शुक्रवार, 20 मार्च 2026

वैदिक उत्तरायण सूर्य की स्थिति उत्तर गोलार्ध में लेकिन ऋतुएँ केवल सौर मास पर आधारित नहीं होती।

संवत्सर -  वसन्त विषुव से अगले वसन्त विषुव तक लगभग 365 दिन 05 घण्टे 48 मिनट 45.2 सेकण्ड हम संवत्सर के साथ वसते (रहते) हैं; फिर संवत्सर पीछे रह जाता है और हम अगले संवत्सर के साथ हो लेते हैं। 
वैदिक अयन शब्द का ठीक-ठीक अर्थ आज तक मुझे नहीं मिला। अयन मतलब उत्तर में गति या उत्तर में स्थिति। जैसे नारायण नार (जल) में ही स्थिति और जल में ही गति?
या
उत्तर दिशा की ओर गति?
उत्तरायण का अर्थ यदि सूर्य की स्थिति या गति उत्तरी गोलार्ध में लेते हैं तो इसके समर्थन में ---
शतपथ ब्राह्मण 2/1/3 तथा तै.सं. 6/5/3 तथा नारायण उपनिषद अनु. 80 में *देवा ऋतवः वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतु उत्तरायण में होती है।* 
यहाँ कहीँ भी शरद ऋतु के आधे भाग का तो नाम ही नहीं है। और वसन्त ऋतु को भी आधी नहीं बतलाया गया। बल्कि वसन्त, ग्रीष्म वर्षा ऋतु ही कहा है।
और
मैत्रायण्युपनिषद में उत्तरायण और नारायण उपनिषद अनु 80
*उदगयन शब्द और देवयान / देवलोक शब्द स्पष्ट आये हैं।* 
महाभारत भीष्म पर्व के अध्याय 25 से 43 के अन्तर्गत भगवान श्रीकृष्ण ने विभूति वर्णन अध्याय 10 श्लोक 35 में ऋतुओं में वसन्त ऋतु कहा है। जो उसकी पूर्णता का सूचक है।
और देवयान मार्ग वर्णन अध्याय 08 श्लोक 24 में उत्तरायण के छः महीने कहा है। अर्थात   देवयान मार्ग में उत्तरायण के पूरे छः महीने आते हैं और मैत्रायण्युपनिषद तथा नारायण उपनिषद अनु 80 में भी उत्तरायण को ही देवयान कहा है। तथा शतपथ ब्राह्मण 2/1/3 तथा तै.सं. 6/5/3 तथा नारायण उपनिषद अनु. 80 में देवा ऋतवः वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतु । कथन से स्पष्ट हो जाता है कि, वसन्त सम्पात से शरद सम्पात के बीच का समय उत्तरायण होता है।
लेकिन 
यदि उत्तर की ओर गति माने तो दक्षिण परम क्रान्ति से उत्तर परम क्रान्ति सायन मकर संक्रान्ति (22 दिसम्बर) से सायन कर्क (22 जून) तक मानना होगा।
लगभग सभी पुराणों और  पञ्चाङ्ग निर्माण के ग्रह गणित के सिद्धान्त ग्रन्थ इसका समर्थन करते हैं।
यहाँ यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि, उत्तरायण - दक्षिणायन शब्द वैदिक हैं पौराणिक नहीं और कोई गणितीय अवधारणा भी नहीं है।  अतः ये प्रमाण कोटि में नहीं आते हैं।

ऋतु - शतपथ ब्राह्मण 2/1/3 तथा तै.सं. 6/5/3 तथा नारायण उपनिषद अनु. 80 में *देवा ऋतवः वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतु उत्तरायण में होती है को प्रमाण मानें तो मधुमास वसन्त सम्पात से प्रारम्भ मानना होगा। और ईष मासारंभ शरद सम्पात से मानना होगा।

