त कृषकाय और सेकड़ों गिदड़ियों के समान भयंकर शब्द करती थी। और असुरों का रक्तपान करने को तत्पर रहती थी।
कोशिकी के नेत्रों से अत्यन्त भयानक और कोयले के समान काली, विशाल मुख वाली मान्स रहित केवल कंकाल पर चमड़ी वाली काली देवी प्रकट हुई। भैरव इनका गण था। चण्ड मुण्ड की गर्दन काट कर उनके सिर कोशिकी को भेंट किये। तब कोशिकी ने इन्हें चामुण्डा नाम दिया।
चामुण्डा युद्ध में दैत्य दानवों को रथ, हाथी घोड़े सहित खा जातीं थीं। इन्होंने और चण्डिका शक्ति (शिव दुति) ने रक्त बीज का एक बुन्द रक्त भी भूमि पर नहीं गिरने दिया। खप्पर में रक्त गिरते ही उत्पन्न हुए राक्षसों को तुरन्त खा जाती थी। रक्त बीज का रक्त सीधे काली के मुख में गिरते ही उत्पन्न राक्षसों को काली चट कर जाती। इस प्रकार रक्त विहीन रक्त बीज का वध कोशिकी ने कर दिया।
शुम्भ ने चुनौती दी की अकेली लड़ो  तो सभी देवियाँ कोशिकी में लय हो गई। फिर उन्होंने शुम्भ को भी मार डाला। और शेष बचे डरे हुए असुर पाताल में प्रवेश कर गये।
इस कथा में उल्लेखित काली जो चामुण्डा भी कहलातीं हैं और उनका वीर भैरव और भैरव की शक्ति पद्मा भैरवी तान्त्रिकों की मुख्य उपास्य हैं।

इसके विपरित वामाचारी दत्त सम्प्रदाय, काली और भैरव के उपासकों के तन्त्र ग्रन्थ भैरव तन्त्र, शारदा तिलकम्, रुद्र यामल तन्त्र, दत्तात्रेय तन्त्रम् आदि हैं।
 इसका उपयोग आकर्षण (जबरजस्ती बुलाना), मोहन (मोहित करना), वशीकरण (अपने नियन्त्रण में लेना), स्थम्भन (रोक देना, स्थिर कर देना), उच्चाटन (मन विचलित कर देना, छोड़ कर भागने की इच्छा पैदा करना), विद्वेषण (परस्पर झगड़ा-फसाद करवाना), बिमार करना, मारण (विष प्रयोग आदि के द्वारा हत्या करना) आदि अभिचार कर्म के लिए ही होता हैं और इसमें अश्लील मुद्रा बना कर दिखाना, मदिरा पान, मत्स्य भोजन, मान्स भोजन के उपरान्त भैरवी के साथ मैथुन करके मन्त्र के अन्त में हूम् फट लगाकर हवन सामग्री फेंकने जैसे आहुति डाली जाती है। जिसे पञ्च मकार भी साधना कहते है। उक्त तन्त्र ग्रन्थों में ये अभिचार और पञ्च मकार साधना भी स्वीकार्य है। 

इससे निष्कृष्ट तन्त्र शाबरी तन्त्र हैं, जिसके मन्त्र राजस्थानी भाषा जैसी बोलियों मे भी हैं, ओम् नमो आदेश गुरु को ....... फुरो मन्त्र इश्वरो वाचा। जैसे वाक्य में होते हैं। इसका उद्देश्य ही अभिचार कर्म है और उक्त पञ्च मकार अनिवार्य है ।

इससे भी निष्कृष्ट तन्त्र डाबरी तन्त्र है जिसमें आकर्षण, मोहन या वशिकरण मन्त्रों में ओम के स्थान पर मोम् का प्रयोग और उच्चाटन, मारण आदि में डोम् का प्रयोग किया जाता है।
इसमें शव साधना होती है, यहाँ तक कि, शव भक्षण और शव से मैथुन तक करते हैं 

ये तन्त्र कापालिक तन्त्र मत है। जो केवल अघोरी ही कर पाते हैं।

सोमवार, 1 दिसंबर 2025

महाभारत युद्ध की मुख्य घटनाओं की तिथि और नक्षत्र।

परम आदरणीय स्व श्री ग.वा. कवीश्वर जी की पुस्तकें  जो आर्काइव पर पढ़ी जा सकती है ---
1 महाभारत के तेरह वर्ष
और
2 महाभारत के गुढ़ रहस्य तथा
3 गीता तत्व मीमांसा
के आधार पर आलेख प्रस्तुत है।

*गीता जयन्ती* अर्थात *युद्धरम्भ के दिन* युद्धारम्म्भ से ठीक पहले श्रीकृष्ण अर्जुन संवाद रूपी श्रीमद्भगवद्गीता प्रवचन की वास्तविक तिथि, नक्षत्र *अमान्त कार्तिक पूर्णिमान्त मार्गशीर्ष कृष्ण अमावस्या चित्रा नक्षत्र के दिन है।*

*भीष्म पितामह के शरशय्या पतन अमान्त मार्गशीर्ष पूर्णिमान्त पौष कृष्ण तृतीया आर्द्रा नक्षत्र के दिन सायंकाल में हुआ।*

सञ्जय ने भीष्म पितामह के शरशय्या पतन पश्चात कुरुक्षेत्र से हस्तिनापुर जाकर धृतराष्ट्र को जो युद्ध विवरण सुनाया वह महाभारत में भीष्म पर्व कहलाता है। इसी भीष्म पर्व सुनाने के अन्तर्गत *धृतराष्ट्र ने भी सञ्जय के मुख से गीता प्रवचन अमान्त मार्गशीर्ष पूर्णिमान्त पौष कृष्ण चतुर्थी, पुनर्वसु नक्षत्र के दिन सुना।*

*अभिमन्यु का वध अमान्त मार्गशीर्ष पूर्णिमान्त पौष कृष्ण नवमी उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के दिन हुआ था।*

*जयद्रथ वध अमान्त मार्गशीर्ष पूर्णिमान्त पौष कृष्ण एकादशी, चित्रा नक्षत्र के दिन सायंकाल में हुआ था ।*

*द्रोणाचार्य जी का वध अमान्त मार्गशीर्ष पूर्णिमान्त पौष कृष्ण द्वादशी, स्वाती नक्षत्र के दिन हुआ था।*

*कर्ण का वध पौष शुक्ल प्रतिपदा, मूल नक्षत्र के दिन हुआ था।*

*शल्य जी का वध पौष शुक्ल तृतीया, उत्तराषाढा नक्षत्र के दिन मध्याह्न मे हुआ था।*

*बलराम जी की* 42 दिन की *तीर्थ यात्रा पूर्ण* होना,भीम द्वारा *दुर्योधन की जाँघ तोड़ना* ,
*दुर्योधन की मृत्यु* , अश्वत्थामा द्वारा सोते हुए *द्रोपदी के पाँचों पुत्रों की हत्या,* सभी घटनाएँ
*पौष शुक्ल चतुर्थी, श्रवण नक्षत्र को सायंकाल से रात्रि तक में हुई।*
*भीष्म पितामह ने देहत्याग माघ शुक्ल पूर्णिमा को ब्रह्म मुहूर्त या अरुणोदय काल में किया।*

पूर्ण विवरण नीचे दिया जा रहा है।

अज्ञात वास समाप्ति पश्चात पाण्डव विराट राज्य के उपलव्य नगर चले गए। दुर्योधन ने उनका राज्य लौटाने से इन्कार कर दिया। कौरवों और पाण्डवों में युद्ध की तैयारियाँ होने लगी।

इस बीच धृतराष्ट्र ने सञ्जय को दूत बनाकर बिना किसी न्यायोचित प्रस्ताव के पाण्डवों के पास भेजा। कोई समझौता नहीं हो पाया।

फिर पाण्डवों ने अपनी ओर से अन्तिम शान्ति प्रयास करने हेतु भगवान श्रीकृष्ण को हस्तिनापुर जाने का अनुरोध किया। शरद ऋतु समाप्त हो कर

हेमन्त ऋतु के प्रारम्भ होने को थी तब कार्तिक मास में जब चन्द्रमा रेवती नक्षत्र पर था, उस दिन श्रीकृष्ण ने मैत्र मुहूर्त में एकलव्य नगर से हस्तिनापुर के लिए यात्रा प्रारम्भ की।

अर्थात कार्तिक शुक्ल त्रयोदशी रेवती नक्षत्र के दिन श्रीकृष्ण ने उपलव्य नगर से प्रयाण किया।

अमान्त कार्तिक पूर्णिमान्त मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की पञ्चमी आर्द्रा नक्षत्र के दिन सायंकाल वृकस्थल पहूँचे, और वृकस्थल में ही रात्रि विश्राम किया।

*षष्ठी, पुनर्वसु नक्षत्र में श्रीकृष्ण हस्तिनापुर में प्रवेश किया। रात्रि विश्राम विदुर जी के घर किया।*

*अमान्त कार्तिक पूर्णिमान्त मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की सप्तमी पुष्य नक्षत्र के दिन धृतराष्ट्र की राज सभा में शान्ति प्रस्ताव रखा‌ और कहा कि, केवल पाँच गांव देदो और शान्ति पूर्वक रहो।लेकिन दुर्योधन ने सुई की नोक के बराबर भूमि देने से इन्कार कर दिया और भगवान श्रीकृष्ण को बन्दी बनाने का प्रयत्न किया। भगवान श्रीकृष्ण तत्काल राजसभा से बाहर निकल गये।*

*फिर विदुर जी के घर से जाते समय कर्ण को समझाने का प्रयास किया लेकिन कर्ण नहीं माना तो भगवान श्रीकृष्ण ने आठवें दिन पश्चात युद्धारम्भ की घोषणा कर दी। जिसे कर्ण ने भीष्ण आदि को बतलाया।*

 *भगवान श्रीकृष्ण ने तुरन्त ही हस्तिनापुर से प्रस्थान कर दिया।*

*उसी दिन सायंकाल में श्रीकृष्ण उपलव्य भी पहूँच गये। पाण्डव सेना ने उपलव्य से प्रस्थान ।*

*अमान्त कार्तिक पूर्णिमान्त मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की सप्तमी पुष्य नक्षत्र के दिन ही बलराम जी की प्रभास क्षेत्र की तीर्थ यात्रा प्रारम्भ हुई।*

*अर्थात अमान्त कार्तिक पूर्णिमान्त मार्गशीर्ष कृष्ण सप्तमी पुष्य नक्षत्र के दिन भगवान श्रीकृष्ण ने आठवें दिन से युद्ध प्रारम्भ करने की घोषणा की।*

*अष्टमी तिथि आश्लेषा नक्षत्र में दोनों सेनाएँ कुरुक्षेत्र पहूँची। और नवमी मघा नक्षत्र से युद्धाभ्यास प्रारम्भ हो गया।*

*चतुर्दशी उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र के दिन कृतवर्मा दुर्योधन से मिले।*

*अमान्त कार्तिक पूर्णिमान्त मार्गशीर्ष कृष्ण अमावस्या चित्रा नक्षत्र के दिन युद्धाभ्यास के लिए अन्तिम दिन दोनों सेनाओं के मध्य रथ खड़ा कर श्रीकृष्ण अर्जुन संवाद हुआ जिसे श्रीमद्भगवद्गीता उपदेश कहा जाता है।*

इसके बाद युद्धारम्भ हुआ। प्रत्यक्ष युद्ध का प्रथम दिन रहा। 

मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा विशाख नक्षत्र में प्रथम विश्राम दिवस।

 *अमान्त मार्गशीर्ष पूर्णिमान्त पौष कृष्ण पक्ष तृतीया आर्द्रा नक्षत्र प्रत्यक्ष युद्ध का दसवाँ दिन। सायंकाल में भीष्म का शरशय्या पर पतन।* भीष्म का शर शय्या पर प्रथम दिवस।

