बुधवार, 8 अप्रैल 2026

भारत पर विदेशी शासन का संक्षिप्त इतिहास।

धर्म की रक्षा करने से धर्म भी रक्षा करता है।
वैदिक वर्णश्रम धर्म छोड़कर जाति प्रथा अपनाई, पञ्च महायज्ञ छोड़कर जैनों और बौद्धों की नकल कर मठ, मन्दिर में मूर्ति पूजा प्रारम्भ कर दी तो देश से अफगानिस्तान, तध्य और पूर्वी तुर्किस्तान, तिब्बत, म्यांमार, श्री लङ्का सब कट गये। और अन्त में 1947 में पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बाङ्लादेश) और पश्चिमी पाकिस्तान कट गये।
सर्वप्रथम दिवोदास और सुदासद के समय टर्की (तुर्किये) से चन्द्र वंशी और सीरिया से नाग वंशी आये और दशराज युद्ध के समय उत्तर में तुर्किस्तान (ब्रह्मावर्त) भारत से कट गया।
 महाभारत काल में ही इराक के असूर धर्म से संस्कारित जरुथ्रुस्ट ने ईरान मे पारसी मत चलाकर सनातन वैदिक वर्णश्रम धर्म को हानि पहूँचाई। ईरान में पारसी मत ने सनातन वैदिक वर्णश्रम धर्म को समाप्त कर दिया। और ईरान भारत से कट गया।
श्रमण मत के जैन पन्थ और 1857 ईसा पूर्व में बौद्ध पन्थ का उदय हुआ। उन्होंने सनातन वर्णाश्रम वैदिक धर्म का नाश किया। मङ्गोलिया भारत से कट गया। और तिब्बत भी लगभग-लगभग कट ही गया।
भगवान श्रीकृष्ण पर आक्रमण करने के लिए यमन से काल यमन को आमन्त्रित करने वाला जरासन्ध चन्द्रवंशी यादव था।
जब 550 ईसापूर्व में पारसी (कुरेश)का आक्रमण हुआ, अफगानिस्तान तक पारसी धर्म फैल गया। 
फिर भारत खण्ड-खण्ब होने लगै।
326 ईस्वी पूर्व सिकन्दर के आक्रम से उत्तर पश्चिम प्रान्त कट गया। पश्चिम को भारत की फूट परस्ती पता चल गई।
123 ई.पू. से 200 ई. तक शको ने भारत पर आक्रमण किया।
60 से 240ई.तक कुषाणो ने भारत पर आक्रमण किया।।
और 425ई. से 500ईस्वी तक हूणो ने भारत पर आक्रमण किया। 

1200 ईस्वी पूर्व मूसा के समय और 2000 वर्ष पहले यीशु के साथ कश्मीर और त्रिपुरा में यहुदी बस गए और भारत में अब्राहमिक मत का प्रारम्भ हुआ। फिर यीशु के शिष्य सेंट थॉमस (थोमा) ने 52 ईस्वी में केरल के कोडुंगल्लूर (मुज़िरिस) के पास मल्यान्कारा (Maliankara) में भारत के पहले चर्च की स्थापना की थी। उन्होंने केरल और तमिलनाडु के तटीय क्षेत्रों में कुल सात और आधे चर्च (एझरा पल्ली) स्थापित किए, जिनमें से पलयार, कोट्टाकावू, और निरनम प्रमुख हैं।
सनातन वैदिक वर्णाश्रम धर्म पर हमले बढ़ गये।
सन 622 में सऊदी अरब में इस्लाम की स्थापना के समय से मोहमद ने अपने अनुयायियों को गजवा ए हिन्द का लक्ष्य दिया। और इराक के खलिफा ने गजवा ए हिन्द के लक्ष्य प्राप्ति के लिए सन 638 से 711 के 74 वर्षा में इराक के नौ खलिफाओं ने 15 बार सिन्ध पर आक्रमण किया। 
24 जून 1206 को दिल्ली पर कुतुबुद्दीन ऐबक ने इस्लामी सत्ता स्थापित की।
20 मई 1498 से केरलम के कोळीकोट बन्दरगाह पर पुर्तगाली (वास्को डी गामा) के द्वारा युरोपीयन का आक्रमण प्रारम्भ हुआ।
1605 से 1885 तक नीदरलैंड्स के डचों का प्रभुत्व रहा।
1664 में फ्रेंच भारत आये 1668 में पहली फैक्ट्री खोली, और 1673 से पाण्डु चेरी में शासन करने लगे।
1600 में अंग्रेज भारत आये और 1665 से राज करने लगे।
 इस समय न गांधी न कम्युनिस्ट और न कांग्रेस का जन्म हुआ था।
तब हमारी राष्ट्रियता को किसने क्षति पहूँचाई थी?

