मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

वाल्मीकि रामायण और तमिल कवि कम्बन रचित ईरामावतारम पर आधारित तुलसीदास जी कृत रामचरितमानस में श्री रामचन्द्र जी के इतिहास में आकाश-पाताल का अन्तर है

वाल्मीकि जी का आश्रम अयोध्या के निकट ही था। सीताजी वाल्मीकि आश्रम में रही वहीं कुश और लव का जन्म हुआ। और वाल्मीकि आश्रम में ही लवकुश का शिक्षण -प्रशिक्षण हुआ।
इसी दौरान महर्षि वाल्मीकि जी ने रामायण इतिहास ग्रन्थ रचा और लव कुश को मुखाग्र करवा कर श्री रामचन्द्र जी के अश्वमेध यज्ञ में सुनाने हेतु भेजा।
इस इतिहास का अनुमोदन स्वयम् श्री रामचन्द्र जी ने किया। इस लिए मूल वाल्मीकि रामायण में केवल अश्वमेध यज्ञ तक का ही वर्णन है। उत्तर काण्ड भरद्वाज जी की रचना मानी जाती है।
इसलिए इतिहास के रूप में केवल वाल्मीकि रामायण ही प्रमाण है।

श्री वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्रीरामचन्द्र जी के वास्तविक चरित्र के सच और रावण के परम प्रशंसक तमिल कवि कम्बन द्वारा तमिल भाषा में 1178 ईस्वी में रचित और 1185 ईस्वी में प्रकाशित तमिलईरामावतारम् के आधार पर रचित तुलसीदास जी कृत रामचरितमानस के आधार पर निर्मित लोक मान्यताओं में आकाश पाताल का अन्तर है।
तुलसीदास जी ने प्रयागराज में माघ मेले में कवि कम्बन रचित राम चरित्र पर प्रवचन सूना था।
उसी से प्रभावित होकर तुलसीदास जी ने रामचरितमानस की द्वितीय आवृत्ति लिखी थी। 
वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास जी की रामचरितमानस में कई स्थानों पर अत्यधिक अन्तर है।


वाल्मीकि रामायण के अनुसार ---
कौशल्या जी के पास स्त्री धन के रूप में कोसल प्रदेश के पन्द्रह गावों की जागीर की जमींदारी थी। इस प्रकार आर्थिक रूप से वे आत्मनिर्भर और सक्षम थी।

कैकेई देश की सुन्दर और साहसी राजकुमारी कैकेई से महाराज दशरथ को अत्यधिक लगाव था। इस कारण पटरानी होते हुए भी कौशल्या जी की स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है।
इसलिए ही सुमित्रा जी ने लक्ष्मण जी को श्रीरामचन्द्र जी के साथ और शत्रुघ्न जी को भरत जी के साथ अटैच कर दिया। यह राजनीति थी।
श्री रामचन्द्र जी, भरत जी, लक्ष्मण जी और शत्रुघ्न जी के जन्म में केवल एक-एक दिन का अन्तर था। मतलब चारों भाई समवयस्क थे।
लेकिन 
जब श्रीराम क्रीड़ा में विजयी होते तो भी उन्हें भरत जी को विजयी घोषित कर देते थे। (यह विवशता की राजनीति कहलाती है।)
मतलब स्पष्ट है कि, उत्तानपाद - सुनीति और सुरुचि तथा ध्रुव जी और उत्तम वाली कहानी रिपिट हो रही थी।
अयोध्या और भारत भूमि में किसी मूर्ति/ प्रतिमा पूजन का उल्लेख नहीं है। लेकिन देवों और देवताओं की आराधना - उपासना हेतु उपासना स्थल / स्थानक होते थे। कौशल्या जी विष्णु उपासक थी।

सूर्यवंश, इक्ष्वाकु वंश, रघुकुल की परम्परा अनुसार श्री रामचन्द्र जी ही उत्तराधिकारी होंगे यह बात कैकई भली-भांति जानती थी और उसने स्वीकार भी कर लिया था। लेकिन 
कैकेई का श्री राम के प्रति प्रेम का तुलसीदास जी का प्रचार मात्र है।

इन्द्र को अपने प्रति आकर्षित देखकर प्रसन्न और उत्साहित होकर अहिल्या जी ने स्वैच्छया इन्द्र को शीघ्रातिशीघ्र उनके साथ रमण कर गोतम ऋषि के लौटने के पहले भाग जाने की सलाह देतीं हैं। मतलब अहिल्या जी भी समान रूप से दोषी थी।
गोतम ऋषि ने अहिल्या जी के उद्धार का उपाय बतलाता कि, श्री रामचन्द्र जी जब यहाँ से गुजरेंगे, तब तक तुम्हें यज्ञ भस्म लपेटे,केवल वायु का सेवन कर (निराहार रहकर) सब लोगों से अदृश्य रहकर (छुपकर) शिलावत स्थिर रहकर तप करना है । जब श्रीरामचन्द्र जी का आतिथ्य, स्वागत - सत्कार करोगी तब तुम दोषमुक्त होंगी।
मतलब अहिल्या जी पत्थर की नहीं बनी थी ।
जब सुनसान आश्रम देखकर श्री रामचन्द्र जी ने महर्षि विश्वामित्र जी से जिज्ञासा प्रकट की, तो महर्षि विश्वामित्र ने इन्द्र-अहिल्या- महर्षि गोतम के पुरे प्रकरण की जानकारी देकर आश्रम में प्रवेश किया। श्री रामचन्द्र जी ने सादर झुक कर माता अहिल्या के चरणों में प्रणाम किया।
अहिल्या जी ने फल-फूल आदि से महर्षि सहित श्री रामचन्द्र जी और लक्ष्मण जी का आतिथ्य सत्कार किया। और महर्षि गौतम के शाप से मुक्त होकर महर्षि गौतम से जा मिली।
अर्थात न तो अहिल्या जी शिला (पाषाण) हुई थी, न रामचन्द्र जी ने अशिष्टता पुर्वक ऋषि पत्नी की पाषाण देह को लात मारी। (चरण नहीं छुआये।) ये सब कवि कम्बन और तुलसीदास जी की कल्पना मात्र है।
मिथिला पहुँचने पर विश्वामित्र जी ने जनक जी और गौतम ऋषि के पुत्र का परिचय कराया और शिव धनुष की जानकारी दी।
महर्षि ने जनक जी से शिव धनुष दिखलाने का कहा। तब जनक जी ने पिनाक धनुष की विशेषता और पिनाक धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने वाले से सीता जी के विवाह का प्रण के विषय में बतलाया।
 एक गाड़ी में सन्दुक में रखे पिनाक धनुष को बहुत से भृत्य धका कर लाये। तब उन्हें बड़े से सन्दुक में रखे शिव धनुष पिनाक के दर्शन करवाए।
महर्षि के निर्देश पर श्री रामचन्द्र जी ने पिनाक पर प्रत्यञ्चा चढ़ा कर ज्यों ही प्रत्यञ्चा कान तक खींच कर टंकार की वैसे ही पुराना होने से धनुष टूट गया।

जनक जी ने प्रण अनुसार सीता जी का विवाह श्री रामचन्द्र जी से करने का प्रस्ताव रखा जिसे महर्षि और श्री रामचन्द्र जी ने स्वीकार किया।

दशरथ जी को सुचित किया गया। वे सदलबल बारात लेकर आये तब अपने छोटे भाइयों की पुत्रियों के विवाह भी दशरथ पुत्रों से करने का प्रस्ताव किया। और सबने सहर्ष स्वीकार किया।
विवाह सम्पन्न हुआ। जब बारात लौट रही थी तब मार्ग में भगवान परशुराम जी का आगमन हुआ। परशुराम जी ने क्रोधित हुए लेकिन श्रीरामचन्द्र जी ने शिष्टता पूर्वक निवेदन किया कि, धनुष पुराना था इसलिए टूट गया। जानबूझकर नहीं तोड़ा। लेकिन परशुराम जी ने नाराज होकर श्री रामचन्द्र जी को वैष्णव धनुष देकर उसपर प्रत्यञ्चा चढ़ा कर दिखलाने की चुनौती दी।
लेकिन जैसे ही परशुरामजी ने वैष्णव धनुष श्रीरामचन्द्र जी के हाथों में दिया वैसे ही भगवान परशुराम जी का अवतारत्व का तेज (चार्ज) श्रीरामचन्द्र जी में प्रवेश कर गया और भगवान परशुराम जी केवल ऋषि ही रह गये। उनको प्राप्त अवतार का प्रभार समाप्त हो गया।(डिस्चार्ज्ड हो गये।) 
मतलब न तो धनुषयज्ञ/ सीता स्वयम्वर हुआ था। न स्वयम्वर में परशुरामजी जी और लक्ष्मण जी का विवाद हुआ। और
अवतारत्व एक दायित्व है। पदभार है। जो अवतार पद के दायित्व निर्वहन कर्ता व्यक्ति के पदभार समाप्त होने पर दूसरे योग्य व्यक्ति को अन्तरित हो सकता है।
एक अवतार दुसरे अवतार को नहीं पहचान पाता है।
सीता जी जनकपुरी में उमादेवी के उपासना स्थल / स्थानक पर उमादेवी की उपासना करतीं थी।  
 श्री रामचन्द्र जी दैनिक पञ्च महायज्ञ के अलावा उपासना स्थलों/ स्थानकों पर जाकर देवों की उपासना करते थे।
अवध राज्य गणराज्य था, गणराज्य के राजा का चुनाव सभी वर्णों के प्रतिनिधियों की समिति करती थी।
श्रीरामचन्द्र जी को युवराज घोषित करने का अनुमोदन भी दशरथ जी ने उक्त समिति से लिया था। तत्पश्चात ही घोषणा की थी।

भरत जी और शत्रुघ्न जी को कैकेई देश भेज कर अचानक श्री रामचन्द्र जी को युवराज घोषित करना भी राजनीति थी। जिससे कैकेई पक्ष को सन्देह होना स्वाभाविक था।

वनवास यात्रा में दशरथ जी सुमन्त के साथ रथ से श्रीरामचन्द्र जी - सीता जी और लक्ष्मण जी को अयोध्या नगरी की सीमा तक छोड़ने गए थे।

भरत जी जब अयोध्या लौटे तो नगरवासियों ने उन्हें बहुत बुरा कहा, उनकी और कैकेई की निन्दा की, उनकी अवहेलना की इसका कारण जानकर भरत जी व्यथित हो गये। स्वाभाविक है कि, भरत जी समझ गए कि, श्रीरामचन्द्र जी के स्थान पर उनका राजा होना जनता को स्वीकार्य नहीं है।

