गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026

ब्राह्म धर्म में सद्योमुक्त की अवधारणा।

जिस समय दोष दर्शन बन्द कर दिया जाता है , सन्देह दूर होने लगेंगे।
सन्देह दूर होते ही सत्य सामने आने लगेगा। और सारे भ्रम दूर हो जाते हैं।

परमात्मा (असम्भुति) की उपासना सम्भव नहीं है, परब्रह्म परमेश्वर विष्णु माया के प्रति पूर्ण समर्पण के आगे या कहें बाद में कर्म शेष नहीं रहते। श्रीमद्भगवद्गीता द्वितीय अध्याय वाली (भगवान शंकराचार्य जी वाली नहीं) सन्यास निष्ठा जागृत हो जाती है।
इसलिए वह केवल लोकसंग्रह हेतु ही पञ्च महायज्ञ अष्टाङ्ग योग अभ्यास आदि जारी रखता है।
शरीर भोग पूरे करने हेतु सांसारिक कर्म और भोग ग्रहण जारी रखता है।
उसके लिए इन्द्रिय सुख-दुख कोई अस्तित्व नहीं रखते हैं।
फिर भी वह प्रकट नहीं करता।
शरीर है तो शरीर के गुण धर्म सब होंगे लेकिन उससे उसकी चित्तवृत्ति अप्रभावित रहती है।
बस यही वानप्रस्थ और संन्यासी में अन्तर है।

अविद्या अर्थात कर्मेंद्रियों से होने वाली क्रियाओं में अपना अहंकार जोड़कर उसे कर्म इसलिए नहीं बनने देता है क्योंकि वह जानता है कि, इन्द्रियाँ अपने अपने अर्थों में, विषयों में वरत रही है (व्यवहार कर रही है।)
और देवताओं की उपासना ब्रह्मचर्य आश्रम में उपवेदों का अध्ययन, प्रयोग और व्यवहार करते समय ही पूर्ण कर चुका। अब उन्हें यथासमय केवल इसलिए करता रहता है ताकि, यह स्मृति से न हटे और आवश्यक होने पर काम आये (कर्ण जैसी स्थिति नहीं हो) इसलिए कर्तव्य है।
[जैसे तन्त्र में उदृष्टका, एकाष्टका, पूर्णिमा, व्यष्टिका, अमावस्या, सायन संक्रान्ति और निरयन संक्रमण तथा सम्बन्धित नक्षत्र पर सूर्य और चन्द्रमा होने के समय तथा सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण के (दिन नहीं बल्कि) समय सिद्ध मन्त्र का जप करना पड़ता है।]
लेकिन यह कार्य वह लोकसंग्रह हेतु करता है न कि, स्वार्थ सिद्धि हेतु। इसलिए (कमाने-खाने वाले) कर्मेंद्रियों के कर्म अनासक्त भाव से कर्तव्य समझकर करता हुआ अन्धतम में प्रवेश नहीं करता अर्थात जड़ता को प्राप्त नहीं होता।
और निष्काम भाव से देवताओं की उपासना रूप विद्या की उपासना करते हुए भी उससे भी अधिक घोर अन्धकार में नहीं रहता है।

सम्भूति मतलब शरीर से लेकर सृष्टि पर्यन्त उत्पन्न होने वाले कार्यब्रह्म की उपासना इसलिए नहीं करता क्योंकि, केवल धनारर्जन से लेकर लोक विजय तक, सङ्ग्रह, संरक्षण से लेकर विस्तार तक और शारीरिक भोग से लेकर ब्रह्मलोक तक के भोगों में उसकी रुचि बहुत पहले ही वानप्रस्थ आश्रम में ही समाप्त हो चुकी होती है।
इसलिए उसे न इन्हें प्राप्त करने के लिए विद्या की उपासना (सकाम उपासना) की आवश्यकता रही और न ही इनमें कोई रुचि या आकर्षण बचा। अब उसे न किसी लोक वास में या किसी लोक का स्वामी बनने में कोई आकर्षण बचा। इसलिए वह अन्धकार में नहीं रहता।
और चूंकि वह जानता है कि, जैसे स्वयम को नमस्कार नहीं किया जा सकता उसी प्रकार द्वेत के अभाव में उस परब्रह्म परमेश्वर के भी कारण उस *परमात्मा की आराधना-उपासना सम्भव नहीं है।* इसलिए जानबूझ अन्धेकुए में कुदने जैसी गलती नहीं करता।
इसलिए वह घोर अन्धतम में प्रवेश नहीं करता।
चूंकि यह दर्शन वर्णाश्रम व्यवस्था वाले सनातन ब्राह्म धर्म का है इसलिए इसे जैन-बौद्ध और तन्त्र व्यवस्था के अन्तर्गत नहीं समझाया जा सकता है।
इसलिए वर्णाश्रम के साथ ही समझाया जा सकता है।
और वर्णाश्रम, कर्मफल, पुनर्जन्म न समझने वाले अब्राहमिक (अब्राह्मिक) तो समझ ही नहीं सकते।

