सोमवार, 14 सितंबर 2026

प्रति वर्ष अधिकांश व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहारों एक दो दिन या एक माह का अन्तर क्यों आता है - इसका कारण और निवारण।

प्रति वर्ष अधिकांश व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहारों एक दो दिन या एक माह का अन्तर क्यों आता है - इसका कारण और निवारण।

1 गणितागत मतभेद ---
वेधशाला से प्राप्त आकड़ों (डेटा) पर आधारित वेधतुल्य पञ्चाङ्गो में भी दो मत हैं।

(क) *भारत में  प्रचलित नक्षत्रीय पद्यति पर आधारित निरयन सौर संक्रमण आधारित निरयन सौर मास और निरयन चन्द्रमा के आधार पर निरयन सौर-चान्द्रमासों वाले पञ्चाङ्ग। ये प्रायः लाहिरी अयनांश के आधार पर ही निकलते हैं। लेकिन कुछ शुद्ध चित्रा पक्षीय अयनांश के आधार पर भी निवलते हैं।*
*लाहिरी अयनांश और शुद्ध चित्रा पक्षीय अयनांश में 22 मार्च 285 ईस्वी को मात्र 03" विकला का अन्तर था जो वर्तमान में चित्रा तारे के निरन्तर विचलन के परिणाम स्वरूप लगभग 01' कला (अर्थात 60 विकला) से अधिक का अन्तर हो गया है। लेकिन भारतीय ज्योतिषी इसे नगण्य मानते हैं।*
(ख) उक्त दृग्तुल्य पञ्चाङ्गो के अतिरिक्त कुछ स्थानीय स्तर पर सूर्य सिद्धान्त के मकरन्द और ग्रह लाघव नामक करण ग्रन्थों पर आधारित स्थूल गणित वाले पञ्चाङ्ग भी प्रचलित हैं। जिनके निरयन सौर संक्रमण, और निरयन चन्द्रमा तथा निरयन ग्रहों की स्थिति प्रायः गलत ही होती है। परिणाम स्वरूप सूर्य के निरयन संक्रमण का समय तथा तिथि और  चन्द्रमा के नक्षत्र का प्रारम्भ और समाप्ति का समय भी गलत ही रहता है। गुरु बृहस्पति एवम् शुक्र का अस्त और उदय का दिन और समय भी गलत ही रहता है। इसलिए व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार भी प्रायः गलत ही रहते हैं। कई बार अधिक मास भी गलत ही बतलाइए थे।
लेकिन ग्रहगणित ज्योतिष (सिद्धान्त ज्योतिष अर्थात एस्ट्रोनॉमी) का ज्ञान नहीं होने के कारण मन्दिरों के पुजारियों का समर्थन इन परम्परागत पञ्चाङ्ग को अभी तक प्रचलन में बनाए हुए हैं।
(ग) ऐसे ही गुजरात में किसी अन्य करण ग्रन्थ के आधार पर पञ्चाङ्ग निकलते हैं
पहले महाराष्ट्र में लोकमान्य बालगङ्गाधर तिळेक के गणित के आधार पर श्री मोरोपन्त छत्रे, लगभग 04° अंश कम वाला झीटापक्षीय अयनांश पर पञ्चाङ्ग निकालते थे। जो कभी भी लोकप्रचलित नहीं हो पाया। इसकी वर्तमान स्थिति ज्ञात नहीं है।

*पञ्चाङ्गो में उक्त गणितीय त्रुटि के अलावा धर्मशास्त्रिय मत भिन्नता महत्वपूर्ण कारण है।
इसे समझने के लिए कुछ पारिभाषिक शब्दावली और कुछ तथ्यों का ज्ञान आवश्यक है।*

*निरयन सौर मास - अर्थात जिस निरयन राशि में सूर्य स्थित हो उसे सौर माह कहते हैं।
चन्द्रमा जिस नक्षत्र में स्थित हो उसे नक्षत्र कहते हैं।*
*चान्द्र सौर मास जिसे प्रायः चान्द्रमास ही लिख देते हैं - अमावस्या समाप्ति समय से अमावस्या समाप्ति समय तक अमान्त चान्द्रसौर मास (अंग्रेजी में लूनी-सोलर मन्थ) या चान्द्र मास या अमान्त मास कहलाता है।*
*पूर्णिमा समाप्ति समय से पूर्णिमा समाप्ति समय तक पूर्णिमान्त मास कहलाता है।*

*सूर्य से चन्द्रमा की प्रत्येक बारह अंश (डिग्री) का अन्तर तिथि कहलाती है।*
और
*दो सूर्योदय के बीच का समय वार कहलाता है। अर्थात वार सूर्योदय से बदलता है।*  (न कि, ब्रह्म मुहूर्त या मध्यरात्रि से।)
*ऐसे ही सूर्योदय पश्चात छः घटि अर्थात 02 घण्टे 24 मिनट अर्थात तीन मुहूर्त तक जो तिथि रहे वह शाकल्यपादिता तिथि कहलाती है। और बहुत से धार्मिक कार्यों, व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार आदि में उक्त शाकल्यपादिता तिथि को पूरे दिन-रात वही तिथि है ऐसा मान लिया जाता है। कुछ प्रकरणों में 04 घण्टे 48 मिनट अर्थात छः मुहूर्त व्यापिनी तिथि को पूरे दिन माना जाता है।*
*कुछ व्रत सूर्योदय के समय जो तिथि रहती है उस सूर्योदय व्यापिनी  तिथि के अनुसार इस लिए मनाए जाते हैं क्योंकि उन व्रत पर्व में मुख्य पूजा सूर्योदय के समय ही होती है। अर्थात उन व्रत पर्वों का पर्वकाल ही सूर्योदय का समय होता है।* *लेकिन यह नियम सभी व्रत पर्व, उत्सव और त्यौहारों में इसलिए लागू नहीं होता है क्योंकि, सभी व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहारों का पर्वकाल अलग-अलग होता है।*
*कोई प्रातः काल व्यापिनी तिथि में मनाते हैं तो कुछ पूर्वाह्न व्यापिनी तिथि में मनाते हैं, तो कोई मध्याह्न काल व्यापिनी तिथि में मनाते हैं तो कुछ अपराह्न काल व्यापिनी तिथि में मनाते हैं। कोई सूर्यास्त कालीन तिथि में मनाते हैं तो कुछ  प्रदोषकाल व्यापिनी तिथि में मनाते हैं तो कुछ पूर्व रात्रि व्यापिनी तिथि में मनाते हैं। कुछ मध्यरात्रि कालीन तिथि में मनाते हैं तो कुछ महानिशिथ काल व्यापिनी तिथि में मनाते हैं। कुछ तो उत्तर रात्रि कालीन तिथि में तो कुछ अरुणोदय कालीन व्यापिनी तिथि अर्थात ब्रह्म मुहूर्त मे जो तिथि हो उसमें मनाते हैं। तो कुछ चन्द्रोदय कालीन तिथि में मनाते हैं। ये सब पर्वकाल कहलाते हैं।*
*पर्वकाल के विषय में भी पौराणिक साहित्य में मतभेद के कारण धर्मशास्त्र पर निबन्धकारों ने अलग-अलग मत व्यक्त किए हैं। यह बहुत गहन विषय है।*