अतः भरत जी श्री रामचन्द्र जी को राजकीय सम्मान सहित वापस लेने चित्रकूट गये।
लेकिन न केवल लक्ष्मण जी अपितु श्रीरामचन्द्र जी भी सेना सहित भरत के आगमन पर शंकित हो गये थे। लेकिन उन्होंने धैर्य रखा और भरत की भावभङ्गिमा और गतिविधियों को देखकर निश्चिन्त हो गये।

वाल्मीकि रामायण में भरत जी के नन्दी ग्राम वास के दौरान उर्मिला जी और माण्डवी जी तथा श्रुति कीर्ति जी के विषय में कुछ भी उल्लेख नहीं है।
लोगों ने मन गड़न्त कहानियाँ गढ़ ली है।

लक्ष्मण रेखा की कहानी भी मनगढ़न्त है।

कृपया देखें -- वाल्मीकि रामायण/ बालकाण्ड/ उनचासवाँ सर्ग/ श्लोक 19 से 21 तक। विशेषकर श्लोक 17 और 18
श्री रामचन्द्र जी ने तपस्या कर रही अहिल्या के चरण छूकर प्रणाम माता जी कहा, लेकिन लोग कहते हैं कि, पत्थर बनी अहिल्या को श्री रामचन्द्र जी ने पैर के अङ्गुष्ठ से छुआ।

कर्नाटक -केरल और लक्ष्यद्वीप का मानचित्र (नक्षा) लेकर वाल्मीकि रामायण/ किष्किन्धाकाण्ड/ पचासवाँ सर्ग/ श्लोक ३,7-8, 21, 24, तिरेपनवाँ सर्ग/ श्लोक 1, 2, 5 एवम् छप्पनवाँ सर्ग / श्लोक 1 एवम् 2, तथा अट्ठावनवाँ सर्ग/ श्लोक 15 से 20 तक, इकतालीसवाँ सर्ग/ श्लोक 19 एवम् 20 और युद्ध काण्ड/ सर्ग/श्लोक 70 -71 , और 92 से 94 तथा 103 एवम् एक सौ एकसौ इक्कीसवाँ सर्ग / श्लोक 17, 45 से 48, 52-53,55,60-61,64-65,69, 71 एवम् 72 पढ़ने पर निश्चित ही समझ आ जाएगा कि, 
*हनुमान जी भरुच के पास से समुद्र पार कर लंका गये थे। लोग धनुषकोडी के पास बतलाते हैं।* 
 *रावण की लंका लक्ष्यद्वीप के स्थान पर श्रीलंका मानते है़। श्री रामचन्द्र जी द्वारा कोझीकोड (केरल) से किल्तान द्वीप तक राम सेतु बनवाया था, लेकिन ,लोग तथाकथित एडम ब्रिज को राम सेतु मानते हैं।* 
वाल्मीकि रामायण के काण्ड, सर्ग और श्लोक संख्या सहित प्रमाण नीचे दिए जा रहे हैं।

 *रावण ने वेदाध्ययन किया था ऐसा कोई उल्लेख नहीं मिलता, लेकिन लोग रावण को वेदज्ञ मानते हैं।* 
तैत्तिरीय संहिता और तैत्तिरीय ब्राह्मण का सम्बन्ध श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यास जी के शिष्य वैशम्पायनजी जी से है, यह वर्णन सर्वत्र उपलब्ध है। 
लेकिन लोग कहते हैं कि, यजुर्वेद पर रावण ने भाष्य किया था, और उस भाष्य और यजुर्वेद को गड्ड-मड्ड कर दिया इसलिए इसे कृष्ण यजुर्वेद कहते हैं। जो दक्षिण भारत में कर्मकाण्ड का आधार है।

*रावण अधर्मी तान्त्रिक था यह उल्लेख किष्किन्धाकाण्ड और युद्ध काण्ड में कई बार मिलता है। लेकिन लोग उसे महान शिवभक्त कहते हैं। *
 
वाल्मीकि रामायण/ किष्किन्धाकाण्ड/ इकतालीसवाँ सर्ग/श्लोक 19-20 देखें ---
 *दक्षिणापथ पर सीताजी की खोज कर्ता दल को स्पष्ट निर्देश देते हैं कि, (तञ्जावुर में) पाण्ड्यदेश का सूचना पट्ट देखकर दक्षिण में आगे बढ़ जाना। (पाण्ड्यदेश में प्रवेश न करना।)* 

 और वाल्मीकि रामायण/ युद्धकाण्ड/ चौथा सर्ग देखें --- *किष्किन्धा से पश्चिम घाट पर ही चलते चलते वे सह्य पर्वत पर पहूँच कर सब वानर सह्य पर्वत पर चड़ गये। श्लोक- 70

श्रीरामचन्द्रजी सह्य और मलय पर्वत के विचित्र काननों, नदियों, तथा झरनों की शोभा देखते हुए यात्रा कर रहेथे। श्लोक- 71 

श्री रामचंद्र जी महेन्द्र पर्वत (शायद कण्णूर का ईजीमाला पर्वत) के पास पहूँच कर उसके शिखर पर चढ़ गये। श्लोक- 92 

महेन्द्र पर्वत पर आरुढ़ हो श्री राम जी ने समुद्र को देखा। श्लोक-93 

इस प्रकार वे सह्य और मलय को लाँघखर महेन्द्र पर्वत के समीपवर्ती समुद्र के तट पर जा पहूँचे। श्लोक- 94 

उस (महेन्द्र पर्वत) से उतरकर शीघ्र ही सागर तटवर्ती वन में जा पहूँचे।रामचन्द्रजी की आज्ञा से सुग्रीव ने समुद्र तटीय वन में सेना को ठहरा दिया। पड़ाव डाला। श्लोक- 103* 

*श्री रामचन्द्र जी कभी तमिलनाडु गये ही नहीं और न कहीं भी कोई शिवलिङ्ग स्थापित किया, लेकिन लोग रामेश्वरम श्री रामचन्द्र जी द्वारा स्थापित बतलाते हैं।* 

 *रावण को सिविल इंजीनियरिंग का भी ज्ञान नहीं था, नल नील द्वारा पाँच दिन में राम सेतु तैयार कर दिया इसपर उसे घोर आश्चर्य हुआ। गुप्तचर बतलाते रहे, लेकिन वह उपहास करते हुए दारु पी कर रंगरेलियां करता रहा। ऐसे मुर्ख को राजनीति का पण्डित कहते हैं।* 

वाल्मीकि रामायण/ युद्ध काण्ड/ बानवेंवाँ सर्ग/ श्लोक 66-67 के अनुसार 
 *मेघनाद वध से दुःखी और क्रुद्ध रावण को दी गई राय के आधार पर अमान्त फाल्गुन पूर्णिमान्त चैत्र कृष्ण पक्ष अमावस्या को रावण द्वारा पूर्ण तैयारी से श्री रामचन्द्र जी के विरुद्ध युद्ध होना निश्चित हुआ।* 
और 
वाल्मीकि रामायण/ युद्ध काण्ड/ एकसौ आठवाँ सर्ग/ श्लोक 17-23 के अनुसार
 *अमान्त फाल्गुन पूर्णिमान्त चैत्र कृष्ण पक्ष अमावस्या को सन्ध्या समय हुए इस अन्तिम युद्ध में ही श्री रामचन्द्र जी द्वारा रावण की छाती पर मारा बाण रावण का हृदय वेधता हुआ आर-पार हो गया और पहले धरती में धँस गया। फिर तरकस मे लौट आया।* 
 *रावण की मृत्यु होते ही रावण की मृत शरीर रथ से धरती पर गिर पड़ा।*
*अमान्त फाल्गुन पूर्णिमान्त चैत्र कृष्ण पक्ष की अमावस्या को ब्रह्मास्त्र से हृदय विदीर्ण हो जाने से रावण तत्काल ही मर गया, लेकिन लोग कहते हैं कि, रावण आश्विन शुक्ल दशमी को मरा और उसके मरने से पहले श्रीरामचन्द्र जी ने लक्ष्मण को रावण से राजनीति सीखने भेजा।* 

ऐसे ही
वाल्मीकि रामायण/ युद्ध काण्ड/ एकसौ चौबीसवाँ सर्ग/ श्लोक १ देखें ---
*श्री रामचन्द्र जी वनवास पूर्ण कर चैत्र शुक्ल पञ्चमी को भरद्वाज आश्रम पहूँचे और चैत्र शुक्ल षष्ठी को अयोध्या पहुँचे। लेकिन* 
 *लोग कहते हैं कि, श्री अमान्त आश्विन पूर्णिमान्त कार्तिक कृष्ण अमावस्या को रामचन्द्र जी के अयोध्या लौटने की खुशी में दीपावली मनाई जाती है।*
रावण की लंका कहाँ थी? लक्षद्वीप में या सिंहल द्वीप मे?
*लंका की स्थिति*

*जानने का आधार केवल वाल्मीकीय रामायण ही क्यों*--
महर्षि वाल्मीकि जी का निवास अयोध्या के निकट ही होने और उन्हे बहुत काल तक सीता जी का  सानिध्य प्राप्त हुआ इस कारण श्रीरामचन्द्र जी और सीतामाता का प्रमाणिक इतिहास हमे केवल वाल्मीकीय रामायण में ही मिल सकता है ।

श्री राम जी ने लोकोपवाद से बचाव हेतु गर्भवती सीताजी को लक्ष्मण जी के साथ भिजवा कर सीताजी को वाल्मीकि आश्रम में रखा था।जहाँ लव -कुश का बचपन बीता और  लव-कुश का गुरुकुल भी था महर्षि वाल्मीकि का वह आश्रम ही बना जो श्रीराम के राज्यक्षेत्र में और अयोध्या के निकट ही था।
अतः श्रीराम -सीताजी के विषय में किसी एतिहासिक तथ्य की परीक्षा महर्षि वाल्मीकि प्रणीत श्री मद् वाल्मीकीय रामायण से ही प्रमाणित हो सकता है। योग वाशिष्ठ भी कुछ लोग श्रीराम कालीन रचना मानते हैं किन्तु अधिकांश विद्वान आदिशंकराचार्य के बाद की रचना मानते हैं। अतः अन्य कोई ग्रन्थ इतिहास की दृष्टि से प्रामाणिक नही हो सकता।

गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण से श्लोक संख्या अनुवाद --
अब हम वाल्मीकीय रामायण के आधार पर रावण की लंका कहाँ थी कौनसी थी इसकी  की यथार्थ भौगोलिक  स्थिति का परीक्षण करते हैं।
रावण द्वारा सीताजी के अपहरण पश्चात,श्री जटायु द्वारा श्रीराम को बतलाया कि, लंका का राजा राक्षस राज रावण सीताजी का जबरजस्ती अपहरण कर रावण उन्हे दक्षिण दिशा में लंका लंका ले गया है।
सुग्रीव जी की सहायता से सीताजी की खोज की गयी । बालीपुत्र अंगद के नेत्रत्व में  जटायु के भाई सम्पाती जी के मार्गदर्शन से श्री हनुमानजी लंका में सीताजी से मिल कर आये और श्री राम को सीताजी की जानकारी दी।
तब श्रीराम जी ने नल - नील की सहायता से समुद्र पर सेतु बनाकर सीता जी को मुक्त कराया। इतनी जानकारी सबको पता है ।
पर  किसी को सही जानकारी नही मालुम की रावण की लंका कहाँ थी/ कौनसी थी। राम सेतु कितना लम्बा था,और कितने समय में कैसे बना। इसी की जाँच हम वाल्मीकीय रामायण के अरण्य काण्ड, किश्किन्धा काण्ड और युद्ध काण्ड के आधार पर पता लगाने का प्रयत्न करते हैं। सुन्दर काण्ड के अलावा इन्ही तीन काण्डो में लंका की जानकारी दी है।और सेतु निर्माण का विवरण और वर्णन युद्ध काण्ड में है।

सामान्यतया सिंहल द्वीप अर्थात श्रीलंका को रावण की लंका माना जारहा है। जहाँ  रावण ने सीताजी का अपहरण कर उन्हे अशोक वाटिका में अवरुद्ध कर रखा था।
श्रीलंका सरकार का पर्यटन विभाग इसका पुरा लाभ उठाता है।
इसी आधार पर तमिलनाड़ु में धनुष्कोटि, रामसेतु और रामेश्वरम आदि कल्पित किये गये।
जबकि सिंहल द्वीप का नाम श्रीलंका इसलिये पड़ा क्योंकि श्री पाद पर्वत / एडम माउण्टेन पर किन्ही श्रीमान पुरुष के लंक अर्थात पेर के पञ्जे के निशान है।
यहूदियों के अनुसार यहोवा की आज्ञा उल्लघन कर आदम द्वारा बुद्धि वृक्ष का फल खा लेने पर आज्ञा उलंलंघन  के दण्ड स्वरुप आदम को अदन की वाटिका के पुर्वी द्वार से निकाल देने पर वे आदम शिखर पर सिंहल द्वीप पर गिरने सेआदम के पंजे के निशान बन गये ऐसा मानते हैं।
सनातन धर्मी उसे किसी श्रीमान पुरुष के लंक (पेर के पंजे के निशान मानते हैं।इस कारण सिंहल द्वीप को श्रीलंका कहते हैं।केवल लंका नही कहते हैं बल्कि श्रीलंका कहते हैं।
अब देखते हैं वाल्मीकीय रामायण में क्या लिखा है।
काण्ड/सर्ग/ श्लोक संख्या सहित गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित श्रीमद् वाल्मीकीय रामायण के श्लोकों के अर्थ ही दिये जा रहे हैं।क्योंकि गीता प्रेस गोरखपुर प्रकाशन और उनके द्वारा प्रकाशित पौराणिक ग्रन्थों का अनुवाद भी सर्वाधिक प्रामाणिक मान्य है।
जो वाल्मीकीय रामायण स्वयम् पढ़कर विचार करेंगे उनका ज्ञान वर्धन और भ्रम निवारण अधिक होगा।किन्तु जो नही पढ़ पाये उनके लिये प्रस्तुत है।--
आप भी पढ़िये और विचार- मनन कर निष्कर्ष निकालने का प्रयत्न करें।
*पहले अरण्य काण्ड से*--
*वाल्मीकि रामायण /अरण्य काण्ड* / *एकोनसप्तितमः सर्ग* / श्लोक क्रमांक---
श्रीराम को जटायु जी प्राण त्याग के ठीक पहले बतलाते हैं कि यहाँ ( जनःस्थान )  से रावण सीता को साथ लिये यहाँ से दक्षिण दिशा की ओर गया। श्लोक -10
वाल्मीकि रामायण /अरण्य काण्ड* / *अष्टषष्टितमः सर्ग*/
श्रीराम लक्ष्मण सीताजी को खोज करते हुए भी पश्चिम में गये। - 1
सीताजी को खोजने दक्षिण दिशा में गये। श्लोक- 2
*वाल्मीकि रामायण /किष्किन्धा काण्ड/* *एकचत्वारिशः सर्ग*/
पाण्य वंशीय राजाओं के नगरद्वार पर लगे हुए सुवर्णमय कपाट दर्शन करोगे। जो मुक्तामणि यों से विभुषित एवं दिव्य है।
( नोट - यहाँ से पाण्ड्य देश की सीमा आरम्भ होती थी न कि, तंजोर नगर की।किन्तु इस प्रवेश द्वार को  लेण्डमार्क के रुप में देखने भर को ही कहा है।पाण्य देश/ तमिलनाड़ु में प्रवेश करने का निर्देश नही किया है। अर्थात पुर्वी घाट की ओर नही बल्कि पश्चिमी घाट की ओर ही जाने का अप्रत्यक्ष निर्देश है। शायद राक्षसों का प्रभाव लक्षद्वीप से नाशिक तक पश्चिम में ही अधिक था।
कुछ लोग पाण्य देश यानी तमिलनाड़ु देखकर ही उत्साहित होकर पुर्वीघाट की ओर बढ़ने का अनुमान करते हैं। जबकि सुग्रीव ने देखते हुए आगे बढ़ने का निर्देश देते हैं प्रवेश का नही।)
तत्पश्चात समुद्र के तट पर जाकर उसे पार करने के सम्बन्ध में अपने कर्त्तव्य का भली-भाँति निश्चय करके उसका पालन करना।महर्षि अगस्त ने  समुद्र के भीतर एक सुन्दर सुवर्ण मय पर्वत को स्थापित किया, जो महेन्द्र गिरि के नाम से विख्यात है। उसके शिखर तथा वहाँ के वृक्ष विचित्र शोभा सम्पन्न है।वह शोभाशाली पर्वत श्रेष्ठ समुद्र के भीतर गहराई तक घुसा हुआ है। श्लोक- 19 &20

( रावण की लंका का वर्णन) --

*उस समुद्र के उसपार एक द्वीप है, जिसका विस्तार सौ योजन है।वहाँ मनुष्यों की पहूँच नही है। श्लोक*-23
(नोट -- सौ योजन विस्तार मतलब लगभग 100 वर्ग योजन अर्थात 1288 वर्गकि.मी. =36×36 वर्ग कि.मी. वर्ग किलोमीटर।*
जबकि श्रीलंका का क्षेत्रफल 65610 वर्ग कि.मी. है।अर्थात लक्षद्वीप ही सही बैठता है श्रीलंका / सिंहल द्वीप नही।)

उस शक्तिशाली द्वीप में चारों ओर पूरा यत्न करके सीता की विशेष खोज करना। श्लोक - 24
वही देश दुरात्मा राक्षसराज रावण का निवासस्थान है।जो हमारा वध्य है। श्लोक- 25
उस दक्षिण समुद्र के बीच में अङ्गारका नाम से प्रसिद्ध एक राक्षसी रहती है, जो छाया पकड़ कर ही प्राणियों को खीँच लेती है और उन्हे खा जाती है। श्लोक - 26
(नोट - यहाँ अङ्गारका राक्षसी कहा है,नागमाता सुरसा का अन्य नाम अङ्गारका था।)
लंका को लाँघ कर आगे बड़ने पर सौ योजन विस्तृत समुद्र में एक पुष्पितक नामक पर्वत है। श्लोक- 28
पुष्पितक के  चौदह  योजन आगे  सूर्यवान पर्वत बतलाया है। श्लोक - 31 & 32
सुर्यवान पर्वत के बाद वैद्युत पर्वत है। श्लोक- 32
फिर कुञ्जर पर्वत है जिसपर अगस्त्य  का सुन्दर भवन है। श्लोक-34
कुञ्जर पर्वत पर भोगावती नगरी है। श्लोक -36
भोगावती पुरी में सर्पराज वासुकि निवास करते हैं। श्लोक - 38
आगे ऋषभ पर्वत पर चन्दन के पेड़ हैं।जिसका स्पर्ष खतरनाक है। श्लोक 40 & 41
उसके आगे पित्र लोक है जहाँ जाने का निषेध किया है। श्लोक- 44
( नोट रावण की लंका के आसपास इतने सारे द्वीप होना भी लक्षद्वीप को ही सुचित करता है।
सिंहल द्वीप श्रीलंका के आसपास इतने द्वीप नही है।

अब किश्किन्धा काण्ड से --

*वाल्मीकि रामायण/किष्किन्धा काण्ड/पञ्चाशः सर्ग/* 
विन्द्याचल  पर सीता जी की खोज करते करते अंगद, जाम्बवन्त जी और  हनुमानजी सहित वानर विन्द्याचल के नैऋत्य कोण (दक्षिण पश्चिम) वाले शिखर पर जा पहूँचे।वहीँ रहते हुए उनका वह समय जो सुग्रीव ने निश्चित किया था, बीत गया। श्लोक -03
खोजते खोजते उन्हे वहाँ एक गुफा दिखाई दी, जिसका द्वार बन्द नही था। अर्थात खुला था। श्लोक- 07
वह गुफा ऋक्षबिल नाम से विख्यात थी।एक दानव उसकी रक्षा में रहता था। वानर गण बहुत थक गये थे, पानी पीना चाहते थे। श्लोक- 8
लता और वृक्षों से आच्छादित के भीतर से क्रोंच, हंस, सारस,तथा जल से भीगे हुए चक्रवाक पक्षी ( चकवे)  , जिनके अङ्ग कमलों के पराग से रक्त वर्ण के हो रहे थे।, बाहर निकले।उस बिल (गुफा) में उन्हे जल होने का सन्देह हुआ। श्लोक- 9 & 10
हनुमानजी ने कहा निश्चित ही इसमें पानी का कुआँ, या जलाशय होना चाहिये।तभी इस गुफा के द्वारवर्तीवृक्ष हरेभरे हैं। वानरों ने उस गुफा में प्रवेश किया। श्लोक- 16 & 17
उस अन्धेरे बिल (गुफा ) से सिंह,मृग और पक्षी निकलते दिखे। श्लोक - 18
नाना प्रकार के वृक्षों से भरी उस गुफा में वे एक योजन तट एक दुसरे को पकड़े हुए गये। श्लोक- 21
*(एक योजन चलने पर) तब उन्हें वहाँ प्रकाश दिखाई दिया। और अन्धकार रहित वन देखा, वहाँ के सभी वृक्ष सुवर्णमयी थे।* श्लोक - 24
*अर्थात गुफा आरपार खुला था।*
साल,ताल,तमाल,नागकेशर, अशोक,धव, चम्पा, नागवृक्ष और कनेर के वृक्ष फुलों से भरे थे। श्लोक- 26
वानरों ने वहाँ इंट,पत्थर,लकड़ी आदि पार्थिव वस्तुओं से निर्मित और स्वर्ण तथा वैदूर्य मणि से अलङ्कृत भवन देखे। वृक्षों में फुल और फल लगे थे। श्लोक- 30 , 31 & 32
मणि और सुवर्ण जटित पलंग, तथा आसन, और सोने,चाँदी, तथा कांसे के फुलपात्र , अगरु,चन्दन, फल, मूल आदि भोजन सामग्री, बहुमूल्य सवारियाँ, सरस मधु, मुल्यवान वस्त्र, कम्बल, कालीन,मृगचर्म और स्वर्ण के ढेर देखे। श्लोक- 32  से 38
वानरों ने उस गुफा में थोड़ी दूर पर किसी स्त्री को.देखा।जो नियमित आहार करती तपस्या में सलग्न थी। हनुमानजी ने उससे उसका परिचय पुछा। श्लोक- 39 से 41

