बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

आस्तिक - नास्तिक, ईश्वरवादी, अनीश्वरवादी, और एकेश्वरवादी ।

1 किसी एक आचरण नियमावली, विधि -निषेध, सिद्धान्त, दर्शन पर आस्थावान को आस्तिक कहते हैं। जैसे वैदिक, या अब्राहमिक।

इसके विपरित जो किसी एक आचरण नियमावली, विधि -निषेध, सिद्धान्त, दर्शन पर आस्थावान न हो वह नास्तिक।

किसी सार्वभौम, सर्वशक्तिमान, सर्वनियन्ता, सृष्टि के जनक, प्रेरक, रक्षक और संहार कर्ता शक्ति चाहे वह व्यवस्था हो, या सत्ता हो उस पर दृढ़ विश्वासी को ईश्वरवादी कहते हैं। जैसे वैष्णव, शैव, शाक्त आदि सम्प्रदाय के लोग।

इसके विपरित जो किसी सार्वभौम, सर्वशक्तिमान, सर्वनियन्ता, सृष्टि के जनक, प्रेरक, रक्षक और संहार कर्ता शक्ति चाहे वह व्यवस्था हो, या सत्ता को भी न मानकर केवल कार्य-कारण वाद से ही सृष्टि उत्पत्ति, स्थिति, सञ्चालन और संहार चल रहा है ऐसा मानने वाला अनीश्वरवादी। जैसे सांख्य दर्शन, जैन दर्शन मानने वाले।

किसी विशेष स्थान (लोक) में रहने वाला एकदेशीय, स्वरूप (व्यक्ति) को ही सर्वशक्तिमान ईश्वर मानने वाला, और उसके द्वारा नियत कानून को ही मानने वाला एकेश्वरवादी कहते हैं। जैसे याहवेह को ही ईश्वर मानने वाले और मूसा को उनका दूत मानने वाले यहुदी। याहवेह को ही ईश्वर मानने वाले और यीशु को उनका दूत मानने वाले ईसाई। और अल्लाह को ही ईश्वर मानने वाले और मोहम्मद को उनका दूत मानने वाले मुस्लिम।
विशेषता यह है कि, यहुदी, ईसाई और मुस्लिम सभी फरिश्तों का अस्तित्व स्वीकार करते हैं। सबाइन , दाउदी, सुलेमानी,यहुदी आदि अब्राहमिक तो फरिश्तों को सिजदा भी करते थे।

मुझे आश्चर्य हैकि, हिन्दी के श्रेष्ठ लेखक भी —-

यह सब जानते बुझते लेखन में दर्शाने का साहस नहीं करते हैं या जानते ही नहीं या जानते तो हैं लेकिन मानने में हिचकिचाते हैं।
क्या यह टिप्पणी नहीं पढ़ी?

मार्क्सवाद, लेनिनवाद, स्टालिन वाद, माओवाद से भिन्न वामपंथी राजनीति

वाममार्गियों का मुख्य उद्देश्य पहले जहाँ (जिस देश/ प्रदेश/ प्रान्त/ क्षेत्र में) जो भी व्यवस्था चल रही हो प्रचलित हो उसे भङ्ग करो।
जैसे पाकिस्तानी कम्युनिस्ट भारत और सनातन धर्म की भूरी-भूरी प्रशंसा करते हैं तो भारत में पाकिस्तान और ईसाइयत और इस्लाम की प्रशंसा करते हैं।

दूसरा - निक्सन के दूत अमेरिकी विदेश मन्त्री हेनरी किसिंजर के चीन दोरों और अमेरिका -चीन समझोते के बाद चीन में ग्लोबलाइजेशन के प्रभाव के बाद चीन में न मार्क्सवाद, न लेनिनवाद न स्टालिन वाद न ट्राॉट्स्की वाद और न माओवाद और न कम्युनिज्म कुछ नहीं बचा है। विस्तार वादी नीति ही उनकी मूल नीति रही थी और है।

तीसरा -- वामपन्थियों का सञ्चालन चीन के हाथों में है। वह म्यांमार और श्रीलंका के बौद्धों का दुरुपयोग करके भारत में और पाकिस्तान का दुरुपयोग करके मुस्लिम राष्ट्रों में षड़यन्त्र चलाता है।

युरोप का राजनीतिक इतिहास।

मार्क्सवाद, लेनिनवाद, स्टालिन वाद और माओवादी कम्युनिज्म को समझने के पहले युरोपीय राजनीति 
 राजनीति मानसिकता समझना अत्यावश्यक है।

