बुधवार, 27 मई 2026

शान्ताकारम भुजगशयन विष्णु स्तुति।

 


*शान्ताकारम् भुजगशयनम् पद्मनाभम् सुरेशम्विश्वाधारम् गगनसदृशम् मेघवर्णम् शुभाङ्गम्।लक्ष्मीकान्तम् कमलनयनम् योगिभिर्ध्यानगम्यम्वन्दे विष्णुम् भवभयहरम् सर्वलोकैकनाथम्॥*

यह श्लोक वेद, ब्राह्मण ग्रन्थों, सूत्र ग्रन्थों में रामायण महाभारत या पुराणों में नहीं मिलता है।
लेकिन सर्वप्रिय विष्णु स्तुति है।


 इसमें प्रायः अधिकांश लोग "योगिभिर्ध्यानगम्य्म" का सही उच्चारण नहीं कर पाते हैं
सही उच्चारण के लिए अन्वय करके सीख सकते हैं।
*योगिभिर्ध्यानगम्य्म् ।*
*योगिभिः ध्यान गम्यम्।*
*योगिभि र् ध्यान गम्यम्।*

शान्ताकारम् भुजग शयनम् पद्मनाभम् सुरेशम्

 विश्वाधारम् गगन सदृशम् मेघवर्णम् शुभाङ्गम्।

लक्ष्मीकान्तम् कमलनयनम्

 योगिभि र् ध्यान गम्यम्  वन्दे विष्णुम्

 भवभय हरम् सर्वलोक एक नाथम्॥

स्मार्त गृहस्थों के लिए शुद्ध हिन्दी में लिखित पास्कर गृह्यसूत्र, मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति आदि के प्रमाण सहित कर्मकाण्ड का सम्पूर्ण ग्रन्थ स्मार्त कर्मकलाप या गृहस्थ कर्मकलाप ग्रन्थ।

*महामहोपाध्याय पं. श्रीकृष्णदत्त जी शास्त्री रचित और गीता प्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित स्मार्त कर्मकलाप या  गृहस्थ कर्मकलाप में प्रत्येक विधि के साथ मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य, पारस्कर गृह्यसूत्र आदि के प्रमाण सहित संस्कृत मंत्रों के साथ सरल हिन्दी में अर्थ सहित हिन्दी में लिखा गया गृहस्थों के लिए सम्पूर्ण कर्मकांड का लगभग 900-1000 पृष्ठ का वृहद ग्रंथ विश्वकोश है।*
*काशी के विद्वान अग्निहोत्री पं. प्रभुदत्त जी शास्त्री ने भी गीता प्रेस की विश्वसनीयता के साथ स्मार्त कर्मकलाप या  गृहस्थ कर्मकलाप की प्रशंसा की थी।*
*पहले कर्मकांड की सारी पुस्तकें संस्कृत में पद्धति रूप में थीं। पुरोहितों के अलावा कोई समझ नहीं पाता था।*

*महामहोपाध्याय पं. श्रीकृष्णदत्त जी शास्त्री ने कर्मकलाप में पहली बार हर विधि को हिन्दी में समझाकर लिखा लगभग 900 पृष्ठों का प्रामाणिक ग्रन्थ है।*
*लेखक पं. श्रीकृष्णदत्त जी ने स्वयं लिखा है कि;*
 *"संस्कृत न जानने वाले हिन्दी पढ़े-लिखे गृहस्थ भी सारे कर्मकांड समझ सकें, इसलिए मैंने यह ग्रंथ लिखा। इसके बिना कर्मकांड अधूरा ही रह जाता है।"* 
*पुरोहित न मिले तो भी सामान्य गृहस्थ स्वयम् पढ़कर कर्म कर सकते हैं।*

*स्मार्त कर्मकलाप या गृहस्थ कर्मकलाप ग्रंथ की संक्षिप्त विषय सूची ---*
*कर्मकलाप में जन्म से मृत्यु तक के सारे संस्कार और नित्य-नैमित्तिक कर्म हैं।*
*प्रथम खण्ड  -- नित्य कर्म।*
*1  प्रातः स्मरण, शौच, स्नान विधि।*
*2 संध्योपासन -- त्रिकाल संध्या, गायत्री जप, तर्पण।*
*3 पंचदेव पूजा, तुलसी-शालिग्राम पूजा।*
*4 बलिवैश्वदेव, भोजन विधि, शयन विधि।*

*द्वितीय खण्ड -- षोडश संस्कार।*
*1 गर्भाधान से अन्त्येष्टि तक षोडष संस्कार --* 
*नामकरण, अन्नप्राशन, मुंडन, यज्ञोपवीत, विवाह आदि सभी संस्कार।*
*2 हिन्दी में प्रत्येक संस्कार की सामग्री सूची, मंत्र, विधि, प्रयोजन।

*तृतीय खण्ड -- व्रत-पर्व-त्योहार*
*1 एकादशी, पूर्णिमा, अमावस्या, संक्रांति व्रत।*
*2 गणेश चतुर्थी, नवरात्र, दीपावली, होली, शिवरात्रि - पूजा विधि, कथा, उद्यापन।*

*चतुर्थ खण्ड --  श्राद्ध-तर्पण।*
*1 एकोदिष्ट, पार्वण, महालय श्राद्ध विधि।*
*2 पिंडदान, ब्राह्मण भोजन, गया श्राद्ध का महत्त्व।*

*पञ्चम खण्ड--- ज्योतिष प्रकरण।*

*1 गणित ज्योतिष--* *तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण आदि पंचांग देखना,* 
*2 फलित ज्योतिष --* 
*मुहूर्त, कुंडली के मूल सिद्धांत, ग्रह शांति।*
*3 यात्रा, गृह प्रवेश, विवाह मुहूर्त कैसे निकालें।*

*षष्ठ खण्ड --*  
*वैदिक कर्मकांड।*
*1 अग्निहोत्र, दर्श-पौर्णमास आदि श्रौत कर्मों का संक्षिप्त परिचय।*
*2 रुद्राभिषेक, नवग्रह शांति, सत्यनारायण व्रत कथा।*

*गीता प्रेस गोरखपुर की किसी भी दुकान पर - कोड 567 महामहोपाध्याय पं. श्रीकृष्णदत्त जी शास्त्री रचित और गीता प्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित स्मार्त कर्मकलाप या  गृहस्थ कर्मकलाप  मिल सकती है।*
*ऑनलाइन मंगाना चाहें तो --* *http://gitapress.org  से मंगवा सकते हैं।*
*पहले तो मुल्य लगभग ₹250/- या ₹300/- था।*

