शनिवार, 5 सितंबर 2026

मन्त्र सिद्धि

वास्तविकता यह है कि, किसी भी देवता के किसी भी मन्त्र की सिद्धि के लिए सर्वप्रथम उस देवता के वैदिक मन्त्र दृष्टा से दीक्षा लेकर उनके आदेशानुसार अमावस्या से अमावस्या पर्यन्त या पूर्णिमा से पूर्णिमा तक कृच्छ चान्द्रायण व्रत करके अपनी व्यक्तिगत समस्त धन-सम्पदा दान करके, ग्राम/ नगर के मध्य खड़ा होकर अपने द्वारा किए गए समस्त मानसिक, वाचिक और शारीरिक अपराध अर्थात पापों को सार्वजनिक रूप से प्रकट कर स्वीकार कर क्षमा प्रार्थना करना होता है।
फिर गुरु के निर्देशानुसार किसी तपोस्थली पर बैठ कर नैष्टिक ब्रह्मचर्य पालन करते हुए नित्य पञ्च महायज्ञ करते हुए जीवन निर्वाह हेतु अत्यावश्यक केवल फल आदि सात्विक आहार लेते हुए पहले उस देवता के कमसे कम दस लाख मन्त्र जप करें या पुरुश्चरण पूर्ण कर जप किए गए मन्त संख्या का दशांश आहुति देकर अग्निहोत्र करें, फिर जप किए गए मन्त्र संख्या का शतांश तर्पण करें, फिर जप किए गए मन्त्र संख्या का सहस्त्रांश श्राद्ध करें , फिर जप किए गए मन्त्र संख्या का दश सहस्त्रांश ब्राह्मण भोजन कराकर उन्हें समुचित दक्षिणा प्रदान करें। उन्हें सौ कदम छोड़ने जाकर कमी के लिए क्षमा प्रार्थना कर आशिर्वाद लें।
उसके बाद गुरु के आदेश पर उस देवता के पौराणिक मन्त्र का निर्धारित संख्या में जप, होम, तर्पण, श्राद्ध, और ब्राह्मण भोजन करवा कर वैदिक मन्त्र जप में रह गई कमी की पूर्णता कर मन्त्र को पुष्ट करें।
फिर गुरुजनों को प्रणाम कर उनसे बीज मन्त्र सीखकर उसका जप कर देवता को प्रकट प्रणाम पूजा आदि कर उस देवता द्वारा प्रदत्त शक्ति को धारण कर लें।
इसके बाद वैदिक मन्त्र, पौराणिक मन्त्र और बीज मन्त्र का एक हजार जप रोज करता हुआ सायन सौर संक्रान्ति , निरयन सौर संक्रमण, शुक्ल पक्ष की अष्टमी, पूर्णिमा, कृष्ण पक्ष की अष्टमी और अमावस्या को वैदिक मन्त्र के साथ 108 आहुति देकर पौराणिक मन्त्र जप कर एकसौ आठ बार बीज मन्त्र पढ़कर देवता को प्रकट कर उनकी सेवा पूजा कर कृपा प्राप्त कर पुष्टि करता रहे।
जब भी सार्वजनिक हित में अत्यावश्यक हो
बीज मन्त्र का उच्चारण कर जल छिड़क कर आये सङ्कट से मुक्ति दिला सकता है।
या किसी भी धुल या तिनके आदि किसी भी वस्तु को अभिमन्त्रित कर फैंक कर शत्रु पर प्रहार कर उसे यथोचित दण्ड दे सकता है।
केवल बीज मन्त्र का जप नहीं होता है।

शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

शिवलिङ्ग पर मुखाकृति बनाना शैव और पाशुपत आगम के विरुद्ध है।

सारस्वत (सिन्धु घाटी की) सभ्यता के समय इराक और सीरिया से आकर बसे तान्त्रिक व्यापारियों द्वारा मोहन जोदड़ो में उनके घरों में छुपकर लिङ्ग और योनि के प्रतिक और ध्यान मुद्रा में बैठे पशुपालक (पशुपति) की प्रतिमाएँ बनाकर पूजना प्रारम्भ कर दिया था।
वैदिक लोग इनका विरोध करते थे।
फिर 
लगभग 345 ईसा पूर्व से 329 ईसापूर्व में महापद्मनन्द राजा के समय शालिग्राम शिला विष्णु लिङ्ग, जलाधारी में फिट बेलनाकार शिवलिङ्, मातृलिङ्ग बिजोरा निम्बू, बेडोल चौड़ा चिकना पत्थर का विनायक लिङ्ग, और त्रिकोणीय पत्थर का भैरव लिङ्ग तो प्रचलित होने लगे थे।
उसी समय जैनों ने चैत्य (मन्दिर) बनाकर ऋषभदेव की मूर्ति बनाकर पूजा प्रारम्भ कर दी थी।
लेकिन किसी भी लिङ्ग अर्थात चिह्न पर आँख-नाक और चेहरा बनाना प्रचलित नहीं था। सम्भवतः कुछ शैवों ने ऐसा प्रयोग किया होगा तो शैव आगम, पाशुपत आगम में इसे निषिद्ध घोषित कर दिया।
लेकिन आजकल तो उज्जैन के महाकालेश्वर मन्दिर में महाकाल ज्योतिर्लिङ्ग पर भाँग आदि से चेहरा बना कर निषेधाज्ञाओं का उलङ्घन तो किया ही; बल्कि शिवलिङ्ग पर कभी अर्धनारीश्वर तो नारायण-श्रीहरि, तो कभी विनायक की मुखाकृति बनाना प्रारम्भ कर दिया। जो आगम ग्रन्थों की आज्ञाओं का सर्वथा उलङ्घन है।
ऐसे ही इसके देख-देखी सिन्दूर पुती विनायक प्रतिमों और भैरव प्रतिमाओं पर भी चेहरा बनाना प्रारम्भ हो गया है। ये सभी आगमोक्त निषिद्ध कर्म हैं।

गुरुवार, 13 अगस्त 2026

मेकाले के मानस पुत्रों का षड़यंत्र।

इन अंग्रेजी में सोचने वाले मेकाले पुत्रों को भारत देश और राष्ट्र नहीं दिखता है, अमेरिका और रूस जैसा केवल एक राजनीतिक गठबन्धन ही लगता है। या अमेरिका और चीन जैसा क्षेत्रों को हड़प कर बना एक राष्ट्र लगता है।
यदि सुत्त पिटक पढ़ो तो पता लगता है कि, सिद्धार्थ गोतम बुद्ध स्वयम् वेदों और ब्राह्मणों का अत्यधिक आदर करते थे।
चार सौ साल बाद श्रीलंकाई और तत्कालीन ब्रह्म देश म्यांमार के बौद्धों द्वारा संचालित अभिधम्मपिटक में वेद विरुद्ध मत और ब्राह्मण विरोधी मत घुसाए गए।
भगवान श्रीकृष्ण के चचेरे भाई अरिष्टनेमी जो जैनियों के तीर्थंकर हैं तक अष्टाङ्ग योग साधना और सांख्य दर्शन जैसे वेदों के प्रति आसक्ति दर्शन के ही अनुयाई थे।
गुरु ग्रन्थ साहिब में अधिकांश पद कबीरदास जी रचित हैं। और वेदों और ब्राह्मणों के प्रति अतिशय आदर दर्शाया गया है। गुरु नानक देव के पुत्र चन्द्र देव ने उदासीन अखाड़ा की स्थापना की थी, और उदासीन अखाड़ा के साधु सन्त अमृतसर हरि मन्दिर साहिब में यज्ञ-हवन, पूजा-पाठ और योग साधना करते थे।
वह तो अंग्रेजो ने मास्टर ताराचंद जैसे अपने अनुयायियों के माध्यम से खालसा पन्थ के अनुयायियों को सनातन धर्म से अलग हो कर अल्पसंख्यक कहलाने के लाभ बतलाये और भड़काया।
भगवान श्री कृष्ण के सबसे अधिक भक्त और मन्दिर दक्षिण भारत में तमिलनाडु, केरल, आन्ध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में हैं।
भगवान श्री रामचन्द्र जी के वन गमन सम्बन्धित महत्वपूर्ण तीर्थ महाराष्ट्र, कर्नाटक और केरल में है।
महेन्द्र पर्वत के आस-पास भगवान परशुराम जी के द्वारा स्थापित परशुरामेश्वरम मन्दीर केरल में गुरुवायुर, कोझिकोड और कण्णुर क्षेत्र में है। वहाँ श्रीकृष्ण भक्त भी हैं।
उसके बाद सर्वाधिक श्रीकृष्ण भक्त बङ्गाल और उड़ीसा में है।
सौर सम्प्रदाय के मन्दिर गुजरात और उड़ीसा में हैं।
पुरे भारत का प्रत्येक सम्प्रदाय वेदों को सर्वोच्च प्रमाण मानता है।
यह सब मेकाले के मानस पुत्रों को नहीं दिखता।
पूरे विश्व में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर भाषा बदल जाती है। फिर भी भारत में संस्कृत मूल और तमिल मूल की भाषाएँ ही प्रचलित है।
ऐसे ही पूरे विश्व में भौगोलिक परिस्थितियों के अनुकूल पहनावा, वेश-भूषा भी बदलती है। लेकिन मेकाले के मानस पुत्र भाषा भेद और भुषा भेद ही दर्शाकर भारत को विभिन्न संस्कृतियों का गठबंधन सिद्ध करते रहते हैं। और अनेकता में एकता बतला कर भारतियों की प्रशंसा बटोरने में सफल हो जाते हैं।
जबकि छद्म रूप से वे भारत को विभिन्न टुकड़ों में बँटा हुआ सिद्ध करते हैं।

