वेद और तन्त्र में अन्तर।
ऋग्वेद और एतरेय ब्राह्मण ग्रन्थ में विष्णु को परम पद कहा है। और कहा है कि, देवता भी विष्णु परम पद को (टकटकी लगाकर) देखते हैं।
तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्॥ ऋग्वेद 1/22/20
विष्णु के हाथ में नियति चक्र है । 90×4 =360 अरों का चक्र है। (चार गुणित नब्बे अर्थात 360अरोंं का संवत्सर चक्र है।) तीनसौ साठ सायन सौर दिनों का संवत्सर ही नियति चक्र कहलाता है।
"चतुर्भि: साकं नवतिं च नामभिश्चक्रं न वृत्तं व्यतीँरवीविपत्। बृहच्छरीरो विमिमान ऋक्वभिर्युवाकुमार: प्रत्येत्याहवम् ॥" ऋग्वेद 01/155/06
जबकि तन्त्र में शंकर जी को महादेव के रूप में इष्ट और काली तथा भैरव उपास्य देवता हैं।
गायों के चरवाहे, अश्वपाल, और गजपालों के प्रमुख शंकर जी पशुपति कहलाते हैं। क्योंकि वे महा विष विज्ञानी, और कुशल शल्य चिकित्सक थे। गवायुर्वेद, अश्वायुर्वेद, गजायुर्वेद आदि के विशेषज्ञ थे। इसलिए गोपाल, अश्वपति, गजपति सभी उनका आदर करते थे।
शंकजी सङ्गीत के वाद्ययन्त्रों, और भरत नाट्यम तथा धनुर्वेद के शस्त्रास्त्रों के विज्ञानी थे और हीमेन पर्सनेलिटी के वीर पुरुष थे। इसलिए प्रियपति कहलाये।
ईरान के मीढ संस्कृति के उपास्य होने से शंकर जी मीढीश कहलाते थे। मङ्गोलिया के प्रमथ गणों के नायक होने के कारण शंकर जी प्रमथेश कहलाते थे। इसके अलावा शंकर जी सुडान, इथियोपिया, सोमालिया, इरिट्रिया, केनिया और टर्की, लेबनान, इजराइल, जोर्डन, सीरिया , इराक, सऊदी अरब, यमन, ओमान आदि देशों में भी उपास्य देवता रहे हैं।
यमन और सऊदी अरब में काबा का शिवलिङ्ग, अव्राम/अब्राहम का शिवाई मत/सबाइन मत, सुलेमान की पत्नी शिवा (शिबा), बेबीलोन के बाल देवता जो नन्दी थे सीरिया के नाग माता सुरसा के पुत्र (नाग) / सूर , मिश्र के पिरामिडों का मृगशीर्ष नक्षत्र के तीन तारे और व्याघ की प्रतिकृत होना (ध्यातव्य है कि, मृगशीर्ष नक्षत्र का देवता सोम अर्थात चन्द्रमा है और व्याघ रुद्र का प्रतीक है) अब्राहमिक मत सेमेटीक (चान्द्र/ चन्द्र वंशी) कहलाते हैं।
लेकिन *वेदों में शंकर जी को* उनके अनुचर दस रुद्रों सहित ग्यारह रुद्रों को वेदों में *तैंतीस देवताओं में स्थान दिया गया। इष्ट देवों में स्थान नहीं दिया था।*
*वेदों में पञ्च महायज्ञ नित्य कर्म माने गए हैं। जिसके ब्रह्म यज्ञ के अन्तर्गत अष्टाङ्ग योग भी समाहित है। लेकिन प्रतिमा मूर्ति या चित्र में ईश्वर की धारणा करना निषिद्ध है।*
*न तस्य प्रतिमा अस्ति। शुक्ल यजुर्वेद 32/3*
यज्ञ --- वेदों में *विष्णुअर्थ / विष्णु के निमित्त/ परमार्थ कर्म/ परम के लिए किए जाने वाले सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय निष्काम कर्म यज्ञ कहलाते हैं।* जिसमें देव यज्ञ में अग्निहोत्र होता है।
प्रत्येक निष्काम सत्कर्म, सात्विक तप, सात्विक साधना, निस्वार्थ दान आदि सब यज्ञ ही है जैसे विनोबा जी का भूदान यज्ञ, श्रमदान यज्ञ, विद्या दान यज्ञ आदि।