*इसके अलावा दक्षिण भारत में निरयन सौर मास में चन्द्रमा का नक्षत्र के आधार पर व्रत, पर्व उत्सव और त्यौहार मनाये जाते हैं वहाँ सौर- चान्द्रमास (लूनी-सोलर मन्थ) का उपयोग न के बराबर बहुत कम होता है। इसलिए तिथियाँ भी लगभग अप्रचलित है।*
*जैसे निरयन मेष राशि के सूर्य में अर्थात मेष मास में पुनर्वसु नक्षत्र में श्रीराम जयन्ती मनाते हैं और  निरयन सिंह राशि के सूर्य (सिंह मास) में रोहिणी नक्षत्र में श्रीकृष्ण जयन्ती मनाते हैं। और निरयन सिंह राशि के सूर्य (सिंह मास) में श्रवण नक्षत्र में वामन जयन्ती ओणम नाम से मनाते हैं। 
फिर उसमें भी आचार्यों के सम्प्रदाय के अनुसार मतभेद हैं जैसे कुछ सूर्योदय कालीन चन्द्र नक्षत्र देखकर व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार मनाते हैं तो कुछ पूर्वकालीन चन्द्र नक्षत्र के अनुसार व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार मनाते हैं।*
*यह मतभेद उत्तर भारत में भी वैष्णव सम्प्रदायों में प्रचलित है। उत्तर भारत में भी कुछ सूर्योदय कालीन (उदिया) तिथि के अनुसार व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार मनाते हैं तो विष्णु, देवी शंकर, सूर्य और गणपति पाँचो देवों को पूजने वाले स्मार्त मतावलम्बी पूर्वकालीन तिथि के अनुसार व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार मनाते हैं।*
*सौर-चान्द्रमासों में तिथि के साथ-साथ पर्वकाल में चन्द्रमा के नक्षत्र के अनुसार देवी पूजा विधान है जैसे महाराष्ट्र में ज्येष्ठा गौरी व्रत में भाद्रपद शुक्ल षष्ठी तिथि में अनुराधा नक्षत्र में आह्वान, भाद्रपद शुक्ल सप्तमी तिथि में ज्येष्ठा नक्षत्र में पूजन, भाद्रपद शुक्ल अष्टमी तिथि में मूल नक्षत्र में विसर्जन करते हैं और बङ्गाल में नवरात्र में आश्विन शुक्ल सप्तमी तिथि में मूल नक्षत्र में सरस्वती देवी का आह्वान, आश्विन शुक्ल अष्टमी तिथि में पूर्वाषाढ़ नक्षत्र में सरस्वती देवी का पूजन, आश्विन शुक्ल नवमी तिथि में उत्तराषाढ़ नक्षत्र में सरस्वती देवी को बलिदान, तथा आश्विन शुक्ल दशमी तिथि में श्रवण नक्षत्र में सरस्वती देवी का विसर्जन होता है।
इतने सारे तथ्यों को पञ्चाङ्गकार ध्यान में रखकर धर्मशास्त्रियों से चर्चा कर अपनी पञ्चाङ्ग में व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार बतलाते हैं।*

*अथर्ववेदोक्त दिन और रात के मुहूर्त तथा प्रातःकाल, मध्याह्न, मध्याह्न काल सन्ध्या काल, प्रदोषकाल, महानिशिथ काल जैसे विषयों पर प्रथक आलेख देखना चाहिए।*

*सनातन वैदिक धर्मियों के सभी व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार चूंकि सिद्धान्त ज्योतिष अर्थात एस्ट्रोनॉमी पर आधारित हैं और वेधशालाएँ भारत शासन के अधीन हैं इसलिए भारत शासन को चाहिए कि पूरे भारत वर्ष के लिए संस्कृत, हिन्दी और सांवैधानिक मान्यता प्राप्त सभी प्रादेशिक भाषाओं में अगले वर्ष के लिए ऑनलाइन पञ्चाङ्ग, ऑफलाइन पञ्चाङ्ग और पुस्तकाकार पञ्चाङ्ग छापकर जन साधारण के लिए सस्ते मुल्य पर उपलब्ध करवाए।*  जिसमें 
 *विषुव सम्पात से गणना आरम्भ कर औसत सुर्योदय समय भारतीय मानक समय 06:00 बजे  के लिए* ---* 

 *वेदिक सायन सौर मास के गते अनुसार*

 *सायन प्रधियों (राशियों) में सूर्य चन्द्रमा एवम् सभी ग्रहों और पात (राहु-केतु) के सायन भोगांश, शर और क्रान्ति,विशुवांश आदि का ज्योतिष पत्रक (इफेमेरीज़/ अल्मनाक) की सारणी हो।* 

