शनिवार, 25 अप्रैल 2026

सभी गाँवो में एक ही मन्दिर हो जिसमें सब देव और देवता हों।

सभी गांवों में एक ही ऐसा मन्दिर हो जहाँ

 भगवान परब्रह्म- 
विष्णु और माया।

ब्रह्म- 
प्रभविष्णु और श्री, लक्ष्मी तथा सवितृ और सावित्री।

अपर ब्रह्म - 
नारायण और नारायणी तथा श्री हरि- कमलासना, गजसेविता लक्ष्मी।

हिरण्यगर्भ (पञ्चमुखी ब्रह्मा) और वाणी,

 त्वष्टा-रचना 
तथा 
सनक, सननन्दन, सनत्कुमार , सनातन, नारद 
धर्म और उनकी तेरह पत्नियाँ - (१) श्रद्धा, (२) लक्ष्मी, (३) धृति, (४) तुष्टि, (५) पुष्टि, (६) मेधा, (७) क्रिया, (८) बुद्धि, (९) लज्जा, (१०) वपु, (११) शान्ति, (१२) सिद्धि, (१३) कीर्ति ) 
काम और रति
एवम्
अर्धनारीश्वर एकरुद्र।

प्रजापति (चतुर्मुख ब्रह्मा) और सरस्वती,
 
इन्द्र-शचि, दक्ष (प्रथम)-प्रसुति, रुचि-आकुति, कर्दम-देवहुति, स्वायम्भुव मनु-शतरूपा
तथा
शंकर- उमा,
एवम्
 मरीची-सम्भूति,  भृगु-ख्याति,  अङ्गिरा-स्मृति,  वशिष्ट-ऊर्ज्जा,  अत्रि-अनसुया,  पुलह-क्षमा,  पुलस्य-प्रीति,  कृतु-सन्तति।

वाचस्पति और वाक ,
 अग्नि-स्वाहा, पितर-स्वधा,

 ब्रह्मणस्पति-सुनृता   , द्वादश आदित्य (1) विष्णु, (2) सवितृ, (3) त्वष्टा, (4) इन्द्र, (5) वरुण, (6) विवस्वान, (7) पूषा, (8) भग, (9) अर्यमा, (10) मित्र, (11) अंशु और (12) धातृ) और उनकी शक्तियाँ,

 ब्रहस्पति- शुभा, ममता , तारा, अष्ट वसु- (1) प्रभास (आकाश) -  प्रभासा।
(2) प्रत्युष (सूर्य/देव) - प्रत्युषा या दीक्षा 
(3) धर्म (वसु-पुत्र) -  धृति ।
(4) ध्रुव (अचल/ध्रुव तारा) -  ध्रुवा या धरणी
(5) अर्क (सूर्य/देव) - अर्का
(6) अनिल (वायु) - अनिला या शिवा 
(7) अनल (अग्नि) - अनला या शांडिली 
(8) अप् (जल) - आप (या सरिता)

पशुपति-  ,एकादश रुद्र-(1) हर, (2) त्र्यम्बकं, (3) वृषाकपि, (4) कपर्दी, (5) अजैकपात, (6) अहिर्बुधन्य, (7) अपराजित, (8) रैवत, (9) बहुरूप, (10) कपाली और (11) शम्भु (शंकर) और उनकी शक्तियाँ,

 गणपति-   ,सोम- वर्चा,

 सदसस्पति-समिति, मही-भारती-सरस्वती- इळा।
 अधिदेव - अष्टादित्य [ (1)मार्तण्ड {विवस्वान}, (2) इन्द्र, (3) वरुण, (4) मित्र, (5) धाता, (6) भग, (7) अंश और (8) अर्यमा)]  

 अध्यात्म दुसरे वसु [(1) द्रोण, (2) प्राण, (3) ध्रुव, (4) अर्क, (5) अग्नि (6) दोष, (7) वसु और (8) विभावसु )]।  

 अधिभूत  दुसरे एकादश रुद्र [(1) मन्यु, (2) मन , (3) महिनस, (4) महान, (5) शिव, (6) उग्ररेता, (7) भव, (8) काल, (9) वामदेव, (10) धृतवृत और (11) मृगव्याध या मतान्तर] से अन्य नाम [(1) सर्प, (2) निऋति,(3) पिनाकी, (4) कपाली, (5) स्थाणु, (6) ईशान नाम और (7) दहन भी।] । 

द्वादश तुषितगण [(1) बुद्धि, (2) मन, (3) उदान, (4) व्यान, (5) प्राण, (6) समान, (7) अपान, (8) श्रोत, (9) स्पर्ष, (10) चक्षु, (11) रसना और (12) घ्राण ]

मरुद्गण (1) आवह, (2) प्रवह, (3) संवह, (4) उद्वह, (5) विवह, (6) परिवह और (7) परावह है। 
शुक्राचार्य के पुत्र त्वष्टा।