मंगलवार, 7 अप्रैल 2026

पौराणिकों के झूठ।

पौराणिकों पर अब्राहमिक मत विशेषकर ईस लाम का कितना प्रभाव था यह इस बात से स्पष्ट होता है कि, याहवेह किसी लोक विशेष में रहता है और मूसा को दस नियम (कानून) लिखित शिलालेख देने नीचे उतरा था।
ऐसे ही अल्लाह से मिलने येरुशलम से बुर्राक नामक गधी पर बैठ कर मोह मद गया था।
चार फ़रिश्ते अल्लाह का सिंहासन उठाये रहते हैं।
फिर वह एकदेशीय जीव निराकार कैसे हो सकता है।
लेकिन अब्राहमिक मतावलम्बी उसे निराकार कहते हैं।
ऐसी ही बुद्धी हीनता पौराणिकों ने दर्शाई।
सर्वव्यापी विष्णु, नार (प्रकृति या जल) पर अयन करने वाले एक देशी नारायण को एक ही व्यक्ति बतला दिया।
वत्रासुर, शम्भर आदि अनेक असुरों, दैत्यों का वध करने वाले इन्द्र को सदा पराजित होने वाला बतला दिया। और परेशान देवताओं की सहायतार्थ श्री हरि को पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ता है। वह भी एक छोटे से क्षेत्र लङ्का द्वीप/ लङ्का पुरी, मथुरा के राजाओं को मारने के लिए!
पञ्च मुखी (अण्डाकार) हिरण्यगर्भ ब्रह्मा और चतुर्मुख प्रजापति ब्रह्मा को एक बतलाने के लिए रुद्र के हाथों ब्रह्मा का सिर कटवा दिया।
उसके पीछे भी अनेक कारण जोड़ लिए।
1 वाणी-हिरण्यगर्भ ब्रह्मा की मानस सन्तान प्रजापति ब्रह्मा और सरस्वती। अर्थात प्रजापति की शक्ति सरस्वती।
सरस्वती को देख कर प्रजापति कामुक हो गये और (उषा के पीछे-पीछे सूर्य के रूपक से) सरस्वती के पीछे प्रजापति ब्रह्मा दौड़े। इस लिए रुद्र ने एक सिर काट डाला।
हिरण्यगर्भ ब्रह्मा का ऊपरी सिरा वेद विरुद्ध असुरों के हित में मन्त्रोच्चार कर रहा था इसलिए तन्त्र रचियता रुद्र ने तान्त्रिक क्रिया करने के आरोप में ब्रह्मा का ऊपरी सिर काट डाला।
ज्योतिर्लिङ्ग का सिरा नहीं खोज पाने के बाद भी खोज लिया कहकर झूठ बोलने वाला सिर काट डाला।
अपराधी को दण्ड देने से रुद्र को ब्रह्म हत्या का पाप के रूप में वह ब्रह्मशिर चिपक गया।
इतनी बे-सिर-पैर की कल्पना सनातन वैदिक धर्म में घुसा दी। इन पौराणिकों से बड़ा पापी और कौन हो सकता है।
जिन्होंने सती के आत्मदाह की झूठी कहानी गढ़ी। देवी देवता अमर होते हैं तो सती मर कैसे गई?
महा विशविज्ञानी भगवान शंकरजी सती की मृत्यु से विक्षिप्त कैसे हो सकते है?
शंकर जी ने सती की भस्मीभूत देह का शव कन्धे पर कैसे लटकाया?
शंकर जी के कन्धे पर टंगी सड़ी गली लाश के इक्कावन टूकड़े क्यों करना पड़े? वो भी भगवान विष्णु को!
शंकर जी को तब तक भी होंश नहीं आना भी आश्चर्य जनक है।
देवी सती का पुनर्जन्म भी हुआ!
हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के मानस पुत्र कामदेव को भी भस्म कर दिया!
कामदेव का भी पुनर्जन्म हुआ। 
पतिव्रता नारी रतिदेवी ने कामदेव के दुसरे जन्म वाले स्वरूप को भी अपना पति मान लिया!
शंकर भगवान को नशेड़ी बतला दिया।
वैरागी भगवान शंकरजी और योगेश्वर श्रीकृष्ण को कामुक बतला दिया। ब्रह्मचारी हनुमानजी का गुरु की पुत्री से विवाह करवा दिया और पसीने से मछली को गर्भवती होना भी बतला दिया। और मकर ध्वज को पुत्र बतला दिया।

इतने झूठ तो कोई बड़ा अपराधी भी नहीं बोलता होगा।

सोमवार, 6 अप्रैल 2026

महाभारत के अनुसार दक्ष द्वितीय के यज्ञ मे सती ने आत्मदाह नहीं किया। बल्कि शंकर-पार्वती दक्ष यज्ञ में साथ में गये थे और साथ में ही सहर्ष लौट आये।

