बुधवार, 15 अप्रैल 2026

भुमध्य रेखा (इक्वेटर) अर्थात 00° अक्षांश, और प्राचीन काल में अवन्तिका पुरी से गुजरने वाली मध्याह्न रेखा (प्राइम मेरिडियन) थी जैसे वर्तमान में ग्रीनविच रेखा मध्याह्न रेखा (प्राइम मेरिडियन) है।

भुमध्य रेखा (इक्वेटर) अर्थात 00° अक्षांश, और प्राचीन काल में अवन्तिका पुरी से गुजरने वाली मध्याह्न रेखा (प्राइम मेरिडियन) थी जैसे वर्तमान में ग्रीनविच रेखा मध्याह्न रेखा (प्राइम मेरिडियन) है।


1 भूमध्य रेखा (Equator) पृथ्वी के बीचों-बीच 0° अक्षांश पर स्थित एक काल्पनिक रेखा है, जो पृथ्वी को उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध में विभाजित करती है। 
और


2 कर्क रेखा (Tropic of Cancer) उत्तरी गोलार्द्ध में भूमध्य रेखा (Equator) के समांतर 
 उत्तर में पश्चिम से पूर्व की ओर खींची गई एक काल्पनिक रेखा है।
ये दोनों समानांतर है।
इसलिए कभी क्रास नहीं हो सकती है।


3 ग्रीनविच रेखा (Prime Meridian) 
 देशांतर (longitude) पर स्थित एक काल्पनिक रेखा है, जो इंग्लैंड के लंदन में ग्रीनविच स्थित रॉयल ऑब्जर्वेटरी से होकर गुजरती है। यह दुनिया का मुख्य समय क्षेत्र (GMT) और अंतरराष्ट्रीय मानक समय निर्धारित करती है, जो पृथ्वी को पूर्वी और पश्चिमी गोलार्द्ध में बांटती है। 
प्राइम मेरिडियन (Prime Meridian) को हिंदी में प्रधान मध्याह्न रेखा या प्रधान याम्योत्तर कहा जाता है। यह 
 देशांतर (longitude) पर स्थित एक काल्पनिक रेखा है

4 ठीक ऐसे ही (ग्रीनविच नामक स्थान के समान ही) प्राचीन काल में उज्जैन से गुजरने वाली (Prime Meridian) 
 देशांतर (longitude) से दुनिया का मुख्य समय क्षेत्र अवन्तिका माध्य समय (AMT) और अंतरराष्ट्रीय मानक समय निर्धारित करती थी, जो पृथ्वी को पूर्वी और पश्चिमी गोलार्द्ध में बांटती थी। 

प्राचीन काल में उज्जैन से निकलने वाली देशान्तर रेखा 75:46 के मध्याह्न (मध्यम मध्याह्न) समय को ही विश्व का मानक समय मानकर अन्य देशों के मध्य से गुजरने वाली मध्याह्न रेखा के माध्यमिक मध्याह्न समय के अन्तर के आधार पर+ या - समयान्तर माना जाता था।
जैसे आजकल भारत की मध्याह्न रेखा ग्रीनविच (प्राइम मेरिडियन) रेखा से 82° 30' देशान्तर रेखा लिखते हैं। और ग्रीनविच माध्यमिक मध्याह्न से देशान्तर रेखा 
82° 30' का समयान्तर 05 घण्टे 30 मिनट लिखते हैं।
वैसे पहले उज्जैन से गुजरने वाली देशान्तर रेखा से करते थे। उस समय उज्जैन से गुजरने वाली देशान्तर रेखा को 00° देशान्तर रेखा कहते थे। जैसे आजकल पूर्व देशान्तर 75°46' कहते हैं।

5 अक्षांश रेखाएं परस्पर समानान्तर हैं। लेकिन देशान्तर रेखाएँ उत्तर ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव पर मिल जाती है इसलिए दो देशान्तर रेखाओं में भूमध्य रेखा पर सर्वाधिक दूरी 40,075 ÷ 360 = 111.319 किलोमीटर लगभग होती है। जबकि दोनों ध्रुवों पर शुन्य होती है।


6 दो अक्षांशों के बीच परस्पर दूरी --- पृथ्वी के अंडाकार (elliptical) आकार के कारण, भूमध्य रेखा पर अक्षांशों के बीच परस्पर दूरी थोड़ी कम (लगभग 110.57
 किमी) और ध्रुवों पर थोड़ी अधिक (लगभग-लगभग 111.7 किमी) होती है।