*वेदिक 12 मासों की आरम्भ की सायन संक्रान्तियाँ तथा सायन प्रधियों (राशियों) में सुर्य, चन्द्रमा, ग्रहों और पातों के प्रवेश का समय भिन्न रंग के गाढ़े अक्षरों में दर्शानें वाली सारणी भी प्रथक से दी जाये।*

 *वास्तविक भोगांश वाले वेदिक 27 नक्षत्रों  में सुर्य, चन्द्रमा, सभी ग्रहों एवम् पातों के प्रवेश का समयकी सारणी दी जाये।*

*(1)  सायन संक्रान्ति  गते, (2) सूर्योदय समय का वेदिक सायन सौर मास गतांश का समाप्ति समय, (3) के साथ दशाह के वासर, (4) निरयन सौर मास संक्रमण गतांश समाप्ति समय, (5) निरयन सौर मास गते, (6) सायन सौर संक्रान्ति आधारित चान्द्र मास और निरयन सौर संक्रमण आधारित चैत्र वैशाख आदि चान्द्रमास के नाम सहित शुक्लपक्ष में 01 से 120 तक चन्द्र कलाओं का समाप्ति समय जिसमें   01 से 30 तक तिथी समाप्ति का समय, स्पष्ट दिखाने के लिए बोल्ड अक्षरों में दर्शाया जाए।* 
और 
*(7) सूर्य और चन्द्रमा के सायन भोगांशादि के योग से निर्मित योग का समाप्ति समय, (8)  शुद्ध चान्द्र मास के अमावस्या गते , (9) चन्द्र दर्शन गते, (10) ग्रेगोरियन केलेण्डर के दिनांक, और (11) सप्ताह के वार दर्शक सारणी हो।*

*सामने वाले पृष्ठ पर अलग से सारणियों में*

 *वेदिक सायन संवत्सर, वेदिक उत्तरायण (पौराणिक उत्तर गोल)/ वेदिक दक्षिणायन (पौराणिक दक्षिण गोल), उत्तर तोयन (पौराणिक दक्षिणायन) / दक्षिण तोयन (पौराणिक उत्तरायण), वेदिक ऋतु / पौराणिक ऋतु , वेदिक सायन सौर मास / पौराणिक सायन सौर मास , निरयन सौर मास, सायन सौर संक्रान्तियों पर आधारित चान्द्र मास, निरयन सौर संक्रमण आधारित चैत्र वैशाख आदि चान्द्र मास का प्रारम्भ का समय सहित वास्तविक व्यतिपात और वैधृतिपात प्रारम्भ और अन्त का समय दर्शाया जाए।*
इसके अलावा *सम्प्रदायों के मतानुसार व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार दर्शाये जाए।* 

 *साथ ही प्रथक प्रथक सारणियों में भी* 

 *वेदिक सायन कलियुग संवत्सर प्रारम्भ समय,सायन सौर संक्रान्तियों पर आधारित चान्द्र संवत को युग संवत्सर (के नाम से) प्रारम्भ का समय सायन सौर संक्रान्तियों पर आधारित चान्द्र मासों का प्रारम्भ समय दर्शाया जाए।*

 *युधिष्ठिर  निरयन सौर संवत्सर एवम् निरयन सौर विक्रम संवत्सर का प्रारम्भ समय, निरयन सौर मास आरम्भ समय दर्शाया जाए* 

 *निरयन सौर संक्रमण आधारित चान्द्र संवत्सर शकाब्द का प्रारम्भ समय* 
 *निरयन सौर संक्रमण आधारित चैत्र वैशाख आदि चान्द्र मास के प्रारम्भ का समय दर्शाया जाए।* 

 *वास्तविक व्यतिपात वैधृतिपात प्रारम्भ और अन्त का समय दर्शाया जाए।* 
 *श्रोत्रिय (वेदिक), स्मार्त, पौराणिक, और  प्रत्यैक मत, सम्प्रदाय और पन्थ के आधार पर उन मत, सम्प्रदाय और पन्थ के नाम सहित प्रारम्भ और अन्त के समय सहित दर्शाया जाए।*

 *जिसमें अधिकांश व्रत पर्व, उत्सव और त्योहारों के संक्रान्ति वर्तमान अंश या संक्रान्ति गतांश या संक्रान्ति गते को आधार बनाया जाए।*
 *केवल महाशिवरात्रि को व्याघ तारा रातभर दिखना चाहिए इसलिए इसे नाक्षत्रीय पद्यति पर आश्रित निरयन सौर धनु मास के २०°१३'१३" वर्तमानांश या गतांश हो उस रात में दर्शाया जाए।* 
 *होली, जन्माष्टमी, दिवाली जैसे जो व्रत पर्व, उत्सव और त्योहार में ऋतु विशेष दर्शाई जाती है; लेकिन एकाष्टका, पूर्णिमा, अष्टका या अमावस्या का भी महत्व है उन व्रत पर्व, उत्सव और त्योहारों को सायन सौर संक्रान्ति आधारित चान्द्रमासों की एकाष्टका पूर्णिमा, तिथि अष्टका या अमावस्या के दिन दर्शाया जाए।*

*जहाँ सौर मास और चन्द्रमा के नक्षत्र से व्रत, पर्व, उत्सव और त्योहार मनाते हैं जैसे बङ्गाल में नवरात्र में मूल नक्षत्र से श्रवण नक्षत्र तक में सरस्वती आव्हान, पूजन, बलिदान, विसर्जन आदि और महाराष्ट्र में ज्येष्ठा आव्हान, पूजन, बलिदान, विसर्जन आदि ज्येष्ठा आदि नक्षत्र में तथा तमिलनाडु में ओणम को सौर सिंह मास में श्रवण नक्षत्र और असमान भोगांश वाले सत्ताइस नक्षत्र के आधार पर सम्बन्धित नक्षत्र के अनुसार दर्शाया जाए।*

