बुधवार, 10 जून 2026

व्रात्य और व्रात्य पति।

व्रात्य का अर्थ ऐसे श्रमण जो संस्कार विहिन हो, निरग्नि हो, निर्ग्रन्थ हो, आचार भ्रष्ट हो, यहाँ तक कि, जिसने जननेन्द्रिय की नस मार ली हो समाज से बहिष्कृत ऐसे लोग व्रात्य कहलाते थे।
व्रात्य लोगों में, सन्यास आश्रम में ऋषभदेव, जड़ भरत जैसे ज्ञानी भी हुए और जैन मुनि बाहुबली भी हुए तो अघोरी भी व्रात्य की श्रेणी में आते हैं।

पहले शंकर जी और बाद में विनायक गजानन भी व्रात्यपति कहलाए।

सोमवार, 8 जून 2026

आकर्षण, आसक्ति (लगाव), राग/ अनुराग ,भ्रम और मोह तथा प्रेम और भक्ति में अन्तर

आकर्षण, आसक्ति (लगाव), राग/ अनुराग ,भ्रम और मोह तथा प्रेम और भक्ति में अन्तर होता है।
किसी भी विषय से सम्बन्धित ज्ञानेंन्द्रि के सम्पर्क में आने के साथ उस ज्ञानेन्द्रि से मन का संयोजन होने पर उस विषय के प्रति आकर्षण उत्पन्न हो जाता है। आकर्षण उत्पन्न होते ही कर्मेंन्द्रियाँ उस विषय भोग के लिए सक्रिय और तत्पर हो उठती है। या यूं कहें कि, उस विषय से सम्बन्धित वस्तु, स्थान या व्यक्ति को प्राप्त करने में लग जाती है।
आकर्षण का विरोधी भाव विकर्षण है। जिसका परिणाम उच्चाटन होता है । व्यक्ति उससे दूर हो जाना चाहता है। लेकिन मन ही मन स्मरण बढ़ता जाता है।
मतलब आकर्षक आसानी से समाप्त नहीं होता।

आकर्षण से उस विषय की स्मृति बारम्बार होती रहती है, या कहें चित्त में बनी रहती है। परिणाम स्वरूप उस विषय (वस्तु, व्यक्ति या स्थान) के प्रति लगाव हो जाता है। इसी लगाव के लिए उपयुक्त शब्द आसक्ति है। वह विषय व्यक्ति से चिपक जाता है। हटाये नहीं हटता। बल्कि और दृढ़ता से चिपकता जाता है।

परिणाम स्वरूप उसके प्रति राग उत्पन्न होता है। उससे व्यक्ति को सुखानुभूति होने लगती है। इससे अनुराग उत्पन्न हो कर व्यक्ति अनुरक्त हो जाता है। उसी में घुल-मिल जाता है।

परिणाम स्वरूप व्यक्ति को हर समय, प्रत्येक गतिविधि में उस विषय की अनुभूति होने लगती है। यह उसका भ्रम होता है।

लेकिन जब व्यक्ति उस भ्रम को ही सत्य समझने लगता है तो भ्रम के स्थाई भाव को मोह कहते हैं।
परिणाम स्वरूप व्यक्ति उस विषय में मोहित हो जाता है। जिसे फारसी भाषा में दीवानह' कहा जाता है, जिसका अर्थ उन्मादग्रस्त, विक्षिप्त या पागल होता है। किसी व्यक्ति के प्रति आसक्ति में मोहित होकर उन्मादी हुए व्यक्ति को उर्दू में दीवाना कहते हैं।

