मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

बौद्धों और जैनों के प्रभाव से सनातन धर्मियों में आये परिवर्तन ---

बौद्धों और जैनों के प्रभाव से सनातन धर्मियों में ये परिवर्तन आये---

1 वेदाध्ययन बन्द हो गया। कई ब्राह्मण ग्रन्थ तो लुप्त हो गये।
बहुत से शुल्बसूत्र, श्रोतसूत्र, गृह्यसूत्र और धर्म सूत्र लुप्त हो गये। यहाँ तक कि, मानव धर्मसूत्र ही नहीं मिलता है।

2 संध्या, पञ्चमहायज्ञ, और अष्टाङ्गयोग छूट गये।
वेदाध्ययन, ब्राह्मण ग्रन्थों का अध्ययन बन्द हो गया।

3 वेदाङ्ग में केवल शिक्षा, व्याकरण और छन्दशास्त्र का अध्ययन जारी रहा कुछ एक विद्वानों ने परवर्ती मयासुर रचित सूर्य सिद्धान्त ज्योतिष ग्रन्थ और वराहमिहिर रचित वृहत संहिता ज्योतिष ग्रंथों की शिक्षा ली और अधिकांश ने होरा शास्त्र का ही अध्ययन किया। 

परिणाम ---
वसन्त विषुव (सायन मेष संक्रान्ति) से प्रारम्भ होने वाला संवत्सर पहले तो चित्रा तारे से 180° पर सूर्य होने वाले दिन निरयन मेष संक्रमण (वैशाखी/ मेषादि/ बैसाख बिहू/ पोइला बैसाख) से प्रारम्भ होने वाला माना जाने लगा जो अभी भी भारत के अधिकांश भाग में प्रचलित है। लेकिन मध्य भारत और पश्चिम भारत में निरयन मेष संक्रमण आधारित चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारम्भ होना माना जाने लगा।

वसन्त विषुव (सायन मेष संक्रान्ति) से प्रारम्भ होने वाला, देवताओं की ऋतु वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतु वाला उत्तरायण केवल उत्तर गोल कहा जाने लगा।और 
शरद विषुव (सायन तुला संक्रान्ति) से प्रारम्भ होने वाला पितरों की ऋतु शरद, हेमन्त और शिशिर ऋतु वाला दक्षिणायन केवल दक्षिण गोल कहा जाने लगा।
और 
दक्षिण परम क्रान्ति (सायन मकर संक्रान्ति) से प्रारम्भ होने वाला दक्षिण तोयन उत्तरायण कहलाने लगा। और 
उत्तर परम क्रान्ति (सायन कर्क संक्रान्ति) से प्रारम्भ होने वाला उत्तर तोयन दक्षिणायन कहलाने लगा।
वसन्त विषुव (सायन मेष संक्रान्ति) से प्रारम्भ होने वाली वसन्त ऋतु एक माह पहले सायन मीन संक्रान्ति से प्रारम्भ होना माना जाने लगा। तदनुसार सभी ऋतुएँ एक माह पहले से प्रारम्भ होना माना जाने लगा।

वसन्त विषुव (सायन मेष संक्रान्ति) से प्रारम्भ होने वाला मधु मास को एक माह पहले वाले सायन मीन संक्रान्ति से प्रारम्भ होना माना जाने लगा। परिणाम स्वरूप मधु- माधव, शुक्र- शचि, नभः नभस्य, ईष-उर्ज, सहस-सहस्य, तपः- तपस्य मास एक माह पहले माने जाने लगे।
धर्मशास्त्र का अङ्ग मुहूर्त शास्त्र तो पुरा ही गड़बड़ा गया।
इतिहास जानने में भी भ्रम होने लगे।
व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार सब तिथियों के अनुसार मनाये जाने लगे।
नक्षत्रों के स्थान पर पश्चिम टर्की, इराक के बेबीलोन और मिश्र में प्रचलित मेष, वृषभादि राशियाँ प्रचलित हो गई।
दशाह के स्थान पर सप्ताह प्रचलित हो गया।
जबकि वेदों में मेष-वृषभादि राशियों और सप्ताह के रविवार सोमवार आदि वारों के नाम भी नहीं है।

ऐसे ही निरुक्त में निघण्टु (कोश) सिखा।
परिणाम --- वेद मन्त्रों के सही अर्थ नही जान पाये।

कल्प में शुल्ब सूत्रों, और श्रोत सूत्रों का ज्ञान बहुत सिमीत लोगों ने सिखा। गृह्य सूत्रों का स्थान कर्मकाण्ड भास्कर, कर्मकाण्ड प्रदीप, ब्रहम नित्य कर्म समुच्चय तथा आह्निक सूत्रावली जैसे निबन्धों ने लिया। 
परिणाम ---इससे मूल अर्थ और क्रिया भूल गए परिणाम यह हुआ कि, विवाह में पाणी ग्रहण के स्थान पर तोरण का मुहूर्त मुख्य हो गया। सप्तपदी और चार फेरे मिलकर सात फेरे हो गये और सप्तपदी भूल ही गए।
गर्भाधान, पुंसवन, जातकर्म , नामकरण , अक्षरारम्भ, विद्यारम्भ और वेदारम्भ संस्कार लुप्त हो गये। 
यज्ञोपवित, उपनयन संस्कार विवाह के समय होने लगे।

धर्मसूत्र का स्थान पहले स्मृतियों ने लिया फिर हेमाद्रि की चतुर्वर्ग चिन्तामणी , माधव की माधवी में पौराणिक सन्दर्भों वाला धर्म प्रचलित हो गया।
उसके बाद कमलाकर भट्ट ने उनके आधार पर निर्णय सिन्धु में सम्पादित किया। और उसकी कुञ्जी धर्म सिन्धु बन गई। अब धर्मसूत्रों के दर्शन दुर्लभ हो गये।
परिणाम स्वरूप व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहारों की तिथियों में अत्यधिक अन्तर होने लगा।

4 उप वेदों में मात्र आयुर्वेद का अध्ययन जारी रहा तथा दक्षिण भारत में गन्धर्ववेद की शिक्षा जारी रही। 
धनुर्वेद में केवल जल्लुकट्टु जैसे मार्शल आर्ट सिखा, तथा स्थापत्य वेद और शिल्प वेद में केवल शिल्प कला सिखी। सेतु निर्माण, पथ निर्माण आदि पर ध्यान नहीं दिया।

5 वेदों, वेदाङ्गो, उपवेदों के स्थान पर पुराणों का महत्व बढ़ गया। यहाँ तक कि, इतिहास ग्रन्थ रामायण और महाभारत तथा ब्राह्मण ग्रन्थों के कर्मकाण्ड भाग की मीमांसा जेमिनी कृत पूर्व मीमांसा और ब्राह्मण ग्रन्थों के ज्ञान काण्ड - ब्रह्म सूत्रों अर्थात आरण्यक और उपनिषदों की मीमांसा बादरायण की उत्तर मीमांसा (शारीरिक सूत्र) का स्थान पर भी पुराणों को देने लगे।
महाभारत के भीष्म पर्व अध्याय 25 से 43 अर्थात श्रीमद्भगवद्गीता धर्म मीमांसा और योग दर्शन का श्रेष्ठतम ग्रन्थ है।
श्रीमद्भगवद्गीता की व्याख्या भी पौराणिक सन्दर्भों से की जाने लगी।