लेकिन यदि दक्षिण परम क्रान्ति सायन मकर संक्रान्ति (22 दिसम्बर) से उत्तर परम क्रान्ति  सायन कर्क (22 जून) तक उत्तरायण मानकर सायन मीन संक्रान्ति से वसन्त सम्पात (सायन मेष संक्रान्ति) तक मधुमास मानें तो फिर एक समस्या और है कि, दक्षिणी गोलार्ध में दक्षिण अफ्रीका महाद्वीप, दक्षिण अमेरिका महाद्वीप, आस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैण्ड के निवासियों के लिए वसन्त सम्पात (सायन मेष संक्रान्ति) के समय वसन्त ऋतु मानें या शरद ऋतु?  और शरद सम्पात (सायन तुला संक्रान्ति) के समय शरद ऋतु माना जाए या वसन्त ऋतु ?
जब उत्तर अमेरिका महाद्वीप और अफ्रीका महाद्वीप के उत्तर में ग्रीष्म ऋतु होती है, गर्मी पड़ती है तभी दक्षिण अमेरिका महाद्वीप और अफ्रीका महाद्वीप के दक्षिण भाग में शिशिर ऋतु रहती है। ठण्ड पड़ती है।
भूमध्य रेखीय देशों में बारहों मास ग्रीष्म और वर्षा होती रहती है। तो मरुस्थलीय क्षेत्रों में वर्षा होती ही नहीं तो वर्षा ऋतु कैसे होगी।
ध्रुवीय प्रदेशों में सदैव शीत ही रहती है ग्रीष्म ऋतु की कल्पना ही नहीं की जा सकती।
अतः ऋतुओं को महीनों से नहीं जोड़ा जा सकता है।
हमने जो वैदिक मधु- माधव मास अर्थात वसन्त सम्पात से सायन मिथुन संक्रान्ति तक वसन्त ऋतु मानी है यह दक्षिण में हरियाणा पञ्जाब से उत्तर में ताजिकिस्तान अर्थात उत्तर अक्षांश 30°
 40° उत्तर अक्षांश तक ही सही है। और पौराणिक मधु-माधव मास अर्थात सायन मीन संक्रान्ति से सायन वृषभ संक्रान्ति तक मानें तो यह उज्जैन लगभग उत्तर अक्षांश 20° से उत्तर अक्षांश 30° तक पञ्जाब हरियाणा तक ही सही रहेगा।

मंगलवार, 17 मार्च 2026

भारतीय राजनीति अधिकांश समय ही सनातन वैदिक वर्णाश्रम धर्म और संस्कृति तथा भारतीय हितों के विरुद्ध ही रही

कितने ही प्रमाण दे दो कि, रा.स्व.से.संघ युरोपीय अब्राहमिक मत के हित साधन हेतु इटली के फासिस्ट दल के अनुकरण में सावरकर, हेडगऺवार और मुञ्जे ने बहुत सोच समझ कर खड़ी की गई संस्था है।
यह संस्था वैदिक सनातन वर्णाश्रम धर्म और भारतवर्ष के विरुद्ध और  राजनीतिक विचारधारा में  व्यक्तिवाद तथा आर्थिक विचारधारा में पूँजीवाद को भारत में स्थापित करने के उद्देश्य से बनाई गई संस्था है।
लेकिन छोटे कार्यकर्ताओं में यह प्रचार किया जाता है कि, संघ का सोच ही राष्ट्रवाद है तथा प्रत्येक भारतीय हिन्दू है चाहे उसका मत, पन्थ, सम्प्रदाय पारसी, यहुदी, ईसाई, इस्लाम, वाहबी आदि अब्राहमिक मत हो या तान्त्रिक, खालसा, जैन, बौद्ध, लिङ्गायत, नाथ पन्थ हो। भारतीय शब्द के स्थान पर हिन्दू और भारतीयता के स्थान पर हिन्दुत्व , व्यक्तिवादी पूंजीवादी फासिस्ट विचारधारा को राष्रवाद नाम देकर केवल भ्रमित कर दिया जाता है।
इस कारण जन सामान्य में भी रा.स्व.से.संघ को सनातन धर्म-संस्कृति और भारत राष्ट्र हितैषी राष्ट्रवादी सङ्गठन ही मानने का भ्रम त्यागना नहीं चाहता है।
दुर्भाग्य से भारत में साम्यवादी विचारधारा नास्तिक के स्थान पर केवल इस्लामी विचार बन कर रह गई। उसके देखा-देखी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने सेकुलरिज्म का अर्थ सनातन धर्म का विरोध और ईसाई - मुस्लिमों का तुष्टिकरण मान लिया। यही विचारधारा लोहियावादी समाजवादियों ने भी अपना ली। अंग्रेजों के कट्टर अनुयाई द्रविड़ दलों का एजेंडा शुरुआत से अति सिमीत दृविड़, तमिल पक्ष और उत्तर भारतियों तथा हिन्दी विरोध ही रहा।
परिणाम स्वरूप दयानन्द सरस्वती जी के अनुयाई शुद्ध भारतीय राजनयिक विचारधारा वाले महर्षि दयानन्द सरस्वती, श्रद्धानन्द जी से प्रेरित उस काल के आर्यसमाजी लाला लाजपतराय के अनुयाई सचिंद्रनाथ सान्याल द्वारा अमर बलिदानी खुदीराम बोस जैसे क्रान्तिकारियों से प्रभावित और प्रेरित होकर  साम्यवादी भारतीय क्रांतिकारी संगठन -- हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी और   पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल, श्री चन्द्रशेखर आजाद, श्री भगतसिंह, श्री राजगुरु, श्री अशफाक उल्ला खाँ जैसे लोगों की हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचआरए) 
श्री चन्द्रशेखर आजाद ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन ( एचआरए ) का नाम में  सोशलिस्टब्द जोड़ कर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन कर दिया। 19 दिसम्बर 1927 को पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल जी को गोरखपुर जेल में 27 फरवरी 1931 को चन्द्रशेखर तिवारी "आजाद" को प्रयागराज के अल्फ्रेड पार्क में और 23 मार्च 1931 को लाहोर जेल में सरदार भगतसिंह जी अमर बलिदान के बाद उक्त राष्ट्रीय आन्दोलन कमजोर हुआ उसके बाद कोई शुद्ध सनातन वैदिक भारतीय विचारधारा वाला राजनीतिक दल नहीं रहा।
इस रिक्त स्थान का लाभ उठाने के लिए अंग्रेजी शासन योजना बना ही रहा था।
इसके बाद अंग्रेजों का चातुर्य देखने और शिक्षा लेने जैसा रहा।
उन्होंने सर सय्यद अहमद और मोहम्मद इकबाल को सनातन धर्मियों के विरुद्ध भड़काया। भीमराव रामोजी सपकाले (अम्बेडकर) को वैदिक सनातन वर्णाश्रम धर्म के विरुद्ध भड़काया।