7 इक्वेटर (भू मध्य रेखा) और लाइन ऑफ केन्सर (कर्क रेखा) को उज्जैन से गुजरने वाली प्राचीन प्रधान याम्योत्तर मध्याह्न रेखा काटती है।
लेकिन भूमध्य रेखा (इक्वेटर) और कर्क रेखा (ट्रॉपिक ऑफ केन्सर) परस्पर समानान्तर होने से एक दुसरे को कभी नहीं काटती ।

उज्जैन से गुजरने वाली देशान्तर रेखापूर्व देशान्तर 75°46' कर्क रेखा को काटती है और भूमध्य रेखा को भी काटती है। 
गुजरने वाली देशान्तर रेखापूर्व देशान्तर 75°46' कर्क रेखा को काटती है और भूमध्य रेखा को जहाँ काटती उसी स्थान को लंकोदय कहते हैं। यहाँ आजकल कोई द्वीप नहीं है। पहले रहा होगा।

लेकिन भूमि पर वृत्त बनाने वाली भूमध्य रेखा और कर्क रेखा आपस में कभी नहीं मिलती। बल्कि भूमध्य रेखा और कर्क रेखा के बीच की सभी स्थानों पर दूरी लगभग 2,635 किलोमीटर ही रहती है।

8 नेताजी मेरिडियन और इक्वेटर का अलग-अलग अर्थ नही समझ पाये। और दोनों का अर्थ भूमध्य रेखा समझ बैठे। और 
 *कह गए कि, उज्जैन में भूमध्य रेखा और कर्क रेखा एक दूसरे को काटती है।*

मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

अक्षय तृतीया

आज के लगभग 2420 वर्ष पहले (लगभग 395 ईसापूर्व) कृतिका नक्षत्र के योग तारा (सात तारों में से मुख्य तारा) पर वसन्त सम्पात अर्थात वसन्त विषुव दिवस था। उस दिन उत्तर ध्रुव पर सूर्योदय और दक्षिण ध्रुव पर सूर्यास्त होता है। सूर्य भूमध्य रेखा से उत्तर दिशा में बढ़ने लगता है। दिन रात बराबर होते हैं और फिर उत्तरी गोलार्ध में दिन बढ़ने और रात छोटी होने लगती है। दक्षिण गोलार्ध में इससे विपरीत दिन छोटे और रात बड़ी होने लगती है।

जिस दिन उक्त योग बना उस दिन वैशाख शुक्ल तृतीया तिथि थी।
इसलिए वैशाख शुक्ल तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया कहा गया।
तभी से अक्षय तृतीया का पर्व मनाया जा रहा है।
गणना अनुसार त्रेतायुग का प्रारम्भ भी अक्षय तृतीया को हुआ था।

युगादि भी होने के कारण इस पर्व का महत्व और भी बढ़ गया।
युगादि तिथियों में स्नान श्राद्ध - तर्पणादि और दान किया जाता है। 
वसन्त विषुव अर्थात वैदिक नव संवत्सर प्रारम्भ दिवस होने से कृषक लोग भूमि का बंटवारा अक्षय तृतीया को ही करते हैं।
इस दिन पूरे दिन मुहुर्त शुभ माना जाता है।

*अक्षय तृतीया और परशुराम जयन्ती 19 अप्रैल 2026 रविवार को है।*
इन्दौर में 
सूर्योदय 06:04 बजे होगा।
मध्यान्ह 12:26 बजे होगा।
मध्याह्न काल 11:10 बजे से 01:42 बजे तक रहेगा।
सूर्यास्त 06:47 बजे होगा।
गोधुलि वेला 06:47 से 07:10 बजे तक रहेगी।

सायं सन्ध्या 06:47 से 07:55 बजे तक रहेगी।
प्रदोषकाल 06:47 हे रात 09:03 बजे तक रहेगा।

तृतीया तिथि 19 अप्रैल 2026 रविवार को दिन में 10:49 बजे से 20 अप्रैल 2026 सोमवार को प्रातः 07:27 बजे तक रहेगी।

*अक्षय तृतीया 20 अप्रैल 2026 सोमवार को क्यों नहीं।* 
*स्पष्टीकरण* 

*20 अप्रैल 2026 सोमवार को तृतीया तिथि 7:27 बजे तक रहेगी।* 

20 अप्रैल 2026 सोमवार को इन्दौर में उपरी कोर दृष्य 
सूर्योदय 06:02:27
सूर्यास्त 18:49:38
दिनमान 12:46:10
प्रातः काल 12:46:10÷5= 02:33:14