*अमान्त मार्गशीर्ष पूर्णिमान्त पौष कृष्ण पक्ष चतुर्थी पुनर्वसु नक्षत्र दसवाँ विश्राम दिवस। द्रोणाचार्य जी का कौरव सेनापति पद पर अभिषेक। सञ्जय ने हस्तिनापुर पहूँच कर धृतराष्ट्र को अब तक का युद्ध विवरण सुनाया। जिसे महाभारत का भीष्म पर्व कहते हैं। सञ्जय के मुख से धृतराष्ट्र ने श्रीमद्भगवद्गीता प्रवचन सुना।*

*अमान्त मार्गशीर्ष पूर्णिमान्त पौष कृष्णांक पक्ष नवमी, उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र प्रत्यक्ष युद्ध का तेरहवाँ दिन अभिमन्यु वध।*

दशमी हस्त नक्षत्र तेरहवाँ विश्राम दिवस।

*अमान्त मार्गशीर्ष पूर्णिमान्त पौष कृष्ण पक्ष एकादशी, चित्रा नक्षत्र प्रत्यक्ष युद्ध का चौदहवाँ दिन जयद्रथ वध, मशालें जलाकर रात्रि में भी बिना विश्राम के युद्ध जारी रहा।*

*अमान्त मार्गशीर्ष पूर्णिमान्त पौष कृष्ण पक्ष द्वादशी स्वाती नक्षत्र प्रत्यक्ष युद्ध का पन्द्रवाँ दिवस। द्रोणाचार्य जी का वध।*

*अमान्त मार्गशीर्ष पूर्णिमान्त पौष कृष्ण पक्ष त्रयोदशी, विशाखा नक्षत्र, विश्राम दिवस, कौरव सेनापति पद पर कर्ण का अभिषेक, सञ्जय ने हस्तिनापुर जाकर धृतराष्ट्र को युद्ध विवरण सुनाया।*

पौष शुक्ल पक्ष 

*पौष शुक्ल पक्ष, प्रतिपदा, मूल नक्षत्र, प्रत्यक्ष युद्ध का सत्रहवाँ दिन, कर्ण वध।*

*पौष शुक्ल पक्ष, द्वितीया, पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र, सत्रहवाँ विश्राम दिवस, कौरव सेनापति पद पर शल्य का अभिषेक। सञ्जय ने हस्तिनापुर जाकर धृतराष्ट्र को युद्ध विवरण सुनाया।*

*पौष शुक्ल पक्ष, तृतीया, उत्तराषाढा नक्षत्र, प्रत्यक्ष युद्ध का साढ़े सत्रहवाँ दिन, शल्य वध के पश्चात युद्ध विराम।*

*पौष शुक्ल पक्ष, चतुर्थी, श्रवण नक्षत्र, प्रत्यक्ष युद्ध का अठारहवाँ दिन, बलराम जी के तीर्थ यात्रा के बयालिसवें दिन की समाप्ति । आधा दिन भीम और दुर्योधन का गदा युद्ध होकर प्रत्यक्ष युद्ध का अठारहवाँ दिन पूर्ण हुआ। अश्वत्थामा द्वारा द्रोपदी के पाँचों पुत्रों की नीन्द में ही हत्या करना, दुर्योधन को तालाब से निकाल कर गदा युद्ध में भीम द्वारा दुर्योधन की जाँघ तोड़कर मरणासन्न करना। भीष्म पितामह की शर शयूपर सत्रहवीं रात्रि।*

पौष शुक्ल पक्ष, पञ्चमी, धनिष्ठा नक्षत्र, दुर्योधन, द्रोपदी पुत्रों की अन्त्येष्टि।शौच पालन मास प्रारम्भ।

*माघ शुक्ल पक्ष चतुर्थी, शतभिषा नक्षत्र, शौच पालन मास समाप्त।*

माघ शुक्ल पक्ष पञ्चमी, पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र, पाण्डवों का हस्तिनापुर प्रवेश।


*माघ शुक्ल पक्ष षष्ठी, उत्तराभाद्र नक्षत्र से नवमी भरणी नक्षत्र तक युधिष्ठिर का राज्याभिषेक।*

*माघ शुक्ल पक्ष दशमी, कृतिका नक्षत्र, भगवान श्रीकृष्ण और पाण्डवों की भीष्म पितामह से भेंट।*

*माघ शुक्ल पक्ष एकादशी, रोहिणी नक्षत्र से पूर्णिमा, पुष्य नक्षत्र तक शर शय्या से भीष्मोपदेश।*

*माघ शुक्ल पक्ष पूर्णिमा, पुष्य नक्षत्र , भीष्म पितामह की शर शय्या पर अट्ठावनवीँ रात्रि समाप्ति बेला में उत्तरायण प्रारम्भ होने पर भीष्म पितामह द्वारा देहत्यागा।*


शुक्रवार, 28 नवंबर 2025

ब्राह्मण, और क्षत्रिय वंश

वेद, ब्राह्मण ग्रन्थ, वाल्मीकि रामायण, महाभारत और विष्णु पुराण के अनुसार, 
प्रजापति के पुत्र दक्ष-प्रसुति, रुचि-आकुति, कर्दम-देवहुति तथा स्वायम्भुव मनु-शतरूपा भूमि के प्रजापति हुए।
धर्म तथा उनकी तेरह पत्नियाँ, अग्नि और स्वाहा तथा पितर और स्वधा भी प्रारम्भ में भूमि पर ही रहे। और प्रजा उत्पन्न की।

इनके अलावा  मरीची-सम्भूति, भृगु-ख्याति, अङ्गिरा-स्मृति, वशिष्ट-ऊर्ज्जा, अत्रि-अनसुया, पुलह-क्षमा, पुलस्य-प्रीति, कृतु-सन्तति की सन्तान ब्रह्मर्षि हुए जो मूलतः धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में रहते थे और वहाँ से अन्य स्थानों पर गये।
स्वाम्भुव मनु-शतरूपा की सन्तान - प्रियव्रत के पुत्र आग्नीध्र हुए। आग्नीध्रके पुत्र अजनाभ या नाभि हुए जिन्हें भारतीय उप महाद्वीप का शासनाधिकार मिला। अजनाभ के पुत्र ऋषभदेव हुए, ऋषभदेव के पुत्र भरत चक्रवर्ती हुए जिनके द्वारा इस क्षेत्र को भारतवर्ष नाम दिया। इन्ही भरत चक्रवर्ती की सन्तान परम्परा मुनुर्भरत कहलाई। ये सब क्षत्रिय कहलाते थे। मनुर्भरतों में दिवोदास के पुरोहित पहले भृगु थे। फिर वशिष्ठ जी हुए जो दिवोदास के पुत्र सुदास के समय भी रहे।
मनुर्भरतों का क्षेत्र भी हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, पञ्जाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तरी राजस्थान तथा उत्तरी मध्य प्रदेश (चम्बल,ग्वालियर सम्भाग) वाले क्षेत्र था। यह क्षेत्र आर्यावर्त कहलाता था।

पञ्जाब, और हरियाणा धर्म क्षेत्र कहलाता था।
हरियाणा के कुरुक्षेत्र अर्थात धर्म का राज्य क्षेत्र था। कुरुक्षेत्र के आस-पास का क्षेत्र धर्मक्षेत्र के अलावा ऋषि देश, गोड़ प्रदेश और मालवा क्षेत्र कहलाता है। गोड़ प्रदेश के निवासी आद्यगोड़, श्रीगोड़, गुजरगोड़ आदि पञगोड़ ब्राह्मण हुए। 
विक्रमादित्य के दादाजी नबोवाहन भी इसी क्षेत्र के निवासी मालव गणों के प्रमुख थे। उनके पुत्र महेन्द्रादित्य गन्धर्वसेन ने सोनकच्छ को राजधानी बनाया। महेन्द्रादित्य गन्धर्वसेन के पुत्र भृतहरि - और विक्रमसेन हुए। इन्होंने उज्जैन को राजधानी बनाया। तब से यह पठार मालवा कहलाया।

 मनुर्भरतों में तृत्सु वंश में उत्पन्न दिवोदास और उनके पुत्र सुदास के समय शत वर्षीय दशराज युद्ध हुआ। 

मरीचि नन्दन कश्यप के पुत्र आदित्य हुए जो तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान, किर्गिस्तान, पाकिस्तान, जम्मू कश्मीर, लद्दाख, नेपाल, भूटान, तिब्बत में बसे, यह क्षेत्र स्वर्ग कहलाता था।  ब्रह्मावर्त भी यही क्षेत्र कहलाता था।
इन्ही आदित्यों में से सप्तम आदित्य विवस्वान के पुत्र श्राद्ध देव के समय जल प्रलय हुआ जिसका वर्णन शतपथ ब्राह्मण में भी है और तनख (बाइबल ओल्ड टेस्टामेण्ट) में भी है।
इन श्राद्ध देव को महामत्स्य की कृपा से सभी मूल जीवों और ऋषियों सहित कश्मीर क्षेत्र में हिमालय के किसी शिखर पर सुरक्षित पहूँचाया।
इन्ही श्राद्ध देव को विवस्वान का पुत्र होने के कारण नामकरण वैवस्वत मनु हुआ । और इनके काल को वैवस्वत मन्वन्तर कहते हैं।इन वैवस्वत मनु की सन्तान सूर्य वंशी कहलाए; कश्यप ऋषि की सन्तान होने के कारण महर्षि कश्यप ने इन्हें कश्मीर में बसाया था। ये ऋषि सन्तान होने के कारण मनुर्भरतों के समान भारतीय मूल के ही थे। सूर्यवंश में इक्ष्वाकु वंश प्रमुख रहा। इक्ष्वाकु वंश में भी रघुवंश प्रमुख रहा। ये भी क्षत्रिय कहलाए। इस वंश की राजधानी अयोध्या थी।

भरत चक्रवर्ती की सन्तान मुनुर्भरतों में तृत्सु वंश में उत्पन्न दिवोदास और उनके पुत्र सुदास के समय टर्की से आये चन्द्रवंशी अनु, दुह, यदु, पुरु और तुर्वसु के वंशजों से सौ वर्ष तक दशराज युद्ध हुआ। इसमें वैवस्वत मनु की सन्तान आदित्यों ने दिवोदास और सुदास का साथ दिया। जबकि, सीरिया के नागों ने चन्द्रवंशियों का साथ दिया।

शत वर्षीय दशराज युद्ध में समझौता हुआ। इसके अन्तर्गत कश्मीर में बसे सूर्यवंशियों को अयोध्या सोपा गया। चन्द्र वंशियों को और नागों को कश्मीर में बसने की अनुमति दी गई।

हिमाचल प्रदेश, पञ्जाब, हरियाणा, पश्चिम उत्तर प्रदेश, उत्तरी राजस्थान तथा उत्तरी मध्य प्रदेश (चम्बल,ग्वालियर सम्भाग) वाले क्षेत्र में दक्ष-प्रसुति, रुचि-आकुति और कर्दम-देवहुति का क्षेत्र था। यहाँ पञ्चायती राज व्यवस्था थी।

पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, मध्य भारत और गुजरात स्वायम्भुव मनु-शतरूपा का शासन क्षेत्र था। जिसमें गणतन्त्र था।
दक्षिण भारत में धर्म के पुत्र दृविण और उनकी सन्तानों का शासन था।
मनुर्भरतों वंश का स्वतन्त्र अस्तित्व समाप्त हो गया। अयोध्या वैवस्वत मन्वन्तर में सूर्यवंशियों की राजधानी बनी।
बाद में चन्द्रवंशी बिहार के गया क्षेत्र और झारखण्ड तरफ फैल गये।  जब नाग कश्मीर में प्रबल हो गये तो तो वे भी भारत के अन्य क्षेत्रों में यथा नगालैण्ड, मध्यभारत, नागपुर, राजस्थान तक फैल गये।
चन्द्रवंशियों ने प्रयागराज को राजधानी बनाया।
द्वापर युग में तो पहले हस्ति ने हस्तिनापुर बसाया फिर अजमीढ़ ने पुष्कर के पास अजमेरु (अजमेर) बसाया। पाण्डवों ने इन्द्रप्रस्थ बसाया। जिसे पृथ्वीराज चौहान ने दहली नाम दिया।
मनुर्भरतों का तो नाम ही नहीं रहा। किसी समय मनुर्भरतों को क्षत्रिय कहते थे। फिर सूर्य वंशी भी क्षत्रिय कहलाए। चन्द्रवंशियों का वर्चस्व बढ़ा तो भी क्षत्रिय कहलाने लगे। फिर नागों को भी क्षत्रिय मान लिया गया। जो अब कालबेलिया कहलाते हैं।

