देवस्थान के प्रारम्भिक प्रमाण वाल्मीकि रामायण में मिलते हैं जहाँ कोशल्या जी विष्णु पूजा करतीं थीं। श्री रामचन्द्र जी विष्णु के स्थान पर जाते थे। सीता जी जनकपुरी में अम्बिका के स्थान पर जातीं थीं।
लेकिन इनमें न किसी ढाँचे का उल्लेख है न किसी रूप या प्रतिमा का। इसलिए स्पष्ट है कि जैसे यज्ञों में मण्डलों पर ही देवताओं का आह्वान, स्थापना और पूजन होता है, वैसे ही इन स्थानों पर भी मण्डलों में ही देवता की पूजा होती थी। आज तक भी लोग श्री यन्त्र, बीसा यन्त्र आदि में देवताओं की पूजा करते हैं।
फिर महाभारत में तीर्थयात्रा प्रकरण में वृक्षों में, तालाब आदि जल स्रोतों में यक्ष गन्धर्वों और नागों का वास मानने का और अनार्यों में इन वृक्षों, यक्षों और नागों की पूजा प्रचलित थी इसके प्रमाण हैं। लेकिन इसके लिए मात्र चबुतरे बना कर पूजा करते थे।आज भी भिन्न भिन्न पर्वोत्सवों पर चबुतरे के बीच लगे वृक्ष की पूजा होती है और तुलसी के पौधे में महा सति वृन्दा की, पीपल वृक्ष में विष्णु की, वट वृक्ष में ब्रह्मा की और शमी मे देवी की पूजा होती है।
निषाद, किरात आदि वनवासी जातियों ने डायनासोर के अण्डों को शिवलिङ्ग मानकर पूजना प्रारम्भ किया। जो आजतक प्रचलित है।
शाक्त पन्थ में बिजोरा निम्बू में मातृका लिङ्ग मानकर पूजा आज भी होती है
ऐसे ही वैष्णवों ने कम से कम दस-बारह लाख वर्ष पुराने समुद्री जीव के कवच में चक्राकार और शङ्खाकार संरचना देखकर शालिग्राम विष्णु लिङ्ग मानकर पूजना प्रारम्भ किया साथ में चल चढ़ाने आदि के लिए शंख रखना प्रारम्भ किया। ये सब परम्परा आज तक प्रचलित है।
ऐसे ही त्रिकोणीय पत्थर में देवी तथा पत्थर पर पत्थर रखकर भैरव एवम् चिकने लगभग तिकोने गोल पत्थर में गजानन विनायक की पूजा होने लगी। लेकिन ये सब प्रथाएँअनार्यों में ही प्रचलित थी। आर्यजन अर्थात श्रेष्ठ जनों में तब भी और आज भी यज्ञ परम्परा ही प्रचलित थी जो गुरुकुलों में आज भी प्रचलित है।
इसके प्रमाण भी मिले हैं जैसे वैदिक सभ्यता जिसमें महाभारत युद्ध तक सरस्वती नदी सदानीरा थी। लेकिन महाभारत युद्ध के बाद हिमालय में आये कुछ उभारों के कारण यमुना और अन्य सहायक नदियों के बहाव की दिशा बदलने से पश्चिम भारत की सारस्वत नागर सभ्यता-संस्कृति के बहुत से नगर उजड़ गए। इन उभारों को पञ्च केदार के रूप में जाना जाता है। पुरातत्वीय उत्खनन में जिनमें राखीगढ़ी, लोथल, मोहनजोदड़ो , हड़प्पा आदि के अवशेष पाए गए हैं। ये लोग विदेश यात्रा करते थे, इनके नगरों में विदेशियों का आगमन होता रहता था, तथा कुछ विदेशी बस्तियाँ भी थी।
कुछ श्रमण मार्गी लोग तान्त्रिक मतावलम्बी थे, और लिङ्ग पूजा करते थे ये व्यावसायिक गतिविधियों से प्रायः दूर रहने के कारण निर्धन और रुग्ण थे। भारतीय आर्य जन इन्हें अस्पृश्य मानते थे। जबकि समझदार आर्य जन आस-पास के हरे-भरे उपजाऊ भू भाग में बस गये। जो लोग सूखे के दौरान भी नहीं हटे उनके ही अवशेष भी पाये गए हैं।
इस प्रकार महाभारत काल में अनार्य दास-दस्युओं, तान्त्रिकों, श्रमणों, व्रात्यों में प्रतिमा पूजन और मूर्ति पूजा प्रचलित थी।
इनके कुछ पुरातत्त्वीय प्रमाण नीचे दिए गए हैं।
पूजा-मंच की संरचना, त्रिकोणाकार शिला के आयाम, पीले रंग (yellow pigment) के प्रयोग तथा उसके शक्ति-यन्त्र
उत्खनन में पत्थरका एक वृत्ताकार पूजा-मंच (platform) मिला, जिसके मध्य में एक प्राकृतिक त्रिकोणाकार रंगीन पत्थर रखा हुआ था। त्रिकोणाकार शिला के आयाम, पीले रंग (yellow pigment) के प्रयोग तथा उसके शक्ति-यन्त्र मिला।