मतलब *यज्ञ में अग्निहोत्र आवश्यक नहीं है* ।
होम --- जैसे विवाह में लाजा होम अर्थात साल (धान) की *धानी जो दीपावली पर मिलती है उसको अग्नि में डालते हैं, या होली में नारियल आदि डालते हैं यह होम है।*
हवन --- *आह्वाहित देवताओं को आहुति देना जैसे किसी विशेष व्रत में या किसी पर्व या त्यौहार पर या विवाह आदि संस्कारों में जो छोटा अग्निहोत्र कर्म होता है उसे हवन कहते हैं।*
तन्त्र मत में *मठ व्यवस्था है। मठों में मन्दिर होते हैं जहाँ मूर्ति पूजा होती है।*
वेदों में मूर्तिपूजा का विरोध है, शिष्णेदेवाः (लिङ्ग योनि पूजकों) का घोर विरोध किया गया है।
*ऋग्वेद सप्तम मण्डल/ सूक्त 21 मन्त्र 05 में कहा है कि,*
*ऋषि वसिष्ठ इंद्र से शिश्नेदैवाः अर्थात लिङ्ग और भग (शिवलिङ्ग) की पूजा करने वाले यातुधान अर्थात (असुर, दैत्य दानव, आदि शत्रुओं से सुरक्षा की प्रार्थना कर रहे हैं।*
मन्त्र ---
*न यातव इन्द्र जुजुवुर्ना न वन्दना शविष्ठ वेद्यभि।न श्रीरर्द्धयो विष्णुनस्य जन्तोर्मा शिश्नदेवाः अपि गुऋतम् नः।।*
मन्त्र का अर्थ ---
*"हे बलवान इंद्र!*
(दुष्ट, कृतघ्न, अधार्मिक, विलासी) *शिश्नेदैवाः अर्थात लिङ्ग और भग (शिवलिङ्ग) की पूजा करने वाले यातुधानों * अर्थात (असुर, दैत्य दानव, आदि) शत्रुओं से हमारी रक्षा कीजिए।*
*लिङ्गपूजक असूर लोग हमें परेशान न कर सकें; उन पर हमारी दृष्टि पड़ने, उनकी छाया पड़ने, उनके स्पर्श दोष से, हमारी समृद्धि को आधी न हो पाए। हे सर्वव्यापी विष्णु देव! उनसे हमारी रक्षा कीजिए।*
जबकि, *तन्त्र में लिङ्ग योनि पूजा आवश्यक है।*
वेदों में * गुण कर्म आधारित वर्णाश्रम व्यवस्था है।*
तन्त्र में *जन्म आधारित जातिप्रथा है।*
*वेदों में बालक और कन्याओं सबके लिए संस्कार आवश्यक कर्म है। संस्कार से ही द्विज कहलाते हैं।*
*तन्त्र मत में स्त्रियों और शुद्धों का उपनयन संस्कार नहीं होता है। न वे यज्ञोपवीत धारण कर सकते हैं।*
*वेदिक मत में बालक और कन्याओं सबके लिए गुरुकुल शिक्षा और वेदाध्ययन तथा पञ्च महायज्ञ आवश्यक है।*
जबकि *तन्त्र मत में शुद्रों और स्त्रियों को वेदाध्ययन, वैदिक मन्त्र जप का अधिकार नहीं है।*
वेदों में *यज्ञों में, संस्करों मे प्रथम पूज्य अग्नि हैं।*
जबकि *तन्त्र मत में प्रथम पूज्य विनायक लम्बोदर गजानन हैं।*
वेदों में *गणराज्य का प्रमुख गणपति कहलाता है। इसलिए व्यवहार में इन्हें प्रथम नागरिक, प्रथम पूज्य, प्रथम निमन्त्रण , प्रथम आमन्त्रण की पात्रता स्वाभाविक थी।*
समिति अर्थात राज्यसभा का सभापति सदसस्पति कहलाता है।
तन्त्र में *विनायक गजानन को प्रथम पुज्य माना जाता है। विनायक गजानन को गणपति माना जाता है।*