द्वादश साध्यगण[ (1) मन, (2) अनुमन्ता, (3) प्राण, (4) अपान, (5) विति , (6) हय, (7) हन्स, (8) विभु, (9) प्रभु, (10) नय, (11) नर और (12) नारायण )

अनेकरुद्र (विशेले कीट पतङ्ग, सर्प, बिच्छू, घोघा (कपर्दी) और सीपी (युनियो, पाईला), सिंह, व्याघ्र आदि हिन्सक प्राणी, आतंकी, गुण्डे, बदमाश, चोर, उचक्के, डाकु, लुटेरे, वनवासी, पुलिस, सेना आदि रुलाने वाले सभी अनेकरुद्र हैं।


प्रभास वसु और (ब्रहस्पति की बहन) वरस्त्री के पुत्र देवशिल्पी विश्वकर्मा।
शुक्राचार्य के पुत्र) त्वष्टा हैं।
यह्व ( महादेव)  यहुदियों का इष्ट  याहवेह ।

(1) ईशित्व- वशित्व, (2) अणिमा-लघिमा, (3) महिमा- गरिमा और (4) प्रकाम्य - प्राप्ति) सिद्धियों के अधिदेवता अष्ट विनायक हैं। [(1)सम्मित-उस्मित, (2) मित- देवयजन, (3) शाल - कटंकट और (4) कुष्माण्ड - राजपुत्र ।
  
दस विश्वैदेवगण - [(1) दक्ष (द्वितीय), (2) कृतु, (3) सत्य, (4) काल (यम), (5) काम, (6) मुनि, (7) एल पुरुरवा, (8) श्रव, (9) रोचमान, (10) आर्द्रवान हैं।

 शुक्राचार्य के पौत्र , त्वष्टापुत्र त्रिशिरा विश्वरूप हैं। 
ईला नामक रौद्री के पुत्र एल भैरव हैं। ( या वैवस्वतमनु की पुत्री ईला और बुध के पुत्र एल पुरुरवा हैं)।

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

तमिल कवि तिरुक्कुरल रचियता दृविड़ सन्त आलावार तिरुवल्लुवर शुद्ध सनातन वैदिक धर्मी वैष्णव महाभागवत थे। न कि, जैन।

कुछ लोग तमिल कवि दृविड़ सन्त आलावार
तिरुवल्लुवर को उनके द्वारा रचित तिरुक्कुरल में सर्वप्रथम ऋग्वेद के अहिंसा सूक्त के दृष्टा ऋषि ऋषभदेव की स्तुति करने और अहिंसा को महत्व देने के आधार पर जैन घोषित करते हैं। जबकि तमिल कवि दृविड़ सन्त तिरुवल्लुवर शुद्ध वैदिक सनातन धर्मी वैष्णव महाभागवत थे।
इस बात को प्रमाणित करने के लिए निम्नलिखित तथ्य उपलब्ध हैं।⤵️
गृहस्थाश्रम का प्रशंसक, ईश्वर स्तुति करने वाला ईश्वर वादी युद्ध नीति की शिक्षा देने वाला, कृषि कर्म का प्रशंसक जैन कैसे हो सकता है?
रामानुजाचार्य जी द्वारा इन्हें आदर देते हुए आलवार सन्तों में मानना;
 और
नाथ मुनि द्वारा इसे नालयिर दिव्य प्रबन्धम् में अन्य आलवार सन्तों की रचनाओं के साथ सम्पादित करना भी इनका वैदिक धर्मी वैष्णव होना ही सिद्ध करता हैं।
तिरु अनन्तपुरम्
तिरुपति बालाजी 
ऐसे ही जहाँ कहीँ भी श्री वाचक तमिल शब्द तिरु आया है वहाँ सभी स्थानों पर वैष्णव परम्परा ही है।
श्रवणबेलगोला में या किसी भी जैसे तीर्थ या जैन सन्त के नाम में तिरु शब्द नहीं मिलता है।

 तिरुवल्लुवर ने श्रङ्गार शतक और नीति शतक के रचयिता भृतहरि के समान धर्म, अर्थ और काम पर तमिल भाषा में अर्थशास्त्र लिखा है।
ध्यान रखें वैदिक परम्परा में अर्थशास्त्र धर्म सूत्र (धर्मशास्त्र) का अङ्ग है।
मनुस्मृति और कौटिल्य अर्थशास्त्र में भी धर्म, अर्थ और काम तीनों का ही वर्णन है।

भृतहरि ने वैराग्य शतक भी रचा था। जो अर्थशास्त्र का विषय नहीं है। इसलिए इन्होंने छोड़ दिया।