बुधवार, 12 अगस्त 2026

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी से मेरे मतभेद।

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी से मेरे मतभेद -
1 आर्य समाजी ॐ को देवनागरी में जैसा लिखा जाता है वैसा ही पढ़ा जाता है के आधार पर ओ३म् लिखते हैं। जबकि मैं ॐ ही लिखता हूँ।

2 महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी देव, देवता, सिद्ध, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर , नाग,असुर, दैत्य, दानव, राक्षस आदि योनि नहीं मानते थे। देवलोक, पाताल, नर्क आदि भी नहीं मानते थे।
लेकिन मैं मानता हूँ।
3 महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी राम कृष्ण आदि को केवल महा पुरुष मानते थे। मैं उर्ध्व लोक के सिद्ध पुरुषों को ऋत के नियमों के अनुसार निर्धारित कार्य पूर्ण करने के लिए जन्मे अलोकिक व्यक्ति मानता हूँ।

4 महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ईश्वर, जीव और प्रकृति को अनादि मानते थे।
 त्रेतवादी थे। जीवों की संख्या अनन्त लेकिन निश्चित मानते थे।
ईश्वर की प्रेरणा से गुण साम्यावस्था वाली प्रकृति में विक्षोभ होने से सत्व, रज और तमोगुण प्रकट हुए।
इन्हीं से जगत और जीवों की देह बनी।