6 *इसी प्रकार वैदिक सूक्तों और ब्राह्मण ग्रन्थों के आरण्यकों और उपनिषदों में उल्लेखित दार्शनिक विचारों से प्रेरित लेकिन स्वतन्त्र विचारकों की रचनाएँ ईश्वर कृष्ण की सांख्य कारिकाएँ, कपिल मुनि का सांख्य दर्शन, पतञ्जली का योग दर्शन श, गोतम का न्याय दर्शन और कणाद का वैशेषिक दर्शन को इतना महत्व दिया जाने लगा कि, वैदिक दृष्टि से सोचना-समझना बिल्कुल बन्द हो गया और उक्त चार दर्शनो के आधार पर सोचने-समझने लगे।* 
*यहाँ तक तो फिर भी चलाया जा सकता है, लेकिन उससे भी आगे बौद्धों के सर्वास्तिवाद, जैनों के अनेकान्तवाद, बढ़कर नागार्जुन के शुन्यवाद,मैत्रेयनाथ का योगाचार- विज्ञान वाद, पाशुपत दर्शन पर आधारित असङ्ग और वसुगुप्त का त्रिक दर्शन अर्थात कश्मीरी शैव-शाक्त दर्शन के आधार पर सोचने-विचारने और समझने लगे।*
*ये लोग वैद, वैदिक धर्म, वैदिक कर्मकाण्ड, वैदिक दर्शन, वैदिक संस्कृति और वैदिक वर्णाश्रम व्यवस्था को स्वाभाविक रूप से नहीं स्वीकारते बल्कि सन्देह की दृष्टि से देखते हैं।*
*तथाकथित वैदिक दर्शनों सांख्य दर्शन, योग दर्शन, न्याय दर्शन और वैशेषिक दर्शन के आधार पर विचार कर निकाले गए निष्कर्षों को वैदिक निष्कर्ष मानते हैं।*
*जैसे बिना वेदाध्ययन, बिना संध्या किये, बिना पञ्च महायज्ञ किये, अष्टाङ्ग योग के यम नियमों का पालन किये या मनुस्मृति के दश धर्म लक्षणों को स्वभाव में उतारे बिना, पूर्ण ईश्वर प्रणिधान की आशा करते हैं।*
*उक्त साधना के बिना सीधे धारणा, ध्यान और समाधि तक पहूँचने के स्वप्न देखते हैं।*
*माया अर्थात प्रकृति का अंश अहंकार-मन, चित्त-बुद्धि रूप अन्तःकरण को शुद्ध करने की कल्पना करते हैं।*
जबकि, 
अधियज्ञ/अधिकरण अर्थात शासन --- प्रत्यगात्मा/अन्तरात्मा - (पुरुष और प्रकृति) परब्रह्म - (प्रभविष्णु और श्री लक्ष्मी /सवितृ-सावित्री) अधियज्ञ और अधिष्ठान (शासन) हैं। 
उन्ही के करण अर्थात यन्त्र या औजार ---

अधिकरण (निकटतम मुख्य करण)-- जीवात्मा अपर ब्रह्म --(अपर पुरुष और अपरा पृकृति अर्थात जीव और आयु) (नारायण और नारायणी अर्थात श्रीहरि और कमलासना गज सेविता लक्ष्मी जो समुद्र मन्थन से निकली कही जाती है।) तथा 
भूतात्मा (प्राण अर्थात चेतना और धृति/ धारण शक्ति धारयित्व अर्थात देहि और अवस्था) हिरण्यगर्भ अर्थात पञ्चमुखी ब्रह्मा और वाणी (त्वष्टा और रचना)।
जीवात्मा (अपर ब्रह्म) और भूतात्मा (हिरण्यगर्भ) दोनों अधिकरण अर्थात मुख्य करण या निकटतम यन्त्र हैं।

अभि करण अर्थात सहायक यन्त्र---- 
सुत्रात्मा (ओज और आभा अर्थात कान्ति) प्रजापति (चतुर्मुख ब्रह्मा) और सरस्वती (दक्ष और प्रसुति) तथा 
अणुरात्मा (तेज और विद्युत) वाचस्पति और वाक (इन्द्र और शचि) अभिकरण अर्थात अधिनस्थ करण हैं अर्थात जैसे जेक के साथ टामी लगती है या बल्ब के साथ स्वीच लगता है या पंखे के साथ रेग्युलेटर होता है या रिमोट होता है। उसे अभिकरण कहते हैं।

अन्तः करण अर्थात जो करण अन्दर हो।----
 चित-बुद्धि और अहंकार-मन
और बहिर्करण----
पञ्च मुख्य प्राण और पञ्च उपप्राण, 
पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ और पञ्च कर्मेंद्रियाँ तथा 
पञ्च महाभूत और पञ्च तन्मात्रा।
अतः ये प्राकृतिक तत्व हैं, इसलिए या तो यह माना जाए कि ये शुद्ध ही है या यह मानलो कि ये शुद्ध हो ही नहीं सकते। जैसे हम नित्य तीन बार स्नान करें तो भी शरीर स्वच्छ नहीं रह सकता। न निर्मल हो सकता है।
वैसे ही उक्त प्राकृतिक पदार्थ प्रकृति की ओर ही रुझान रखेंगे।
हमें केवल इन तत्वों के प्रति मैं और मेरा वाला भाव अहन्ता ममता त्यागना होगा। 
इसीलिए अपरिग्रह साधना है, ता कि, वाह्य वस्तुओं के प्रति ममता न रहे। कोई अनजाने में ले ले, बतला कर लेले, मांग कर ले ले, लेकर नहीं लौटाए तब भी उसके प्रति विरोध, क्रोध, द्वेश नहीं हो यह अक्रोध ही अहिंसा साधना है।
सभी चीजों का मूल तत्व ही देखना जैसे सुनार आभुषणों में केवल स्वर्ण देखता है, कारीगर या कलाकार केवल डिजाइन दैखता है। वैसे ही हमें सब वस्तुओं में एक परमात्मा को देखने का स्वभाव बनाना और बनाये रखना सत्य की साधना है।
सब-कुछ ब्रह्म का है, सब-कुछ परमात्मा की लीला मात्र है। इसमें वास्तविकता कुछ नहीं है। यह जान लेने की साधना अस्तेय, निर्लोभता है।
सबसे अन्त में लिङ्ग भेद मिटता है।
सृष्टि के भैदों से मुक्त होकर अभेद मूल तत्व परमात्मा को ही जानना यह ब्रह्मचर्य साधना है।
इतना सब होने फर ही सब-कुछ परमात्मा का ही है सब-कुछ परमात्मा ही है, जान लेने, मान लेने पर ही ईश्वर प्रणिधान सम्भव है। इसलिए यही लक्ष्य है।

