अधिकांश गाँवों में केवल खेड़ापति हनुमान ही होते हैं लेकिन जहाँ नाथ सम्प्रदाय का गढ़ और तान्त्रिक अधिक होते हैं, वहाँ भैरव प्रतिमा भी रहती है। जिसमें प्रायः धड़ से ऊपर-ऊपर धड़ और मुख ही होता है।
एक भारतीय के विचार
गुरुवार, 5 मार्च 2026
ग्राम की चारों दिशाओं में क्षेत्रपाल प्रतिमा।
चित्र में माता जी के आगे-आगे दो बालक समान वीर हनुमान जी जैसे और कालभैरव देखे होंगे ये वीर कहलाते हैं; ये ही गाँव के चारों ओर क्षेत्रपाल के रूप में स्थापित किए जाते थे।
शनिवार, 28 फ़रवरी 2026
भारत कैसा हो?
चेतावनी।
सनातन वैदिक धर्म, जाति (मूल भारतीयता) और ऋषभदेव के पुत्र भरत चक्रवर्ती का राज्य क्षेत्र भारतवर्ष (राष्ट्र-राज्य) की सुरक्षा तभी सम्भव है; जब प्रत्येक नागरिक स्वस्थ्य, सुघड़, सुन्दर, सम्पन्न, समृद्ध,सुखी, सानन्द और बलवान होने के साथ-साथ बुद्धिमान, विवेकवान, चतुर, आशु निर्णय क्षमता युक्त, कट्टर वैदिक सनातन धर्म और संस्कृति का पालक-पोषक, केवल भारतवर्ष (स्वराष्ट्र) के प्रति निष्ठावान, कर्तव्य पथ में सजग प्रहरी होकर धनुर्वेद (सैन्यशास्त) निपुण हो और ऐसे सब नागरिक मिलकर सशक्त, समृद्ध, भविष्य की तकनीकी और रणनीति को ध्यान में रखते हुए अस्त्र-शस्त्रादि से सम्पन्न, समृद्ध, उन अस्त्र-शस्त्रादि के सञ्चालन, संधारण (रखरखाव), और विविध उपयोग जानने वाले कुशल सैनिकों से सेवित हो।
अभी हमें बहुत तैयारी करनी है।
अन्यथा चर्च और मस्जिद ही हमारा भविष्य होगा।
गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026
ग्रहण काल में क्या करें - क्या न करें।
प्रथम तथ्य तो यह है कि, मूर्ति पूजा जैसे अवैदिक कर्म को छोड़कर ग्रहण की अवधि में भी कोई भी वैदिक कर्म में कोई रोक नहीं है।-
ग्रहण के समय में
1 ब्रह्मयज्ञ अर्थात शास्त्र पठन-पाठन, ॐ का जप, गायत्री मन्त्र का जप, या कोई भी वैदिक मन्त्र जप करना ही चाहिए। नदी में खुले आसमान के नीचे करना और भी अधिक अच्छा माना जाता है।
2 देव यज्ञ - वैद मन्त्रो के साथ अग्निहोत्र करके देवताओं को आहुति देना चाहिए।
3 नृयज्ञ - गुरुकुलों, ब्रह्मचारियों, रोगी, बालकों असहायों और अशक्तों की सेवा करना ही चाहिए।
4 भूत यज्ञ, गो, आदि पाल्य पशुओं, कुत्ता, कौवा, चींटी आदि जन्तुओं, पेड़-पौधे आदि वनस्पतियों की सेवा पञ्च बलि निकालना करना ही चाहिए।
सूखा मेवा , स्वर्ण आदि का दान करना ही चाहिए।
5 पितृ यज्ञ -- अशक्त, असहाय और रुग्ण वृद्धौ , गुरुजनों , नगर में प्रवेश न करने वाले संन्यासियों की सेवा करना ही श्राद्ध है।
यह श्राद्ध कर्म करना ही चाहिए। भूखे बच्चे, वृद्ध, बिमार या गर्भवती स्त्रियों से यदि भूख सहन नहीं हो पा रही हो तो उन्हें सुखे मेवे या सेब जैसे गुदादार फल या शकरकन्द (रतालू) जैसे कन्द-फल आदि से उनकी भूख मिटाने का प्रयत्न करें।
फिर भी न रह पाए तो तुलसी दल, दुर्वा, कुश, स्वर्ण, चान्दी आदि रखकर सुरक्षित किया हुआ पका भोजन भी खिला सकते हैं।
यही श्राद्ध कर्म है।
ये सभी वैदिक कर्तव्य कर्म आवश्यक है करना ही चाहिए।
लेकिन मूर्ति पूजा और विशेषकर लिङ्ग-योनि स्पर्श और पूजा पूर्णतः निषिद्ध है।
होलिका दहन वैदिक नव सस्येष्टि कर्म का ही विकृत संस्करण है। और धुलि वन्दना और वसन्तोत्सव भी वैदिक कर्म है।