*प्रातः काल सूर्योदय 06:02:27 बजे से 08:35:41 बजे तक रहेगा।*

जबकि शास्त्रीय *नियमानुसार तो उदिया तृतीया यदि तीन मुहूर्त अर्थात 06 घटि अर्थात प्रातः काल के बाद तक हो तभी अक्षय तृतीया के रूप में मान्य है।*
*इसलिए प्रातः काल समाप्ति 08:36 बजे के भी 01 घण्टा 09 मिनट पहले (02 घटि 52 पल 30 विपल) पहले ही 07:27 बजे समाप्त हो जाने वाली तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया कैसे माना जा सकता है?*
दुसरा 
*युगादि पर किया जाने वाला श्राद्ध तर्पण अपराह्न व्यापी तृतीया में ही हो सकता है। जबकि तृतीया तिथि प्रातः काल में ही समाप्त हो चुकी होगी।*
श्राद्ध में उदिया तिथि का कोई महत्व नहीं होता है। अपराह्न काल वाली तिथि ही मान्य होती है।

वैदिक काल में असमान क्षेत्र वाले नक्षत्र और मधु, माधव आदि महिनों के नाम से ही जानी जाने वाली तीस-तीस अंशो वाली सायन प्रधि (प्रधियाँ) ही प्रचलित थी (जिसे आजकल सायन राशियाँ कहा जाता है।)

*भारत में विक्रमादित्य के समय आचार्य वराहमिहिर ने 13°20' के समान क्षेत्र वाले नक्षत्र, और पश्चिम टर्की, इराक के बेबीलोन और मिश्र में प्रचलित पशुओं की आकृति वाली समान तीस-तीस अंशो वाली निरयन मेषादि राशियों तथा रविवार आदि वारों का प्रचलन प्रारम्भ किया। इसके पहले मेष वृषभादि निरयन राशियाँ, 13°20' के समान भोग वाले नक्षत्र और सोमवार/ बुधवार भारत में कोई नहीं जानता था।*
*अतः सोमवार बुधवार को पढ़ने वाली तृतीया विशेष पुण्यदाई मानना केवल पौराणिक परम्परा है। श्रोत/ स्मार्त मत नहीं है।*

*अक्षय तृतीया पर विवाह करने वालों को रिक्ता तिथि चतुर्थी में विवाह करना पड़ेगा यह भी एक मुद्दा है, लेकिन अक्षय तृतीया पर विवाह शास्त्रीय मत न होकर केवल परम्परा मात्र है इसलिए विचारणीय नहीं है। फिर भी समस्या तो है ही।*
ध्यान रखें श्रोत - स्मार्त मतानुसार सर्वकालिक तिथि ही महत्व रखती है।
*जहाँ उदिया तिथि ग्राह्य होती है वहाँ भी शाकल्यपादिता तिथि अर्थात तीन मुहूर्त अर्थात छः घटि तक (सूर्योदय के बाद 02 घण्टे 24 मिनट तक) रहे तभी मान्य होती है।* 
वास्तव में तो दिनमान को पाँच से भाग देकर (दिनमान÷5=) तीन मुहूर्त या छः घटि निकालते हैं।
*20 अप्रैल 2026 को तृतीया तिथि सूर्योदय के बाद केवल 03 घटि 32 पल तक ही रहेगी।* अर्थात दो मुहूर्त भी नहीं है।
*जबकि 19 अप्रैल 2026 रविवार को तृतीया तिथि दिन में 10:49 बजे लगेगी। अतः मध्याह्न व्यापी, अपराह्न व्यापी प्रदोषकाल व्यापी तथा पूर्ण रात्रि व्यापी तिथि है।*
*अतः अक्षय तृतीया 19 अप्रैल 2026 रविवार को ही है।*

सोमवार, 13 अप्रैल 2026

निरयन मेष संक्रमण से नक्षत्रीय नव संवत्सर युधिष्ठिर संवत और विक्रम संवत का प्रारम्भ।

*युधिष्ठिर संवत 5163 विक्रम संवत 2083 का प्रारम्भ, वैशाखी, निरयन मेष संक्रमण 14 अप्रैल 2026 मङ्गलवार को प्रातः 09:33 बजे होगा।*
*पुण्यकाल सूर्योदय समय (इन्दौर में 06:21 बजे से) दोपहर 12:45 बजे तक रहेगा।* 
*धार्मिक प्रयोजन मे युधिष्ठिर संवत 5163 विक्रम संवत 2083 का प्रारम्भ निरयन मेष संक्रमण के समय दिन में 09:33 बजे से होगा।*
*लेकिन व्यवहार में सूर्योदय से ही लागू होगा। इन्दौर में सूर्योदय समय 06:21 बजे होगा ‌।*