वैदिक अभेदवादी मैं परमात्मा का ही लीला में सर्वरूपों में प्रकटीकरण मानता हूँ।
परमात्मा के विश्वात्मा ॐ सङ्कल्प से परमात्मा प्रज्ञात्मा परब्रह्म परमेश्वर परम दिव्य पुरुष विष्णु और परा प्रकृति माया के रूप में प्रकट होकर स्वयम् ही प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) ब्रह्म पुरुष प्रभविष्णु (सवितृ) और प्रकृति श्री लक्ष्मी ( सावित्री) के स्वरूप में प्रकट होकर जीवात्मा अपर ब्रह्म नारायण जीव श्री हरि और नारायणी परा प्रकृति कमला (पद्मा) के स्वरूप में प्रकट होते हैं और अपः तत्व की सृष्टि करते हैं। फिर भूतात्मा वाणी हिरण्यगर्भ ब्रह्मा प्राण (चेतना या देही) त्वष्टा और धारयित्व (धृति या अवस्था) रचना के स्वरूप में प्रकट होते हैं तथा त्वष्टा ने सृष्टि के ब्रह्माण्डो के भुवनों के सूर्य और ग्रह आदि की रचना करते हैं। फिर वाणी हिरण्यगर्भ सनक, सनन्दन, सनत्कुमार, सनातन और नारद को प्रकट करते हैं। फिर वाणी हिरण्यगर्भ ब्रह्मा अर्धनारीश्वर एक रुद्र को प्रकट करते हैं। फिर धर्म और धृति तथा काम और रति को प्रकट करते हुए स्वयम्
सूत्रात्मा प्रजापति ब्रह्मा और सरस्वती के स्वरूप में प्रकट होते हैं। सूत्रात्मा ओज और कान्ति दक्ष प्रथम प्रसुति, रुचि - आकुति, कर्दम-देवहुति, स्वायम्भुव मनु-शतरूपा तथा शंकर- उमा की जोड़ियाँ प्रकट करते हैं।
ये जोड़ियाँ ही मैथुनिक सृष्टि प्रारम्भ करते हैं।
फिर प्रजापति सृष्टि ब्रह्माण्डों के भुवनों में लोक स्थापित करते हैं।
इन्हीं में हमारे अठारह भुवन और सोलह लोक भी सम्मिलित हैं।
भुवन मतलब आवास योग्य भूमि और लोक मतलब भुवन में जहाँ जीवों के वास होने से जैविक चेतना से भुवन आलोकित हो।
फिर प्रजापति और सरस्वती और (1)मरीची-सम्भूति, (2) भृगु-ख्याति, (3) अङ्गिरा-स्मृति, (4) वशिष्ट-ऊर्ज्जा, (5) अत्रि-अनसुया, (6) पुलह-क्षमा, (7) पुलस्य-प्रीति, (8) कृतु-सन्तति भू स्थानीय प्रजापतियों को जन्म देते हैं।स्वायम्भुव मन्वन्तर के सभी ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मण इन्हीं की सन्तान थे। और इन्हीं के गुरुकुल में शिक्षित थे।
फिर प्रजापति ने स्वयम् को अणुरात्मा वाचस्पति और वाक के स्वरूप में प्रकट किया। ये ही स्वर्गलोक के प्रजापति इन्द्र (तेज) और शचि (विद्युत) के स्वरूप में प्रकट हुए। 
वाचस्पति और वाक ने अग्नि और स्वाहा तथा पितरः और स्वधा को प्रकट किया।
तथा वायु और शिवा को भी प्रकट किया।
अग्नि से तीन+तीन अर्थात छ: अग्नि हुए। इन छहों अग्नि के सात सात पुत्र हुए इस प्रकार उनचास अग्नि हो गये।
ऐसे ही पितरः के तीन+ तीन छः पितर हुए। जिसमें (१) अग्निष्वात (२) बहिर्षद और (३) कव्यवाह तीन निराकार और (४) अर्यमा, (५) अनल (६) सोम और (७) यम चार साकार हैं। अर्यमा मुख्य हैं इन्हीं की पत्नी स्वधा है।
ऐसे ही वायु के भी तीन+तीनः वायु हुए। उन छहों के सात- सात पुत्र हुए। ये ही आंधी, तुफान, झंझावात के देवता उनचास मरुद्गण कहलाये। मुख्य मरुद्गण (1) आवह, (2) प्रवह, (3) संवह, (4) उद्वह, (5) विवह, (6) परिवह और (7) परावह है। ये सातों सैन्य प्रमुख के समान गणवेश धारण करते है।