इसलिए चन्द्रग्रहण में होलिका दहन, धूलिवन्दन, वसन्तोत्सव का कोई निषेध नहीं है।
होलिका दहन के नियम - विधि-निषेध।
1 *फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा का उत्तरार्ध अर्थात भद्रा से रहित हो, प्रदोष व्यापिनी हो, तब होलिका दहन करना चाहिए ।*
2 *यदि दोनों दिन प्रदोष व्यापिनी पूर्णिमा हो, तब दूसरे दिन ही होलिका दहन करना* चाहिए,कारण यही है कि पहले दिन भद्रा से युक्त होलिका दहन उचित नहीं।
3(क) *यदि दूसरे दिन प्रदोष को पूर्णिमा स्पर्श न करें और पहले दिन प्रदोष में भद्रा हो तथा दूसरे दिन शाकल्यपादिता पूर्णिमा तिथि हो अर्थात साढ़े तीन प्रहर तक अथवा उससे अधिक पूर्णिमा तिथि हो और उससे अगले दिन प्रतिपदा वृद्धि गामिनी हो तो ऐसी स्थिति में दूसरे दिन प्रदोष व्यापिनी प्रतिपदा में ही होलिका दहन होना चाहिए।*
3 (ख) *यदि दूसरे दिन प्रदोष को पूर्णिमा स्पर्श न करें और पहले दिन प्रदोष में भद्रा हो तथा दूसरे दिन शाकल्यपादिता पूर्णिमा तिथि हो अर्थात साढ़े तीन प्रहर तक अथवा उससे अधिक पूर्णिमा तिथि हो औरयदि प्रतिपदा का ह्रास हो तब पहले दिन भद्रा के पुच्छ काल में अथवा भद्रा के मुख को छोड़कर, भद्रा में ही होलिका दहन किया जाना चाहिए।*
4 *यदि दूसरे दिन प्रदोष को पूर्णिमा स्पर्श न करें और पहले दिन निशिथकाल से पहले ही भद्रा समाप्त हो जाए तो भद्रा समाप्त होने पर होलिका दहन करना चाहिए, परंतु यदि भद्रा निशीथकाल से बाद में समाप्त हो तो भद्रा के मुख को छोड़कर, भद्रा काल में ही अथवा पुच्छ काल में होलिका दहन करनी चाहिए ।*
5 *श्री विद्याधर शर्मा गौड़ जी ने निर्णय सिंधु के द्वितीय परिच्छेद के फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा निर्णय में कहा..*
*अथ परेन्हि ग्रस्तोदयस्तदा पूर्व दिने भद्रावर्ज रात्रौ चतुर्थयामे विष्टिपुच्छे वा होलिका कार्या...*
अर्थात
*यदि दूसरे दिन ग्रस्तोदय चंद्र ग्रहण हो तो पूर्व दिन ही भद्रा के पुच्छ काल में अथवा उस रात्रि के चतुर्थयाम में होलिका दहन करें।*
6 निष्कर्ष-- *(जैसा कि निर्णय सिंधु में श्री विद्याधर शर्मा गौड़ जी ने कहा)*
*अतः पूर्णिमा तिथि के चतुर्थ प्रहर की प्रथम पाँच घटि अर्थात भद्रा के मुख को छोड़कर पुच्छ काल से पूर्व का समय अधम, पुच्छ काल मध्यम तथा चतुर्थयाम सर्वोत्तम काल के रूप में स्वीकार करना चाहिए।*
इसके अलावा यह सत्य है कि साधारण नियमानुसार ग्रहण काल में होलिका दहन का निषेध नहीं, परन्तु मूर्धन्य विद्वान विद्याधर शर्मा गौड़ जी के वचनानुसार विशेष परिस्थितियों में ग्रहण काल में होलिका दहन से बचना चाहिए।
7 धूलिवन्दन पर्व *धर्म सिंधु, निर्णय सिंधु तथा अन्य जितने भी ग्रंथ हैं उन सभी में यही प्रमाण प्राप्त होता है कि होलिका विभूति वन्दन/वसंतोत्सव करने हेतु प्रतिपदा, सूर्योदय कालिक होनी चाहिए।*
शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026
अंग्रेजी लिपि के रोमन अपर केस लेटर्स ABCD, लोअर केस लेटर्स abcd और दोनों प्रकार के कर्स्यु लेटर्स का संक्षिप्त इतिहास।
पत्थरों पर या मिट्टी की प्लेट पर कीलों से खोद-खोदकर लिखने हेतु सरल रेखाओं और अर्धवृत्त को जोड़कर ABCD आदि रोमन / लेटिन स्क्रिप्ट का विकास हरियाणा भारत की ब्राह्मी लिपि --> लेबनान की फोनिशियन लिपि --> पश्चिम टर्की की ग्रीक लिपि --> से लेटिन रोमन लिपि का आविष्कार चौथी शताब्दी में हुआ।
