1 आर्य समाजी ॐ को देवनागरी में जैसा लिखा जाता है वैसा ही पढ़ा जाता है के आधार पर ओ३म् लिखते हैं। जबकि मैं ॐ ही लिखता हूँ।
2 महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी देव, देवता, सिद्ध, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर , नाग,असुर, दैत्य, दानव, राक्षस आदि योनि नहीं मानते थे। देवलोक, पाताल, नर्क आदि भी नहीं मानते थे।
लेकिन मैं मानता हूँ।
3 महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी राम कृष्ण आदि को केवल महा पुरुष मानते थे। मैं उर्ध्व लोक के सिद्ध पुरुषों को ऋत के नियमों के अनुसार निर्धारित कार्य पूर्ण करने के लिए जन्मे अलोकिक व्यक्ति मानता हूँ।
4 महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ईश्वर, जीव और प्रकृति को अनादि मानते थे।
त्रेतवादी थे। जीवों की संख्या अनन्त लेकिन निश्चित मानते थे।
ईश्वर की प्रेरणा से गुण साम्यावस्था वाली प्रकृति में विक्षोभ होने से सत्व, रज और तमोगुण प्रकट हुए।
इन्हीं से जगत और जीवों की देह बनी।
वैदिक अभेदवादी मैं परमात्मा का ही लीला में सर्वरूपों में प्रकटीकरण मानता हूँ।
परमात्मा के विश्वात्मा ॐ सङ्कल्प से परमात्मा प्रज्ञात्मा परब्रह्म परमेश्वर परम दिव्य पुरुष विष्णु और परा प्रकृति माया के रूप में प्रकट होकर स्वयम् ही प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) ब्रह्म पुरुष प्रभविष्णु (सवितृ) और प्रकृति श्री लक्ष्मी ( सावित्री) के स्वरूप में प्रकट होकर जीवात्मा अपर ब्रह्म नारायण जीव श्री हरि और नारायणी परा प्रकृति कमला (पद्मा) के स्वरूप में प्रकट होते हैं और अपः तत्व की सृष्टि करते हैं। फिर भूतात्मा वाणी हिरण्यगर्भ ब्रह्मा प्राण (चेतना या देही) त्वष्टा और धारयित्व (धृति या अवस्था) रचना के स्वरूप में प्रकट होते हैं तथा त्वष्टा ने सृष्टि के ब्रह्माण्डो के भुवनों के सूर्य और ग्रह आदि की रचना करते हैं। फिर वाणी हिरण्यगर्भ सनक, सनन्दन, सनत्कुमार, सनातन और नारद को प्रकट करते हैं। फिर वाणी हिरण्यगर्भ ब्रह्मा अर्धनारीश्वर एक रुद्र को प्रकट करते हैं। फिर धर्म और धृति तथा काम और रति को प्रकट करते हुए स्वयम्
सूत्रात्मा प्रजापति ब्रह्मा और सरस्वती के स्वरूप में प्रकट होते हैं। सूत्रात्मा ओज और कान्ति दक्ष प्रथम प्रसुति, रुचि - आकुति, कर्दम-देवहुति, स्वायम्भुव मनु-शतरूपा तथा शंकर- उमा की जोड़ियाँ प्रकट करते हैं।
ये जोड़ियाँ ही मैथुनिक सृष्टि प्रारम्भ करते हैं।
फिर प्रजापति सृष्टि ब्रह्माण्डों के भुवनों में लोक स्थापित करते हैं।
इन्हीं में हमारे अठारह भुवन और सोलह लोक भी सम्मिलित हैं।
भुवन मतलब आवास योग्य भूमि और लोक मतलब भुवन में जहाँ जीवों के वास होने से जैविक चेतना से भुवन आलोकित हो।
