बुधवार, 12 अगस्त 2026

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी से मेरे मतभेद।

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी से मेरे मतभेद -
1 आर्य समाजी ॐ को देवनागरी में जैसा लिखा जाता है वैसा ही पढ़ा जाता है के आधार पर ओ३म् लिखते हैं। जबकि मैं ॐ ही लिखता हूँ।

2 महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी देव, देवता, सिद्ध, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर , नाग,असुर, दैत्य, दानव, राक्षस आदि योनि नहीं मानते थे। देवलोक, पाताल, नर्क आदि भी नहीं मानते थे।
लेकिन मैं मानता हूँ।
3 महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी राम कृष्ण आदि को केवल महा पुरुष मानते थे। मैं उर्ध्व लोक के सिद्ध पुरुषों को ऋत के नियमों के अनुसार निर्धारित कार्य पूर्ण करने के लिए जन्मे अलोकिक व्यक्ति मानता हूँ।

4 महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ईश्वर, जीव और प्रकृति को अनादि मानते थे।
 त्रेतवादी थे। जीवों की संख्या अनन्त लेकिन निश्चित मानते थे।
ईश्वर की प्रेरणा से गुण साम्यावस्था वाली प्रकृति में विक्षोभ होने से सत्व, रज और तमोगुण प्रकट हुए।
इन्हीं से जगत और जीवों की देह बनी।


वैदिक अभेदवादी मैं परमात्मा का ही लीला में सर्वरूपों में प्रकटीकरण मानता हूँ।
परमात्मा के विश्वात्मा ॐ सङ्कल्प से परमात्मा प्रज्ञात्मा परब्रह्म परमेश्वर परम दिव्य पुरुष विष्णु और परा प्रकृति माया के रूप में प्रकट होकर स्वयम् ही प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) ब्रह्म पुरुष प्रभविष्णु (सवितृ) और प्रकृति श्री लक्ष्मी ( सावित्री) के स्वरूप में प्रकट होकर जीवात्मा अपर ब्रह्म नारायण जीव श्री हरि और नारायणी परा प्रकृति कमला (पद्मा) के स्वरूप में प्रकट होते हैं और अपः तत्व की सृष्टि करते हैं। फिर भूतात्मा वाणी हिरण्यगर्भ ब्रह्मा प्राण (चेतना या देही) त्वष्टा और धारयित्व (धृति या अवस्था) रचना के स्वरूप में प्रकट होते हैं तथा त्वष्टा ने सृष्टि के ब्रह्माण्डो के भुवनों के सूर्य और ग्रह आदि की रचना करते हैं। फिर वाणी हिरण्यगर्भ सनक, सनन्दन, सनत्कुमार, सनातन और नारद को प्रकट करते हैं। फिर वाणी हिरण्यगर्भ ब्रह्मा अर्धनारीश्वर एक रुद्र को प्रकट करते हैं। फिर धर्म और धृति तथा काम और रति को प्रकट करते हुए स्वयम्
सूत्रात्मा प्रजापति ब्रह्मा और सरस्वती के स्वरूप में प्रकट होते हैं। सूत्रात्मा ओज और कान्ति दक्ष प्रथम प्रसुति, रुचि - आकुति, कर्दम-देवहुति, स्वायम्भुव मनु-शतरूपा तथा शंकर- उमा की जोड़ियाँ प्रकट करते हैं।
ये जोड़ियाँ ही मैथुनिक सृष्टि प्रारम्भ करते हैं।
फिर प्रजापति सृष्टि ब्रह्माण्डों के भुवनों में लोक स्थापित करते हैं।
इन्हीं में हमारे अठारह भुवन और सोलह लोक भी सम्मिलित हैं।
भुवन मतलब आवास योग्य भूमि और लोक मतलब भुवन में जहाँ जीवों के वास होने से जैविक चेतना से भुवन आलोकित हो।
फिर प्रजापति और सरस्वती और (1)मरीची-सम्भूति, (2) भृगु-ख्याति, (3) अङ्गिरा-स्मृति, (4) वशिष्ट-ऊर्ज्जा, (5) अत्रि-अनसुया, (6) पुलह-क्षमा, (7) पुलस्य-प्रीति, (8) कृतु-सन्तति भू स्थानीय प्रजापतियों को जन्म देते हैं।स्वायम्भुव मन्वन्तर के सभी ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मण इन्हीं की सन्तान थे। और इन्हीं के गुरुकुल में शिक्षित थे।
फिर प्रजापति ने स्वयम् को अणुरात्मा वाचस्पति और वाक के स्वरूप में प्रकट किया। ये ही स्वर्गलोक के प्रजापति इन्द्र (तेज) और शचि (विद्युत) के स्वरूप में प्रकट हुए। 
वाचस्पति और वाक ने अग्नि और स्वाहा तथा पितरः और स्वधा को प्रकट किया।
तथा वायु और शिवा को भी प्रकट किया।
अग्नि से तीन+तीन अर्थात छ: अग्नि हुए। इन छहों अग्नि के सात सात पुत्र हुए इस प्रकार उनचास अग्नि हो गये।
ऐसे ही पितरः के तीन+ तीन छः पितर हुए। जिसमें (१) अग्निष्वात (२) बहिर्षद और (३) कव्यवाह तीन निराकार और (४) अर्यमा, (५) अनल (६) सोम और (७) यम चार साकार हैं। अर्यमा मुख्य हैं इन्हीं की पत्नी स्वधा है।
ऐसे ही वायु के भी तीन+तीनः वायु हुए। उन छहों के सात- सात पुत्र हुए। ये ही आंधी, तुफान, झंझावात के देवता उनचास मरुद्गण कहलाये। मुख्य मरुद्गण (1) आवह, (2) प्रवह, (3) संवह, (4) उद्वह, (5) विवह, (6) परिवह और (7) परावह है। ये सातों सैन्य प्रमुख के समान गणवेश धारण करते है।