*प्रचेताओं के पुत्र दक्ष द्वितीय की पुत्री सती पार्वती ने दक्ष यज्ञ में आत्मदाह नहीं किया। वे जीवित ही शंकर जी के साथ कैलाश लौटी थी।*
*यदि दक्ष यज्ञ में सती आत्मदाह करती, सती का पुनर्जन्म होता और पार्वती के रूप में शंकर जी से विवाह होता तो वाल्मीकि भी रामायण में कुछ तो उल्लेख करते ही।*
*कृपया गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित महाभारत पञ्चम खण्ड,शान्ति पर्व/ मौक्ष पर्व/ अध्याय २८४ पृष्ठ ५१६६ या संक्षिप्त महाभारत का पृष्ठ १२८१ देखें।*
*महाभारत में  उल्लेखित दक्षयज्ञ विध्वंस की कथा के अनुसार प्रचेताओं के पुत्र दक्ष द्वितीय  द्वारा किए गए यज्ञ में सभी देवताओं और ऋषियों को बुलाया लेकिन शंकर पार्वती को नहीं बुलाया।*
*देवताओं को समुह में जाते देख पार्वती ने शंकर जी से पुछा, तब शंकर जी ने पार्वती को बतलाया कि, दक्ष (द्वितीय) यज्ञ कर रहे हैं, उसमें उनके निमन्त्रण / आह्वान पर देवता यज्ञभाग लेने जा रहे हैं।*
*पार्वती द्वारा यह आपत्ति जताई कि, आप रुद्र को यज्ञभाग लेने हेतु क्यों आमन्त्रित नहीं किया गया।*
*तब शंकर जी बतलाते हैं कि, इसमें दक्ष का कोई दोष नहीं है। सृष्टि के आदि में प्रजापति ब्रह्मा ने रुद्र को यज्ञभाग न देने का विधान किया गया था। इसलिए मुझे नहीं बुलाया।*
*दक्ष द्वारा यज्ञ में न बुलाने और यज्ञभाग न देने की जानकारी से रुष्ट पार्वती (न कि, सती) को साथ लेकर स्वयम् शंकर जी दक्ष यज्ञ स्थल पर गये। वहाँ पार्वती अपनी नाराज़गी प्रकट करती है। केवल दधीचि पार्वती का समर्थन करते हैं। शेष सब मौन ही रहते हैं। दक्ष पर पार्वती के रोष का कोई प्रभाव न देखकर पार्वती जी और रुष्ट हो गई। इसे देखकर शंकरजी ने वीरभद्र और भद्रकाली का आह्वान किया। और वीरभद्र और भद्रकाली को दक्षयज्ञ विध्वंस का आदेश दिया। वीरभद्र और भद्रकाली को दक्षयज्ञ विध्वंस कर दक्ष द्वितीय का सिर काट दिया। और देवताओं को भी प्रताड़ित किया।*
*फिर प्रजापति ब्रह्मा ने नियमों में संशोधन कर भविष्य में रुद्र को यज्ञभाग देने का नियम बना दिया तब, शंकर जी ने दक्ष द्वितीय को पुनर्जीवित किया। और सहर्ष पार्वती जी को लेकर वापस लौट गए।*
*क्या महाभारत ग्रन्थ गलत है?  यदि शिव पुराण सही है तो महाभारत गलत है। शिव पुराण गलत है।*
*शिवपुराण जो वस्तूतः वायु पुराण की रुद्र संहिता नामक अध्याय है, गलत है।* 
 *क्योंकि वायु पुराण में महाभारत के पश्चात आधुनिक काल की रचना है। वायु पुराण में आधुनिक काल तक के भारत के अधिकांश राजवंशों और राजाओं का इतिहास दिया है। मतलब अत्यधिक नवीनतम रचना है।* अतः 
*वरीयता तो प्राचीन ग्रन्थ महाभारत की ही रहेगी।*
*अतः महाभारत में वर्णित तथ्य ही सही है कि,प्रचेताओं के पुत्र दक्ष द्वितीय की पुत्री सती पार्वती ने दक्ष यज्ञ में आत्मदाह नहीं किया। वे जीवित ही शंकर जी के साथ कैलाश लौटी थी।*
*इसलिए सती की भस्मीभूत देह को लेकर शंकर जी द्वारा विक्षिप्त होकर पूरे भारत वर्ष में भ्रमण करना भी गलत ही है। भगवान विष्णु द्वारा शंकर भगवान के कन्धे पर लटकी सती की भस्मीभूत देह के इक्कावन टूकड़े करना भी गलत है। सती के भस्मीभूत देह के टुकड़े भारत भूमि पर जहाँ- जहाँ गिरे वहाँ-वहाँ शक्तिपीठ बनना भी गलत है।*
*पौराणिकों ने देवी सती की मृत्यु होना बतला दिया, जबकि शंकर-पार्वती देवता हैं अतः एक मन्वन्तर आयु वाले हैं। अर्थात अमर हैं।*
*यदि सती जलकर भस्म हो गई थी तो उनकी मृत देह कहाँ से आ गई?*
 *पौराणिकों ने भगवान शंकर को विक्षिप्त होना बतला दिया। जबकि वे महान विश विज्ञानी और वितरागी/ वैराग्यवान हैं। उन्हें कैसा शौक और कैसा मोह।*
*पौराणिकों ने भगवान विष्णु द्वारा मृत देह के इक्कावन टूकड़े करने वाला बतला दिया।*
क्या ऐसा पुराण और पौराणिक कथा सही हो सकती है? या केवल सनातन वैदिक धर्म के देवी देवताओं का अपमान करने के उद्देश्य से रची गई बौद्ध रचना है?*
*ध्यान रखें बौद्ध मत की वज्रयान शाखा के तान्त्रिक बौद्धों में ऐसी ही कथा/ कहानियाँ और मठ- मन्दिर पाये जाते हैं। वैदिक धर्म में नहीं।* 