*वाल्मीकि रामायण/ किष्किन्धा काण्ड/*  *एकपञ्चाशः सर्ग/*

हनुमानजी ने उसे कहा
हम भूख-प्यास से व्यथित हैं।और जानना चाहते हैं कि,यहाँ यह सब वैभव कैसे है? श्लोक- 02 से 09
तब उस बिल( गुफा) में स्थित उस मेरुसावर्णी की पुत्री स्वयम्प्रभा नामक उस तपस्वी स्त्री  ने उत्तर दिया - मयासुर दानव पहले दानवों का विश्वकर्मा था। उसने तपस्या कर  ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त कर शुक्राचार्य का सारा शिल्प - वैभव प्राप्त किया था।
मयासुर दानव ने यहाँ की सारी वस्तुओं का निर्माण करके कुछ काल तक यहाँ निवास किया था। कुछ काल बाद हेमा नामक अप्सरा से मयासुर दानव का सम्पर्क हो गया, यह जानकर जघानेश पुरन्दर (इन्द्र) ने मयासुर को मार भगाया। तत्पश्चात ब्रह्माजी ने यह गुफा और वैभव उस अप्सरा हेमा को सोप दिया।मेरी प्रिय सखी हेमा अप्सरा द्वारा प्रदत्त इस भवन की रक्षा करती हूँ। तुमलोग पहले फल-मूल खाकर जलपान कर फिर अपना परिचय और आने का प्रयोजन बतलाना। श्लोक   -11 & 19
*वाल्मीकि रामायण/ किष्किन्धा काण्ड/*  *द्विपञ्चाशः सर्ग/*
भोजन जलपान उपरान्त विश्राम करलेने पर हनुमानजी ने अपने सहित सबका परिचय और  राक्षस रावण और उसके द्वारा अपहृत  सीताजी की खोज का वृतान्त कहकर आने का प्रयोजन बतलाया। श्लोक-  01 से 08
हनुमानजी के निवेदन पर स्वयम्प्रभा ने बाहर निकलने हेतु नैत्र मुन्दने को कहा । वानरों के द्वारा आँखे बन्दकर हाथों से ढँकते ही स्वयम्प्रभा ने उन वानरों को गुफा से बाहर पहूँचा दिया।(उस एक योजन लम्बी अर्थात  लगभग 13 कि.मी लम्बी थी ।)
गुफा के बाहर पहूँचाकर उन्हे बतलाया कि, यह विन्द्यगिरि है, इधर  यह प्रसवण गिरि है।सामने सागर लहरा रहा है। ऐसा बतलाकर स्वयम्प्रभा अपनी गुफा म़े लोट गई। श्लोक - 23 से 32
*वाल्मीकि रामायण/ किष्किन्धा काण्ड/*  *त्रिपञ्चाशः सर्ग/*
तदन्तर उन वानरों ने महासागर देखा । श्लोक - 1
वानरों का वह एकमास बीत गया, जिसे राजा सुग्रीव ने लोटने का समय निश्चित किया था।  श्लोक- 2
विन्द्यगिरि के पार्श्ववर्ती पर्वत पर बैठकर वे सभी महात्मा वानर चिन्ता करने लगे। श्लोक-  3
जो वसन्त ऋतु में फलते हैं उन आम आदि वृक्षों की डालियों को मञ्जरी एवम् फूलों के अधिक भार से झुकी हुई तथा सेकड़ो लता बेलों से व्याप्त देख वे सभी सुग्रीव के भय से थर्रा उठे। श्लोक-  4
वे एक दुसरे को बताकर कि, अब वसन्त का समय आना चाहता है, राजा के आदेशानुसार एक माह के भीतर जो काम कर लेना चाहिए था , वह न कर सकने के  या उसे नष्ट कर देने के कारण भय के मारे भूमि पर गिर पड़े। श्लोक- 5
*वाल्मीकि रामायण/ किष्किन्धा काण्ड/*  *चतुःपञ्चाशः सर्ग/*
हनुमानजी जानते थे कि, बालीपुत्र अंगद अष्टाङ्ग बुद्धि, चार प्रकार के बल और चौदह गुणों से सम्पन्न है श्लोक।-  2
अष्टांग बुद्धि - 1-  सुनने की इच्छा रखना; 2 सुनना, 3 सुनकर ग्रहण करना, 4 ग्रहणकर धारण करना,  5उहापोह करना,6 अर्थ या तात्पर्य को समझना,7 तत्व ज्ञान सम्पन्न होना।
चार प्रकार के बल - 1 साम, 2 दण्ड,  3 भेद और चौथा दण्ड।

चौदह गुण -01 देशकाल ज्ञान,0 2 दृढ़ता,0 3 सब प्रकार के कष्टों को सहन करने की क्षमता,04  सभी विषयों का ज्ञान प्राप्त करना,0 5 चातुर्य (चतुरता), 06 उत्साह या बल,07 मन्त्रणा को गुप्त रखना,08 परस्पर विरोधी बातें न करना,09 शूरता,10 अपनी और शत्रु की शक्ति का ज्ञान, श्लोक 11 कृतज्ञता, श्लोक 12 शरणाङगत वत्सलता,  13 अमर्षशीलता,   14  और अचाञ्चल्य, ( स्थैर्य या गाम्भीर्य)।

*वाल्मीकि रामायण/ किष्किन्धा काण्ड/षट्पञ्चाशः सर्ग/*

पर्वत के जिस स्थान पर वे सब वानर आमरण उपवास करने बैठे थे उस स्थान पर गृध्रराज सम्पाति आये। श्लोक- 1 - 2
महागिरि विन्ध्य की कन्दरा से निकलकर सम्पाति ने जब वहाँ बैठे वानरों को देखा तब वे हर्षित होकर बोले - आज दीर्घकाल यह भोजन स्वतः मेरे लिये प्राप्त हो गया । वानरों में जो जो मरता जायेगा उसको में क्रमशः भक्षण करता जाऊँगा। श्लोक- 3 से 5
यह सुन अङ्गद हनुमानजी से बोले । श्लोक - 7
विदेह कुमारी सीताजी का प्रिय करने की इच्छा से गृध्रराज जटायु ने जो साहस पुर्ण कार्य किया था , यह सब आप लोगोंने सुना ही होगा। श्लोक- 9
धर्मज्ञ जटायु ने ही श्रीराम का प्रिय किया है। -12
गृध्रराज जटायु ही सुखी हैं जो युद्ध में रावण के हाथ मारे गये। श्लोक-13
महाराज दशरथ की मृत्यु, जटायु का विनाश और विदेह कुमारी सीता का अपहरण - इन घटनाओं से इस समय वानरों का जीवन संशय में पड़ गया है । श्लोक- 14
श्रीराम और लक्ष्मण को सीता के साथ वन में निवास करना पड़ा, राघव के बाण से बाली का वध हुआ और अब श्रीराम के कोप से  समस्त  राक्षसों का संहार होगा - ये कैकेयी को दिये वरदान से पैदा हुई है। श्लोक 15 &16
अङ्गद के मुख से उस वचन को सुन सम्पाति ने उच्च स्वर में पुछा। श्लोक- 18
यह कौन है जो जो मेरे प्राण प्रिय भाई जटायु के वध की बात कर रहा है। श्लोक - 19
जनः स्थान में राक्षस का गृध्र के साथ किस प्रकार का युद्ध हुआ? अपने भाई का नाम कई दिनों के बाद सुनाई दिया । श्लोक- 20
जटायु मुझसे छोटा गुणज्ञ, और पराक्रम के कारण प्रशंसनीय था। श्लोक- 21
दीर्घकाल के पश्चात आज उसका नाम सुनकर बड़ी प्रसन्नता हुई। आप लोग मुझे नीचे उतार दें । - 22
मुझे मेरे भाई का विनाश का वृतान्त सुनने की   इच्छा है। महाराज दशरथ मेरे भाई के मित्र कैसे हुए? श्लोक- 23
मेरे पंख सुर्य  की किरणों से जल गये हैं,इसलिये मैं उड़ नही सकता। किन्तु इस पर्वत से नीचे उतरना चाहता हूँ। श्लोक-24
*वाल्मीकि रामायण/ किष्किन्धा काण्ड/* *अष्टपञ्चाशः सर्ग/*
सप्पाति जी ने कहा-
एक दिन मेने भी देखा,दुरात्मा रावण सब प्रकार के गहनों से सजी हुई एक रुपवती युवती को हरकर लिये जा रहा था। श्लोक - 15
वह भामिनी 'हा राम ! हा राम! हा लक्ष्मण! की रट लगाती हुई अपने गहने फेंकती छटपटा रही थी। श्लोक- 16
श्रीराम का नाम लेनेसे मैं समझता हूँ, वह सीता ही थी। अब मैं उस राक्षस का घर का पता बतलाता हूँ, सुनो। श्लोक- 18
रावण नामक राक्षस महर्षि विश्रवा का पुत्र और कुबेर का भाई है। वह "लङ्का नामवाली नगरी में निवास करता है।" श्लोक - 19
(ध्यान दें लंका को केवल नगरी कहा है। सिंहल द्वीप/ श्रीलंका जैसा बड़ा स्थान नही हो सकता।) 

*यहाँ से शतयोजन (अर्थात लगभग 1287 कि.मी.) के अन्तर पर समुद्र में एक द्वीप है, वहाँ विश्वकर्मा ने अत्यन्त रमणीय लङ्का पुरी निर्माण किया है।'* श्लोक- 20
(नोट- शत योजन को अनुवादक ने  चार सौ कोस लिखा है अर्थात 1287 कि.मी.।)

उस नगरी की चहारदीवारी बहुत बड़ी है। उसी के भीतर पीले रंग की रेशमी साड़ी पहने सीता दीन भाव से निवास करती है। श्लोक- 23
(नोट- श्रीलंका के आसपास  चाहरदीवारी होना सम्भव नही है।)
बहुत सी राक्षसियों के पहरे में रावण के अन्तःपुर में अवरुद्घ है। श्लोक- 23
लंका चारों ओर से समुद्र से सुरक्षित है।पुरे सौ योजन (1287 कि.मी.) समुद्र को पार कर उसके दक्षिण तट पर पहूँचने पर रावण को देख सकोगे। श्लोक- 24 & 25