वाचस्पति स्वयम् विज्ञानात्मा ब्रह्मणस्पति और सुनृता के स्वरूप में प्रकट होते हैं। ये ब्राह्मणों के अध्यक्ष कहे जाते हैं। वेद मन्त्रों को ब्रह्म कहते हैं। और सभी मन्त्रों के ये दृष्टा हैं।
विज्ञानात्मा ब्रह्मणस्पति और सुनृता से चित्त और चेत द्वादश आदित्य प्रकट हुए।
  (1) विष्णु, (2) सवितृ, (3) त्वष्टा, (4) इन्द्र, (5) वरुण, (6) विवस्वान, (7) पूषा, (8) भग, (9) अर्यमा, (10) मित्र, (11) अंशु और (12) धातृ।

फिर ब्रह्मणस्पति स्वयम् ज्ञानात्मा ब्रहस्पति और तारा के स्वरूप में प्रकट हुए। ज्ञानात्मा ब्रहस्पति से बुद्धि और बोध आठ वसु हुए।
(1) प्रभास, (2) प्रत्युष, (3) धर्म, (4) ध्रुव, (5) अर्क, (6) अनिल, (7) अनल और (8) अप् ।
 ज्ञानात्मा ब्रहस्पति स्वयम् लिङ्गात्मा पशुपति के स्वरूप में प्रकट हुए।
लिङ्गात्मा पशुपति से अहंकार और अस्मिता एकादश रुद्र हुए।
(1) हर, (2) त्र्यम्बकं, (3) वृषाकपि, (4) कपर्दी, (5) अजैकपात, (6) अहिर्बुधन्य, (7) अपराजित, (8) रैवत, (9) बहुरूप, (10) कपाली और (11) शम्भु (शंकर)।

 लिङ्गात्मा पशुपति स्वयम् मनसात्मा गणपति के स्वरूप में प्रकट हुए। ये गणपति लम्बोदर गजानन विनायक से अलग हैं। कबिलों को गण कहते हैं। गणों के अध्यक्ष गणराज्य के नायक गणपति कहलाते हैं।
 लिङ्गात्मा गणपति से मन और संकल्प सोम राजा और वर्चा प्रकट हुए।
 मनसात्मा गणपति ने स्वयम् को स्व सदसस्पति और स्वभाव मही के स्वरूप में प्रकट हुए।
 स्वभाव मही स्वयम् सात्विक स्वभाव स्वाहा भारती, राजसी स्वभाव वषट सरस्वती और तामसी स्वभाव स्वधा इळा (इला या तृण देवी इरा) के स्वरूप में प्रकट हुई।
इन्हीं से यह भौतिक पदार्थ और भौतिक जगत उत्पन्न हुआ। शरीर बने।

5 महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने पञ्च महायज्ञ को आवश्यक तो माना लेकिन योग साधना पर अधिक जोर दिया।