शंकर जी के *पिशाच गणो मे अष्ट विनायक भी हैं। इन अष्ट विनायकों में से एक लम्बोदर गजानन को पहले शंकर जी के प्रमथ गणों का गणपति और बादमे शंकर जी के सभी गणों का गणपति घोषित कर दिया गया। इसलिए लम्बोदर गजानन को शंकर जी के गणो में प्रथम पूज्य घोषित कर दिया गया।*
*श्री पाण्डुरङ्ग वामन काणे ने धर्मशास्त्र का इतिहास भाग -1 पृष्ठ 186 पर स्पष्ट लिखा है कि, अष्ट विनायक - 1 सम्मित, 2 उस्मित, 3 मित, 4 देवयजन, 5 शाल, 6 कटंकट, 7 कुष्माण्ड, और 8 राजपुत्र ये आठों पिशाच हैं और शिवगण हैं।*
*शंकर जी की शक्ति वेदों की उमा कहलाती है, जबकि तन्त्र में पहले सती थी फिर सती के दुसरे जन्म में पार्वती कहलाईं।*
शंकर जी के मित्र तिब्बत निवासी यक्ष कुबेर निधिपति (धनाध्यक्ष) थे। इसलिए निधिपति यक्ष कुबेर को भी रुद्र माना जाता है। तन्त्र में कुबेर को रुद्रगण माना जाता है।
शंकर जी के पुत्र कार्तिकेय देव सेनापति थे। लेकिन तन्त्र में कार्तिकेय की तुलना में विनायक लम्बोदर गजानन का महत्व अधिक है।
*तन्त्र एक वेद विरुद्ध व्यवस्था का नाम है। तन्त्र का मतलब सकाम कर्म। इसके लिए वेद मन्त्रों का प्रयोग किया जाए या स्मार्त, पौराणिक मन्त्र या तान्त्रिक मन्त्रों का प्रयोग किया जाए यह महत्वपूर्ण नहीं है ।किस भाव और किस उद्देश्य से मन्त्र का उपयोग किया गया है, इसका ही महत्व है।*
*वेदिक धर्म परमात्मा, परमेश्वर सर्वव्यापी विष्णु के प्रति पूर्ण समर्पण का नाम है।*
*वहाँ कोई व्यक्तिगत माँग नहीं होती। इसलिए वेद मन्त्रों में हम ऐसा करे, हमें ऐसा प्रदान कीजिए, हमारी रक्षा करो ऐसी सामुहिक प्रार्थना है।*
अर्गलास्तोत्र के मन्त्र ---
*रूपम् देहि, जयम् देहि, यशो देहि , द्विषोजहि जैसी नीजी मांग नहीं मिलेगी।*
*आगम ग्रन्थोंक्त तन्त्र का समय मत अर्थात तुलनात्मक सात्विक तन्त्र* ---
सनातन धर्म में सर्वप्रथम दक्षिण भारत में अपनाया गया। भगवान आद्य शंकराचार्य जी ने स्मार्त मत चलाकर तन्त्र के समय मत को अपनाया। बाद में दक्षिण भारत के अलवार वैष्णव भक्तों के शिष्य रामानुजाचार्य ने भी अपनाया। (तमिल शब्द अलवार का हिन्दी में अर्थ जो लीन है। ये अलवार भक्त शुद्र माने जाते हैं।)
फिर तो यह सभी पन्थों और सम्प्रदायों ने अपने अपने आगम ग्रन्थ, आम्नाय , मठ और मठों में मन्दिर बना कर मूर्ति पूजा प्रारम्भ कर दी।
* सभी पन्थों और सम्प्रदायों का एक ही तर्क है कि, समय मत तन्त्र सात्विक है, इसमें स्तम्भन, आकर्षण, मोहन, वशिकरण, उच्चाटन, विद्वेषण और मारण आदि अभिचार कर्म और मुद्रा, मदिरा, मत्स्य, मान्स और मैथुन आदि पञ्च मकार स्वीकार्य नहीं है। इसलिए यह हमें स्वीकार्य है। लेकिन उन्हें तन्त्र की उपर्युक्त वेद विरोधी मान्यताओं की परवाह इस लिए नहीं रही क्योंकि सभी पन्थों और सम्प्रदायों के आचार्य आर्यावर्त से बाहर दक्षिणापथ में जन्में।*
