1 गणितागत मतभेद ---
वेधशाला से प्राप्त आकड़ों (डेटा) पर आधारित वेधतुल्य पञ्चाङ्गो में भी दो मत हैं।
(क) सायन सौर वर्ष और सायन सौर संक्रान्ति आधारित सायन सौर मास और सायन चन्द्रमा पर आधारित सौर-चान्द्रमासों वाला पञ्चाङ्ग जो नोएडा उत्तरप्रदेश से आचार्य दार्शनेय लोकेश द्वारा स्थापित, सम्पादित और प्रकाशित श्री मोहन कृते आर्ष पत्रकम्।
इस मत के कुछ अनुयाई महाराष्ट्र में भी केलेण्डर पञ्चाङ्ग निकालते हैं।
(ख) शेष भारत में प्रचलित नक्षत्रीय पद्यति पर आधारित निरयन सौर संक्रमण आधारित निरयन सौर मास और निरयन चन्द्रमा के आधार पर निरयन सौर-चान्द्रमासों वाले पञ्चाङ्ग। ये प्रायः लाहिरी अयनांश के आधार पर ही निकलते हैं लेकिन कुछ शुद्ध चित्रा पक्षीय अयनांश के आधार पर भी निवलते हैं।
लाहिरी अयनांश और शुद्ध चित्रा पक्षीय अयनांश में 22 मार्च 285 ईस्वी को मात्र 03" विकला का अन्तर था जो वर्तमान में चित्रा तारे के निरन्तर विचलन के परिणाम स्वरूप लगभग 01' कला (अर्थात 60 विकला) से अधिक का अन्तर हो गया है। लेकिन भारतीय ज्योतिषी इसे नगण्य मानते हैं।
(ग) उक्त दृग्तुल्य पञ्चाङ्गो के अतिरिक्त कुछ स्थानीय स्तर पर सूर्य सिद्धान्त के मकरन्द और ग्रह लाघव नामक करण ग्रन्थों पर आधारित स्थूल गणित वाले पञ्चाङ्ग भी प्रचलित हैं। जिनके निरयन सौर संक्रमण, और निरयन चन्द्रमा तथा निरयन ग्रहों की स्थिति प्रायः गलत ही होती है। परिणाम स्वरूप सूर्य के निरयन संक्रमण का समय तथा तिथि और चन्द्रमा के नक्षत्र का प्रारम्भ और समाप्ति का समय भी गलत ही रहता है। गुरु बृहस्पति एवम् शुक्र का अस्त और उदय का दिन और समय भी गलत ही रहता है। इसलिए व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार भी प्रायः गलत ही रहते हैं। कई बार अधिक मास भी गलत ही बतलाइए थे।
लेकिन ग्रहगणित ज्योतिष (सिद्धान्त ज्योतिष अर्थात एस्ट्रोनॉमी) का ज्ञान नहीं होने के कारण मन्दिरों के पुजारियों का समर्थन इन परम्परागत पञ्चाङ्ग को अभी तक प्रचलन में बनाए हुए हैं।
(घ)
पहले महाराष्ट्र में लोकमान्य बालगङ्गाधर तिळेक के गणित के आधार पर श्री मोरोपन्त छत्रे, लगभग 04° अंश कम वाला झीटापक्षीय अयनांश पर पञ्चाङ्ग निकालते थे। जो कभी भी लोकप्रचलित नहीं हो पाया। इसकी वर्तमान स्थिति ज्ञात नहीं है।
पञ्चाङ्गो में उक्त गणितीय त्रुटि के अलावा धर्मशास्त्रिय मत भिन्नता महत्वपूर्ण कारण है।
इसे समझने के लिए कुछ पारिभाषिक शब्दावली और कुछ तथ्यों का ज्ञान आवश्यक है।
निरयन सौर मास - अर्थात जिस निरयन राशि में सूर्य स्थित हो उसे सौर माह कहते हैं।
चन्द्रमा जिस नक्षत्र में स्थित हो उसे नक्षत्र कहते हैं।
चान्द्र सौर मास जिसे प्रायः चान्द्रमास ही लिख देते हैं - अमावस्या समाप्ति समय से अमावस्या समाप्ति समय तक अमान्त चान्द्रसौर मास (अंग्रेजी में लूनी-सोलर मन्थ) या चान्द्र मास या अमान्त मास कहलाता है।
पूर्णिमा समाप्ति समय से पूर्णिमा समाप्ति समय तक पूर्णिमान्त मास कहलाता है।
सूर्य से चन्द्रमा की प्रत्येक बारह अंश (डिग्री) का अन्तर तिथि कहलाती है।
और
दो सूर्योदय के बीच का समय वार कहलाता है। अर्थात वार सूर्योदय से बदलता है। (न कि, ब्रह्म मुहूर्त या मध्यरात्रि से।)
ऐसे ही सूर्योदय पश्चात छः घटि अर्थात 02 घण्टे 24 मिनट तक जो तिथि रहे वह शाकल्यपादिता तिथि कहलाती है। और बहुत से धार्मिक कार्यों, व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार आदि में उक्त शाकल्यपादिता तिथि को पूरे दिन-रात वही तिथि है ऐसा मान लिया जाता है।
कुछ व्रत सूर्योदय के समय जो तिथि रहती है उस सूर्योदय व्यापिनी तिथि के अनुसार इस लिए मनाए जाते हैं क्योंकि उन व्रत पर्व में मुख्य पूजा सूर्योदय के समय ही होती है। अर्थात उन व्रत पर्वों का पर्वकाल ही सूर्योदय का समय होता है। लेकिन यह नियम सभी व्रत पर्व, उत्सव और त्यौहारों में इसलिए लागू नहीं होता है क्योंकि, सभी व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहारों का पर्वकाल अलग-अलग होता है।