इसलिए पहले यह पढ़ लोगे तो यदि मार्क्सवाद , पूँजी और कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो पढ़ा होगा तो मार्क्सवाद में और कम्युनिज्म में और वामपंथी विचारधारा में अन्तर समझकर हस्तमालकाचार्य बन जाओगे।

फ्रांस की राज्य क्रान्ति ---
लुइ चौदहवें के उत्तराधिकारी लुई सोलहवें का पतन।
लुई चौदहवाँ निरंकुश राज्यतन्त्र का नायक था तो लुई सोलहवाँ साम्यवादी शासक था।

फ्रांसीसी राज्य क्रान्ति के मुख्य नायकों में रूसो के अलावा, वाल्टेयर, मोंटेस्क्यू जैसे दार्शनिक, तथा मीराब्यू, लाफायेट, रोबेस्पिएर, डैंटन, और नेपोलियन जैसे क्रांतिकारी नेता शामिल थे। 

ज्ञानोदय के दार्शनिक
वाल्टेयर--
एक फ्रांसीसी लेखक जो धर्म, और पारंपरिक संस्थानों की आलोचना के लिए और स्वतंत्र भाषण व नागरिक स्वतंत्रता के समर्थन के लिए जाने जाते थे। 

मोंटेस्क्यू--
इन्होंने व्यक्तिगत अधिकारों और स्वतंत्रता के सिद्धांतों पर जोर दिया। 

रूसो--
इनका मानना था कि समाज मनुष्य को भ्रष्ट करता है और वे व्यक्तिगत अधिकारों, स्वतंत्रता और समानता पर ज़ोर देते थे। 
क्रांतिकारी नेता और अभिनेता
मीराब्यू और लाफायेट:
ये क्रांति के शुरुआती और शांत चरण के प्रमुख नेता थे। 
रोबेस्पिएर और डैंटन:
ये आतंक के दौर में क्रांति के प्रमुख नेता थे। 


सेना नायक से राष्ट्रनायक बना नेपोलियन बोनापार्ट---

नेपोलियन
एक सैन्य जनरल जिसने क्रांति को समाप्त किया और बाद में फ्रांस का शासक बना। 

ब्रिसोट--
गिरोंडिन्स के नेता, जो बाद में क्रांति के दुश्मन घोषित कर दिए गए। 

ज्याँ-पॉल मराट--
उन्होंने अपने अखबार "जनता का मित्र" के माध्यम से कथित साजिशों और प्रतिक्रांतिकारियों के खिलाफ हिंसा की आवश्यकता पर जोर दिया।



युरोपीय राष्ट्रवाद का उदय
इटली का एकीकरण ---
 इटली के एकीकरण में मेजिनी और गैरीबाल्डी के अलावा प्रमुख नायक थे राजा विक्टर इमैनुएल द्वितीय, काउंट कैमिलो बेन्सो डी कावूर, और इटली के तत्कालीन प्रधानमंत्री। ये सभी नेता इटली को बाहरी प्रभुत्व से मुक्त करने और एकीकृत राष्ट्र बनाने के प्रयास में प्रमुख भूमिका में थे। 

अन्य प्रमुख नायक--

राजा विक्टर इमैनुएल द्वितीय--
पीडमोंट-सार्डिनिया के राजा के रूप में उन्होंने इटली के एकीकरण के आंदोलन को सहारा दिया और अंततः पूरे इटली के राजा बने।

काउंट कैमिलो बेन्सो डी कावूर--
इटली के एकीकरण में यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण राजनीतिज्ञ, अर्थशास्त्री और राजनेता थे। उन्होंने पीडमोंट-सार्डिनिया के प्रधानमंत्री के रूप में विदेश नीति में सक्रिय भूमिका निभाई और ऑस्ट्रिया के खिलाफ युद्ध छेड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

ये नेता मिलकर इटली के विभिन्न राज्यों को एकजुट करने, विदेशी प्रभुत्व से मुक्त करने और एक एकीकृत इटली का निर्माण करने के प्रयास में शामिल थे।


युरोपीय राष्ट्रवाद का विकास ---

जर्मनी के एकीकरण के मुख्य नायक ओटो वॉन बिस्मार्क थे, जिन्होंने प्रशिया के चांसलर के रूप में कूटनीति और युद्धों के माध्यम से जर्मनी के विभिन्न राज्यों को एक एकीकृत राष्ट्र में संगठित किया। उन्होंने "रक्त और लौह" की नीति अपनाई और ऑस्ट्रिया, डेनमार्क और फ्रांस के खिलाफ युद्ध जीते, जिसके परिणामस्वरूप 1871 में एकीकृत जर्मन साम्राज्य की स्थापना हुई और विलियम प्रथम सम्राट बने।
 