वैशाखी पर्व भी 14 अप्रैल मङ्गलवार को है। यह खालसा पन्थ की बैसाखी से मिलता है, लेकिन खालसा पन्थ नानक पन्थी पञ्चाङ्ग के आधार पर अमृतसर के लिए बैसाखी निर्धारित करते हैं।

*ब्राह्मण ग्रंथों और श्रोत सूत्र -गृह्य सूत्र ग्रन्थों में क्रान्ति वृत के ठीक मध्य में चित्रा तारे को माना गया है। अर्थात चित्रा तारे को भूमि द्वारा सूर्य के परिभ्रमण पथ के ठीक मध्य में अर्थात 180° पर माना गया है। इसलिए क्रान्तिवृत और नक्षत्र पट्टी का प्रारम्भ बिन्दु चित्रा तारे से 180° पर माना गया है। यही अश्विनी नक्षत्र का प्रारम्भ बिन्दु होता है। इसे निरयन मेषादि बिन्दु पर भी कहते हैं।*

*आकाश का नित्य अवलोकन करने वाले किसान आदि और तारों (Star's) को पहचानने वाले खगोल शास्त्री आकाश में देख सकते हैं कि, निरयन मेष संक्रमण/ वैशाखी (14 अप्रैल) को सूर्योदय के ठीक पहले चित्रा तारा पश्चिम में अस्त हो रहा होगा। और सूर्यास्त के ठीक बाद में चित्रा तारा पूर्व में उदय हो रहा होगा। यह नक्षत्रीय नव संवत्सर प्रारम्भ होने की पहचान है।*

*पञ्जाब हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उड़ीसा और नेपाल में जिन दो सूर्योदय के बीच निरयन मेष संक्रमण होता है उसी दिन वैशाखी से नव वर्ष मनाते हैं। चूंकि मङ्गलवार और बुधवार के सूर्योदय के बीच निरयन मेष संक्रमण होगा इसलिए 14 अप्रैल 2026 मङ्गलवार को सूर्योदय के समय वैशाखी से नव वर्ष मनाते हैं। इसी दिन यहाँ विक्रम संवत 2083 का प्रारम्भ होगा।*
*उत्तर प्रदेश में सतुआ संक्रान्ति कहते हैं।*

*बङ्गाल और असम में में जिन दो मध्यरात्रियों के बीच में निरयन मेष संक्रमण होता है उसके आधार पर नववर्ष प्रारम्भ करते हैं। चुंकि,13 उपरान्त 14 अप्रैल 2026 सोमवार Tuesday को मध्यरात्रि के बाद मेष संक्रमण होगा इसलिए बङ्गाल में नबा वर्ष पाहेला बोईशाख 14 अप्रैल 2026 मङ्गलवार से प्रारम्भ होगा। बङ्गाल में लोग परस्पर सुभो नोबो बोरशो कह कर बधाई देते हैं।*

*उड़ीसा में 14 अप्रैल से पणा संक्रान्ति या महा बिशुबा के रूप में नव वर्ष मनाएंगे।*

*त्रिपुरा में भी 14 अप्रैल को निरयन मेष संक्रमण से ही नव वर्ष प्रारम्भ होता है।*

*असम में निरयन मेष संक्रमण 14 अप्रैल से ही बिहू या बोहाग बिहू और रोंगोली बिहू नाम से नव वर्ष मनाएंगे। बोहाग बिहु का प्रथम दिन गोरू बिहू कहलाता है।*

*तमिल नाडु में सोमवार को सूर्यास्त के बाद निरयन मेष संक्रमण होने के कारण तमिल नाडु में 14 अप्रैल 2025 से पथाण्डु के नाम से नव वर्ष मनाएंगे।*
पुडुचेरी में भी तमिलनाडु के समान ही निरयन मेष संक्रमण दिवस से ही नव वर्ष मनाते हैं।

*सोमवार को सूर्योदय पश्चात 18 घटि अर्थात 07 घणटे 12 मिनट के बाद निरयन मेष संक्रमण होने से केरलम में 14 अप्रैल को विषुकानी नाम से नववर्ष मनाएंगे।*

इसके अलावा श्रीलङ्का, म्यांमार, कम्बोडिया, लाओस, थाईलैंड और सिङ्गापूर में बसे तमिल, मलयाली जन भी निरयन मेष संक्रमण के दिन से ही नववर्ष प्रारम्भ करते हैं।