तन्त्र के *समय मत के अन्तर्गत वेदों के स्थान पर अलग-अलग पन्थों और सम्प्रदायों के अलग-अलग आगम ग्रन्थ और उनके आम्नाय बनाना, वर्ण के स्थान पर जातिप्रथा, आश्रम के स्थान पर मठाम्नाय के अनुसार प्रत्येक पन्थ और सम्प्रदाय के अलग-अलग मठ बनाना, यज्ञ के स्थान पर इन्हीं मठों में मन्दिर बना कर अपने इष्टदेव की प्रतिमा या मूर्ति स्थापित कर जड़ मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा करके पूजन कर ईश्वर का कार्य स्वयम् मठाधीश को करने में समर्थ घोषित करना। कर्म फलों के सञ्चित में से इस जन्म में भोगे जा सकने योग्य कर्म फलों के समुच्चय जिसे प्रारब्ध कहते हैं। प्रारब्ध तो सबको ही भोगना पड़ता है इस नीयत प्राकृतिक व्यवस्था के विरुद्ध इष्ट का नाम जप या कोई मन्त्र सिद्ध कर मनोवाञ्छित फल प्राप्त करने का भ्रम पालना, पञ्च महायज्ञ, अष्टाङ्ग योग साधना छोड़कर, हठयोग और नाम जप या मन्त्र जप करने से चार प्रकार के मोक्ष प्राप्त होना जैसी वेद विरुद्ध और विचित्र मान्यताएँ और कर्म स्वीकार किए गए।*
शंकर जी की शक्ति पार्वती के सम्बन्ध में महाभारत में उल्लेख है कि,---
गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित महाभारत पञ्चम खण्ड,शान्ति पर्व/ मौक्ष पर्व/ अध्याय २८४ पृष्ठ ५१६६ या संक्षिप्त महाभारत का पृष्ठ १२८१ पर दक्षयज्ञ विध्वंस की कथा में स्पष्ट लिखा है कि, शंकर जी ने पार्वती जी के रुष्ट होने पर उन्हें समझाया था कि, *सृष्टि के आदि में ही प्रजापति ने यज्ञ में रुद्र को भाग नहीं दिया जाने का आदेश दिया था। इसलिए दक्ष द्वितीय प्रजापति ने कनखल में हो रहे यज्ञ में मुझे निमन्त्रण नहीं देकर कोई गलती नहीं की।*
फिर भी पार्वती का क्रोध शान्त न होने के कारण शंकर जी स्वयम् पार्वती जी को लेकर कनखल (हरिद्वार) दक्ष द्वितीय के यज्ञ में गये। दक्ष यज्ञ में पार्वती द्वारा रुद्र शंकर जी को नहीं बुलाने का विरोध किया । इसपर दक्ष द्वितीय ने पार्वती और शंकर जी के प्रति अपमान जनक व्यवहार किया । इससे रुष्ट होकर शंकर जी ने अपने गण वीरभद्र और भद्रकाली को आह्वान किया (बुलाया)। फिर शंकर जी के आदेश पर वीरभद्र और भद्रकाली की सेना ने दक्ष यज्ञ विध्वंस कर दिया और दक्ष द्वितीय का सिर काट दिया।
यह देखकर देवताओं के परामर्श से प्रजापति ने संविधान संशोधन कर यज्ञ में रुद्र भाग निकालने की व्यवस्था की।
तब शंकर जी का क्रोध शान्त हुआ और देवताओं और प्रजापति के कहने पर दक्ष द्वितीय की शल्य चिकित्सा कर उनका सिर वापस जोड़ दिया। इस प्रक्रिया में दक्ष द्वितीय का चेहरा भेड़ जैसा दिखने लगा।