प्रेम इन सबसे पूर्णतः भिन्न भावना है।
प्रेम का आधार गुणों के प्रति श्रद्धा होता है।
किसी भी सद्गुण सम्पन्न व्यक्ति के प्रति प्रायः सभी सदाचारियों को सहज ही प्रेम उपजता है। प्रेम उमड़ता है।
बालक के गुणों से उपजे प्रेम को वात्सल्य कहते हैं।
आजकल लोग भाषाई अज्ञान वश वात्सल्य भाव को माँ की ममता कहते हैं। जबकि ममता का अर्थ मेरापन होता है। ममता अहंकार का परिणाम है। इसीलिए अहन्त- ममता अर्थात मैं- मेरा शब्द साथ में ही आते हैं।
प्रेम प्राकृतिक भाव है। प्रेम न किया जाता है, न हो जाता है। बल्कि प्रेम सनातन भाव है; जो सदा से था। है और सदा रहेगा।
प्रेम सद्गुणों के प्रति श्रद्धा से होता है; ज्ञान से होता है। प्रेम किसी विषय, व्यक्ति, वस्तु या स्थान के प्रति नहीं होता।

जब प्रेम में आदर, सम्मान जुड़ जाता है तब वही प्रेम भक्ति कहलाता है।

गुरुवार, 28 मई 2026

लगभग उन्नीस हजार श्लोक वाले गरुड़ पुराण और राजस्थान के पाली जिले के ग्राम सोजत के पण्डित रामेश्वर जी श्रीमाली के मार्गदर्शन में जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह के मंत्री लधराज द्वारा राजस्थानी हिन्दी में सम्पादित छोटी पुस्तिका श्री विष्णु सारोद्धर्म में अन्तर।

*लगभग उन्नीस हजार श्लोक वाले गरुड़ पुराण और राजस्थान के पाली जिले के ग्राम सोजत के पण्डित रामेश्वर जी श्रीमाली के मार्गदर्शन में जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह के मंत्री लधराज द्वारा राजस्थानी हिन्दी में सम्पादित छोटी पुस्तिका श्री विष्णु सारोद्धर्म में अन्तर।*


*गरुड़ पुराण।*
*गीता प्रेस संस्करण  कोड 72। सबसे शुद्ध और प्रचलित है।*

*अठारह महापुराणों में से एक  भगवान विष्णु द्वारा गरुड़ जी को सुनाया गया गरुड़ पुराण लगभग उन्नीस हजार श्लोकों में भगवान विष्णु और गरुड़ के संवाद पर आधारित पूर्व खण्ड और उत्तर खण्ड दो खण्ड दो खण्डों में जीवन और मरण दोनों की नियमावली (मैन्युअल) है।*
*पूर्व खण्ड बताता है कि , कैसे जीना है और  उत्तर खण्ड बताता है मरने के बाद क्या होगा इसलिए उत्तर खण्ड को प्रेत कल्प भी कहते हैं। गरुड़ पुराण  के मुख्य देवता भगवान विष्णु  हैं।*
*गरुड़ पुराण का रचनाकाल चौथी से दसवीं शताब्दी के बीच, कई बार संशोधित हुआ।*

 *गरुड़ पुराण की  तीन बड़ी सीख।*

*1 कर्म का फल निश्चित है जैसा कर्म करोगे, तो वैसी योनि और वैसा ही स्वर्ग या नर्क मिलेगा।*
*2 दान-श्राद्ध का महत्त्व ,गया में पिंडदान, अन्नदान, गौदान से प्रेत योनि छूटती है।*
*3 विष्णु भक्ति ही तारने वाली है। अंत समय में ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र ही यम के फंदों से बचाता है।*

*विषय सूची।
*पूर्व खण्ड - आचार काण्ड जीवन सुधारने के लिए आयुर्वेद, नीति, धर्म की बातें हैं जो गृहस्थ के काम की हैं।*