अर्थात *सातवाहन वंश और शक और कुषाणों द्वारा शासित पश्चिम भारत और मध्य भारत के पौराणिक मतावलम्बियों को छोड़कर शेष उत्तर भारत, पूर्वी भारत, और दक्षिण भारत में तथा बाङ्ग्ला देश, श्रीलङ्का, म्यांमार, कम्बोडिया, लाओस, थाईलैंड और सिङ्गापूर में बसे तमिल, मलयाली जन भी निरयन सौर संक्रमण से प्रारम्भ होने वाला नव संवत्सर और मेष-वृषभादि मास तथा वैशाखी, विषु, माघ बिहू आदि पर्व मनाते हैं।*

बुधवार, 8 अप्रैल 2026

भारत पर विदेशी शासन का संक्षिप्त इतिहास।

धर्म की रक्षा करने से धर्म भी रक्षा करता है।
वैदिक वर्णश्रम धर्म छोड़कर जाति प्रथा अपनाई, पञ्च महायज्ञ छोड़कर जैनों और बौद्धों की नकल कर मठ, मन्दिर में मूर्ति पूजा प्रारम्भ कर दी तो देश से अफगानिस्तान, तध्य और पूर्वी तुर्किस्तान, तिब्बत, म्यांमार, श्री लङ्का सब कट गये। और अन्त में 1947 में पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बाङ्लादेश) और पश्चिमी पाकिस्तान कट गये।
सर्वप्रथम दिवोदास और सुदासद के समय टर्की (तुर्किये) से चन्द्र वंशी और सीरिया से नाग वंशी आये और दशराज युद्ध के समय उत्तर में तुर्किस्तान (ब्रह्मावर्त) भारत से कट गया।
 महाभारत काल में ही इराक के असूर धर्म से संस्कारित जरुथ्रुस्ट ने ईरान मे पारसी मत चलाकर सनातन वैदिक वर्णश्रम धर्म को हानि पहूँचाई। ईरान में पारसी मत ने सनातन वैदिक वर्णश्रम धर्म को समाप्त कर दिया। और ईरान भारत से कट गया।
श्रमण मत के जैन पन्थ और 1857 ईसा पूर्व में बौद्ध पन्थ का उदय हुआ। उन्होंने सनातन वर्णाश्रम वैदिक धर्म का नाश किया। मङ्गोलिया भारत से कट गया। और तिब्बत भी लगभग-लगभग कट ही गया।
भगवान श्रीकृष्ण पर आक्रमण करने के लिए यमन से काल यमन को आमन्त्रित करने वाला जरासन्ध चन्द्रवंशी यादव था।
जब 550 ईसापूर्व में पारसी (कुरेश)का आक्रमण हुआ, अफगानिस्तान तक पारसी धर्म फैल गया। 
फिर भारत खण्ड-खण्ब होने लगै।
326 ईस्वी पूर्व सिकन्दर के आक्रम से उत्तर पश्चिम प्रान्त कट गया। पश्चिम को भारत की फूट परस्ती पता चल गई।
123 ई.पू. से 200 ई. तक शको ने भारत पर आक्रमण किया।
60 से 240ई.तक कुषाणो ने भारत पर आक्रमण किया।।
और 425ई. से 500ईस्वी तक हूणो ने भारत पर आक्रमण किया। 

1200 ईस्वी पूर्व मूसा के समय और 2000 वर्ष पहले यीशु के साथ कश्मीर और त्रिपुरा में यहुदी बस गए और भारत में अब्राहमिक मत का प्रारम्भ हुआ। फिर यीशु के शिष्य सेंट थॉमस (थोमा) ने 52 ईस्वी में केरल के कोडुंगल्लूर (मुज़िरिस) के पास मल्यान्कारा (Maliankara) में भारत के पहले चर्च की स्थापना की थी। उन्होंने केरल और तमिलनाडु के तटीय क्षेत्रों में कुल सात और आधे चर्च (एझरा पल्ली) स्थापित किए, जिनमें से पलयार, कोट्टाकावू, और निरनम प्रमुख हैं।
सनातन वैदिक वर्णाश्रम धर्म पर हमले बढ़ गये।
सन 622 में सऊदी अरब में इस्लाम की स्थापना के समय से मोहमद ने अपने अनुयायियों को गजवा ए हिन्द का लक्ष्य दिया। और इराक के खलिफा ने गजवा ए हिन्द के लक्ष्य प्राप्ति के लिए सन 638 से 711 के 74 वर्षा में इराक के नौ खलिफाओं ने 15 बार सिन्ध पर आक्रमण किया। 
24 जून 1206 को दिल्ली पर कुतुबुद्दीन ऐबक ने इस्लामी सत्ता स्थापित की।
20 मई 1498 से केरलम के कोळीकोट बन्दरगाह पर पुर्तगाली (वास्को डी गामा) के द्वारा युरोपीयन का आक्रमण प्रारम्भ हुआ।
1605 से 1885 तक नीदरलैंड्स के डचों का प्रभुत्व रहा।
1664 में फ्रेंच भारत आये 1668 में पहली फैक्ट्री खोली, और 1673 से पाण्डु चेरी में शासन करने लगे।
1600 में अंग्रेज भारत आये और 1665 से राज करने लगे।
 इस समय न गांधी न कम्युनिस्ट और न कांग्रेस का जन्म हुआ था।
तब हमारी राष्ट्रियता को किसने क्षति पहूँचाई थी?