गुरुवार, 14 मई 2026

हिन्दू शब्द के अर्थ में मतभिन्नता पर मीमांसा।

क्या ऐसे सभी उदाहरण देखने के बाद भी यह स्वीकारना उचित होगा कि, तान्त्रिक नाथ, जैन, बौद्ध, खालसा, लिङ्गायत को सनातन वैदिक धर्मी माना जाए।
सिन्धु नदी के पूर्व में बसे गेहुंआ रङ्ग के लोगों के लिए ईरान के पारसियों के धर्मग्रन्थ जेन्द अवेस्ता में पारसियों के आचार्य जरुथ्रुस्ट द्वारा श्रीकृष्ण द्वेपायन व्यास जी (भगवान वेदव्यास जी) से हुए संवाद के प्रकरण में वेदव्यास जी के काले रङ्ग को देख कर पारसी भाषा में उन्हें हिन्दू कहा था। जैसे युरोपीय लोग भारतियों, अमेरिका और आस्ट्रेलिया के मूल निवासियों ब्लेक कहते हैं।
इस आधार पर ईरानी पारसी भारतियों को हिन्दू कहते थे। इसलिए अरबी जातियों के इस्लामी आक्रांताओं ने भी भारतियों को हिन्दू कहा।
संविधान ने गत तीन हजार वर्षों से भारत में निवास करने वाली सभी जातियों को हिन्दू कहा है। जिसमें टर्की से आकर बसे चन्द्रवंशी पुरु, यदु, तुर्वसु, अनु और दृह्यु की सन्तान, ईरानी परशु (पर्शियन), तिब्बती शक, कुषाण और मङ्गोलियाई हूण सम्मिलित हैं। फिर चाहे वे भारत में जन्मे तान्त्रिक नाथ, जैन, बौद्ध, खालसा या लिङ्गायत किसी भी पन्थ के अनुयाई हो; सभी को हिन्दू माना है। यहाँ हिन्दू से तात्पर्य दीर्घावधि से भारतीय भूमि में निवासरत और भारतीय मत, पन्थ और संस्कृति को अपना चुकी जनता से है।
जबकि, इस्लामी आक्रांताओं से बचकर भारत में बसे जरुथ्रुस्ट के अनुयाई पारसी, और अब्राहमिक मतावलम्बी यहुदी, ईसाई, मुस्लिम और बहाई पन्थ के लोगों को गैर हिन्दू कहा है।
तात्पर्य यह कि, भारतीय संविधान में हिन्दू शब्द मत, पन्थ, सम्प्रदाय के अर्थ में प्रयोग नहीं किया गया है। बल्कि मूल भारतीय जन के अर्थ में प्रयोग किया है।
जबकि सावरकर और हेडगॉवार, मुञ्जे, गोल वर्कर के अनुयाई हिन्दू महासभा, रा.स्व.से. संघ और उसके अनुशंङ्गी संगठन जनसंघ, विश्व हिन्दू परिषद, बजरङ्ग दल, भा. ज.पा. आदि सभी सङ्गठन विभाजन पश्चात वर्तमान भारत में रह रहे सभी भारतवासियों को हिन्दू कहते हैं।
रा. स्व. से. संघ का हिन्दू यथार्थवादी किसी भी सिद्धान्त से मैल नहीं खाता है। बल्कि शुद्ध काल्पनिक अवधारणा है।
किसी के कुछ भी मान लेने मात्र से सत्य नहीं बदल जाता।

अवतार रहस्य

जब दृढ़तापूर्वक वर्णाश्रम धर्म का पालन करने के उपरान्त जीवन मुक्त हुआ व्यवस्था सम्बन्धी विशेष योग्यता को धारी कोई पुरुष या स्त्री स्वैच्छिक रूप से वैकुण्ठ में किसी लोक विशेष में भविष्य में सृष्टि हित के किसी कार्य विशेष के सम्पादन के लिए अपना अस्तित्व बनाए रखता है। तब तदनुरूप परिस्थिति उत्पन्न होते ही ऋत की व्यवस्था के अनुसार वह मुक्त महापुरुष/स्त्री शरीर धारण कर मृत्युलोक में उतरता है उसे अवतरण कहते हैं, और उस महापुरुष/ स्त्री को अवतार कहते हैं।
उसके सहयोग हेतु देवताओं के लोक से कोई देवांश भूमि पर उतरते है।
ये पूरा समुह कुछ निर्धारित कार्य पूर्ण करने तक की समयावधि के लिए ही आते हैं और कार्य पूर्ण होने पर वापस अपने लोक में लौट जाते हैं।
इसमें कुछ अपवाद जो मृत्युलोक में ही कुछ कार्य शेष रहने के लिए रुकते भी हैं जैसे कल्कि अवतार को शास्त्रार्थ का शिक्षण प्रशिक्षण के लिए भगवान परशुराम जी अवतार का कार्यभार समाप्त होने पर भगवान श्री रामचन्द्र जी को अवतार का कार्यभार सोप कर स्वयम् तप करते हुए भूमि पर ही रहते हैं। और रुद्रांश हनुमानजी भी भूमि पर ही रह रहे हैं। ये चिरञ्जीवी कहलाते हैं।
जबकि काल के द्वारा कार्य पूर्ण होने का सन्देश देने पर भगवान श्री रामचन्द्र जी, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न तुरन्त साकेत लोक लौट गए। और बाली का ऋण उतारने का अन्तिम शेष कार्य पूर्ण कर जरा के रूप में जन्मे बाली के साधारण सा जहर बुझा तीर एड़ी में लगने पर अपनी लीला संवरण कर गोलोक पधार गये।
भगवान परशुराम और भगवान श्री राम आमने-सामने आने पर नहीं जानते थे कि, परशुरामजी का अवतारत्व वैष्णव धनुष हस्तान्तरण के माध्यम से श्री रामचन्द्र जी में समाहित हो जाएगा। और भगवान परशुराम केवल ऋषि रहकर तप करते हुए कल्कि अवतार को धनुर्वेद का शिक्षण प्रशिक्षण देने तक रुकेंगे।
भागवत पुराण के अनुसार द्वारिका के ब्राह्मण आठ पुत्रों को लेने पश्चिम सागर से होते हुए पाताल में नाग लोक में शेषनाग के महल में विराजमान अष्टभुजा धारी भगवान भूमा के समक्ष उपस्थित होने पर भगवान भूमा नारायण द्वारा बतलाया गया कि, हे कृष्ण तुम पिछले जन्म में नारायण ऋषि थे और अर्जुन नर नामक ऋषि थे। तुम दोनों ने नर नारायण पर्वत पर तप किया था। तुमसे मिलने के लिए इन ब्राह्मण बालकों को लाया गया था। तुम इन्हें लेजाकर ब्राह्मण को सोप दो।
ये सब तथ्य सिद्ध करते हैं कि, भगवान विष्णु और माया को या भगवान प्रभविष्णु और श्री लक्ष्मी को भगवान नारायण और नारायणी को या भगवान श्रीहरि और कमलासना गज सेवित कमला को भूमि पर जन्म नहीं लेना पड़ता है।
सभी अवतार अलग-अलग लोक से आये और वहीं वापस लौटे भी।
धर्म आधारित इसी व्यवस्था को अपनी-अपनी विचारधारा के अनुसार अलग-अलग नाम-रूपों में सभी पन्थों ने अपनाया।
जैनों ने अनीश्वरवादी विचारों के अनुकूल तीर्थंकर कहा। तो, बौद्धों ने भौतिक दृष्टिकोण से बोधिसत्व कहा। और अब्राहमिक मतावलम्बियों ने नबी कहा और खालसा पन्थ ने गुरु कहकर स्वीकारा।