*यह जीवन जीने की कला सिखाता है। मृत्यु से पहले का ज्ञान।*

*1 सृष्टि वर्णन --* 
*ब्रह्मांड की उत्पत्ति, 14 लोक, युग धर्म*
*2 सूर्य-चंद्र वंश वर्णन और चौबीस अवतार--*
 *राजाओं की वंशावली, विष्णु के चौबीस अवतार*
*3 धर्म-नीति --*
*दान, व्रत, तीर्थ, एकादशी, तुलसी माहात्म्य*
*4 आयुर्वेद--*
 *रोग, औषधि, रस-रसायन, नाड़ी परीक्षा* 
*5 ज्योतिष --* 
*ग्रह, नक्षत्र, शकुन-अपशकुन, स्वप्न फल*
*6 व्याकरण और छन्द --* *संस्कृत व्याकरण, काव्य शास्त्र* 
*7 रत्न और वास्तु --* *मणि-माणिक्य की पहचान, गृह निर्माण नियम*
*8 राजनीति --*
*राजा के कर्तव्य, युद्ध नीति*

*द्वितीय खण्ड  --* 
*उत्तर खण्ड / प्रेत कल्प पाप का भय नरकों का वर्णन पढ़कर मनुष्य पाप से बचता है।इसी भाग के कारण गरुड़ पुराण सबसे ज्यादा जाना जाता है।*

*मृत्यु के बाद का ज्ञान।*
*1 मृत्यु के लक्षण --* *मनुष्य को मरने से पहले कैसे संकेत मिलते हैं।*
*2 यममार्ग का वर्णन --*
*मृत्यु के बाद जीवात्मा सैंतालीस दिन में यमलोक कैसे पहुँचती है। वैतरणी नदी, यमदूत।*
*3 चोरासी लाख योनियाँ--* 
*किन किन कर्मों के अनुसार कौन-कौन सी योनि मिलती है।*
*4 नरक वर्णन--*   *तामिस्र, अंधतामिस्र, रौरव, कुंभीपाक आदि अट्ठाईस प्रकार के नर्क ।*
 *किस पाप से कौन-सा नर्क मिलता है।*
*5 प्रेत योनि --*
*प्रेत कौन बनता है, प्रेत बाधा से मुक्ति कैसे हो।*
*6 श्राद्ध-तर्पण --* *अंत्येष्टि, दशगात्र, सपिण्डीकरण, पिण्डदान, गया श्राद्ध की विधि।*
*7 मोक्ष उपाय--*
 *गीता पाठ, विष्णु सहस्रनाम, गया में पिंडदान से मुक्ति।*

 *परम्परा अनुसार घर में मृत्यु होने पर तेरह दिन तक प्रेत कल्प का पाठ कराते हैं। लेकिन आजकल उसके स्थान पर राजस्थान के सोजत के पण्डित रामेश्वर जी श्रीमाली की रचना विष्णु सारोद्धर्म मृत्यु उपरान्त तेरह दिनों तक गरुड़ पुराण के नाम से कर्मकाण्डी पण्डित लोग सुनाते हैं।*
*मान्यता है कि गरुड़ पुराण द्वितीय खण्ड प्रेत कल्प का पाठ मृतक की आत्मा को यममार्ग में कष्ट नहीं होता और सद्गति मिलती है।*
 लेकिन 
*राजस्थान के सोजत के पण्डित रामेश्वर जी श्रीमाली की रचना विष्णु सारोद्धर्म नामक पुस्तिका का पाठ कर सन्तोष कर लिया जाता है।*

*ध्यान रखें कि, श्री विष्णु सारोद्धर्म नामक पुस्तक महामहोपाध्याय पण्डित श्री कृष्णदत्त शास्त्री रचित स्मार्त कार्यकलाप या गृहस्थ कर्मकलाप से पूर्णतः असम्बन्धित और बिल्कुल भिन्न पुस्तक है।*


*श्री विष्णु सारोद्धर्म पुस्तिका।*
*राजस्थानी-मालवी क्षेत्र में गृहस्थों में बहुत प्रचलित श्री विष्णु सारोद्धर्म पुस्तिका वैष्णव कर्मकाण्ड की छोटी पुस्तिका है। इसमें विष्णु पूजा, व्रत, तिलक, तुलसी माहात्म्य, एकादशी विधि आदि का सार दिया गया है।*