वेद ज्ञान परमात्मा में ही स्थित है, यह जानकर ही वेदपाठ करना सार्थक है।

ऋग्वेद १.१६४.३९

ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन्देवा अधि विश्वे निषेदुः।
यस्तन्न वेद किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासते।।

अर्थ ---

वैदिक ज्ञान ऋचा अविनाशी अक्षर, सर्वव्यापी परम व्योम में, जिस में विश्व के समस्त देवता स्थित हैं या रहते हैं या हैं।
जो यह नहीं जानता, वह ऋग्वेद का क्या करेगा? अर्थात उसके द्वारा केवल वेद पाठ केवल दोहराना मात्र है। जो यह जानते हैं, वे ही परम अभेद (एकत्व) जानने वाले ज्ञानी हैं।

बुधवार, 26 नवंबर 2025

अहोरात्र में काल।

अहोरात्र में इतने काल होते हैं।⤵️
सूर्योदय, प्रातः, सङ्गव, मध्याह्न, अभिजित मुहूर्त, मध्याह्न काल, विजय मुहूर्त, अपराह्न काल, सायाह्न, सूर्यास्त, गोधुलि वेला, सायं सन्ध्या, प्रदोषकाल, रात्रि, मध्यरात्रि, महानिशा यानी महानिशिथ काल, उत्तर रात्रि, ब्रह्म मुहूर्त, प्रातः सन्ध्या, अरुणोदय काल। या फिर किसी लग्न विशेष ।

मानव जीवन के कर्तव्य ब्रह्म मुहूर्त में और रात्रि में शयन पूर्व परमात्मा का स्मरण, सर्वजन हिताय सेवा,दुसरों की गलती देख स्वयम् में सुधार और अधिकतम अर्जन।

मानव जीवन के कर्तव्य

परमात्मा किसी का भाग्य निर्धारित नहीं करता है।
प्रारब्ध तो अपने अनन्त जन्मों के कर्मों के सञ्चित में से इस जन्म में भोगे जा सकने वाले कर्मों का उदय मात्र है।
सत्सङ्ग और सत्कर्म से बड़े से बड़ा सञ्कट ऐसे निकल जाता है कि, कई बार तो पता भी नहीं चलता।
लेकिन कुसङ्गति में पड़े और अधर्मी को तो राज्य भी मिल जाए तो भी वह सुखी नहीं हो पाता है।
प्रातःकाल उठते से ही हरि स्मरण कर लो तो दिन भर हरिनाम संकीर्तन याद आता रहता है ‌
रात को सोते समय हरि स्मरण कर लो तो रात भर स्वप्न में भी भगवान के भजन ही चलते रहते हैं।
इसलिए सुबह से रात तक हरि बोल।

अधिकतम् अर्जन (कमाना) और सत्कर्मों में व्यय (खर्च) करना हमारा सामाजिक और राष्ट्रीय कर्तव्य है।
क्योंकि जैसे अड़ानी-अम्बानी धनार्जन कर रहे हैं तो, उनके बल पर राष्ट्रीय विकास हो रहा है। नौकरी करके या निवेश करके या अन्य प्रकार से समाज के लाखों लोग उनके कार्यों में सहयोग देकर स्वयम् भी सम्पन्न हो रहे हैं।
उन लोगों के बल बुते पर उनके घर काम करने वाले, उनके बच्चों को पढ़ाने वाले, उनका इलाज करने, हॉटेल-रेस्टोरेंट, गार्डन वाले, परिवहन वाले आदि अनेकानेक लोग स्वयम् की ग्रहस्थी चला पा रहे हैं।
और धन-सम्पदा साथ नहीं जाएगी का उपदेश देने वाले बाबा लोग उनसे और उनके सहयोगियों से करोड़ों रुपए की धन-सम्पदा लेकर खुद भी ऐश से जी रहे हैं और चेलों को भी एश करवा रहे हैं।😃

जो दूसरों के शुभाशुभ कर्म और उसके परिणाम स्वरूप उनके ऐश-आराम के बजाय उनके सुख-सन्तोष को देख कर शिक्षा ले वह स्वयम् में सुधार करके उत्तरोत्तर विकास कर जाता है,
इसके विपरित - कितना भी समझाने पर अपनी आदत के अनुसार ही कार्य करने वाले दासों, नौकरों को देखिए वे उत्तरोत्तर पतनोन्मुख ही होते जाते हैं।

गुरुवार, 20 नवंबर 2025

फलित ज्योतिष के अनुसार तलाक य पति-पत्नी में अनबन के कारण।


प्रायः जन साधारण मङ्गल के नाम से भयभीत हैं। और इसका लाभ पुरोहित वर्ग और उनके एजेंट ज्योतिष के नाम पर भय दोहन करने वाले उठाते हैं।
सन 1980 में नासिक के एक पण्डाजी ने कालसर्प दोष नामक नकली योग की खोज कर नागबलि करवा कर कालसर्प दोष की शान्ति का उपाय करवा कर भय दोहन करना शुरू किया।  आजकल काल सर्प दोष के नाम पर ठगी करते हैं।   
आर्किटेक्ट जिसे संस्कृत में वास्तुशास्त्र कहते हैं, उस वास्तुशास्त्र के अनजान लोगों को वास्तु के नाम पर भय दोहन करते हैं ।

दाम्पत्य जीवन में कष्ट के कारण --
कुण्डली में  कुण्डली का सातवाँ खाना जिसमें कोई भी अंक लिखा हो वह सप्तम भाव पति या पत्नी / जीवन-साथी, और विवाह का सूचक है।
सप्तम भाव का सप्तम भाव होने से  कुण्डली का पहला खाना जिसमें कोई भी अंक लिखा हो वह लग्न भाव भी विवाह सूचक है।
द्वितीय भाव दुसरे विवाह को दर्शाता है। तो दुसरे भाव से दुसरा भाव होने से तृतीय भाव भी द्वितीय विवाह का सूचक है। कभी-कभी एक पत्नी के रहते दूसरा विवाह भी तलाक का कारण बन जाता है। द्वितीय भाव सम्पत्ति का सूचक भी है। धन सम्पत्ति के लालच में कुछ लोग धन खोदने जैसी मुर्खतापूर्ण कार्य करने के चक्कर में तान्त्रिकों के चक्कर में फँसकर गृहस्थी बर्बाद कर लेते हैं।
पञ्चम भाव, जीवन-आनन्द (Please of life) और काम-सुख का सूचक है। व्यक्ति व्यभिचारी हो सकता है। और एकाधिक योन सम्बन्ध स्थापित कर दाम्पत्य जीवन नष्ट कर सकता है।
अष्टम भाव लिङ्ग (स्त्री या पुरुष की पहचान करवाने वाला अङ्ग) का सूचक है।
अति कामुकता शारीरिक अक्षमता का कारण बन कर तलाक का कारण बन सकता है।
नवम भाव बिना कर्म किए भाग्य से मिलने वाले सुख अर्थात भाग्य का सूचक है। भारत में पति को पत्नी का सौभाग्य (सुहाग) माना जाता है। जिसका पति जीवित है, वह स्त्री सौभाग्यवती (सुहागिन) कहलाती है। अतः स्त्री की कुण्डली में नवम भाव भी महत्वपूर्ण है।
लेकिन भाग्य भरोसे बैठने वाले पति परिवार का समुचित भरण-पोषण नहीं कर पाते हैं और व्यक्ति लालच में आकर टोने-टोटके और तान्त्रिकों के चक्कर में फँस कर घर गृहस्थी बर्बाद कर बैठते हैं। यह भी तलाक का कारण बन सकता है।
एकादश भाव आय और लाभ का सूचक है। विवाह द्वारा परिवार में एक सदस्य बढ़ता है,  लेकिन पति पर उत्तरदायित्व बढ़ जाता है, इसलिए वह अधिकतम आय अर्जित कर पत्नी और बच्चों तथा मात-पिता आदि की सुख-सुविधाओं के लिए अधिकतम धनार्जन करने के चक्कर में परिवार वालों को समय नहीं दे पाता, और परिवार में मतभेद, क्लेश-कलह उत्पन्न हो जाते हैं। और तलाक हो जाता है। निकाह और अन्य कई फिल्मों में यह तथ्य दिखाया गया है।
अर्थात एकादश भाव जो आवक का भाव है वह भी तलाक का कारण बन सकता है।
या कभी-कभी व्यक्ति लालच में आकर टोने-टोटके और तान्त्रिकों के चक्कर में फँस कर घर गृहस्थी बर्बाद कर बैठते हैं।

द्वादश भाव शय्या सुख (आराम, भोग, और व्यभिचार ) का सूचक है। अत्यधिक कामुकता भी पति-पत्नी में दूरियाँ उत्पन्न कर देती है। ता तो जीवनसाथी परेशान हो जाता है या असन्तुष्ट रहकर कर अवसाद ग्रस्त हो जाता है।
ऐसे में कुछ लोग टोने-टोटके और तान्त्रिकों के चक्कर में फँस कर घर गृहस्थी बर्बाद कर बैठते हैं।

इन (2, 7, 8, 9, 11 और 12) भावों में स्थित ग्रह, इन (2, 7, 8, 9, 11 और 12) भावों में लिखे राशि के अङ्क का स्वामी ग्रह, इन भावों में स्थित ग्रहों के नक्षत्र में स्थित ग्रह, और इन (2, 7, 8, 9, 11 और 12) भावों में लिखे राशि के अङ्क का स्वामी ग्रह के नक्षत्र में स्थित ग्रहों में से वक्री या अस्त ग्रह के नक्षत्र में स्थित ग्रह तथा जो ग्रह स्वयम् वक्री या अस्त हो उन ग्रहों को छोड़कर शेष ग्रह विवाह और पति - पत्नी और विवाह के सूचक ग्रह होते हैं।
इनकी दशा/ अन्तर्दशा/ प्रत्यन्तर दशा में जब ये विवाह सूचक ग्रह गोचर में इन्हीं विवाह सूचक भावों में और इन विवाह सूचक ग्रहों के राशि नक्षत्र में में भ्रमण करते हैं तब विवाह होता है। इन राशियों/नक्षत्रों और ग्रहों के स्वभाव, दिशा, स्थान आदि तथा राशियों/नक्षत्रों और ग्रहों के स्वभाव आदि के अनुसार ही पति/ पत्नी (जीवन-साथी) मिलता है।
इसी प्रकार इन भावों से षष्ठ (शत्रु या रोग के सूचक), अष्टम ( मृत्यु या दुर्घटना का सूचक) और द्वादश (दूरी, व्यय और हानि का सूचक) भाव में में स्थित ग्रह, इन भावों में लिखे राशि के अङ्क का स्वामी ग्रह, इन भावों में स्थित ग्रहों के नक्षत्र में स्थित ग्रह, और इन  भावों में लिखे राशि के अङ्क का स्वामी ग्रह के नक्षत्र में स्थित ग्रहों में से वक्री या अस्त ग्रह के नक्षत्र में स्थित ग्रह तथा जो ग्रह स्वयम् वक्री या अस्त हो उन ग्रहों की दशा/ अन्तर्दशा/ प्रत्यन्तर दशा में जब ये तलाक या मृत्यु के सूचक ग्रह गोचर में इन्हीं तलाक या मृत्यु  सूचक भावों में और इन तलाक या मृत्यु  सूचक ग्रहों के राशि नक्षत्र में में भ्रमण करते हैं तब तलाक या मृत्यु होता/ होती है।
सप्तम भाव का द्वादश भाव षष्ठ भाव है। जो झगड़ा करवाना, शत्रु पैदा करवाना आदि का सूचक है।
सप्तम भाव का सप्तम (मारक भाव) लग्न है जो  अहंकार को चोंट पहूँचने के कारण विवाह विच्छेद सूचित करता है।
सप्तम भाव का द्वितीय भाव अष्टम भाव (सम्पत्ति का भाव) है, जो दहेज की मांग के कारण सम्बन्ध विच्छेद दर्शाता है।
सप्तम भाव का अष्टम भाव (द्वितीय भाव) जीवन-साथी की मृत्यु की स्थितियाँ और कारण दर्शाता है।
ऐसे ही सप्तम भाव से द्वितीय (अष्टम भाव)और सप्तम भाव ( लग्न) की दशा, अन्तर्दशा, प्रत्यन्तर दशा जीवन-साथी की मृत्यु का समय दर्शाती है।
इसी प्रकार देख सकते हैं।