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

मानव योनि श्रेष्ठतम है।

वाल्मीकि रामायण में बाली, सुग्रीव, हनुमान जी, अङ्गद आदि ने कई बार स्वयम् को मानवों से निम्नतर योनि कहा है।
मानवों से उच्चतर केवल देवताओं को ही माना गया है।
गन्धर्व भी मूलतः मानव जाति के ही थे। इनमेऔ कुछ देवताओं की सन्निधि पाकर देव गन्धर्व कहलाये। जैसे मानवों में भी कई ऋषि, राजन आदि देवताओं के निकटतम सम्पर्क में ही नहीं थे अपितु भ्रगु जैसे ऋषिगण तो देवताओं को छोड़ों देवों को भी दण्डित करते थे।
महाराजा रैवत तो पुत्री को भी ब्रह्मा जी के लोक में ले गए थे। मान्धाता, दीलिप, रघु, दशरथ, महाराज मुचुकुंद आदि देवासुर संग्राम में देवताओं के पक्ष में लड़ते थे।
यक्षों (मङ्गोल) और राक्षसों (निग्रो) को बन्धु (भाई) माना जाता है। लेकिन यक्षराज मणिभद्र और शंकरजी के मित्र कुबेर जैसे कुछ यक्ष देवयक्ष कहलाते हैं। लेकिन ये अपवाद ही होते हैं।
यों तो हम (नागपाल, नागरथ सरनेम वाले कालबेलिया) नागों की भी पूजा करते हैं। गो माता की भी पूजा करते हैं। पीपल आदि वृक्षों की भी पूजा करते हैं। लेकिन इन सब योनियों से मानव योनि श्रेष्ठतम है।

शुक्रवार, 20 मार्च 2026

अवतार ईश्वर नहीं होता, सिद्ध व्यक्ति का उच्च लोक से निर्धारित समय के लिए निश्चित कार्यक्रम के अन्तर्गत कार्य विशेष के लिए उतर कर, जन्म लेकर कार्य पूर्ण होने पर पुनः उसी लोक में लौटने को अवतार कहते हैं।