मंगलवार, 7 अप्रैल 2026

पौराणिकों के झूठ।

पौराणिकों पर अब्राहमिक मत विशेषकर ईस लाम का कितना प्रभाव था यह इस बात से स्पष्ट होता है कि, याहवेह किसी लोक विशेष में रहता है और मूसा को दस नियम (कानून) लिखित शिलालेख देने नीचे उतरा था।
ऐसे ही अल्लाह से मिलने येरुशलम से बुर्राक नामक गधी पर बैठ कर मोह मद गया था।
चार फ़रिश्ते अल्लाह का सिंहासन उठाये रहते हैं।
फिर वह एकदेशीय जीव निराकार कैसे हो सकता है।
लेकिन अब्राहमिक मतावलम्बी उसे निराकार कहते हैं।
ऐसी ही बुद्धी हीनता पौराणिकों ने दर्शाई।
सर्वव्यापी विष्णु, नार (प्रकृति या जल) पर अयन करने वाले एक देशी नारायण को एक ही व्यक्ति बतला दिया।
वत्रासुर, शम्भर आदि अनेक असुरों, दैत्यों का वध करने वाले इन्द्र को सदा पराजित होने वाला बतला दिया। और परेशान देवताओं की सहायतार्थ श्री हरि को पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ता है। वह भी एक छोटे से क्षेत्र लङ्का द्वीप/ लङ्का पुरी, मथुरा के राजाओं को मारने के लिए!
पञ्च मुखी (अण्डाकार) हिरण्यगर्भ ब्रह्मा और चतुर्मुख प्रजापति ब्रह्मा को एक बतलाने के लिए रुद्र के हाथों ब्रह्मा का सिर कटवा दिया।
उसके पीछे भी अनेक कारण जोड़ लिए।
1 वाणी-हिरण्यगर्भ ब्रह्मा की मानस सन्तान प्रजापति ब्रह्मा और सरस्वती। अर्थात प्रजापति की शक्ति सरस्वती।
सरस्वती को देख कर प्रजापति कामुक हो गये और (उषा के पीछे-पीछे सूर्य के रूपक से) सरस्वती के पीछे प्रजापति ब्रह्मा दौड़े। इस लिए रुद्र ने एक सिर काट डाला।
हिरण्यगर्भ ब्रह्मा का ऊपरी सिरा वेद विरुद्ध असुरों के हित में मन्त्रोच्चार कर रहा था इसलिए तन्त्र रचियता रुद्र ने तान्त्रिक क्रिया करने के आरोप में ब्रह्मा का ऊपरी सिर काट डाला।
ज्योतिर्लिङ्ग का सिरा नहीं खोज पाने के बाद भी खोज लिया कहकर झूठ बोलने वाला सिर काट डाला।
अपराधी को दण्ड देने से रुद्र को ब्रह्म हत्या का पाप के रूप में वह ब्रह्मशिर चिपक गया।
इतनी बे-सिर-पैर की कल्पना सनातन वैदिक धर्म में घुसा दी। इन पौराणिकों से बड़ा पापी और कौन हो सकता है।
जिन्होंने सती के आत्मदाह की झूठी कहानी गढ़ी। देवी देवता अमर होते हैं तो सती मर कैसे गई?
महा विशविज्ञानी भगवान शंकरजी सती की मृत्यु से विक्षिप्त कैसे हो सकते है?
शंकर जी ने सती की भस्मीभूत देह का शव कन्धे पर कैसे लटकाया?
शंकर जी के कन्धे पर टंगी सड़ी गली लाश के इक्कावन टूकड़े क्यों करना पड़े? वो भी भगवान विष्णु को!
शंकर जी को तब तक भी होंश नहीं आना भी आश्चर्य जनक है।
देवी सती का पुनर्जन्म भी हुआ!
हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के मानस पुत्र कामदेव को भी भस्म कर दिया!
कामदेव का भी पुनर्जन्म हुआ। 
पतिव्रता नारी रतिदेवी ने कामदेव के दुसरे जन्म वाले स्वरूप को भी अपना पति मान लिया!
शंकर भगवान को नशेड़ी बतला दिया।
वैरागी भगवान शंकरजी और योगेश्वर श्रीकृष्ण को कामुक बतला दिया। ब्रह्मचारी हनुमानजी का गुरु की पुत्री से विवाह करवा दिया और पसीने से मछली को गर्भवती होना भी बतला दिया। और मकर ध्वज को पुत्र बतला दिया।