शुक्रवार, 8 मई 2026

वास्तविक धर्म, कर्तव्य कर्म और निषिद्ध कर्म।

मनुस्मृति (6/92) के अनुसार धर्म के 10 मुख्य लक्षण हैं,  
*धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।धीर्विद्या सत्यमक्रोधो, दशकं धर्मलक्षणम्॥*
अर्थात 
*धृति (धैर्य), क्षमा, दम (मन पर नियंत्रण), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (पवित्रता), इन्द्रिय-निग्रह (इंद्रियों पर नियंत्रण), धी (बुद्धि), विद्या (ज्ञान), सत्य (सत्यता), और अक्रोध (क्रोध न करना)।*
जो व्यक्तिगत आचरण और नैतिकता को परिभाषित करते हैं।

*महाभारत/अनशासन पर्व। अध्याय 115*: भीष्म पितामह के अनुसार धर्म के 13 लक्षण गिनाए हैं:  
    *सत्यं शौचं दया क्षान्तिस्त्यागः सन्तोष आर्जवम्।*  
    *दमः शमस्तपः साम्यं तितिक्षोपरतिर्धृतिः॥* 115.11  
   *सत्य, पवित्रता, दया, क्षमा, त्याग, संतोष, सरलता, इन्द्रिय-निग्रह, मन-निग्रह, तप, समता, सहिष्णुता, वैराग्य और धैर्य।*

पतञ्जली के योग दर्शन में भी 
*अहिंसा, सत्य अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह* 
ये पाँच यम अर्थात धर्म कहे गए हैं।
 और  उक्त धर्म पालन मे सहायक और सहयोगी पाँच नियम बतलाये हैं।
*शोच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान।*

इसलिए ही ब्राह्मण ग्रन्थों में 

1 *संध्या, वेदाध्ययन और अष्टाङ्गयोग ब्रह्म यज्ञ*  

2 *पर्यावरण व्यवस्था और रोगाणु-, जीवाणु-किटाणु नाशक अग्निहोत्र रूपी देव यज्ञ*, 

3 *मानव सेवा, ब्रह्मचारी, संन्यासी, बिमार और अशक्तों की सेवा सेवा तथा गुरुकुल, चिकित्सालय, औषधालय आदि की व्यवस्था में सहयोग रूपी नृयज्ञ*,

4 *पशु-पक्षी और वनस्पतियों की सेवा रूपी बलिवैश्वदेव कर्म और भूत यज्ञ* एवम

5 *बुजुर्गो की सेवा, उनकी अतृप्त इच्छाएँ पूरी करने हेतु कुए, बावड़ी, तालाब, धर्मशाला, सदावृत , पुस्तकालय, वाचनालय आदि के निर्माण, रखरखाव और सञ्चालन में सहयोग करना रूपी पितृ यज्ञ श्राद्ध कर्म* 
करने को नित्य कर्म घोषित किया गया है।

*इसके विधि विधान कर्मकाण्ड भास्कर, ब्रह्म नित्य कर्म समुच्चय, आह्निक सूत्रावली, और सबसे सरलतम गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित नित्य कर्म पूजा प्रकाश में उपलब्ध है।*

और
*श्रुति अर्थात वेदों पर आधारित ब्राह्म धर्म और ब्राह्मण ग्रन्थों पर आधारित ब्राह्मण धर्म में प्रतिमा या मूर्ति पूजा, अभिषेक, षोडशोपचार पूजन को निषिद्ध और घृणित कर्म माना जाता है।*

*लिङ्ग और योनि की प्रतिमा/ मूर्ति बनाकर अभिषेक और षोडशोपचार पूजन करने वाले शिश्नेदेवाः को दूर करने की प्रार्थना की गई है।*

*ऋग्वेद सप्तम मण्डल/ सूक्त 21 मन्त्र 05 में कहा है कि,*
मन्त्र ---
*न यातव इन्द्र जुजुवुर्ना न वन्दना शविष्ठ वेद्यभि। न श्रीरर्द्धयो विष्णुनस्य जन्तोर्मा शिश्नदेवाः अपि गुऋतम् नः।।*

 *ऋषि वसिष्ठ इंद्र से शिश्नेदैवाः अर्थात लिङ्ग और भग (शिवलिङ्ग) की पूजा करने वाले यातुधान अर्थात (असुर, दैत्य दानव, आदि शत्रुओं से सुरक्षा की प्रार्थना कर रहे हैं।*

अर्थात ---

*"हे बलवान इंद्र!* 
(दुष्ट, कृतघ्न, अधार्मिक, विलासी) *शिश्नेदैवाः अर्थात लिङ्ग और भग (शिवलिङ्ग) की पूजा करने वाले यातुधानों अर्थात (असुर, दैत्य दानव, आदि) शत्रुओं से हमारी रक्षा कीजिए।*
*लिङ्गपूजक असूर लोग हमें परेशान न कर सकें; उन पर हमारी दृष्टि पड़ने, उनकी छाया पड़ने, उनके स्पर्श दोष से, हमारी समृद्धि को आधी न हो पाए। हे सर्वव्यापी विष्णु देव! उनसे हमारी रक्षा कीजिए।*

शुक्ल यजुर्वेद अध्याय 32 मन्त्र 03 में भी स्पष्ट कहा है कि,
*न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः।*
*हिरण्यगर्भ इत्येष मा मा हिंसीदित्येषा यस्मान्न जातः इत्येषः॥*
*उस परमात्मा की कोई प्रतिमा (मूर्ति, चित्र या तुलना) नहीं है। जिसका नाम या कीर्ति महान (बहुत बड़ी) है।*
*वही ब्रह्मांड का रचयिता हिरण्यगर्भ है। वह हमारी हिंसा न करे। (अर्थात हमारी रक्षा करें/ निर्भय करें) वह ईश्वर किसी से उत्पन्न नहीं हुआ है, वह अजन्मा है।*

*शुक्ल यजुर्वेद अध्याय 40 का प्रथम और द्वितीय मन्त्र कहता है कि*,
*ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥1।।*
अर्थात 
*इस जगत में जो कुछ भी है, वह सब ईश परमात्मा से व्याप्त है। अतः त्यागपूर्वक ही भोग करना चाहिए, किसी के धन लोभ-लालच न करें।*

*कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्मं लिप्यते नरे।।2।।*
अर्थात 
*कर्तव्य मान कर ही कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करे। क्योंकि इसके अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है जिससे कर्मों का लेप न हो। अर्थात कर्म बन्धन न हो इसलिए कर्म करते हुए ही जीवन व्यतीत करें।*
न अकर्मण्यता हो, न कर्मासक्ति हो और न फलाशा / फलासक्ति हो।