सार्वदेशक हिन्दू सभा ---
लाला लाजपतराय, मदन मोहन मालवीय द्वारा सार्वदेशक हिन्दू सभा सङ्गठन की स्थापना हरिद्वार में 1907 में की।
फिर 
राजनितिक दल के रूप में हरिद्वार में सर्वदेशक हिन्दू सभा की स्थापना 1915 लाला लाजपतराय, मदन मोहन मालवीय द्वारा की गई।

सार्वदेशिक हिन्दू सभा के अध्यक्ष ---
1915 से 1921 तक पण्डित मदन मोहन मालवीय सार्वदेशिक हिन्दू सभा के अध्यक्ष थे।

1921 से 1931 तक 
लाला लाजपत राय सार्वदेशिक हिन्दू सभा के अध्यक्ष रहे ।

इसके बाद अंग्रेजों का चातुर्य देखने और शिक्षा लेने जैसा रहा। लाला लाजपत राय जैसे शुद्ध सनातन वैदिक वर्णाश्रम धर्म संस्कृति के पोषक कट्टर भारतीय राष्ट्र वादी लाला लाजपत राय के बाद 1931 में बालकृष्ण शिवराम मुञ्जे हिन्दू महासभा के अध्यक्ष बने बन गये। 
और अंग्रेज़ो का कुटिल राजनीतिक खेल प्रारम्भ हो गया।

1931 से 1937 तक
बालकृष्ण शिवराम मुञ्जे अध्यक्ष रहे।
उधर हिन्दू सभा के पञ्जाब शाखा के अध्यक्ष भाई परमानन्द त्यागी ने 1933 में मुस्लिमों को अफगानिस्तान भेजने और द्विराष्ट्र सिद्धान्त का स्वीकार करने का लाभ लेने के लिए अंग्रेजी शासन तत्पर होगया।

अखिल भारतीय हिन्दू महासभा
1937 से 1943 तक अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के अध्यक्ष विनायक दामोदर सावरकर  रहे। 
विनायक दामोदर सावरकर ने सार्वदेशिक हिन्दू सभाका नाम हिन्दू महासभा नाम कर के इटली के फासिस्ट दल का अनुयाई बना दिया दिया।

1945 से 1946 तक डॉक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के अध्यक्ष रहे।
डॉक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने 21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली में भारतीय जनसङ्घ की स्थापना की और जो 06 अप्रैल 1980 से भारतीय जनता पार्टी कहलाती है।