फिर प्रजापति और सरस्वती और (1)मरीची-सम्भूति, (2) भृगु-ख्याति, (3) अङ्गिरा-स्मृति, (4) वशिष्ट-ऊर्ज्जा, (5) अत्रि-अनसुया, (6) पुलह-क्षमा, (7) पुलस्य-प्रीति, (8) कृतु-सन्तति भू स्थानीय प्रजापतियों को जन्म देते हैं।स्वायम्भुव मन्वन्तर के सभी ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मण इन्हीं की सन्तान थे। और इन्हीं के गुरुकुल में शिक्षित थे।
फिर प्रजापति ने स्वयम् को अणुरात्मा वाचस्पति और वाक के स्वरूप में प्रकट किया। ये ही स्वर्गलोक के प्रजापति इन्द्र (तेज) और शचि (विद्युत) के स्वरूप में प्रकट हुए।
वाचस्पति और वाक ने अग्नि और स्वाहा तथा पितरः और स्वधा को प्रकट किया।
तथा वायु और शिवा को भी प्रकट किया।
अग्नि से तीन+तीन अर्थात छ: अग्नि हुए। इन छहों अग्नि के सात सात पुत्र हुए इस प्रकार उनचास अग्नि हो गये।
ऐसे ही पितरः के तीन+ तीन छः पितर हुए। जिसमें (१) अग्निष्वात (२) बहिर्षद और (३) कव्यवाह तीन निराकार और (४) अर्यमा, (५) अनल (६) सोम और (७) यम चार साकार हैं। अर्यमा मुख्य हैं इन्हीं की पत्नी स्वधा है।
ऐसे ही वायु के भी तीन+तीनः वायु हुए। उन छहों के सात- सात पुत्र हुए। ये ही आंधी, तुफान, झंझावात के देवता उनचास मरुद्गण कहलाये। मुख्य मरुद्गण (1) आवह, (2) प्रवह, (3) संवह, (4) उद्वह, (5) विवह, (6) परिवह और (7) परावह है। ये सातों सैन्य प्रमुख के समान गणवेश धारण करते है।
वाचस्पति स्वयम् विज्ञानात्मा ब्रह्मणस्पति और सुनृता के स्वरूप में प्रकट होते हैं। ये ब्राह्मणों के अध्यक्ष कहे जाते हैं। वेद मन्त्रों को ब्रह्म कहते हैं। और सभी मन्त्रों के ये दृष्टा हैं।
विज्ञानात्मा ब्रह्मणस्पति और सुनृता से चित्त और चेत द्वादश आदित्य प्रकट हुए।
(1) विष्णु, (2) सवितृ, (3) त्वष्टा, (4) इन्द्र, (5) वरुण, (6) विवस्वान, (7) पूषा, (8) भग, (9) अर्यमा, (10) मित्र, (11) अंशु और (12) धातृ।
फिर ब्रह्मणस्पति स्वयम् ज्ञानात्मा ब्रहस्पति और तारा के स्वरूप में प्रकट हुए। ज्ञानात्मा ब्रहस्पति से बुद्धि और बोध आठ वसु हुए।
(1) प्रभास, (2) प्रत्युष, (3) धर्म, (4) ध्रुव, (5) अर्क, (6) अनिल, (7) अनल और (8) अप् ।
ज्ञानात्मा ब्रहस्पति स्वयम् लिङ्गात्मा पशुपति के स्वरूप में प्रकट हुए।
लिङ्गात्मा पशुपति से अहंकार और अस्मिता एकादश रुद्र हुए।
(1) हर, (2) त्र्यम्बकं, (3) वृषाकपि, (4) कपर्दी, (5) अजैकपात, (6) अहिर्बुधन्य, (7) अपराजित, (8) रैवत, (9) बहुरूप, (10) कपाली और (11) शम्भु (शंकर)।
लिङ्गात्मा पशुपति स्वयम् मनसात्मा गणपति के स्वरूप में प्रकट हुए। ये गणपति लम्बोदर गजानन विनायक से अलग हैं। कबिलों को गण कहते हैं। गणों के अध्यक्ष गणराज्य के नायक गणपति कहलाते हैं।
लिङ्गात्मा गणपति से मन और संकल्प सोम राजा और वर्चा प्रकट हुए।
मनसात्मा गणपति ने स्वयम् को स्व सदसस्पति और स्वभाव मही के स्वरूप में प्रकट हुए।