*विष्णु सारोद्धर्म पुस्तिका के वास्तविक रचयिता राजस्थान के पाली जिले के ग्राम सोजत के पण्डित रामेश्वर जी श्रीमाली कहे जा सकते हैं । उन्ही के मार्गदर्शन में राजस्थानी हिन्दी में विष्णु सारोद्धर्म पुस्तिका का सम्पादन जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह के मंत्री लधराज ने किया था।*
*सत्रहवीं शताब्दी में जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह के मंत्री लधराज ने स्वयम्  उनके ग्रंथों में संस्कृत के प्रकांड पण्डित और कर्मकाण्ड, पुराण, धर्मशास्त्र के ज्ञाता राजस्थान के सोजत के पण्डित रामेश्वर जी श्रीमाली का उल्लेख किया है ।*

*चुंकि महाराजा जसवंतसिंह के मंत्री लधराज संस्कृत नहीं जानते थे, इसलिए संस्कृत के आधार पर बने ग्रंथ उन्होंने पण्डित रामेश्वर श्रीमाली जैसे विद्वानों से सुनकर लिखे।*

बुधवार, 27 मई 2026

शान्ताकारम भुजगशयन विष्णु स्तुति।

 


*शान्ताकारम् भुजगशयनम् पद्मनाभम् सुरेशम्विश्वाधारम् गगनसदृशम् मेघवर्णम् शुभाङ्गम्।लक्ष्मीकान्तम् कमलनयनम् योगिभिर्ध्यानगम्यम्वन्दे विष्णुम् भवभयहरम् सर्वलोकैकनाथम्॥*

यह श्लोक वेद, ब्राह्मण ग्रन्थों, सूत्र ग्रन्थों में रामायण महाभारत या पुराणों में नहीं मिलता है।
लेकिन महाभारत का अनुशासन पर्व, अध्याय 149 (भीष्म-युधिष्ठिर संवाद) में उल्लेखित विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र के पाठ से पूर्व पढ़ा जाने वाला ध्यान श्लोक के रूप में सर्वप्रिय विष्णु स्तुति है।


 इसमें प्रायः अधिकांश लोग "योगिभिर्ध्यानगम्य्म" का सही उच्चारण नहीं कर पाते हैं
सही उच्चारण के लिए अन्वय करके सीख सकते हैं।
*योगिभिर्ध्यानगम्य्म् ।*
*योगिभिः ध्यान गम्यम्।*
*योगिभि र् ध्यान गम्यम्।*

शान्ताकारम् भुजग शयनम् पद्मनाभम् सुरेशम्

 विश्वाधारम् गगन सदृशम् मेघवर्णम् शुभाङ्गम्।

लक्ष्मीकान्तम् कमलनयनम्

 योगिभि र् ध्यान गम्यम्  वन्दे विष्णुम्

 भवभय हरम् सर्वलोक एक नाथम्॥

स्मार्त गृहस्थों के लिए शुद्ध हिन्दी में लिखित पास्कर गृह्यसूत्र, मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति आदि के प्रमाण सहित कर्मकाण्ड का सम्पूर्ण ग्रन्थ स्मार्त कर्मकलाप या गृहस्थ कर्मकलाप ग्रन्थ।

*महामहोपाध्याय पं. श्रीकृष्णदत्त जी शास्त्री रचित और गीता प्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित स्मार्त कर्मकलाप या  गृहस्थ कर्मकलाप में प्रत्येक विधि के साथ मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य, पारस्कर गृह्यसूत्र आदि के प्रमाण सहित संस्कृत मंत्रों के साथ सरल हिन्दी में अर्थ सहित हिन्दी में लिखा गया गृहस्थों के लिए सम्पूर्ण कर्मकांड का लगभग 900-1000 पृष्ठ का वृहद ग्रंथ विश्वकोश है।*
*काशी के विद्वान अग्निहोत्री पं. प्रभुदत्त जी शास्त्री ने भी गीता प्रेस की विश्वसनीयता के साथ स्मार्त कर्मकलाप या  गृहस्थ कर्मकलाप की प्रशंसा की थी।*
*पहले कर्मकांड की सारी पुस्तकें संस्कृत में पद्धति रूप में थीं। पुरोहितों के अलावा कोई समझ नहीं पाता था।*