ओटो वॉन बिस्मार्क की भूमिका---

मास्टरमाइंड--
बिस्मार्क को जर्मनी के एकीकरण के पीछे का मास्टरमाइंड माना जाता है, जिन्होंने प्रशिया की शक्ति का उपयोग करके इसे पूरा किया। 
'लौह और रक्त' की नीति--
उन्होंने अपनी प्रसिद्ध "लौह और रक्त" की नीति के माध्यम से, सैन्य बल और कूटनीति का उपयोग करके जर्मनी के एकीकरण का मार्ग प्रशस्त किया। 

तीन युद्ध--
बिस्मार्क ने डेनमार्क के खिलाफ युद्ध (शलेसविग और होलस्टीन के लिए), ऑस्ट्रिया के खिलाफ युद्ध (सेडोवा की लड़ाई), और फ्रांस के खिलाफ युद्ध (सीडान की लड़ाई) लड़े, जिनमें प्रशिया की जीत हुई। 
अन्य महत्वपूर्ण व्यक्ति: 
विलियम प्रथम (राजा विल्हेम प्रथम): एकीकृत जर्मन साम्राज्य के पहले सम्राट बने।
इस प्रकार, ओटो वॉन बिस्मार्क ने सैन्य और कूटनीतिक कुशलता से जर्मनी के एकीकरण को अंतिम रूप दिया। 

जर्मनी के एकीकरण में ओटो वॉन बिस्मार्क और राजा के अलावा मुख्य नायक हेल्मुथ वॉन मोल्टके द एल्डर और अल्ब्रेक्ट वॉन रून थे, जिन्होंने बिस्मार्क के साथ मिलकर प्रशिया की सेना को मजबूत किया और कूटनीतिक और सैन्य रणनीति के माध्यम से जर्मनी के एकीकरण का मार्ग प्रशस्त किया। 
मुख्य नायक और उनकी भूमिकाएँ: 
हेल्मुथ वॉन मोल्टके द एल्डर (Helmuth von Moltke the Elder):
प्रशियाई सेना के नए चीफ ऑफ स्टाफ के रूप में, मोल्टके ने सेना के आधुनिकीकरण और पुनर्गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी सैन्य रणनीतियों ने बिस्मार्क को डेनमार्क, ऑस्ट्रिया और फ्रांस के विरुद्ध युद्धों में निर्णायक जीत दिलाने में मदद की, जो एकीकरण के लिए आवश्यक थे।
अल्ब्रेक्ट वॉन रून (Albrecht von Roon):
रून को युद्ध मंत्री नियुक्त किया गया था, और उन्होंने प्रशियाई सेना को एक शक्तिशाली, कुशल बल में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने बिस्मार्क के साथ एक स्थायी राजनीतिक गठबंधन बनाया, जिससे सेना को सुदृढ़ करने और एकीकरण के प्रयासों में सहयोग करने में मदद मिली।
इन तीनों ने मिलकर 'रियलपोलिटिक' की नीति अपनाई, जो कि विचारधारा से हटकर व्यावहारिक कूटनीति और सैन्य बल का उपयोग करके राजनीतिक लक्ष्यों को प्राप्त करने पर केंद्रित थी। इस सहयोग ने प्रशिया को जर्मन राज्यों के एकीकरण का नेतृत्व करने में सक्षम बनाया।

फ्रांस की राज्य क्रान्ति से अत्यधिक प्रभावित 
युरोपीय राष्ट्रवाद का मिश्रित स्वरूप संयुक्त राज्य अमेरिका ---

संयुक्त राज्य अमेरिका के गठन और तेरह राज्यों के एकीकरण में जॉर्ज वॉशिंगटन के अलावा  थॉमस जेफरसन, जॉन एडम्स, बेंजामिन फ्रैंकलिन, अलेक्जेंडर हैमिल्टन, जॉन जे और जेम्स मैडिसन जैसे कई प्रमुख नायक थे, जो संस्थापक पिता के रूप में जाने जाते हैं। इन व्यक्तियों ने स्वतंत्रता संग्राम, महाद्वीपीय कांग्रेस में भाग लेने और संविधान का मसौदा तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे एक नया राष्ट्र बना। 

प्रमुख संस्थापक पिता---

थॉमस जेफरसन --
स्वतंत्रता की घोषणा के मुख्य लेखक और राष्ट्र के तीसरे राष्ट्रपति थे। 

जॉन एडम्स --
संयुक्त राज्य अमेरिका के पहले उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति थे, जिन्होंने कानूनी और राजनीतिक विचारों में योगदान दिया। 