साथ ही *महामहोपाध्याय पं. श्रीकृष्णदत्त जी शास्त्री रचित स्मार्त कर्मकलाप या  गृहस्थ कर्मकलाप का आधार लेकर वैदिक संहिताओं, ब्राह्मण ग्रन्थों, शुल्ब सूत्रों, श्रोत सूत्रों, गृह्य सूत्रों, धर्म सूत्रों और पूर्व मीमांसा ग्रन्थ के आधार पर पर्वकाल सहित वैदिक कर्मकाण्ड के लिए विधि-विधान और निषेधाज्ञाओं के आधार पर वैदिक कर्मकलाप ग्रन्थ तैयार किया जाए। जिसे केवल लागत मूल्य पर प्रकाशित कर जन साधारण हेतु सुलभ करवाया जाए। और इसका ऑनलाइन और ऑफ लाइन संस्करण भी उपलब्ध कराया जाए।*

सोमवार, 7 सितंबर 2026

भगवान श्रीरामचन्द्र क लिए नल द्वारा तैयार किया गया राम सेतु केरल के कन्नुर से लक्ष्यद्वीप के किल्तान द्वीप तक 296 कि.मी का वास्तविक रामसेतु।

एक बार वाल्मीकि रामायण अवश्य पढ़ें।
हो सके तो भारत का नक्शा साथ में रखना।
तो पता चलेगा कि, 
1 सुग्रीव जी ने सीता खोजी दल को पाण्ड्य देश में प्रवेश करने से ही इन्कार कर रखा था। इसलिए दक्षिण दिशा में  सीता खोजी दल ने कभी तमिलनाडु में प्रवेश ही नहीं किया।
और  सुग्रीव जी श्री रामचन्द्र जी और लक्ष्मण जी को कभी तमिलनाडु लेकर कभी नहीं गये।
2 अङ्गद, जामवन्त जी, हनुमानजी आदि सहित दक्षिण में सीत खोजी दल ने विंध्याचल  से सीता जी की खोज प्रारम्भ की। और वसन्त ऋतु प्रारम्भ होने तक वे विन्ध्याचल के दक्षिण पश्चिमी सिरे तक पहूँच गए थे जहाँ से एक ओर (दक्षिण में) प्रसवण गिरी दिख रहा था, निकट ही पश्चिम में समुद्र था। जिसके पानी में भीगे हुए पङ्ख और परागकण चिपके (चकवा) पक्षी स्वयम्प्रभा की गुफा से निकल रहे थे। उस गुफा में प्रवेश कर वह दल दूसरी ओर सागर तट पर एक शिखर पर पहूँचा। अर्थात खम्बात की खाड़ी के पूर्वी तट पर भरुच पहूँचे; जहाँ उन्हें जटायु जी के भाई सम्पाति मिले और उन्होंने वहाँ से लगभग 1287 किलोमीटर (सौ योजन) दूर दक्षिण दिशा में रावण की लङ्का (लक्ष्यद्वीप के किल्तान द्वीप) में अशोक वाटिका में सीता जी को बैठे देखा। और सीता खोजी दल को बतलाया।
श्री हनुमानजी ने वहीं से सौ योजन की छलाङ्ग लगाकर समुद्र पार किया था। मतलब बीच में कोई भू भाग नहीं था, अन्यथा वे दोड़़ते हुए भी जा सकते थे।
3 लौटते समय हनुमान जी उसी मार्ग से न लौटकर सीधे कर्नाटक के हम्पी में सुग्रीव की राजधानी पहूंचे मतलब वे पश्चिम घाट पर होते हुए हम्पी पहूँचे और वानर दल खम्बात के भरुच से सीधे पश्चिम घाट होते हुए कर्नाटक के हम्पी पहूँचे।

4 शरद ऋतु के प्रारम्भ में सुग्रीव जी की सेना सहित श्री रामचन्द्र जी और लक्ष्मण जी कर्नाटक के हम्पी से पश्चिम घाट (सह्याद्रि पर्वत) पर चलते हुए कर्नाटक सीमा और केरल सीमा के मिलन स्थल सह्य और मलय पर्वत के मिलन स्थल कोझीकोड होते हुए  कन्नूर पहूँचे। जहाँ श्री रामचन्द्र जी ने इजीमाला पर्वत के महेन्द्र शिखर पर चढ़कर पश्चिम सागर (अरब सागर) देखा।
कन्नूर में ही डेरा डालकर वहीँ से पाँच दिन में  296 किलोमीटर का सेतु बना कर लक्ष्यद्वीप के किल्तान द्वीप पर पहूँचे।
पहले दिन 14 योजन सेतु बना। दुसरे दिन 6 योजन और बना कर कुल बीस योजन सेतु बना। तीसरे चौथे और पाँचवें दिन एक एक एक योजन सेतु बढ़ा कर तीसरे दिन कुल 21 योज का सेतु बना।
चौथे दिन कुल 22 योजन सेतु बना। और पाँचवे दिन कुल 23 योजन सेतु बना। अर्थात 23×12.87= 296 किलोमीटर का सेतु बना।
जिसे प्रोग्रेसिव टोटल जोड़कर सौ योजन कहा गया। 14+20+21+22+23= 100 योजन लिख दिया। जबकि उथले समुद्र में पहले दिन 14 योजन सेतु बना, दुसरे दिन सेतु 14 से 20 योजन हुआ, तीसरे दिन से गहराई बढ़ने के कारण एक-एक योजन ही बढ़ा और तीसरे दिन 20 से 21 दिन हुआ । चौथे दिन 21 से 22 योजन हुआ और पाँचवे दिन बचा हुआ सेतु एक योजन बढ़ा कर 22 से कुल 23 योजन का सेतु बना लिया।
इसी प्रकार 100 योजन विस्तार वाली लङ्का पुरी का मतलब है रावण की लङ्का का क्षेत्रफल 100 वर्ग योजन था। (अर्थात लगभग 10 योजन लम्बी और 10 योजन चौड़ी = 100 वर्ग योजन था।) अर्थात 128.7×187.7 = 16563.69 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल था।।