मेरा मत है कि, वेदों और ब्राह्मण ग्रन्थों के अनुसार पञ्च महायज्ञ के ब्रह्म यज्ञ के अन्तर्गत ही अष्टाङ्ग योग अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह (पञ्चयम/ धर्म), शोच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान (पञ्च नियम/ अनुशासन), चौरासी आसन (शरीर की स्थिरता), प्राणायाम (स्व नियन्त्रित श्वास-प्रश्वास के माध्यम से समस्त शारीरिक अन्तःक्रियाएँ स्व नियन्त्रण में लाकर, प्रत्याहार के माध्यम से मन का इन्द्रियों की ओर भटकाव स्व नियन्त्रण में लेकर स्वस्थ्य तन- मन प्राप्त कर धारणा द्वारा सिखी गई शिक्षा धारण करते हुए स्वाध्याय, वेद पाठ, वेदाध्ययन, सन्ध्योपासना, कर ध्यान पूर्वक गायत्री मन्त्र जप करना। ब्रह्मचर्य आश्रम में यह अभ्यास आदत में ढालना, मसल्स मेमोरी में उतार देना। फिर देव यज्ञ से आत्म समर्पण/ ईश्वर प्रणिधान हो पाता है। भूत यज्ञ से प्रकृति के प्रति कर्तव्य पालन और अतिथि यज्ञ से मानवों के प्रति कर्तव्य भावना जागृत होती है। पितृ यज्ञ श्राद- तर्पण, और सामाजिक कार्यों में सहयोग कर के सामाजिकता आती है।इस प्रकार ग्रहस्थाश्रम में पञ्च महायज्ञ स्वाभाविक रूप से हो पाएँगे।
वानप्रस्थ आश्रम में अध्ययन- अध्यापन, ध्यान - समाधि अभ्यास, संयम (कुछ ही समय में धारणा-ध्यान- समाधि में स्थित होकर) 
संयम से तन्मयता प्राप्त कर वाञ्छित जानकारी और ज्ञान प्राप्त कर लिया जाता है।
इस प्रकार परमात्मा में तन्मय होकर आत्मज्ञान प्राप्त होता है।
पञ्च महायज्ञ सम्पूर्ण स्वस्थ्य और स्वस्थ जीवन प्रणाली है।

6 महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी विवाह में वर की आदर्श अवस्था (वय) 48 वर्ष और वधू की वय (अवस्था) 16 वर्ष मानते थे।
जबकि मैं विवाह में वर की आदर्श वय (अवस्था) 24-25 वर्ष और वधू की आदर्श अवस्था (वय) 21-22 वर्ष मानता हूँ।
48 वर्ष तक ब्रह्मचर्य पालन करने वाले पुरुष को विवाह करने की आवश्यकता ही नहीं रहती है।

7 महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी विधवा विवाह को अनुचित नहीं मानते थे।
श्रद्धानन्द जी ने तो विधवा विवाह को सामाजिक आन्दोलन में सम्मिलित कर लिया।
लेकिन महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी नियोग को भी उचित मानते थे।
जबकि मैं नियोग से पूर्णतः असहमत हूँ।
यदि पुत्र ही इकलौती सन्तान हो। और उसकी निःसंतान नव विवाहिता वधु विधवा हो जाए, तो उसका पुनर्विवाह कर उसकी सन्तान को गोद लेना नियोग की तुलना में अनन्त गुना श्रेष्ठ होगा।

सोमवार, 10 अगस्त 2026

ब्राह्मण और क्षत्रियों की दुरावस्था।

शत वर्षिय दशराज युद्ध के बाद से ही मूल क्षत्रिय - मनुर्भरतों का तो अस्तित्व ही समाप्त हो गया।
फिर उज़्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, तिब्बत और कश्मीर के सूर्यवंशी अयोध्या में बसाये गए। और टर्की से आये चन्द्र वंशियों तथा सीरिया से आये नागों को उज़्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, तिब्बत और कश्मीर में बसाया गया। लेकिन वे भी चन्द्र वंशियों के सामने नहीं टिक पाये। और प्रयागराज तथा बिहार, झारखण्ड में बस गये।
ईराक के असुरों ने सेवन सिस्टर्स के असम मणिपुर, त्रिपुरा, नगालैंड तथा श्री लङ्का आदि में फैल गये। अफ्रीका से आये राक्षस लक्ष्यद्वीप में बस गये।
दास-दस्यु (दृविड़) तमिलनाडु में बस गये। चोर (चोल) कर्नाटक में और आन्ध्र प्रदेश में आन्ध्र बस गये। 
ब्रह्मर्षियों की सन्तान जो हरियाणा में बसी थी और स्वायम्भुव मनु-शतरूपा के पुत्र प्रियव्रत सन्तान जो पञ्जाब, सिन्ध, बलुचिस्तान और अफगानिस्तान में बसी थी। जिन्हें मनुर्भरत कहा जाता था। तथा उत्तानपादासन और ध्रुव की सन्तान ईरान में बसी थी वे सब चारों ओर से ययाति के पाँचो पुत्रों (चन्द्रवंशियों) और नागों से घिर गए।
जब वैदिक काल के बाद ब्राह्मण ग्रन्थों के रचनाकाल से सूत्र ग्रन्थों के रचनाकाल त्रेतायुग में ही यह हाल था तो अब तो कलियुग में समय ही उनका है।