 बालकृष्ण शिवराम मुञ्जे जो सार्वदेशिक हिन्दू सभा के 1931 – 37 तक अध्यक्ष रहे वे केशव बलराम हेडगेवार के राजनीतिक अनुयाई थे। लेकिन उसी समय केशव बलराम हेडगेवार आखिल भारतीय हिन्दू महासभा के उपसभापति रहे। 
केशव बलिराम हेडग॑वार के राजनीतिक अनुयाई बालकृष्ण शिवराम मुंजे का योगदान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बनवाने में  बहुत अधिक रहा। संघ के संस्थापक और बालकृष्ण शिवराम मुंजे के राजनितिक गुरु  डॉक्टर केशव बलिराम हेडग॑वार ने अपने शिष्य बालकृष्ण शिवराम मुञ्जे को इटली के फासिस्ट दल के अनुसार सङ्गठन बनाने का प्रशिक्षण लेने इटली  भेजा। जब मुञ्जे दल का सञ्चालन का और शाखा लगाने का
प्रशिक्षण ले कर लौटे तब डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में 27 सितम्बर 1925 ईस्वी में भारत में वैसा ही सङ्गठन राष्ट्रीय स्वयम् सेवक सङ्घ की स्थापना की।
लेकिन 
सावरकर की हिन्दू महासभा गांधी जी जैसा जन आन्दोलन खड़ा नहीं कर पाई। यह टीस सावरकर और उसके अनुयायियों को सदैव खलती रहती है। इसलिए विनायक दामोदर सावरकर सदैव से ही गांधी जी का विरोध करते रहे।

सोमवार, 9 मार्च 2026

बिना खाए-पीए 80 वर्ष तक रहने वाले स्व. श्री प्रहलाद ज्ञानी जो 91 वर्ष जीवित रहे।

प्रहलाद जानी जिनको चुनरीवाला माताजी भी कहते थे, क्योंकि, वे चुनरी ओढ़ते थे। गुजरात के रहने वाले जानी ने दावा किया था कि वे 1940 से 2020 तक (करीब 80 साल) बिना अन्न-जल के रहे, जिसे उन्होंने देवी अंबा की कृपा बताया। 

भारतीय रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) के वैज्ञानिकों ने उन पर 2010 में कड़ी निगरानी में एक अध्ययन किया था, जिसमें दावा किया गया कि वे बिना कुछ खाए-पिए रह सकते थे। 
 उनका जन्म 13 अगस्त 1929 को गुजरात के चराडा गांव में हुआ था। उन्होंने दावा किया था कि 11 साल की उम्र में देवी अंबा के दर्शन के बाद उन्होंने अन्न-जल का पूरी तरह त्याग कर दिया था।
तब से वे हमेशा एक महिला की तरह श्रृंगार करते थे, लाल साड़ी (चुनरी) पहनते थे और नाक में नथ पहनते थे, इसलिए उन्हें 'माताजी' कहा जाता था।
2003 और 2010 में दो बार उनका वैज्ञानिक परिक्षण भी हुआ।
अहमदाबाद के स्टर्लिंग अस्पताल में डॉक्टरों और वैज्ञानिकों की टीम (जिसमें DRDO के वैज्ञानिक भी शामिल थे) ने उन पर दो बार रिसर्च की।
 2010 के परीक्षण के दौरान उन्हें 15 दिनों तक लगातार CCTV की कड़ी निगरानी में रखा गया। इस दौरान उन्होंने न तो कुछ खाया-पिया और न ही शौच या मूत्र त्याग किया।
डॉक्टर यह देखकर हैरान थे कि उनके मूत्राशय (bladder) में मूत्र बनता था, लेकिन वह शरीर द्वारा फिर से सोख लिया जाता था।
रहस्यमयी सिद्धांत: वैज्ञानिकों का अनुमान था कि उनके शरीर ने भूख और प्यास के प्रति एक अत्यधिक अनुकूलन (extreme adaptation) विकसित कर लिया था। जानी जी का स्वयं का मानना था कि उनके तालू (palate) में एक छेद है जिससे उन्हें "दिव्य अमृत" प्राप्त होता है।
 वे गुजरात के अंबाजी मंदिर के पास एक गुफा में रहते थे। 91 वर्ष की आयु में 26 मई 2020 को गुजरात के बनासकांठा में उनका निधन हुआ।

गुरुवार, 5 मार्च 2026

ग्राम की चारों दिशाओं में क्षेत्रपाल प्रतिमा।

चित्र में माता जी के आगे-आगे दो बालक समान वीर हनुमान जी जैसे और कालभैरव देखे होंगे ये वीर कहलाते हैं; ये ही गाँव के चारों ओर क्षेत्रपाल के रूप में स्थापित किए जाते थे।
अधिकांश गाँवों में केवल खेड़ापति हनुमान ही होते हैं लेकिन जहाँ नाथ सम्प्रदाय का गढ़ और तान्त्रिक अधिक होते हैं, वहाँ भैरव प्रतिमा भी रहती है। जिसमें प्रायः धड़ से ऊपर-ऊपर धड़ और मुख ही होता है।

शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

भारत कैसा हो?