वाचस्पति स्वयम् विज्ञानात्मा ब्रह्मणस्पति और सुनृता के स्वरूप में प्रकट होते हैं। ये ब्राह्मणों के अध्यक्ष कहे जाते हैं। वेद मन्त्रों को ब्रह्म कहते हैं। और सभी मन्त्रों के ये दृष्टा हैं।
विज्ञानात्मा ब्रह्मणस्पति और सुनृता से चित्त और चेत द्वादश आदित्य प्रकट हुए।
  (1) विष्णु, (2) सवितृ, (3) त्वष्टा, (4) इन्द्र, (5) वरुण, (6) विवस्वान, (7) पूषा, (8) भग, (9) अर्यमा, (10) मित्र, (11) अंशु और (12) धातृ।

फिर ब्रह्मणस्पति स्वयम् ज्ञानात्मा ब्रहस्पति और तारा के स्वरूप में प्रकट हुए। ज्ञानात्मा ब्रहस्पति से बुद्धि और बोध आठ वसु हुए।
(1) प्रभास, (2) प्रत्युष, (3) धर्म, (4) ध्रुव, (5) अर्क, (6) अनिल, (7) अनल और (8) अप् ।
 ज्ञानात्मा ब्रहस्पति स्वयम् लिङ्गात्मा पशुपति के स्वरूप में प्रकट हुए।
लिङ्गात्मा पशुपति से अहंकार और अस्मिता एकादश रुद्र हुए।
(1) हर, (2) त्र्यम्बकं, (3) वृषाकपि, (4) कपर्दी, (5) अजैकपात, (6) अहिर्बुधन्य, (7) अपराजित, (8) रैवत, (9) बहुरूप, (10) कपाली और (11) शम्भु (शंकर)।

 लिङ्गात्मा पशुपति स्वयम् मनसात्मा गणपति के स्वरूप में प्रकट हुए। ये गणपति लम्बोदर गजानन विनायक से अलग हैं। कबिलों को गण कहते हैं। गणों के अध्यक्ष गणराज्य के नायक गणपति कहलाते हैं।
 लिङ्गात्मा गणपति से मन और संकल्प सोम राजा और वर्चा प्रकट हुए।
 मनसात्मा गणपति ने स्वयम् को स्व सदसस्पति और स्वभाव मही के स्वरूप में प्रकट हुए।
 स्वभाव मही स्वयम् सात्विक स्वभाव स्वाहा भारती, राजसी स्वभाव वषट सरस्वती और तामसी स्वभाव स्वधा इळा (इला या तृण देवी इरा) के स्वरूप में प्रकट हुई।
इन्हीं से यह भौतिक पदार्थ और भौतिक जगत उत्पन्न हुआ। शरीर बने।

5 महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने पञ्च महायज्ञ को आवश्यक तो माना लेकिन योग साधना पर अधिक जोर दिया।

मेरा मत है कि, वेदों और ब्राह्मण ग्रन्थों के अनुसार पञ्च महायज्ञ के ब्रह्म यज्ञ के अन्तर्गत ही अष्टाङ्ग योग अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह (पञ्चयम/ धर्म), शोच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान (पञ्च नियम/ अनुशासन), चौरासी आसन (शरीर की स्थिरता), प्राणायाम (स्व नियन्त्रित श्वास-प्रश्वास के माध्यम से समस्त शारीरिक अन्तःक्रियाएँ स्व नियन्त्रण में लाकर, प्रत्याहार के माध्यम से मन का इन्द्रियों की ओर भटकाव स्व नियन्त्रण में लेकर स्वस्थ्य तन- मन प्राप्त कर धारणा द्वारा सिखी गई शिक्षा धारण करते हुए स्वाध्याय, वेद पाठ, वेदाध्ययन, सन्ध्योपासना, कर ध्यान पूर्वक गायत्री मन्त्र जप करना। ब्रह्मचर्य आश्रम में यह अभ्यास आदत में ढालना, मसल्स मेमोरी में उतार देना। फिर देव यज्ञ से आत्म समर्पण/ ईश्वर प्रणिधान हो पाता है। भूत यज्ञ से प्रकृति के प्रति कर्तव्य पालन और अतिथि यज्ञ से मानवों के प्रति कर्तव्य भावना जागृत होती है। पितृ यज्ञ श्राद- तर्पण, और सामाजिक कार्यों में सहयोग कर के सामाजिकता आती है।इस प्रकार ग्रहस्थाश्रम में पञ्च महायज्ञ स्वाभाविक रूप से हो पाएँगे।
वानप्रस्थ आश्रम में अध्ययन- अध्यापन, ध्यान - समाधि अभ्यास, संयम (कुछ ही समय में धारणा-ध्यान- समाधि में स्थित होकर) 
संयम से तन्मयता प्राप्त कर वाञ्छित जानकारी और ज्ञान प्राप्त कर लिया जाता है।
इस प्रकार परमात्मा में तन्मय होकर आत्मज्ञान प्राप्त होता है।
पञ्च महायज्ञ सम्पूर्ण स्वस्थ्य और स्वस्थ जीवन प्रणाली है।