बेंजामिन फ्रैंकलिन--
एक प्रतिभाशाली लेखक, वैज्ञानिक और राजनयिक थे, जिन्होंने देश के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। 

अलेक्जेंडर हैमिल्टन--
पहले वित्त मंत्री और एक प्रमुख संघीयवादी थे, जिन्होंने एक मजबूत राष्ट्रीय सरकार की वकालत की। 

जॉन जे --
पहले सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और कई मौलिक दस्तवेजों के सह-लेखक थे। 

जेम्स मैडिसन --
"संविधान के पिता" के रूप में जाने जाते हैं और संविधान के मसौदे में उनकी भूमिका के लिए प्रसिद्ध हैं।

अन्य महत्वपूर्ण व्यक्ति ---

पैट्रिक हेनरी--
एक प्रेरक वक्ता थे जिन्होंने स्वतंत्रता की भावना पैदा करने में भूमिका निभाई।

सैमुअल एडम्स--
एक प्रमुख देशभक्त और बोस्टन की टी पार्टी के आयोजकों में से एक थे।

जॉन हैनकॉक--
स्वतंत्रता की घोषणा पर हस्ताक्षर करने वाले पहले व्यक्ति थे।


रूस की बोल्शेविक क्रांति में लेनिन और स्टालिन के अलावा प्रमुख नायकों में लियोन ट्रॉट्स्की, लेव कामेनेव और अनातोली लूनचारस्की जैसे नेता थे, जिन्होंने पार्टी और क्रांति के दौरान महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाईं। ट्रॉट्स्की ने लाल सेना की स्थापना की, कामेनेव ने एक प्रमुख राजनीतिक रणनीतिकार के रूप में काम किया, और लूनचारस्की ने शिक्षा और कला के क्षेत्र में योगदान दिया। 

प्रमुख नायक---

लियोन ट्रॉट्स्की--
वह एक प्रमुख बोल्शेविक नेता थे, जिन्होंने अक्टूबर क्रांति का नेतृत्व किया और लाल सेना की स्थापना की, जो एक महत्वपूर्ण सैन्य शक्ति थी जिसने गृहयुद्ध में बोल्शेविकों को जीत दिलाई।


लेव कामेनेव--
कामेनेव एक अनुभवी बोल्शेविक नेता थे जिन्होंने पार्टी के भीतर एक प्रमुख राजनीतिक रणनीतिकार के रूप में कार्य किया। उन्होंने क्रांति की सफलता में अहम भूमिका निभाई।


अनातोली लूनचारस्की--

लूनचारस्की एक मार्क्सवादी विचारक और वक्ता थे, जिन्हें क्रांति के बाद शिक्षा और संस्कृति के लिए जन комиссаर (निक्षेपक) नियुक्त किया गया था। उन्होंने शिक्षा प्रणाली के निर्माण में योगदान दिया। 

इन नेताओं ने लेनिन और स्टालिन के साथ मिलकर कार्ल मार्क्स के विचारों को लागू करने और बोल्शेविक सत्ता स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


चीन की क्रांति में माओत्से तुंग और चाऊ एन लाई के अलावा अन्य महत्वपूर्ण नायक थे लियू शाओकी, जो पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के अध्यक्ष थे और बाद में माओ के विरोधी बने, और देंग शियाओपिंग, जिन्होंने सांस्कृतिक क्रांति के बाद माओ के व्यक्तित्व पंथ को खत्म करने में अहम भूमिका निभाई। 

अन्य मुख्य नायक---
 
लियू शाओकी--

सांस्कृतिक क्रांति के दौरान वे पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना के अध्यक्ष थे। माओ ने उन्हें सत्ता से हटा दिया था और उन पर हमला किया था।

देंग शियाओपिंग--
सांस्कृतिक क्रांति के बाद, देंग शियाओपिंग और अन्य लोगों ने मिलकर "बोलुआन फैनझेंग" नामक अभियान चलाया, जिसने सांस्कृतिक क्रांति के हानिकारक प्रभावों को खत्म किया और व्यक्तित्व पंथ के उपयोग को बंद कर दिया।