अलग-अलग पुराणों में अलग-अलग देवों/ देवताओं की महत्ता और शेष सब को गौण, आधीन बतलाने के कारण सबके अलग-अलग इष्ट देव बन गये । सबमें परमात्मा देखने के बजाय स्व रचित या कारिगर से बनवाई मूर्ति में ही ब्रह्मभाव लाना और उससे परे जगत देखने के बजाय पूरी सृष्टि परमात्मा की लीला मात्र है मानकर उसके सृजेता, सञ्चालक, और निवारक के रूप में ईश्वर भाव लाकर समर्पण करना आसान है।

सुबह शाम घर में मूर्तिपूजा, आरती करना, भोग लगाना तथा शेष समय और मन्दिर या मूर्ति के बाहर ईश्वर नहीं देखना नास्तिकता अनीश्वरवाद ही है।

रविवार, 26 अप्रैल 2026

सभी गाँवो में एक ही मन्दिर हो जहाँ, परमात्मा , ॐ, सब देव और सभी देवताओं के स्थान हों।

सभी गाँवो में एक ही मन्दिर हो जिसमें सभी वैदिक देव और देवताओं के मण्डप शुल्ब सूत्रों के अनुसार मण्डप हों और मण्डप में मण्डल भी शुल्ब सूत्रों के अनुसार हो। जहाँ उन देवताओं का आव्हान, स्थापन, पूजन, यजन कर विसर्जन किया जाता रहे। सभी मण्डपों में यज्ञ बेदी भी शुल्ब सुत्रों के अनुसार बनी हो। *जहाँ उक्त मण्डपों में स्थित मण्डल पर* ---
परमात्मा 
  परब्रह्म
विष्णु और माया

ब्रह्म- 
प्रभविष्णु और श्री, लक्ष्मी तथा सवितृ और सावित्री।

अपर ब्रह्म
नारायण और नारायणी तथा श्री हरि- कमलासना, गजसेविता लक्ष्मी।

हिरण्यगर्भ (पञ्चमुखी ब्रह्मा) और वाणी,

 त्वष्टा-रचना 
तथा 
सनक, सननन्दन, सनत्कुमार , सनातन, नारद 
धर्म और उनकी तेरह पत्नियाँ - (१) श्रद्धा, (२) लक्ष्मी, (३) धृति, (४) तुष्टि, (५) पुष्टि, (६) मेधा, (७) क्रिया, (८) बुद्धि, (९) लज्जा, (१०) वपु, (११) शान्ति, (१२) सिद्धि, (१३) कीर्ति ) 
काम और रति
एवम्
अर्धनारीश्वर एकरुद्र।

प्रजापति (चतुर्मुख ब्रह्मा) और सरस्वती,
 
इन्द्र और शचि, दक्ष (प्रथम) और प्रसुति, रुचि और आकुति, कर्दम और देवहुति, स्वायम्भुव मनु और शतरूपा
तथा
शंकर और उमा,
एवम्
 मरीची और सम्भूति,  भृगु और ख्याति,  अङ्गिरा और स्मृति,  वशिष्ट और ऊर्ज्जा,  अत्रि और अनसुया,  पुलह और क्षमा,  पुलस्य और प्रीति,  कृतु और सन्तति।

वाचस्पति और वाक ,
 अग्नि और स्वाहा, पितर और स्वधा,

 ब्रह्मणस्पति और सुनृता, 
द्वादश आदित्य ---
(1) विष्णु, (2) सवितृ, (3) त्वष्टा, (4) इन्द्र, (5) वरुण, (6) विवस्वान, (7) पूषा, (8) भग, (9) अर्यमा, (10) मित्र, (11) अंशु और (12) धातृ) और उनकी शक्तियाँ,

 ब्रहस्पति- शुभा, ममता , तारा
अष्ट वसु---
(1) प्रभास (आकाश) -  प्रभासा।
(2) प्रत्युष (सूर्य/देव) - प्रत्युषा या दीक्षा 
(3) धर्म (वसु-पुत्र) -  धृति ।
(4) ध्रुव (अचल/ध्रुव तारा) -  ध्रुवा या धरणी
(5) अर्क (सूर्य/देव) - अर्का
(6) अनिल (वायु) - अनिला या शिवा 
(7) अनल (अग्नि) - अनला या शांडिली 
(8) अप् (जल) - आप (या सरिता)

पशुपति-पार्वती   
एकादश रुद्र----
(1) हर, (2) त्र्यम्बकं, (3) वृषाकपि, (4) कपर्दी, (5) अजैकपात, (6) अहिर्बुधन्य, (7) अपराजित, (8) रैवत, (9) बहुरूप, (10) कपाली और (11) शम्भु (शंकर) और उनकी शक्तियाँ,

 गणपति और सिद्धि ,
सोम और वर्चा,
सदसस्पति और समिति। 
मही
भारती
अधिदेव 
अष्टादित्य
  (1)मार्तण्ड {विवस्वान}, (2) इन्द्र, (3) वरुण, (4) मित्र, (5) धाता, (6) भग, (7) अंश और (8) अर्यमा ।

 द्वादश तुषितगण।  
 (1) बुद्धि, (2) मन, (3) उदान, (4) व्यान, (5) प्राण, (6) समान, (7) अपान, (8) श्रोत, (9) स्पर्ष, (10) चक्षु, (11) रसना और (12) घ्राण ।

सरस्वती
द्वादश साध्यगण । 
 (1) मन, (2) अनुमन्ता, (3) प्राण, (4) अपान, (5) विति , (6) हय, (7) हन्स, (8) विभु, (9) प्रभु, (10) नय, (11) नर और (12) नारायण
चौरासी सिद्ध गण

प्रणेताओं के पुत्र दक्ष द्वितीय।(शंकर जी के श्वसुर)
अध्यात्म- दुसरे अष्ट वसु। 
 (1) द्रोण, (2) प्राण, (3) ध्रुव, (4) अर्क, (5) अग्नि (6) दोष, (7) वसु और (8) विभावसु।  
मरुद्गण ।  
(1) आवह, (2) प्रवह, (3) संवह, (4) उद्वह, (5) विवह, (6) परिवह और (7) परावहऔर इन सातों के छ:छ: पुत्र।

दस विश्वैदेवगण। 
(1) दक्ष (द्वितीय), (2) कृतु, (3) सत्य, (4) काल (यम), (5) काम, (6) मुनि, (7) एल पुरुरवा, (8) श्रव, (9) रोचमान, (10) आर्द्रवान । 
इळा

 प्रभास वसु और (ब्रहस्पति की बहन) वरस्त्री के पुत्र देवशिल्पी विश्वकर्मा। 
(शुक्राचार्य के पुत्र) त्वष्टा। 