ऋषभदेव स्वायम्भुव मनु-शतरूपा के पाँचवी पीढ़ी पर हुए।
स्वायम्भुव मनु-शतरूपा-> उत्तानपादासन और प्रियव्रत।
प्रियव्रत -> आग्नीध्र 
आग्नीध्र -> ऋषभदेव 
ऋषभदेव -> बाहुबली और भरत चक्रवर्ती जो बाद में जड़ भरत कहलाये।
स्वायम्भुव मनु-शतरूपा, ऋषभदेव और भरत चक्रवर्ती ने वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुसार वृद्धावस्था में संन्यास ग्रहण किया था। जबकि भरत चक्रवर्ती से परास्त होकर बाहुबली ने युवावस्था में ही संन्यास ले लिया और कर्नाटक में श्रमण बेलगोला में निवास किया था। इसलिए जैन लोगों उन्हें जैन घोषित कर दिया। और ऋग्वेद में अहिंसा सूक्त के दृष्टा होने से ऋषभदेव को अपना पहला तीर्थंकर घोषित कर दिया।
जब युरोपीय लोगों ने मोहनजोदड़ो और हड़प्पा में पद्मासनस्थ मूर्ति और तान्त्रिकों की लिङ्ग और योनि की मूर्ति देखी तो जैनों ने उसे जैन श्रमण संस्कृति घोषित कर दिया। इस हिसाब से तो सभी नाथ योगी जैन थे।

दृविड़ वेद (तमिल भाषा में नालयिर दिव्य प्रबन्धम्) क्या है?

दृविड़ तमिल लोगों के अनुसार भगवान में डूबे हुए बारह आलवार संतों द्वारा छठी से नौवीं सदी के बीच रचित नालयिर दिव्य प्रबंधम् नामक द्रविड़ वेद कुल चार हजार (4000) वैष्णव भक्ति के पद हैं। ये तमिल वैष्णव परंपरा का ग्रंथ-संग्रह है।
रामानुजाचार्य के अनुसार तमिल नालयिर दिव्य प्रबंधम् वेदों का सार है। संस्कृत वेद देवभाषा में हैं, जबकि नालयिर दिव्य प्रबंधम्द्र विड़ वेद तमिल भाषा होने से आम तमिल भाषी लोग भी समझ सकते हैं। दृविड़ तमिल लोग इसे सनातन वैदिक धर्म के वेदों के बराबर मानते हैं।
वे मानते हैं कि,
वेद ब्रह्म का ज्ञान देते हैं, द्रविड़ वेद ब्रह्म का प्रेम सिखाते हैं।
कभी-कभी तिरुक्कुरल (Tirukkural) को भी तमिल के नैतिक 'वेद' के रूप में संदर्भित किया जाता है, लेकिन 'द्रविड़ वेद' का सीधा संबंध आलवारों की भक्ति रचनाओं से है। 

नालयिर दिव्य प्रबंधम् का चार भागों में सम्पादन दसवीं शताब्दी में *नाथमुनि* ने किया।

1 मुदलायिरम् में 947 पद हैं। (तमिल इसे ऋग्वेद के समान मानते हैं।)
2 इरंडामायिरम् में 1134 हैं। तमिल इसे यजुर्वेद के समान मानते हैं।
3 मून्रामायिरम् में 593 पद हैं। तमिल इसे सामवेद के समान मानते हैं।
नम्मालवार की रचना तिरुवाय्मोली के 1102 पदों को तमिल लोग सामवेद के समान मानते हैं।
वेदांत देशिक ने कहा - "वेद में जो गूढ़ है, वो तिरुवाय्मोली में स्पष्ट है"।
4 नानकामायिरम् में 1326 पद हैं। तमिल इसे अथर्ववेद के समान मानते हैं।
रामानुज, वेदांत देशिक, मणवाल मामुनि ने इस पर भाष्य लिखे। 
इनमें नारायण और उनके अवतारों की भक्ति। श्रीरंगम, तिरुपति, कांची के मंदिरों का वर्णन। भगवान को नायक और भक्त को नायिका मानकर प्रेम के पद। आण्डाल की तिरुप्पावै मार्गशीर्ष महीने में रोज गाई जाती है।
तिरुपति, श्रीरंगम, मेलकोटे में रोज वेद पारायण के बाद *दिव्य प्रबंध पारायण* होता है।

नालयिर दिव्य प्रबंधम्द्र में मुख्य रूप से नम्मालवार तिरुवाय्मोली रचित 1352 पद । 
तिरुमंगई आलवार रचित 1361 पद ।
गोदादेवी के पिता पेरियालवार रचित 473 पद। 
एकमात्र महिला आललवार *आण्डाल* रचित तिरुप्पावै ।


किंचितकरम ट्रस्ट (Kinchitkaram Trust)
 संस्कृत और द्रविड़ वेदों का संरक्षण. अनुवाद, पुस्तकों का प्रकाशन कैलेंडर का प्रकाशन प्राचीन तमिल और संस्कृत टीकाओं का अंग्रेजी में अनुवाद करने का कार्य करता है

गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

बाइबल

अ ब्राह्म , अब्राहम 
अत्रि-अनसुया के पुत्र चन्द्रमा पुत्र बुध, बुध और वैवस्वत मनु (श्राद्ध देव) की पुत्री इला के पुत्र *एल* पुरुरवा ही एल, इलाही, अल्लाह हैं जिन्हें बाइबल में (देवताओं में वरिष्ठ / महादेव का वाचक यह्व) से याहवेह कहा है। पुरुरवा और इराक के नगर उर की वासी, तिब्बत में स्थित अमरावती पुरी के ईशान कोण में स्थित इन्द्र सभा की नर्तकी उर्वशी (उर वासी) का पुत्र आयु ही आदम है। आ दम (दम मतलब प्राण)।‌
इन्द्र सभा से अवकाश लेकर उर्वशी ने पुरुरवा से अस्थाई काण्ट्रैक्ट मेरिज मुता निकाह किया।
 प्रसुति अवस्था में उर्वशी उर नगर चली गई थी। फिर आयु का फिडिंग समय पूर्ण होने पर पुरुरवा को सोप गई और इन्द्र सभा में जॉइन कर लिया।
आरामी भाषा में रचित तनख (बायबल ओल्ड टेस्टामेंट की पहली पुस्तक उत्पत्ति) के अनुसार यहोवा (एल पुरुरवा) ने आदम (आयु) को दक्षिण पूर्व टर्की के युफ्रेटिस घाँटि में ईलाझी शहर में अदन वाटिका में अकेले ही पाला था। उसके साथ स्वर्भानु की पुत्री प्रभांशी (या प्रभुचि) को रखा था जिसे वह हव्ययती कहता था।
सुरसा की सन्तान सर्प/नाग वंशी सीरिया वासी ने आयु (आदम) को पिता (एल पुरुरवा)के विरुद्ध भड़का कर उसकी आज्ञा के विरुद्ध बुद्धि वृक्ष का अधपका/ कच्चा फल तोड़ कर खा लिया। इस कारण वह स्वयम् भी अल्प बुद्धि का ही रहा। (और बेचारा एल याहवेह बुद्धिहीन/ मुर्ख ही रह गया ।😂 इस कारण) एल पुरुरवा ने आयु (आदम) को अदन वाटिका से निकाल दिया। आयु प्रभांशी / प्रभुचि (हव्ययती) की सलाह पर आर्मेनिया गया। फिर वहाँ से इराक, इरान होते हुए व्यापारिक जहाजियों के साथ से सिंहल द्वीप पहूँच गया। सिंहल द्वीप श्रीलंका में श्रीपाद पर्वत शिखर पर किसी श्रीमान पुरुष के चरण चिह्न बने हैं। वह श्रीलंकाई सनातनियों का तीर्थ स्थल था। उसे ही अब्राहमिक मतावलम्बी यहुदी, ईसाई, इस्लाम और बहाई पन्थ वाले आदम शिखर (एडम पिक) कहते हैं। और उनका तीर्थ मानते हैं।
श्रीलंका से केरल होता हुआ वापस टर्की पहूँचा। तब तक एल पुरुरवा बुढ़ा होने लगा था। इसलिए उसने भी आयु (आदम) को क्षमा कर दिया।
इसी आयु (आदम) और प्रभांशी / प्रभुचि (हव्ययती) का पुत्र नहुष (न्युहु) हुआ। नहुष का विवाह शंकर जी और पार्वती जी की पुत्री अशोक सुन्दरी से हुआ।
नहुष और अशोक सुन्दरी का पुत्र ययाति (अब्राहम) हुआ। 
ययाति (अब्राहम) की प्रथम पत्नी शुक्राचार्य जी की पुत्री देवयानी (सारेह) से यदु (यदुवंशियों के पूर्वज) और तुर्वसु हुए।
ययाति (अब्राहम) की दुसरी पत्नी वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा (हागार या हाजिरा) जो देवयानी (सारेह) की दासी थी के पुत्र पुरु (भारतीय चन्द्र वंशियों के पितामह), अनु और दृह्यु हुए।

बाइबल पुराना नियम (ओल्ड टेस्टामेंट) में अब्राहम की आर्मेनिया से इजराइल तक की यात्रा और संघर्ष, याहवेह का आज्ञाकारी भक्त होना। अब्राहम के पुत्र इसहाक जो किसी फरिश्ते से कुश्ती लड़ा इसलिए उसका नाम इज्राएल पड़ा। दासी हागार/ हाजिरा के पुत्र इस्माइल की बलि देने से याहवेह ने बचाया फिर इस्माइल का स्वेज (सिनाई) में बसना।
अब्राहम का वंश वर्णन, वंशजों की कथा है।
फिर न्युहु का जल प्रलय का वर्णन (शतपथ ब्राह्मण, मत्स्य पुराण, बाइबल) और इराक की प्राचीन कथाओं में भी वर्णित है। आगे न्युहु का वंश वर्णन है।
मुसा और जोसेफ की कथा, मिश्र की दासता से मुक्त होने हेतु इजराइलियों को एकत्र कर लाल सागर पार कर इजराइल में बसना। याहवेह द्वारा मुसा को दस कानून लिखित शिलालेख (टेन टेस्टामेंट) देना। उसके आधार पर यहुदा के नाम पर यहुदी पन्थ स्थापित करना।
फिर दाउद की भजन संहिता है, सुलेमान (सोलोमन) की कथा है।
बाइबल नया नियम में यीशु के जन्म से बारह वर्ष तक का वर्णन। फिर तीस से तैंतीस वर्षायु के बीच यहुदियों में मूल यहुदी पन्थ के सिद्धान्तों तथा मूल यहुदी पन्थ के सिद्धान्तों में बौद्ध मत के अनुसार सुधार करने का उपदेश देना। इससे नाराज यहुदी पुरोहितों ने रोमन ऑफिसर पिलातुस को शिकायत कर क्रुस पर बांधकर कीलें ठोंकने का दण्ड दिलवाना।
शुक्रवार को अपराह्न में यीशु को क्रुस पर टांगना और सूर्यास्त के पहले उतार कर कपड़े में लपेटकर गुफा में रखना।
जहाँ अनुयायियों ने उपचार कर ठीक कर दिया।
शनिवार को यीशु का दूर भाग जाना और रविवार को उपदेश दे कर वापस स्वर्ग (भारत के कश्मीर में लौट आना) का ग्रीक भाषा में वर्णन है।


