संवत्सर - वसन्त विषुव से अगले वसन्त विषुव तक लगभग 365 दिन 05 घण्टे 48 मिनट 45.2 सेकण्ड हम संवत्सर के साथ वसते (रहते) हैं; फिर संवत्सर पीछे रह जाता है और हम अगले संवत्सर के साथ हो लेते हैं।
वैदिक अयन शब्द का ठीक-ठीक अर्थ आज तक मुझे नहीं मिला। अयन मतलब उत्तर में गति या उत्तर में स्थिति। जैसे नारायण नार (जल) में ही स्थिति और जल में ही गति?
या
उत्तर दिशा की ओर गति?
उत्तरायण का अर्थ यदि सूर्य की स्थिति या गति उत्तरी गोलार्ध में लेते हैं तो इसके समर्थन में ---
शतपथ ब्राह्मण 2/1/3 तथा तै.सं. 6/5/3 तथा नारायण उपनिषद अनु. 80 में *देवा ऋतवः वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतु उत्तरायण में होती है।*
यहाँ कहीँ भी शरद ऋतु के आधे भाग का तो नाम ही नहीं है। और वसन्त ऋतु को भी आधी नहीं बतलाया गया। बल्कि वसन्त, ग्रीष्म वर्षा ऋतु ही कहा है।
और
मैत्रायण्युपनिषद में उत्तरायण और नारायण उपनिषद अनु 80
*उदगयन शब्द और देवयान / देवलोक शब्द स्पष्ट आये हैं।*
महाभारत भीष्म पर्व के अध्याय 25 से 43 के अन्तर्गत भगवान श्रीकृष्ण ने विभूति वर्णन अध्याय 10 श्लोक 35 में ऋतुओं में वसन्त ऋतु कहा है। जो उसकी पूर्णता का सूचक है।
और देवयान मार्ग वर्णन अध्याय 08 श्लोक 24 में उत्तरायण के छः महीने कहा है। अर्थात देवयान मार्ग में उत्तरायण के पूरे छः महीने आते हैं और मैत्रायण्युपनिषद तथा नारायण उपनिषद अनु 80 में भी उत्तरायण को ही देवयान कहा है। तथा शतपथ ब्राह्मण 2/1/3 तथा तै.सं. 6/5/3 तथा नारायण उपनिषद अनु. 80 में देवा ऋतवः वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतु । कथन से स्पष्ट हो जाता है कि, वसन्त सम्पात से शरद सम्पात के बीच का समय उत्तरायण होता है।
लेकिन
यदि उत्तर की ओर गति माने तो दक्षिण परम क्रान्ति से उत्तर परम क्रान्ति सायन मकर संक्रान्ति (22 दिसम्बर) से सायन कर्क (22 जून) तक मानना होगा।
लगभग सभी पुराणों और पञ्चाङ्ग निर्माण के ग्रह गणित के सिद्धान्त ग्रन्थ इसका समर्थन करते हैं।
यहाँ यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि, उत्तरायण - दक्षिणायन शब्द वैदिक हैं पौराणिक नहीं और कोई गणितीय अवधारणा भी नहीं है। अतः ये प्रमाण कोटि में नहीं आते हैं।
ऋतु - शतपथ ब्राह्मण 2/1/3 तथा तै.सं. 6/5/3 तथा नारायण उपनिषद अनु. 80 में *देवा ऋतवः वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतु उत्तरायण में होती है को प्रमाण मानें तो मधुमास वसन्त सम्पात से प्रारम्भ मानना होगा। और ईष मासारंभ शरद सम्पात से मानना होगा।
लेकिन यदि दक्षिण परम क्रान्ति सायन मकर संक्रान्ति (22 दिसम्बर) से उत्तर परम क्रान्ति सायन कर्क (22 जून) तक उत्तरायण मानकर सायन मीन संक्रान्ति से वसन्त सम्पात (सायन मेष संक्रान्ति) तक मधुमास मानें तो फिर एक समस्या और है कि, दक्षिणी गोलार्ध में दक्षिण अफ्रीका महाद्वीप, दक्षिण अमेरिका महाद्वीप, आस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैण्ड के निवासियों के लिए वसन्त सम्पात (सायन मेष संक्रान्ति) के समय वसन्त ऋतु मानें या शरद ऋतु? और शरद सम्पात (सायन तुला संक्रान्ति) के समय शरद ऋतु माना जाए या वसन्त ऋतु ?
जब उत्तर अमेरिका महाद्वीप और अफ्रीका महाद्वीप के उत्तर में ग्रीष्म ऋतु होती है, गर्मी पड़ती है तभी दक्षिण अमेरिका महाद्वीप और अफ्रीका महाद्वीप के दक्षिण भाग में शिशिर ऋतु रहती है। ठण्ड पड़ती है।
भूमध्य रेखीय देशों में बारहों मास ग्रीष्म और वर्षा होती रहती है। तो मरुस्थलीय क्षेत्रों में वर्षा होती ही नहीं तो वर्षा ऋतु कैसे होगी।
ध्रुवीय प्रदेशों में सदैव शीत ही रहती है ग्रीष्म ऋतु की कल्पना ही नहीं की जा सकती।
अतः ऋतुओं को महीनों से नहीं जोड़ा जा सकता है।
हमने जो वैदिक मधु- माधव मास अर्थात वसन्त सम्पात से सायन मिथुन संक्रान्ति तक वसन्त ऋतु मानी है यह दक्षिण में हरियाणा पञ्जाब से उत्तर में ताजिकिस्तान अर्थात उत्तर अक्षांश 30°
40° उत्तर अक्षांश तक ही सही है। और पौराणिक मधु-माधव मास अर्थात सायन मीन संक्रान्ति से सायन वृषभ संक्रान्ति तक मानें तो यह उज्जैन लगभग उत्तर अक्षांश 20° से उत्तर अक्षांश 30° तक पञ्जाब हरियाणा तक ही सही रहेगा।