 अधिभूत-  दुसरे एकादश रुद्र। 
 (1) मन्यु, (2) मन , (3) महिनस, (4) महान, (5) शिव, (6) उग्ररेता, (7) भव, (8) काल, (9) वामदेव, (10) धृतवृत और (11) मृगव्याध
 या मतान्तर से अन्य नाम 
(1) सर्प, (2) निऋति,(3) पिनाकी, (4) कपाली, (5) स्थाणु, (6) ईशान नाम और (7) दहन भी।

अनेकरुद्र
(विशेले कीट पतङ्ग, सर्प, बिच्छू, घोघा (कपर्दी) और सीपी (युनियो, पाईला), सिंह, व्याघ्र आदि हिन्सक प्राणी, रोगाणु (बैक्टरिया), विषाणु (वायरस), फफुन्द, काई, आतंकी, गुण्डे, बदमाश, चोर, उचक्के, डाकु, लुटेरे, वनवासी, पुलिस, सेना आदि रुलाने वाले सभी अनेकरुद्र ।

शुक्राचार्य के पौत्र , त्वष्टापुत्र त्रिशिरा विश्वरूप हैं।

यह्व ( महादेव) । 

(1) ईशित्व- वशित्व, (2) अणिमा-लघिमा, (3) महिमा- गरिमा और (4) प्रकाम्य - प्राप्ति) सिद्धियों के अधिदेवता अष्ट विनायक ।  (1)सम्मित-उस्मित, (2) मित- देवयजन, (3) शाल - कटंकट और (4) कुष्माण्ड - राजपुत्र
  

 ईला नामक रौद्री के पुत्र एल भैरव। ( या वैवस्वतमनु की पुत्री ईला और बुध के पुत्र एल पुरुरवा।) ।
और
राजा के स्थान हों। जहाँ उन देवों, देवताओं का आह्वान, स्थापन, पूजन और यजन किया जा सके।


प्राचीन काल में केवल स्थान बनाया जाता था। जिसमें न कोई पद चिह्न होते थे, न चित्र होता था, न प्रतिमा होती थी और न ही मूर्ति होती थी। मण्डप में केवल मण्डल बने होते थे। जिस पर सम्बन्धित देव/देवता की धारणा और ध्यान किया जाता था।
*इससे कुछ मिलता- जुलता प्रयोग यज्ञों में किया जाता है। और जैन लोगों में भी मण्डल पूजा के रूप में प्रचलित है।*

शंकरजी और उनके शिष्य शुक्राचार्य जी द्वारा स्थापित तथा अत्रि पुत्र दत्तात्रेय द्वारा अपने शिष्य राजा कार्तवीर्य सहस्रार्जुन और रावण द्वारा प्रचलित वेद विरुद्ध तन्त्र परम्परा के अनुयाई कुछ तान्त्रिक भारत में भी गुप्त रूप से तन्त्र क्रिया करते थे और छोटी छोटी मूर्तियाँ रखकर पूजा करते थे। लेकिन मठ- मन्दिर नहीं होते थे। पहले ईरान में भी मीढ लोग इसी मत के थे। इसलिए शंकर जी को मीढीश कहते हैं। वर्तमान में नाथ पन्थ इन्हीं का उत्तरवर्ती रूप है। 
परवर्ती काल में मङ्गोलिया से तुर्किस्तान के देश होते हुए युनान के निकट क्रीट तक फैले तान्त्रिक लोग, इराक, टर्की, युनान, मिश्र,  युरोप, अफ्रीका और उत्तर अमेरिका, मध्य अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप में इस तन्त्र मत का फैलाव हुआ और वहाँ मठ मन्दिर और मूर्ति पूजा प्रचलित हुई। लेकिन तब भी भारत में वैदिक काल में मूर्ति पूजा नहीं होती थी
स्वायम्भुव मनु-शतरूपा के तीसरी पीढ़ी में जन्मे ऋषभदेव जी जिन्होंने दक्ष प्रजापति प्रथम द्वारा स्थापित और  अपने पूर्वजो मनु शतरुपा, प्रियव्रत, आग्नीध्र और अजनाभ (नाभि) द्वारा पालित वर्णाश्रम धर्म का पालन करते हुए अन्तिम अवस्था में संन्यास ग्रहण किया था। और उनके पुत्र भरत चक्रवर्ती ने भी उसका पालन किया। 
लेकिन ऋषभदेव के पुत्र बाहुबली ने युवावस्था में ही संन्यास ग्रहण कर लिया था। उसे आदर्श मानने वाले जैन पन्थ ने ऋषभदेव जी को अपना पहला तीर्थंकर घोषित कर श्रमण मत के अन्तर्गत  तन्त्र परम्परा अपना ली और मठ, मन्दिर और मूर्ति पूजा प्रारम्भ कर दी।
व्यापार और राजनीति के कारण उक्त देशों के सम्पर्क में भारतीय राजनयिक और व्यापारी आये परिणाम स्वरूप भारत में सर्वप्रथम श्रमण मतावलम्बियों ने तन्त्र मतानुसार मठ- मन्दिर और मूर्ति पूजा प्रारम्भ की। इसमें मुख्य रूप से जैन व्यापारी प्रमुख थे।
भारत में भी सर्वप्रथम शिवलिङ्ग- योनि की पूजा प्रारम्भ हुई। फिर ध्यान मुद्रा में बैठे शंकर जी, रुद्र और अम्बिका, काली, चामुण्डा, भैरव- भैरवी, गजानन विनायक और नन्दी की मूर्ति पूजा प्रचलन में आई।
शैव-शाक्त, गाणपत्य के बाद ईरान से आये मग ब्राह्मणों ने सूर्य की मूर्ति और मन्दिर की पूजा प्रारम्भ की।
अन्त में विष्णु, लक्ष्मी नारायण, हिरण्यगर्भ ब्रह्मा और प्रजापति ब्रह्मा की मूर्तियाँ बनने लगी।
श्रीकृष्ण की मुर्ति पूजा होने लगी, फिर श्री रामचन्द्र जी मुर्तियाँ पूजी जाने लगी। फिर चौबीस अवतारों की पूजा प्रारम्भ हुई।
फिर तो शिव परिवार, शिव अवतार, चण्डिका के अवतारों, विनायक गजानन और उनके अवतारों की मूर्तियाँ पूजी जाने लगी, शितला देवी भी पूजी जाने लगी।
इसलिए किसी अन्य स्थान पर मूर्ति पूजक यदि चाहें तो उनके लिए उपर्युक्तानुसार मण्डप में मण्डल पर उक्त देवों/ देवताओं की मूर्ति  स्थापित कर उनके लिए भी ऐसा ही एक मन्दिर बना दिया जाए।

गुरुकुल शिक्षा क्या है?