बुधवार, 15 अप्रैल 2026

भुमध्य रेखा (इक्वेटर) अर्थात 00° अक्षांश, और प्राचीन काल में अवन्तिका पुरी से गुजरने वाली मध्याह्न रेखा (प्राइम मेरिडियन) थी जैसे वर्तमान में ग्रीनविच रेखा मध्याह्न रेखा (प्राइम मेरिडियन) है।

भुमध्य रेखा (इक्वेटर) अर्थात 00° अक्षांश, और प्राचीन काल में अवन्तिका पुरी से गुजरने वाली मध्याह्न रेखा (प्राइम मेरिडियन) थी जैसे वर्तमान में ग्रीनविच रेखा मध्याह्न रेखा (प्राइम मेरिडियन) है।


1 भूमध्य रेखा (Equator) पृथ्वी के बीचों-बीच 0° अक्षांश पर स्थित एक काल्पनिक रेखा है, जो पृथ्वी को उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध में विभाजित करती है। 
और


2 कर्क रेखा (Tropic of Cancer) उत्तरी गोलार्द्ध में भूमध्य रेखा (Equator) के समांतर 
 उत्तर में पश्चिम से पूर्व की ओर खींची गई एक काल्पनिक रेखा है।
ये दोनों समानांतर है।
इसलिए कभी क्रास नहीं हो सकती है।


3 ग्रीनविच रेखा (Prime Meridian) 
 देशांतर (longitude) पर स्थित एक काल्पनिक रेखा है, जो इंग्लैंड के लंदन में ग्रीनविच स्थित रॉयल ऑब्जर्वेटरी से होकर गुजरती है। यह दुनिया का मुख्य समय क्षेत्र (GMT) और अंतरराष्ट्रीय मानक समय निर्धारित करती है, जो पृथ्वी को पूर्वी और पश्चिमी गोलार्द्ध में बांटती है। 
प्राइम मेरिडियन (Prime Meridian) को हिंदी में प्रधान मध्याह्न रेखा या प्रधान याम्योत्तर कहा जाता है। यह 
 देशांतर (longitude) पर स्थित एक काल्पनिक रेखा है

4 ठीक ऐसे ही (ग्रीनविच नामक स्थान के समान ही) प्राचीन काल में उज्जैन से गुजरने वाली (Prime Meridian) 
 देशांतर (longitude) से दुनिया का मुख्य समय क्षेत्र अवन्तिका माध्य समय (AMT) और अंतरराष्ट्रीय मानक समय निर्धारित करती थी, जो पृथ्वी को पूर्वी और पश्चिमी गोलार्द्ध में बांटती थी। 

प्राचीन काल में उज्जैन से निकलने वाली देशान्तर रेखा 75:46 के मध्याह्न (मध्यम मध्याह्न) समय को ही विश्व का मानक समय मानकर अन्य देशों के मध्य से गुजरने वाली मध्याह्न रेखा के माध्यमिक मध्याह्न समय के अन्तर के आधार पर+ या - समयान्तर माना जाता था।
जैसे आजकल भारत की मध्याह्न रेखा ग्रीनविच (प्राइम मेरिडियन) रेखा से 82° 30' देशान्तर रेखा लिखते हैं। और ग्रीनविच माध्यमिक मध्याह्न से देशान्तर रेखा 
82° 30' का समयान्तर 05 घण्टे 30 मिनट लिखते हैं।
वैसे पहले उज्जैन से गुजरने वाली देशान्तर रेखा से करते थे। उस समय उज्जैन से गुजरने वाली देशान्तर रेखा को 00° देशान्तर रेखा कहते थे। जैसे आजकल पूर्व देशान्तर 75°46' कहते हैं।