तत्पश्चात शंकरजी पार्वती को लेकर सहर्ष वापस कैलाश लौट गए। और देवता भी स्वधाम लौट गए। न दक्ष पुत्री को सती लिखा है, न सती के आत्मदाह का कोई उल्लेख है। बल्कि प्रसन्नता पूर्वक शंकर जी पार्वती सहित वापस कैलाश लौट जाते हैं। चूंकि सति के आत्मदाह का ही उल्लेख नहीं है तो,शंकर जी का विक्षिप्त की भांति सती के भस्मीभूत देह को कन्धे पर लटका कर पूरे भारत भर में घूमने का उल्लेख होने का प्रश्न ही नहीं है। जब शंकर जी सती का भस्मीभूत शरीर कन्धे पर लटका कर घुमाने का उल्लेख नहीं है तो श्रीहरि द्वारा सती के भस्मीभूत शरीर के इक्कावन टुकड़े करने के उल्लेख का प्रश्न ही नहीं है इसलिए जब सती की देह के बावन टुकड़े जहाँ-जहाँ गिरे वहाँ-वहाँ शक्तिपीठ बनने का उल्लेख भी नहीं होना स्वाभाविक ही है। मतलब महाभारत में कोई मनगढ़ंत गप नहीं होकर शुद्ध इतिहास लिखा है ।
जबकि तन्त्र में उल्लेख है कि, शंकर जी प्रजापति प्रथम द्वारा स्थापित धर्म मर्यादा के विरुद्ध तन्त्र मत के आविष्कारक थे। दक्ष द्वितीय की पुत्री सती ने अपने पिता (दक्ष द्वितीय) की इच्छा के विरुद्ध तन्त्र मत के सृजेता और पालनकर्ता शंकर जी से विवाह किया।
इससे रुष्ट होकर दक्ष द्वितीय ने सती की अवहेलना करना शुरू कर दिया।
जब दक्ष द्वितीय ने कनखल में बड़े यज्ञ का आयोजन किया तो पुत्री सती और दामाद शंकर जी को नहीं बुलाया।
इससे क्रोधित होकर सती शंकर जी के आदेश की अवहेलना कर पिता दक्ष द्वितीय के यज्ञ में कनखल गई।
वहाँ श्री हरि, हिरण्यगर्भ ब्रह्मा, प्रजापति ब्रह्मा, इन्द्रादि देवताओं और पिता दक्ष प्रजापति द्वितीय और आमन्त्रित देवताओं, ऋषियों और ऋत्विकों को क्रोध पूर्वक फटकार लगाई।
इससे दक्ष द्वितीय ने सती को डांटा और वापस लौटने का आदेश दिया। ऋषियों में दधीचि आदि शैवों ने सती का समर्थन किया। और श्री हरि, हिरण्यगर्भ ब्रह्मा, प्रजापति ब्रह्मा, इन्द्रादि देवताओं और दक्ष प्रजापति द्वितीय की घोर भर्त्सना की।
इस कारण विवाद बढ़ा और सती ने यज्ञ भङ्ग करने के उद्देश्य से यज्ञाग्नि से आत्मदाह कर लिया।
सती की देह जलकर भस्म हो गई। तो शंकर जी को सूचित किया, शंकर जी तत्काल आ गये और वीरभद्र का आह्वान किया। शंकर जी के आदेश से वीरभद्र और शिवगणों ने यज्ञाग्नि बुझा दी। ऋत्विकों और उपस्थित देवगणों और ऋषियों तथा दक्ष द्वितीय के साथ मारपीट, हत्या आदि शुरू कर दी। दक्ष द्वितीय की गर्दन काट दी।
फिर देवताओं और ऋषियों के निवेदन पर शंकर जी ने दक्ष द्वितीय को बकरे का सिर लगा दिया।
बकरे के सिर वाले दक्ष ने शंकर जी से क्षमा मांगी। तो शंकर जी ने बकरे के सिर वाले दक्ष को क्षमा कर वरदान दे दिये।
सभी देवता अपने-अपने धाम लौट गए।
दक्ष (द्वितीय) का सिर जोड़ कर वरदान के बाद (पता नहीं क्या हुआ कि,) शंकर जी अचानक विक्षिप्त हो गये और सती की भस्मीभूत देह उठाकर कन्धे पर लटका कर पूरे भारत वर्ष में घूमते फिरे।
फिर श्रीहरि ने शंकर जी के कन्धे पर लटकी सती की भस्मीभूत देह के चक्र से इक्कावन टुकड़े कर दिए।
ये टुकड़े जहाँ-जहाँ गिरे वहाँ-वहाँ बावन शक्तिपीठ बन गये।
टुकड़े भी इतने छोटे थे कि, कहीँ ओठ गिरा, तो कहीं कोहनी तो कहीं भग गिरी।
यह समझ नहीं आया कि, दक्ष द्वितीय को क्षमा करने तक शान्त हो चुके शंकर जी अचानक अशान्त होकर विक्षिप्त कैसे हो गये?