रविवार, 18 अक्टूबर 2026

वैदिक दर्शन में अभेद दृष्टि।

*वेदों में पारमार्थिक सत्य तथ्य के अलावा व्यावहारिक दृष्टिकोण को भी मान्यता देकर ईश्वर, जीव और जगत के रूप में तीनों सत्ताओं को अचानक खड़ा नहीं करते हुए शाश्वत अमर चेतना की प्रगाढ़ता, सघनता, तीव्रता और प्रचण्डता तथा विभव, क्षमता, सामर्थ्य, अन्तःशक्ति, और सम्भूति (सम्भावना) में क्रमशः विभिन्न चरणों में धीरे-धीरे कमी दर्शाते हुए अलग-अलग स्वरूपों में प्रकटीकरण के माध्यम से बतलाया गया।*
*इस प्रकार स्वतन्त्र इच्छा वाले एक व्यक्तिगत तानाशाह सम्प्रभु शासक के रूप में ईश्वर की अवधारणा के स्थान पर कर्मफल सिद्धान्त पुनर्जन्म का सिद्धान्त स्थापित किया गया।* (जिसे मैं करो और भुगतो का सिद्धान्त कहता हूँ। यदि करते समय सोच-विचार नहीं तो भोगने में सोच विचार क्यों?)
परमात्मा के - (विश्वात्मा) ॐ संकल्प से - (प्रज्ञात्मा) परब्रह्म परमेश्वर (परम पुरुष) विष्णु और (परा प्रकृति) माया -- (प्रत्यगात्मा/ अन्तरात्मा) (महेश्वर) ब्रह्म -(पुरुष) प्रभविष्णु सवितृ और (प्रकृति) श्री लक्ष्मी सावित्री -- (जीवात्मा) जगदीश्वर (अपरब्रह्म) - (अपर पुरुष) नारायण श्रीहरि और (त्रिगुणात्मक अपरा प्रकृति) कमलासना गज सेविता लक्ष्मी --- (भूतात्मा) अण्डाकार पञ्च मुखी हिरण्यगर्भ ब्रह्मा - (प्राण) (चेतना/ देही) त्वष्टा और (धृति/ धारयित्व) रचना, और अर्धनारीश्वर एक रुद्र --- (सूत्रात्मा) प्रजापति - (ओज) दक्ष प्रजापति, रुचि प्रजापति , कर्दम प्रजापति, स्वायम्भुव मनु तथा शंकर जी और (आभा) (कान्ति), प्रसुति, आकुति, देवहूति, शतरूपा तथा उमा (पार्वती), --- (अणुरात्मा) वाचस्पति - (तेज) इन्द्र और (विद्युत) शचि, --- (विज्ञानात्मा)  ब्रह्मणस्पति - (चित्त) द्वादश आदित्य और (वृत्ति) - (तुरीय, जागृति, स्वप्न निद्रा आदि), --- (ज्ञानात्मा) बृहस्पति - (बुद्धि) अष्ट वसु और (बोध), --- (लिङ्गात्मा) पशुपति - (अहंकार) एकादश रुद्र और (अस्मिता), --- (मनसात्मा) गणपति - (मन) सोम और (सङ्कल्प - विकल्प)  वर्चा --- (स्व) सदसस्पति (सिंगुलैरिटी) और (स्वभाव) मही (एनर्जी) ---- (वैकारिक स्वभाव) स्वाहा (आधिदैविक शक्ति) - (तेजस स्वभाव) वषट (अध्यात्मिक शक्ति) - (भूतादिक स्वभाव) स्वधा (भौतिक शक्ति/कास्मिक एनर्जी ) ।
(आगे भी है.....)
वैदिक सृष्टि क्रम वर्णन की विशेषता।
1 अनादि अनन्त, गुणातीत परमात्मा।

2 परमात्मा का ॐ संकल्प, जिसे पूर्ण से पूर्ण होना कहा गया।

3 परमात्मा के ॐ संकल्प साथ ही एक (1) प्रज्ञात्मा परब्रह्म होना।

4   उस 1 को ही द्वि (2) (द्वैत) परमपुरुष और परा प्रकृति यानी विष्णु और माया रूप में भासना। 
जैसे सूर्य और प्रकाश दो अलग-अलग समझे जाते हैं, माने जाते हैं लेकिन मूलतः अलग-अलग किया नहीं जा सकता। सूर्य है तो ही प्रकाश है। प्रकाशित हो रहा है तो ही सूर्य है।

5 प्रज्ञात्मा परब्रह्म का ही प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) ब्रह्म (ईकाई/युनिट) के रूप में प्रकट होना।

6 प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) ब्रह्म (महाकाश) को पुरुष प्रभविष्णु (जनक, प्रेरक, रक्षक - सवितृ) और श्री लक्ष्मी (सावित्री) के रूप में जाना जना, समझा जाना, माना जाना।
(ईकाई/ युनिट को भी गुण और गुणवत्ता के आधार पर द्वैत दर्शाना।)

7 प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) ब्रह्म का जीवात्मा अपर ब्रह्म (काल) के पूर्णतः भासमान स्वरूप में प्रकटीकरण। जिसे पूर्ण भासमान अपर पुरुष जीव और त्रिगुणात्मक अपरा प्रकृति आयु के रूप में प्रसिद्धि।