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026

रोहिङ्ग्या समस्या पर भारत का विचित्र रुख।

आश्चर्य है कि, बर्मा के रोहिंग्या मुसलमानों को तीसरे देश में भेजने की राष्ट्रपति थीन सीन की योजना को बढ़ावा देने के लिए असीन वीरसू या वीरथु और विराधु नाम से प्रसिद्ध बौद्ध भिक्षु विन खिंग ऊ (Win Khin Oo)  ने सितंबर 2012 में मांडले में भिक्षुओं की एक रैली का नेतृत्व किया। और 2017 में रोहिंग्या म्यांमार के रखाइन प्रान्त से  असीन वीरसू या वीरथु और विराधु द्वारा  भगाये गये रोहिंग्याओं को अन्य देशों के समान  घुसने से रोकने का कोई कड़ा प्रबन्ध नहीं किया। केवल विरोध प्रदर्शन किया।
और उन्हें वापस रखाइन प्रांत में बसाने के लिए भूकम्परोधी मकान बना कर दिये। रखाइन विकास बोर्ड की स्थापना की।

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026

ब्राह्म धर्म में सद्योमुक्त की अवधारणा।

जिस समय दोष दर्शन बन्द कर दिया जाता है , सन्देह दूर होने लगेंगे।
सन्देह दूर होते ही सत्य सामने आने लगेगा। और सारे भ्रम दूर हो जाते हैं।

परमात्मा (असम्भुति) की उपासना सम्भव नहीं है, परब्रह्म परमेश्वर विष्णु माया के प्रति पूर्ण समर्पण के आगे या कहें बाद में कर्म शेष नहीं रहते। श्रीमद्भगवद्गीता द्वितीय अध्याय वाली (भगवान शंकराचार्य जी वाली नहीं) सन्यास निष्ठा जागृत हो जाती है।
इसलिए वह केवल लोकसंग्रह हेतु ही पञ्च महायज्ञ अष्टाङ्ग योग अभ्यास आदि जारी रखता है।
शरीर भोग पूरे करने हेतु सांसारिक कर्म और भोग ग्रहण जारी रखता है।
उसके लिए इन्द्रिय सुख-दुख कोई अस्तित्व नहीं रखते हैं।
फिर भी वह प्रकट नहीं करता।
शरीर है तो शरीर के गुण धर्म सब होंगे लेकिन उससे उसकी चित्तवृत्ति अप्रभावित रहती है।
बस यही वानप्रस्थ और संन्यासी में अन्तर है।

अविद्या अर्थात कर्मेंद्रियों से होने वाली क्रियाओं में अपना अहंकार जोड़कर उसे कर्म इसलिए नहीं बनने देता है क्योंकि वह जानता है कि, इन्द्रियाँ अपने अपने अर्थों में, विषयों में वरत रही है (व्यवहार कर रही है।)
और देवताओं की उपासना ब्रह्मचर्य आश्रम में उपवेदों का अध्ययन, प्रयोग और व्यवहार करते समय ही पूर्ण कर चुका। अब उन्हें यथासमय केवल इसलिए करता रहता है ताकि, यह स्मृति से न हटे और आवश्यक होने पर काम आये (कर्ण जैसी स्थिति नहीं हो) इसलिए कर्तव्य है।
[जैसे तन्त्र में उदृष्टका, एकाष्टका, पूर्णिमा, व्यष्टिका, अमावस्या, सायन संक्रान्ति और निरयन संक्रमण तथा सम्बन्धित नक्षत्र पर सूर्य और चन्द्रमा होने के समय तथा सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण के (दिन नहीं बल्कि) समय सिद्ध मन्त्र का जप करना पड़ता है।]
लेकिन यह कार्य वह लोकसंग्रह हेतु करता है न कि, स्वार्थ सिद्धि हेतु। इसलिए (कमाने-खाने वाले) कर्मेंद्रियों के कर्म अनासक्त भाव से कर्तव्य समझकर करता हुआ अन्धतम में प्रवेश नहीं करता अर्थात जड़ता को प्राप्त नहीं होता।
और निष्काम भाव से देवताओं की उपासना रूप विद्या की उपासना करते हुए भी उससे भी अधिक घोर अन्धकार में नहीं रहता है।