*महामहोपाध्याय पं. श्रीकृष्णदत्त जी शास्त्री ने कर्मकलाप में पहली बार हर विधि को हिन्दी में समझाकर लिखा लगभग 900 पृष्ठों का प्रामाणिक ग्रन्थ है।*
*लेखक पं. श्रीकृष्णदत्त जी ने स्वयं लिखा है कि;*
 *"संस्कृत न जानने वाले हिन्दी पढ़े-लिखे गृहस्थ भी सारे कर्मकांड समझ सकें, इसलिए मैंने यह ग्रंथ लिखा। इसके बिना कर्मकांड अधूरा ही रह जाता है।"* 
*पुरोहित न मिले तो भी सामान्य गृहस्थ स्वयम् पढ़कर कर्म कर सकते हैं।*

*स्मार्त कर्मकलाप या गृहस्थ कर्मकलाप ग्रंथ की संक्षिप्त विषय सूची ---*
*कर्मकलाप में जन्म से मृत्यु तक के सारे संस्कार और नित्य-नैमित्तिक कर्म हैं।*
*प्रथम खण्ड  -- नित्य कर्म।*
*1  प्रातः स्मरण, शौच, स्नान विधि।*
*2 संध्योपासन -- त्रिकाल संध्या, गायत्री जप, तर्पण।*
*3 पंचदेव पूजा, तुलसी-शालिग्राम पूजा।*
*4 बलिवैश्वदेव, भोजन विधि, शयन विधि।*

*द्वितीय खण्ड -- षोडश संस्कार।*
*1 गर्भाधान से अन्त्येष्टि तक षोडष संस्कार --* 
*नामकरण, अन्नप्राशन, मुंडन, यज्ञोपवीत, विवाह आदि सभी संस्कार।*
*2 हिन्दी में प्रत्येक संस्कार की सामग्री सूची, मंत्र, विधि, प्रयोजन।

*तृतीय खण्ड -- व्रत-पर्व-त्योहार*
*1 एकादशी, पूर्णिमा, अमावस्या, संक्रांति व्रत।*
*2 गणेश चतुर्थी, नवरात्र, दीपावली, होली, शिवरात्रि - पूजा विधि, कथा, उद्यापन।*

*चतुर्थ खण्ड --  श्राद्ध-तर्पण।*
*1 एकोदिष्ट, पार्वण, महालय श्राद्ध विधि।*
*2 पिंडदान, ब्राह्मण भोजन, गया श्राद्ध का महत्त्व।*

*पञ्चम खण्ड--- ज्योतिष प्रकरण।*

*1 गणित ज्योतिष--* *तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण आदि पंचांग देखना,* 
*2 फलित ज्योतिष --* 
*मुहूर्त, कुंडली के मूल सिद्धांत, ग्रह शांति।*
*3 यात्रा, गृह प्रवेश, विवाह मुहूर्त कैसे निकालें।*

*षष्ठ खण्ड --*  
*वैदिक कर्मकांड।*
*1 अग्निहोत्र, दर्श-पौर्णमास आदि श्रौत कर्मों का संक्षिप्त परिचय।*
*2 रुद्राभिषेक, नवग्रह शांति, सत्यनारायण व्रत कथा।*

*गीता प्रेस गोरखपुर की किसी भी दुकान पर - कोड 567 महामहोपाध्याय पं. श्रीकृष्णदत्त जी शास्त्री रचित और गीता प्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित स्मार्त कर्मकलाप या  गृहस्थ कर्मकलाप  मिल सकती है।*
*ऑनलाइन मंगाना चाहें तो --* *http://gitapress.org  से मंगवा सकते हैं।*
*पहले तो मुल्य लगभग ₹250/- या ₹300/- था।*