(नोट - अर्थात रावण की लंका नगरी खम्बात की खाड़ी के तट से दक्षिण में 1287 कि.मी. दुर  लक्षद्वीप समुह  के द्वीप पड़ते है। अर्थात लंका लक्षद्वीप में थी।  जिसकी राजधानी कवरत्ती है (या किल्तान द्वीप में हो सकती है। )
(नोट - उल्लेखनीय है कि, श्री लंका / सिंहल द्वीप जाने के लिये  भारत की मुख्य भूमि से जाया जा सकता है।
समुद्र पार कर नही जाया जा सकता।समुद्री मार्ग से जाने पर भारत की मुख्य भूमि की परिक्रमा कर जाना होगा और   बहुत अधिक दूरी हो जायेगी।)

*अब आगे का विवरण युद्ध काण्ड से* --
*वाल्मीकि रामायण/ युद्ध काण्ड/*  *चतुर्थ सर्ग/*
रामचन्द्रजी ने सुग्रीव को कहा --
सुग्रीव ! तुम इसी मुहूर्त में प्रस्थान की तैयारी करो। सुर्य देव दिन के मध्य भाग में पहूँचे हैं।इसलिये इस विजय नामक मुहूर्त में हमारी यात्रा उपयुक्त  होगी। श्लोक- 3
आज उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र है। कल चन्द्रमा का हस्त नक्षत्र से योग होगा। इसलिये सुग्रीव ! हमलोग आज ही सारी सेनाओं के साथ यात्रा कर दें। चलते चलते  उन्होनें पर्वत श्रेष्ठ सह्यगिरि को देखा। जिसके आसपास भी सेकड़ो पर्वत थे। श्लोक- 37
उस समय वानर राज सुग्रीव और लक्ष्मण से सम्मानित हुए धर्मात्मा श्रीराम सेनासहित दक्षिण दिशा की ओर बड़े जा रहे थे। श्लोक- 42
(आकाश साफ होने का वर्णन। श्लोक - 46 से 49)
वानर सेना दिन- रात चलती रही। श्लोक - 68
उन्होने रास्ते में कहीँ दो घड़ी भी विश्राम नही लिया। श्लोक- 69
चलते चलते वे सह्य पर्वत पर पहूँच कर सब वानर सह्य पर्वत पर चड़ गये। श्लोक- 70
श्री रामचन्द्रजी सह्य और.मलय पर्वत के विचित्र काननों, नदियों, तथा झरनों की शोभा देखते हुए यात्रा कर रहेथे। श्लोक- 71
श्री रामचंद्र जी महेन्द्र पर्वत (शायद कण्णूर का ईजीमाला पर्वत) के पास पहूँच कर उसके शिखर पर चढ़ गये। श्लोक - 92
महेन्द्र पर्वत पर आरुढ़ हो श्री राम जी ने समुद्र को देखा। श्लोक -93
इस प्रकार वे सह्य और मलय  को लाँघकर महेन्द्र पर्वत के समीपवर्ती समुद्र के तट पर जा पहूँचे। श्लोक- 94
उस (महेन्द्र पर्वत) से उतरकर शीघ्र ही सागर तटवर्ती वन में जा पहूँचे।
रामचन्द्रजी की आज्ञा से सुग्रीव ने समुद्र तटीय वन में सेना को ठहरा दिया। पढ़ाव डाला। श्लोक - 103

(नोट - सुग्रीव बहुत अच्छे भुगोल वेत्ता थे।महेन्द्र  नामक पर्वत बहुत दो से अधिक हैं यह सर्व स्वीकार्य है। सह्य और मलय दोनो पर्वत पश्चिमी घाट पर है। अतः यह महेन्द्र गिरि निश्चित ही पश्चिमी घाँट पर होगा। कुछ लोग विद्वान परम्परा निर्वाह हेतु  *किश्किन्धा काण्ड / एकचत्वारिशः सर्ग/18 से 27* में सुग्रीव जी द्वारा दक्षिणापथ का मार्ग वर्णन करते समय पाण्यदेशान्तर्गत महेन्द्र पर्वत तञ्जोर अथवा तनञ्जोर के निकट बतला कर बंगाल की खाड़ी की ओर जाना बतलाते हैं; उनसे मेरा निवेदन है कि, क्या सुग्रीव जी इतने मुर्ख थे कि,पुर्वी घाट पर उतरने के लिये सेना सहित पहले पश्चिमी पर पहूँच कर श्रम और समय दोनो नष्ट करते? वे पुर्वी घाट पर वे सीधे ही जा सकते थे।)

दिन के अन्त और रात के आरम्भ में चन्द्रोदय होने पर समुद्र में ज्वार आ गया। श्लोक 110- 111 अर्थात जिस दिन सागर तट पर  पहूँचे उस दिन पुर्णिमा थी।

*वाल्मीकीय रामायण/युद्धकाण्ड/एकोनविश सर्ग/*
समुद्र की शरण लेने की विभिषण की सलाह श्लोक- 31

विभिषण की सलाह पर सर्व सम्मति। श्लोक - 40
श्रीराम समुद्र तट पर कुशा बिछाकर धरना देने बैठे। श्लोक -41
*वाल्मीकीय रामायण/युद्धकाण्ड/एकविंश सर्ग/*
इस प्रकार समुद्र तट पर  तीन रात लेटे लेटे बीतने पर भी समुद्र देव प्रकट नही हुए । श्लोक 11-12
श्रीराम समुद्र पर कुपित हो गये। श्लोक- 13
श्रीराम ने अपने धनुष सेबड़े भयंकर बाण समुद्र पर छोड़े। श्लोक-  27
समुद्र मेंहुई हलचल को देख-
लक्ष्मण ने श्री राम का धनुष पकड़ कर रोका। श्लोक- 33
वाल्मीकीय रामायण/युद्धकाण्ड/द्वाविंश सर्ग/
श्रीराम ने ब्रह्मास्त का संधान किया श्लोक-  5
तब समुद्र के मध्य सागर सवयम् उत्थित हुआ। श्लोक- 17
चमकीले सर्पों के साथ जाम्बनद नामक स्वर्णाभूषण युक्त वैदुर्य मणि के सदृष्य श्याम वर्णीय समुद्र प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हुआ। श्लोक - 18
समुद्र ने पार होने का उपाय बतलाने का आश्वासन दिया। श्लोक - 29
श्री राम ने पुछा अमोघ ब्रह्मास्त्र किस स्थान पर छोड़ुँ? श्लोक - 30
समुद्र ने कहा कि,मेरे उत्तर तट पर द्रुमकुल्य नामक स्थान है। श्लोक 32
द्रमकुल्य स्थान में आभीर लोग रहते हैं। वे पापी दस्यु हैं।और मेरा ही पानी पीते हैं। श्लोक- 33
उनके स्पर्ष से मुझे भी पाप लगता है। कृपया उस स्थान पर/ उन पर   ब्रह्मास्त्र छोड़िये। श्लोक - 34
तदनुसार श्री राम ने द्रमकुल्य देश पर ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया। श्लोक - 35
वह स्थान पर मरुस्थल बन गया। श्लोक- 36
उस स्थान का नाम मरुकान्तार पड़ गया।
वह भूमि दुधारू पशुओं और विभिन्न औषधियों से सम्पन्न होगी यह वरदान दिया। श्लोक - 43
समुद्र ने विश्वकर्मा पुत्र नल का परिचय दिया और बतलाया कि नल समस्त विश्वकर्म (इंजीनियरिंग) का ज्ञाता है। श्लोक- 45
यह महोत्साही वानर पिता के समान योग्य है।मैं इसके कार्य को धारण करुँगा। श्लोक - 46
तब नल ने उठकर श्रीराम से बोला - 
मैं पिता के समान सामर्थ्य पुर्वक समुद्र पर सेतु निर्माण करुँगा। श्लोक -  48
समुद्र ने मुझे स्मरण करवा दिया है। मैं बिना पुछे अपने गुणों को नही बतला सकता था।  अतः चुप था। श्लोक- 52
मैं सागर पर सेतु निर्माण में सक्षम हूँ। अतः सभी वानर मिल कर सेतु निर्माण आज ही आरम्भ करदें। श्लोक 53
वानर गण वन से बड़े बड़े वृक्ष और पर्वत शिखर / बड़े बड़े पत्थर/ चट्टानें ले आये। श्लोक- 55
महाकाय  महाबली वानर यन्त्रों ( मशीनों) की सहायता से बड़े बड़े पर्वत शिखर / शिलाओं को तोड़ कर/ उखाड़़ कर समुद्र तक परिवहन (ट्रांस्पोर्ट) कर लाये। श्लोक -60
कुछ बड़े बड़े शिलाखण्डों से समुद्र पाटने लगे।कोई सुत पकड़े हुए था। श्लोक - 61
कोई नापने के लिये दण्ड पकड़े़ था, कोई सामग्री जुटाते थे। वृक्षों से सेतु बाँधा जा रहा था। श्लोक-  64 & 65

पहले दिन उन्होने चौदह योजन लंबा सेतु बाँधा। श्लोक-69

(नोट - तट वर्ती क्षेत्र में केवल भराव करने से काम चल गया अतः  180 कि.मी. पुल बन गया। आगे गहराई बढ़़ने और तरङ्गो/ लहरों का वेग बढ़ने से गति धीमी हो जायेगी।)

दुसरे दिन बीस का योजन सेतु तैयार हो गया  श्लोक 69

(अर्थात दुसरे दिन (20- 14 = 6 योजन  सेतु बना।छः  योजन अर्थात 77 कि.मी. पुल बना कर सेतु की कुल लम्बाई बीस योजन अर्थात 257 कि.मी. हो गई। आगे गहराई बढ़ने और तरङ्गो/ लहरों का वेग बढ़ने से गति धीमी हो गई।दुसरे दिन गति लगभग आधी ही रह गई।)

तीसरे दिन कुल इक्कीस योजन का सेतु निर्माण कर लिया। श्लोक 70
(अर्थात तीसरे दिन एक योजन  यानी 12.87 कि.मी. सेतु बन पाया और सेतु की कुल लम्बाई 21 योजन = 270 कि.मी. हो गई।

(नोट - गति कम पड़़ना स्वाभाविक ही है। दुसरे दिन गति आधी रह गई और तीसरे दिन से तो  एक एक योजन अर्थात  प्रतिदिन 12.87 कि.मी. ही पुल  बनने लगा।)