शनिवार, 8 अगस्त 2026

ब्रह्म यज्ञ और देव यज्ञ।

सूर्योदय से कम-से-कम दो घण्टे पहले शय्या त्याग कर शौच स्नान, ब्रह्मयज्ञ अर्थात अष्टाङ्ग योग साधना, सन्ध्या, गायत्री मन्त्र जप, उदयीमान सूर्य को अर्घ्य देकर दैनिक अग्निहोत्र करने से सूर्योपासना स्वतः हो जाती है। किसी भी देवता विशेष की स्वतन्त्र आराधना केवल निषिद्ध सकामोपासना में होती है।
अन्यथा सदाचारी जीवन जीते हुए, समत्व भाव धारण कर निश्चयात्मकमिका बुद्धि से चित्त में निरन्तर परमात्मा को ध्यान में बनाये रखते हुए शास्त्रोक्त विधि से ही केवल शास्त्रोक्त कर्म करने वाले योगी का योगक्षेम परमात्मा स्वयम् वहन करते हैं।

गुण मिलान में दोष।

 गुण मिलान का आधार  चन्द्रमा किस राशि/नक्षत्र में है बस यही गुणों का आधार है।

राशि और नक्षत्र के योग से 36 योग बनते हैं।
पूरी कुण्डली में 

1 किस ग्रह, भाव (खाने) का बल और शुभाशुभत्व कैसा है?

2कौन-सा ग्रह किस भाव (खाने) का स्वामी होकर किस भाव (खाने) में बैठा है?

3 किस-किस भाव (खाने) को देख रहा है?

4 किस भाव (खाने) के स्वामी को देख रहा है?

5 किस भाव (खाने) के स्वामी द्वारा देखा जा रहा है?

इन सब का कोई महत्व नहीं है।

ऐसे ही पूरी कुण्डली के 12 भाव (खानों) में से पाँच भाव(खाने) 1,4,7,8 और 12 वें भाव (खाने) में मङ्गल हो तो कुण्डली माङ्गलिक कहलाती है।
इसका फल माना जाता है कि, लाइफ पार्टनर (पति या पत्नी) की आयु क्षय करता है।
इस दोष का हरण करने के लिए सामने वाले (वर या वधू) की कुण्डली में इन्हीं 1,4,7,8 और 12 वें भाव (खाने) में से किसी भी भाव (खाने) में, मङ्गल > शनि > सूर्य > राहु > केतु में से कोई एक भी ग्रह हो तो माङ्गलिक मिलान ठीक हो जाता है।

शास्त्रों में तो और भी बहुत से परिहार भी बतलाये हैं, जिनका ज्ञान नगण्य ज्योतिषियों को है।
जैसे 3,6, या 11 वें भाव में भी यदि मङ्गल > शनि > सूर्य > राहु > केतु में से कोई एक भी ग्रह हो तो माङ्गलिक दोष का परिहार हो जाता है।
जिसकी कुण्डली में माङ्गलिक दोष है उसकी कुण्डली में मङ्गल उच्च का हो या नीच का हो या वक्री या अस्त हो तो भी माङ्गलिक दोष का परिहार हो जाता है।
और भी आयु अधिक होना (मतलब केवल बाल विवाह में ही निषेध था।) और 25 से अधिक या 27 से अधिक गुण मिलने पर भी माङ्गलिक दोष का परिहार हो जाता है।
लेकिन यह जानकारी नगण्य पारम्परिक ज्योतिषियों को है।

मतलब उनके मतानुसार तो दोनों एक दूसरे की आयु क्षीण करके मर जाएंगे और बच्चे अनाथ हो जाएंगे उसे अच्छा मानते हैं।🤔

ऐसे मुर्खतापूर्ण सिद्धान्तों में मेरी रत्ती मात्र भी श्रद्धा नहीं है।
लेकिन जब कोई ज्योतिषी से पूछता है तो, ज्योतिषी का कर्तव्य है कि, प्रचलित परम्परा अनुसार उत्तर दे। इसलिए वह भी बतलाता हूँ।

शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

नामकरण कैसे करें?