इसी प्रकार ग्रहों के स्वभाव भी तलाक का या अनबन का कारण दर्शाते हैं।
सूर्योदय के समय जन्में बच्चों में -- लग्न में सूर्य।
जैसे --
सूर्यदेव का तेज उनकी पत्नी सरण्यु (संज्ञा) सहन नहीं कर पाई। और सूर्यदेव को छोड़कर चली गई। (अश्विनी के रूप में बाद में मिली। तब अश्विनी कुमार हुए।)
हनुमान जी ने विवाह नहीं किया।
ऐसे ही तलाक की सम्भावना बनती है।

सूर्यास्त के समय जन्में बच्चों में भगवान नृसिंह के समान क्रोधी स्वभाव कष्टकारी होकर क्रोध के कारण एसीडिटी बढ़ती है। गेस के कारण क्षमता कम हो जाती है। तलाक करवा देता है। 

चन्द्रमा -- सत्ताइस पत्नियों में से केवल रोहिणी के साथ ही लगाव रहने के कारण श्वसुर दक्ष प्रजापति (द्वितीय) द्वारा शाप देने के कारण क्षय रोग ग्रस्त हो गये।
स्वयम् की सत्ताईस पत्नियाँ होते हुए देवगुरु ब्रहस्पति की पत्नी तारा का हरण कर लिया और बुध को जन्म दिया।
मतलब व्यभिचारी प्रवृत्ति के कारण अलगाव हो जाता है।
स्त्री का मायके वालों से ही लगाव और ससुराल वालों से द्वेष का स्वभाव।

बुध -- नपुंसक ग्रह है। इसलिए अक्षमता अलगाव का कारण बनता है।

गुरु ब्रहस्पति -- जहाँ बेठता है, वहाँ की हानि करता है।
स्वयम् की पत्नी (तारा) को नहीं सम्भाल पाये। तारा को चन्द्रमा हरण कर ले गया। और बुध को जन्म दिया।
ऐसे ही सप्तम भाव का गुरु गृहस्थ जीवन में विशेष रुचि नहीं होने के कारण दाम्पत्य सम्बन्ध खराब कर देता है।
पति का अपने परिवार वालों से ही लगाव और ससुराल वालों से द्वेष का स्वभाव।

शुक्र -- अत्यधिक काल्पनिक, फिल्म नवरङ्ग जैसे कवि, चित्रकार, मूर्तिकार, गायक, नर्तक, अभिनेता होने के कारण दाम्पत्य जीवन में सफल नहीं होते।
प्रायः अभिनेताओं - अभिनेत्रियों मे तलाक अधिक देखे जाते हैं।
कुटील स्वभाव, दुष्ट सङ्गति भी दाम्पत्य जीवन में बाधक होता है।
द्वादश भावस्थ शुक्र व्यभिचारी बनाता है।
स्त्री हो या पुरुष दोनों का अपने स्वजनों से ही लगाव और ससुराल वालों से द्वेष का स्वभाव।

शनि -- कठोर अनुशासन, न्याय के लिए दण्ड देने की प्रवृत्ति दाम्पत्य जीवन सफल नहीं होने देती।
हत्या- मार-पीट कुछ भी कर सकते हैं।
ससुराल वालों से द्वेष का स्वभाव।

राहु -- भ्रम, भ्रमित करने का स्वभाव, अत्यधिक छल-कपट, षड़यंत्र करना, नीच सङ्गति, जुआ-सट्टा में ही दिमाग व्यस्त रहना आदि कारणों से दाम्पत्य जीवन में पूर्ण असफलता पैदा करता है।
परिवार वालों के प्रति द्वेष का स्वभाव।


केतु -- त्याग प्रवृत्ति, पत्नी का विवाह पत्नी के पूर्व प्रेमी या विवाहेतर सम्बन्ध रखने वाली पत्नी का उसके प्रेमी से विवाह करवाने वाले, घर बेंच कर तीर्थ करने वाले। भक्त नृसिंह मेहता जैसे लोगों का दाम्पत्य जीवन में लगाव ही नहीं होता।
इसलिए तलाक हो जाता है।
द्वादश भावस्थ केतु -- केतु के नक्षत्र में स्थित ग्रह की दशा -अन्तर्दशा में व्यक्ति, नौकरी - धन्धा, या घर गृहस्थी कुछ भी छोड़ देता है। तलाक भी हो सकता है।
परिवार वालों के प्रति द्वेष का स्वभाव।

सोमवार, 17 नवंबर 2025

ॐ विष्णवे नमः ही क्यों लिखता हूँ?

🙏🏼 ॐ विष्णवे नमः।🙏🏼

श्रीरामचन्द्र जी के परम भक्त महाकवि, महा नीतिज्ञ तुलसीदास जी महाराज जी के जीवन की यह घटना मुझे सदैव प्रेरणा देती रही है।
जब सन्त तुलसीदास जी को छल पूर्वक ज्ञान गोदड़ी नामक स्थान पर श्रीकृष्ण मन्दिर ले गये।
तुलसीदास जी केवल श्री रामचन्द्र जी के रूप में ही सर्वत्र परमात्मा के दर्शन करना पसन्द करते थे।
लेकिन जैसे ही तुलसीदास जी की दृष्टि मन्दिर में स्थापित प्रतिमा पर पड़ी तो वे हतप्रभ रह गए।
और उन्होंने भगवान से निवेदन किया कि,
*कहा कहो छवि आपकी, भले बिराजे नाथ ।*
*तुलसी मस्तक तब नवै, धनुष बाण लो हाथ॥*

तत्काल ही भगवान ने भक्त की भावना को आदर देते हुए प्रतिमा का स्वरूप बदल दिया। और

 *कित मुरली कित चन्द्रिका कित गोपियन को साथ।*
*अपने जन के कारणे श्री कृष्ण भये रघुनाथ ॥*
मुझे यह भी भली-भांति स्मरण रहता है कि,
*तुलसी नर का क्या बड़ा? समय बड़ा बलवान।*
*भीलां लूटी गोपियाँ वही अर्जुन वही बाण ||*

इसलिए ईश्वरार्पण होकर भगवान से यही प्रार्थना करता हूँ कि, मेरी आस्था परमात्मा के ॐ सञ्कल्प के साथ प्रकट हुए परमात्मा के परब्रह्म स्वरूप जिसे मानवीय बुद्धि के अनुसार परम पुरुष, परमेश्वर, सर्वव्यापी भगवान विष्णु और उनकी माया शक्ति के रूप में जानते हैं।
बस उसी स्वरूप में मेरी मति स्थिर रहे।
🙏🏼

राशि और वार मिश्र, पश्चिम तुर्कीये, बेबीलोन (इराक) और तुर्किस्तान की खोज है, भारत में आचार्य वराहमिहिर ने परिचय करवाया।

मिश्र,  पश्चिम टर्की (जिसे यूरोपीय लोग ग्रीक सभ्यता कहते हैं),इराक के बेबीलोन, और तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान, कज़ाकस्तान,  किर्गिस्तान, और तिब्बत के शिनजियांग प्रांत  में प्रचलित 30° वाली मेष, वृषभ आदि राशियाँ  तथा 19 वर्षीय चक्र वाले सायन सौर संक्रान्ति आधारित चान्द्र वर्ष और रविवार- सोमवार आदि वार प्रचलित थे। 
तिब्बत के शिनजियांग प्रांत के निवासी शक और कुषाणों को भारतीय शक कहते थे। ये लोग अफगानिस्तान से लगे ईरान के पूर्वी भाग में भी बस गए थे इसलिए उस क्षेत्र के निवासी आचार्य वराहमिहिर को भी शक माना जाता है।
आज के 2082 वर्ष पहले सम्राट विक्रमादित्य के राज ज्योतिषी आचार्य वराहमिहिर ने  भारत में 30° वाली मेष, वृषभ आदि निरयन राशियाँ  तथा 19 वर्षीय चक्र वाले निरयन सौर संक्रान्ति आधारित चान्द्र वर्ष और रविवार- सोमवार आदि वार प्रचलित किये थे। 

लेकिन हरियाणा के कुरुक्षेत्र के आस-पास के गोड़ प्रदेश और मालवा प्रान्त के निवासी नाबोवाहन के पुत्र गन्धर्वसेन महेन्द्रादित्य  सोनकच्छ के पास गन्धर्वपुरी के राजा हुए। उनकी पत्नी सोम्यदर्शना  वीरमती के पुत्र उज्जैन के राजा भृतुहरि के अनुज विक्रमसेन ने  सम्राट विक्रमादित्य के रूप में राज्याभिषेक के अवसर पर पञ्जाब-हरियाणा में प्रचलित निरयन सौर मेष-वृषभ मास वाला निरयन सौर विक्रम संवत प्रचलित किया। 
विक्रम संवत 135 के बाद मथुरा से कुषाण वंशीय राजाओं ने उत्तर भारत में तथा  महाराष्ट्र के नासिक के पास पैठण से सातवाहन वंशीय राजाओं ने दक्षिण भारत और मध्य भारत में 19 वर्षीय , 122 वर्षीय और 141 वर्षीय चक्र वाले निरयन सौर संक्रमण आधारित चान्द्र वर्ष शालिवाहन शक संवत चलाया।
इसके पहले तीस अंश वाली मेष-वृषभ राशियाँ और रविवार-सोमवार आदि वार भारत में प्रचलित नहीं थे।

तिथियों के देवता -
1 प्रतिपदा के अग्नि देव, 
2 द्वितीय के ब्रह्मा जी, 
3 तृतीया की गौरी, 
4 चतुर्थी के गणेश, 
5 पञ्चमी के नागदेव, 
6 षष्टी के कुमार कार्तिकेय, 
7 सप्तमी के सूर्य, 
8 अष्टमी के शिव, 
9 नवमी की दुर्गा देवी, 
10 दशमी के यमराज 
11 एकादशी के विश्वेदेवाः, 
12 द्वादशी के विष्णु भगवान, 
13 तृयोदशी के कामदेव, 
14 चतुर्दशी के शंकर ,
15 पूर्णिमा के चन्द्रदेव और 
30 अमावस्या के देवता पितरः हैं । अतः  तिथियों को उनके देवता की ही पूजा करते थे।
लेकिन 
सोशल मीडिया पर और उसके प्रभाव से व्यवहार में भी एक विचित्रता देखने में आती है कि, 
दैनिक और व्यावहारिक जीवन में वारों का महत्व अत्यधिक बढ़ रहा है। 