इतने झूठ तो कोई बड़ा अपराधी भी नहीं बोलता होगा।

सोमवार, 6 अप्रैल 2026

महाभारत के अनुसार दक्ष द्वितीय के यज्ञ मे सती ने आत्मदाह नहीं किया। बल्कि शंकर-पार्वती दक्ष यज्ञ में साथ में गये थे और साथ में ही सहर्ष लौट आये।

*प्रचेताओं के पुत्र दक्ष द्वितीय की पुत्री सती पार्वती ने दक्ष यज्ञ में आत्मदाह नहीं किया। वे जीवित ही शंकर जी के साथ कैलाश लौटी थी।*
*यदि दक्ष यज्ञ में सती आत्मदाह करती, सती का पुनर्जन्म होता और पार्वती के रूप में शंकर जी से विवाह होता तो वाल्मीकि भी रामायण में कुछ तो उल्लेख करते ही।*
*कृपया गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित महाभारत पञ्चम खण्ड,शान्ति पर्व/ मौक्ष पर्व/ अध्याय २८४ पृष्ठ ५१६६ या संक्षिप्त महाभारत का पृष्ठ १२८१ देखें।*
*महाभारत में  उल्लेखित दक्षयज्ञ विध्वंस की कथा के अनुसार प्रचेताओं के पुत्र दक्ष द्वितीय  द्वारा किए गए यज्ञ में सभी देवताओं और ऋषियों को बुलाया लेकिन शंकर पार्वती को नहीं बुलाया।*
*देवताओं को समुह में जाते देख पार्वती ने शंकर जी से पुछा, तब शंकर जी ने पार्वती को बतलाया कि, दक्ष (द्वितीय) यज्ञ कर रहे हैं, उसमें उनके निमन्त्रण / आह्वान पर देवता यज्ञभाग लेने जा रहे हैं।*
*पार्वती द्वारा यह आपत्ति जताई कि, आप रुद्र को यज्ञभाग लेने हेतु क्यों आमन्त्रित नहीं किया गया।*
*तब शंकर जी बतलाते हैं कि, इसमें दक्ष का कोई दोष नहीं है। सृष्टि के आदि में प्रजापति ब्रह्मा ने रुद्र को यज्ञभाग न देने का विधान किया गया था। इसलिए मुझे नहीं बुलाया।*
*दक्ष द्वारा यज्ञ में न बुलाने और यज्ञभाग न देने की जानकारी से रुष्ट पार्वती (न कि, सती) को साथ लेकर स्वयम् शंकर जी दक्ष यज्ञ स्थल पर गये। वहाँ पार्वती अपनी नाराज़गी प्रकट करती है। केवल दधीचि पार्वती का समर्थन करते हैं। शेष सब मौन ही रहते हैं। दक्ष पर पार्वती के रोष का कोई प्रभाव न देखकर पार्वती जी और रुष्ट हो गई। इसे देखकर शंकरजी ने वीरभद्र और भद्रकाली का आह्वान किया। और वीरभद्र और भद्रकाली को दक्षयज्ञ विध्वंस का आदेश दिया। वीरभद्र और भद्रकाली को दक्षयज्ञ विध्वंस कर दक्ष द्वितीय का सिर काट दिया। और देवताओं को भी प्रताड़ित किया।*
*फिर प्रजापति ब्रह्मा ने नियमों में संशोधन कर भविष्य में रुद्र को यज्ञभाग देने का नियम बना दिया तब, शंकर जी ने दक्ष द्वितीय को पुनर्जीवित किया। और सहर्ष पार्वती जी को लेकर वापस लौट गए।*
*क्या महाभारत ग्रन्थ गलत है?  यदि शिव पुराण सही है तो महाभारत गलत है। शिव पुराण गलत है।*
*शिवपुराण जो वस्तूतः वायु पुराण की रुद्र संहिता नामक अध्याय है, गलत है।* 
 *क्योंकि वायु पुराण में महाभारत के पश्चात आधुनिक काल की रचना है। वायु पुराण में आधुनिक काल तक के भारत के अधिकांश राजवंशों और राजाओं का इतिहास दिया है। मतलब अत्यधिक नवीनतम रचना है।* अतः 
*वरीयता तो प्राचीन ग्रन्थ महाभारत की ही रहेगी।*
*अतः महाभारत में वर्णित तथ्य ही सही है कि,प्रचेताओं के पुत्र दक्ष द्वितीय की पुत्री सती पार्वती ने दक्ष यज्ञ में आत्मदाह नहीं किया। वे जीवित ही शंकर जी के साथ कैलाश लौटी थी।*
*इसलिए सती की भस्मीभूत देह को लेकर शंकर जी द्वारा विक्षिप्त होकर पूरे भारत वर्ष में भ्रमण करना भी गलत ही है। भगवान विष्णु द्वारा शंकर भगवान के कन्धे पर लटकी सती की भस्मीभूत देह के इक्कावन टूकड़े करना भी गलत है। सती के भस्मीभूत देह के टुकड़े भारत भूमि पर जहाँ- जहाँ गिरे वहाँ-वहाँ शक्तिपीठ बनना भी गलत है।*
*पौराणिकों ने देवी सती की मृत्यु होना बतला दिया, जबकि शंकर-पार्वती देवता हैं अतः एक मन्वन्तर आयु वाले हैं। अर्थात अमर हैं।*
*यदि सती जलकर भस्म हो गई थी तो उनकी मृत देह कहाँ से आ गई?*
 *पौराणिकों ने भगवान शंकर को विक्षिप्त होना बतला दिया। जबकि वे महान विश विज्ञानी और वितरागी/ वैराग्यवान हैं। उन्हें कैसा शौक और कैसा मोह।*
*पौराणिकों ने भगवान विष्णु द्वारा मृत देह के इक्कावन टूकड़े करने वाला बतला दिया।*
क्या ऐसा पुराण और पौराणिक कथा सही हो सकती है? या केवल सनातन वैदिक धर्म के देवी देवताओं का अपमान करने के उद्देश्य से रची गई बौद्ध रचना है?*
*ध्यान रखें बौद्ध मत की वज्रयान शाखा के तान्त्रिक बौद्धों में ऐसी ही कथा/ कहानियाँ और मठ- मन्दिर पाये जाते हैं। वैदिक धर्म में नहीं।* 

