*लगभग उन्नीस हजार श्लोक वाले गरुड़ पुराण और राजस्थान के पाली जिले के ग्राम सोजत के पण्डित रामेश्वर जी श्रीमाली के मार्गदर्शन में जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह के मंत्री लधराज द्वारा राजस्थानी हिन्दी में सम्पादित छोटी पुस्तिका श्री विष्णु सारोद्धर्म में अन्तर।*
*गरुड़ पुराण।*
*गीता प्रेस संस्करण कोड 72। सबसे शुद्ध और प्रचलित है।*
*अठारह महापुराणों में से एक भगवान विष्णु द्वारा गरुड़ जी को सुनाया गया गरुड़ पुराण लगभग उन्नीस हजार श्लोकों में भगवान विष्णु और गरुड़ के संवाद पर आधारित पूर्व खण्ड और उत्तर खण्ड दो खण्ड दो खण्डों में जीवन और मरण दोनों की नियमावली (मैन्युअल) है।*
*पूर्व खण्ड बताता है कि , कैसे जीना है और उत्तर खण्ड बताता है मरने के बाद क्या होगा इसलिए उत्तर खण्ड को प्रेत कल्प भी कहते हैं। गरुड़ पुराण के मुख्य देवता भगवान विष्णु हैं।*
*गरुड़ पुराण का रचनाकाल चौथी से दसवीं शताब्दी के बीच, कई बार संशोधित हुआ।*
*गरुड़ पुराण की तीन बड़ी सीख।*
*1 कर्म का फल निश्चित है जैसा कर्म करोगे, तो वैसी योनि और वैसा ही स्वर्ग या नर्क मिलेगा।*
*2 दान-श्राद्ध का महत्त्व ,गया में पिंडदान, अन्नदान, गौदान से प्रेत योनि छूटती है।*
*3 विष्णु भक्ति ही तारने वाली है। अंत समय में ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र ही यम के फंदों से बचाता है।*
*विषय सूची।*
*पूर्व खण्ड - आचार काण्ड जीवन सुधारने के लिए आयुर्वेद, नीति, धर्म की बातें हैं जो गृहस्थ के काम की हैं।*
*यह जीवन जीने की कला सिखाता है। मृत्यु से पहले का ज्ञान।*
*1 सृष्टि वर्णन --*
*ब्रह्मांड की उत्पत्ति, 14 लोक, युग धर्म*
*2 सूर्य-चंद्र वंश वर्णन और चौबीस अवतार--*
*राजाओं की वंशावली, विष्णु के चौबीस अवतार*
*3 धर्म-नीति --*
*दान, व्रत, तीर्थ, एकादशी, तुलसी माहात्म्य*
*4 आयुर्वेद--*
*रोग, औषधि, रस-रसायन, नाड़ी परीक्षा*
*5 ज्योतिष --*
*ग्रह, नक्षत्र, शकुन-अपशकुन, स्वप्न फल*
*6 व्याकरण और छन्द --* *संस्कृत व्याकरण, काव्य शास्त्र*
*7 रत्न और वास्तु --* *मणि-माणिक्य की पहचान, गृह निर्माण नियम*
*8 राजनीति --*
*राजा के कर्तव्य, युद्ध नीति*
*द्वितीय खण्ड --*
*उत्तर खण्ड / प्रेत कल्प पाप का भय नरकों का वर्णन पढ़कर मनुष्य पाप से बचता है।इसी भाग के कारण गरुड़ पुराण सबसे ज्यादा जाना जाता है।*
*मृत्यु के बाद का ज्ञान।*
*1 मृत्यु के लक्षण --* *मनुष्य को मरने से पहले कैसे संकेत मिलते हैं।*
*2 यममार्ग का वर्णन --*
*मृत्यु के बाद जीवात्मा सैंतालीस दिन में यमलोक कैसे पहुँचती है। वैतरणी नदी, यमदूत।*
*3 चोरासी लाख योनियाँ--*
*किन किन कर्मों के अनुसार कौन-कौन सी योनि मिलती है।*
*4 नरक वर्णन--* *तामिस्र, अंधतामिस्र, रौरव, कुंभीपाक आदि अट्ठाईस प्रकार के नर्क ।*
*किस पाप से कौन-सा नर्क मिलता है।*
*5 प्रेत योनि --*
*प्रेत कौन बनता है, प्रेत बाधा से मुक्ति कैसे हो।*
*6 श्राद्ध-तर्पण --* *अंत्येष्टि, दशगात्र, सपिण्डीकरण, पिण्डदान, गया श्राद्ध की विधि।*
*7 मोक्ष उपाय--*
*गीता पाठ, विष्णु सहस्रनाम, गया में पिंडदान से मुक्ति।*
*परम्परा अनुसार घर में मृत्यु होने पर तेरह दिन तक प्रेत कल्प का पाठ कराते हैं। लेकिन आजकल उसके स्थान पर राजस्थान के सोजत के पण्डित रामेश्वर जी श्रीमाली की रचना विष्णु सारोद्धर्म मृत्यु उपरान्त तेरह दिनों तक गरुड़ पुराण के नाम से कर्मकाण्डी पण्डित लोग सुनाते हैं।*
*मान्यता है कि गरुड़ पुराण द्वितीय खण्ड प्रेत कल्प का पाठ मृतक की आत्मा को यममार्ग में कष्ट नहीं होता और सद्गति मिलती है।*
लेकिन
*राजस्थान के सोजत के पण्डित रामेश्वर जी श्रीमाली की रचना विष्णु सारोद्धर्म नामक पुस्तिका का पाठ कर सन्तोष कर लिया जाता है।*
*ध्यान रखें कि, श्री विष्णु सारोद्धर्म नामक पुस्तक महामहोपाध्याय पण्डित श्री कृष्णदत्त शास्त्री रचित स्मार्त कार्यकलाप या गृहस्थ कर्मकलाप से पूर्णतः असम्बन्धित और बिल्कुल भिन्न पुस्तक है।*
*श्री विष्णु सारोद्धर्म पुस्तिका।*
*राजस्थानी-मालवी क्षेत्र में गृहस्थों में बहुत प्रचलित श्री विष्णु सारोद्धर्म पुस्तिका वैष्णव कर्मकाण्ड की छोटी पुस्तिका है। इसमें विष्णु पूजा, व्रत, तिलक, तुलसी माहात्म्य, एकादशी विधि आदि का सार दिया गया है।*
*विष्णु सारोद्धर्म पुस्तिका के वास्तविक रचयिता राजस्थान के पाली जिले के ग्राम सोजत के पण्डित रामेश्वर जी श्रीमाली कहे जा सकते हैं । उन्ही के मार्गदर्शन में राजस्थानी हिन्दी में विष्णु सारोद्धर्म पुस्तिका का सम्पादन जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह के मंत्री लधराज ने किया था।*
*सत्रहवीं शताब्दी में जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह के मंत्री लधराज ने स्वयम् उनके ग्रंथों में संस्कृत के प्रकांड पण्डित और कर्मकाण्ड, पुराण, धर्मशास्त्र के ज्ञाता राजस्थान के सोजत के पण्डित रामेश्वर जी श्रीमाली का उल्लेख किया है ।*
*चुंकि महाराजा जसवंतसिंह के मंत्री लधराज संस्कृत नहीं जानते थे, इसलिए संस्कृत के आधार पर बने ग्रंथ उन्होंने पण्डित रामेश्वर श्रीमाली जैसे विद्वानों से सुनकर लिखे।*