आजकल रविवार को सूर्यदेव का महत्व बढ़ जाता है, दुसरे सब देवता गौण हो जाते हैं।
सोमवार को शंकर जी का महत्व बढ़ जाता है, दुसरे देवता गौण हो जाते हैं ।
मङ्गलवार को हनुमान जी का महत्व बढ़ जाता है, दुसरे सब देवता गौण हो जाते हैं ।
बुधवार के देवता भगवान विष्णु हैं; लेकिन बुधवार को विनायक गजानन का महत्व बढ़ जाता है, दुसरे सब देवता गौण हो जाते हैं। 
दुसरे देवता गौण हो जाते हैं ।
गुरुवार के देवता ब्रह्मा जी हैं, लेकिन गुरुवार को भगवान विष्णु या नारायण श्रीहरि  का महत्व बढ़ जाता है, दुसरे सब देवता गौण हो जाते हैं ।
शुक्रवार को लक्ष्मी जी  का महत्व बढ़ जाता है, दुसरे सब देवता गौण हो जाते हैं ।और
शनिवार को शनि देव के साथ हनुमान जी और हनुमान जी के साथ भगवान श्री रामचन्द्र जी का भी  का महत्व बढ़ जाता है, दुसरे सब देवता गौण हो जाते हैं ।
सोमवार को शिव मन्दिर में भीड़, मङ्गलवार को  महाराष्ट्र कर्नाटक तेलङ्गाना, आन्ध्र प्रदेश तमिलनाडु और केरल में विनायक गजानन मन्दिर में और मालवा में हनुमान मन्दिर में भीड़, 
बुधवार को मालवा में विनायक गजानन मन्दिर में भीड़।
गुरुवार को श्रीकृष्ण मन्दिर या श्रीराम मन्दिर में भीड़,
शुक्रवार को लक्ष्मी मन्दिर में भीड़, और शनिवार को शनि मन्दिर और हनुमान मन्दिर में भीड़ हो जाती है।
लेकिन अन्य दिनों में ये मन्दिर सुनसान रहते हैं।

शनिवार, 15 नवंबर 2025

मानव जीवन के कर्तव्य


परमात्मा किसी का भाग्य निर्धारित नहीं करता है।
प्रारब्ध तो अपने अनन्त जन्मों के कर्मों के सञ्चित में से इस जन्म में भोगे जा सकने वाले कर्मों का उदय मात्र है।
सत्सङ्ग और सत्कर्म से बड़े से बड़ा सञ्कट ऐसे निकल जाता है कि, कई बार तो पता भी नहीं चलता।
लेकिन कुसङ्गति में पड़े और अधर्मी को तो राज्य भी मिल जाए तो भी वह सुखी नहीं हो पाता है।
प्रातःकाल उठते से ही हरि स्मरण कर लो तो दिन भर हरिनाम संकीर्तन याद आता रहता है ‌
रात को सोते समय हरि स्मरण कर लो तो रात भर स्वप्न में भी भगवान के भजन ही चलते रहते हैं।
इसलिए सुबह से रात तक हरि बोल।

अधिकतम् अर्जन (कमाना) और सत्कर्मों में व्यय (खर्च) करना हमारा सामाजिक और राष्ट्रीय कर्तव्य है।
क्योंकि जैसे अड़ानी-अम्बानी धनार्जन कर रहे हैं तो, उनके बल पर राष्ट्रीय विकास हो रहा है। नौकरी करके या निवेश करके या अन्य प्रकार से समाज के लाखों लोग उनके कार्यों में सहयोग देकर स्वयम् भी सम्पन्न हो रहे हैं।
उन लोगों के बल बुते पर उनके घर काम करने वाले, उनके बच्चों को पढ़ाने वाले, उनका इलाज करने, हॉटेल-रेस्टोरेंट, गार्डन वाले, परिवहन वाले आदि अनेकानेक लोग स्वयम् की ग्रहस्थी चला पा रहे हैं।
और धन-सम्पदा साथ नहीं जाएगी का उपदेश देने वाले बाबा लोग उनसे और उनके सहयोगियों से करोड़ों रुपए की धन-सम्पदा लेकर खुद भी ऐश से जी रहे हैं और चेलों को भी एश करवा रहे हैं।😃

जो दूसरों के शुभाशुभ कर्म और उसके परिणाम स्वरूप उनके ऐश-आराम के बजाय उनके सुख-सन्तोष को देख कर शिक्षा ले वह स्वयम् में सुधार करके उत्तरोत्तर विकास कर जाता है,
इसके विपरित - कितना भी समझाने पर अपनी आदत के अनुसार ही कार्य करने वाले दासों, नौकरों को देखिए वे उत्तरोत्तर पतनोन्मुख ही होते जाते हैं।


शुक्रवार, 14 नवंबर 2025

अष्टमी, एकादशी, पूर्णिमा और अमावस्या आदि पर व्रत क्यों रखते हैं?

वास्तविकता यह है कि, दोनों अष्टमी तिथि (अर्ध चन्द्रमा) के समय भूमि के केन्द्र पर सूर्य और चन्द्रमा 90° का कोण बनाते हैं।
शुक्ल पक्ष की दशमी समाप्ति और एकादशी प्रारम्भ के समय सूर्य और चन्द्रमा 120° का कोण बनाते हैं। यही स्थिति कृष्ण पक्ष में पञ्चमी तिथि समाप्ति पर बनती है) लेकिन कृष्ण पक्ष की एकादशी को 60° या 300° का कोण बनता है।
इसलिए नारद पुराण में शुक्ल पक्ष की एकादशी को अधिक महत्व दिया है। और एकभक्त- एकासना (एक बार ही बिना आसन से उठे भोजन करना।) करने को लिखा है।
 इसी प्रकार पूर्णिमा तिथि समाप्ति पर सूर्य और चन्द्रमा 180° का सरल कोण बनाते हैं।और
अमावस्या तिथि समाप्ति पर 000° का कोण बनाते हैं।
इसलिए अर्ध चन्द्र के समय , शुक्ल पक्ष की एकादशी प्रारम्भ के समय और कृष्ण पक्ष की पञ्चमी तिथि समाप्ति के समय तथा पूर्णिमा समाप्ति के समय सूर्य और चन्द्रमा के बल अलग-अलग दिशाओं में खींचते हैं। और अमावस्या समाप्ति के समय सूर्य और चन्द्रमा दोनों का बल एक ही दिशा में खींचता है।
भौतिकी के बल समानान्तर चतुर्भुज के नियम आदि के अनुसार इस खींच-तान का प्रभाव भूमि के सागरों पर पड़ता है जिससे ज्वार-भाटा उत्पन्न होते हैं।
परिणाम स्वरूप भूमि की घूर्णन गति तथा परिभ्रमण पर भी पड़ता है।
इन सब का प्रभाव मानव मन पर भी पड़ता है, जिसे लुनेटिक लोगों पर स्पष्ट देखा जा सकता है।
इस कारण पाचनशक्ति कमजोर हो जाती है, चित्त भ्रम होते है, इसलिए आपराधिक मानसिकता उत्पन्न होती है।
इनसे बचाव हेतु, लङ्घन (भूखे रहना) और आराधना-उपासना में दिन व्यतीत करना, जागरण (अलर्ट रहना) आदि के निर्देश धर्मशास्त्रों में दिये गए हैं।

क्या जनन अशोच, मरण अशोच में एकादशी व्रत का पारण हो सकता है?

व्रत पालन मतलब नियम पालन।
जब जिसके माता-पिता का देहान्त होता है वह पुत्र तेरह दिनों तक विष्णु पूजा करता है जिसे घर के बाहर रखे पापा विष्णु की पूजा दस दिन करना कहते हैं, उसे जल चढ़ाना मतलब स्नान करवाना, स्वयम् के द्वारा पकाये भोजन का नैवेद्य अर्पित करना, धूप देना मतलब अग्निहोत्र करना, गरुड़ पुराण सुनना मतलब शास्त्र श्रवण करना आदि सभी कर्म करना होता है तो, नित्य कर्म (वैदिक धर्म-कर्म मतलब पञ्च महायज्ञ) का निषेध कैसे हो सकता है? 
हाँ, अवैदिक कर्म - तन्त्रोक्त कर्म, यथा - मूर्ति पूजन अवश्य निषेध है।

मृतक के निमित्त एकादशी व्रत का संकल्प लिया जाता है अन्य किसी व्रत का संकल्प नहीं दिलाया जाता, वही एकादशी व्रत कैसे छोड़ा जा सकता है?

एकादशी व्रत का सामान्य नियम यह है कि, एकादशी के पूर्व दिन सूर्यास्त पश्चात भोजन त्याग कर पारण समय में पारण करने पर ही एकादशी व्रत पूर्ण होता है। अन्यथा व्रत भङ्ग माना जाता है। यह नियम सभी व्रतों में सामान्य (कामन) है।
तो, 
सूतक में भी निष्काम व्रत पालन अवश्य ही करना चाहिए यह तो समझ आता है लेकिन सूतक में पारण नहीं होता यह उल्टा ज्ञान है।

कभी-कभी एकादशी व्रत का पारण हरिवासर समाप्त होने के बाद भी सीधे अपराह्न काल में ही क्यों बतलाया जाता है?

एक सामान्य जिज्ञासा होती है कि,
*कभी-कभी द्वादशी तिथि का एक चौथाई भाग अर्थात हरिवासर समाप्त होने के भी बाद भी पारण क्यों नहीं कर सकते?
उसका कारण यह है कि,

 *पारण (ब्रेक फास्ट) या तो प्रातः काल में (नाश्ते के समय) होता है या फिर भोजन के समय अपराह्न काल में होता है।* 
क्योंकि भोजन का समय अपराह्न काल को ही माना गया है। 
*क्योंकि वैदिक काल में लोग पूरे अहोरात्र में प्रायः अपराह्न काल में एक बार ही भोजन करते थे।*
मतलब 
*आज की भाषा में समझें तो प्रात काल में ब्रेक फास्ट (नाश्ता) और अपराह्न काल में लञ्च (भोजन) करते थे। डीनर (रात्रि भोज) निषिद्ध है। इसलिए सूर्यास्त के बाद खाने का प्रश्न ही नहीं।* 

सूर्योदय के पहले ब्रह्म मुहूर्त में सन्ध्या होती है, सावित्री (गायत्री) मन्त्र जप पूर्ण कर उदयिमान सूर्य को अर्घ्य देकर अतिथि यज्ञ और दान करके व्रत का पारण होता है।

मध्याह्न पूर्व भी सन्ध्या करके गायत्री मन्त्र जप करके ठीक मध्याह्न में सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
सायाह्न में भी सन्ध्या करके, गायत्री मन्त्र जप पूर्ण कर के सूर्यास्त समय अस्त हो रहे सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इसके बाद वैदिक कर्म नहीं किए जाते हैं।
इस कारण गोधुलि लग्न में पाणी ग्रहण संस्कार भी उचित नहीं है। क्योंकि इस समय यदि पाणी ग्रहण संस्कार किया जाएगा तो सायाह्न सन्ध्या छूट जाएगी।

वास्तव में महाभारत युद्ध के बाद पौराणिक काल में सभी विद्वानों और धर्मी राजाओं की मृत्यु हो जाने के कारण गुरुकुल समाप्त होने लगे थे। इसलिए ज्योतिष में वेध लेना बन्द हो गया। सिद्धान्त ज्योतिष गणिताध्याय और गोलाध्याय (खगोल) के जानकार समाप्त होने लगे। इसलिए तिथियों और करण तथा असमान विस्तार वाले सत्ताइस नक्षत्रों का ठीक-ठीक प्रारम्भ और समाप्ति समय ज्ञात नहीं हो पाता था। इसलिए लगभग एक चौथाई द्वादशी तिथि (लगभग 06 घण्टे) की त्रुटि सम्भावित मान कर इसे हरिवासर मान कर इस अवधि में व्रत का पारण निषेध किया गया था। लेकिन अब पुनः एस्ट्रोनॉमी का अच्छा विकास हो गया है। ग्रह गणित और तिथि, करण और नक्षत्रों के प्रारम्भ और समाप्ति का समय ठीक-ठीक गणना होने लगी है इसलिए दशमी भेद और हरिवासर में पारण नहीं करना के नियम पालन अनावश्यक हो गया है।