नासा ने केवल इतना कहा था कि, धनुषकोडी से श्रीलंका के बीच मन्नार की खाड़ी में एडम ब्रिज (सिंहल द्वीप से भारत मे आने के लिए आदम के द्वारा उपयोग किया गया सेतु) प्राकृतिक संरचना नहीं लगता है। मानव निर्मित संरचना लगती है।
आई टी सेल द्वारा प्रसारित झूठी अफवाह के कारण में गीता प्रेस ने कल्याण में एक लेख छपा था। बाद में नासा का स्पष्टीकरण प्राप्त हुआ तो सम्पादक श्री राधेश्याम खेमका जी ने खेद प्रकट कर पाठकों से क्षमा प्रार्थना की।

शनिवार, 5 सितंबर 2026

मन्त्र सिद्धि

वास्तविकता यह है कि, किसी भी देवता के किसी भी मन्त्र की सिद्धि के लिए सर्वप्रथम उस देवता के वैदिक मन्त्र दृष्टा से दीक्षा लेकर उनके आदेशानुसार अमावस्या से अमावस्या पर्यन्त या पूर्णिमा से पूर्णिमा तक कृच्छ चान्द्रायण व्रत करके अपनी व्यक्तिगत समस्त धन-सम्पदा दान करके, ग्राम/ नगर के मध्य खड़ा होकर अपने द्वारा किए गए समस्त मानसिक, वाचिक और शारीरिक अपराध अर्थात पापों को सार्वजनिक रूप से प्रकट कर स्वीकार कर क्षमा प्रार्थना करना होता है।
फिर गुरु के निर्देशानुसार किसी तपोस्थली पर बैठ कर नैष्टिक ब्रह्मचर्य पालन करते हुए नित्य पञ्च महायज्ञ करते हुए जीवन निर्वाह हेतु अत्यावश्यक केवल फल आदि सात्विक आहार लेते हुए पहले उस देवता के कमसे कम दस लाख मन्त्र जप करें या पुरुश्चरण पूर्ण कर जप किए गए मन्त संख्या का दशांश आहुति देकर अग्निहोत्र करें, फिर जप किए गए मन्त्र संख्या का शतांश तर्पण करें, फिर जप किए गए मन्त्र संख्या का सहस्त्रांश श्राद्ध करें , फिर जप किए गए मन्त्र संख्या का दश सहस्त्रांश ब्राह्मण भोजन कराकर उन्हें समुचित दक्षिणा प्रदान करें। उन्हें सौ कदम छोड़ने जाकर कमी के लिए क्षमा प्रार्थना कर आशिर्वाद लें।
उसके बाद गुरु के आदेश पर उस देवता के पौराणिक मन्त्र का निर्धारित संख्या में जप, होम, तर्पण, श्राद्ध, और ब्राह्मण भोजन करवा कर वैदिक मन्त्र जप में रह गई कमी की पूर्णता कर मन्त्र को पुष्ट करें।
फिर गुरुजनों को प्रणाम कर उनसे बीज मन्त्र सीखकर उसका जप कर देवता को प्रकट प्रणाम पूजा आदि कर उस देवता द्वारा प्रदत्त शक्ति को धारण कर लें।
इसके बाद वैदिक मन्त्र, पौराणिक मन्त्र और बीज मन्त्र का एक हजार जप रोज करता हुआ सायन सौर संक्रान्ति , निरयन सौर संक्रमण, शुक्ल पक्ष की अष्टमी, पूर्णिमा, कृष्ण पक्ष की अष्टमी और अमावस्या को वैदिक मन्त्र के साथ 108 आहुति देकर पौराणिक मन्त्र जप कर एकसौ आठ बार बीज मन्त्र पढ़कर देवता को प्रकट कर उनकी सेवा पूजा कर कृपा प्राप्त कर पुष्टि करता रहे।
जब भी सार्वजनिक हित में अत्यावश्यक हो
बीज मन्त्र का उच्चारण कर जल छिड़क कर आये सङ्कट से मुक्ति दिला सकता है।
या किसी भी धुल या तिनके आदि किसी भी वस्तु को अभिमन्त्रित कर फैंक कर शत्रु पर प्रहार कर उसे यथोचित दण्ड दे सकता है।
केवल बीज मन्त्र का जप नहीं होता है।

शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

शिवलिङ्ग पर मुखाकृति बनाना शैव और पाशुपत आगम के विरुद्ध है।

सारस्वत (सिन्धु घाटी की) सभ्यता के समय इराक और सीरिया से आकर बसे तान्त्रिक व्यापारियों द्वारा मोहन जोदड़ो में उनके घरों में छुपकर लिङ्ग और योनि के प्रतिक और ध्यान मुद्रा में बैठे पशुपालक (पशुपति) की प्रतिमाएँ बनाकर पूजना प्रारम्भ कर दिया था।
वैदिक लोग इनका विरोध करते थे।
फिर 
लगभग 345 ईसा पूर्व से 329 ईसापूर्व में महापद्मनन्द राजा के समय शालिग्राम शिला विष्णु लिङ्ग, जलाधारी में फिट बेलनाकार शिवलिङ्, मातृलिङ्ग बिजोरा निम्बू, बेडोल चौड़ा चिकना पत्थर का विनायक लिङ्ग, और त्रिकोणीय पत्थर का भैरव लिङ्ग तो प्रचलित होने लगे थे।
उसी समय जैनों ने चैत्य (मन्दिर) बनाकर ऋषभदेव की मूर्ति बनाकर पूजा प्रारम्भ कर दी थी।
लेकिन किसी भी लिङ्ग अर्थात चिह्न पर आँख-नाक और चेहरा बनाना प्रचलित नहीं था। सम्भवतः कुछ शैवों ने ऐसा प्रयोग किया होगा तो शैव आगम, पाशुपत आगम में इसे निषिद्ध घोषित कर दिया।
लेकिन आजकल तो उज्जैन के महाकालेश्वर मन्दिर में महाकाल ज्योतिर्लिङ्ग पर भाँग आदि से चेहरा बना कर निषेधाज्ञाओं का उलङ्घन तो किया ही; बल्कि शिवलिङ्ग पर कभी अर्धनारीश्वर तो नारायण-श्रीहरि, तो कभी विनायक की मुखाकृति बनाना प्रारम्भ कर दिया। जो आगम ग्रन्थों की आज्ञाओं का सर्वथा उलङ्घन है।
ऐसे ही इसके देख-देखी सिन्दूर पुती विनायक प्रतिमों और भैरव प्रतिमाओं पर भी चेहरा बनाना प्रारम्भ हो गया है। ये सभी आगमोक्त निषिद्ध कर्म हैं।