8 जीवात्मा अपर ब्रह्म से भूतात्मा वाणी हिरण्यगर्भ (विश्वकर्मा) (महादिक) के अण्डाकार (अनुभव किए जा सकने वाले भौतिक स्वरूप में) प्रकटीकरण। जिसे प्राण (चेतना) (ब्रह्माण्ड रचियता) त्वष्टा और धारण शक्ति धृति रचना के स्वरूप में जाना गया।
इस स्वरूप ने भौतिक ब्रह्माण्ड तो रच दिया लेकिन सजीव जगत रचना का सूत्र न मिलने पर रोष (भाव) आने पर (न्युट्रल) अर्धनारीश्वर स्वरूप एक रुद्र प्रकट हो गए। जिन्होंने सृजन से इन्कार कर तप को अपनाया।
फिर वाणी हिरण्यगर्भ ने धर्म और धृति (जिसने धर्म को धारण किया) और काम (कामना/ इच्छा) और रति (क्रियाशील रत रखने वाली शक्ति जो (सूख की इच्छा) राग के प्रति उत्तरोत्तर तीव्रता जगाने वाली रति) को उत्पन्न किया।
इन दोनों के प्रति समत्व भाव वाला स्वरूप आने की परिस्थितियाँ हो जाने पर जैविक सृष्टि के सृजनकर्ता हुए।

9 भूतात्मा वाणी हिरण्यगर्भ (विश्वकर्मा) से सूत्रात्मा प्रजापति और सरस्वती हुए जिन्हें अध्यात्मिक तत्व ओज और आभा (कान्ति) के रूप में जानते हैं। और आधिदैविक स्वरूप में दक्ष प्रजापति और उनकी पत्नी प्रसुति, रुचि प्रजापति और आकुति, कर्दम प्रजापति और देवहुति तथा स्वायम्भुव मनु और शतरूपा हुए।
जिन्होंने मैथुनिक जैविक सृष्टि उत्पन्न की।
पहले भू-भव मतलब होना (भुतात्मा हुए)।
फिर धर्म - धृति (कर्तव्य भाव) और कामना (काम-रति) दो प्रकार की भावना जागृत हुई।
तब जैविक सृष्टि मैथुन के माध्यम से हुई।
यहाँ जाकर द्वैत भाव परिपूर्ण हुआ।
आज भी अन्तःकरण में जब-तक स्त्री-पुरुष द्वैत भाव रहने तक ब्रह्मचर्य सिद्धि नहीं माना जाता है।
जो ब्रह्म की ओर चलने वाला ब्रह्मचारी होगा वही ब्रह्म में लीन हो पाएगा।

दिए गए वैदिक सूक्त, तेरह उपनिषद और श्रीमद्भगवद्गीता को यदि मस्तिष्क पर लगा चश्मा हटाकर पढ़ ले तो सभी तत्व, उनके परस्पर सम्बन्ध सभी प्रकाशित हो जाएंगे।

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026

निर्णय सिन्धु के अनुसार नवरात्र

आश्विन शुक्ल षष्ठी तिथि में सायंकाल में बिल्व के पास जाकर देवी और बिल्व का पूजन कर प्रार्थना करें कि, रावण के वध के लिए श्रीराम का अनुग्रह के लिए असमय में ब्रह्मा ने देवी का बोधन पहले आप मे (बिल्व में) किया अतः मैं भी सायंकाल के समय षष्ठी तिथि में आपके आश्रित देवी का बोधन करता हूँ। श्रीशैल पर्वत के शिखर में उत्पन्न श्रीफल (बिल्वफल) लक्ष्मी का निवास स्थान है। मैं आपको ले जाऊँगा। कृपया आप आइयेगा। दुर्गा स्वरूप आप पूज्य हैं।
रावणस्य वधार्थाय रामास्यानुग्रहाय च।अकाले ब्रह्मणा बोधो देव्यास्त्वयि कृतः पुरा।।
अहमप्याश्रितः पृष्ठायाम् सायाह्ने बोधयाम्यतः। श्रीशैलिखरे जातः श्रीफलः श्री निकेतनः।। नेतव्योऽसि मयागच्छ पूज्यो दुर्गास्वरूपतः।। निर्णय सिन्धु पृष्ठ 346-347

कालिका पुराण के अनुसार ---
इस प्रकार देवी का अधिवासन कर दुसरे दिन सप्तमी को निमन्त्रित बिल्व की शाखापत्री में प्रवेश कर पूजा करें‌
इसमें सप्तमी तिथि की मुख्य है, मूल नक्षत्र भी हो तो सर्वोत्तम।
दो नूतन बिल्व के फलों का युग्म तथा शाखा को वैसे ही देवी प्रतिमा का स्नान कराकर अभ्युक्षण कर प्रवेश करें‌। इसमें दाक्षिणात्य (महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आन्ध्र प्रदेश में) षष्ठी युक्त सप्तमी तिथि ग्रहण करते हैं लेकिन गोड़ (बङ्गाल, उड़ीसा, पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार, असम आदि सेवन सिस्टर्स में प्रचलित) मत है कि,चाहे एक घटि भी उदिया सप्तमी तिथि हो तो भी उदिया सप्तमी का ही महत्व है। निर्णय सिन्धु पृष्ठ 348
नव पत्रिका ---
केल का पत्ता, दारु हल्दी का पत्ता, हल्दी का पत्ता , जयन्ती (मेउडी) , धान (चावल की का पोधा) आदि। निर्णय सिन्धु पृष्ठ 348

देवी पुराण के अनुसार ---
दक्षिण मुखी दुर्गा प्रतिमा शुभदायक, पूर्वाभिमुख दुर्गा प्रतिमा विजयप्रद, पश्चिमामिमुख दुर्गा प्रतिमा भी उत्तम है। लेकिन उत्तराभिमुख दुर्गा प्रतिमा स्थापना भूल कर भी न करें। निर्णय सिन्धु पृष्ठ 350