उदाहरण देखिए ---

दिनांक 16 नवम्बर 2025 रविवार को इन्दौर में 

*प्रातः काल सूर्योदय 06:41 से 08:53 बजे तक।* फिर 

सङ्गव काल 08:53 से 11:05 तक । फिर 

मध्याह्न काल 11:05 से दोपहर 01: 17 बजे तक । जिसमें मध्याह्न सन्ध्या होती है। और इसके बाद भोजन का समय

*अपराह्न काल दोपहर 01:17 बजे से दोपहर 03:29 बजे तक रहेगा।*

तदुपरान्त  
सायाह्न काल दोपहर 03:29 से 05:41 सूर्यास्त तक। रहेगा। जिसमें पुनः सन्ध्या होती है।

गुरुवार, 13 नवंबर 2025

सायन गणना, नक्षत्रिय पद्धति, निरयन और सावन गणना सभी दर्शाने वाली पञ्चाङ्ग/ केलेण्डर ही उचित हैं।

श्री रामचन्द्र जी के जन्म के समय के सम शितोष्ण ऋतु का वर्णन, ऋषि पञ्चमी पर अपामार्ग के पानी से स्नान करना, बालध ककड़ी खाना, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन यमुना नदी में बाढ़ आने का वर्णन, नवरात्र  और शरद पूर्णिमा शब्दों में ही ऋतु का उल्लेख होना, पञ्च दिवसीय दीपावली उत्सव में पूजन सामग्री में ज्वार के भुट्टे और गन्ने, सिंघाड़ा आदि का प्रयोग (नव धान्येष्टि), मकर संक्रान्ति पर तिल-गुड़ का प्रयोग, शिवरात्रि पर शिवजी को बदरीफल (बेर) अर्पित करना, होली पर गेंहू की बालियों का होला सेकना, (नव सस्येष्टि) तथा अमान्त चैत्र कृष्ण एकादशी वरूथिनी एकादशी को खरबुजा का फलाहार।
अमान्त वैशाख कृष्ण एकादशी अपरा एकादशी को खरबुजा ( या ककड़ी) का फलाहार।
अमान्त ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी कमला एकादशी को दाख का फलाहार।
ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी निर्जला एकादशी को आम का फलाहार।
श्रावण शुक्ल एकादशी पवित्रा एकादशी को सिंघाड़ा का फलाहार।
 भाद्रपद शुक्ल एकादशी जलझूलनी एकादशी को बालन ककड़ी का फलाहार।
आश्विन शुक्ल एकादशी पापाङ्कुशा एकादशी को फुट काचरी का फलाहार।
अमान्त आश्विन शुक्ल एकादशी पापाङ्कुशा एकादशी को केला का फलाहार।
अमान्त कार्तिक शुक्ल एकादशी सफला एकादशी को तिल शकर का फलाहार।
माघ शुक्ल एकादशी जया एकादशी को गन्ने का रस का फलाहार।
फाल्गुन शुक्ल एकादशी आमलकी एकादशी को आँवला का फलाहार।
संवत्सर की प्रथम ऋतु वसन्त ऋतु होना, शरद ऋतु में ही शरद पूर्णिमा हो सकती है, सायन तुला संक्रान्ति का सम्बन्ध देवताओं की रात्रि प्रारम्भ होने से नवरात्र कहलाना,
ये सब बातें व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहारों का ऋतु आधारित होना प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है।
इसलिए मधु-माधव आदि सायन सौर मासों की संक्रान्तियों पर आधारित चान्द्र मासों में ही उक्त व्रत, पर्व उत्सव और त्यौहार मनाए जाना चाहिए।
सायन मतावलम्बियों के पक्ष में इतने सारे प्रमाण है।
लेकिन रामनवमी पर पुनर्वसु नक्षत्र पर चन्द्रमा होना, श्रीरामचन्द्र जी का राज्याभिषेक चैत्र शुक्ल पक्ष में पूष्य नक्षत्र पर चन्द्रमा होना, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को अमान्त श्रावण कृष्ण अष्टमी को चन्द्रमा रोहिणी नक्षत्र पर होना, भाद्रपद शुक्ल द्वादशी वामन जयन्ती को श्रवण नक्षत्र पर चन्द्रमा होना, बङ्गाल में नवरात्र में सरस्वती आह्वान, पूजन, बलिदान और विसर्जन में चन्द्रमा के नक्षत्र का ही महत्व होना, शिवरात्रि के दिन बहेलिए द्वारा सारी रात मृगशीर्ष नक्षत्र के तारे और लुब्धक (व्याघ) को देखना तथा पश्चिम और मध्य भारत को छोड़कर शेष उत्तर भारत, पूर्वी भारत, बाङ्ग्ला देश और दक्षिण भारत में निरयन सौर संक्रमण से प्रारम्भ होने वाले मेष-वृषभादि मास, वैशाखी, विषु, माघ बिहू आदि पर्व, तथा मेष-वृषभादि मासों में चन्द्रमा के नक्षत्र के अनुसार ही रामनवमी, श्रीकृष्ण जन्मोत्सव और वामन जयन्ती ओणम पर्व वैदिक काल में सायन सौर मधु-माधव आदि मासों में चन्द्रमा किसी विशेष नक्षत्र के साथ होने के आधार पर ही व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार तथा शुभ कार्यारम्भ और पूर्णाहुति करने का स्मरण करवाते हैं।
ये सभी तथ्य नक्षत्रिय पद्धति के पक्ष में तर्क हैं।
वर्षान्त में  वर्षान्त के पाँच दिन पहले दशा पूजन सावन वर्ष को सायन सौर वर्ष से समायोजित करने का उपक्रम है। ठीक इसी प्रकार दीपावली से लाभ पञ्चमी तक गुजरात में अवकाश रहना भी पारसियों के समान सावन वर्ष को सायन सौर वर्ष से समायोजित करने की व्यवस्था है।
इस लिए आदर्श पञ्चाङ्ग वहीं जो सायन संक्रान्ति आधारित सौर और सौर चान्द्र मास, निरयन संक्रमण और निरयन संक्रमण आधारित सौर मास सौर चान्द्र मासों और सावन वर्ष-मासों तथा दशाह के वासर इन तीनों को दर्शाता हो।

बुधवार, 12 नवंबर 2025

वेदों में लिङ्ग पूजक शिश्नेदेवाः से रक्षा हेतु महर्षि वशिष्ठ जी द्वारा इन्द्र से प्रार्थना।

*ऋग्वेद, मंडल 07, सूक्त 21, मंत्र 05 का अर्थ और व्याख्या*

प्रसङ्ग और सन्दर्भ ---
*ऋग्वेद सप्तम मण्डल/ सूक्त 21 मन्त्र 05 में कहा है कि,*
मन्त्र ---
*न यातव इन्द्र जुजुवुर्ना न वन्दना शविष्ठ वेद्यभि।न श्रीरर्द्धयो विष्णुनस्य जन्तोर्मा शिश्नदेवाः अपि गुऋतम् नः।।*

 *ऋषि वसिष्ठ इंद्र से शिश्नेदैवाः अर्थात लिङ्ग और भग (शिवलिङ्ग) की पूजा करने वाले यातुधान अर्थात (असुर, दैत्य दानव, आदि शत्रुओं से सुरक्षा की प्रार्थना कर रहे हैं।*

मन्त्र का अर्थ ---

*"हे बलवान इंद्र!* 
(दुष्ट, कृतघ्न, अधार्मिक, विलासी) *शिश्नेदैवाः अर्थात लिङ्ग और भग (शिवलिङ्ग) की पूजा करने वाले यातुधानों * अर्थात (असुर, दैत्य दानव, आदि) शत्रुओं से हमारी रक्षा कीजिए।*
*लिङ्गपूजक असूर लोग हमें परेशान न कर सकें; उन पर हमारी दृष्टि पड़ने, उनकी छाया पड़ने, उनके स्पर्श दोष से, हमारी समृद्धि को आधी न हो पाए। हे सर्वव्यापी विष्णु देव! उनसे हमारी रक्षा कीजिए।*

शब्दार्थ:
1. *यातवः* – यातुधान अर्थात (दुष्ट,पीड़क,शत्रु) *असुर दैत्य, दानव, राक्षस।* 
2 *शविष्ठ* – *अत्यंत बलवान* , (इन्द्र का विशेषण)।
 3 *वेद्यभिः* – *ज्ञानी, विद्वान*,(इन्द्र का विशेषण)।
4 *इन्द्र* – *देवताओं के राजा* (शक्ति के प्रतीक) ।
5. *न जुजुवुः* – *तंग न करें, पीड़ित न करें* ।
6. *न वन्दना* – *नमन न करने वाले, कृतघ्न* ।

7. *श्रीः* – *समृद्धि, सौभाग्य* ।
8. *अर्द्धयः* – *आधा* , अधूरा।
9. *विष्णुनस्य* – व्यापक, *सर्वव्यापी विष्णु* ।
10. *जन्तोः* – *प्राणियों के।* 
11. *शिश्नदेवाः* – (विलासी, कामुक, अधर्मी) *शिश्न और भग रूप में शिवलिङ्ग पूजक* ।
12. *अपि गुऋतम् नः* – *हमसे दूर करे, बचाएं या हमें दूर रखें* ।

मंगलवार, 11 नवंबर 2025

वर्तमान प्रचलित मुहूर्त शास्त्र में मेरी श्रद्धा क्यों नहीं है?

वर्तमान प्रचलित मुहूर्त शास्त्र में मेरी श्रद्धा क्यों नहीं है? 

क्योंकि मेरी श्रद्धा, आस्था और विश्वास केवल वेदों में है।
वैदिक मत, वैदिक वर्णाश्रम धर्म, वैदिक दर्शन, वैदिक कर्म या वैदिक क्रियाओं अर्थात वैदिक कर्मकाण्ड और वैदिक संस्कृति को ही सनातन धर्म मानता हूँ।
जो भी उसके विपरीत और वेद विरुद्ध तन्त्र है उसमें मुझे तनिक मात्र भी श्रद्धा, आस्था और विश्वास नहीं है।

लेकिन गणित, होरा शास्त्र अर्थात फलित ज्योतिष, मुहूर्त, वास्तु शास्त्र, सामुद्रिक शास्त्र, शकुन शास्त्र और धर्म शास्त्र का अध्यन करने और परम्परागत शिक्षा प्राप्त करने के कारण लोग मुझे ज्योतिषी समझते हैं और तत्सम्बन्धी प्रश्न पूछते हैं, राय लेते हैं, मुहूर्त पुछते हैं तो, गुरुदेव का ऋण समझकर मुझे परम्परागत जानकारी के आधार पर उत्तर देना पड़ता है। और बतलाता भी हूँ, लेकिन साथ में वैदिक मत भी बतला देता हूँ।