कई गुरुकुल हैं, जहाँ वेद, ब्राह्मण ग्रन्थ, शिक्षा (उच्चारण/ फोनेटिक), व्याकरण, निरुक्त (भाषा शास्त्र),निघण्टु (शब्दकोश),छन्द शास्त्र, ज्योतिष (एस्ट्रोनॉमी और संहिता), ब्रह्माण्ड के नक्शे मण्डल- मण्डप बनाने के लिए शुल्बसूत्र, संस्कार, नित्यकर्म और व्रत,पर्व, उत्सव और त्यौहार मनाने के विधि-विधान के लिए गृह्यसूत्र, अश्वमेध, राजसूय जैसे बड़े सत्र वाले बड़े यज्ञों की विधि विधान के लिए श्रोतसूत्र नीति, कर्तव्याकर्तव्य, राजनीति और अर्थशास्त्र का ज्ञान और के निर्णय हेतु धर्मसूत्र (चार कल्प) (आदि सब मिलाकर षडवेदाङ्ग), के साथ आवश्यक और योग्यतानुसार आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद (नाट्य, सङ्गीत) शिल्पवेद स्थापत्य वेद (चार उपवेद) के शास्त्र, ब्राह्मण ग्रन्थों की कर्मकाण्ड सम्बन्धी पूर्व मीमांसा उपनिषदों के ब्रह्मज्ञान की उत्तर मीमांसा, सांवय दर्शन - कर्म मीमांसा और अष्टाङ्गयोग हेतु श्रीमद्भगवद्गीता, और योग दर्शन, न्याय दर्शन, और वैशेषिक दर्शन, वाल्मीकि रामायण और महाभारत (इतिहास) तथा विष्णु पुराण का अध्ययन करवाया जाता है।
साथ ही आधुनिकता शिक्षा भी दी जाती है। वे सफल शिक्षक, डॉक्टर, इञ्जिनियर, सैन्य अधिकारी, न्यायाधीश, अकाउण्टेण्ट, व्यवस्थापक और प्रशासक और शासक बनते है।

शनिवार, 25 अप्रैल 2026

सभी गाँवो में एक ही मन्दिर हो जिसमें सृष्टि क्रम में सब देव और देवता हों।

सभी गाँवो में एक ही मन्दिर हो जिसमें सभी वैदिक देव और देवताओं के मण्डप शुल्ब सूत्रों के अनुसार मण्डप हों और मण्डप में मण्डल भी शुल्ब सूत्रों के अनुसार हो। जहाँ उन देवताओं का आव्हान, स्थापन, पूजन, यजन कर विसर्जन किया जाता रहे। सभी मण्डपों में यज्ञ बेदी भी शुल्ब सुत्रों के अनुसार बनी हो। *जहाँ उक्त मण्डपों में स्थित मण्डल पर* ---

परमात्मा
परब्रह्म
विष्णु और माया

ब्रह्म
प्रभविष्णु और श्री, लक्ष्मी तथा सवितृ और सावित्री

अपर ब्रह्म
नारायण और नारायणी तथा श्री हरि- कमलासना, गजसेविता लक्ष्मी।

हिरण्यगर्भ (पञ्चमुखी ब्रह्मा) और वाणी,

 त्वष्टा-रचना 
तथा 
सनक, सननन्दन, सनत्कुमार , सनातन, नारद 
धर्म और उनकी तेरह पत्नियाँ - (१) श्रद्धा, (२) लक्ष्मी, (३) धृति, (४) तुष्टि, (५) पुष्टि, (६) मेधा, (७) क्रिया, (८) बुद्धि, (९) लज्जा, (१०) वपु, (११) शान्ति, (१२) सिद्धि, (१३) कीर्ति ) 
काम और रति
एवम्
अर्धनारीश्वर एकरुद्र

प्रजापति (चतुर्मुख ब्रह्मा) और सरस्वती,
 
इन्द्र-शचि, दक्ष (प्रथम)-प्रसुति, रुचि-आकुति, कर्दम-देवहुति, स्वायम्भुव मनु-शतरूपा
तथा
शंकर- उमा,
एवम्
 मरीची-सम्भूति,  भृगु-ख्याति,  अङ्गिरा-स्मृति,  वशिष्ट-ऊर्ज्जा,  अत्रि-अनसुया,  पुलह-क्षमा,  पुलस्य-प्रीति,  कृतु-सन्तति।

वाचस्पति और वाक ,
 अग्नि-स्वाहा, पितर-स्वधा,

 ब्रह्मणस्पति और सुनृता
द्वादश आदित्य
(1) विष्णु, (2) सवितृ, (3) त्वष्टा, (4) इन्द्र, (5) वरुण, (6) विवस्वान, (7) पूषा, (8) भग, (9) अर्यमा, (10) मित्र, (11) अंशु और (12) धातृ) और उनकी शक्तियाँ,

 ब्रहस्पति- शुभा, ममता , तारा
अष्ट वसु - (1) प्रभास (आकाश) -  प्रभासा।
(2) प्रत्युष (सूर्य/देव) - प्रत्युषा या दीक्षा 
(3) धर्म (वसु-पुत्र) -  धृति ।
(4) ध्रुव (अचल/ध्रुव तारा) -  ध्रुवा या धरणी
(5) अर्क (सूर्य/देव) - अर्का
(6) अनिल (वायु) - अनिला या शिवा 
(7) अनल (अग्नि) - अनला या शांडिली 
(8) अप् (जल) - आप (या सरिता)

पशुपतिऔर पार्वती -
 एकादश रुद्र- (1) हर, (2) त्र्यम्बकं, (3) वृषाकपि, (4) कपर्दी, (5) अजैकपात, (6) अहिर्बुधन्य, (7) अपराजित, (8) रैवत, (9) बहुरूप, (10) कपाली और (11) शम्भु (शंकर) और उनकी शक्तियाँ,

 गणपतिऔर सिद्धि -  
सोम और वर्चा,

 सदसस्पति और समिति
मही-भारती-सरस्वती- इळा।
 अधिदेव - अष्टादित्य -
  (1)मार्तण्ड {विवस्वान}, (2) इन्द्र, (3) वरुण, (4) मित्र, (5) धाता, (6) भग, (7) अंश और (8) अर्यमा। 

 अध्यात्म - दुसरे वसु
(1) द्रोण, (2) प्राण, (3) ध्रुव, (4) अर्क, (5) अग्नि (6) दोष, (7) वसु और (8) विभावसु। 

 अधिभूतदुसरे एकादश रुद्र
(1) मन्यु, (2) मन , (3) महिनस, (4) महान, (5) शिव, (6) उग्ररेता, (7) भव, (8) काल, (9) वामदेव, (10) धृतवृत और (11) मृगव्याध।
 या मतान्तर से अन्य नाम (1) सर्प, (2) निऋति,(3) पिनाकी, (4) कपाली, (5) स्थाणु, (6) ईशान नाम और (7) दहन भी। ।

द्वादश तुषितगण - 
(1) बुद्धि, (2) मन, (3) उदान, (4) व्यान, (5) प्राण, (6) समान, (7) अपान, (8) श्रोत, (9) स्पर्ष, (10) चक्षु, (11) रसना और (12) घ्राण ।