चेतावनी।
सनातन वैदिक धर्म, जाति (मूल भारतीयता) और ऋषभदेव के पुत्र भरत चक्रवर्ती का राज्य क्षेत्र भारतवर्ष (राष्ट्र-राज्य) की सुरक्षा तभी सम्भव है; जब प्रत्येक नागरिक स्वस्थ्य, सुघड़, सुन्दर, सम्पन्न, समृद्ध,सुखी, सानन्द और बलवान होने के साथ-साथ बुद्धिमान, विवेकवान, चतुर, आशु निर्णय क्षमता युक्त, कट्टर वैदिक सनातन धर्म और संस्कृति का पालक-पोषक, केवल भारतवर्ष (स्वराष्ट्र) के प्रति निष्ठावान, कर्तव्य पथ में सजग प्रहरी होकर धनुर्वेद (सैन्यशास्त) निपुण हो और ऐसे सब नागरिक मिलकर सशक्त, समृद्ध, भविष्य की तकनीकी और रणनीति को ध्यान में रखते हुए अस्त्र-शस्त्रादि से सम्पन्न, समृद्ध, उन अस्त्र-शस्त्रादि के सञ्चालन, संधारण (रखरखाव), और विविध उपयोग जानने वाले कुशल सैनिकों से सेवित हो।


अभी हमें बहुत तैयारी करनी है।
अन्यथा चर्च और मस्जिद ही हमारा भविष्य होगा।

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

ग्रहण काल में क्या करें - क्या न करें।

प्रथम तथ्य तो यह है कि, मूर्ति पूजा जैसे अवैदिक कर्म को छोड़कर ग्रहण की अवधि में भी कोई भी वैदिक कर्म में कोई रोक नहीं है।-  
ग्रहण के समय में 
1 ब्रह्मयज्ञ अर्थात शास्त्र पठन-पाठन, ॐ का जप, गायत्री मन्त्र का जप, या कोई भी वैदिक मन्त्र जप करना ही चाहिए। नदी में खुले आसमान के नीचे करना और भी अधिक अच्छा माना जाता है।
2 देव यज्ञ - वैद मन्त्रो के साथ अग्निहोत्र करके देवताओं को आहुति देना चाहिए।
3 नृयज्ञ - गुरुकुलों, ब्रह्मचारियों, रोगी, बालकों असहायों और अशक्तों की सेवा करना ही चाहिए।
4 भूत यज्ञ, गो, आदि पाल्य पशुओं, कुत्ता, कौवा, चींटी आदि जन्तुओं, पेड़-पौधे आदि वनस्पतियों की सेवा पञ्च बलि निकालना करना ही चाहिए।
सूखा मेवा , स्वर्ण आदि का दान करना ही चाहिए।
5 पितृ यज्ञ -- अशक्त, असहाय और रुग्ण वृद्धौ , गुरुजनों , नगर में प्रवेश न करने वाले संन्यासियों की सेवा करना ही श्राद्ध है।
यह श्राद्ध कर्म करना ही चाहिए। भूखे बच्चे, वृद्ध, बिमार या गर्भवती स्त्रियों से यदि भूख सहन नहीं हो पा रही हो तो उन्हें सुखे मेवे या सेब जैसे गुदादार फल या शकरकन्द (रतालू) जैसे कन्द-फल आदि से उनकी भूख मिटाने का प्रयत्न करें।
फिर भी न रह पाए तो तुलसी दल, दुर्वा, कुश, स्वर्ण, चान्दी आदि रखकर सुरक्षित किया हुआ पका भोजन भी खिला सकते हैं।
यही श्राद्ध कर्म है।

ये सभी वैदिक कर्तव्य कर्म आवश्यक है करना ही चाहिए।
लेकिन मूर्ति पूजा और विशेषकर लिङ्ग-योनि स्पर्श और पूजा पूर्णतः निषिद्ध है।