परमात्मा सर्वोच्च है। परमात्मा के संविधान को ही वेदों में ऋत कहा गया है।
परमात्मा ने जिस कल्याण स्वरूप ॐ सञ्कल्प से स्वयम् को परब्रह्म परमेश्वर विष्णु और माया के प्रथम सगुण निरञ्जन निराकार स्वरूप में प्रकट होकर सृजन प्रारम्भ किया उसी सञ्कल्प के अन्तर्गत पुनः विष्णु ने कल्प रचना की कल्पना की। जो उनकी कल्पना है, वही हमारे लिए सृष्टि है।
इसलिए जगत को माया और स्वप्नवत कहा जाता है।
चूंकि जो भी हम अनुभव कर रहे हैं वस्तुतः भगवान विष्णु की कल्पना में वह बहुत पहले हो चुका है। शुटिंग होकर रील तो कब की बन चुकी हम आज अनन्त डायमेंशन में अभी अनुभव कर रहे हैं।
भगवान श्री रामचन्द्र जी को बाली वध का बदला चुकाने हेतु श्रीकृष्ण जन्म में जरा के बाण से मृत्यु वरण ।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने नारायण स्वरूप में स्थित होकर अर्जून से स्पष्ट कहा है कि, तेरे और मेरे अनेक जन्म हो चुके हैं, मैं जानता हूँ लेकिन तु नहीं जानता है।
षड ऐश्वर्यवान व्यक्ति को ही भगवान कहते हैं।भगवान और साधारण व्यक्ति में इतना ही अन्तर होता है।
इसके दो प्रमाण वाल्मीकि रामायण से और एक प्रमाण भागवत पुराण से दे रहा हूँ।
1 जनक जी के यहाँ पिनाक धनुष भङ्ग से क्रोधित होकर जब भगवान परशुराम जी ने श्री रामचन्द्र जी को वैष्णव धनुष पर प्रत्यञ्चा चढ़ाने की चुनौती देते हुए जैसे ही वैष्णव धनुष श्री रामचन्द्र जी के हाथ में दिया वैसे ही भगवान श्री परशुराम जी का वैष्णव तेज (अवतार पद का चार्ज) श्री रामचन्द्र जी के शरीर में अन्तरित हो गया।
अब परशुराम जी केवल ऋषि रह गये और श्री रामचन्द्र जी को अवतार का पदभार मिल गया।
मतलब अवतारत्व निर्धारित कार्यकाल में निर्धारित कार्य पूर्ण करने हेतु ईश्वर प्रदत्त पदभार है। इसका प्रमाण है कि,
2 जब भगवान श्री रामचन्द्र जी की अवतार अवधि पूर्ण हो गई तो उन्हें अपना कार्यभार वापस लौटा कर लीला संवरण करने का निर्देश देने स्वयम् काल ही पधारे । और श्री रामचन्द्र जी ने सरयु में जल समाधि लेकर देह त्याग दी।
3 श्रीमद्भागवत पुराण में श्रीकृष्ण के यज्ञ में आकर एक ब्राह्मण अपने सात पुत्रों की जन्मते ही मृत्यु का दोष राजा पर लगाकर श्रीकृष्ण को दोषी ठहराते हैं तो, अर्जुन उनके गर्भस्थ शिशु की रक्षा का भार लेते हैं। लेकिन असफल होने पर आत्मदाह कर प्रायश्चित करने जा रहे होते हैं तभी भगवान श्रीकृष्ण का यज्ञ पूर्ण होने पर वे अर्जून को लेकर पश्चिम सागर होते हुए क्षीर सागर में शेषनाग के महल में सिंहासनारुड़़  अष्टभुजा धारी भगवान भूमा के सम्मुख करबद्ध उपस्थित होते हैं। तब भगवान भूमा नारायण श्री कृष्ण जी को कहते हैं कि, तुमसे मिलने के लिए ही मेने तुम्हे यहाँ बुलाया है।
तुम गत जन्म में नारायण ऋषि थे और अर्जुन नर ऋषि थे। तुम दोनों नर नारायण ने कठोर तप किया था।
फिर ब्राह्मण बालकों को सोप कर वापस लौटा देते हैं।
ये तीनों प्रमाण सिद्ध करते हैं कि, भगवान विष्णु या नारायण स्वयम जन्म नहीं लेते बल्कि किसी योग्य तपस्वी ऋषि को किसी कार्य विशेष को पूर्ण करने के लिए आवश्यक सामर्थ्य प्रदान कर अवतार का कार्यभार सोपते हैं।
इससे सिद्ध होता है कि, जब  वैकुण्ठ लोक के किसी देश का क्षत्रप के रूप में पदस्थ कोई आत्मज्ञ/ब्रह्मज्ञानी व्यक्ति किसी विशेष प्रयोजन को पूर्ण करने हेतु निर्धारित कार्य काल के लिए नियुक्त किया जाता है तो उसके उच्च लोक से उतरने की घटना को अवतरण कहते हैं। इसलिए वह षड ऐश्वर्यवान व्यक्ति अवतार कहलाता है। लेकिन वह ईश्वर नहीं होता है।
इसलिए ही भगवान श्री रामचन्द्र जी साकेत लोक से उतरे थे और पुनः साकेत लोक में अपना कार्य देखने लौट गए।और भगवान श्रीकृष्ण गोलोक से अवतरित हुए और वापस लौट कर गोलोक का कार्य भार ग्रहण कर लिया।
हमारे सौ-सवासौ वर्ष उन लोकों के लिए क्षण मात्र होता है, इसलिए वहाँ कोई कमी नहीं लगती है।

वैदिक उत्तरायण सूर्य की स्थिति उत्तर गोलार्ध में लेकिन ऋतुएँ केवल सौर मास पर आधारित नहीं होती।