6 महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी विवाह में वर की आदर्श अवस्था (वय) 48 वर्ष और वधू की वय (अवस्था) 16 वर्ष मानते थे।
जबकि मैं विवाह में वर की आदर्श वय (अवस्था) 24-25 वर्ष और वधू की आदर्श अवस्था (वय) 21-22 वर्ष मानता हूँ।
48 वर्ष तक ब्रह्मचर्य पालन करने वाले पुरुष को विवाह करने की आवश्यकता ही नहीं रहती है।

7 महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी विधवा विवाह को अनुचित नहीं मानते थे।
श्रद्धानन्द जी ने तो विधवा विवाह को सामाजिक आन्दोलन में सम्मिलित कर लिया।
लेकिन महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी नियोग को भी उचित मानते थे।
जबकि मैं नियोग से पूर्णतः असहमत हूँ।
यदि पुत्र ही इकलौती सन्तान हो। और उसकी निःसंतान नव विवाहिता वधु विधवा हो जाए, तो उसका पुनर्विवाह कर उसकी सन्तान को गोद लेना नियोग की तुलना में अनन्त गुना श्रेष्ठ होगा।

सोमवार, 10 अगस्त 2026

ब्राह्मण और क्षत्रियों की दुरावस्था।

शत वर्षिय दशराज युद्ध के बाद से ही मूल क्षत्रिय - मनुर्भरतों का तो अस्तित्व ही समाप्त हो गया।
फिर उज़्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, तिब्बत और कश्मीर के सूर्यवंशी अयोध्या में बसाये गए। और टर्की से आये चन्द्र वंशियों तथा सीरिया से आये नागों को उज़्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, तिब्बत और कश्मीर में बसाया गया। लेकिन वे भी चन्द्र वंशियों के सामने नहीं टिक पाये। और प्रयागराज तथा बिहार, झारखण्ड में बस गये।
ईराक के असुरों ने सेवन सिस्टर्स के असम मणिपुर, त्रिपुरा, नगालैंड तथा श्री लङ्का आदि में फैल गये। अफ्रीका से आये राक्षस लक्ष्यद्वीप में बस गये।
दास-दस्यु (दृविड़) तमिलनाडु में बस गये। चोर (चोल) कर्नाटक में और आन्ध्र प्रदेश में आन्ध्र बस गये। 
ब्रह्मर्षियों की सन्तान जो हरियाणा में बसी थी और स्वायम्भुव मनु-शतरूपा के पुत्र प्रियव्रत सन्तान जो पञ्जाब, सिन्ध, बलुचिस्तान और अफगानिस्तान में बसी थी। जिन्हें मनुर्भरत कहा जाता था। तथा उत्तानपादासन और ध्रुव की सन्तान ईरान में बसी थी वे सब चारों ओर से ययाति के पाँचो पुत्रों (चन्द्रवंशियों) और नागों से घिर गए।
जब वैदिक काल के बाद ब्राह्मण ग्रन्थों के रचनाकाल से सूत्र ग्रन्थों के रचनाकाल त्रेतायुग में ही यह हाल था तो अब तो कलियुग में समय ही उनका है।