यह बिल्वपत्र आदि केवल पूजा में रखी जाने वाली दुर्गा सप्तशती की पुस्तक में सप्तमी तिथि (मूल नक्षत्र) में प्रातः स्थापित कर सरस्वती पूजन करें। पठन-पाठन, पाठ अध्ययन के लिए दुर्गा सप्तशती की दूसरी पुस्तक रखें। निर्णय सिन्धु पृष्ठ 346

 अष्टमी तिथि (पूर्वाषाढ़ नक्षत्र) में प्रातः सरस्वती सरस्वती पूजन, नवमी तिथि (उत्तराषाढ़ नक्षत्र) में प्रातः सरस्वती के निमित्त बलिदान (धार्मिक कर अदायगी) करें, और दशमी तिथि (उत्तराषाढ़ नक्षत्र) में प्रातः सरस्वती विसर्जन करें। निर्णय सिन्धु पृष्ठ 330-331,, प्रातः काल का महत्व, तिथि का ही महत्व पृष्ठ 331,334,
नवरात्र में पूजा ही प्रधान है उपवास आदि तो उसका अङ्ग है। निर्णय सिन्धु पृष्ठ 342
घटस्थापना सूर्योदय से दस घटि के अन्दर ही करें। पृष्ठ 336, रात्रि 
पारण दशमी तिथि में करें पृष्ठ 372

निरयन मेष, कर्क, तुला और मकर संक्रमण का सम्बन्ध चित्रा तारे से है।

00 *क्रान्तिवृत में _चित्रा तारे से 180° पर क्रान्तिवृत का प्रारम्भ बिन्दु है।_ जिसे अश्विन्यादि बिन्दु अर्थात अश्विनी नक्षत्र का प्रारम्भ बिन्दु कहते हैं।*
  *क्रान्तिवृत में चित्रा तारे से 180° पर क्रान्तिवृत का प्रारम्भ बिन्दु को वर्तमान में निरयन मेषादि बिन्दु भी कहा जाता है।*
लेकिन
 *चित्रा तारे से 180° पर अश्विनी नक्षत्र के प्रारम्भ बिन्दु जिसे निरयन मेषादि बिन्दु कहते हैं उस बिन्दु पर वर्तमान में कोई तारा नही है।*  

01 *_जिस समय सूर्य चित्रा तारे से 180° पर होता है_* ;
*तब निरयन मेष संक्रमण कहलाता है।*
 या प्रकारान्तर से 
*_सूर्य केन्द्रीय ग्रहस्पष्ट में भूमि चित्रा तारे के समक्ष चित्रा तारे से 000° का कोण बनाते हैं_*;
 *तब निरयन मेष संक्रमण कहलाता है।*


02 *_जिस समय चित्रा तारे पर भूमि और सूर्य के बीच 270° का कोण बनता है उस समय को निरयन कर्क संक्रमण कहते हैं।_*
प्रकारान्तर से 
*_जिस समय उक्त अश्विन्यादि बिन्दु पर अर्थात निरयन मेषादि बिन्दु पर सूर्य और भूमि का 90° का कोण बनता है तो उस घटना को निरयन कर्क संक्रमण कहते हैं।_*

03 *चित्रा तारे पर क्रान्तिवृत का 180° अर्थात मध्य बिन्दु माना जाता है। चित्रा तारे को ही चित्रा नक्षत्र का भी मध्य बिन्दु कहा जाता है। संयोग से चित्रा नक्षत्र का एक ही तारा होने से चित्रा तारे को ही चित्रा नक्षत्र का भी कहा जाता है। चित्रा तारे को ही निरयन तुला राशि का आदि बिन्दु भी कहा जाता है।*


*_जिस समय सूर्य चित्रा तारे पर होता हैउसे निरयन तुला संक्रमण कहते हैं।_*
और प्रकारान्तर से 
*_सूर्य केन्द्रीय ग्रह स्पष्ट में भूमि चित्रा तारे से 180° पर होती है उसे निरयन तुला संक्रमण कहते हैं।_*


*_जिस समय चित्रा तारे पर भूमि और सूर्य के बीच 90° का कोण बनता है उस समय को निरयन मकर संक्रमण कहते हैं।_*
प्रकारान्तर से 
*_जिस समय उक्त निरयन मेषादि बिन्दु पर सूर्य और भूमि का 270° का कोण बनता है तो उस घटना को निरयन मकर संक्रमण कहते हैं।_*

*आकाश और नक्षत्रों को पहचानने वाले किसान तक भी इस घटना को देख सकते हैं। पुराने किसान इसी आधार पर महिनों का अनुमान भी लगा लेते थे।*
वर्तमान में भी एक एस्ट्रोनॉमर दूसरे एस्ट्रोनामर्स को किसी नये पिण्ड की सूचना देते समय अमुक तारा मण्डल (नक्षत्र) में, कितने अक्षांश (शर) पर कितनी क्रान्ति और अंशो पर स्थित है ऐसे ही सूचित करते हैं। वर्तमान एस्ट्रोनॉमी में तेरह नक्षत्र (राशि Sign) ही माने जाते हैं। जबकि भारत में पहले अभिजित नक्षत्र सहित अट्ठाईस नक्षत्र माने जाते थे। लेकिन अभिजित नक्षत्र का योग तारा लगभग 66° उत्तर में चला गया इसलिए अब सत्ताइस नक्षत्र मानते हैं।
और आधुनिक एस्ट्रोनॉमी की सर्पधारी राशि () Sign चूंकि भचक्र (नक्षत्र पट्टी) से काफी उत्तर में है इसलिए सर्पधारी राशि (Sign) को सिद्धान्त ज्योतिष में मान्यता नहीं मिली। इसी कारण प्लुटो को भी कभी ग्रह नहीं माना गया।