चौथे दिन वानरों ने बाईस योजन तक का सेतु बनाया। श्लोक- 71
(अर्थात एक योजन / 12.87 कि.मी.वृद्धि हुई और कुल 22 योजन =   283 कि.मी. पुल बना।)
पाँचवें दिन वानरों ने कुल 23 योजन सेतु बना लिया। श्लोक- 72
(अर्थात एक योजन वृद्धि कर सेतु की कुल लम्बाई 23 योजन = 296 कि.मी. हो गई।)
इस प्रकार विश्वकर्मा पुत्र नल ने  ( पाँच दिन में वानरों की सहायता से भारत की मुख्य भूमि से रावण की लंका तक   23 योजन = लगभग 300 कि.मी. का )  सेतु समुद्र में  तैयार कर दिया।
नोट - इस प्रकार भारत की मुख्य भूमि पश्चिमी घाट के केरल की नीलगिरी के कोजीकोड से  किल्तान द्वीप की ओर दुरी लगभग तीन सौ तीन कि.मी. का सेतु / पुल तैयार कर लिया।)

सुचना - पुरातत्व विदों द्वारा केरल के कण्णूर से लक्ष्यद्वीप के किल्तान द्वीप के बीच वास्तविक रामसेतु खोजा जाना चाहिए।

(सूचना - अर्थात रावण की लंका नगरी खम्बात की खाड़ी के तट जहाँ से हनुमानजी ने सीताजी की खोज हेतू छलांग लगाई थी से दक्षिण में 1287 कि.मी. दुर  लक्षद्वीप समुह  के द्वीप पड़ते है। तथा  पश्चिमी घाँट के केरल की नीलगिरी के कण्णूर  से  किल्तान द्वीप की ओर दुरी लगभग तीनसौ तीन कि.मी.है।दोनो ठीक बैठती है। अर्थात लंका लक्षद्वीप में थी।  राजधानी कवरत्ती है या किल्तान द्वीप में हो सकती है। कण्णूर और लक्ष्यद्वीप का घनिष्ठ राजनीतिक सम्बन्ध भी सदा से रहा है। कण्णूर से सोलोमन के मन्दिर के लिए लकड़ियाँ जहाज द्वारा गई थी। ईराक के उर से व्यापारिक सम्बन्ध भी थे।)

(नोट यह विशुद्ध विश्वकर्म / इंजीनियरिंग का कमाल था। न कि राम नाम लिखने से पत्थर तैराने का  कोई चमत्कार। तैरते पिण्डों को बान्ध कर पुल बनाना भी इंजीनियरिंग ही है किन्तु यहाँ उस तकनीकी का प्रयोग नही हुआ।
किन्तु नाम लिखने से पत्थर नही तैरते बल्कि जैविकीय गतिविधियों से निर्मित कुछ पाषाण नुमा संरचना समुद्र में तैरती हुई कई स्थानों में पायी। जाती है। इसमें कोई चमत्कार नही है। पाषाण नुमा संरचनाएँ जो बीच में पोली / खाली होती है उनमें हवा हरी रह जाती है। ऐसे पत्थरों का घनत्व एक ग्राम प्रति घन सेण्टीमीटर से कम होने के कारण वे भी बर्फ के समान तैरते हैं। )
नोट --श्लोक 76 में सेतु की लम्बाई शत योजन और चौड़ाई दश योजन लिखा है। निश्चित ही यह श्लोक प्रक्षिप्त है क्यों कि,  नई दिल्ली से आन्ध्रप्रदेश के चन्द्रपुर से आगे असिफाबाद तक की दुरी के बराबर  सेतु की लम्बाई 1288 कि.मी. कोई मान भी लेतो 129 कि.मी. चौड़ा पुल तो मुर्खता सीमा के पार की सोच लगती है। दिल्ली से हस्तिनापुर की दुरी भी 110 कि.मी. है। उससे भी बीस कि.मी.अधिक चौड़ा पुल तो अकल्पनीय है।

अस्तु यह स्पष्ट है कि, दासता युग में सूफियों के इन्द्रजाल अर्थात वैज्ञानिक और कलात्मक जादुगरी से प्रभावित कुछ लोगों ने मिलकर पुराने ग्रन्थों में भी ऐसे चमत्कार बतलाने के उद्देश्य से ऐसे प्रक्षिप्त श्लोक डाल दिये। जो मूल रचना से कतई मैल नही खाते। ऐसे ही

श्लोक 78 में वानरों की संख्या सहत्र कोटि यानी एक अरब जनसंख्या बतलाई है।
भारत की जनसंख्या के बराबर एक अरब वा्नर  श्रीलंका में भी नही समा पाते।

अस्तु शास्त्राध्ययन में स्वविवेक जागृत रखना होता है।

खम्बात की खाड़ी के तट कोरोमण्डल दहेज के लूवारा ग्राम के परशुराम मन्दिर  से हनुमानजी ने सीताजी की खोज हेतू छलांग लगाई थी से दक्षिण में 1287 कि.मी. दुर लक्षद्वीप समुह  का किल्तान द्वीप पड़ता है। तथा केरल के  पश्चिमी घाँट के  नीलगिरी के कोजीकोड  के रामनाट्टुकारा और पन्थीराम्कवु या कन्नुर से  किल्तान द्वीप की ओर दुरी लगभग तीन सौ तीन कि.मी.है। दोनो ठीक बैठती है अर्थात लंका लक्षद्वीप में थी।   राजधानी कवरत्ती है या किल्तान द्वीप में रावण की लंका हो सकती है।

पुरे प्रकरण को पढ़कर भारत का नक्षा  एटलस  लेकर जाँचे।
कि,  भारत के पश्चिमी घाँट के केरल की नीलगिरी के कण्णूर (केरल) से  किल्तान द्वीप की ओर दुरी लगभग तीनसौ तीन कि.मी. है। और गुजरात के खम्बात की खाड़ी से दहेज नामक स्थान से किल्तान की दुरी भी लगभग 1290 कि.मी. है।
अस्तु लगभग किल्तान द्वीप के आसपास ही रावण की लंका रही होगी। लक्षद्वीप में किल्तान द्वीप राजधानी करवत्ती से उत्तर में है।
अध्ययन कर पता लगाया जा सकता है कि किल्तान या करवत्ती या कोई डुबा हुआ द्वीप में से रावण की लंका कौनसा द्वीप था।
यह कार्य पुरातत्व विभाग और पुरातत्व शास्त्रियों का कार्य है।

रामेश्वरम कहाँ है ---

परशुराम जी का मूल नाम राम है। परशु धारण करनें के कारण उनका नाम परशुराम पड़ गया। यह भी सम्भव है कि, अयोध्या नरेश श्री राम की ख्याति बड़नें के कारण विशिष्ठिकृत नाम के रूप में परशुराम नाम प्रचलित हुआ हो।

रामायण में श्रीराम द्वारा रामेश्वरम शिवलिङ्ग स्थापना का वर्णन नही है। किन्तु वाल्मीकि रामायण के बहुत बाद के राक्षसों और विशेषकर रावण के प्रति आस्थावान तमिल कवि कम्बन की रचना इरामावतारम् के आधार पर यह मान्य हुआ। 

केरल में त्रिशुर भी गुरुवायूर से 38 कि.मी दूर त्रिशुर के शिवलिङ्ग की स्थापना परशुराम जी ने की थी।

अतः सम्भव है कि, कवि कम्बन ने त्रिशुर वाले रामेश्वरम ज्योतिर्लिङ्ग का वर्णन करनें में स्व स्थान तमिलनाड़ु में वर्णित कर दिया हो या बाद में किसी ने परिवर्तन किया हो। अतः त्रिशुर ही वास्तविक रामेश्वरम होना चाहिए।

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

दक्षिण भारतीय परम्परा अनुसार संन्यासी का निरग्नि होने के कारण अग्निहोत्र वाले देवयज्ञ के निषेध का कारण और स्पष्टीकरण।

भगवान आद्य शंकराचार्य जी सहित सभी दक्षिण भारतिय आचार्यों, सन्तों और वेदान्तियों में यह परम्परागत भ्रम है कि, संन्यासी को निरग्नि होकर यज्ञ नहीं करना चाहिए।
वास्तव में तो संन्यासी को वनवासी ही रहना चाहिए, एक स्थान पर दुसरे रात्रि नही रहना चाहिए, अपने लिए भोजन नहीं पकाना चाहिए, केवल बिना तोड़े, बिना उखाड़े, बिना खोदे, जो पत्र, फल, कन्द- मूल भूमि पर पड़े मिल जाए या बिना मांगे कोई कुछ खाद्य वस्त्रादि दे दे वही ग्रहण करना चाहिए। वस्त्र भी फटकर गिरजाए तो दिगम्बर ही रहे। खाद्य न मिलने पर भूखा ही रहे। शय्या त्याग तो वानप्रस्थ के अन्तिम चरण में ही कर देते हैं।लेकिन इन नियमों की अवहेलना कर दी। और अग्निहोत्र का त्याग कर दिया।

इस भ्रम के पीछे रहस्य यह है कि, हिरण्यगर्भ ब्रह्मा जी के मानस पुत्र अर्धनारीश्वर एक रुद्र और सनक, सनन्दन, सनत्कुमार और सनातन अग्निहोत्र देवयज्ञ नहीं करते थे।
तो उसका उत्तर पुरुष सूक्त में यज्ञ के वर्णन में ही है।
जब न कोई सामग्री थी, न कोई देवता था, न विधि थी तो यज्ञ होने का प्रश्न ही नहीं। तब तक तो वस्त्र भी नहीं थे। ये लोग प्रथम साकार रचना थे। इसके पहल हिरण्यगर्भ ब्रह्मा तक तो सब निराकार, या तरङ्गाकार या आकाश या वायु या सूर्य के समान आकृति वाले थे, जिन्हें वस्त्र या आसन की आवश्यकता ही नहीं होती।
ब्रह्म यज्ञ,देवयज्ञ, नृ यज्ञ, भूत यज्ञ और पित्र यज्ञ (श्राद्ध नहीं) नामक पञ्च महायज्ञ, संस्कार और अश्वमेध यज्ञ, राजसूय यज्ञ आदि की विधि-विधान और निषेध तो प्रजापति के पुत्र दक्ष प्रथम और प्रसुति ने की।  पितृ श्राद्ध के विधि-विधान और निषेध की व्यवस्था प्रजापति के पुत्र रुचि प्रजापति और आकुति ने की। तथा योग जिसे अध्यात्म नाम से जाना जाता है, उसके विधि-विधान-निषेध प्रजापति के पुत्र कर्दम प्रजापति और देवहुति ने की। और महर्षि कपिल को सिखाया।
अद्वैत वेदान्तियों का यह तर्क दमदार है कि, देव यज्ञ में इदम् विष्णवे न मम् बोलना होता है जो द्वैत/ त्रेत की पुष्टि करता है। एक तरफ उपनिषद श्रवण पश्चात महावाक्यों के श्रवण, चिन्तन मनन से अद्वैत सिद्धि का प्रयत्न और दुसरी तरफ द्वैत स्वीकारना दोनों एक साथ सम्भव नहीं है।
इसका उत्तर यह है कि, केवल महावाक्य श्रवण, चिन्तन,  मनन, निदिध्यासन के समय ही देव यज्ञ न करें बस उसके पहले तो सबको पञ्च महायज्ञ और वर्णाश्रम धर्म पालन अवश्य करणीय कार्य (कर्तव्य) कर्म है।
मीमांसा - श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है कि, विद्वत् ज्ञानी महाजनों का अनुसरण जन सामान्य करता है। यदि ये  महाजन यज्ञ न करेंगे तो सबलोग यज्ञ धर्म त्याग देंगे। और वही हुआ भी। इस लिए श्री कृष्ण ने कहा मेरे लिए कोई कर्तव्य शेष नहीं होते हुभी मैं कार्य कर्म करता हूँ।
दुसरा बादरायण ने शारीरिक सूत्र में लिखा है कि, ना विशेषात। अर्थात ज्ञानी संन्यासी के लिए कोई विशेष विधि-निषेध नहीं है। वे यथा परिस्थिति जो उचित समझें वही करें। क्योंकि वे किसी आदेश से परे हैं।
इसलिए ऋषभदेव जी और भरत मुनि जैसे कुछ संन्यासियों ने ज्ञान प्राप्ति के बाद भी यज्ञादि कर्मों का त्याग जारी रखा। जबकि दक्ष प्रजापति और विदेह जनक जैसे ज्ञानियों ने ज्ञान प्राप्ति पश्चात भी वर्णाश्रम व्यवस्था अनुसार यज्ञ जारी रखे।