*नामकरण के लिए कैसे करें? कौनसी पद्यति सही है? प्राचीन संस्कृत पद्यति के आधार पर जन्माक्षर लें और नाम के अक्षरों का योगांक लें या यवन अवकहड़ा चक्र और कीरो की हिब्रू न्युमरोलॉजी  के आधार पर?*

नामकरण के लिए क्या सही ?  प्राचीन संस्कृत पद्यति? या अवकहड़ा चक्र और कीरो अंकविद्या?



जन्मनाम निर्धारण प्राचीन संस्कृत पद्यति से।

देखिये अग्निपुराण अध्याय 293 श्लोक 10 से 15 तक।
यह विधि अग्नि पुराण मन्त्र - विद्या के अन्तर्गत नक्षत्र - चक्र, राशि चक्र और सिद्धादादि मन्त्र शोधन प्रकार में दी गई है उसमे नामकरण की दृष्टि से आवश्यक संशोधन कर तैयार गई है।
जन्मलग्न के नक्षत्र चरण के अनुसार जन्मनाम/ देह नाम रखें।
नही बने तो अपवाद में दशम भाव स्पष्ट के नक्षत्र चरणानुसार कर्मनाम भी रख सकते हैं।
सुर्य के नक्षत्र चरणानुसार गुरु प्रदत्त अध्यात्मिक नाम / आत्म नाम।
तन्त्र क्रिया हेतु तान्त्रिक आचार्य प्रदत्त नाम मानस नाम जन्म कालिक चन्द्रमा के नक्षत्र चरणानुसार रखें।

प्राचीन संस्कृत पद्यति -- 

राशि /नक्षत्र चरण १ २ ३ ४  
मेष / अश्विनी अ अ अ अ मेष / भरणी आ आ आ आ मेष / कृतिका इ                  
                             १ २ ३ ४
वृष / कृतिका इ ई ई
वृष / रोहिणी उ उ ऊ ऊ
वृष / मृगशिर्ष ऋ ऋ  
                             १ २ ३ ४
मिथुन/ मृगशिर्ष ऋ ऋ
मिथुन/ आर्द्रा ए ए ऐ ऐ
मिथुन/पुनर्वसु ओ ओ औ 
                              १ २ ३ ४
कर्क / पुनर्वसु औ
कर्क / पुष्य अं अं अः अः
कर्क / आश्लेषा क का ख खा 
                               १ २ ३ ४
सिंह / मघा ग गा घ घा
सिंह/पुर्वाफाल्गुनि च चा छ छा
सिंह/उत्तराफाल्गनि ज
                                 १ २ ३ ४
कन्या/उत्तराफाल्गुनि जा झ झा
कन्या / हस्त ट टा ठ ठा
कन्या / चित्रा ड डा   
                                 १ २ ३ ४
तुला / चित्रा ढ ढा
तुला / स्वाती त ता थ था
तुला / विशाखा द दा ध    
                                  १ २ ३ ४
वृश्चिक/ विशाखा धा
वृश्चिक/ अनुराधा न न ना नृ
वृश्चिक/ ज्यैष्ठा प पा फ फा
                                   १ २ ३ ४
धनु / मुल ब बा भ भा
धनु / पुर्वाषाढ़ा म म मा मृ
धनु / उत्तराषाढ़ा य
                                    १ २ ३ ४
मकर/ उत्तराषाढ़ा य य या
मकर / श्रवण र र रा रृ
मकर / धनिष्ठा ल ल
                                     १ २ ३ ४
कुम्भ / धनिष्ठा ला लृ
कुम्भ / शतभिषा व व वा वृ
कुम्भ / पुर्वाभाद्रपद श शा ष  
                                      १ २ ३ ४
मीन / पुर्वाभाद्रपद षा
मीन / उत्तराभाद्रपद स स सा सृ
मीन / रेवती ह ह हा हृ

मात्रा लगाने की विधि / नियम --

प्रथम एवम् त्रतीय चरण में मुल स्वर हैं। द्वितीय और चतुर्थ चरण में आ से औ तक की मात्रा वाले अक्षर जन्मनाम का प्रथमाक्षर रहेगा।