मरुद्गण - (1) आवह, (2) प्रवह, (3) संवह, (4) उद्वह, (5) विवह, (6) परिवह और (7) परावह । 
अनेकरुद्र - 
विशेले कीट पतङ्ग, सर्प, बिच्छू, घोघा (कपर्दी) और सीपी (युनियो, पाईला), सिंह, व्याघ्र आदि हिन्सक प्राणी, रोगाणु (बैक्टरिया), विषाणु (वायरस), फफुन्द, काई, आतंकी, गुण्डे, बदमाश, चोर, उचक्के, डाकु, लुटेरे, वनवासी, पुलिस, सेना आदि रुलाने वाले सभी अनेकरुद्र

द्वादश साध्यगण-
 (1) मन, (2) अनुमन्ता, (3) प्राण, (4) अपान, (5) विति , (6) हय, (7) हन्स, (8) विभु, (9) प्रभु, (10) नय, (11) नर और (12) नारायण। 
चौरासी सिद्ध गण

प्रभास वसु और (ब्रहस्पति की बहन) वरस्त्री के पुत्र देवशिल्पी विश्वकर्मा
शुक्राचार्य के पुत्र) त्वष्टा हैं।

यह्व ( महादेव)  यहुदियों का इष्ट  याहवेह ।

(1) ईशित्व- वशित्व, (2) अणिमा-लघिमा, (3) महिमा- गरिमा और (4) प्रकाम्य - प्राप्ति) सिद्धियों के अधिदेवता अष्ट विनायक । (1)सम्मित-उस्मित, (2) मित- देवयजन, (3) शाल - कटंकट और (4) कुष्माण्ड - राजपुत्र
  
दस विश्वैदेवगण
(1) दक्ष (द्वितीय), (2) कृतु, (3) सत्य, (4) काल (यम), (5) काम, (6) मुनि, (7) एल पुरुरवा, (8) श्रव, (9) रोचमान, (10) आर्द्रवान

 शुक्राचार्य के पौत्र , त्वष्टापुत्र त्रिशिरा विश्वरूप हैं। 
ईला नामक रौद्री के पुत्र एल भैरव हैं। ( या वैवस्वतमनु की पुत्री ईला और बुध के पुत्र एल पुरुरवा
और
राजा के स्थान हों। जहाँ उन देवों, देवताओं का आह्वान, स्थापन, पूजन और यजन किया जा सके।


प्राचीन काल में केवल स्थान बनाया जाता था। जिसमें न कोई पद चिह्न होते थे, न चित्र होता था, न प्रतिमा होती थी और न ही मूर्ति होती थी। मण्डप में केवल मण्डल बने होते थे। जिस पर सम्बन्धित देव/देवता की धारणा और ध्यान किया जाता था।
*इससे कुछ मिलता- जुलता प्रयोग यज्ञों में किया जाता है। और जैन लोगों में भी मण्डल पूजा के रूप में प्रचलित है।*

शंकरजी और उनके शिष्य शुक्राचार्य जी द्वारा स्थापित तथा अत्रि पुत्र दत्तात्रेय द्वारा अपने शिष्य राजा कार्तवीर्य सहस्रार्जुन और रावण द्वारा प्रचलित वेद विरुद्ध तन्त्र परम्परा के अनुयाई कुछ तान्त्रिक भारत में भी गुप्त रूप से तन्त्र क्रिया करते थे और छोटी छोटी मूर्तियाँ रखकर पूजा करते थे। लेकिन मठ- मन्दिर नहीं होते थे। पहले ईरान में भी मीढ लोग इसी मत के थे। इसलिए शंकर जी को मीढीश कहते हैं। वर्तमान में नाथ पन्थ इन्हीं का उत्तरवर्ती रूप है। 
परवर्ती काल में मङ्गोलिया से तुर्किस्तान के देश होते हुए युनान के निकट क्रीट तक फैले तान्त्रिक लोग, इराक, टर्की, युनान, मिश्र, युरोप, अफ्रीका और उत्तर अमेरिका, मध्य अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप में इस तन्त्र मत का फैलाव हुआ और वहाँ मठ मन्दिर और मूर्ति पूजा प्रचलित हुई। लेकिन तब भी भारत में वैदिक काल में मूर्ति पूजा नहीं होती थी।
स्वायम्भुव मनु-शतरूपा के तीसरी पीढ़ी में जन्मे ऋषभदेव जी जिन्होंने दक्ष प्रजापति प्रथम द्वारा स्थापित और अपने पूर्वजो मनु शतरुपा, प्रियव्रत, आग्नीध्र और अजनाभ (नाभि) द्वारा पालित वर्णाश्रम धर्म का पालन करते हुए अन्तिम अवस्था में संन्यास ग्रहण किया था। और उनके पुत्र भरत चक्रवर्ती ने भी उसका पालन किया। 
लेकिन ऋषभदेव के पुत्र बाहुबली ने युवावस्था में ही संन्यास ग्रहण कर लिया था। उसे आदर्श मानने वाले जैन पन्थ ने ऋषभदेव जी को अपना पहला तीर्थंकर घोषित कर श्रमण मत के अन्तर्गत तन्त्र परम्परा अपना ली और मठ, मन्दिर और मूर्ति पूजा प्रारम्भ कर दी।
व्यापार और राजनीति के कारण उक्त देशों के सम्पर्क में भारतीय राजनयिक और व्यापारी आये परिणाम स्वरूप भारत में सर्वप्रथम श्रमण मतावलम्बियों ने तन्त्र मतानुसार मठ- मन्दिर और मूर्ति पूजा प्रारम्भ की। इसमें मुख्य रूप से जैन व्यापारी प्रमुख थे।
भारत में भी सर्वप्रथम शिवलिङ्ग- योनि की पूजा प्रारम्भ हुई। फिर ध्यान मुद्रा में बैठे शंकर जी, रुद्र और अम्बिका, काली, चामुण्डा, भैरव- भैरवी, गजानन विनायक और नन्दी की मूर्ति पूजा प्रचलन में आई।
शैव-शाक्त, गाणपत्य के बाद ईरान से आये मग ब्राह्मणों ने सूर्य की मूर्ति और मन्दिर की पूजा प्रारम्भ की।
अन्त में विष्णु, लक्ष्मी नारायण, हिरण्यगर्भ ब्रह्मा और प्रजापति ब्रह्मा की मूर्तियाँ बनने लगी।
श्रीकृष्ण की मुर्ति पूजा होने लगी, फिर श्री रामचन्द्र जी मुर्तियाँ पूजी जाने लगी। फिर चौबीस अवतारों की पूजा प्रारम्भ हुई।
फिर तो शिव परिवार, शिव अवतार, चण्डिका के अवतारों, विनायक गजानन और उनके अवतारों की मूर्तियाँ पूजी जाने लगी, शितला देवी भी पूजी जाने लगी।
इसलिए किसी अन्य स्थान पर मूर्ति पूजक यदि चाहें तो उनके लिए उपर्युक्तानुसार मण्डप में मण्डल पर उक्त देवों/ देवताओं की मूर्ति स्थापित कर उनके लिए भी ऐसा ही एक मन्दिर बना दिया जाए।