रामायण, महाभारत कालीन काल गणना में सायन/ ट्रॉपिकल पोजीशन (Tropical Position)
 नाक्षत्रीय/ साइडरियल पोजीशन (Sidereal position) दोनों का साथ-साथ उपयोग किया जाता है।
 नक्षत्रों का उल्लेख और स्थिर भचक्र (फिक्स्ड ज़ोडिऐक) में नक्षत्र विशेष के साथ या सामने 180° पर सूर्य-चन्द्र और ग्रहों की स्थिति बतलाया जाना ही नक्षत्रीय पद्धति है। इसका उल्लेख ब्राह्मण, सूत्र ग्रन्थों सभी में है। वाल्मीकि रामायण और महाभारत में भरपूर मात्रा में उल्लेख है।

लेकिन सूर्य- चन्द्रमा, और ग्रह किस प्रधि (Tropical sign) के कितने अंश पर स्थित है यह कहीं पढ़ने में नहीं आया।
जबकि शुल्ब सूत्रों में गणितीय सूत्रों का उल्लेख है। लेकिन ग्रहगणित का नहीं है।

 *खगोलीय पिण्डों (Celestial object) और पातों / नोड्स (Nodes) की स्थिति/ पोजीशन (Position) बतलाने की तीन विधियाँ है -* 
 *१ सायन/ ट्रॉपिकल पोजीशन (Tropical Position)* 
*२ नाक्षत्रीय/ साइडरियल पोजीशन (Sidereal position)* और 
*३ उन्नतांश और दिगंश/ एल्टिट्युड अजिमुथ (Altitude azimuth) पद्धति।*

जिसमें उन्नतांश और दिगंश/ एल्टिट्युड अजिमुथ (Altitude azimuth) पद्धति सबसे नवीन है। लेकिन एविएशन में यही सर्वाधिक उपयुक्त है। इसी प्रकार उपग्रह लॉन्च करते समय भी उन्नतांश और दिगंश/ एल्टिट्युड अजिमुथ (Altitude azimuth) पद्धति का ही उपयोग होता है।

कोई किसी का विकल्प नहीं है।

बुधवार, 7 अक्टूबर 2026

सूतक में पूजन करना चाहिए।

सूतक में भी नवरात्र पूजन पूर्ववत ही करना। केवल मूर्ति पूजा नहीं करना चाहिए।

अशोच (सूतक) में भी केवल मूर्ति को स्पर्श नहीं किया जाता है। लेकिन सन्ध्या, पञ्च महायज्ञ, अष्टाङ्ग योग,पूजन सब नित्य कर्म है।
पुत्र अपने पिता की मृत्यु पर और पुत्र की मृत्यु पर उस बालक के पिता स्वयम् तेरह दिनों तक नित्य विष्णु पूजन करेंगे, धूप देंगे। तो अन्य लोगों को पूजा करने से रोकना यह शास्त्र नीति नहीं है; केवल लोकरीति है।
सूर्यग्रहण में भी ग्रहण अवधि में जप किए जाते हैं। जबकि, उस अवधि को भी सूतक ही कहते हैं।
दूर्गा सप्तशती/ प्रथम चरीत्र में भगवान नारायण की योगनिद्रा की अवतार ही मध्यम चरीत्र की महिषासुर मर्दिनी महालक्ष्मी अवतार कही गई है। उन्ही ने देवताओं को आशीर्वाद दिया था और वचन दिया था कि, तुम जब भी पुकारोगे तुम्हारे संकट हरनें में आऊँगी।
इसीलिए जब उत्तर चरीत्र में देवताओं ने जब हिमालय पर देवी की स्तुति की तभी देवी पार्वती देवताओं से पूछतीं है कि, तु लोग किसकी स्तुति कर रहे हो; तो वे योगनिद्रा देवी तुरन्त पार्वती के शरीर कोश से प्रकट होकर प्रकट होकर पार्वती जी को उत्तर देतीं है कि, ये सब देवता मेरी स्तुति कर रहे हैं।
पार्वती जी के शरीर कोश से उत्पन्न होने के कारण वे कोशिकी कहलाई।
उन्ही से उत्पन्न नौ देवियों द्वारा निशुम्भ की सेना से युद्ध कर रही थी तब निशुम्भ ने उलाहना दिया कि, तुम इन सब देवियों की सहायता से लड़ रही हो। तो देवी कोशिकी कहतीं हैं कि, ये सब तो मेरे ही स्वरूप हैं। और सभी देवियाँ कोशिकी में समा जाती हैं।
मतलब सभी देवियाँ भगवान श्रीमन्नारायण की योग निद्रा का ही स्वरूप है।
जब हम दस दिन सूतक में उनके स्वामी भगवान विष्णु की पूजा करते हैं तो , माता जी की पूजन का निषेध तो सम्भव ही नहीं है।

लोग पढ़ते तो हैं नहीं बस मेरे पिताजी ऐसा करते थे, मेरी सास ऐसा करती थीं इसलिए मुझे भी यही करना है।