भस्मीभूत देह को उठाकर कन्धे पर कैसे लादा? फिर उस भस्मीभूत देह के इतने छोटे-छोटे टुकड़े क्यों किये?
तन्त्र मत में प्रचेताओं के पुत्र दक्ष द्वितीय की पुत्री सती का दक्ष यज्ञ में आत्मदाह करने का गलत उल्लेख, शंकर जी भस्मीभूत सती का शव कन्धे पर टांगकर तत्कालीन पूरे भारत भर में विक्षिप्तों की भांति भटकने का गलत उल्लेख, भगवान श्रीहरि द्वारा शंकर जी के कन्धे पर टंगे सती के भस्मीभूत देह के इक्कावन टुकड़े करने का गलत उल्लेख और सती के भस्मीभूत देह के टुकड़े जहाँ-जहाँ गिरे उन उन स्थानों पर बावन शक्तिपीठ बनाने का गलत उल्लेख, हिमवान (हिमाचल) और (अर्यमा-स्वधा की पुत्री) हिमवान की पत्नी मेनावती के गर्भ से पार्वती के रूप में सती का पुनर्जन्म होने का गलत उल्लेख, शंकरजी से विवाह करने हेतु पार्वती द्वारा घोर तपस्या करने का उल्लेख, शंकरजी को विवाह करने के लिए कामदेव द्वारा कामबाण चलाने पर रुष्ट होकर शंकर जी द्वारा कामदेव को भस्म कर देने का गलत उल्लेख; इस प्रकार के अनेक गलत उल्लेख किये गये हैं। ऐसे ही और तन्त्र मत में शक्ति के बिना शिव को शव के समान माना जाने का मुर्खतापूर्ण तर्क दिया जाता है। इसलिए पुराणों के नाम से प्रचारित संस्कृत में लिखे गए परवर्ती साहित्य के ग्रन्थों के ये उल्लेख अग्राह्य एवम् त्याज्य हैं।
वेद विरुद्ध व्यवस्था को ही तन्त्र कहते हैं। एक मान्यता है कि, शंकर जी तन्त्र शास्त्र के जनक हैं; इसलिए तन्त्र मत के इष्ट देव माने जाते हैं।
मतलब प्रथम दृष्टया ही झूठ का पुलिन्दा लगता है। फिर महाभारत में उल्लेखित सच्चा इतिहास जानकार भी शंकरजी और उमा पार्वती पर ऐसे घृणित झूठे मन गड़न्त आरोप लगाने का दुष्कृत्य क्यों किया गया।
फिर भी मन नहीं भरा तो शंकर जी जैसे महा विष विज्ञानी देवता को गंजेड़ी-भंडेड़ी और पत्नी को नग्न कर नचवाने का झूठा आरोप लगा दिया। लानत है ऐसे तान्त्रिकों को।
यह सब स्पष्ट करते हैं कि, कि, इस तन्त्र का आधार ही झूठा है। तन्त्र वैदिक रुद्र देवता शंकर जी की रचना हो यह कदापि सम्भव नहीं है। यह किसी अघोरी की रचना ही हो सकती है।
दुसरी मान्यता के अनुसार तन्त्र शुक्राचार्य की रचना है। शुक्राचार्य जी के पुत्र त्वष्टा ने की, युनान के पास क्रीट में शाक्त पन्थ की स्थापना की थी। त्वष्टा के पुत्र और शुक्राचार्य जी के पौत्र विश्वरूप ने मङ्गोलिया के तन्त्रधर्म के धर्मशास्त्र तन्त्र शास्त्र की रचना की थी।
भारत में तन्त्र शास्त्र का प्रचार अत्री और अनुसुया के पुत्र दत्तात्रेय ने किया । दत्तात्रेय के दो प्रमुख शिष्य थे मण्डला और जबलपुर का शासक कार्तवीर्य सहस्रार्जून तथा लक्ष्यद्वीप का शासक रावण।