5 अक्षांश रेखाएं परस्पर समानान्तर हैं। लेकिन देशान्तर रेखाएँ उत्तर ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव पर मिल जाती है इसलिए दो देशान्तर रेखाओं में भूमध्य रेखा पर सर्वाधिक दूरी 40,075 ÷ 360 = 111.319 किलोमीटर लगभग होती है। जबकि दोनों ध्रुवों पर शुन्य होती है।


6 दो अक्षांशों के बीच परस्पर दूरी --- पृथ्वी के अंडाकार (elliptical) आकार के कारण, भूमध्य रेखा पर अक्षांशों के बीच परस्पर दूरी थोड़ी कम (लगभग 110.57
 किमी) और ध्रुवों पर थोड़ी अधिक (लगभग-लगभग 111.7 किमी) होती है।

7 इक्वेटर (भू मध्य रेखा) और लाइन ऑफ केन्सर (कर्क रेखा) को उज्जैन से गुजरने वाली प्राचीन प्रधान याम्योत्तर मध्याह्न रेखा काटती है।
लेकिन भूमध्य रेखा (इक्वेटर) और कर्क रेखा (ट्रॉपिक ऑफ केन्सर) परस्पर समानान्तर होने से एक दुसरे को कभी नहीं काटती ।

उज्जैन से गुजरने वाली देशान्तर रेखापूर्व देशान्तर 75°46' कर्क रेखा को काटती है और भूमध्य रेखा को भी काटती है। 
गुजरने वाली देशान्तर रेखापूर्व देशान्तर 75°46' कर्क रेखा को काटती है और भूमध्य रेखा को जहाँ काटती उसी स्थान को लंकोदय कहते हैं। यहाँ आजकल कोई द्वीप नहीं है। पहले रहा होगा।

लेकिन भूमि पर वृत्त बनाने वाली भूमध्य रेखा और कर्क रेखा आपस में कभी नहीं मिलती। बल्कि भूमध्य रेखा और कर्क रेखा के बीच की सभी स्थानों पर दूरी लगभग 2,635 किलोमीटर ही रहती है।

8 नेताजी मेरिडियन और इक्वेटर का अलग-अलग अर्थ नही समझ पाये। और दोनों का अर्थ भूमध्य रेखा समझ बैठे। और 
 *कह गए कि, उज्जैन में भूमध्य रेखा और कर्क रेखा एक दूसरे को काटती है।*

मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

अक्षय तृतीया

आज के लगभग 2420 वर्ष पहले (लगभग 395 ईसापूर्व) कृतिका नक्षत्र के योग तारा (सात तारों में से मुख्य तारा) पर वसन्त सम्पात अर्थात वसन्त विषुव दिवस था। उस दिन उत्तर ध्रुव पर सूर्योदय और दक्षिण ध्रुव पर सूर्यास्त होता है। सूर्य भूमध्य रेखा से उत्तर दिशा में बढ़ने लगता है। दिन रात बराबर होते हैं और फिर उत्तरी गोलार्ध में दिन बढ़ने और रात छोटी होने लगती है। दक्षिण गोलार्ध में इससे विपरीत दिन छोटे और रात बड़ी होने लगती है।

जिस दिन उक्त योग बना उस दिन वैशाख शुक्ल तृतीया तिथि थी।
इसलिए वैशाख शुक्ल तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया कहा गया।
तभी से अक्षय तृतीया का पर्व मनाया जा रहा है।
गणना अनुसार त्रेतायुग का प्रारम्भ भी अक्षय तृतीया को हुआ था।

युगादि भी होने के कारण इस पर्व का महत्व और भी बढ़ गया।
युगादि तिथियों में स्नान श्राद्ध - तर्पणादि और दान किया जाता है। 
वसन्त विषुव अर्थात वैदिक नव संवत्सर प्रारम्भ दिवस होने से कृषक लोग भूमि का बंटवारा अक्षय तृतीया को ही करते हैं।
इस दिन पूरे दिन मुहुर्त शुभ माना जाता है।

*अक्षय तृतीया और परशुराम जयन्ती 19 अप्रैल 2026 रविवार को है।*
इन्दौर में 
सूर्योदय 06:04 बजे होगा।
मध्यान्ह 12:26 बजे होगा।
मध्याह्न काल 11:10 बजे से 01:42 बजे तक रहेगा।
सूर्यास्त 06:47 बजे होगा।
गोधुलि वेला 06:47 से 07:10 बजे तक रहेगी।

सायं सन्ध्या 06:47 से 07:55 बजे तक रहेगी।
प्रदोषकाल 06:47 हे रात 09:03 बजे तक रहेगा।

तृतीया तिथि 19 अप्रैल 2026 रविवार को दिन में 10:49 बजे से 20 अप्रैल 2026 सोमवार को प्रातः 07:27 बजे तक रहेगी।

*अक्षय तृतीया 20 अप्रैल 2026 सोमवार को क्यों नहीं।* 
*स्पष्टीकरण* 

*20 अप्रैल 2026 सोमवार को तृतीया तिथि 7:27 बजे तक रहेगी।* 

20 अप्रैल 2026 सोमवार को इन्दौर में उपरी कोर दृष्य 
सूर्योदय 06:02:27
सूर्यास्त 18:49:38
दिनमान 12:46:10
प्रातः काल 12:46:10÷5= 02:33:14