सम्भूति मतलब शरीर से लेकर सृष्टि पर्यन्त उत्पन्न होने वाले कार्यब्रह्म की उपासना इसलिए नहीं करता क्योंकि, केवल धनारर्जन से लेकर लोक विजय तक, सङ्ग्रह, संरक्षण से लेकर विस्तार तक और शारीरिक भोग से लेकर ब्रह्मलोक तक के भोगों में उसकी रुचि बहुत पहले ही वानप्रस्थ आश्रम में ही समाप्त हो चुकी होती है।
इसलिए उसे न इन्हें प्राप्त करने के लिए विद्या की उपासना (सकाम उपासना) की आवश्यकता रही और न ही इनमें कोई रुचि या आकर्षण बचा। अब उसे न किसी लोक वास में या किसी लोक का स्वामी बनने में कोई आकर्षण बचा। इसलिए वह अन्धकार में नहीं रहता।
और चूंकि वह जानता है कि, जैसे स्वयम को नमस्कार नहीं किया जा सकता उसी प्रकार द्वेत के अभाव में उस परब्रह्म परमेश्वर के भी कारण उस *परमात्मा की आराधना-उपासना सम्भव नहीं है।* इसलिए जानबूझ अन्धेकुए में कुदने जैसी गलती नहीं करता।
इसलिए वह घोर अन्धतम में प्रवेश नहीं करता।
चूंकि यह दर्शन वर्णाश्रम व्यवस्था वाले सनातन ब्राह्म धर्म का है इसलिए इसे जैन-बौद्ध और तन्त्र व्यवस्था के अन्तर्गत नहीं समझाया जा सकता है।
इसलिए वर्णाश्रम के साथ ही समझाया जा सकता है।
और वर्णाश्रम, कर्मफल, पुनर्जन्म न समझने वाले अब्राहमिक (अब्राह्मिक) तो समझ ही नहीं सकते।

रविवार, 18 अक्टूबर 2026

वैदिक दर्शन में अभेद दृष्टि।

*वेदों में पारमार्थिक सत्य तथ्य के अलावा व्यावहारिक दृष्टिकोण को भी मान्यता देकर ईश्वर, जीव और जगत के रूप में तीनों सत्ताओं को अचानक खड़ा नहीं करते हुए शाश्वत अमर चेतना की प्रगाढ़ता, सघनता, तीव्रता और प्रचण्डता तथा विभव, क्षमता, सामर्थ्य, अन्तःशक्ति, और सम्भूति (सम्भावना) में क्रमशः विभिन्न चरणों में धीरे-धीरे कमी दर्शाते हुए अलग-अलग स्वरूपों में प्रकटीकरण के माध्यम से बतलाया गया।*
*इस प्रकार स्वतन्त्र इच्छा वाले एक व्यक्तिगत तानाशाह सम्प्रभु शासक के रूप में ईश्वर की अवधारणा के स्थान पर कर्मफल सिद्धान्त पुनर्जन्म का सिद्धान्त स्थापित किया गया।* (जिसे मैं करो और भुगतो का सिद्धान्त कहता हूँ। यदि करते समय सोच-विचार नहीं तो भोगने में सोच विचार क्यों?)
परमात्मा के - (विश्वात्मा) ॐ संकल्प से - (प्रज्ञात्मा) परब्रह्म परमेश्वर (परम पुरुष) विष्णु और (परा प्रकृति) माया -- (प्रत्यगात्मा/ अन्तरात्मा) (महेश्वर) ब्रह्म -(पुरुष) प्रभविष्णु सवितृ और (प्रकृति) श्री लक्ष्मी सावित्री -- (जीवात्मा) जगदीश्वर (अपरब्रह्म) - (अपर पुरुष) नारायण श्रीहरि और (त्रिगुणात्मक अपरा प्रकृति) कमलासना गज सेविता लक्ष्मी --- (भूतात्मा) अण्डाकार पञ्च मुखी हिरण्यगर्भ ब्रह्मा - (प्राण) (चेतना/ देही) त्वष्टा और (धृति/ धारयित्व) रचना, और अर्धनारीश्वर एक रुद्र --- (सूत्रात्मा) प्रजापति - (ओज) दक्ष प्रजापति, रुचि प्रजापति , कर्दम प्रजापति, स्वायम्भुव मनु तथा शंकर जी और (आभा) (कान्ति), प्रसुति, आकुति, देवहूति, शतरूपा तथा उमा (पार्वती), --- (अणुरात्मा) वाचस्पति - (तेज) इन्द्र और (विद्युत) शचि, --- (विज्ञानात्मा)  ब्रह्मणस्पति - (चित्त) द्वादश आदित्य और (वृत्ति) - (तुरीय, जागृति, स्वप्न निद्रा आदि), --- (ज्ञानात्मा) बृहस्पति - (बुद्धि) अष्ट वसु और (बोध), --- (लिङ्गात्मा) पशुपति - (अहंकार) एकादश रुद्र और (अस्मिता), --- (मनसात्मा) गणपति - (मन) सोम और (सङ्कल्प - विकल्प)  वर्चा --- (स्व) सदसस्पति (सिंगुलैरिटी) और (स्वभाव) मही (एनर्जी) ---- (वैकारिक स्वभाव) स्वाहा (आधिदैविक शक्ति) - (तेजस स्वभाव) वषट (अध्यात्मिक शक्ति) - (भूतादिक स्वभाव) स्वधा (भौतिक शक्ति/कास्मिक एनर्जी ) ।
(आगे भी है.....)
वैदिक सृष्टि क्रम वर्णन की विशेषता।
1 अनादि अनन्त, गुणातीत परमात्मा।