स्पष्ट है कि, *केवल शास्त्रोक्त विधि से शास्त्रोक्त कर्म ही करें। अर्थात यज्ञ के लिए ही यज्ञ करे। सेवा मय जीवन व्यतीत करें।* 
क्योंकि *मैं परमात्मा का हूँ और शरीर जगत का हिस्सा है। अतः हर समय परमात्मा का ही स्मरण, ध्यान, चिन्तन रखते हुए शरीर को पञ्चमहायज्ञ रूपी जगत सेवा में निवेश करें।*
*ब्राह्मण ग्रन्थों में और शुल्बसूत्रों, श्रोत सूत्रों और गृह्यसूत्रों में भी केवल मण्डप में मण्डल बनाकर, बेदी बनाकर अग्रिहोत्र का ही वर्णन है। धर्मसूत्रों में माता -पिता, आचार्य, अतिथि आदि की सेवा -पूजा का ही उल्लेख है।*

अब इसमें *किसी देवता विशेष की सेवा-पूजा, अनुष्ठान आदि का कोई आदेश/निर्देश है ही नहीं। बल्कि मूर्ति पूजा का तो स्पष्ट निषेध किया है।*
*अतः देव नहलाना, पञ्चोपचार/ दशोपचार या षोडशोपचार पूजा करके धर्म विरुद्ध आचरण करके नर्क का मार्ग प्रशस्त न किया जाए।*
*उल्लेखनीय है कि, अन्य लेखों में यह प्रमाणित कर चुका हूँ कि, द्वापरयुग तक भारत में मठ, मन्दिर और मूर्ति पूजा का नामो-निशान तक नहीं था।*
 *सर्वप्रथम श्रमण मतावलम्बी ईराक, सऊदी अरब, सीरिया, टर्की, युनान और मिश्र से मूर्ति पूजा सीख कर आये।* और 
*भारत में पहले तान्त्रिकों द्वारा दबे-छुपे मूर्ति पूजा प्रारम्भ की और अनुयाई बढ़ने पर मठों में मन्दिर/ स्तूप आदि में मूर्तिपूजा प्रारम्भ की।*
*इसी प्रकार भागवत कथा, शिव पुराण सुनना भी कोई धर्म-कर्म नहीं है। वास्तविक धर्म तो अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह ही है।* *दृढ़तापूर्वक धर्मपालन में सहयोगी शोच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान रूपी पाँच नियम है।*
तथा *ब्रह्म यज्ञ के अन्तर्गत संध्या, गायत्री मन्त्र जप, वेदाध्ययन, अष्टाङ्ग योग सहित ब्रह्म यज्ञ अग्निहोत्र कर देवयज्ञ, मानव सेवा रूपी नृयज्ञ, बलिवैश्वदेव सहित सर्व प्राणी और वनस्पतियों की सेवा रूपी भूतयज्ञ और बुजुर्गों की सेवा रूपी पितृ यज्ञ ये पाँच महायज्ञ है।*

लेकिन *महाभारत युद्ध के पश्चात जन साधारण इनके बजाय मठ, मन्दिरों में प्रतिष्ठित मूर्तियों या घर पर ही देवालय बना कर उसमे रखी देवी-देवताओं, अवतारों, आचार्यों, गुरु जनों, पितरों की मूर्तियों, प्रतिमाओं या चित्रों की पञ्चोपचार, दशोपचार या षोडशोपचार पूजन करने में अपना कल्याण और श्रेय समझने लगे हैं।*
*उससे उत्पन्न सबसे बड़ा दोष कि, उन मूर्तियों आदि में भगवान की धारणा कर परमात्मा के ईश्वर स्वरूप में भी पूर्ण श्रद्धा भक्ति और समर्पण रहित हो कर ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि*, 
*हे भगवान, मुझे यह चाहिए/ वह चाहिये और इसके लिए आप ऐसा- ऐसा कर दीजिए। ताकि, मुझे सफलता पूर्वक वाञ्छित भोग प्राप्त हो सके।*
*मतलब भगवान को निरा अज्ञानी मूर्ख समझकर उसे अपनी वैध/ अवैध माँगे मनवाने के लिए स्वयम् द्वारा सुझाए गए उपायों का पालन करने की सलाह देकर उसके बदले उपास/ उपवास समझकर लङ्घन करने, कोई स्तुति - स्तोत्र पाठ करने, मन्त्र जप करने, मन्दिर में कोई मूल्यवान भेंट चढ़ा कर, या भागवत कथा, या वायु पुराण का एक भाग शिव पुराण पाठ- प्रवचन आदि का आयोजन करवा कर शिवपुराणोक्त टोटके करके स्वयम् को महान आस्तिक, सच्चा ईश्वर वादी और परम भक्त सिद्ध करते हैं।*
*दुसरी हानि यह हुई कि, मन्दिर परिसर या मूर्ति में ही ईश्वर हैं बाहर ईश्वर नहीं है। सर्वव्यापी को सिमीत एकदेशीय मान लिया।*
*तीसरा दोष माता-पिता, आचार्य -गुरुजन, योग्य अतिथि के प्रति पूज्यभाव समाप्त हो गया।*
आजकल कुछ लोग नानी बाई का मायरा का पाठ करवाते हैं, लेकिन न, करने वाला; न, करवाने वाला और न ही, श्रोतागण कोई भी  *श्रीकृष्ण के प्रति पुत्र भाव रखने वाले भक्त नरसिंह मेहता का अपने इष्ट के प्रति विश्वास पर ध्यान नहीं देते हैं।*
*सबको केवल अपने द्वारा किए गए टोटकों, छल-कपट, षड़यन्त्रों, और सकाम आराधना के नाम पर किये गए कर्मों से ही परिणाम प्राप्ति का विश्वास रहता है।*
 *मेने ऐसा किया इस लिए ऐसा हो गया। मेने ऐसा नहीं किया वरना ऐसा हो जाता। मैं नहीं होता तो ऐसा नहीं हो पाता, मैं नहीं रहूँगा तो दुनिया रुक जाएगी। मरते दम तक इसी भ्रम में जीते हैं।*
जबकि यह नहीं देखते समझते कि, *जब मैं नहीं जन्मा था तब भी विश्व सुचारू रूप से चल रहा था, विकास कर रहा था। और जहाँ मैं नहीं हूँ वहाँ भी जगत सुचारू रूप से चल रहा है।*
इसलिए मेरा होना या न होना दोनों से विश्व में कोई अन्तर नहीं पड़ने वाला है।
यही स्थिति घर गृहस्थी की भी है। *जब नहीं थे तब भी गृहस्थी चल रही थी जब मैं नहीं रहूँगा तब भी गृहस्थी ऐसे ही चलेगी।*
क्योंकि *सञ्चालक तो परमात्मा का ईश्वरीय स्वरूप है। कोई व्यक्ति या समूह नहीं।*
मूर्ति पूजा के ऐसे परिणाम जानने के कारण ही वेदों में मूर्ति पूजा निषिद्ध की गई है।
मुझे ज्ञात है कि, मूर्ति पूजा के पक्षधर सगुण सर्वव्यापी विष्णु, सगुण कूटाकृति प्रभविष्णु, सगुण साकार नारायण श्रीहरि, प्रथम पूर्ण साकार हिरण्यगर्भ, प्रथम सावयव प्रजापति के वर्णन के आधार पर साकार देवों और सावयव प्रजापति आदि देवताओं का प्रमाण देकर मूर्ति पूजा सिद्ध करने का कुतर्क देंगे। उनसे सविनय एक ही अनुरोध है कि, आप स्वयम् भी सावयव हैं, आपका सिर मुख, हाथ- पेर सब है तो क्या कोई आपकी मूर्ति बनाकर पूजता है ऐसी कोई जानकारी है आपको? मतलब देवताओं के मुखादि अङ्ग होने से उनकी मूर्ति बनाकर कोई पूजता था यह प्रमाणित नहीं होता।
दूसरा कुतर्क का खण्डन मैं पहले ही वाल्मीकि रामायण में देवों के स्थान होने लेकिन उन स्थानों पर किसी आकृति वाली मूर्ति का उल्लेख नहीं होने, जैसे यज्ञ में मण्डप में मण्डल बनाकर उसपर देवों और देवताओं का आह्वान किया जाता है, और हम लोग मण्डप में मण्डल पर उन देवताओं की पूजा आदि करते हैं, वैसे ही जनकपुरी में श्री सीताजी का भगवती उमा की पूजा करने जाने का वर्णन है। कहीं किसी मूर्ति/ प्रतिमा या चित्र होने का उल्लेख नहीं है।
इसी प्रकार श्री रामचन्द्र जी द्वारा अयोध्या काण्ड में युवराज पद पर अभिषेक के पहले जाने के वर्णन में भी भगवान विष्णु के स्थान पर किसी मूर्ति/ प्रतिमा या चित्र होने का उल्लेख नहीं है।
ठीक इसी प्रकार विदर्भ राजकमारी श्री रुक्मिणी जी के विदर्भ की राजधानी के निकट ही अम्बिका देवी के स्थान पर पूजा करने जाना भी समझना चाहिए। ध्यान रखें महाराष्ट्र के विदर्भ (नागपुर क्षेत्र) से मध्यप्रदेश के धार जिले के अमझेरा की अम्बिका मन्दिर में रुक्मिणी जी का पूजा करने आना शुद्ध काल्पनिक है।
1178 में रचित एवम 1185 में प्रकाशित 
तमिल कवि कम्बन की  ईरामावतारम् महाकाव्य और 1574 से 1577 ईस्वी के बीच अवधि कवि भक्त तुलसीदास जी रचित रामचरितमानस में भगवान श्रीरामचन्द्र जी द्वारा तमिलनाडु में रामेश्वरम शिवलिङ्ग की स्थापना का प्रमाण न दें। क्योंकि ये रचनाएं अत्यधिक आधुनिक काल की रचना है अतः कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है।
इसी प्रकार ब्रह्माण्ड पुराण का भाग अध्यात्म रामायण ईस्वी की दहवीं से पन्द्रहवीं शताब्दी की रचना है। और आनन्द रामायण भी ईस्वी की पन्द्रहवीं शताब्दी की रचना है। इसलिए इतिहास के विषय में ये भी कोई प्रामाणिक ग्रन्थ नहीं है।
 दूसरी बात श्री रामचन्द्र जी केरल के कोझीकोड और कन्नूर होते हुए लक्ष्यद्वीप के किल्तान द्वीप में स्थित रावण की लङ्का गये थे। श्री रामचन्द्र जी कभी तमिलनाडु गये ही नहीं।