*प्रातः काल सूर्योदय 06:02:27 बजे से 08:35:41 बजे तक रहेगा।*

जबकि शास्त्रीय *नियमानुसार तो उदिया तृतीया यदि तीन मुहूर्त अर्थात 06 घटि अर्थात प्रातः काल के बाद तक हो तभी अक्षय तृतीया के रूप में मान्य है।*
*इसलिए प्रातः काल समाप्ति 08:36 बजे के भी 01 घण्टा 09 मिनट पहले (02 घटि 52 पल 30 विपल) पहले ही 07:27 बजे समाप्त हो जाने वाली तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया कैसे माना जा सकता है?*
दुसरा 
*युगादि पर किया जाने वाला श्राद्ध तर्पण अपराह्न व्यापी तृतीया में ही हो सकता है। जबकि तृतीया तिथि प्रातः काल में ही समाप्त हो चुकी होगी।*
श्राद्ध में उदिया तिथि का कोई महत्व नहीं होता है। अपराह्न काल वाली तिथि ही मान्य होती है।

वैदिक काल में असमान क्षेत्र वाले नक्षत्र और मधु, माधव आदि महिनों के नाम से ही जानी जाने वाली तीस-तीस अंशो वाली सायन प्रधि (प्रधियाँ) ही प्रचलित थी (जिसे आजकल सायन राशियाँ कहा जाता है।)

*भारत में विक्रमादित्य के समय आचार्य वराहमिहिर ने 13°20' के समान क्षेत्र वाले नक्षत्र, और पश्चिम टर्की, इराक के बेबीलोन और मिश्र में प्रचलित पशुओं की आकृति वाली समान तीस-तीस अंशो वाली निरयन मेषादि राशियों तथा रविवार आदि वारों का प्रचलन प्रारम्भ किया। इसके पहले मेष वृषभादि निरयन राशियाँ, 13°20' के समान भोग वाले नक्षत्र और सोमवार/ बुधवार भारत में कोई नहीं जानता था।*
*अतः सोमवार बुधवार को पढ़ने वाली तृतीया विशेष पुण्यदाई मानना केवल पौराणिक परम्परा है। श्रोत/ स्मार्त मत नहीं है।*

*अक्षय तृतीया पर विवाह करने वालों को रिक्ता तिथि चतुर्थी में विवाह करना पड़ेगा यह भी एक मुद्दा है, लेकिन अक्षय तृतीया पर विवाह शास्त्रीय मत न होकर केवल परम्परा मात्र है इसलिए विचारणीय नहीं है। फिर भी समस्या तो है ही।*
ध्यान रखें श्रोत - स्मार्त मतानुसार सर्वकालिक तिथि ही महत्व रखती है।
*जहाँ उदिया तिथि ग्राह्य होती है वहाँ भी शाकल्यपादिता तिथि अर्थात तीन मुहूर्त अर्थात छः घटि तक (सूर्योदय के बाद 02 घण्टे 24 मिनट तक) रहे तभी मान्य होती है।* 
वास्तव में तो दिनमान को पाँच से भाग देकर (दिनमान÷5=) तीन मुहूर्त या छः घटि निकालते हैं।
*20 अप्रैल 2026 को तृतीया तिथि सूर्योदय के बाद केवल 03 घटि 32 पल तक ही रहेगी।* अर्थात दो मुहूर्त भी नहीं है।
*जबकि 19 अप्रैल 2026 रविवार को तृतीया तिथि दिन में 10:49 बजे लगेगी। अतः मध्याह्न व्यापी, अपराह्न व्यापी प्रदोषकाल व्यापी तथा पूर्ण रात्रि व्यापी तिथि है।*
*अतः अक्षय तृतीया 19 अप्रैल 2026 रविवार को ही है।*

सोमवार, 13 अप्रैल 2026

निरयन मेष संक्रमण से नक्षत्रीय नव संवत्सर युधिष्ठिर संवत और विक्रम संवत का प्रारम्भ।

*युधिष्ठिर संवत 5163 विक्रम संवत 2083 का प्रारम्भ, वैशाखी, निरयन मेष संक्रमण 14 अप्रैल 2026 मङ्गलवार को प्रातः 09:33 बजे होगा।*
*पुण्यकाल सूर्योदय समय (इन्दौर में 06:21 बजे से) दोपहर 12:45 बजे तक रहेगा।* 
*धार्मिक प्रयोजन मे युधिष्ठिर संवत 5163 विक्रम संवत 2083 का प्रारम्भ निरयन मेष संक्रमण के समय दिन में 09:33 बजे से होगा।*
*लेकिन व्यवहार में सूर्योदय से ही लागू होगा। इन्दौर में सूर्योदय समय 06:21 बजे होगा ‌।*