गुरुवार, 13 अगस्त 2026

मेकाले के मानस पुत्रों का षड़यंत्र।

इन अंग्रेजी में सोचने वाले मेकाले पुत्रों को भारत देश और राष्ट्र नहीं दिखता है, अमेरिका और रूस जैसा केवल एक राजनीतिक गठबन्धन ही लगता है। या अमेरिका और चीन जैसा क्षेत्रों को हड़प कर बना एक राष्ट्र लगता है।
यदि सुत्त पिटक पढ़ो तो पता लगता है कि, सिद्धार्थ गोतम बुद्ध स्वयम् वेदों और ब्राह्मणों का अत्यधिक आदर करते थे।
चार सौ साल बाद श्रीलंकाई और तत्कालीन ब्रह्म देश म्यांमार के बौद्धों द्वारा संचालित अभिधम्मपिटक में वेद विरुद्ध मत और ब्राह्मण विरोधी मत घुसाए गए।
भगवान श्रीकृष्ण के चचेरे भाई अरिष्टनेमी जो जैनियों के तीर्थंकर हैं तक अष्टाङ्ग योग साधना और सांख्य दर्शन जैसे वेदों के प्रति आसक्ति दर्शन के ही अनुयाई थे।
गुरु ग्रन्थ साहिब में अधिकांश पद कबीरदास जी रचित हैं। और वेदों और ब्राह्मणों के प्रति अतिशय आदर दर्शाया गया है। गुरु नानक देव के पुत्र चन्द्र देव ने उदासीन अखाड़ा की स्थापना की थी, और उदासीन अखाड़ा के साधु सन्त अमृतसर हरि मन्दिर साहिब में यज्ञ-हवन, पूजा-पाठ और योग साधना करते थे।
वह तो अंग्रेजो ने मास्टर ताराचंद जैसे अपने अनुयायियों के माध्यम से खालसा पन्थ के अनुयायियों को सनातन धर्म से अलग हो कर अल्पसंख्यक कहलाने के लाभ बतलाये और भड़काया।
भगवान श्री कृष्ण के सबसे अधिक भक्त और मन्दिर दक्षिण भारत में तमिलनाडु, केरल, आन्ध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में हैं।
भगवान श्री रामचन्द्र जी के वन गमन सम्बन्धित महत्वपूर्ण तीर्थ महाराष्ट्र, कर्नाटक और केरल में है।
महेन्द्र पर्वत के आस-पास भगवान परशुराम जी के द्वारा स्थापित परशुरामेश्वरम मन्दीर केरल में गुरुवायुर, कोझिकोड और कण्णुर क्षेत्र में है। वहाँ श्रीकृष्ण भक्त भी हैं।
उसके बाद सर्वाधिक श्रीकृष्ण भक्त बङ्गाल और उड़ीसा में है।
सौर सम्प्रदाय के मन्दिर गुजरात और उड़ीसा में हैं।
पुरे भारत का प्रत्येक सम्प्रदाय वेदों को सर्वोच्च प्रमाण मानता है।
यह सब मेकाले के मानस पुत्रों को नहीं दिखता।
पूरे विश्व में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर भाषा बदल जाती है। फिर भी भारत में संस्कृत मूल और तमिल मूल की भाषाएँ ही प्रचलित है।
ऐसे ही पूरे विश्व में भौगोलिक परिस्थितियों के अनुकूल पहनावा, वेश-भूषा भी बदलती है। लेकिन मेकाले के मानस पुत्र भाषा भेद और भुषा भेद ही दर्शाकर भारत को विभिन्न संस्कृतियों का गठबंधन सिद्ध करते रहते हैं। और अनेकता में एकता बतला कर भारतियों की प्रशंसा बटोरने में सफल हो जाते हैं।
जबकि छद्म रूप से वे भारत को विभिन्न टुकड़ों में बँटा हुआ सिद्ध करते हैं।

बुधवार, 12 अगस्त 2026

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी से मेरे मतभेद।

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी से मेरे मतभेद -
1 आर्य समाजी ॐ को देवनागरी में जैसा लिखा जाता है वैसा ही पढ़ा जाता है के आधार पर ओ३म् लिखते हैं। जबकि मैं ॐ ही लिखता हूँ।

2 महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी देव, देवता, सिद्ध, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर , नाग,असुर, दैत्य, दानव, राक्षस आदि योनि नहीं मानते थे। देवलोक, पाताल, नर्क आदि भी नहीं मानते थे।
लेकिन मैं मानता हूँ।
3 महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी राम कृष्ण आदि को केवल महा पुरुष मानते थे। मैं उर्ध्व लोक के सिद्ध पुरुषों को ऋत के नियमों के अनुसार निर्धारित कार्य पूर्ण करने के लिए जन्मे अलोकिक व्यक्ति मानता हूँ।

4 महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ईश्वर, जीव और प्रकृति को अनादि मानते थे।
 त्रेतवादी थे। जीवों की संख्या अनन्त लेकिन निश्चित मानते थे।
ईश्वर की प्रेरणा से गुण साम्यावस्था वाली प्रकृति में विक्षोभ होने से सत्व, रज और तमोगुण प्रकट हुए।
इन्हीं से जगत और जीवों की देह बनी।