लगभग चौथी से आठवीं सदी के बीच कलम (पेन) से लेखन प्रारम्भ होने के पश्चात लेखन में शीघ्रता हेतु अक्षरों को गोलाई दी देकर छोटे लेटर्स abcd बनाए। छापखाने में लोअर केस में रखे जाने के कारण लोअरकेस भी कहलाते हैं। जबकि रोमन लेटर्स अपर केस कहलाते हैं क्योंकि ये उपर की ट्रे में रखें जाते थे।
बिना हाथ उठाए आर्मेनियाई आरामी (प्राचीन अरबी) लिपि के अनुसरण में बिना हाथ उठाए हस्त लेखन में तेजी हेतु दोनों प्रकार के कर्स्यु लेटर्स सत्रहवीं - अठारहवीं शताब्दी में रचे गये।
इङ्ग्लेण्ड की मूल भाषा एङ्ग्लो-सेक्शन थी जिसे जर्मनी के प्रभावित इङ्लिश में परिवर्तित किया गया।
मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026
होलाष्टक क्या है? क्यों माना जाता है? शुभकार्यों में कहाँ-कहाँ निषिद्ध है?
*होलाष्टक*
पौराणिक कथाओं के अनुसार हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु की एक बहन और प्रह्लाद जी की भुआ असम के राजा विप्रचित्ति की रानी सिंहिका थी जिसका पुत्र स्वर्भानु (राहु) था जो अधिकांशतः हिरण्यकशिपु के पास ही रहता था। और हिरण्यकशिपु का दुसरे पुत्र संह्लाद को विप्रचित्ति ने राहु के जन्म से पहले ही गोद ले रखा था । संह्लाद कामरूप (असम) में रहता था। उसने विभिन्न प्रजाति के विषैले सर्प पाल रखे थे।
और दुसरी बहन होलिका थी जिसने तपस्या करके अग्नि में न जलने का वरदान प्राप्त कर रखा था। लेकिन हर वरदान की कुछ सीमाएँ एवम् पारिस्थितिक शर्तें होती है।
ये दोनों बहनें जब हिरण्यकशिपु से मिलने आई उसके पहले सिंहिका पुत्र स्वर्भानु की सलाह पर हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद जी को मारने के लिए अनेक प्रयत्न किये। लेकिन प्रह्लाद जी अपने इष्ट नारायण श्रीहरि की कृपा से बच जाते थे। सिंहिका और विप्रचित्ति ने प्रह्लाद जी को पत्र लिखकर प्रह्लाद जी को कामरूप में संह्लाद से मिलने भेज दिया और पत्र में सांकेतिक भाषा में प्रह्लाद जी को सर्प गृह बतलाने के बहाने अन्दर बन्द करदेने का निर्देश लि दिया था।
जब संह्लाद ने प्रह्लाद जी को सर्प गृह में बन्द किया तो सर्प गृह खुला रह गया और सर्पों ने संह्लाद को ही डस लिया। लेकिन प्रह्लाद जी ने अपने भाई संह्लाद को बचा लिया। इससे संह्लाद का मन परिवर्तित हो गया।
असफल होने पर लौटते समय पुनः स्वर्भानु की सलाह पर हिरण्यकशिपु ने व्यास (विपाशा), रावी (इरावति) और सतलुज नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों में अर्थात धवलपुर, लुधियाना, शिमला, फिरोजपुर, गुरदासपुर, होशियारपुर, कांगड़ा,कपूरथला और अजमेर - पुष्कर के आस-पास के क्षेत्रों में प्रह्लाद जी को फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से चतुर्दशी तक मारने हेतु बहुत प्रकार की प्रताड़ना दी गई। लेकिन प्रह्लाद जी की रक्षा उनके इष्टदेव भगवान नारायण श्रीहरि करते रहे।
अन्ततः होलिका ने प्रस्ताव रखा कि, मुझे अग्नि नहीं जला सकेगी ऐसा वरदान प्राप्त है। अतः कल (फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को) मैं सार्वजनिक महोत्सव के रूप में प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि स्नान करूंगी। परिणाम स्वरूप प्रह्लाद जल कर मर जाएगा। और मैं बची रहूँगी।