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

तमिल कवि तिरुक्कुरल रचियता दृविड़ सन्त आलावार तिरुवल्लुवर शुद्ध सनातन वैदिक धर्मी वैष्णव महाभागवत थे। न कि, जैन।

कुछ लोग तमिल कवि दृविड़ सन्त आलावार
तिरुवल्लुवर को उनके द्वारा रचित तिरुक्कुरल में सर्वप्रथम ऋग्वेद के अहिंसा सूक्त के दृष्टा ऋषि ऋषभदेव की स्तुति करने और अहिंसा को महत्व देने के आधार पर जैन घोषित करते हैं। जबकि तमिल कवि दृविड़ सन्त तिरुवल्लुवर शुद्ध वैदिक सनातन धर्मी वैष्णव महाभागवत थे।
इस बात को प्रमाणित करने के लिए निम्नलिखित तथ्य उपलब्ध हैं।⤵️
गृहस्थाश्रम का प्रशंसक, ईश्वर स्तुति करने वाला ईश्वर वादी युद्ध नीति की शिक्षा देने वाला, कृषि कर्म का प्रशंसक जैन कैसे हो सकता है?
रामानुजाचार्य जी द्वारा इन्हें आदर देते हुए आलवार सन्तों में मानना;
 और
नाथ मुनि द्वारा इसे नालयिर दिव्य प्रबन्धम् में अन्य आलवार सन्तों की रचनाओं के साथ सम्पादित करना भी इनका वैदिक धर्मी वैष्णव होना ही सिद्ध करता हैं।
तिरु अनन्तपुरम्
तिरुपति बालाजी 
ऐसे ही जहाँ कहीँ भी श्री वाचक तमिल शब्द तिरु आया है वहाँ सभी स्थानों पर वैष्णव परम्परा ही है।
श्रवणबेलगोला में या किसी भी जैसे तीर्थ या जैन सन्त के नाम में तिरु शब्द नहीं मिलता है।

 तिरुवल्लुवर ने श्रङ्गार शतक और नीति शतक के रचयिता भृतहरि के समान धर्म, अर्थ और काम पर तमिल भाषा में अर्थशास्त्र लिखा है।
ध्यान रखें वैदिक परम्परा में अर्थशास्त्र धर्म सूत्र (धर्मशास्त्र) का अङ्ग है।
मनुस्मृति और कौटिल्य अर्थशास्त्र में भी धर्म, अर्थ और काम तीनों का ही वर्णन है।

भृतहरि ने वैराग्य शतक भी रचा था। जो अर्थशास्त्र का विषय नहीं है। इसलिए इन्होंने छोड़ दिया।

ऋषभदेव स्वायम्भुव मनु-शतरूपा के पाँचवी पीढ़ी पर हुए।
स्वायम्भुव मनु-शतरूपा-> उत्तानपादासन और प्रियव्रत।
प्रियव्रत -> आग्नीध्र 
आग्नीध्र -> ऋषभदेव 
ऋषभदेव -> बाहुबली और भरत चक्रवर्ती जो बाद में जड़ भरत कहलाये।
स्वायम्भुव मनु-शतरूपा, ऋषभदेव और भरत चक्रवर्ती ने वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुसार वृद्धावस्था में संन्यास ग्रहण किया था। जबकि भरत चक्रवर्ती से परास्त होकर बाहुबली ने युवावस्था में ही संन्यास ले लिया और कर्नाटक में श्रमण बेलगोला में निवास किया था। इसलिए जैन लोगों उन्हें जैन घोषित कर दिया। और ऋग्वेद में अहिंसा सूक्त के दृष्टा होने से ऋषभदेव को अपना पहला तीर्थंकर घोषित कर दिया।
जब युरोपीय लोगों ने मोहनजोदड़ो और हड़प्पा में पद्मासनस्थ मूर्ति और तान्त्रिकों की लिङ्ग और योनि की मूर्ति देखी तो जैनों ने उसे जैन श्रमण संस्कृति घोषित कर दिया। इस हिसाब से तो सभी नाथ योगी जैन थे।

दृविड़ वेद (तमिल भाषा में नालयिर दिव्य प्रबन्धम्) क्या है?

दृविड़ तमिल लोगों के अनुसार भगवान में डूबे हुए बारह आलवार संतों द्वारा छठी से नौवीं सदी के बीच रचित नालयिर दिव्य प्रबंधम् नामक द्रविड़ वेद कुल चार हजार (4000) वैष्णव भक्ति के पद हैं। ये तमिल वैष्णव परंपरा का ग्रंथ-संग्रह है।
रामानुजाचार्य के अनुसार तमिल नालयिर दिव्य प्रबंधम् वेदों का सार है। संस्कृत वेद देवभाषा में हैं, जबकि नालयिर दिव्य प्रबंधम्द्र विड़ वेद तमिल भाषा होने से आम तमिल भाषी लोग भी समझ सकते हैं। दृविड़ तमिल लोग इसे सनातन वैदिक धर्म के वेदों के बराबर मानते हैं।
वे मानते हैं कि,
वेद ब्रह्म का ज्ञान देते हैं, द्रविड़ वेद ब्रह्म का प्रेम सिखाते हैं।
कभी-कभी तिरुक्कुरल (Tirukkural) को भी तमिल के नैतिक 'वेद' के रूप में संदर्भित किया जाता है, लेकिन 'द्रविड़ वेद' का सीधा संबंध आलवारों की भक्ति रचनाओं से है। 

नालयिर दिव्य प्रबंधम् का चार भागों में सम्पादन दसवीं शताब्दी में *नाथमुनि* ने किया।

1 मुदलायिरम् में 947 पद हैं। (तमिल इसे ऋग्वेद के समान मानते हैं।)
2 इरंडामायिरम् में 1134 हैं। तमिल इसे यजुर्वेद के समान मानते हैं।
3 मून्रामायिरम् में 593 पद हैं। तमिल इसे सामवेद के समान मानते हैं।
नम्मालवार की रचना तिरुवाय्मोली के 1102 पदों को तमिल लोग सामवेद के समान मानते हैं।
वेदांत देशिक ने कहा - "वेद में जो गूढ़ है, वो तिरुवाय्मोली में स्पष्ट है"।
4 नानकामायिरम् में 1326 पद हैं। तमिल इसे अथर्ववेद के समान मानते हैं।
रामानुज, वेदांत देशिक, मणवाल मामुनि ने इस पर भाष्य लिखे। 
इनमें नारायण और उनके अवतारों की भक्ति। श्रीरंगम, तिरुपति, कांची के मंदिरों का वर्णन। भगवान को नायक और भक्त को नायिका मानकर प्रेम के पद। आण्डाल की तिरुप्पावै मार्गशीर्ष महीने में रोज गाई जाती है।
तिरुपति, श्रीरंगम, मेलकोटे में रोज वेद पारायण के बाद *दिव्य प्रबंध पारायण* होता है।