2 परमात्मा का ॐ संकल्प, जिसे पूर्ण से पूर्ण होना कहा गया।

3 परमात्मा के ॐ संकल्प साथ ही एक (1) प्रज्ञात्मा परब्रह्म होना।

4   उस 1 को ही द्वि (2) (द्वैत) परमपुरुष और परा प्रकृति यानी विष्णु और माया रूप में भासना। 
जैसे सूर्य और प्रकाश दो अलग-अलग समझे जाते हैं, माने जाते हैं लेकिन मूलतः अलग-अलग किया नहीं जा सकता। सूर्य है तो ही प्रकाश है। प्रकाशित हो रहा है तो ही सूर्य है।

5 प्रज्ञात्मा परब्रह्म का ही प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) ब्रह्म (ईकाई/युनिट) के रूप में प्रकट होना।

6 प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) ब्रह्म (महाकाश) को पुरुष प्रभविष्णु (जनक, प्रेरक, रक्षक - सवितृ) और श्री लक्ष्मी (सावित्री) के रूप में जाना जना, समझा जाना, माना जाना।
(ईकाई/ युनिट को भी गुण और गुणवत्ता के आधार पर द्वैत दर्शाना।)

7 प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) ब्रह्म का जीवात्मा अपर ब्रह्म (काल) के पूर्णतः भासमान स्वरूप में प्रकटीकरण। जिसे पूर्ण भासमान अपर पुरुष जीव और त्रिगुणात्मक अपरा प्रकृति आयु के रूप में प्रसिद्धि।

8 जीवात्मा अपर ब्रह्म से भूतात्मा वाणी हिरण्यगर्भ (विश्वकर्मा) (महादिक) के अण्डाकार (अनुभव किए जा सकने वाले भौतिक स्वरूप में) प्रकटीकरण। जिसे प्राण (चेतना) (ब्रह्माण्ड रचियता) त्वष्टा और धारण शक्ति धृति रचना के स्वरूप में जाना गया।
इस स्वरूप ने भौतिक ब्रह्माण्ड तो रच दिया लेकिन सजीव जगत रचना का सूत्र न मिलने पर रोष (भाव) आने पर (न्युट्रल) अर्धनारीश्वर स्वरूप एक रुद्र प्रकट हो गए। जिन्होंने सृजन से इन्कार कर तप को अपनाया।
फिर वाणी हिरण्यगर्भ ने धर्म और धृति (जिसने धर्म को धारण किया) और काम (कामना/ इच्छा) और रति (क्रियाशील रत रखने वाली शक्ति जो (सूख की इच्छा) राग के प्रति उत्तरोत्तर तीव्रता जगाने वाली रति) को उत्पन्न किया।
इन दोनों के प्रति समत्व भाव वाला स्वरूप आने की परिस्थितियाँ हो जाने पर जैविक सृष्टि के सृजनकर्ता हुए।

9 भूतात्मा वाणी हिरण्यगर्भ (विश्वकर्मा) से सूत्रात्मा प्रजापति और सरस्वती हुए जिन्हें अध्यात्मिक तत्व ओज और आभा (कान्ति) के रूप में जानते हैं। और आधिदैविक स्वरूप में दक्ष प्रजापति और उनकी पत्नी प्रसुति, रुचि प्रजापति और आकुति, कर्दम प्रजापति और देवहुति तथा स्वायम्भुव मनु और शतरूपा हुए।
जिन्होंने मैथुनिक जैविक सृष्टि उत्पन्न की।
पहले भू-भव मतलब होना (भुतात्मा हुए)।
फिर धर्म - धृति (कर्तव्य भाव) और कामना (काम-रति) दो प्रकार की भावना जागृत हुई।
तब जैविक सृष्टि मैथुन के माध्यम से हुई।
यहाँ जाकर द्वैत भाव परिपूर्ण हुआ।
आज भी अन्तःकरण में जब-तक स्त्री-पुरुष द्वैत भाव रहने तक ब्रह्मचर्य सिद्धि नहीं माना जाता है।
जो ब्रह्म की ओर चलने वाला ब्रह्मचारी होगा वही ब्रह्म में लीन हो पाएगा।