तन्त्र शास्त्र के समय मत में दुर्गा सप्तशती मुख्य ग्रन्थ है। दुर्गा सप्तशती के प्रथम चरित्र में उल्लेख के अनुसार सृष्टि के आदि में मधु केटभ वध के लिए हिरण्यगर्भ ब्रह्मा ने योगनिद्रा का आश्रय लेकर सोये हुए नारायण को पुकारा तब नारायण की आंखों से योग निद्रा प्रथक होकर नारायणी अत्यन्त कृष्ण वर्णा महाकाली स्वरूप में प्रकट हुई।
ध्यातव्य है कि नारायण तथा नारायणी ही श्री हरि और पद्मासना गज सेविता कमला देवी के स्वरूप में प्रकट हुए।
श्री हरि ने पाँच हजार वर्षों तक बाहु युद्ध कर मधुकेटभ का वध कर दिया।
दुर्गा सप्तशती के मध्यम चरित्र में महिशासुर से त्रस्त देवताओं द्वारा हिरण्यगर्भ ब्रह्मा जी के नेतृत्व में प्रजापति ब्रह्मा, इन्द्र, द्वादश आदित्य, अष्ट वसु और शंकर जी सहित एकादश रुद्र, और मनु सहित सहित तैंतीस देवताओं ने नारायण श्री हरि की शरण ग्रहण कर गुहार लगाई तो नारायण श्रीहरि ने अत्यन्त क्रोध किया और उनके शरीर से तेज प्रकट हुआ, साथ ही हिरण्यगर्भ ब्रह्मा, प्रजापति ब्रह्मा, इन्द्रादि सभी देवताओं के शरीर से भी तेज प्रकट हुआ। सभी तेज मिलकर एक देवी का स्वरूप प्रकट हुआ। जिसे सभी देवताओं ने वस्त्राभूषण और अपने-अपने अस्त्र-शस्त्रादि भेट किये।
फिर प्रजापति आदि सभी देवताओं ने उस देवी की स्तुति कर महिशासुर के वध की प्रार्थना की। फिर उन देवी ने सेना सहित महिशासुर का नाश कर दिया। शेष बचे दैत्य दानव असुर पाताल लोक लौट गए। देवताओं ने प्रसन्नता पूर्वक देवी की स्तुति की और भविष्य में भी ऐसी ही सहायता प्रदान करने की प्रार्थना की। देवी ने भी देवताओं को आश्वस्त किया।
दुर्गा सप्तशती के उत्तम चरित्र में शुम्भ निशुम्भ के उत्पातों से परेशान देवताओं ने हिमालय पर एकत्रित हो कर देवी को पुकारा। उसी समय वहाँ से गुजर रही भगवती पार्वती ने देवताओं से पुछा आप लोग किसकी प्रार्थना कर रहे हो? तभी भगवती पार्वती के शरीर कोश से अत्यन्त गोर वर्ण परम सुन्दरी कौशिकी देवी प्रकट हुई। और उन्होंने भगवती पार्वती को कहा देवी ये मेरी आराधना कर रहे हैं। इसके बाद गौरवर्णी पार्वती काली हो गई और हिमालय पर विचरण करने वाली कालिका या गढ़ कालिका कहलाई।
फिर देवताओं ने प्रसन्न होकर देवी कोशिकी की स्तुति की और शुम्भ निशुम्भ के आतंक से मुक्ति की प्रार्थना की।
इन्ही देवी की सहायतार्थ सभी देवताओं की शक्तियाँ आई जो सप्त मातृकाएं कहलाती है।
तथा चण्डिका शक्ति भी आई जिन्होंने शंकर जी को दूत बनाकर शुम्भ निशुम्भ को समझाने भेजा और शुम्भ निशुम्भ को सेना सहित पाताल लौट जाओ या मरने के लिए तैयार हो जाओ का सन्देश दिया, इसलिए वे शिव दूति कहलातीं हैं। ये अत्यन्त कृषकाय और सेकड़ों गिदड़ियों के समान भयंकर शब्द करती थी। और असुरों का रक्तपान करने को तत्पर रहती थी।