कोई प्रातः काल व्यापिनी तिथि में मनते हैं तो कुछ पूर्वाह्न व्यापिनी तिथि में मनते हैं, तो कोई मध्याह्न काल व्यापिनी तिथि में मनते हैं तो कुछ अपराह्न काल व्यापिनी तिथि में मनते हैं। कोई सूर्यास्त कालीन तिथि में मनते हैं तो कुछ प्रदोषकाल व्यापिनी तिथि में मनते हैं तो कुछ पूर्व रात्रि व्यापिनी तिथि में मनते हैं। कुछ मध्यरात्रि कालीन तिथि में मनते हैं तो कुछ महानिशिथ काल व्यापिनी तिथि में मनते हैं। कुछ तो उत्तर रात्रि कालीन तिथि में तो कुछ अरुणोदय कालीन व्यापिनी तिथि अर्थात ब्रह्म मुहूर्त मे जो तिथि हो उसमें मनते हैं। तो कुछ चन्द्रोदय कालीन तिथि में मनते हैं। ये सब पर्वकाल कहलाते हैं।
पर्वकाल के विषय में भी पौराणिक साहित्य में मतभेद के कारण धर्मशास्त्र पर निबन्धकारों ने अलग-अलग मत व्यक्त किए हैं। यह बहुत गहन विषय है।
इसके अलावा दक्षिण भारत में निरयन सौर मास में चन्द्रमा का नक्षत्र के आधार पर व्रत, पर्व उत्सव और त्यौहार मनाये जाते हैं वहाँ सौर- चान्द्रमास (लूनी-सोलर मन्थ) का उपयोग न के बराबर बहुत कम होता है। इसलिए तिथियाँ भी लगभग अप्रचलित है।
जैसे निरयन मेष राशि के सूर्य में अर्थात मेष मास में पुनर्वसु नक्षत्र में श्रीराम जयन्ती मनाते हैं और निरयन सिंह राशि के सूर्य (सिंह मास) में रोहिणी नक्षत्र में श्रीकृष्ण जयन्ती मनाते हैं। और निरयन सिंह राशि के सूर्य (सिंह मास) में श्रवण नक्षत्र में वामन जयन्ती ओणम नाम से मनाते हैं।
फिर उसमें भी आचार्यों के सम्प्रदाय के अनुसार मतभेद हैं जैसे कुछ सूर्योदय कालीन चन्द्र नक्षत्र देखकर व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार मनाते हैं तो कुछ पूर्वकालीन चन्द्र नक्षत्र के अनुसार व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार मनाते हैं।
यह मतभेद उत्तर भारत में भी वैष्णव सम्प्रदायों में प्रचलित है। उत्तर भारत में भी कुछ सूर्योदय कालीन (उदिया) तिथि के अनुसार व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार मनाते हैं तो विष्णु, देवी शंकर, सूर्य और गणपति पाँचो देवों को पूजने वाले स्मार्त मतावलम्बी पूर्वकालीन तिथि के अनुसार व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार मनाते हैं।
बङ्गाल में नवरात्र और महाराष्ट्र में ज्येष्ठा लक्ष्मी व्रत में सौर-चान्द्रमासों में तिथि के साथ-साथ पर्वकाल में चन्द्रमा के नक्षत्र के अनुसार देवी का आह्वान, पूजन, बलिदान और विसर्जन करते हैं।
इतने सारे तथ्यों को पञ्चाङ्गकार ध्यान में रखकर धर्मशास्त्रियों से चर्चा कर अपनी पञ्चाङ्ग में व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार बतलाते हैं।
अथर्ववेदोक्त दिन और रात के मुहूर्त तथा प्रातःकाल, मध्याह्न, मध्याह्न काल सन्ध्या काल, प्रदोषकाल, महानिशिथ काल जैसे विषयों पर प्रथक आलेख देखना चाहिए।
भविष्य में प्रत्येक या प्रमुख व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहारों के पर्वकाल और साम्प्रदायिक मतभेद पर स्वतन्त्र विस्तृत आलेख जारी किया जाना प्रस्तावित है।
इसका सर्वश्रेष्ठ हल/ निवारण यह है कि,
1 भारत शासन शुद्ध सायन और स्पष्ट लाहिरी अयनांश आधारित निरयन पञ्चाङ्ग ऑनलाइन , /ऑफ लाइन पञ्चाङ्ग और पुस्तकाकार पञ्चाङ्ग प्रकाशित करें।
2 केवल वैदिक मतानुसार ही व्रत, पर्व उत्सव और त्यौहार मनाये जाएँ।
3 एस्ट्रोनॉमी के जानकार और धर्मशास्त्रियों की समिति बनाकर सब व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहारों का पर्वकाल आधारित सायन सौर दिनांक, निरयन सौर दिनांक, और सायन सौर मास तथा निरयन सौर मास में चन्द्रमा का अषमान क्षेत्र वाले नक्षत्र में चन्द्रमा की स्थिति के आधार पर व्रत, पर्व उत्सव और त्यौहार निर्धारित कर दिए जाएँ। भारत शासन द्वारा प्रकाशित ऑनलाइन , /ऑफ लाइन पञ्चाङ्ग और पुस्तकाकार पञ्चाङ्ग में तदनुसार ही व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहारों का उल्लेख हो।
और सभी व्रत, पर्व, उत्सव और मनाने की वेदोक्त विधि-विधान और निषेध भी ऑनलाइन, ऑफ लाइन और पुस्तक प्रकाशित की जाए। इसमें स्मार्त कर्मकलाप या गृहस्थ कार्यकलाप ग्रन्थ का सहयोग लिया जाए।