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

मानव योनि श्रेष्ठतम है।

वाल्मीकि रामायण में बाली, सुग्रीव, हनुमान जी, अङ्गद आदि ने कई बार स्वयम् को मानवों से निम्नतर योनि कहा है।
मानवों से उच्चतर केवल देवताओं को ही माना गया है।
गन्धर्व भी मूलतः मानव जाति के ही थे। इनमेऔ कुछ देवताओं की सन्निधि पाकर देव गन्धर्व कहलाये। जैसे मानवों में भी कई ऋषि, राजन आदि देवताओं के निकटतम सम्पर्क में ही नहीं थे अपितु भ्रगु जैसे ऋषिगण तो देवताओं को छोड़ों देवों को भी दण्डित करते थे।
महाराजा रैवत तो पुत्री को भी ब्रह्मा जी के लोक में ले गए थे। मान्धाता, दीलिप, रघु, दशरथ, महाराज मुचुकुंद आदि देवासुर संग्राम में देवताओं के पक्ष में लड़ते थे।
यक्षों (मङ्गोल) और राक्षसों (निग्रो) को बन्धु (भाई) माना जाता है। लेकिन यक्षराज मणिभद्र और शंकरजी के मित्र कुबेर जैसे कुछ यक्ष देवयक्ष कहलाते हैं। लेकिन ये अपवाद ही होते हैं।
यों तो हम (नागपाल, नागरथ सरनेम वाले कालबेलिया) नागों की भी पूजा करते हैं। गो माता की भी पूजा करते हैं। पीपल आदि वृक्षों की भी पूजा करते हैं। लेकिन इन सब योनियों से मानव योनि श्रेष्ठतम है।