जबकि, उपनिषद में समावर्तन संस्कार के समय गुरुकुल के शिष्यों को आचार्य का वचन स्पष्ट है कि, हमने जो या जैसा किया उसे भूलकर हमने जो कहा उसी का पालन करना।

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

श्रेय और कल्याण का मार्ग

यजुर्वेद अध्याय 40 मन्त्र प्रथम एवम् द्वितीय --

जगत में जो कुछ भी है वह सब परमात्मा के ॐ संकल्प के साथ परमात्मा का प्रज्ञात्मा परब्रह्म परमेश्वर परम पुरुष विष्णु स्वरूप से व्याप्त है, आच्छादित है। सब-कुछ विष्णुमय है।

विवेचना --चूंकि यहाँ सम्पूर्ण जगत (परा प्रकृति माया) को व्याप्त करने का और ईश शब्द का प्रयोग हुआ है इसलिए विष्णु अर्थ ही सार्थक सिद्ध होता है।
इसलिए जगत का अनासक्त भाव से भोग सिमीत अत्यावश्यक होने पर उतनी ही मात्रा में करना उचित है जितना शरीर निर्वाह हेतु आवश्यक है। भोजन और भोग किया जाए ठूँसा नहीं जाए। भोग को लक्ष्य नहीं साधन समझा जाए।
परमात्मा के द्वारा निर्मित यह जगत स्वयम् विनाशशील है। इसलि एदुसरे के पास की विश्व की किसी चीज के प्रति आकर्षित न हो,  किसी के धन का लोभ न करें।
इस प्रकार सदैव केवल निष्काम भाव से शास्त्रोक्त सौद्देश्य कर्म केवल शास्त्रोक्त विधि से ही करते रहें। यही एकमात्र श्रेय और कल्याण का मार्ग है।

सोमवार, 5 अक्टूबर 2026

श्री किरित चन्दुलाल मेहता, स्वामी शंकरदेव जी, उनके शिष्य स्वामी, दिव्य फार्मेसी, स्वामी कर्मवीर, बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण, पतञ्जलि, राजीव दीक्षित, राष्ट्रीय स्वाभिमान ट्रस्ट का इतिहास ।


आस्था चेनल 

श्री किरित चंदूलाल मेहता की आस्था चैनल जिसने बाबा रामदेव को प्रमोट कर प्रसिद्ध कर दिया उसीपर दिव्य फार्मेसी और पतञ्जलि का कब्जा होना भी विचारणीय विषय है।


स्वामी शंकरदेव जी महाराज।
स्वामी शंकरदेव जी महाराज पतंजलि वाले बाबा रामदेव जी के संन्यास दीक्षा गुरु हुए थे।

स्वामी शंकरदेव जी महाराज ने कनखल में दिव्य फार्मेसी शुरू की थी, जो बाद में दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट बनी। वहीं से आयुर्वेदिक दवाइयाँ और योग का प्रचार शुरू हुआ। बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण शुरुआती दिनों में इसी आश्रम के दो कमरों में रहते थे और साइकिल से दवाइयाँ बेचते थे।

 14 जुलाई 2007 को सुबह टहलने के लिए निकले और फिर लौटे नहीं। कृपालु बाग आश्रम से रहस्यमय हालात में लापता हो गए। काफी खोज के बाद आचार्य बालकृष्ण ने कनखल थाने में गुमशुदगी दर्ज कराई। पुलिस को कोई सुराग नहीं मिला तो मामला सीबीआई को सौंप दिया गया।
उनके शिष्य स्वामी कर्मवीर ने अपनी किताब 'प्राण साधना एवं योग रहस्य' में लिखा है कि लापता होने से 2 दिन पहले शंकरदेव जी ने उनसे फोन पर कहा था - *'मैं आश्रम की कुछ गतिविधियों से बहुत निराश हूँ, मेरे साथ कोई भी अनहोनी हो सकती है, शायद मेरी आपसे अंतिम बात होगी'*। 

स्वामी कर्मवीर के अनुसार उनका आज तक शव नहीं मिला और न ही मृत्यु का कारण पता चला। सीबीआई आज भी इस मामले की जांच में लगी हुई है।

अपने आखिरी दिनों में स्वामी शंकरदेव जी महाराज बहुत सादगी और तंगहाली में रहते थे। आश्रम के गत्ते-बोरे तक खुद कबाड़ी को बेचते थे। 

श्री राजीव दीक्षित।

 *2009 ईस्वी मे श्री राजीव दीक्षित बाबा रामदेव के संपर्क मे आए और बाबा रामदेव को देश की गंभीर समस्याओ और उनके समाधानो से परिचित करवाया और विदेशो मे जमा कालेधन आदि के विषय मे बताया और उनके साथ मिल कर आंदोलन को आगे बढाने का फैसला किया। आजादी बचाओ के कुछ कार्यकर्ता राजीव दीक्षित के इस निर्णय से सहमत नहीं थे। फिर भी राजीव दीक्षित ने 5 जनवरी 2009 को भारत स्वाभिमान आंदोलन की नीव रखी। जिसका मुख्य उदेश्य लोगो को अपनी विचार धारा से जोडना, उनको देश की मुख्य समस्याओ का कारण और समाधान बताना। योग और आयुर्वेद से लोगो को निरोगी बनाना और भारत स्वाभिमान आंदोलन के साथ जोड कर 2014 मे देश से अच्छे लोगो को आगे लाकर एक नई पार्टी का निर्माण करना था जिसका उदेश्य भारत मे चल रही अँग्रेजी व्यवस्थाओ को पूर्ण रूप से खत्म करना, विदेशो मे जमा काला धन वापिस लाना, गौ हत्या पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगाना, और एक वाक्य मे कहा जाए ये आंदोलन सम्पूर्ण आजादी को लाने के लिए शुरू किया गया था ।*