जिन नक्षत्रों में प्रथम और त्रतीय चरण में अलग अलग वर्ण हो उनमें द्वितीय चरण में प्रथम चरण के वर्ण में और चतुर्थ चरण में त्रतीय चरण के वर्ण में ००ं-००' से ००ं-२०' तक ा की मात्रा लगायें। तदनुसार ही आगे भी ००ं-२१' से ००-४०' तक ि की मात्रा लगायें।००ं-४१' से ०१ं-००' तक ई की मात्रा ।०१ं-०१' से ०१ं-२०' तक ु की मात्रा।०१ं-२१' से ०१ं-४०' तक ू की मात्रा।०१ं-४१' से ०२ं-००' तक ृ की मात्रा।०२ं-०१' से ०२ं-२०' तक े की मात्रा।०२ं-२१ से ०२ं-४०' तक ै की मात्रा। ०२ं-४१' से ०३ं-००' तक ो की आत्रा । और , ०३ं-००' से ०३ं-२०' तक ौ की मात्रा लगाकर नाम का प्रथमाक्षर रखें।

जबकि, जिन नक्षत्रों में चारों चरणों में एक ही व्यञ्जन हो वहाँ प्रथम एवम् द्वितीय चरण में मुल वर्ण से नाम का प्रथमाक्षर रहेगा।जबकि, तृतीय और चतुर्थ चरण में ००ं-००' से ००ं-४०' तक ा की मात्रा लगायें। तदनुसार ही आगे भी ००ं-४१' से ०१-२०' तक ि की मात्रा लगायें। ०१ं-२१' से ०२ं-००' तक ई की मात्रा ।०२ं-०१' से ०२ं-४०' तक ु की मात्रा । ०२ं-४१' से ०३ं-२० तक ू की मात्रा।और चतुर्थ चरण में ०३ं-२१' से ०४ं-००' तक ृ की मात्रा।०४ं-०१' से ०४ं-४०' तक े की मात्रा।०४ं-४१ से ०५ं-२०' तक ै की मात्रा। ०५ं-२१ से ०६ं-००' तक ो की आत्रा । और , ०६ं-०१' से ०६ं-४०' तक ौ की मात्रा लगाकर नाम का प्रथमाक्षर रखें।

नाम की संस्कृत, / हिन्दी या मराठी वर्तनी के अक्षरों के अंक।

नाम सरनेम सहित जन्म नाम के अंको को जोड़कर प्राप्त योगफल का ईकाई अंक जन्मसमय के सायन सौर गतांश के ईकाई अंक दोनों एक ही हो।

0- अ, क, ट, प, ष, अः, क्ष, ऽ 0

1- आ, ख, ठ, फ, स, त्र , 1

 2- इ, ई, ग, ड, ब, ह , 2

 3- उ, ऊ, घ, ढ, भ, 3

 4- ऋ, ङ, ण, म, 4
  
 5- ए, च, त, य, 5

 6- ऐ, छ, थ, र, ज्ञ, 6

 7- ओ, ज, द, द, ल, ड़,ॉ 7

 8- औ, झ, ध, व, ढ़ 8
 
 9- अं, ञ, न, श, 9

  0- अ, अः, क, ट, प, ष, ऽ 0


अब नीचे देखिए।⤵️

जन्म नाम जानने का या अवकहोड़ा चक्र जिसका नाम ही विचित्र है और आधारहीन है।

राशि /नक्षत्र चरण १ २ ३ ४  
  
मेष / अश्विनि चु चे चो ला मेष / भरणी ली लू ले लो मेष / कृतिका अ    
                 
                            १ २ ३ ४

वृष / कृतिका इ उ ए
वृष / रोहिणी ओ वा वी वु
वृष / मृगशिर्ष वे वो  

                           १ २ ३ ४

मिथुन/ मृगशिर्ष का की
मिथुन/ आर्द्रा कु ङ ग छ
मिथुन/पुनर्वसु के को ह 

                          १ २ ३ ४

कर्क / पुनर्वसु ही
कर्क / पुष्य हु हे हो ड़ा 
कर्क / आश्लेषा डि डु डे डो

                               १ २ ३ ४

सिंह / मघा मा मे मी मू
सिंह/पुर्वाफाल्गुनि मो टा टी टू
सिंह/उत्तराफाल्गनि टे

                                   १ २ ३ ४

कन्या/उत्तराफाल्गुनि टो पा पी
कन्या / हस्त पु ष ण ठ
कन्या / चित्रा पे पो   

                                  १ २ ३ ४

तुला / चित्रा रा री
तुला / स्वाती रु रे रो ता
तुला / विशाखा ति तू ते  

                                 १ २ ३ ४

वृश्चिक/ विशाखा तो
वृश्चिक/ अनुराधा ना नी नू ने
वृश्चिक/ ज्यैष्ठा नो या यी यू

                                  १ २ ३ ४

धनु / मुल ये यो भा भी
धनु / पुर्वाषाढ़ा भू धा फा ढ़ा
धनु / उत्तराषाढ़ा भे

                                 १ २ ३ ४

मकर/ उत्तराषाढ़ा भो जा जी
मकर/ अभिजित जू जे जो खा
मकर / श्रवण खी खू खे खो
मकर / धनिष्ठा गा गी             