वर्तमान प्रचलित मुहूर्त शास्त्र में मेरी श्रद्धा क्यों नहीं है? का उत्तर ---

उत्तरायण दक्षिणायन में तीन महीने का तीन महीने आगे खिसका दिया और तीन महीने पहले ही उत्तरायण ले आये। ऋतुओं को एक महीने पहले से मान लिया। इस प्रकार मध्य भारत के मौसम से अनुकूल कर दिया।
फिर भी सन्तोष नहीं हुआ तो शुक्ल पक्ष से प्रारम्भ होने वाले चान्द्र मासों को पन्द्रह दिन पहले कृष्ण पक्ष से प्रारम्भ होना शुरू कर दिया।
वेदों में केवल दोनों प्रतिपदा, चन्द्र दर्शन (द्वितीया समझ सकते हैं), अर्ध चन्द्र (अष्टमी समझ सकते हैं), पूर्ण चन्द्र (पूर्णिमा समझ सकते हैं) और बिना चन्द्रमा वाली रात्रि (अमावस्या समझ सकते हैं) के अलावा किसी तिथि का उल्लेख नहीं है।
वैदिक काल में नक्षत्र असमान विस्तार वाले, चित्रा के समान एक तारा का एक अंश से भी कम विस्तार वाले नक्षत्र, मृगशीर्ष जैसे तीन तारे वाले नक्षत्र, कृतिका जैसे सात तारों वाले नक्षत्र, तो शतभिषा जैसे सौ या वर्तमान में बचे अठासी तारों वाले नक्षत्र तो चित्रा के समान एक तारा का एक अंश से भी कम विस्तार वाले नक्षत्र और
स्वाति जैसे चौबीस अंशों वाले नक्षत्र होते थे। जबकि वर्तमान में सभी नक्षत्रों का एक समान भोग 13°20' मान लिया गया है।
ऐसे ही पश्चिम टर्की, मिश्र, और बेबिलोनिया में पशुओं की आकृति वाली असमान विस्तार वाली राशियाँ मानी जाती थी। वर्तमान एस्ट्रोनॉमी में भी यही मानते हैं। जबकि, गर्गाचार्य और आचार्य वराहमिहिर के समय जब राशियाँ और वार की नई अवधारणा अपनाई गई तो, तीस-तीस अंशों की समान विस्तार वाली राशियाँ बना दी गई। जबकि वेदों में क्रान्तिवृत के बारह समान तीस-तीस अंशों की समान विस्तार वाले सायन प्रधय मधु-माधव आदि मासों की गणना के लिए मानी जाती थी। लेकिन न उनका कोई स्वतन्त्र नाम नहीं दिया और न कोई आकृति बतलाई। क्योंकि सायन प्रधय (राशि) का कोई निश्चित क्षेत्र ही नहीं रहता, छात्राओं से सायन प्रधय का कोई सम्बन्ध ही नहीं रहता है, तो आकृति तो हो ही नहीं सकती।
वेदों में सिद्धान्त (गणित) ज्योतिष के वैधृति पात और व्यतिपात अर्थात सूर्य और चन्द्रमा के अंशों का योग 180° होने और 360° होने को छोड़कर किसी अन्य योग का उल्लेख नहीं है। जबकि वर्तमान में सत्ताईस योग प्रचलित हैं। न भद्रा (विष्टि करण) का उल्लेख है। जबकि वर्तमान में भद्रा को अशुभ मानते हैं।
कुछ महत्वपूर्ण तथ्य स प्रमाण नीचे दिए जा रहे हैं। जिससे प्रमाणित होता है कि वर्तमान में प्रचलित अयन, ऋतु, मास सब गलत हैं।⤵️
‌*संवत्सर व्यवस्था -* 
उत्तरायण की तीन ऋतु - वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा। - 
*देवा ऋतवः वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतु उत्तरायण में होती है।* 
शतपथ ब्राह्मण 2/1/3 तथा तै.सं. 6/5/3 तथा नारायण उपनिषद अनु. 80
*उदगयन शब्द और देवयान / देवलोक शब्द स्पष्ट आये हैं।* 
मैत्रायण्युपनिषद में उत्तरायण और नारायण उपनिषद अनु 80
(भा. ज्यो.पृष्ठ 44 एवम् 45)

*वसन्त को प्रथम ऋतु और संवत्सर का शिर, ग्रीष्म को दक्षिण पक्ष (पंख) और शरद को उत्तर पक्ष कहा है।* 
तै.ब्रा. 1/1/2/6 एवम् 7 एवम् 3/10/4/1
*हेमन्त को संवत्सर का मध्य और वर्षा को पुच्छ कहा है।*
तै.ब्रा. 3/10/4/1
(भा. ज्यो. पृष्ठ 47)
उक्त आधार पर प्रमाणित होता है कि, वसन्त सम्पात से शरद सम्पात तक वैदिक उत्तरायण होता था। और शरद सम्पात से वसन्त सम्पात तक वैदिक दक्षिणायन होता था। वैदिक काल के उत्तरायण में वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतु होती थी। और दक्षिणायन में शरद, हेमन्त और शिशिर ऋतु होती थी।
तदनुसार संवत्सर का प्रारम्भ वसन्त सम्पात, उत्तरायण, वसन्त ऋतु और मधुमास से होता था।

*तीन मौसम / ऋतु के नाम आये हैं।* 
अग्निर्ऋतुः सूर्य ऋतुश्चन्द्रमा ऋतु।
तैत्तिरीय ब्राह्मण 1/10/1
(भा.ज्यो पृष्ठ 49)
इससे प्रमाणित होता है कि, वर्तमान के ही समान वैदिक युग में भी तीन मौसम मुख्य रहते थे १ गर्मी, वर्षा और ठण्ड।
वसन्त सम्पात अर्थात सायन मेष संक्रान्ति। जो प्रायः 20/21 मार्च को होती है। और शरद सम्पात अर्थात सायन तुला संक्रान्ति जो प्रायः 22/23 सितम्बर को होती है।
अतः वैदिक उत्तरायण 21 मार्च से 22 सितम्बर तक होता है। इसे उत्तरगोल भी कहते हैं।
और वैदिक दक्षिणायन 23 सितम्बर से 19/20 मार्च तक होता है। इसे दक्षिण गोल भी कहते हैं।

उत्तर परम क्रान्ति अर्थात सायन कर्क संक्रान्ति प्रायः 22/ 23 जून को होती है। और दक्षिण परम क्रान्ति सायन मकर संक्रान्ति प्रायः 22 दिसम्बर को होती है।
उत्तर परम क्रान्ति अर्थात सायन कर्क संक्रान्ति 23 जून से दक्षिण परम क्रान्ति सायन मकर संक्रान्ति 21 दिसम्बर तक वैदिक उत्तर तोयन कहते हैं। पौराणिक काल में इसे दक्षिणायन कहा जाने लगा।
दक्षिण परम क्रान्ति सायन मकर संक्रान्ति 22 दिसम्बर से उत्तर परम क्रान्ति अर्थात सायन कर्क संक्रान्ति 22 जून तक वैदिक दक्षिण तोयन होता है। पौराणिक काल में इसे उत्तरायण कहा जाने लगा।
इसलिए

*फाल्गुन पूर्णिमा/ पूर्वाफाल्गुनी के दिन को संवत्सर का अन्तिम दिन कहा है। और उसके अगले दिन उत्तराफाल्गुनी को संवतरारम्भ कहा है।*
वैदिक असमान विस्तार वाले नक्षत्र - पूर्वाफाल्गुनी और उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र की सन्धि पर पूर्णिमा का चन्द्रमा होगा तो इससे १८०° पर स्थित नक्षत्र पर सूर्य होगा।
तैत्तिरीय संहिता 7/4/8 में तथा पृष्ठ 51 पर सामवेद के ताण्यब्राह्मण 5/9
 तैत्तिरीय ब्राह्मण 7/4/8
(भा.ज्यो.पृष्ठ 50)

*अधिक मास वर्षान्त में जुड़ता था।*
 वाजसनैय संहिता 22/30 एवम् 31 
ऐतरेय ब्राह्मण 3/1 और 17 और तैत्तिरीय ब्राह्मण 3/8/3
(भा. ज्यो. पृष्ठ 40 एवम् 41)
अर्थात वर्तमान में निरयन सौर वर्ष या सायन सौर वर्ष से चान्द्र वर्ष को बराबर करने के लिए निर्धारित १९ वर्ष, १२२ वर्ष और १४१ वर्ष वाला चक्र प्रचलित नहीं था।
महाभारत काल में हर अट्ठावन माह बाद उनसठवाँ और साठवाँ माह अधिक मास करते थे। ऐसे ही वैदिक काल में वर्षान्त पश्चात तेरहवाँ माह अधिक मास करते थे। सम्भवतः कितने वर्ष पश्चात करते थे यह स्पष्ट नहीं है।

इससे सिद्ध होता है कि, सामान्यतः अमान्त मास भी प्रचलित थे लेकिन संवत्सर आरम्भ के लिए सायन मेष संक्रान्ति ही मुख्य थी। उस दिन पड़ने वाले चन्द्रमा जिस नक्षत्र के साथ होता था उस नक्षत्र से भी इंगित करते थे। 

*शुक्ल पक्ष और कृष्णपक्ष को अर्धमास कहा है।* 
*अर्धमासों के नाम पवित्रादि हैं।* 
अथ यदाह । पवित्रन् पवयिष्यन्त्सहस्वान्त्सहीयानरुणोरणरजा इति। एष एव तत्। ए ह्येव तेर्धमासाः एषः मासाः ।
तैत्तिरीय ब्राह्मण 1/6/3 ।
(भा. ज्यो.पृष्ठ 48)
इससे प्रमाणित होता है कि, छब्बीस पक्षों के भी नामकरण किया गया था।

तिथियाँ प्रचलित नहीं थी। केवल उदृष्टका (शुक्ल प्रतिपदा), एकाष्टका (शुक्लाष्टमी), पूर्णिमा, व्यष्टका (कृष्ण प्रतिपदा) और अष्टका (कृष्णाष्टमी) और अमावस्या तिथि का ही उल्लेख है।

 *कृष्णपक्ष की प्रतिपदा को व्यष्टका और शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को उदृष्ट कहा है।* 
तैत्तिरीय ब्राह्मण 1/8/2 तथा ताण्ड्य ब्राह्मण 10/3/11 ।
 *कृष्णपक्ष की अष्टमी को अष्टका और शुक्ल पक्ष की अष्टमी को एकाष्टका कहा है।* 
तैत्तिरीय ब्राह्मण 1/5/12 तथा ताण्ड्य ब्राह्मण 10/3/11 ।
(भा.ज्यो.पृष्ठ 59)
इससे प्रमाणित होता है कि, तिथियाँ प्रचलित नही थी। लेकिन चन्द्रमा के चारो फेस का निर्धारण गणना करते थे। यानी अमावस्या, उदृष्यका या शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा, एकाष्टका (शुक्ल पक्ष की अष्टमी), पूर्णिमा, व्यष्टका (कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा), अष्टका (कृष्ण पक्ष की अष्टमी), और अमावस्या की गणना की जाती थी।


वैदिक काल में व्यवहार में ३६० दिन का सावन सौर वर्ष भी चलता था, इसमें प्रत्येक महिना ३० दिन का ही होता है ‌ तथा साथ में दशाह के वासर प्रचलित थे।

(१) *संवत्सर*--- संवत्सर नामक सामान्य वर्ष के *बारह महीने में ३६० दिन का संवत्सर* होता था। तथा

(२) *परिवत्सर* --- (३८३५ वें वर्ष को छोड़कर) प्रत्येक *पाँचवाँ वर्ष तेरह मास का* अर्थात *३९० दिन का परिवत्सर* होता था। 

(३) *इदावत्सर* --- ( *३८४० वें वर्ष को छोड़* ) *प्रत्येक ४०वाँ वर्ष ३६० दिन* का अर्थात *बारह मास का* ही होता था।

(४) --- *अनुवत्सर* --- *३८३५ वाँ वर्ष ३६० दिन (बारह मास) का अनुवत्सर* होता था। एवम्

(५) *इद्वत्सर* --- *३८४० वाँ वर्ष ३९० दिन (तेरह मास) का इद्वत्सर* होता था।

इस गणना में पारिश्रमिक वितरण में दशाह चलता था। सप्ताह शब्द भी मिलता है लेकिन उपयोग का उल्लेख नहीं है। वासर सूर्योदय से दुसरे सूर्योदय तक को कहते हैं, लेकिन ग्रहों के नाम वाले वार का उल्लेख नहीं है।