गुरुवार, 7 मई 2026

मूर्ति पूजा निषेध।

श्रुति अर्थात वेदों पर आधारित ब्राह्म धर्म और ब्राह्मण ग्रन्थों पर आधारित ब्राह्मण धर्म में प्रतिमा या मूर्ति पूजा, अभिषेक, षोडशोपचार पूजन को निषिद्ध और घृणित कर्म माना जाता है।
लिङ्ग और योनि की प्रतिमा/ मूर्ति बनाकर जलाभिषेक और षोडशोपचार पूजन करने वाले शिश्नेदेवाः को दूर करने की प्रार्थना की गई है।
*ऋग्वेद सप्तम मण्डल/ सूक्त 21 मन्त्र 05 में कहा है कि,*
मन्त्र ---
*न यातव इन्द्र जुजुवुर्ना न वन्दना शविष्ठ वेद्यभि।न श्रीरर्द्धयो विष्णुनस्य जन्तोर्मा शिश्नदेवाः अपि गुऋतम् नः।।*

 *ऋषि वसिष्ठ इंद्र से शिश्नेदैवाः अर्थात लिङ्ग और भग (शिवलिङ्ग) की पूजा करने वाले यातुधान अर्थात (असुर, दैत्य दानव, आदि शत्रुओं से सुरक्षा की प्रार्थना कर रहे हैं।*

मन्त्र का अर्थ ---

*"हे बलवान इंद्र!* 
(दुष्ट, कृतघ्न, अधार्मिक, विलासी) *शिश्नेदैवाः अर्थात लिङ्ग और भग (शिवलिङ्ग) की पूजा करने वाले यातुधानों * अर्थात (असुर, दैत्य दानव, आदि) शत्रुओं से हमारी रक्षा कीजिए।*
*लिङ्गपूजक असूर लोग हमें परेशान न कर सकें; उन पर हमारी दृष्टि पड़ने, उनकी छाया पड़ने, उनके स्पर्श दोष से, हमारी समृद्धि को आधी न हो पाए। हे सर्वव्यापी विष्णु देव! उनसे हमारी रक्षा कीजिए।*
शुक्ल यजुर्वेद अध्याय 32 मन्त्र 03 में भी स्पष्ट कहा है कि,
*न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः।*
*हिरण्यगर्भ इत्येष मा मा हिंसीदित्येषा यस्मान्न जातः इत्येषः॥*
उस परमात्मा की कोई प्रतिमा (मूर्ति, चित्र या तुलना) नहीं है। जिसका नाम या कीर्ति महान (बहुत बड़ी) है।
वही ब्रह्मांड का रचयिता हिरण्यगर्भ है। वह हमारी हिंसा न करे। (अर्थात हमारी रक्षा करें/ निर्भय करें) वह ईश्वर किसी से उत्पन्न नहीं हुआ है, वह अजन्मा है।

शुक्ल यजुर्वेद अध्याय 40 का प्रथम और द्वितीय मन्त्र ही कहता है कि,
*ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥1।।*

अर्थात 
इस जगत में जो कुछ भी है, वह सब ईश परमात्मा से व्याप्त है। अतः त्यागपूर्वक ही भोग करना चाहिए, किसी के धन लोभ-लालच न करें।

*कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्मं लिप्यते नरे।।2।।*
अर्थात 
कर्तव्य मान कर ही कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करे। क्योंकि इसके अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है जिससे कर्मों का लेप न हो। अर्थात कर्म बन्धन न हो इसलिए कर्म करते हुए ही जीवन व्यतीत करें।
न अकर्मण्यता हो, न कर्मासक्ति हो और न फलाशा / फलासक्ति हो।