संवत्सर -  वसन्त विषुव से अगले वसन्त विषुव तक लगभग 365 दिन 05 घण्टे 48 मिनट 45.2 सेकण्ड हम संवत्सर के साथ वसते (रहते) हैं; फिर संवत्सर पीछे रह जाता है और हम अगले संवत्सर के साथ हो लेते हैं। 
वैदिक अयन शब्द का ठीक-ठीक अर्थ आज तक मुझे नहीं मिला। अयन मतलब उत्तर में गति या उत्तर में स्थिति। जैसे नारायण नार (जल) में ही स्थिति और जल में ही गति?
या
उत्तर दिशा की ओर गति?
उत्तरायण का अर्थ यदि सूर्य की स्थिति या गति उत्तरी गोलार्ध में लेते हैं तो इसके समर्थन में ---
शतपथ ब्राह्मण 2/1/3 तथा तै.सं. 6/5/3 तथा नारायण उपनिषद अनु. 80 में *देवा ऋतवः वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतु उत्तरायण में होती है।* 
यहाँ कहीँ भी शरद ऋतु के आधे भाग का तो नाम ही नहीं है। और वसन्त ऋतु को भी आधी नहीं बतलाया गया। बल्कि वसन्त, ग्रीष्म वर्षा ऋतु ही कहा है।
और
मैत्रायण्युपनिषद में उत्तरायण और नारायण उपनिषद अनु 80
*उदगयन शब्द और देवयान / देवलोक शब्द स्पष्ट आये हैं।* 
महाभारत भीष्म पर्व के अध्याय 25 से 43 के अन्तर्गत भगवान श्रीकृष्ण ने विभूति वर्णन अध्याय 10 श्लोक 35 में ऋतुओं में वसन्त ऋतु कहा है। जो उसकी पूर्णता का सूचक है।
और देवयान मार्ग वर्णन अध्याय 08 श्लोक 24 में उत्तरायण के छः महीने कहा है। अर्थात   देवयान मार्ग में उत्तरायण के पूरे छः महीने आते हैं और मैत्रायण्युपनिषद तथा नारायण उपनिषद अनु 80 में भी उत्तरायण को ही देवयान कहा है। तथा शतपथ ब्राह्मण 2/1/3 तथा तै.सं. 6/5/3 तथा नारायण उपनिषद अनु. 80 में देवा ऋतवः वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतु । कथन से स्पष्ट हो जाता है कि, वसन्त सम्पात से शरद सम्पात के बीच का समय उत्तरायण होता है।
लेकिन 
यदि उत्तर की ओर गति माने तो दक्षिण परम क्रान्ति से उत्तर परम क्रान्ति सायन मकर संक्रान्ति (22 दिसम्बर) से सायन कर्क (22 जून) तक मानना होगा।
लगभग सभी पुराणों और  पञ्चाङ्ग निर्माण के ग्रह गणित के सिद्धान्त ग्रन्थ इसका समर्थन करते हैं।
यहाँ यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि, उत्तरायण - दक्षिणायन शब्द वैदिक हैं पौराणिक नहीं और कोई गणितीय अवधारणा भी नहीं है।  अतः ये प्रमाण कोटि में नहीं आते हैं।

ऋतु - शतपथ ब्राह्मण 2/1/3 तथा तै.सं. 6/5/3 तथा नारायण उपनिषद अनु. 80 में *देवा ऋतवः वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतु उत्तरायण में होती है को प्रमाण मानें तो मधुमास वसन्त सम्पात से प्रारम्भ मानना होगा। और ईष मासारंभ शरद सम्पात से मानना होगा।

लेकिन यदि दक्षिण परम क्रान्ति सायन मकर संक्रान्ति (22 दिसम्बर) से उत्तर परम क्रान्ति  सायन कर्क (22 जून) तक उत्तरायण मानकर सायन मीन संक्रान्ति से वसन्त सम्पात (सायन मेष संक्रान्ति) तक मधुमास मानें तो फिर एक समस्या और है कि, दक्षिणी गोलार्ध में दक्षिण अफ्रीका महाद्वीप, दक्षिण अमेरिका महाद्वीप, आस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैण्ड के निवासियों के लिए वसन्त सम्पात (सायन मेष संक्रान्ति) के समय वसन्त ऋतु मानें या शरद ऋतु?  और शरद सम्पात (सायन तुला संक्रान्ति) के समय शरद ऋतु माना जाए या वसन्त ऋतु ?
जब उत्तर अमेरिका महाद्वीप और अफ्रीका महाद्वीप के उत्तर में ग्रीष्म ऋतु होती है, गर्मी पड़ती है तभी दक्षिण अमेरिका महाद्वीप और अफ्रीका महाद्वीप के दक्षिण भाग में शिशिर ऋतु रहती है। ठण्ड पड़ती है।
भूमध्य रेखीय देशों में बारहों मास ग्रीष्म और वर्षा होती रहती है। तो मरुस्थलीय क्षेत्रों में वर्षा होती ही नहीं तो वर्षा ऋतु कैसे होगी।
ध्रुवीय प्रदेशों में सदैव शीत ही रहती है ग्रीष्म ऋतु की कल्पना ही नहीं की जा सकती।
अतः ऋतुओं को महीनों से नहीं जोड़ा जा सकता है।
हमने जो वैदिक मधु- माधव मास अर्थात वसन्त सम्पात से सायन मिथुन संक्रान्ति तक वसन्त ऋतु मानी है यह दक्षिण में हरियाणा पञ्जाब से उत्तर में ताजिकिस्तान अर्थात उत्तर अक्षांश 30°
 40° उत्तर अक्षांश तक ही सही है। और पौराणिक मधु-माधव मास अर्थात सायन मीन संक्रान्ति से सायन वृषभ संक्रान्ति तक मानें तो यह उज्जैन लगभग उत्तर अक्षांश 20° से उत्तर अक्षांश 30° तक पञ्जाब हरियाणा तक ही सही रहेगा।