वैशाखी पर्व भी 14 अप्रैल मङ्गलवार को है। यह खालसा पन्थ की बैसाखी से मिलता है, लेकिन खालसा पन्थ नानक पन्थी पञ्चाङ्ग के आधार पर अमृतसर के लिए बैसाखी निर्धारित करते हैं।

*ब्राह्मण ग्रंथों और श्रोत सूत्र -गृह्य सूत्र ग्रन्थों में क्रान्ति वृत के ठीक मध्य में चित्रा तारे को माना गया है। अर्थात चित्रा तारे को भूमि द्वारा सूर्य के परिभ्रमण पथ के ठीक मध्य में अर्थात 180° पर माना गया है। इसलिए क्रान्तिवृत और नक्षत्र पट्टी का प्रारम्भ बिन्दु चित्रा तारे से 180° पर माना गया है। यही अश्विनी नक्षत्र का प्रारम्भ बिन्दु होता है। इसे निरयन मेषादि बिन्दु पर भी कहते हैं।*

*आकाश का नित्य अवलोकन करने वाले किसान आदि और तारों (Star's) को पहचानने वाले खगोल शास्त्री आकाश में देख सकते हैं कि, निरयन मेष संक्रमण/ वैशाखी (14 अप्रैल) को सूर्योदय के ठीक पहले चित्रा तारा पश्चिम में अस्त हो रहा होगा। और सूर्यास्त के ठीक बाद में चित्रा तारा पूर्व में उदय हो रहा होगा। यह नक्षत्रीय नव संवत्सर प्रारम्भ होने की पहचान है।*

*पञ्जाब हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उड़ीसा और नेपाल में जिन दो सूर्योदय के बीच निरयन मेष संक्रमण होता है उसी दिन वैशाखी से नव वर्ष मनाते हैं। चूंकि मङ्गलवार और बुधवार के सूर्योदय के बीच निरयन मेष संक्रमण होगा इसलिए 14 अप्रैल 2026 मङ्गलवार को सूर्योदय के समय वैशाखी से नव वर्ष मनाते हैं। इसी दिन यहाँ विक्रम संवत 2083 का प्रारम्भ होगा।*
*उत्तर प्रदेश में सतुआ संक्रान्ति कहते हैं।*

*बङ्गाल और असम में में जिन दो मध्यरात्रियों के बीच में निरयन मेष संक्रमण होता है उसके आधार पर नववर्ष प्रारम्भ करते हैं। चुंकि,13 उपरान्त 14 अप्रैल 2026 सोमवार Tuesday को मध्यरात्रि के बाद मेष संक्रमण होगा इसलिए बङ्गाल में नबा वर्ष पाहेला बोईशाख 14 अप्रैल 2026 मङ्गलवार से प्रारम्भ होगा। बङ्गाल में लोग परस्पर सुभो नोबो बोरशो कह कर बधाई देते हैं।*

*उड़ीसा में 14 अप्रैल से पणा संक्रान्ति या महा बिशुबा के रूप में नव वर्ष मनाएंगे।*

*त्रिपुरा में भी 14 अप्रैल को निरयन मेष संक्रमण से ही नव वर्ष प्रारम्भ होता है।*

*असम में निरयन मेष संक्रमण 14 अप्रैल से ही बिहू या बोहाग बिहू और रोंगोली बिहू नाम से नव वर्ष मनाएंगे। बोहाग बिहु का प्रथम दिन गोरू बिहू कहलाता है।*

*तमिल नाडु में सोमवार को सूर्यास्त के बाद निरयन मेष संक्रमण होने के कारण तमिल नाडु में 14 अप्रैल 2025 से पथाण्डु के नाम से नव वर्ष मनाएंगे।*
पुडुचेरी में भी तमिलनाडु के समान ही निरयन मेष संक्रमण दिवस से ही नव वर्ष मनाते हैं।

*सोमवार को सूर्योदय पश्चात 18 घटि अर्थात 07 घणटे 12 मिनट के बाद निरयन मेष संक्रमण होने से केरलम में 14 अप्रैल को विषुकानी नाम से नववर्ष मनाएंगे।*

इसके अलावा श्रीलङ्का, म्यांमार, कम्बोडिया, लाओस, थाईलैंड और सिङ्गापूर में बसे तमिल, मलयाली जन भी निरयन मेष संक्रमण के दिन से ही नववर्ष प्रारम्भ करते हैं।

अर्थात *सातवाहन वंश और शक और कुषाणों द्वारा शासित पश्चिम भारत और मध्य भारत के पौराणिक मतावलम्बियों को छोड़कर शेष उत्तर भारत, पूर्वी भारत, और दक्षिण भारत में तथा बाङ्ग्ला देश, श्रीलङ्का, म्यांमार, कम्बोडिया, लाओस, थाईलैंड और सिङ्गापूर में बसे तमिल, मलयाली जन भी निरयन सौर संक्रमण से प्रारम्भ होने वाला नव संवत्सर और मेष-वृषभादि मास तथा वैशाखी, विषु, माघ बिहू आदि पर्व मनाते हैं।*