स्पष्ट है कि, केवल शास्त्रोक्त विधि से शास्त्रोक्त कर्म ही करें। अर्थात यज्ञ के लिए ही यज्ञ करे। सेवा मय जीवन व्यतीत करें। 
क्योंकि मैं परमात्मा का हूँ और शरीर जगत का हिस्सा है। अतः हर समय परमात्मा का ही स्मरण, ध्यान, चिन्तन रखते हुए शरीर को पञ्चमहायज्ञ रूपी जगत सेवा में निवेश करें।
ब्राह्मण ग्रन्थों मे़ और शुल्बसूत्रों, श्रोत सूत्रों और गृह्यसूत्रों में भी केवल मण्डप में मण्डल बनाकर, बेदी बनाकर अग्रिहोत्र का ही वर्णन है। धर्मसूत्रों में माता -पिता, आचार्य, अतिथि आदि की सेवा -पूजा का ही उल्लेख है।

अब इसमें किसी देवता विशेष की सेवा-पूजा, अनुष्ठान आदि का कोई आदेश/निर्देश है ही नहीं। बल्कि मूर्ति पूजा का तो स्पष्ट निषेध किया है।
अतः देव नहलाना, पञ्चोपचार)/ दशोपचार या षोडशोपचार पूजा करके धर्म विरुद्ध आचरण करके नर्क का मार्ग प्रशस्त न किया जाए।
उल्लेखनीय है कि, अन्य लेखों में यह प्रमाणित कर चुका हूँ कि, द्वापरयुग तक भारत में मठ, मन्दिर और मूर्ति पूजा का नामो-निशान तक नहीं था। सर्वप्रथम श्रमण मतावलम्बी ईराक, सऊदी अरब, सीरिया, टर्की, युनान और मिश्र से मूर्ति पूजा सीख कर आये। और भारत में पहले तान्त्रिकों द्वारा दबे-छुपे मूर्ति पूजा प्रारम्भ की और अनुयाई बढ़ने पर मठों में मन्दिर/ स्तूप आदि में मूर्तिपूजा प्रारम्भ की।
इसी प्रकार भागवत कथा, शिव पुराण सुनना भी कोई धर्म-कर्म नहीं है। वास्तविक धर्म तो अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य ही है। दृढ़तापूर्वक धर्मपालन में सहयोगी शोच, सन्तोष,तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान रूपी पाँच नियम है।
तथा ब्रह्म यज्ञ के अन्तर्गत संध्या, गायत्री मन्त्र जप, वेदाध्ययन, अष्टाङ्ग योग सहित ब्रह्म यज्ञ अग्निहोत्र कर देवयज्ञ,मानव सेवा रूपी नृयज्ञ, बलिवैश्वदेव सहित सर्व प्राणी और वनस्पतियों की सेवा और बुजुर्गों की सेवा रूष पितृ यज्ञ पाँच महायज्ञ है।

बुधवार, 29 अप्रैल 2026

श्रीरामचन्द्र जी और उनके समकालीन लोगों का चरित्र और इतिहास जानने का एकमात्र साधन वाल्मीकि रामायण ही है।

इतिहास का सच जानने के लिए केवल वाल्मीकि रामायण और महाभारत ग्रन्थों पर ही निर्भर रहना पड़ता है।
चुंकि महर्षि वाल्मीकि परशुरामजी और श्री रामचन्द्र जी के समकालीक थे, सीता जी वाल्मीकि आश्रम में रही थी।
महर्षि वाल्मीकि ने प्रजापति ब्रह्मा के निर्देश पर, देवर्षि नारद जी से श्री रामचन्द्र जी का इतिहास और चरित्र सुनकर, और फिर सीता जी से जानकारी सुनिश्चित कर रामायण की रचना की थी। 
इस लिए सगर, महर्षि वशिष्ठ, महर्षि विश्वामित्र, महर्षि अगस्त्य, महर्षि वाल्मीकि, महर्षि भरद्वाज, दशरथ जी,जनक जी, महर्षि ऋष्यश्रङ्ग, रामचन्द्र जी की बड़ी बहन शान्ता, रामचन्द्र जी, परशुरामजी, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, सीता जी,   कौशल्या , सुमित्रा, कैकई, अहिल्या,  शबरी, हनुमान जी, बाली, सुग्रीव, जामवन्त जी, नल-नील,  रावण, कुम्भकरण, विभिषण, शुर्पणखा, केकसी, मन्दोदरी आदि के चरित्र जानने का एकमात्र साधन वाल्मीकि रामायण है।
साथ ही 
रामायण में उल्लेखित विषय ---
परशुरामजी का जन्म, महर्षि जमदग्नि द्वारा अपने क्षेत्र के राजा कार्तवीर्य सहस्रार्जुन का सेना सहित स्वागत-सत्कार करने पर कामधेनु की शक्ति जानकर सहस्रार्जुन का लोभ जागना और कामधेनु का हरण करना, विरोध करने पर उनकी आश्रम तहस नहस करना, क्रोधित परशुरामजी द्वारा कार्तवीर्य सहस्रार्जुन का वध कर दिया।
महाभारत के अनुसार कार्तवीर्य सहस्रार्जुन के वध का बदला लेने हेतु कार्तवीर्य सहस्रार्जुन के पुत्रों ने परशुरामजी के पिता  महर्षि जमदग्नि को समाधि अवस्था में हत्या कर दी। पति की हत्या से व्यथित परशुरामजी की माता रेणुका सती हो गई। इससे क्रोधित होकर परशुरामजी ने कार्तवीर्य सहस्रार्जुन के 21 कुलों का नाश कर दिया।
केवल चन्द्रवंश की शाखा हैहय वंशियों के इक्कीस कुलों का संहार किया था न कि, सभी क्षत्रियों का और बाद में महर्षि ऋचिक द्वारा रोके जाने पर प्रायश्चित स्वरूप अश्वमेध यज्ञ कर विजित भूमि महर्षि कश्यप को दान कर महेन्द्र पर्वत पर तप करने लगे। और देवराज इन्द्र के समक्ष अपने शस्त्र त्याग दिये।
इसी समय शिवजी का पिनाक धनुष जनक जी के यहाँ रखा गया। लेकिन वैष्णव धनुष अपने पास रखा जिसे शिव धनुष टूटने पर चुनोति के रूप में श्रीरामचन्द्र जी को दिया और उसके साथ ही परशुरामजी का वैष्णव तेज और अवतारत्व श्री रामचन्द्र जी में समा गया।