क्रान्तिवृत के उत्तर-दक्षिण में आसपास आठ-आठ अंश चोड़ी पट्टी में असमान आकृति वाले तारा मण्डलों को असमान भोगांश वाले नक्षत्र कहते थे। समान भोग वाले नक्षत्र नहीं थे। 
अथर्ववेद में अट्ठाईस नक्षत्र बतलाये गए हैं। जबकि कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता ४/४/४० में शुक्ल यजुर्वेद के शतपथ ब्राह्मण/ दशम काण्ड/पञ्चमोऽध्याय/ चतुर्थ ब्राह्मण में और सामवेद के जैमिनी ब्राह्मण में सत्ताईस नक्षत्र ही बतलाए गए हैं लेकिन सभी में एक बात निश्चित है कि, नक्षत्र भोग असमान था। 

 चित्रा नक्षत्र का भोग केवल ००°२३'३१" ही था, स्वाती नक्षत्र का भोग २०°५०'५७" था, जबकि धनिष्ठा नक्षत्र का भोग २५°१४'०८" था; ऐसे ही सभी नक्षत्रों के भोगांश अलग अलग थे।*

 शतपथब्राह्मणम् में सत्ताइस नक्षत्रों का उल्लेख दिया हुआ है।

नक्षत्राणि ह त्वेवैषोऽग्निश्चितः तानि वा एतानि सप्तविंशतिर्नक्षत्राणि सप्तविंशतिः सप्तविंशतिर्होपनक्षत्राण्येकैकं नक्षत्रमनूपतिष्ठन्ते तानि सप्त च शतानि विंशतिश्चाधि षट्त्रिंशत्ततो यानि सप्त च शतानि विंशतिश्चेष्टका एव ताः षष्टिश्चत्रीणि च शतानि परिश्रितः षष्टिश्च त्रीणि च शतानि यजुष्मत्योऽथ यान्यधिषट्त्रिंशत्स त्रयोदशो मासः स आत्मा त्रिंशदात्मा प्रतिष्ठा प्राणा द्वे शिर एव षट्त्रिंश्यौ तद्यत्ते द्वे भवतो द्व्यक्षरं हि शिरोऽथ यदन्तरा नक्षत्रे तत्सूददोहा अथ यन्नक्षत्रेष्वन्नं तत्पुरीषं ता आहुतयस्ताः समिधोऽथ यन्नक्षत्राणीत्याख्यायते तल्लोकम्पृणा तद्वा एतत्सर्वं नक्षत्राणीत्येवाख्यायते तत्सर्वोऽग्निर्लोकम्पृणामभिसम्पद्यते स यो हैतदेवं वेद लोकम्पृणामेनं भूतमेतत्सर्वमभिसम्पद्यते

शतपथब्राह्मणम्/काण्डम् १०/अध्यायः ५/ब्राह्मण ४

सामवेद के जैमिनी ब्राह्मण में सत्ताइस नक्षत्र कहे गए हैं।

यास्सप्तपदाश्शक्वर्यो ये सप्त ग्राम्याः पशवो यानि सप्त चतुरुत्तराणि छन्दांसि ये सप्त मुख्याः प्राणा यानि सप्तविंशतिर्दिव्यानि नक्षत्राणि यस्सप्तविंश स्तोमो यत्किं च सप्त सप्त तस्यैषा सर्वस्यर्द्धिस्तस्योपाप्तिः ।)
परवर्ती ज्योतिष ग्रन्थों में इसका समाधान इस प्रकार किया कि,
जब अट्ठाइस नक्षत्रों के बजाय सत्ताइस नक्षत्र लेने का निर्णय लिया, तो उत्तराषाढ़ा की अन्तिम चार घटी और श्रवण नक्षत्र के प्रारम्भ की २५ घटी को मिला कर कुल २९ घटी को अभिजित् नक्षत्र मान लिया।
महर्षि गर्गाचार्य नें गर्ग संहिता और भास्कराचार्य ने सिद्धान्त शिरोमणि में असमान भोगांश वाले नक्षत्रों को मान्यता दी। लेकिन वराहमिहिर ने वृहत् संहिता में १३°२०' के समान भोगांश वाले सत्ताइस को मान्यता दी। साथ ही मिश्र,युनान और बेबीलोन (इराक) में प्रचलित ३०° वाली बारह राशियों को भी मान्यता दी। तथा राशियों और नक्षत्रों में समायोजन स्थापित किया।
योग एवम् करण (तिथ्यार्ध) का उल्लेख नहीं है।
सूर्य से चन्द्रमा के बारह-बारह अंश के अन्तर पर तिथियाँ बदलती है। जैसे 348° से 360° तक अमावस्या रहती है। 00° से 12° अन्तर तक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा, 12° से 24° तक द्वितीया, 24° से 36° तक तृतीया ....…. 168° से 180° तक पूर्णिमा। फिर 180° से 192° तक कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा, 192° से 204° तक कृष्ण पक्ष की द्वितीया 204° से 216° तक कृष्ण पक्ष की तृतीया और पुनः 348° से 360° तक अमावस्या रहती है।
ऐसे ही सूर्य से चन्द्रमा के छः-छः अंश के अन्तर को करण कहते हैं।

इसके अलावा मुहूर्त शास्त्र में अक्षांशो के आधार पर ऋतुओं में अन्तर पड़ता है। 
क्या उत्तर गोल यानी वैदिक उत्तरायण में किये जाने वाले कार्य दक्षिणी गोलार्ध में भी उत्तर गोल यानी वैदिक उत्तरायण में ही किये जाने चाहिए। या वहाँ उनमें से कुछ कार्य जिनका सम्बन्ध वास्तु से है वे कार्य दक्षिण गोल अर्थात वैदिक दक्षिणायन में करना चाहिए? ऐसा कोई स्पष्टीकरण नहीं है।

केवल कर्क रेखा और मकर रेखा के आस-पास ही षड ऋतुएँ होती है। इसी कारण ऋग्वेद में पाँच ऋतुओं का ही उल्लेख किया है। हेमन्त ऋतु का उल्लेख नहीं है।
भूमध्य रेखीय क्षेत्रों में ग्रीष्म ऋतु और वर्षा ऋतु के अलावा कोई ऋतु होती ही नहीं।
उत्तर अक्षांश 66° 40 के उत्तर में जब ग्रीष्म ऋतु होती ही नहीं तब कोई व्यक्ति ग्रीष्म वाले कार्य कैसे करेगा? ऐसे ही 
 दक्षिण अक्षांश 66° 40 के उत्तर में जब ग्रीष्म ऋतु होती ही नहीं तब कोई व्यक्ति ग्रीष्म वाले कार्य कैसे करेगा?

अधिक उत्तर दक्षिण अक्षांशो पर दिनमान 24 घण्टे से भी अधिक होते हैं वहाँ कोई व्रत, व्रत का पारण कैसे किया जाए इस सम्बन्ध में उचित अनुचित की व्यवस्था देने वाले धर्मशास्त्र में भी उल्लेख नहीं है, तो, धर्म शास्त्र के अङ्ग रूप मुहूर्त शास्त्र में सूर्योदय, प्रातः, सङ्गव, पूर्वाह्न, मध्याह्न, अभिजित मुहूर्त, विजय मुहूर्त, अपराह्न, सूर्यास्त, गोधुलि, सायं सन्ध्या, प्रदोषकाल, पूर्व रात्रि, महानिशा, मध्य रात्रि, ब्राह्म मुहूर्त, ब्रह्म मुहूर्त, उषा काल, अरुणोदय, का निर्णय उक्त कालों में कैसे किया जाएगा इसका कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है

जब उत्तर अक्षांश 66° 40 के उत्तर में जब मकर लग्न दिखता ही नहीं तब कोई व्यक्ति मकर लग्न वाले कार्य कैसे करेगा?ऐसे ही 
 दक्षिण अक्षांश 66° 40 के उत्तर में जब कर्क लग्न दिखता ही नहीं तब कोई व्यक्ति कर्क लग्न वाले कार्य कैसे करेगा?
कोई स्पष्टीकरण नहीं है।

इतनी सब विसङ्गतियों का प्रभाव यह पढ़ा कि, मुहूर्त निकलाने वाले भी मुहुर्त में कोई कार्य नहीं कर पाते। या
मन वाञ्छित दिन में मन वाञ्छित समय में ही मुहूर्त चाहते हैं।
वैदिक अग्निहोत्र रात्रि में नहीं होते फिर विवाह में रात्रि में अग्निहोत्र कर फैरे का चक्कर मेरी समझ से अत्यन्त परे है।
मेरे मातृ कुल में ही मेरे भतिजे का विवाह वेदतुल्य गणित वाली पञ्चाङ्ग से उनके जन्म राशि/नक्षत्र/ चरण के आधार पर नहीं निकल रहे थे तो, लड़की के जन्म नाम के स्थान पर बोलते नाम पर मुहूर्त निकलवा लिया गया।
जबकि मेरे अनुज ने मेरे भतिजे का नाम बदलकर चन्द्रमा के राशि नक्षत्र पर अवकहड़ा चक्र के अनुसार कर दिया था। उसी के विवाह के लिए लड़की के जन्म नाम से मुहूर्त जून में निकल रहे थे तो उन्होंने होने वाली पुत्र वधू के आधार कार्ड वाले नाम से मुहूर्त निकलवा लिया।
विवाह लग्न के समय मेरे भतीजे को नवम सूर्य पूज्य है और भतिजा बहू के जन्म कुण्डली की चन्द्र राशि से गुरु ब्रहस्पति तृतीय अर्थात पूज्य है। जबकि मेरा अनुज पूज्य गुरु ब्रहस्पति में सगाई करने को भी तैयार नहीं था।
यह तो सभी ने देखा है कि, जि समय लग्न मुहूर्त में पाणिग्रहण संस्कार (हथलेवा) का समय होता है उसी समय वर का प्रोसेशन निकल रहा होता है और बाराती फुहड़ डान्स कर रहे होते हैं। (नृत्य नहीं कहा जा सकता इसलिए लिख रहा डान्स कर रहे होते हैं ऐसा लिख रहा हूँ)  

पाँच सौ वर्षों के संघर्ष के बाद शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी के अनुचरों, ग्रामीणों की प्रशिक्षित सेना के द्वारा ढाँचा गिराने पर माननीय न्यायालय के समक्ष शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी के वकीलों द्वारा अंग्रेजी शासन के दौरान अयोध्या के अंग्रेज कलेक्टर द्वारा सरयु नदी और अन्राय मन्दिरों आदि लेण्डमार्क से नपती करवा कर बनाये गए नक्शे मे प्राचीन रामजन्म भूमि का स्थान नियत करके रखे गए प्रमाण प्रस्तुत किए जाने और वकील श्री विष्णु जैन के द्वारा प्रस्तुत प्रमाणों के आधार पर हुए पूरा तात्विक सर्वेक्षण को आधार बनाकर माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय और न्याय (फैसले) और आदेश के पालन में राम भक्तों से प्राप्त चन्दे की राशि से बनाए गए अधुरे राम मन्दिर की प्राण प्रतिष्ठा केवल राजनीतिक लाभ की आशा में नीमच की चण्डु पञ्चाङ्ग (निर्णय सागर पञ्चाङ्ग) में बतलाये गए मुहूर्त को मानकर जोड़-तोड़ करके बिना मुहूर्त के दिन कर दी गई। भले ही राजनीतिक लाभ मिला तो मिला नहीं लेकिन मुहूर्त बतलाने वाले शास्त्री जी लगभग छः महीने में ही निपट गए।
ऐसे देश समाज में, कलिकाल मे रहने वाले मेरे भाई के परिवार जनों को क्या दोष दिया जा सकता है।
अब बतलाइये कि, उक्त गलत तथ्यों पर आधारित वर्तमान मुहूर्त शास्त्र पर किस आधार पर और किस कारण से श्रद्धा, आस्था और विश्वास व्यक्त किया जाए?
अतः निर्णय आप पर छोड़ता हूँ।