होलिका दहन वैदिक नव सस्येष्टि कर्म का ही विकृत संस्करण है। और धुलि वन्दना और वसन्तोत्सव भी वैदिक कर्म है।
इसलिए चन्द्रग्रहण में होलिका दहन, धूलिवन्दन, वसन्तोत्सव का कोई निषेध नहीं है।

होलिका दहन के नियम - विधि-निषेध।

1 *फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा का उत्तरार्ध अर्थात भद्रा से रहित हो, प्रदोष व्यापिनी हो, तब होलिका दहन करना चाहिए ।*
2 *यदि दोनों दिन प्रदोष व्यापिनी पूर्णिमा हो, तब दूसरे दिन ही होलिका दहन करना* चाहिए,कारण यही है कि पहले दिन भद्रा से युक्त होलिका दहन उचित नहीं।

3(क) *यदि दूसरे दिन प्रदोष को पूर्णिमा स्पर्श न करें और पहले दिन प्रदोष में भद्रा हो तथा दूसरे दिन शाकल्यपादिता पूर्णिमा तिथि हो अर्थात साढ़े तीन प्रहर तक अथवा उससे अधिक पूर्णिमा तिथि हो और उससे अगले दिन प्रतिपदा वृद्धि गामिनी हो तो ऐसी स्थिति में दूसरे दिन प्रदोष व्यापिनी प्रतिपदा में ही होलिका दहन होना चाहिए।* 


3 (ख) *यदि दूसरे दिन प्रदोष को पूर्णिमा स्पर्श न करें और पहले दिन प्रदोष में भद्रा हो तथा दूसरे दिन शाकल्यपादिता पूर्णिमा तिथि हो अर्थात साढ़े तीन प्रहर तक अथवा उससे अधिक पूर्णिमा तिथि हो औरयदि प्रतिपदा का ह्रास हो तब पहले दिन भद्रा के पुच्छ काल में अथवा भद्रा के मुख को छोड़कर, भद्रा में ही होलिका दहन किया जाना चाहिए।*

4 *यदि दूसरे दिन प्रदोष को पूर्णिमा स्पर्श न करें और पहले दिन निशिथकाल से पहले ही भद्रा समाप्त हो जाए तो भद्रा समाप्त होने पर होलिका दहन करना चाहिए, परंतु यदि भद्रा निशीथकाल से बाद में समाप्त हो तो भद्रा के मुख को छोड़कर, भद्रा काल में ही अथवा पुच्छ काल में होलिका दहन करनी चाहिए ।*

5 *श्री विद्याधर शर्मा गौड़ जी ने निर्णय सिंधु के द्वितीय परिच्छेद के फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा निर्णय में कहा..*

*अथ परेन्हि ग्रस्तोदयस्तदा पूर्व दिने भद्रावर्ज रात्रौ चतुर्थयामे विष्टिपुच्छे वा होलिका कार्या...*
अर्थात 
 *यदि दूसरे दिन ग्रस्तोदय चंद्र ग्रहण हो तो पूर्व दिन ही भद्रा के पुच्छ काल में अथवा उस रात्रि के चतुर्थयाम में होलिका दहन करें।*

6 निष्कर्ष-- *(जैसा कि निर्णय सिंधु में श्री विद्याधर शर्मा गौड़ जी ने कहा)*

*अतः पूर्णिमा तिथि के चतुर्थ प्रहर की प्रथम पाँच घटि अर्थात भद्रा के मुख को छोड़कर पुच्छ काल से पूर्व का समय अधम, पुच्छ काल मध्यम तथा चतुर्थयाम सर्वोत्तम काल के रूप में स्वीकार करना चाहिए।*
इसके अलावा यह सत्य  है कि साधारण नियमानुसार ग्रहण काल में होलिका दहन का निषेध नहीं, परन्तु मूर्धन्य विद्वान विद्याधर शर्मा गौड़ जी के वचनानुसार विशेष परिस्थितियों में ग्रहण काल में होलिका दहन से बचना चाहिए।


7 धूलिवन्दन पर्व *धर्म सिंधु, निर्णय सिंधु तथा अन्य जितने भी ग्रंथ हैं उन सभी में यही प्रमाण प्राप्त होता है कि होलिका विभूति वन्दन/वसंतोत्सव करने हेतु प्रतिपदा, सूर्योदय कालिक होनी चाहिए।*