श्री रामचन्द्र जी का विश्वामित्र जी के साथ रहने, धनुर्वेद शिक्षा लेने, राक्षसों के प्रति धारणा बनने, राक्षसों को दण्डित करने, ताड़का वध, गोतम पत्नी अहिल्या का इन्द्र के प्रति आकर्षण और फिर इन्द्र के साथ रमण करना, गोतम का शाप कि, पाषाणवत स्थिर रहकर लोगों की दृष्टि से छुपकर (अदृष्य रहकर), निराहार रहते हुए, (भूख नहीं सताए इसके लिए प्राणायाम की एक क्रिया है, वायु भक्षण) केवल वायु का भक्षण कर श्री रामचन्द्र जी की प्रतीक्षा करना। जब वे इधर से गुजरेंगे तब उनका स्वागत सत्कार करने पर प्राश्चित पूरा होगा। अर्थात दण्ड पूर्ण होगा, अहिल्या ने यही आदेश स्वीकार कर पालन किया। विश्वामित्र जी के साथ श्री रामचन्द्र जी और लक्ष्मण जी का जनक पुरी जाना, रास्ते में गोतम आश्रम सुना दैखकर विश्वामित्र जी से पूछना, विश्वामित्र जी ने अहिल्या के प्राश्चित हेतु तप करने और उनके उद्धार के आदेश पर गोतम आश्रम में जाकर अहिल्या जी के पैर छूकर प्रणाम किया। फिर अहिल्या जी द्वारा प्रस्तुत जलपान और फल कन्द आदि ग्रहण कर अहिल्या जी का प्राश्चित पूर्ण होना और महर्षि गोतम से जा मिलना।
जनक पुरी में महर्षि विश्वामित्र, श्री रामचन्द्र जी और लक्ष्मण जी द्वारा शिवजी का पिनाक धनुष का दर्शन करना, श्री जनक जी का सीता जी के जन्म और विवाह के बारे में प्रतिज्ञा लेने की बात बतलाना, सीता जी से विवाह के इच्छुक राजाओं द्वारा धनुष उठाकर प्रत्यञ्चा चढ़ाने में असफल होने पर जनक जी पर सामुहिक आक्रमण करना और इन्द्र के द्वारा उन सभी अक्रान्ता राजाओं को परास्त कर भगाने का वृतान्त सुनाना,
श्री रामचन्द्र जी द्वारा पुराने शिव धनुष पर सहज ही प्रत्यञ्चा चढ़ाकर टंकार करने पर टुटना धनुष टूटना, परशुरामजी का आगमन, श्री रामचन्द्र जी को वैष्णव धनुष देकर उसपर प्रत्यञ्चा चढ़ाने की चुनौती देना, धनुष देने के साथ ही परशुरामजी का अवतारत्व का पदभार (चार्ज) श्री रामचन्द्र जी में समाहित हो जाने पर परशुरामजी का शान्त होना का इतिहास जानने का एकमेव साधन वाल्मीकि रामायण है।
श्री रामचन्द्र जी का युवराज पद पर सभा की सहमति से चयन, मन्थरा द्वारा भड़काने पर कैकई द्वारा रामचन्द्र जी को चौदह वर्ष का वनवास और भरत का राज्याभिषेक की मांग। श्रीरामचन्द्र जी का वनवास गमन, सीता जी और लक्ष्मण का साथ जाना, वशिष्ठ जी के निर्देश पर वनवास में भी सीताजी पूर्ण राजसी श्रङ्गार सहित रहना।  दशरथ जी की मृत्यु, भरत और शत्रुघ्न को कैकई देश से वापस बुलाना, भरत के लौटने पर का पूरी अयोध्या में तिरस्कार होता देख भरत को किसी अनिष्ट की आशंका, दशरथ जी की अन्त्येष्टि, भरत का श्री रामचन्द्र जी को लौटा लाने के लिए जाना लेकिन श्री रामचन्द्र जी का वापस नहीं आना। भरत श्री रामचन्द्र जी की पादुका लाकर नन्दीग्राम में पादुका स्थापित कर श्री रामचन्द्र जी के प्रतिनिधि के रूप में शासन करना। वनवास में भरत के बार-बार आवागमन की आशंका के चलते चित्रकूट छोड़कर पञ्चवटी जाना, शुर्पणखा की नाक काटने पर शुर्पणखा द्वारा रावण को श्री सीता जी के हरण के लिए दुष्प्रेरित करना, मारिच द्वारा स्वर्णमृग बनकर सीता जी को स्वर्णमृग पालने और वापसी में अयोध्या ले चलने की अभिलाषा प्रकट करना, श्री रामचन्द्र जी द्वारा लक्ष्मण पर सीताजी की अभिरक्षा का भार सोपना, मारिच द्वारा श्री रामचन्द्र जी के स्वर में लक्ष्मण को पुकारने पर सीताजी द्वारा लक्ष्मण जी को श्रीरामचन्द्र जी की सहायतार्थ भेजना। श्री रामचन्द्र जी द्वारा सीताजी को श्री रामचन्द्र जी के सामर्थ्य बतलाने और राक्षसों का छल-कपट कहने पर सीताजी द्वारा लक्ष्मण जी पर आक्षेप लगाकर जबरन भेजना। रावण द्वारा साधुवेश में भिक्षा याचना कर सीताजी का अपहरण करना, जटायु जी द्वारा सीताजी को छुड़ाने के प्रयत्न में प्राण अर्पण करना। फिर श्री रामचन्द्र जी को रावण द्वारा सीताजी के अपहरण की जानकारी देकर प्राण त्याग करना जटायु जी की अन्त्येष्टि, शबरी जी द्वारा सुग्रीव से मिलने का सुझाव। फिर  हनुमान जी से मिलना और सुग्रीव से मैत्री, बाली वध, वर्षा ऋतु समाप्त होने पर अङ्गद, जामवंत जी, नल-नील और हनुमान जी को सीता जी की खोज हेतु विंध्याचल के दक्षिण में एक माह में खोजने हेतु भेजना। उस समय सुग्रीव जी लंका का क्षेत्रफल सौ वर्ग योजन अर्थात लगभग 36×36=1296 वर्ग किलोमीटर बतलाया और लंका के आस-पास आठ द्वीप बतलाये। यह लक्षण केवल लक्ष्यद्वीप पर सही बैठता है सिंहल द्वीप (श्री लंका) पर बिल्कुल नहीं बैठता है।

सुग्रीव द्वारा खोजी दल को तञ्जावुर की सीमा पर लगे द्वार में प्रवेश न करने और पाण्ड्य देश (तमिलनाडु) में प्रवेश न करने की आज्ञा देना।
विंध्याचल के दक्षिण पश्चिम सिरे पर ही एक माह पूर्ण होना। फिर स्वयम्प्रभा की गुफा में प्रवेश करना और वहाँ से विंध्याचल के दक्षिण पश्चिम में खम्बात की खाड़ी में भरुच पहूँचना। जटायु जी के भाई सम्पाति से मुलाकात, और उनके द्वारा रावण की लंका में अशोक वाटिका में सीता जी को बैठे हुए देखकर अङ्गद के खोजी दल को भरुच से ठीक दक्षिण में समुद्र में सौ योजन अर्थात लगभग 1287 किलोमीटर दूर सागर में रावण की लंका नामक द्वीप का पता बतला कर वहाँ अशोक वाटिका में सीता जी के होने की सूचना देना।
जामवंत जी द्वारा उत्साहित करने पर हनुमान जी ने छलांग लगाकर लंका पहूँचना, वहाँ पूरी लंका का सुक्ष्म अवलोकन कर रावण और लंकावासियों का मदिरा और सुन्दरियों के सङ्ग व्यभिचार देखना, हनुमानजी ने लंका में पक्षियों के समान विमान उड़ते देखे।
सीताजी से मिल कर श्री रामचन्द्र जी का सन्देश और मुद्रिका देना। फिर हनुमानजी ने रावण की लंका में निकुम्भला यक्षिणी के कई मन्दिर ध्वस्त किए और मूर्तियाँ तोड़ी।