गुरुवार, 14 मई 2026

हिन्दू शब्द के अर्थ में मतभिन्नता पर मीमांसा।

क्या ऐसे सभी उदाहरण देखने के बाद भी यह स्वीकारना उचित होगा कि, तान्त्रिक नाथ, जैन, बौद्ध, खालसा, लिङ्गायत को सनातन वैदिक धर्मी माना जाए।
सिन्धु नदी के पूर्व में बसे गेहुंआ रङ्ग के लोगों के लिए ईरान के पारसियों के धर्मग्रन्थ जेन्द अवेस्ता में पारसियों के आचार्य जरुथ्रुस्ट द्वारा श्रीकृष्ण द्वेपायन व्यास जी (भगवान वेदव्यास जी) से हुए संवाद के प्रकरण में वेदव्यास जी के काले रङ्ग को देख कर पारसी भाषा में उन्हें हिन्दू कहा था। जैसे युरोपीय लोग भारतियों, अमेरिका और आस्ट्रेलिया के मूल निवासियों ब्लेक कहते हैं।
इस आधार पर ईरानी पारसी भारतियों को हिन्दू कहते थे। इसलिए अरबी जातियों के इस्लामी आक्रांताओं ने भी भारतियों को हिन्दू कहा।
संविधान ने गत तीन हजार वर्षों से भारत में निवास करने वाली सभी जातियों को हिन्दू कहा है। जिसमें टर्की से आकर बसे चन्द्रवंशी पुरु, यदु, तुर्वसु, अनु और दृह्यु की सन्तान, ईरानी परशु (पर्शियन), तिब्बती शक, कुषाण और मङ्गोलियाई हूण सम्मिलित हैं। फिर चाहे वे भारत में जन्मे तान्त्रिक नाथ, जैन, बौद्ध, खालसा या लिङ्गायत किसी भी पन्थ के अनुयाई हो; सभी को हिन्दू माना है। यहाँ हिन्दू से तात्पर्य दीर्घावधि से भारतीय भूमि में निवासरत और भारतीय मत, पन्थ और संस्कृति को अपना चुकी जनता से है।
जबकि, इस्लामी आक्रांताओं से बचकर भारत में बसे जरुथ्रुस्ट के अनुयाई पारसी, और अब्राहमिक मतावलम्बी यहुदी, ईसाई, मुस्लिम और बहाई पन्थ के लोगों को गैर हिन्दू कहा है।
तात्पर्य यह कि, भारतीय संविधान में हिन्दू शब्द मत, पन्थ, सम्प्रदाय के अर्थ में प्रयोग नहीं किया गया है। बल्कि मूल भारतीय जन के अर्थ में प्रयोग किया है।
जबकि सावरकर और हेडगॉवार, मुञ्जे, गोल वर्कर के अनुयाई हिन्दू महासभा, रा.स्व.से. संघ और उसके अनुशंङ्गी संगठन जनसंघ, विश्व हिन्दू परिषद, बजरङ्ग दल, भा. ज.पा. आदि सभी सङ्गठन विभाजन पश्चात वर्तमान भारत में रह रहे सभी भारतवासियों को हिन्दू कहते हैं।
रा. स्व. से. संघ का हिन्दू यथार्थवादी किसी भी सिद्धान्त से मैल नहीं खाता है। बल्कि शुद्ध काल्पनिक अवधारणा है।
किसी के कुछ भी मान लेने मात्र से सत्य नहीं बदल जाता।

