सन्देह दूर होते ही सत्य सामने आने लगेगा। और सारे भ्रम दूर हो जाते हैं।
परमात्मा (असम्भुति) की उपासना सम्भव नहीं है, परब्रह्म परमेश्वर विष्णु माया के प्रति पूर्ण समर्पण के आगे या कहें बाद में कर्म शेष नहीं रहते। श्रीमद्भगवद्गीता द्वितीय अध्याय वाली (भगवान शंकराचार्य जी वाली नहीं) सन्यास निष्ठा जागृत हो जाती है।
इसलिए वह केवल लोकसंग्रह हेतु ही पञ्च महायज्ञ अष्टाङ्ग योग अभ्यास आदि जारी रखता है।
शरीर भोग पूरे करने हेतु सांसारिक कर्म और भोग ग्रहण जारी रखता है।
उसके लिए इन्द्रिय सुख-दुख कोई अस्तित्व नहीं रखते हैं।
फिर भी वह प्रकट नहीं करता।
शरीर है तो शरीर के गुण धर्म सब होंगे लेकिन उससे उसकी चित्तवृत्ति अप्रभावित रहती है।
बस यही वानप्रस्थ और संन्यासी में अन्तर है।
अविद्या अर्थात कर्मेंद्रियों से होने वाली क्रियाओं में अपना अहंकार जोड़कर उसे कर्म इसलिए नहीं बनने देता है क्योंकि वह जानता है कि, इन्द्रियाँ अपने अपने अर्थों में, विषयों में वरत रही है (व्यवहार कर रही है।)
और देवताओं की उपासना ब्रह्मचर्य आश्रम में उपवेदों का अध्ययन, प्रयोग और व्यवहार करते समय ही पूर्ण कर चुका। अब उन्हें यथासमय केवल इसलिए करता रहता है ताकि, यह स्मृति से न हटे और आवश्यक होने पर काम आये (कर्ण जैसी स्थिति नहीं हो) इसलिए कर्तव्य है।
[जैसे तन्त्र में उदृष्टका, एकाष्टका, पूर्णिमा, व्यष्टिका, अमावस्या, सायन संक्रान्ति और निरयन संक्रमण तथा सम्बन्धित नक्षत्र पर सूर्य और चन्द्रमा होने के समय तथा सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण के (दिन नहीं बल्कि) समय सिद्ध मन्त्र का जप करना पड़ता है।]
लेकिन यह कार्य वह लोकसंग्रह हेतु करता है न कि, स्वार्थ सिद्धि हेतु। इसलिए (कमाने-खाने वाले) कर्मेंद्रियों के कर्म अनासक्त भाव से कर्तव्य समझकर करता हुआ अन्धतम में प्रवेश नहीं करता अर्थात जड़ता को प्राप्त नहीं होता।
और निष्काम भाव से देवताओं की उपासना रूप विद्या की उपासना करते हुए भी उससे भी अधिक घोर अन्धकार में नहीं रहता है।
सम्भूति मतलब शरीर से लेकर सृष्टि पर्यन्त उत्पन्न होने वाले कार्यब्रह्म की उपासना इसलिए नहीं करता क्योंकि, केवल धनारर्जन से लेकर लोक विजय तक, सङ्ग्रह, संरक्षण से लेकर विस्तार तक और शारीरिक भोग से लेकर ब्रह्मलोक तक के भोगों में उसकी रुचि बहुत पहले ही वानप्रस्थ आश्रम में ही समाप्त हो चुकी होती है।
इसलिए उसे न इन्हें प्राप्त करने के लिए विद्या की उपासना (सकाम उपासना) की आवश्यकता रही और न ही इनमें कोई रुचि या आकर्षण बचा। अब उसे न किसी लोक वास में या किसी लोक का स्वामी बनने में कोई आकर्षण बचा। इसलिए वह अन्धकार में नहीं रहता।
और चूंकि वह जानता है कि, जैसे स्वयम को नमस्कार नहीं किया जा सकता उसी प्रकार द्वेत के अभाव में उस परब्रह्म परमेश्वर के भी कारण उस *परमात्मा की आराधना-उपासना सम्भव नहीं है।* इसलिए जानबूझ अन्धेकुए में कुदने जैसी गलती नहीं करता।
इसलिए वह घोर अन्धतम में प्रवेश नहीं करता।
चूंकि यह दर्शन वर्णाश्रम व्यवस्था वाले सनातन ब्राह्म धर्म का है इसलिए इसे जैन-बौद्ध और तन्त्र व्यवस्था के अन्तर्गत नहीं समझाया जा सकता है।
इसलिए वर्णाश्रम के साथ ही समझाया जा सकता है।
और वर्णाश्रम, कर्मफल, पुनर्जन्म न समझने वाले अब्राहमिक (अब्राह्मिक) तो समझ ही नहीं सकते।