स्वभाव मही स्वयम् सात्विक स्वभाव स्वाहा भारती, राजसी स्वभाव वषट सरस्वती और तामसी स्वभाव स्वधा इळा (इला या तृण देवी इरा) के स्वरूप में प्रकट हुई।
इन्हीं से यह भौतिक पदार्थ और भौतिक जगत उत्पन्न हुआ। शरीर बने।
5 महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने पञ्च महायज्ञ को आवश्यक तो माना लेकिन योग साधना पर अधिक जोर दिया।
मेरा मत है कि, वेदों और ब्राह्मण ग्रन्थों के अनुसार पञ्च महायज्ञ के ब्रह्म यज्ञ के अन्तर्गत ही अष्टाङ्ग योग अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह (पञ्चयम/ धर्म), शोच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान (पञ्च नियम/ अनुशासन), चौरासी आसन (शरीर की स्थिरता), प्राणायाम (स्व नियन्त्रित श्वास-प्रश्वास के माध्यम से समस्त शारीरिक अन्तःक्रियाएँ स्व नियन्त्रण में लाकर, प्रत्याहार के माध्यम से मन का इन्द्रियों की ओर भटकाव स्व नियन्त्रण में लेकर स्वस्थ्य तन- मन प्राप्त कर धारणा द्वारा सिखी गई शिक्षा धारण करते हुए स्वाध्याय, वेद पाठ, वेदाध्ययन, सन्ध्योपासना, कर ध्यान पूर्वक गायत्री मन्त्र जप करना। ब्रह्मचर्य आश्रम में यह अभ्यास आदत में ढालना, मसल्स मेमोरी में उतार देना। फिर देव यज्ञ से आत्म समर्पण/ ईश्वर प्रणिधान हो पाता है। भूत यज्ञ से प्रकृति के प्रति कर्तव्य पालन और अतिथि यज्ञ से मानवों के प्रति कर्तव्य भावना जागृत होती है। पितृ यज्ञ श्राद- तर्पण, और सामाजिक कार्यों में सहयोग कर के सामाजिकता आती है।इस प्रकार ग्रहस्थाश्रम में पञ्च महायज्ञ स्वाभाविक रूप से हो पाएँगे।
वानप्रस्थ आश्रम में अध्ययन- अध्यापन, ध्यान - समाधि अभ्यास, संयम (कुछ ही समय में धारणा-ध्यान- समाधि में स्थित होकर)
संयम से तन्मयता प्राप्त कर वाञ्छित जानकारी और ज्ञान प्राप्त कर लिया जाता है।
इस प्रकार परमात्मा में तन्मय होकर आत्मज्ञान प्राप्त होता है।
पञ्च महायज्ञ सम्पूर्ण स्वस्थ्य और स्वस्थ जीवन प्रणाली है।
6 महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी विवाह में वर की आदर्श अवस्था (वय) 48 वर्ष और वधू की वय (अवस्था) 16 वर्ष मानते थे।
जबकि मैं विवाह में वर की आदर्श वय (अवस्था) 24-25 वर्ष और वधू की आदर्श अवस्था (वय) 21-22 वर्ष मानता हूँ।
48 वर्ष तक ब्रह्मचर्य पालन करने वाले पुरुष को विवाह करने की आवश्यकता ही नहीं रहती है।
7 महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी विधवा विवाह को अनुचित नहीं मानते थे।
श्रद्धानन्द जी ने तो विधवा विवाह को सामाजिक आन्दोलन में सम्मिलित कर लिया।
लेकिन महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी नियोग को भी उचित मानते थे।
जबकि मैं नियोग से पूर्णतः असहमत हूँ।
यदि पुत्र ही इकलौती सन्तान हो। और उसकी निःसंतान नव विवाहिता वधु विधवा हो जाए, तो उसका पुनर्विवाह कर उसकी सन्तान को गोद लेना नियोग की तुलना में अनन्त गुना श्रेष्ठ होगा।