सभी गांवों में एक ही ऐसा मन्दिर हो जहाँ
भगवान परब्रह्म-
विष्णु और माया।
ब्रह्म-
प्रभविष्णु और श्री, लक्ष्मी तथा सवितृ और सावित्री।
अपर ब्रह्म -
नारायण और नारायणी तथा श्री हरि- कमलासना, गजसेविता लक्ष्मी।
हिरण्यगर्भ (पञ्चमुखी ब्रह्मा) और वाणी,
त्वष्टा-रचना
तथा
सनक, सननन्दन, सनत्कुमार , सनातन, नारद
धर्म और उनकी तेरह पत्नियाँ - (१) श्रद्धा, (२) लक्ष्मी, (३) धृति, (४) तुष्टि, (५) पुष्टि, (६) मेधा, (७) क्रिया, (८) बुद्धि, (९) लज्जा, (१०) वपु, (११) शान्ति, (१२) सिद्धि, (१३) कीर्ति )
काम और रति
एवम्
अर्धनारीश्वर एकरुद्र।
प्रजापति (चतुर्मुख ब्रह्मा) और सरस्वती,
इन्द्र-शचि, दक्ष (प्रथम)-प्रसुति, रुचि-आकुति, कर्दम-देवहुति, स्वायम्भुव मनु-शतरूपा
तथा
शंकर- उमा,
एवम्
मरीची-सम्भूति, भृगु-ख्याति, अङ्गिरा-स्मृति, वशिष्ट-ऊर्ज्जा, अत्रि-अनसुया, पुलह-क्षमा, पुलस्य-प्रीति, कृतु-सन्तति।
वाचस्पति और वाक ,
अग्नि-स्वाहा, पितर-स्वधा,
ब्रह्मणस्पति-सुनृता , द्वादश आदित्य (1) विष्णु, (2) सवितृ, (3) त्वष्टा, (4) इन्द्र, (5) वरुण, (6) विवस्वान, (7) पूषा, (8) भग, (9) अर्यमा, (10) मित्र, (11) अंशु और (12) धातृ) और उनकी शक्तियाँ,
ब्रहस्पति- शुभा, ममता , तारा, अष्ट वसु- (1) प्रभास (आकाश) - प्रभासा।
(2) प्रत्युष (सूर्य/देव) - प्रत्युषा या दीक्षा
(3) धर्म (वसु-पुत्र) - धृति ।
(4) ध्रुव (अचल/ध्रुव तारा) - ध्रुवा या धरणी
(5) अर्क (सूर्य/देव) - अर्का
(6) अनिल (वायु) - अनिला या शिवा
(7) अनल (अग्नि) - अनला या शांडिली
(8) अप् (जल) - आप (या सरिता)
पशुपति- ,एकादश रुद्र-(1) हर, (2) त्र्यम्बकं, (3) वृषाकपि, (4) कपर्दी, (5) अजैकपात, (6) अहिर्बुधन्य, (7) अपराजित, (8) रैवत, (9) बहुरूप, (10) कपाली और (11) शम्भु (शंकर) और उनकी शक्तियाँ,
गणपति- ,सोम- वर्चा,
सदसस्पति-समिति, मही-भारती-सरस्वती- इळा।
अधिदेव - अष्टादित्य [ (1)मार्तण्ड {विवस्वान}, (2) इन्द्र, (3) वरुण, (4) मित्र, (5) धाता, (6) भग, (7) अंश और (8) अर्यमा)]
अध्यात्म दुसरे वसु [(1) द्रोण, (2) प्राण, (3) ध्रुव, (4) अर्क, (5) अग्नि (6) दोष, (7) वसु और (8) विभावसु )]।
अधिभूत दुसरे एकादश रुद्र [(1) मन्यु, (2) मन , (3) महिनस, (4) महान, (5) शिव, (6) उग्ररेता, (7) भव, (8) काल, (9) वामदेव, (10) धृतवृत और (11) मृगव्याध या मतान्तर] से अन्य नाम [(1) सर्प, (2) निऋति,(3) पिनाकी, (4) कपाली, (5) स्थाणु, (6) ईशान नाम और (7) दहन भी।] ।
द्वादश तुषितगण [(1) बुद्धि, (2) मन, (3) उदान, (4) व्यान, (5) प्राण, (6) समान, (7) अपान, (8) श्रोत, (9) स्पर्ष, (10) चक्षु, (11) रसना और (12) घ्राण ]
मरुद्गण (1) आवह, (2) प्रवह, (3) संवह, (4) उद्वह, (5) विवह, (6) परिवह और (7) परावह है।
शुक्राचार्य के पुत्र त्वष्टा।
द्वादश साध्यगण[ (1) मन, (2) अनुमन्ता, (3) प्राण, (4) अपान, (5) विति , (6) हय, (7) हन्स, (8) विभु, (9) प्रभु, (10) नय, (11) नर और (12) नारायण )
अनेकरुद्र (विशेले कीट पतङ्ग, सर्प, बिच्छू, घोघा (कपर्दी) और सीपी (युनियो, पाईला), सिंह, व्याघ्र आदि हिन्सक प्राणी, आतंकी, गुण्डे, बदमाश, चोर, उचक्के, डाकु, लुटेरे, वनवासी, पुलिस, सेना आदि रुलाने वाले सभी अनेकरुद्र हैं।
प्रभास वसु और (ब्रहस्पति की बहन) वरस्त्री के पुत्र देवशिल्पी विश्वकर्मा।
शुक्राचार्य के पुत्र) त्वष्टा हैं।
यह्व ( महादेव) यहुदियों का इष्ट याहवेह ।
(1) ईशित्व- वशित्व, (2) अणिमा-लघिमा, (3) महिमा- गरिमा और (4) प्रकाम्य - प्राप्ति) सिद्धियों के अधिदेवता अष्ट विनायक हैं। [(1)सम्मित-उस्मित, (2) मित- देवयजन, (3) शाल - कटंकट और (4) कुष्माण्ड - राजपुत्र ।
दस विश्वैदेवगण - [(1) दक्ष (द्वितीय), (2) कृतु, (3) सत्य, (4) काल (यम), (5) काम, (6) मुनि, (7) एल पुरुरवा, (8) श्रव, (9) रोचमान, (10) आर्द्रवान हैं।
शुक्राचार्य के पौत्र , त्वष्टापुत्र त्रिशिरा विश्वरूप हैं।
ईला नामक रौद्री के पुत्र एल भैरव हैं। ( या वैवस्वतमनु की पुत्री ईला और बुध के पुत्र एल पुरुरवा हैं)।