नालयिर दिव्य प्रबंधम्द्र में मुख्य रूप से नम्मालवार तिरुवाय्मोली रचित 1352 पद । 
तिरुमंगई आलवार रचित 1361 पद ।
गोदादेवी के पिता पेरियालवार रचित 473 पद। 
एकमात्र महिला आललवार *आण्डाल* रचित तिरुप्पावै ।


किंचितकरम ट्रस्ट (Kinchitkaram Trust)
 संस्कृत और द्रविड़ वेदों का संरक्षण. अनुवाद, पुस्तकों का प्रकाशन कैलेंडर का प्रकाशन प्राचीन तमिल और संस्कृत टीकाओं का अंग्रेजी में अनुवाद करने का कार्य करता है

गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

बाइबल

अ ब्राह्म , अब्राहम 
अत्रि-अनसुया के पुत्र चन्द्रमा पुत्र बुध, बुध और वैवस्वत मनु (श्राद्ध देव) की पुत्री इला के पुत्र *एल* पुरुरवा ही एल, इलाही, अल्लाह हैं जिन्हें बाइबल में (देवताओं में वरिष्ठ / महादेव का वाचक यह्व) से याहवेह कहा है। पुरुरवा और इराक के नगर उर की वासी, तिब्बत में स्थित अमरावती पुरी के ईशान कोण में स्थित इन्द्र सभा की नर्तकी उर्वशी (उर वासी) का पुत्र आयु ही आदम है। आ दम (दम मतलब प्राण)।‌
इन्द्र सभा से अवकाश लेकर उर्वशी ने पुरुरवा से अस्थाई काण्ट्रैक्ट मेरिज मुता निकाह किया।
 प्रसुति अवस्था में उर्वशी उर नगर चली गई थी। फिर आयु का फिडिंग समय पूर्ण होने पर पुरुरवा को सोप गई और इन्द्र सभा में जॉइन कर लिया।
आरामी भाषा में रचित तनख (बायबल ओल्ड टेस्टामेंट की पहली पुस्तक उत्पत्ति) के अनुसार यहोवा (एल पुरुरवा) ने आदम (आयु) को दक्षिण पूर्व टर्की के युफ्रेटिस घाँटि में ईलाझी शहर में अदन वाटिका में अकेले ही पाला था। उसके साथ स्वर्भानु की पुत्री प्रभांशी (या प्रभुचि) को रखा था जिसे वह हव्ययती कहता था।
सुरसा की सन्तान सर्प/नाग वंशी सीरिया वासी ने आयु (आदम) को पिता (एल पुरुरवा)के विरुद्ध भड़का कर उसकी आज्ञा के विरुद्ध बुद्धि वृक्ष का अधपका/ कच्चा फल तोड़ कर खा लिया। इस कारण वह स्वयम् भी अल्प बुद्धि का ही रहा। (और बेचारा एल याहवेह बुद्धिहीन/ मुर्ख ही रह गया ।😂 इस कारण) एल पुरुरवा ने आयु (आदम) को अदन वाटिका से निकाल दिया। आयु प्रभांशी / प्रभुचि (हव्ययती) की सलाह पर आर्मेनिया गया। फिर वहाँ से इराक, इरान होते हुए व्यापारिक जहाजियों के साथ से सिंहल द्वीप पहूँच गया। सिंहल द्वीप श्रीलंका में श्रीपाद पर्वत शिखर पर किसी श्रीमान पुरुष के चरण चिह्न बने हैं। वह श्रीलंकाई सनातनियों का तीर्थ स्थल था। उसे ही अब्राहमिक मतावलम्बी यहुदी, ईसाई, इस्लाम और बहाई पन्थ वाले आदम शिखर (एडम पिक) कहते हैं। और उनका तीर्थ मानते हैं।
श्रीलंका से केरल होता हुआ वापस टर्की पहूँचा। तब तक एल पुरुरवा बुढ़ा होने लगा था। इसलिए उसने भी आयु (आदम) को क्षमा कर दिया।
इसी आयु (आदम) और प्रभांशी / प्रभुचि (हव्ययती) का पुत्र नहुष (न्युहु) हुआ। नहुष का विवाह शंकर जी और पार्वती जी की पुत्री अशोक सुन्दरी से हुआ।
नहुष और अशोक सुन्दरी का पुत्र ययाति (अब्राहम) हुआ। 
ययाति (अब्राहम) की प्रथम पत्नी शुक्राचार्य जी की पुत्री देवयानी (सारेह) से यदु (यदुवंशियों के पूर्वज) और तुर्वसु हुए।
ययाति (अब्राहम) की दुसरी पत्नी वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा (हागार या हाजिरा) जो देवयानी (सारेह) की दासी थी के पुत्र पुरु (भारतीय चन्द्र वंशियों के पितामह), अनु और दृह्यु हुए।

बाइबल पुराना नियम (ओल्ड टेस्टामेंट) में अब्राहम की आर्मेनिया से इजराइल तक की यात्रा और संघर्ष, याहवेह का आज्ञाकारी भक्त होना। अब्राहम के पुत्र इसहाक जो किसी फरिश्ते से कुश्ती लड़ा इसलिए उसका नाम इज्राएल पड़ा। दासी हागार/ हाजिरा के पुत्र इस्माइल की बलि देने से याहवेह ने बचाया फिर इस्माइल का स्वेज (सिनाई) में बसना।
अब्राहम का वंश वर्णन, वंशजों की कथा है।
फिर न्युहु का जल प्रलय का वर्णन (शतपथ ब्राह्मण, मत्स्य पुराण, बाइबल) और इराक की प्राचीन कथाओं में भी वर्णित है। आगे न्युहु का वंश वर्णन है।
मुसा और जोसेफ की कथा, मिश्र की दासता से मुक्त होने हेतु इजराइलियों को एकत्र कर लाल सागर पार कर इजराइल में बसना। याहवेह द्वारा मुसा को दस कानून लिखित शिलालेख (टेन टेस्टामेंट) देना। उसके आधार पर यहुदा के नाम पर यहुदी पन्थ स्थापित करना।
फिर दाउद की भजन संहिता है, सुलेमान (सोलोमन) की कथा है।
बाइबल नया नियम में यीशु के जन्म से बारह वर्ष तक का वर्णन। फिर तीस से तैंतीस वर्षायु के बीच यहुदियों में मूल यहुदी पन्थ के सिद्धान्तों तथा मूल यहुदी पन्थ के सिद्धान्तों में बौद्ध मत के अनुसार सुधार करने का उपदेश देना। इससे नाराज यहुदी पुरोहितों ने रोमन ऑफिसर पिलातुस को शिकायत कर क्रुस पर बांधकर कीलें ठोंकने का दण्ड दिलवाना।
शुक्रवार को अपराह्न में यीशु को क्रुस पर टांगना और सूर्यास्त के पहले उतार कर कपड़े में लपेटकर गुफा में रखना।
जहाँ अनुयायियों ने उपचार कर ठीक कर दिया।
शनिवार को यीशु का दूर भाग जाना और रविवार को उपदेश दे कर वापस स्वर्ग (भारत के कश्मीर में लौट आना) का ग्रीक भाषा में वर्णन है।