मंगलवार, 17 मार्च 2026

भारतीय राजनीति अधिकांश समय ही सनातन वैदिक वर्णाश्रम धर्म और संस्कृति तथा भारतीय हितों के विरुद्ध ही रही

कितने ही प्रमाण दे दो कि, रा.स्व.से.संघ युरोपीय अब्राहमिक मत के हित साधन हेतु इटली के फासिस्ट दल के अनुकरण में सावरकर, हेडगऺवार और मुञ्जे ने बहुत सोच समझ कर खड़ी की गई संस्था है।
यह संस्था वैदिक सनातन वर्णाश्रम धर्म और भारतवर्ष के विरुद्ध और  राजनीतिक विचारधारा में  व्यक्तिवाद तथा आर्थिक विचारधारा में पूँजीवाद को भारत में स्थापित करने के उद्देश्य से बनाई गई संस्था है।
लेकिन छोटे कार्यकर्ताओं में यह प्रचार किया जाता है कि, संघ का सोच ही राष्ट्रवाद है तथा प्रत्येक भारतीय हिन्दू है चाहे उसका मत, पन्थ, सम्प्रदाय पारसी, यहुदी, ईसाई, इस्लाम, वाहबी आदि अब्राहमिक मत हो या तान्त्रिक, खालसा, जैन, बौद्ध, लिङ्गायत, नाथ पन्थ हो। भारतीय शब्द के स्थान पर हिन्दू और भारतीयता के स्थान पर हिन्दुत्व , व्यक्तिवादी पूंजीवादी फासिस्ट विचारधारा को राष्रवाद नाम देकर केवल भ्रमित कर दिया जाता है।
इस कारण जन सामान्य में भी रा.स्व.से.संघ को सनातन धर्म-संस्कृति और भारत राष्ट्र हितैषी राष्ट्रवादी सङ्गठन ही मानने का भ्रम त्यागना नहीं चाहता है।
दुर्भाग्य से भारत में साम्यवादी विचारधारा नास्तिक के स्थान पर केवल इस्लामी विचार बन कर रह गई। उसके देखा-देखी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने सेकुलरिज्म का अर्थ सनातन धर्म का विरोध और ईसाई - मुस्लिमों का तुष्टिकरण मान लिया। यही विचारधारा लोहियावादी समाजवादियों ने भी अपना ली। अंग्रेजों के कट्टर अनुयाई द्रविड़ दलों का एजेंडा शुरुआत से अति सिमीत दृविड़, तमिल पक्ष और उत्तर भारतियों तथा हिन्दी विरोध ही रहा।
परिणाम स्वरूप दयानन्द सरस्वती जी के अनुयाई शुद्ध भारतीय राजनयिक विचारधारा वाले महर्षि दयानन्द सरस्वती, श्रद्धानन्द जी से प्रेरित उस काल के आर्यसमाजी लाला लाजपतराय के अनुयाई सचिंद्रनाथ सान्याल द्वारा अमर बलिदानी खुदीराम बोस जैसे क्रान्तिकारियों से प्रभावित और प्रेरित होकर  साम्यवादी भारतीय क्रांतिकारी संगठन -- हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी और   पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल, श्री चन्द्रशेखर आजाद, श्री भगतसिंह, श्री राजगुरु, श्री अशफाक उल्ला खाँ जैसे लोगों की हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचआरए) 
श्री चन्द्रशेखर आजाद ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन ( एचआरए ) का नाम में  सोशलिस्टब्द जोड़ कर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन कर दिया। 19 दिसम्बर 1927 को पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल जी को गोरखपुर जेल में 27 फरवरी 1931 को चन्द्रशेखर तिवारी "आजाद" को प्रयागराज के अल्फ्रेड पार्क में और 23 मार्च 1931 को लाहोर जेल में सरदार भगतसिंह जी अमर बलिदान के बाद उक्त राष्ट्रीय आन्दोलन कमजोर हुआ उसके बाद कोई शुद्ध सनातन वैदिक भारतीय विचारधारा वाला राजनीतिक दल नहीं रहा।
इस रिक्त स्थान का लाभ उठाने के लिए अंग्रेजी शासन योजना बना ही रहा था।
इसके बाद अंग्रेजों का चातुर्य देखने और शिक्षा लेने जैसा रहा।
उन्होंने सर सय्यद अहमद और मोहम्मद इकबाल को सनातन धर्मियों के विरुद्ध भड़काया। भीमराव रामोजी सपकाले (अम्बेडकर) को वैदिक सनातन वर्णाश्रम धर्म के विरुद्ध भड़काया।