अद्वैत वेदान्तियों का विरोध करने वाले महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने भी भगवान आद्य शंकराचार्य जी के पहले से दक्षिण भारत में प्रचलित प्रचलित संन्यास परम्परा को ही मान्य किया।

शनिवार, 31 जनवरी 2026

हरि कृपा कैसे होगी?

हम कितने मुर्ख है! इस बात को आरती में स्वीकार भी किया गया है। कि, 
 *मैं मुरख खल कामी। कृपा करो भर्ता।* 
लेकिन वैदिक शास्त्रीय मत स्पष्ट है कि,
भगवान कृपा तब करेंगे जब श्वसन भी सावधानी पूर्वक हो। हर स्वासप्रश्वास पर भी आपका नियन्त्रण हो। इसीलिए सन्ध्या और जप भी प्राणायाम पूर्वक करने का विधान है।
प्राणायाम करने के लिए यम (धर्म) का  सतर्कता पूर्वक नियमित पालन हो।  (अर्थात यम- नियम पालन हो।) फिर दैहिक स्थैर्य और इन्द्रियों पर नियन्त्रण हेतु आसन सिद्ध हो तब प्राणायाम किया जा सकता है।
इसके बाद ही प्रत्याहार द्वारा मन पर नियन्त्रण किया जा सकता है। तब ही सही ढङ्ग से (धारणा-ध्यान-समाधि)अन्तरङ्ग योग सधेगा।
फिर आप यज्ञ में जब इन्दम् इन्द्राय न मम् बोलोगे, तो आपका भाव भी यही रहेगा कि, यह इन्द्र का है, मेरा नहीं।
तब समर्पण बन पाएगा। और हर समय यह ध्यान रह पाएगा कि,न यह जगत मेरा है न मैं इस जगत का हूँ बल्कि यह सब परमात्मा का है, मैं भी केवल परमात्मा का ही हूँ। 
अर्थात पूर्ण समर्पण होगा तब देव (विष्णु) की कृपा होगी।

बुधवार, 14 जनवरी 2026

सायन संक्रान्तियाँ दिन में शंकु की छाया देखकर और निरयन संक्रमण आकाश में चित्रा तारे को देखकर समझा जा सकता है।

परम्परागत उत्तरायण और वैदिक उत्तर तोयन तो 21/22 दिसम्बर से प्रारम्भ होता है। यह पृथ्वी पर छाया देखने से स्पष्ट समझ आता है। आकाश में देखने पर समझ नहीं आयेगा। 
20/21 मार्च, 22 जून, 22/23 सितम्बर और 22 दिसम्बर और पुनः 21 मार्च को मध्याह्न में छत या  या मैदान में शंकु या बिजली के खम्भे की छाया पर निशान लगा कर देखने से स्पष्ट हो जाएगा कि, 21 सितम्बर से 22 दिसम्बर तक सूर्य उत्तर से दक्षिण की ओर जा रहा है। और 22 दिसम्बर से 21 मार्च तक दक्षिण से उत्तर की ओर जा रहा है।
मतलब 22 दिसम्बर को सूर्य सर्वाधिक दक्षिण में था।
इससे उलट 21 मार्च से 22 जून तक सूर्य दक्षिण से उत्तर की ओर जाता दिखेगा। फिर 22 जून से 21/22 सितम्बर तक सूर्य उत्तर से दक्षिण में जाता दिखेगा। अर्थात 22 जून को सूर्य सर्वाधिक उत्तर में रहता है।
इसी प्रकार 21 मार्च और 22 सितम्बर को दिन-रात बराबर रहते हैं। भूमध्य रेखा पर सूर्य ठीक पूर्व में उदय और पश्चिम में अस्त होता है। यही वास्तविक पूर्व और पश्चिम दिशा होती है। अतः प्रातः और सायं काल की छाया की के चिह्न को मिलाकर एक रेखा खीच लो, ये आपके स्थान की ठीक-ठीक पूर्व और पश्चिम दिशा बतलाएगी।
 ऐसे ही उज्जैन में प्रति वर्ष 22 जून को मध्याह्न में बिजली के खम्भे की छाया नहीं बनती । ऐसे ही भारत में उज्जैन से दक्षिण में स्थित किसी भी ग्राम या नगर में 08 जून से 23 जून के बीच किसी एक दिन मध्याह्न में बिजली के खम्भे की छाया नहीं बनती है।
जबकि 
निरयन संक्रमण केवल आकाश में चित्रा तारे को देखकर ही जाना जा सकता है।
निरयन मकर संक्रमण को  सूर्यास्त पश्चात देखने पर चित्रा तारा ठीक सिर पर दिखता है। इससे स्पष्ट हो जाएगा। कि आज मकर संक्रमण है।
और 
कर्क संक्रमण के दिन सूर्योदय के पहले चित्रा तारा ठीक सिर पर दिखता है। यह कर्क संक्रमण की पहचान है।
निरयन मेष संक्रमण के दिन सूर्योदय के ठीक पहले चित्रा तारा ठीक पश्चिम में दिखेगा। और निरयन तुला संक्रमण के दिन सूर्यास्त के ठीक बाद में चित्रा तारा ठीक पूर्व में दिखता है।

यह नक्षत्रिय सौर पद्धति और निरयन सौर पद्धति का खगोलीय प्रमाण है। इसे आकाश में ही देखा जा सकता है लेकिन भूमि पर इसका कोई प्रभाव नहीं दिखता है। अर्थात इसे वेधशाला में भी देखा जा सकता है। हमारे देश के तो पुराने किसानों तक को यह जानकारी रहती है।*

*लेकिन कुछ सनातन धर्मी लोग भी और विदेशी तथा अब्राहमिक मतावलम्बी सनातन धर्म के मुख्य ग्रन्थ वेदों, ब्राह्मण ग्रन्थों, शुल्ब सूत्रों, श्रोत सूत्रों और गृह्य सूत्रों तथा ग्रह गणित के भारतीय सिद्धान्त ग्रन्थों में चित्रा तारे को क्रान्तिवृत के मध्य में अर्थात क्रान्तिवृत के 180° पर होने के उल्लेख को प्रमाण नहीं मानते हैं, बल्कि काल्पनिक मानते हैं; उन लोगों के लिए यह कोई प्रमाण नहीं है।*
और
इसी प्रकार जो भारतीय सनातन धर्मी केवल विदेशियों और अब्राहमिक मतावलम्बियों के कथन को ही ब्रह्मवाक्य मानने हैं; उन दास मानसिकता के हिन्दुओं के लिए भी कोई प्रमाण है ही नहीं।

निरयन मकर संक्रमण क अर्था क्या है ? क्यों मनाया जाता है?

जिज्ञासा ---
 *वैदिक दक्षिणायनान्त दिवस, अर्थात शीतान् के छः मासों की समाप्ति और और उष्णान की छः मासी प्रारम्भ दिवस, वैदिक सहस्य मास प्रारम्भ दिवस, पूरी भूमि पर सबसे छोटा दिन सबसे और बड़ी रात वाला दिन उत्तरी ध्रुव पर मध्यरात्रि, दक्षिण ध्रुव पर मध्याह्न वाला दिन, दसवीं सायन संक्रान्ति जिसे महाभारत काल से उत्तरायण प्रारम्भ दिवस कहा जाने लगा है 21 दिसम्बर 2025 रविवार को रात्रि 08:33 बजे हो चुकी है। जिसे भूमि पर देखा जा सकता है। तो; फिर* 
 *दिनांक 14 जनवरी 2026 बुधवार को दोपहर 03 बजकर 08 मिनट पर निरयन सौर धनुर्मास समाप्ति अर्थात सूर्य का निरयन धनु राशि से निकलकर कर निरयन मकर राशि में संक्रमण का पर्व या निरयन मकर संक्रमण क्यों कहा जाता है?* 
 *इस समय ऐसा क्या होता है जिस कारण भारत के आस-पास के लगभग सभी देशों सहित पूरे भारत वर्ष में मनाया जाता है?* 
उत्तर --
 *निरयन मकर संक्रमण वास्तव में आकाशीय घटना है। सूर्य का परिभ्रमण भूमि जिस मार्ग से करती है उसे क्रान्तिवृत कहते हैं।*
*वेदों में चित्रा तारे को इस क्रान्तिवृत का मध्य बिन्दु अर्थात 180° कहा गया है।* 
*क्रान्तिवृत में चित्रा तारे से 180° पर क्रान्तिवृत का प्रारम्भ बिन्दु है। जिसे अश्विन्यादि बिन्दु अर्थात अश्विनी नक्षत्र का प्रारम्भ बिन्दु कहते हैं।*
*क्रान्तिवृत में चित्रा तारे से 180° पर क्रान्तिवृत का प्रारम्भ बिन्दु को वर्तमान में निरयन मेषादि बिन्दु भी कहा जाता है।*
लेकिन *चित्रा तारे से 180° पर अश्विनी नक्षत्र के प्रारम्भ बिन्दु जिसे निरयन मेषादि बिन्दु कहते हैं उस बिन्दु पर वर्तमान में कोई तारा नही है।*  
*जिस समय उक्त निरयन मेषादि बिन्दु पर सूर्य और भूमि का 270° का कोण बनता है तो उस घटना को निरयन मकर संक्रमण कहते हैं।*
प्रकारान्तर से 