इस स्थल को उत्तर पुरापाषाण (Upper Palaeolithic) काल के अंतिम चरण का माना गया है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार इसकी तिथि लगभग 10,000–9,000 ईसा पूर्व (या लगभग 11,000–12,000 वर्ष पूर्व) मानी जाती है।
पुरातत्वविदों ने देखा कि निकटवर्ती क्षेत्र के कोल और बैगा समुदाय आज भी त्रिकोणाकार प्राकृतिक पत्थरों को "माई" (मातृदेवी) के रूप में पूजते हैं। बघोर-I में मिला पत्थर भी उसी प्रकार का था और एक विशेष मंच पर स्थापित था। इस आधार पर उत्खननकर्ताओं ने यह परिकल्पना प्रस्तुत की कि यह संभवतः किसी देवी अथवा स्त्री-तत्त्व (female principle) का पूजा-स्थल रहा होगा। इसे एक अनुष्ठानिक (ritual) स्थल माना जाता है।
स्वयं उत्खननकर्ताओं ने भी "मूर्ति-पूजा" का सबसे प्राचीन बहुत प्रबल संभावना" (strong probability) की बात कही थी, न कि पूर्ण निश्चितता की।
2 उड़ीसा (ओडिशा) की राजधानी भुवनेश्वर (Bhubaneswar) के निकट उदयगिर गुफा (Udayagiri Caves) में स्थित हाथी गुम्बा (Hāthigumphā) में
कलिङ्ग के राजा खारवेल (Kharavela) का पहली शताब्दी ईसा पूर्व का अभिलेख मिला है जिसका संबंधित भाग कुछ स्थानों पर क्षतिग्रस्त है और उसके पाठ (reading) को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं उसके आधार पर ऐसा दावा किया जाता है कि, किसी नन्दराजा द्वारा कलिङ्ग पर आक्रमण कर कोई धार्मिक धरोहर या एक पूजनीय वस्तु या जैन प्रतीक या जिन-प्रतिमा
मगध ले जाई गई थी, और मगध में स्थापित किया था। परन्तु उसका सटीक स्वरूप निश्चित नहीं है।
कई शताब्दियों बाद खारवेल ने मगध पर अभियान किया। उसने उस प्रतिमा को पुनः कलिङ्ग वापस लाकर प्रतिष्ठित किया।
जैन परम्परा का मत है कि वह अग्रजिन (Agra-Jina) अथवा प्रथम जिन, अर्थात् (आदिनाथ) ऋषभदेव (Rishabhanatha) की प्रतिमा थी।
इस आधार पर यह माना जाता है कि, ईसा पूर्व चौथी–पाँचवीं शताब्दी तक पूर्वी भारत में जैन प्रतिमा-पूजा का कोई विकसित रूप विद्यमान था। जैन परम्परा के अनुसार उस नन्द शासक की पहचान महापद्म नन्द के रूप में करना सम्भावित तथ्य है, परन्तु पूर्णतः सिद्ध नहीं है।
3 मथुरा से 24 कि.मी. दक्षिण पश्चिम में सोंख नामक स्थान पर 1966 से 1974 के बीच जर्मन पुरातत्ववेत्ता हर्बर्ट हर्टेल के निर्देशन में हुए उत्खनन में ईसापूर्व 800 से 400 तक के खम्भों के गड्ढे, मिट्टी के घर आदि ग्रामीण बसावट के प्रमाण प्राप्त हुए।
इसके अतिरिक्त मोर्य का ईसा पूर्व पहली शताब्दी के अर्धवृत्ताकार नाग मन्दिर मिला;जिसका पुनर्निर्माण कुषाण काल में हुआ। यहाँ श्रमणों द्वारा पूजित यक्ष- यक्षिणी, नाग और मातृका की टेराकोटा (पकी मिट्टी) की प्रतिमाएँ भी मिली।
मध्यप्रदेश में विदिशा जिले में बेतवा और बेस नदी के सङ्मम क्षेत्र में बेसनगर (भिलसा) में शुंग राजा 'भागभद्र' के शासनकाल में तक्षशिला के युनानी (ग्रीक) राजा 'एंटियालसिडस' के राजदूत श्रीकृष्ण और बलराम के उपासक हेलियोडोरस ने 113 ईसापूर्व में गरुड़ध्वज स्तम्भ का निर्माण करवाया था।
4 इसके अलावा पाणिनि की अष्टाध्याई में उल्लेखित वर्णनो में तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व मे देव स्थानों का वर्णन महाभारत के वर्णनों से मैल खाता है।
लेकिन पाणिनि की अष्टाध्याई पर पतञ्जली के महाभाष्य में दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में विष्णु, शिव, देवी देवताओं की प्रतिमाओं और मूर्तियों के वर्णन के आधार पर पहली बार ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में सनातन वैदिक धर्म में मूर्ति पूजा के प्रमाण माना जाता है।
और ईसा की दुसरी और पहली शताब्दी में कुषाण वंश के कनिष्क के समय मन्दिरों और चैत्यों में मानवीय आकार की विकसित और बढ़ी मूर्तियों की पूजा प्रारम्भ हुई।