अवतार रहस्य

जब दृढ़तापूर्वक वर्णाश्रम धर्म का पालन करने के उपरान्त जीवन मुक्त हुआ व्यवस्था सम्बन्धी विशेष योग्यता को धारी कोई पुरुष या स्त्री स्वैच्छिक रूप से वैकुण्ठ में किसी लोक विशेष में भविष्य में सृष्टि हित के किसी कार्य विशेष के सम्पादन के लिए अपना अस्तित्व बनाए रखता है। तब तदनुरूप परिस्थिति उत्पन्न होते ही ऋत की व्यवस्था के अनुसार वह मुक्त महापुरुष/स्त्री शरीर धारण कर मृत्युलोक में उतरता है उसे अवतरण कहते हैं, और उस महापुरुष/ स्त्री को अवतार कहते हैं।
उसके सहयोग हेतु देवताओं के लोक से कोई देवांश भूमि पर उतरते है।
ये पूरा समुह कुछ निर्धारित कार्य पूर्ण करने तक की समयावधि के लिए ही आते हैं और कार्य पूर्ण होने पर वापस अपने लोक में लौट जाते हैं।
इसमें कुछ अपवाद जो मृत्युलोक में ही कुछ कार्य शेष रहने के लिए रुकते भी हैं जैसे कल्कि अवतार को शास्त्रार्थ का शिक्षण प्रशिक्षण के लिए भगवान परशुराम जी अवतार का कार्यभार समाप्त होने पर भगवान श्री रामचन्द्र जी को अवतार का कार्यभार सोप कर स्वयम् तप करते हुए भूमि पर ही रहते हैं। और रुद्रांश हनुमानजी भी भूमि पर ही रह रहे हैं। ये चिरञ्जीवी कहलाते हैं।
जबकि काल के द्वारा कार्य पूर्ण होने का सन्देश देने पर भगवान श्री रामचन्द्र जी, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न तुरन्त साकेत लोक लौट गए। और बाली का ऋण उतारने का अन्तिम शेष कार्य पूर्ण कर जरा के रूप में जन्मे बाली के साधारण सा जहर बुझा तीर एड़ी में लगने पर अपनी लीला संवरण कर गोलोक पधार गये।
भगवान परशुराम और भगवान श्री राम आमने-सामने आने पर नहीं जानते थे कि, परशुरामजी का अवतारत्व वैष्णव धनुष हस्तान्तरण के माध्यम से श्री रामचन्द्र जी में समाहित हो जाएगा। और भगवान परशुराम केवल ऋषि रहकर तप करते हुए कल्कि अवतार को धनुर्वेद का शिक्षण प्रशिक्षण देने तक रुकेंगे।
भागवत पुराण के अनुसार द्वारिका के ब्राह्मण आठ पुत्रों को लेने पश्चिम सागर से होते हुए पाताल में नाग लोक में शेषनाग के महल में विराजमान अष्टभुजा धारी भगवान भूमा के समक्ष उपस्थित होने पर भगवान भूमा नारायण द्वारा बतलाया गया कि, हे कृष्ण तुम पिछले जन्म में नारायण ऋषि थे और अर्जुन नर नामक ऋषि थे। तुम दोनों ने नर नारायण पर्वत पर तप किया था। तुमसे मिलने के लिए इन ब्राह्मण बालकों को लाया गया था। तुम इन्हें लेजाकर ब्राह्मण को सोप दो।
ये सब तथ्य सिद्ध करते हैं कि, भगवान विष्णु और माया को या भगवान प्रभविष्णु और श्री लक्ष्मी को भगवान नारायण और नारायणी को या भगवान श्रीहरि और कमलासना गज सेवित कमला को भूमि पर जन्म नहीं लेना पड़ता है।
सभी अवतार अलग-अलग लोक से आये और वहीं वापस लौटे भी।
धर्म आधारित इसी व्यवस्था को अपनी-अपनी विचारधारा के अनुसार अलग-अलग नाम-रूपों में सभी पन्थों ने अपनाया।
जैनों ने अनीश्वरवादी विचारों के अनुकूल तीर्थंकर कहा। तो, बौद्धों ने भौतिक दृष्टिकोण से बोधिसत्व कहा। और अब्राहमिक मतावलम्बियों ने नबी कहा और खालसा पन्थ ने गुरु कहकर स्वीकारा।