*जिस समय चित्रा तारे पर भूमि और सूर्य के बीच 90° का कोण बनता है उस समय को निरयन मकर संक्रमण कहते हैं।*
*यही घटना दिनांक 14 जनवरी 2026 बुधवार को दोपहर 03 बजकर 08 मिनट पर घटि।*
*आकाश और नक्षत्रों को पहचानने वाले किसान तक इस घटना को देख सकते हैं।* 
 
*देवताओं और स्वर्गादि लोकों को मानने वाले समस्त सनातन धर्मी, जैन, बौद्ध और खालसा सब हर्षोल्लास के साथ सूर्य के निरयन मकर संक्रमण का पर्व मनाते हैं।*

रविवार, 11 जनवरी 2026

मेरे सिद्धान्त (थ्योरी) और उनकी खोज का समय।

सृष्टि उत्पत्ति के उर्ध्वमूलम अधः शाखम का वृक्ष का वर्तमान स्वरूप समझ में आया था। जिसके पीछे में 1968 के आस-पास से पड़ा था जब पहली बार नालछा में नाना जी के घर कल्याण के जनवरी (वार्षिक) अंक में श्रष्टि उत्पत्ति की पौराणिक कथा पढ़ी थी।
आलिराजपुर में था तब 1991 में सर्वटे बस स्टैंड के सामने बजरङ्ग लॉज में रुका था तब स्पेक्ट्रम में दो पट्टी और होना चाहिए।
और
                        परमात्मा 
                             !
                           ॐ
                             !
                         परब्रह्म
                            /\
                  विष्णु         माया  
                              !
                            ब्रह्म 
                             /\
     सवितृ प्रभविष्णु       श्री लक्ष्मी सावित्री 
                               !
                        अपर ब्रह्म 
                              /\
      नारायण श्री हरि      नारायणी कमलासना 
                                !
                          हिरण्यगर्भ 
                                 /\
                         त्वष्टा       रचना 
                                   !
                              प्रजापति 
                                 /।\ 
   दक्ष-प्रसुति,    रुचि-आकुति,    कर्दम-देवहुति 
                                    !
                             वाचस्पति 
                                   /\
                             इन्द्र     शचि
         
ऐसे 101 तत्व हैं। इस प्रकार 
सृष्टि उत्पत्ति वाले ब्लॉग में विस्तार से समझाया है।

कोई गेलेक्सी का आवर्तकाल (केन्द्र का परिभ्रमण समय) मिल्की-वे (आकाश गङ्गा) से कम हो और उसमें कोई तारे का गेलेक्सी के केन्द्र के परिभ्रमण का समय (आवर्तकाल) भी कम हो और उस तारे के ग्रह का आवर्तकाल सब मिलकर भूमि के आवर्तकाल से 360 गुणा अधिक हो तो वहाँ का एक वर्ष हमारे 360 वर्ष के बराबर होगा। उनका अहोरात्र हमारे एक वर्ष के बराबर होगा।उनका दिनमान और रात्रिमान उत्तरायण और दक्षिणायन के बराबर होगा। अर्थात स्वर्ग।

ऐसे ग्रह की खोज कर स्वर्ग और ब्रह्म लोक की खोजा जा सकता है।
ऐसे ही छोटा सप्तर्षि मण्डल (शिशुमार चक्र) में वैकुंठ की खोज भी हो सकती है।
यह विचार पुराणों मे वर्णित ग्रह नक्षत्र, ध्रुव और शिशुमार चक्र के वर्णन पढ़ कर आया। तब 1974-75 में हम धार में धोबी बाखल वाले मकान में रहतेथे।

उसी समय स्पेक्ट्रम में रेडियो वेव के पहले दो वेव और होना चाहिए ता कि, तरङ्ग दैर्ध्य अनन्त तक और आवृत्ति 00 तक हो सके।

मङ्गल और बृहस्पति के बीच दो ग्रह होना चाहिए यह बात भी उसी मकान में सूझी थी। उसी आधार पर मेने राशियों के स्वामी निर्धारित किए थे।
उसका विकसित रूप भेज चुका हूँ।
लेकिन बाद में पता चला कि, दोनों ग्रह टूट कर बिखर गए या ये दोनों अभी ग्रह नहीं बन ही पाये और वर्तमान में अवान्तर ग्रहों की दो पट्टियाँ है।

फिर नये सिरे से नक्षत्र देवताओं के आधार पर निरयन राशियों और नक्षत्रों के स्वामी ग्रह, दिशा, वर्ण, देवता, लिङ्ग, तत्व आदि का चार्ट बनाया और अंक विद्या और वास्तु से सम्बन्ध 1986-87 की है। जब में हासलपुर में था।

ये सब मेने मेरे ब्लॉग में लिखा है और मेरी डायरी में नोट इन सब की फोटो मेने श्री शिशिर भागवत को दे रखी है ताकि, इनका विकास हो सके।

बुधवार, 7 जनवरी 2026

चमत्कार कथाओं और मूर्ति पूजा में मेरी श्रद्धा क्यों नहीं है?

महाभारत में भगवान श्री कृष्ण ने बहुत कम चमत्कार दिखाये। जबकि, महर्षि सान्दिपनि से उन्होंने बत्तीस विद्याएँ और चौसठ कलाओं में इन्द्रजाल (जादू) भी सीखा था।
1 गुरुमाता के बच्चों को वापस लाकर देना। इसे प्रत्यक्ष चमत्कार कह सकते हैं।
2 द्रोपदी की साड़ी बढ़ाना। लेकिन यह अप्रत्यक्ष चमत्कार था। जानने वाले ही समझ पाये। प्रत्यक्ष में तो द्रोपदी का चमत्कार दिख रहा था।
2 दूसरी बार बार ही प्रत्यक्ष चमत्कार दिखाना पड़ा जब शान्ति सन्धि प्रस्ताव लेकर धृतराष्ट्र की राज सभा में उपस्थित होने पर दुर्योधन ने भगवान श्रीकृष्ण को बान्धने का प्रयत्न किया तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपना तन बढ़ना प्रारम्भ किया। और दुर्योधन को चुनौती दी की बान्धकर बता।
3 तीसरी बार जयद्रथ वध के समय कौरव सेना का मुख पूर्व दिशा में था जयद्रथ बार बार पीछे मुड़कर देखता रहता था कि, सूर्यास्त हुआ या नहीं, उसे लगातार सूर्य दिखता रहा लेकिन कौरव सेना को सूर्यास्त होते दिखा और वे अति प्रसन्न होकर उत्सव मनाने लगे। जयद्रथ की सुरक्षा पर से कौरव सेना का ध्यान हट गया क्योंकि अर्जुन ने भी धनुष छोड़ दिया था। जयद्रथ हत्प्रभ होकर सुरक्षा की गुहार करता रहा लेकिन उत्सव के हल्ले में उसकी बात किसी ने नहीं सुनी और भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सूर्य दिखाकर बतलाया कि, सूर्यास्त नहीं हुआ है जल्दी से बाण चलाकर जयद्रथ का सिर काट कर तपस्यारत उसके पिता की गोद में डालदे। ताकि जयद्रथ का सिर उसके पिता द्वारा ही भूमि पर गिरकर उनके ही शाप के अनुसार उनका ही सिर टुकड़े-टुकड़े हो जाए।
अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण की बात यथावत मान ली। और जैसे ही जयद्रथ का सिर कटा वैसे ही पश्चिम आकाश में सूर्य चमकने लगा। और जयद्रथ के पिता का सिर फटने के बाद सूर्यास्त हो गया।
लेकिन यह भी अ प्रत्यक्ष चमत्कार ही था।
एक प्रत्यक्ष चमत्कार श्रीमद्भागवत पुराण में उल्लेखित है - द्वारिका में यज्ञ पर बैठ श्रीकृष्ण को ब्राह्मण द्वारा अपने आठ पुत्रों के गायब हो जाने पर अनेकानेक अपशब्द कहे। अर्जुन की सुरक्षा व्यवस्था भी असफल हो गई। वचन पालन में अर्जुन आत्मदाह को तत्पर हुआ। लेकिन तभी श्रीकृष्ण का यज्ञ पूर्ण हुआ और वे पश्चिम सागर के मार्ग से पाताल में जाकर भुमा से मिलकर ब्राह्मण बालकों को वापस लेकर आये और उन्हें ब्राह्मण को सोप दिया।

क्योंकि सनातन धर्म में चमत्कार दिखाना निषिद्ध है। और चमत्कार से प्रभावित होकर नमस्कार करना भी निषिद्ध है।
लेकिन मुर्ख हिन्दुओं (दासों) ने सूफियों की जादूगरी से प्रभावित होकर इस्लाम स्वीकार कर लिया और मरने के बाद भी उनकी कबर पूजना प्रारम्भ कर दिया।

यदि मुर्तियाँ/ प्रतिमाएँ चमत्कार करती थी तो
भगवान श्रीकृष्ण के और वेदव्यास जी के समय लगभग 5100 ईसा पूर्व या आधुनिक इतिहासकारों की माने तो भी सिद्धार्थ गोतम बुद्ध के समय अर्थात लगभग 500ईसा पू्व ज़रथ्रुष्ट्र ने ईरान में मग और मीढ संस्कृति की हजारों मूरतियाँ तोड़ी,
 सन 622 से 632 ईस्वी के बीच सऊदी अरब,यमन, ओमान, आर्मेनिया, अजर बेजान, टर्की, सीरिया, इराक ईरान, जोर्डन, मिश्र सभी स्थानों की हजारों वर्ष पुरानी मूर्तियाँ मोह मद और उसके अनुयायियों ने तोड़ दी तब तो एक भी मुर्ती ने कोई चमत्कार नहीं दिखाया। उसके बाद अफगानिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान, किर्गिस्तान, कजाकिस्तान, तिब्बत में भी कई हजारों मूर्तियाँ मोह मदन लोंगों ने तोड़ी, 
उसके बाद 712 ईस्वी के बाद से आज तक ईराक के खलिफा, तुर्क, कजाक अफगान मुस्लिमों ने पुरे भारत में हजारों प्राण-प्रतिष्ठा की हुई मूर्तियाँ तोड़ दी तब तो एक भी मुर्ती स्वयम् अपनी रक्षा तक नहीं कर पाई!
चार शंकराचार्य, रामानुजाचार्य जी, निम्बार्काचार्य जी के पीठाधीश्वर, श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु स्वयम और उनके अनुयायाई, वल्लभाचार्य जी और उनके अनुयाई, रामानुजाचार्य जी और उनके अनुयाई कोई भी इन मूर्तियों की रक्षा नहीं कर पाये, इनके हाथों स्थापित और प्राण-प्रिष्ठित मूर्तियाँ स्वयम अपनी आत्म रक्षा नहीं कर पाई। 
इसलिए मुझे ऐसे किसी चमत्कार में कभी भी श्रद्धा नहीं रही।