 विभिषण जी से मिलना, रावण पुत्र अक्षय कुमार का वध कर रावण से मिलना, दूत अवध्य होने विभिषण जी के सुझाव को मानकर हनुमान जी की पूंछ मे आग लगाना, हनुमान जी द्वारा लंका दहन करना। फिर सीता जी से मिलकर श्री रामचन्द्र जी के लिए सीताजी का सन्देश लेकर किष्किन्धा लौटना । श्रीरामचन्द्र जी को सीता जी का सन्देश देना। और पता बतलाना। रावण द्वारा विभिषण का अपमान कर देश निकाला देना। 
सुग्रीव जी द्वारा सम्पूर्ण वानर सेना और यन्त्र आदि एकत्रित कर श्री रामचन्द्र जी की सहायतार्थ लंका अभियान पर निकलना। किष्किन्धा से कोझिकोड और कन्नूर तक पूरी यात्रा पश्चिम घाट पर करना। कर्नाटक केरल सीमा पर पश्चिम घाट में कन्नूर पहूच कर श्री रामचन्द्र जी ने महेन्द्र पर्वत पर चढ़कर अरब सागर और तीन सौ किलोमीटर दूर लक्ष्यद्वीप में टापु पर रावण की लंका देखा। फिर सह्य और मलय पर्वत लांघकर अरब सागर के तट पर पहुँचे और डेरा डाला। विभिषण जी द्वारा श्री रामचन्द्र जी की शरण ग्रहणना श्रीरामचन्द्र जी द्वारा विभिषण जी से मित्रता करना। 
समुद्र से मार्ग देने की प्रार्थना लेकिन मार्ग न देने पर श्री रामचन्द्र जी द्वारा ब्रह्मास्त्र संधान। समुद्र द्वारा विश्वकर्मा पुत्र नल से सेतु बनवाने की राय देना। ब्रह्मास्त्र पश्चिम दिशा में छोड़ना, जिससे उस स्थान पर मरुस्थल बनना।
विश्वकर्म में निपुण नल ने बड़े बड़े यन्त्रों की सहायता से पर्वत शिखर से बड़े-बड़े शिलाखण्ड और बड़े-बड़े पैड़ उखड़वाकर बुलवाये फिर सागर में पैड़ों से जाल बिछा कर उसपर शिलाखण्ड रखवाकर फिर मिट्टी डलवाई। इस प्रकार केरल के कन्नूर से प्रारम्भ कर लक्ष्यद्वीप के किल्तान द्वीप तक पहले दिन चौदह योजन, दुसरे दिन छ योजन, तीसरे, चौथे और पाँचवे दिन एक-एक योजन सेतु बनाकर कुल पाँच दिन में 23 योजन अर्थात 296 किलोमीटर का सेतु बनाया।
श्रीरामचन्द्र जी और लक्ष्मण जी सहित पूरी सेना को मेघनाद द्वारा ब्रह्मास्त्र चलाकर घायल कर देना। जामवन्त जी द्वारा हनुमान जी को सूर्योदय से पहले रातों-रात सब को स्वस्थ्य करने हेतु हिमालय के महाशय पर्वत शिखर से चार चमकीली बुटियाँ - शल्य विकर्णी, सञ्जीव करणी, सावर्ण्य करणी और सन्धानी बुटी सूर्योदय से पहले लाने हेतु पूरा मार्ग बतलाकर भेजना। हनुमान जी छलांग लगा कर हिमालय पहूँचे। इन्द्र की अमरावती पुरी, कुबेर की अलकापुरी, वरुण की वारुणीपुरी, यम की संयमनी पुरी देखना। प्रजापति , इन्द्र, वरुण, द्वादश आदित्य, आठ वसु, एकादश रुद्र सहित स्वर्ग की सभा देखी।
बुटियों को न पहचान पाने के कारण महाशय पर्वत शिखर उखाड़ लाये। और चिकित्सा उपरान्त वापस रख आये। यही कार्य दुबारा मेघनाद द्वारा विभिषण जी पर की गई शक्ति प्रहार को लक्ष्मण जी ने आगे बढ़कर अपने सीने पर झेल लिया। और अचेत हो गये तब भी जामवन्त जी ने हनुमानजी को वापस महाशय पर्वत शिखर पर भेजा और हनुमान जी उक्त चारों बुटियों सहित पर्वत शिखर ले आये और चिकित्सा उपरान्त वापस रख आये।
विभिषण जी द्वारा सूचित करने पर रावण की कुलदेवी रक्षिणी निकुम्भला के मन्दिर में मेघनाद द्वारा किए जा रहे तान्त्रिक हवन का विध्वंस कर हनुमान जी और लक्ष्मण जी ने निकुम्भला मन्दिर ध्वस्त कर निकुम्भला की मूर्ति  तोड़ डाली लक्ष्मण जी द्वारा मेघनाद का वध किया।
बाद में फिर विभिषण जी द्वारा सूचित करने पर  रावण  भी निकुम्भला के गुप्त मन्दिर में तान्त्रिक पूजा, होम- हवन करने लगा तो हनुमान जी और लक्ष्मण ने मन्दिर और मूर्ति तोड़ कर हवन ध्वन्स कर दिया 
इन्द्र द्वारा सारथी मातली सहित रथ श्री रामचन्द्र जी की सहायतार्थ रथ भेजा। मातली की सलाह पर श्री रामचन्द्र जी ने रावण पर महर्षि अगस्त्य द्वारा प्रदत्त ब्रह्मास्त्र चलाकर वध कर दिया।और वह तत्काल ही मर गया था।*
रावण का वध अमान्त फाल्गुन कृष्ण पूर्णिमान्त चैत्र कृष्ण अमावस्या तिथि को सायं सन्ध्या में हुआ।
 श्री रामचन्द्र जी ने विभिषण का राज्याभिषेक करवा कर पुष्पक विमान से चैत्र शुक्ल पञ्चमी तिथि को चित्रकूट में भरद्वाज आश्रम पहूँचे।
चैत्र शुक्ल षष्ठी तिथि को अयोध्या पहूँचे।

 रामराज्य के प्रति अयोध्या वासियों की राय पुछने पर गुप्तचरों ने बतलाया कि, रावण की लंका में रही सीता जी को पटरानी बनाया जाने पर जनता में असन्तोष है। इस कारण दुसरे दिन श्री रामचन्द्र जी ने लक्ष्मण जी के साथ गर्भवती सीता जी को वाल्मीकि आश्रम के पास छुड़वा दिया। वहाँ जाकर लक्ष्मण जी ने सीता जी को सही जानकारी दी।
लव-कुश का जन्म, शिक्षा, और रामायण महाकाव्य कण्ठस्थ करवाया।
फिर श्रीरामचन्द्र जी द्वारा किए जा रहे राजसूय यज्ञ में लव-कुश ने पहली बार रामायण महाकाव्य का गायन कर सुनाया।