लेकिन भगवान नारायण श्रीहरि की कृपा से हो उल्टा गया। होलिका जल गई और प्रह्लाद जी सुरक्षित रहे।
व्यास (विपाशा), रावी (इरावति) और सतलुज नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों में अर्थात धवलपुर, लुधियाना, शिमला, फिरोजपुर, गुरदासपुर, होशियारपुर, कांगड़ा,कपूरथला और अजमेर - पुष्कर के आस-पास के क्षेत्रों के लोगों की मान्यता हैं कि, हिरण्यकशिपु ने इस क्षेत्र में प्रह्लाद जी का उत्पीड़न किया था। इसलिए धवलपुर, लुधियाना, शिमला, फिरोजपुर, गुरदासपुर, होशियारपुर, कांगड़ा,कपूरथला और अजमेर - पुष्कर के आस-पास के क्षेत्रों फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा तक होलाष्टक में कोई शुभ कार्य नहीं करना चाहिए। यह उस क्षेत्र की परम्परा है।
मुहूर्त चिंतामणि शुभाशुभ प्रकरण श्लोक 40 तथा मुहूर्त गणपति श्लोक 204 के अनुसार होलाष्टक का दोष विशेष रूप से व्यास (विपाशा), रावी (इरावति) और सतलुज नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों में वर्जित माना गया है।
यह मुख्य रूप से उत्तर पश्चिम भारत के पंजाब, हिमाचल प्रदेश का कुछ भाग और अजमेर (पुष्कर) क्षेत्र में ही मान्य है।
अर्थात
धवलपुर, लुधियाना, शिमला, फिरोजपुर, गुरु दासपुर, होशियारपुर, कांगड़ा, कपूरथला, अजमेर, पुष्कर आदि नगरों के आस-पास का क्षेत्र में ही मान्य है; अन्य क्षेत्र: यह दोष हर जगह मान्य नहीं है।
गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026
जो सरकार निकम्मी है वो सरकार बदलनी है; नारे का वास्तविक अर्थ।
*जो सरकार निकम्मी है वो सरकार बदलनी है; नारे का अर्थ अब समझ में आया।*
हमारे बचपन में चुनावी रैलियाँ और आमसभाओं में एक नारा विपक्षी दल अवश्य लगवाते थे -- जो सरकार निकम्मी है वो सरकार बदलनी है।
बच्चों को बिल्ला लगाकर हाथ में झण्डा देकर मोहल्ला रैलियाँ भी निकालते थे। बहुत से बच्चे सभी राजनीतिक दलों की रैलियों में जाकर झण्डे, डण्डे और बिल्ला संग्रहण कर अमेरिकी कथाकार मार्क ट्वैन की भाषा में स्वयम् को बहुमुल्य सम्पत्ति का स्वामी बनकर इठलाता रहता था।
लेकिन तब सभी रैलियों में जाने वाले/ माता- पिता के दबाव में केवल किसी एक रैली में में ही जाकर सन्तोष कर लेने को विवश बच्चे और किसी भी रेली में भाग नहीं ले पाने वाले के कारण घर में ही नारा लगाने वाले बच्चों से लेकर नारा लगवाने वाले वरिष्ठ जनों तक किसी को भी इस नारे का छिपा हुआ मूल अर्थ पता नहीं होता था। जो कई वर्षों से न समझ आने वाले बजट को हर साल समझने के असफल प्रयत्न से समझ आया कि,
निकम्मी सरकार वह होती है जो सम्भावना होते हुए भी राजनीतिक भाषा में भोली-भाली (वास्तविक अर्थ - मूर्ख) जनता को करों के बोझ से दबा कर कुचलने में कमी रख दे। और सरकार को सम्भावित आय प्राप्त करने से महरूम रख दे।
इसलिए हम सन 1957 से लगातार हर दस-पन्द्रह वर्ष में तो तथाकथित निकम्मी सरकार बदलते रहे हैं और नेताओं पर होने वाले खर्च और कर बढ़ाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेती है।
हमने सभी दलों के छुटभैय्ए नेताओं को कमाने के भरपूर अवसर देकर ईंट-पत्थर तोड़ने हेतु अपनी खोपड़ी का उपयोग कर अपना ही सिर फोड़ते रहे।
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