शनिवार, 8 अगस्त 2026

ब्रह्म यज्ञ और देव यज्ञ।

सूर्योदय से कम-से-कम दो घण्टे पहले शय्या त्याग कर शौच स्नान, ब्रह्मयज्ञ अर्थात अष्टाङ्ग योग साधना, सन्ध्या, गायत्री मन्त्र जप, उदयीमान सूर्य को अर्घ्य देकर दैनिक अग्निहोत्र करने से सूर्योपासना स्वतः हो जाती है। किसी भी देवता विशेष की स्वतन्त्र आराधना केवल निषिद्ध सकामोपासना में होती है।
अन्यथा सदाचारी जीवन जीते हुए, समत्व भाव धारण कर निश्चयात्मकमिका बुद्धि से चित्त में निरन्तर परमात्मा को ध्यान में बनाये रखते हुए शास्त्रोक्त विधि से ही केवल शास्त्रोक्त कर्म करने वाले योगी का योगक्षेम परमात्मा स्वयम् वहन करते हैं।

गुण मिलान में दोष।

 गुण मिलान का आधार  चन्द्रमा किस राशि/नक्षत्र में है बस यही गुणों का आधार है।

राशि और नक्षत्र के योग से 36 योग बनते हैं।
पूरी कुण्डली में 

1 किस ग्रह, भाव (खाने) का बल और शुभाशुभत्व कैसा है?

2कौन-सा ग्रह किस भाव (खाने) का स्वामी होकर किस भाव (खाने) में बैठा है?

3 किस-किस भाव (खाने) को देख रहा है?

4 किस भाव (खाने) के स्वामी को देख रहा है?

5 किस भाव (खाने) के स्वामी द्वारा देखा जा रहा है?

इन सब का कोई महत्व नहीं है।

ऐसे ही पूरी कुण्डली के 12 भाव (खानों) में से पाँच भाव(खाने) 1,4,7,8 और 12 वें भाव (खाने) में मङ्गल हो तो कुण्डली माङ्गलिक कहलाती है।
इसका फल माना जाता है कि, लाइफ पार्टनर (पति या पत्नी) की आयु क्षय करता है।
इस दोष का हरण करने के लिए सामने वाले (वर या वधू) की कुण्डली में इन्हीं 1,4,7,8 और 12 वें भाव (खाने) में से किसी भी भाव (खाने) में, मङ्गल > शनि > सूर्य > राहु > केतु में से कोई एक भी ग्रह हो तो माङ्गलिक मिलान ठीक हो जाता है।

शास्त्रों में तो और भी बहुत से परिहार भी बतलाये हैं, जिनका ज्ञान नगण्य ज्योतिषियों को है।
जैसे 3,6, या 11 वें भाव में भी यदि मङ्गल > शनि > सूर्य > राहु > केतु में से कोई एक भी ग्रह हो तो माङ्गलिक दोष का परिहार हो जाता है।
जिसकी कुण्डली में माङ्गलिक दोष है उसकी कुण्डली में मङ्गल उच्च का हो या नीच का हो या वक्री या अस्त हो तो भी माङ्गलिक दोष का परिहार हो जाता है।
और भी आयु अधिक होना (मतलब केवल बाल विवाह में ही निषेध था।) और 25 से अधिक या 27 से अधिक गुण मिलने पर भी माङ्गलिक दोष का परिहार हो जाता है।
लेकिन यह जानकारी नगण्य पारम्परिक ज्योतिषियों को है।

मतलब उनके मतानुसार तो दोनों एक दूसरे की आयु क्षीण करके मर जाएंगे और बच्चे अनाथ हो जाएंगे उसे अच्छा मानते हैं।🤔

ऐसे मुर्खतापूर्ण सिद्धान्तों में मेरी रत्ती मात्र भी श्रद्धा नहीं है।
लेकिन जब कोई ज्योतिषी से पूछता है तो, ज्योतिषी का कर्तव्य है कि, प्रचलित परम्परा अनुसार उत्तर दे। इसलिए वह भी बतलाता हूँ।