सार्वदेशक हिन्दू सभा ---
लाला लाजपतराय, मदन मोहन मालवीय द्वारा सार्वदेशक हिन्दू सभा सङ्गठन की स्थापना हरिद्वार में 1907 में की।
फिर 
राजनितिक दल के रूप में हरिद्वार में सर्वदेशक हिन्दू सभा की स्थापना 1915 लाला लाजपतराय, मदन मोहन मालवीय द्वारा की गई।

सार्वदेशिक हिन्दू सभा के अध्यक्ष ---
1915 से 1921 तक पण्डित मदन मोहन मालवीय सार्वदेशिक हिन्दू सभा के अध्यक्ष थे।

1921 से 1931 तक 
लाला लाजपत राय सार्वदेशिक हिन्दू सभा के अध्यक्ष रहे ।

इसके बाद अंग्रेजों का चातुर्य देखने और शिक्षा लेने जैसा रहा। लाला लाजपत राय जैसे शुद्ध सनातन वैदिक वर्णाश्रम धर्म संस्कृति के पोषक कट्टर भारतीय राष्ट्र वादी लाला लाजपत राय के बाद 1931 में बालकृष्ण शिवराम मुञ्जे हिन्दू महासभा के अध्यक्ष बने बन गये। 
और अंग्रेज़ो का कुटिल राजनीतिक खेल प्रारम्भ हो गया।

1931 से 1937 तक
बालकृष्ण शिवराम मुञ्जे अध्यक्ष रहे।
उधर हिन्दू सभा के पञ्जाब शाखा के अध्यक्ष भाई परमानन्द त्यागी ने 1933 में मुस्लिमों को अफगानिस्तान भेजने और द्विराष्ट्र सिद्धान्त का स्वीकार करने का लाभ लेने के लिए अंग्रेजी शासन तत्पर होगया।

अखिल भारतीय हिन्दू महासभा
1937 से 1943 तक अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के अध्यक्ष विनायक दामोदर सावरकर  रहे। 
विनायक दामोदर सावरकर ने सार्वदेशिक हिन्दू सभाका नाम हिन्दू महासभा नाम कर के इटली के फासिस्ट दल का अनुयाई बना दिया दिया।

1945 से 1946 तक डॉक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के अध्यक्ष रहे।
डॉक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने 21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली में भारतीय जनसङ्घ की स्थापना की और जो 06 अप्रैल 1980 से भारतीय जनता पार्टी कहलाती है।

 बालकृष्ण शिवराम मुञ्जे जो सार्वदेशिक हिन्दू सभा के 1931 – 37 तक अध्यक्ष रहे वे केशव बलराम हेडगेवार के राजनीतिक अनुयाई थे। लेकिन उसी समय केशव बलराम हेडगेवार आखिल भारतीय हिन्दू महासभा के उपसभापति रहे। 
केशव बलिराम हेडग॑वार के राजनीतिक अनुयाई बालकृष्ण शिवराम मुंजे का योगदान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बनवाने में  बहुत अधिक रहा। संघ के संस्थापक और बालकृष्ण शिवराम मुंजे के राजनितिक गुरु  डॉक्टर केशव बलिराम हेडग॑वार ने अपने शिष्य बालकृष्ण शिवराम मुञ्जे को इटली के फासिस्ट दल के अनुसार सङ्गठन बनाने का प्रशिक्षण लेने इटली  भेजा। जब मुञ्जे दल का सञ्चालन का और शाखा लगाने का
प्रशिक्षण ले कर लौटे तब डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में 27 सितम्बर 1925 ईस्वी में भारत में वैसा ही सङ्गठन राष्ट्रीय स्वयम् सेवक सङ्घ की स्थापना की।
लेकिन 
सावरकर की हिन्दू महासभा गांधी जी जैसा जन आन्दोलन खड़ा नहीं कर पाई। यह टीस सावरकर और उसके अनुयायियों को सदैव खलती रहती है। इसलिए विनायक दामोदर सावरकर सदैव से ही गांधी जी का विरोध करते रहे।