दिए गए वैदिक सूक्त, तेरह उपनिषद और श्रीमद्भगवद्गीता को यदि मस्तिष्क पर लगा चश्मा हटाकर पढ़ ले तो सभी तत्व, उनके परस्पर सम्बन्ध सभी प्रकाशित हो जाएंगे।

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

निर्णय सिन्धु के अनुसार नवरात्र

आश्विन शुक्ल षष्ठी तिथि में सायंकाल में बिल्व के पास जाकर देवी और बिल्व का पूजन कर प्रार्थना करें कि, रावण के वध के लिए श्रीराम का अनुग्रह के लिए असमय में ब्रह्मा ने देवी का बोधन पहले आप मे (बिल्व में) किया अतः मैं भी सायंकाल के समय षष्ठी तिथि में आपके आश्रित देवी का बोधन करता हूँ। श्रीशैल पर्वत के शिखर में उत्पन्न श्रीफल (बिल्वफल) लक्ष्मी का निवास स्थान है। मैं आपको ले जाऊँगा। कृपया आप आइयेगा। दुर्गा स्वरूप आप पूज्य हैं।
रावणस्य वधार्थाय रामास्यानुग्रहाय च।अकाले ब्रह्मणा बोधो देव्यास्त्वयि कृतः पुरा।।
अहमप्याश्रितः पृष्ठायाम् सायाह्ने बोधयाम्यतः। श्रीशैलिखरे जातः श्रीफलः श्री निकेतनः।। नेतव्योऽसि मयागच्छ पूज्यो दुर्गास्वरूपतः।। निर्णय सिन्धु पृष्ठ 346-347

कालिका पुराण के अनुसार ---
इस प्रकार देवी का अधिवासन कर दुसरे दिन सप्तमी को निमन्त्रित बिल्व की शाखापत्री में प्रवेश कर पूजा करें‌
इसमें सप्तमी तिथि की मुख्य है, मूल नक्षत्र भी हो तो सर्वोत्तम।
दो नूतन बिल्व के फलों का युग्म तथा शाखा को वैसे ही देवी प्रतिमा का स्नान कराकर अभ्युक्षण कर प्रवेश करें‌। इसमें दाक्षिणात्य (महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आन्ध्र प्रदेश में) षष्ठी युक्त सप्तमी तिथि ग्रहण करते हैं लेकिन गोड़ (बङ्गाल, उड़ीसा, पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार, असम आदि सेवन सिस्टर्स में प्रचलित) मत है कि,चाहे एक घटि भी उदिया सप्तमी तिथि हो तो भी उदिया सप्तमी का ही महत्व है। निर्णय सिन्धु पृष्ठ 348
नव पत्रिका ---
केल का पत्ता, दारु हल्दी का पत्ता, हल्दी का पत्ता , जयन्ती (मेउडी) , धान (चावल की का पोधा) आदि। निर्णय सिन्धु पृष्ठ 348

देवी पुराण के अनुसार ---
दक्षिण मुखी दुर्गा प्रतिमा शुभदायक, पूर्वाभिमुख दुर्गा प्रतिमा विजयप्रद, पश्चिमामिमुख दुर्गा प्रतिमा भी उत्तम है। लेकिन उत्तराभिमुख दुर्गा प्रतिमा स्थापना भूल कर भी न करें। निर्णय सिन्धु पृष्ठ 350

यह बिल्वपत्र आदि केवल पूजा में रखी जाने वाली दुर्गा सप्तशती की पुस्तक में सप्तमी तिथि (मूल नक्षत्र) में प्रातः स्थापित कर सरस्वती पूजन करें। पठन-पाठन, पाठ अध्ययन के लिए दुर्गा सप्तशती की दूसरी पुस्तक रखें। निर्णय सिन्धु पृष्ठ 346

 अष्टमी तिथि (पूर्वाषाढ़ नक्षत्र) में प्रातः सरस्वती सरस्वती पूजन, नवमी तिथि (उत्तराषाढ़ नक्षत्र) में प्रातः सरस्वती के निमित्त बलिदान (धार्मिक कर अदायगी) करें, और दशमी तिथि (उत्तराषाढ़ नक्षत्र) में प्रातः सरस्वती विसर्जन करें। निर्णय सिन्धु पृष्ठ 330-331,, प्रातः काल का महत्व, तिथि का ही महत्व पृष्ठ 331,334,
नवरात्र में पूजा ही प्रधान है उपवास आदि तो उसका अङ्ग है। निर्णय सिन्धु पृष्ठ 342
घटस्थापना सूर्योदय से दस घटि के अन्दर ही करें। पृष्ठ 336, रात्रि 
पारण दशमी तिथि में करें पृष्ठ 372