वैदिक अभेदवादी मैं परमात्मा का ही लीला में सर्वरूपों में प्रकटीकरण मानता हूँ।
परमात्मा के विश्वात्मा ॐ सङ्कल्प से परमात्मा प्रज्ञात्मा परब्रह्म परमेश्वर परम दिव्य पुरुष विष्णु और परा प्रकृति माया के रूप में प्रकट होकर स्वयम् ही प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) ब्रह्म पुरुष प्रभविष्णु (सवितृ) और प्रकृति श्री लक्ष्मी ( सावित्री) के स्वरूप में प्रकट होकर जीवात्मा अपर ब्रह्म नारायण जीव श्री हरि और नारायणी परा प्रकृति कमला (पद्मा) के स्वरूप में प्रकट होते हैं और अपः तत्व की सृष्टि करते हैं। फिर भूतात्मा वाणी हिरण्यगर्भ ब्रह्मा प्राण (चेतना या देही) त्वष्टा और धारयित्व (धृति या अवस्था) रचना के स्वरूप में प्रकट होते हैं तथा त्वष्टा ने सृष्टि के ब्रह्माण्डो के भुवनों के सूर्य और ग्रह आदि की रचना करते हैं। फिर वाणी हिरण्यगर्भ सनक, सनन्दन, सनत्कुमार, सनातन और नारद को प्रकट करते हैं। फिर वाणी हिरण्यगर्भ ब्रह्मा अर्धनारीश्वर एक रुद्र को प्रकट करते हैं। फिर धर्म और धृति तथा काम और रति को प्रकट करते हुए स्वयम्
सूत्रात्मा प्रजापति ब्रह्मा और सरस्वती के स्वरूप में प्रकट होते हैं। सूत्रात्मा ओज और कान्ति दक्ष प्रथम प्रसुति, रुचि - आकुति, कर्दम-देवहुति, स्वायम्भुव मनु-शतरूपा तथा शंकर- उमा की जोड़ियाँ प्रकट करते हैं।
ये जोड़ियाँ ही मैथुनिक सृष्टि प्रारम्भ करते हैं।
फिर प्रजापति सृष्टि ब्रह्माण्डों के भुवनों में लोक स्थापित करते हैं।
इन्हीं में हमारे अठारह भुवन और सोलह लोक भी सम्मिलित हैं।
भुवन मतलब आवास योग्य भूमि और लोक मतलब भुवन में जहाँ जीवों के वास होने से जैविक चेतना से भुवन आलोकित हो।
फिर प्रजापति और सरस्वती और (1)मरीची-सम्भूति, (2) भृगु-ख्याति, (3) अङ्गिरा-स्मृति, (4) वशिष्ट-ऊर्ज्जा, (5) अत्रि-अनसुया, (6) पुलह-क्षमा, (7) पुलस्य-प्रीति, (8) कृतु-सन्तति भू स्थानीय प्रजापतियों को जन्म देते हैं।स्वायम्भुव मन्वन्तर के सभी ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मण इन्हीं की सन्तान थे। और इन्हीं के गुरुकुल में शिक्षित थे।
फिर प्रजापति ने स्वयम् को अणुरात्मा वाचस्पति और वाक के स्वरूप में प्रकट किया। ये ही स्वर्गलोक के प्रजापति इन्द्र (तेज) और शचि (विद्युत) के स्वरूप में प्रकट हुए। 
वाचस्पति और वाक ने अग्नि और स्वाहा तथा पितरः और स्वधा को प्रकट किया।
तथा वायु और शिवा को भी प्रकट किया।
अग्नि से तीन+तीन अर्थात छ: अग्नि हुए। इन छहों अग्नि के सात सात पुत्र हुए इस प्रकार उनचास अग्नि हो गये।
ऐसे ही पितरः के तीन+ तीन छः पितर हुए। जिसमें (१) अग्निष्वात (२) बहिर्षद और (३) कव्यवाह तीन निराकार और (४) अर्यमा, (५) अनल (६) सोम और (७) यम चार साकार हैं। अर्यमा मुख्य हैं इन्हीं की पत्नी स्वधा है।
ऐसे ही वायु के भी तीन+तीनः वायु हुए। उन छहों के सात- सात पुत्र हुए। ये ही आंधी, तुफान, झंझावात के देवता उनचास मरुद्गण कहलाये। मुख्य मरुद्गण (1) आवह, (2) प्रवह, (3) संवह, (4) उद्वह, (5) विवह, (6) परिवह और (7) परावह है। ये सातों सैन्य प्रमुख के समान गणवेश धारण करते है।

वाचस्पति स्वयम् विज्ञानात्मा ब्रह्मणस्पति और सुनृता के स्वरूप में प्रकट होते हैं। ये ब्राह्मणों के अध्यक्ष कहे जाते हैं। वेद मन्त्रों को ब्रह्म कहते हैं। और सभी मन्त्रों के ये दृष्टा हैं।
विज्ञानात्मा ब्रह्मणस्पति और सुनृता से चित्त और चेत द्वादश आदित्य प्रकट हुए।
  (1) विष्णु, (2) सवितृ, (3) त्वष्टा, (4) इन्द्र, (5) वरुण, (6) विवस्वान, (7) पूषा, (8) भग, (9) अर्यमा, (10) मित्र, (11) अंशु और (12) धातृ।

फिर ब्रह्मणस्पति स्वयम् ज्ञानात्मा ब्रहस्पति और तारा के स्वरूप में प्रकट हुए। ज्ञानात्मा ब्रहस्पति से बुद्धि और बोध आठ वसु हुए।
(1) प्रभास, (2) प्रत्युष, (3) धर्म, (4) ध्रुव, (5) अर्क, (6) अनिल, (7) अनल और (8) अप् ।
 ज्ञानात्मा ब्रहस्पति स्वयम् लिङ्गात्मा पशुपति के स्वरूप में प्रकट हुए।
लिङ्गात्मा पशुपति से अहंकार और अस्मिता एकादश रुद्र हुए।
(1) हर, (2) त्र्यम्बकं, (3) वृषाकपि, (4) कपर्दी, (5) अजैकपात, (6) अहिर्बुधन्य, (7) अपराजित, (8) रैवत, (9) बहुरूप, (10) कपाली और (11) शम्भु (शंकर)।