*29 नवंबर 2010 को छतीसगढ के दुर्ग जिले मे पहुंचे । उनके साथ छतीसगढ के राज्य प्रभारी दया सागर और कुछ अन्य लोग साथ थे । दुर्ग जिले मे उनकी दो विशाल जन सभाए आयोजित थी पहली जनसभा तहसील बेमतरा मे सुबह 10 बजे से दोपहर 01 बजे तक थी। राजीव दीक्षित ने विशाल जन सभा को आयोजित किया । इसके बाद का कार्यक्रम साय 04 बजे दुर्ग मे था। जिसके लिए वह दोपहर 02 बजे बेमेतरा तहसील से रवाना हुए ।*

 *(इसके बाद की सारी घटना उस समय उपस्थित छतीसगढ के प्रभारी दयासागर और कुछ अन्य साथियो द्वारा बताई गई है)*

*उन लोगो का कहना है गाडी मे बैठने के बाद श्री राजीव दीक्षित जी का शरीर पसीना पसीना हो गया । दयासागर ने राजीव दीक्षित जी से पूछा तो जवाब मिला की मुझे थोडी गैस सीने मे चढ गई है शोचालय जाऊँ तो ठीक हो जाऊंगा । फिर श्री दयासागर तुरंत उनको दुर्ग के अपने आश्रम मे ले गए वहाँ राजीव दीक्षित  जी शोचालय गए और जब कुछ देर बाद बाहर नहीं आए तो दयासागर जी ने उनको आवाज दी राजीव भाई ने दबी दबी आवाज मे कहा गाडी स्टार्ट करो मैं निकल रहा हूँ । जब काफी देर बाद राजीव दीक्षित जी बाहर नहीं आए तो दरवाजा खोला गया राजीव दीक्षित जी पसीने से लथपत होकर नीचे गिरे हुए थे । उनको बिस्तर पर लिटाया गया और पानी छिडका गया दयासागर जी ने उनको अस्पताल चलने को कहा । राजीव भाई ने मना कर दिया उन्होने कहा होमियोपैथी डॉक्टर को दिखाएंगे ।*

*थोडी देर बाद होमियोपैथी डॉक्टर आकर उनको दवाइयाँ दी । फिर भी आराम ना आने पर उनको भिलाई के सेक्टर 9 मे इस्पात स्वयं अस्पताल मे भर्ती किया गया । इस अस्पताल मे अच्छी सुविधाइए ना होने के कारण उनको अपोलो बी. एस. आर. मे भर्ती करवाया गया । राजीव भाई एलोपेथी चिकित्सा लेने से मना करते रहे । उनका संकल्प इतना मजबूत था कि वो अस्पताल मे भर्ती नहीं होना चाहते थे। उनका कहना था कि सारी जिंदगी एलोपेथी चिकित्सा नहीं ली तो अब कैसे ले लू ? ऐसा कहा जाता है कि इसी समय बाबा रामदेव ने उनसे फोन पर बात की और उनको आईसीयु मे भर्ती होने को कहा।*

*फिर राजीव भाई 5 डॉक्टरों की टीम के निरीक्षण मे आईसीयु भर्ती करवाएगे । उनकी अवस्था और भी गंभीर होती गई और रात्रि एक से दो के बीच डॉक्टरों ने उन्हे मृत घोषित किया ।*
*30 नवम्बर 2010 को दीक्षित को अचानक दिल का दौरा पड़ने के बाद पहले भिलाई के सरकारी अस्पताल ले जाया गया। उसके बाद अपोलो बी. एस. आर. अस्पताल में दाखिल कराया गया। उन्हें दिल्ली ले जाने की तैयारी की जा रही थी, लेकिन इसी दौरान स्थानीय डाक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। डाक्टरों का कहना था कि उन्होंने ऍलोपैथिक इलाज से लगातार परहेज किया। चिकित्सकों का यह भी कहना था कि राजीव दीक्षित जी आयुर्वेदिक दवाओं के लिये अड़े हुए थे। अस्पताल में कुछ दवाएँ और इलाज से वे कुछ समय के लिये बेहतर भी हो गये थे मगर रात में एक बार फिर उनको गम्भीर दौरा पड़ा जो उनके लिये घातक सिद्ध हुआ।*

 *राजीव दीक्षित जी की मृत्यु का कारण दिल का दौरा बता कर सब तरफ प्रचारित किया गया । 30 नवंबर 2010 को उनके मृत शरीर को पतंजलि, हरिद्वार लाया गया जहां हजारो की संख्या मे लोग उनके अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे । और 01 दिसंबर 2010 को राजीव दीक्षित जी का दाह संस्कार कनखल हरिद्वार मे किया गया ।*