कोशिकी के नेत्रों से अत्यन्त भयानक और कोयले के समान काली, विशाल मुख वाली मान्स रहित केवल कंकाल पर चमड़ी वाली काली देवी प्रकट हुई। भैरव इनका गण था। चण्ड मुण्ड की गर्दन काट कर उनके सिर कोशिकी को भेंट किये। तब कोशिकी ने इन्हें चामुण्डा नाम दिया।
चामुण्डा युद्ध में दैत्य दानवों को रथ, हाथी घोड़े सहित खा जातीं थीं। इन्होंने और चण्डिका शक्ति (शिव दुति) ने रक्त बीज का एक बुन्द रक्त भी भूमि पर नहीं गिरने दिया। खप्पर में रक्त गिरते ही उत्पन्न हुए राक्षसों को तुरन्त खा जाती थी। रक्त बीज का रक्त सीधे काली के मुख में गिरते ही उत्पन्न राक्षसों को काली चट कर जाती। इस प्रकार रक्त विहीन रक्त बीज का वध कोशिकी ने कर दिया।
शुम्भ ने चुनौती दी की अकेली लड़ो तो सभी देवियाँ कोशिकी में लय हो गई। फिर उन्होंने शुम्भ को भी मार डाला। और शेष बचे डरे हुए असुर पाताल में प्रवेश कर गये।
इस कथा में उल्लेखित काली जो चामुण्डा भी कहलातीं हैं और उनका वीर भैरव और भैरव की शक्ति पद्मा भैरवी तान्त्रिकों की मुख्य उपास्य हैं।
इसके विपरित वामाचारी दत्त सम्प्रदाय, काली और भैरव के उपासकों के तन्त्र ग्रन्थ भैरव तन्त्र, शारदा तिलकम्, रुद्र यामल तन्त्र, दत्तात्रेय तन्त्रम् आदि हैं।
इसका उपयोग आकर्षण (जबरजस्ती बुलाना), मोहन (मोहित करना), वशीकरण (अपने नियन्त्रण में लेना), स्थम्भन (रोक देना, स्थिर कर देना), उच्चाटन (मन विचलित कर देना, छोड़ कर भागने की इच्छा पैदा करना), विद्वेषण (परस्पर झगड़ा-फसाद करवाना), बिमार करना, मारण (विष प्रयोग आदि के द्वारा हत्या करना) आदि अभिचार कर्म के लिए ही होता हैं और इसमें अश्लील मुद्रा बना कर दिखाना, मदिरा पान, मत्स्य भोजन, मान्स भोजन के उपरान्त भैरवी के साथ मैथुन करके मन्त्र के अन्त में हूम् फट लगाकर हवन सामग्री फेंकने जैसे आहुति डाली जाती है। जिसे पञ्च मकार भी साधना कहते है। उक्त तन्त्र ग्रन्थों में ये अभिचार और पञ्च मकार साधना भी स्वीकार्य है।
इससे निष्कृष्ट तन्त्र शाबरी तन्त्र हैं, जिसके मन्त्र राजस्थानी भाषा जैसी बोलियों मे भी हैं, ओम् नमो आदेश गुरु को ....... फुरो मन्त्र इश्वरो वाचा। जैसे वाक्य में होते हैं। इसका उद्देश्य ही अभिचार कर्म है और उक्त पञ्च मकार अनिवार्य है ।
इससे भी निष्कृष्ट तन्त्र डाबरी तन्त्र है जिसमें आकर्षण, मोहन या वशिकरण मन्त्रों में ओम के स्थान पर मोम् का प्रयोग और उच्चाटन, मारण आदि में डोम् का प्रयोग किया जाता है।
इसमें शव साधना होती है, यहाँ तक कि, शव भक्षण और शव से मैथुन तक करते हैं
ये तन्त्र कापालिक तन्त्र मत है। जो केवल अघोरी ही कर पाते हैं।