 लिङ्गात्मा पशुपति स्वयम् मनसात्मा गणपति के स्वरूप में प्रकट हुए। ये गणपति लम्बोदर गजानन विनायक से अलग हैं। कबिलों को गण कहते हैं। गणों के अध्यक्ष गणराज्य के नायक गणपति कहलाते हैं।
 लिङ्गात्मा गणपति से मन और संकल्प सोम राजा और वर्चा प्रकट हुए।
 मनसात्मा गणपति ने स्वयम् को स्व सदसस्पति और स्वभाव मही के स्वरूप में प्रकट हुए।
 स्वभाव मही स्वयम् सात्विक स्वभाव स्वाहा भारती, राजसी स्वभाव वषट सरस्वती और तामसी स्वभाव स्वधा इळा (इला या तृण देवी इरा) के स्वरूप में प्रकट हुई।
इन्हीं से यह भौतिक पदार्थ और भौतिक जगत उत्पन्न हुआ। शरीर बने।

5 महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने पञ्च महायज्ञ को आवश्यक तो माना लेकिन योग साधना पर अधिक जोर दिया।

मेरा मत है कि, वेदों और ब्राह्मण ग्रन्थों के अनुसार पञ्च महायज्ञ के ब्रह्म यज्ञ के अन्तर्गत ही अष्टाङ्ग योग अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह (पञ्चयम/ धर्म), शोच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान (पञ्च नियम/ अनुशासन), चौरासी आसन (शरीर की स्थिरता), प्राणायाम (स्व नियन्त्रित श्वास-प्रश्वास के माध्यम से समस्त शारीरिक अन्तःक्रियाएँ स्व नियन्त्रण में लाकर, प्रत्याहार के माध्यम से मन का इन्द्रियों की ओर भटकाव स्व नियन्त्रण में लेकर स्वस्थ्य तन- मन प्राप्त कर धारणा द्वारा सिखी गई शिक्षा धारण करते हुए स्वाध्याय, वेद पाठ, वेदाध्ययन, सन्ध्योपासना, कर ध्यान पूर्वक गायत्री मन्त्र जप करना। ब्रह्मचर्य आश्रम में यह अभ्यास आदत में ढालना, मसल्स मेमोरी में उतार देना। फिर देव यज्ञ से आत्म समर्पण/ ईश्वर प्रणिधान हो पाता है। भूत यज्ञ से प्रकृति के प्रति कर्तव्य पालन और अतिथि यज्ञ से मानवों के प्रति कर्तव्य भावना जागृत होती है। पितृ यज्ञ श्राद- तर्पण, और सामाजिक कार्यों में सहयोग कर के सामाजिकता आती है।इस प्रकार ग्रहस्थाश्रम में पञ्च महायज्ञ स्वाभाविक रूप से हो पाएँगे।
वानप्रस्थ आश्रम में अध्ययन- अध्यापन, ध्यान - समाधि अभ्यास, संयम (कुछ ही समय में धारणा-ध्यान- समाधि में स्थित होकर) 
संयम से तन्मयता प्राप्त कर वाञ्छित जानकारी और ज्ञान प्राप्त कर लिया जाता है।
इस प्रकार परमात्मा में तन्मय होकर आत्मज्ञान प्राप्त होता है।
पञ्च महायज्ञ सम्पूर्ण स्वस्थ्य और स्वस्थ जीवन प्रणाली है।

6 महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी विवाह में वर की आदर्श अवस्था (वय) 48 वर्ष और वधू की वय (अवस्था) 16 वर्ष मानते थे।
जबकि मैं विवाह में वर की आदर्श वय (अवस्था) 24-25 वर्ष और वधू की आदर्श अवस्था (वय) 21-22 वर्ष मानता हूँ।
48 वर्ष तक ब्रह्मचर्य पालन करने वाले पुरुष को विवाह करने की आवश्यकता ही नहीं रहती है।

7 महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी विधवा विवाह को अनुचित नहीं मानते थे।
श्रद्धानन्द जी ने तो विधवा विवाह को सामाजिक आन्दोलन में सम्मिलित कर लिया।
लेकिन महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी नियोग को भी उचित मानते थे।
जबकि मैं नियोग से पूर्णतः असहमत हूँ।
यदि पुत्र ही इकलौती सन्तान हो। और उसकी निःसंतान नव विवाहिता वधु विधवा हो जाए, तो उसका पुनर्विवाह कर उसकी सन्तान को गोद लेना नियोग की तुलना में अनन्त गुना श्रेष्ठ होगा।

सोमवार, 10 अगस्त 2026

ब्राह्मण और क्षत्रियों की दुरावस्था।

शत वर्षिय दशराज युद्ध के बाद से ही मूल क्षत्रिय - मनुर्भरतों का तो अस्तित्व ही समाप्त हो गया।
फिर उज़्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, तिब्बत और कश्मीर के सूर्यवंशी अयोध्या में बसाये गए। और टर्की से आये चन्द्र वंशियों तथा सीरिया से आये नागों को उज़्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, तिब्बत और कश्मीर में बसाया गया। लेकिन वे भी चन्द्र वंशियों के सामने नहीं टिक पाये। और प्रयागराज तथा बिहार, झारखण्ड में बस गये।
ईराक के असुरों ने सेवन सिस्टर्स के असम मणिपुर, त्रिपुरा, नगालैंड तथा श्री लङ्का आदि में फैल गये। अफ्रीका से आये राक्षस लक्ष्यद्वीप में बस गये।
दास-दस्यु (दृविड़) तमिलनाडु में बस गये। चोर (चोल) कर्नाटक में और आन्ध्र प्रदेश में आन्ध्र बस गये। 
ब्रह्मर्षियों की सन्तान जो हरियाणा में बसी थी और स्वायम्भुव मनु-शतरूपा के पुत्र प्रियव्रत सन्तान जो पञ्जाब, सिन्ध, बलुचिस्तान और अफगानिस्तान में बसी थी। जिन्हें मनुर्भरत कहा जाता था। तथा उत्तानपादासन और ध्रुव की सन्तान ईरान में बसी थी वे सब चारों ओर से ययाति के पाँचो पुत्रों (चन्द्रवंशियों) और नागों से घिर गए।
जब वैदिक काल के बाद ब्राह्मण ग्रन्थों के रचनाकाल से सूत्र ग्रन्थों के रचनाकाल त्रेतायुग में ही यह हाल था तो अब तो कलियुग में समय ही उनका है।