*राजीव दीक्षित जी के चाहने वालों का कहना है कि अंतिम समय मे राजीव दीक्षित जी का चेहरा पूरा हल्का नीला, काला पड गया था । उनके चाहने वालों ने बार-बार उनका पोस्टमार्टम करवाने का आग्रह किया लेकिन पोस्टमार्ट्म नहीं करवाया गया ।  

*राजीव दीक्षित जी की मृत्यु से जुडे कुछ सवाल।*

*किसके आदेश पर ये प्रचारित किया गया ? कि राजीव दीक्षित की मृत्यु दिल का दौरा पडने से हुयी है ?*

*29 नवंबर 2010 को दोपहर 2 बजे बेमेतरा से निकलने के पश्चात जब उनको गैस की समस्या हुए और रात 2 बजे जब उनको मृत घोषित किया गया इसके बीच मे पूरे 12 घंटे का समय था 12 घंटे मे मात्र एक गैस की समस्या का समाधान नहीं हो पाया ?*

*आखिर पोस्ट मार्टम करवाने मे क्या तकलीफ थी ?*

*राजीव दीक्षित का फोन जो हमेशा आन रहता था उस 2 बजे बाद बंद क्यों था ?*

*राजीव दीक्षित के पास एक थैला रहता था जिसमे वो हमेशा आयुर्वेदिक, होमियोपैथी दवाएं रखते थे वो थैला खाली क्यों था ?*

*30 नवंबर 2010 को जब उनको पतञ्जलि योगपीठ मे अंतिम दर्शन के लिए रखा गया था उनके मुंह और नाक से क्या टपक रहा था उनके सिर को माथे से लेकर पीछे तक काले रंग के पालिथीन से क्यूँ ढका था ?*

*राजीव दीक्षित की अंतिम विडियो जो आस्था चैनल पर दिखाई गई तो उसको एडिट कर चेहरे का रंग सफेद कर क्यों दिखाया गया ?? अगर किसी के मन को चोर नहीं था तो विडियो एडिट करने की क्या जरूरत थी ?*

*अंत पोस्टमार्टम ना होने के कारण उनकी मृत्यु आजतक एक रहस्य ही बन कर रह गई ।*

*राजीव दीक्षित के कई समर्थक उनके जाने के बाद बाबा रामदेव से काफी खफा है क्योंकि बाबा रामदेव अपने एक व्याख्यान मे कहा कि राजीव दीक्षित को हार्ट ब्लोकेज था, शुगर की समस्या थी, बी.पी. भी था राजीव दीक्षित पतञ्जलि योगपीठ की बनी दवा मधुनाशनी खाते थे । जबकि राजीव भाई खुद अपने एक व्याख्यान मे बता रहे हैं कि उनका शुगर, बीपी, कोलेस्ट्रोल सब नार्मल है । वे पिछले 20 साल से डॉक्टर के पास नहीं गए ! और अगले 15 साल तक जाने की संभावना नहीं ।*

और 
*राजीव दीक्षित के चाहने वालो का कहना है कि हम कुछ देर के लिए राजीव दीक्षित जी की मृत्यु पर प्रश्न नहीं उठाते लेकिन हमको एक बात समझ नहीं आती कि पतञ्जलि योगपीठ वालों ने राजीव दीक्षित जी की मृत्यु के बाद उनको तिरस्कृत करना क्यों शुरू कर दिया ?*

*मञ्चो के पीछे उनकी फोटो क्यों नहीं लगाई जाती ?*

*आस्था चैनल पर उनके व्याख्यान दिखाने क्यों बन्द कर दिये गए ?* 
*कभी साल अगर उनकी पुण्यतिथि पर व्याख्यान दिखाये भी जाते है तो वो भी 2-3 घण्टे के व्याख्यान को काट काट कर एक घण्टे का बनाकर दिखा दिया जाता है ।*

इसके अतिरिक्त उनके कुछ समर्थक कहते हैं कि ;
*भारत स्वाभिमान आन्दोलन की स्थापना जिस उदेश्य के लिए हुए थी राजीव दीक्षित जी की मृत्यु के बाबा रामदेव उस राह हट क्यों गए ।*

*राजीव दीक्षित जी और बाबा रामदेव खुद कहते थे कि सब राजनीतिक पार्टियां एक जैसी है हम 2014 मे अच्छे लोगो को आगे लाकर एक नया राजनीतिक विकल्प देंगे । लेकिन राजीव दीक्षित जी की मृत्यु के बाद बाबा रामदेव ने भारत स्वाभिमान के आंदोलन की दिशा बदल दी और राजीव दीक्षित जी की सोच के विरुद्ध आज वो भाजपा सरकार का समर्थन कर रहें । इसलिए बहुत से राजीव दीक्षित जी के चाहने वाले भारत स्वाभिमान से हट कर अपने अपने स्तर पर राजीव दीक्षित जी का प्रचार करने मे लगे हैं ।*

राजीव दीक्षित जी ने अपने पूरे जीवन मे देश भर मे घूम घूम कर 5000 से ज्यादा व्याख्यान दिये। सन 2005 तक वह भारत के पूर्व से पश्चिम उत्तर से दक्षिण चार बार भ्रमण कर चुके थे । उन्होने विदेशी कम्पनियो की नाक मे दम कर रखा था ।

*भारत के किसी भी मीडिया चैनल ने उनको दिखाने का साहस नहीं किया । क्योकि वह देश से जुडे ऐसे मुद्दो पर बात करते थे की एक बार लोग सुन ले तो देश मे 1857 से बडी क्रांति हो जाती।*