                                  १ २ ३ ४

कुम्भ / धनिष्ठा गु गे
कुम्भ / शतभिषा गो सा सी सू
कुम्भ / पुर्वाभाद्रपद से सो दा  

                                      १ २ ३ ४

मीन / पुर्वाभाद्रपद दी
मीन / उत्तराभाद्रपद दू थ झ ञ
मीन / रेवती दे दो चा ची

जो महानुभाव उक्त अवकहोड़ा/अवकहड़ा चक्र को भारतीय ऋषि मुनियों की रचना मानते हैं कृपया विचार कर बतलायें कि, कौन से भारतीय ऋषि संस्कृत नही जानते थे। जिन्हें यह नही पता था कि, 
1 संस्कृत में ङ (आर्द्रा 2),ण (हस्त 3), से कोई शब्द नही बनता। किसी शब्द का प्रथमाक्षर ङ और ण नही होता।
2 पूरे अवकहड़ा चक्र में ब वर्ण है ही नही। ब के लिए कोई राशि/ नक्षत्र/ नक्षत्र चरण मे स्थान नही है?
कृपया बतलायें कि, बबीता की राशि/ नक्षत्र/ चरण कौनसा है। वृष राशि/ रोहिणी नक्षत्र/ तृतीय चरण तो "वा" वाणी के लिये है न कि, "ब" बबीता के लिए। ऐसा क्यो?
3 कौनसा संस्कृत विद्वान ऐसी बे सिर पेर की अक्षर व्यवस्था बनायेगा? जबकि संस्कृत वर्ण प्रधान भाषा है न कि, अक्षर प्रधान।

ऐसे महान ऋषि और उनके अनुयायियों के लिए हमारे पास कोई शब्द नही है।

सम्भवतया वराहमिहिर के समय प्रचलित हुई उपर्युक्त यमन पद्यति / यवन पद्यति है इसके ही समान ही कीरो की आंग्ल / चाल्डियन / हिब्रु पद्यति (और तथाकथित भारतीय कश्मीरी पद्यति) द्वारा नामाक्षरों के अंको के योगांक वाली पद्यति है। जिसका कोई आधार सिद्ध नही होता। ⤵️

जन्म नाम कीअंग्रेजी स्पेल्लिंग के अक्षरों के अंको का योग का योग या योग कें अंकों का योगांक ग्रेगोरियन केलेण्डर की सुर्योदय वाली दिनांक एक ही हो।
जन्म नाम कीअंग्रेजी स्पेल्लिंग के अक्षरों के अंक

1 = A. I. J. Q. Y = 1
2 = B. K. R. = 2
3 = C. G. L. S. = 3
4 = D. M. T = 4
5 = E. H. N. X = 5
6 = U. V. W = 6
7 = O. Z = 7
8 = F. P = 8

शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

भारत की दुरावस्था के दोषी कौन?

दोष  उन सभी लोगों को दे रहा हूँ, जिन्हें चन्द्रवंशियों और नाग वंशियों के महाभारत काल से आज तक के राजा-महाराजा, सामन्तों का जिन्होंने सामुहिक रूप से सीमा पर जाकर  विधर्मी विदेशी आक्रान्ताओ से युद्ध करने, लड़ने भिड़ने के बजाय किले में छुपकर बैठ गये।
जनता लूटती मरती रही और और ये राजा, महाराजा, और उनके सामन्त बिल में छुपकर बैठ रहे।
बाद में साका और जोहर करने के बजाय उन्हें सीमा में घुसने ही नही देने के लिए ईरान और अफगानिस्तान तथा तुर्किस्तान की सीमाओं पर डटे रहना चाहिए था। लेकिन ये अपनी जागीरों/ स्टेट में ही आपस में लड़ते मरते रहे।
और
आक्रमणकारियों की सेना में भर्ती होकर अपने देशवासियों और स्वजाति बन्धुओं (भारतियों) का संहार करने वाले सैनिकों 
और उन देशवासियों का जिन्होंने अपने खेत खलिहान रोन्दते, दुकान - मकान लूटने वाले विदेशी सैनिकों का जरा भी सामुहिक प्रतिरोध नहीं किया।

मैं उन सभी लोगों का विरोध करता हूँ जो;
इन सब लोगों को दोषी ठहराने के बजाय उनकी उक्त मुर्खतापूर्ण कार्रवाइयों का गुणगान करते फिरते हैं और दोष केवल कर्मकाण्डियों, शास्त्रियों और आचार्यों को ही देते हैं। जिनकी रक्षा का भार उक्त निकम्मे डरपोक राजाओं, सामन्तों और सैनिकों का था।

गुरुवार, 16 जुलाई 2026

प्रारब्ध और पराक्रम का प्रभाव।

1 प्रकृति आयु की गणना श्वास प्रश्वास की संख्या में करतीं हैं।
इसलिए प्राणायाम साधना द्वारा और लम्बी और गहरी श्वास लेने के अभ्यास को आदत में / मसल मेमोरी में डाल देने से ही स्वस्थ्य शरीर, दीर्घायु जीवन और स्वस्थ हुआ जा सकता है।
2 अनन्त जन्मों के सञ्चित कर्मों में से इस जन्म में भोगे जा सकने योग्य कर्म फलों के समुच्चय के उदय को प्रारब्ध कहते हैं ।
3 प्रारब्ध के अनुसार निर्धारित ---
 देश ( अर्थात लोक, ग्रह, महाद्वीप, राष्ट्र, राज्य, प्रदेश, सम्भाग, जिला, तहसील, ब्लाक, ग्राम/नगर, मोहल्ला/ कॉलोनी)।
 काल ( अर्थात कल्प, मन्वन्तर, युग, संवत्सर, अयन, तोयन, ऋतु , मास, पक्ष, दिनांक, और घटि, पल, विपलात्मक समय।)
वंश, कुल, कुटुम्ब और परिवार में , मात-पिता, बड़े-छोटे भाई- बहन, भाभी - जीजा, ताऊ-काका,भुआ, ताई-काकी, फुफा, मामा-मौसी, मामी-मौसा, चचेरे, फुफेरे, ममेरे, मौसेरे भाई- बहन, भाभी - जीजा आदि के बीच जन्म होना, स्व देश, स्व कुल, स्वयम् के परिवार में 
या 
पर देव, अन्य कुल, किसी अन्य परिवार में पालन- पोषण होना, 
शारीरिक बनावट, स्वास्थ्य, सुघड़ता, स्वभाव, आदतें, रुचियाँ-अरुचियाँ, योग्यताएँ- निर्योग्यता, कौशल और पारिवारिक सुख-सुविधाएँ तथा सम्पततियाँ, और आय- व्यय रूपी परिस्थितियों के साथ बच्चे का जन्म होता है।
लेकिन 
4 इनमें विकास करना, वहीँ अटके रहना, घटाना ये सब कर्म पर निर्भर करता है।
यह सही है कि, अधिकांश लोग स्वयम् को परिस्थितियों का दास मानकर परिस्थितियों के अनुसार ही कर्म करते हैं।
किन्तु 
5 सत्वगुण प्रधान, निश्चयात्मकमिका बुद्धि वाले विवेकी पुरुष (शरीर रूपी पुर मे रहने वाला व्यक्ति) समाज में रह रहे लोगों के गुण-दोषों और उनसे उन्हें हुए लाभ हानि को देख-समझकर और गुरुजनों (वरिष्ठ जनों) द्वारा दी गई शिक्षा को अपना कर शुद्र (सेवक), से वैश्य (स्वामी), और फिर क्षत्रिय (शासक) और विप्र (वेदज्ञ), और ब्राह्मण (वेदों को आत्मसात कर आत्मज्ञानी) हो जाता है।
लेकिन 
6 रजोगुण प्रधान आधि-व्याधि, स्त्यान, प्रमाद, आलस्य, संशय, भ्रम, अवरति आदि विक्षेपों से विक्षिप्त और आधिदैविक, अधिभौतिक और आध्यात्मिक दुखों और दौर्मनस्य के कारण पर्याप्त पराक्रम न करने के कारण कष्ट भोगता हुआ, कुछ सुधार करके जैसे-तैसे जी लेता है।

7 तमोगुणी अविवेकी पुरुष तो स्वयम् में केवल गुण ही देख पाता है, बतलाने पर भी दोष नहीं मानता तो सुधार करने का प्रश्न ही नहीं होता इसलिए परिस्थितियों और दुसरों को दोष देकर
आधि-व्याधि, स्त्यान, प्रमाद, आलस्य, संशय, भ्रम, अवरति आदि विक्षेपों से विक्षिप्त और आधिदैविक, अधिभौतिक और आध्यात्मिक दुखों और दौर्मनस्य को अनिवार्य (जिना निवारण नहीं हो सकता ऐसा) मानकर सदा कष्टित, पीड़ित और दुःखी रहता है । फिर भी नहीं सुधरता है और जीवन बर्बाद कर लेता है।