प्रति वर्ष अधिकांश व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहारों एक दो दिन या एक माह का अन्तर क्यों आता है - इसका कारण और निवारण।
1 गणितागत मतभेद ---
वेधशाला से प्राप्त आकड़ों (डेटा) पर आधारित वेधतुल्य पञ्चाङ्गो में भी दो मत हैं।
(क) *भारत में प्रचलित नक्षत्रीय पद्यति पर आधारित निरयन सौर संक्रमण आधारित निरयन सौर मास और निरयन चन्द्रमा के आधार पर निरयन सौर-चान्द्रमासों वाले पञ्चाङ्ग। ये प्रायः लाहिरी अयनांश के आधार पर ही निकलते हैं। लेकिन कुछ शुद्ध चित्रा पक्षीय अयनांश के आधार पर भी निवलते हैं।*
*लाहिरी अयनांश और शुद्ध चित्रा पक्षीय अयनांश में 22 मार्च 285 ईस्वी को मात्र 03" विकला का अन्तर था जो वर्तमान में चित्रा तारे के निरन्तर विचलन के परिणाम स्वरूप लगभग 01' कला (अर्थात 60 विकला) से अधिक का अन्तर हो गया है। लेकिन भारतीय ज्योतिषी इसे नगण्य मानते हैं।*
(ख) उक्त दृग्तुल्य पञ्चाङ्गो के अतिरिक्त कुछ स्थानीय स्तर पर सूर्य सिद्धान्त के मकरन्द और ग्रह लाघव नामक करण ग्रन्थों पर आधारित स्थूल गणित वाले पञ्चाङ्ग भी प्रचलित हैं। जिनके निरयन सौर संक्रमण, और निरयन चन्द्रमा तथा निरयन ग्रहों की स्थिति प्रायः गलत ही होती है। परिणाम स्वरूप सूर्य के निरयन संक्रमण का समय तथा तिथि और चन्द्रमा के नक्षत्र का प्रारम्भ और समाप्ति का समय भी गलत ही रहता है। गुरु बृहस्पति एवम् शुक्र का अस्त और उदय का दिन और समय भी गलत ही रहता है। इसलिए व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार भी प्रायः गलत ही रहते हैं। कई बार अधिक मास भी गलत ही बतलाइए थे।
लेकिन ग्रहगणित ज्योतिष (सिद्धान्त ज्योतिष अर्थात एस्ट्रोनॉमी) का ज्ञान नहीं होने के कारण मन्दिरों के पुजारियों का समर्थन इन परम्परागत पञ्चाङ्ग को अभी तक प्रचलन में बनाए हुए हैं।
(ग) ऐसे ही गुजरात में किसी अन्य करण ग्रन्थ के आधार पर पञ्चाङ्ग निकलते हैं
पहले महाराष्ट्र में लोकमान्य बालगङ्गाधर तिळेक के गणित के आधार पर श्री मोरोपन्त छत्रे, लगभग 04° अंश कम वाला झीटापक्षीय अयनांश पर पञ्चाङ्ग निकालते थे। जो कभी भी लोकप्रचलित नहीं हो पाया। इसकी वर्तमान स्थिति ज्ञात नहीं है।
*पञ्चाङ्गो में उक्त गणितीय त्रुटि के अलावा धर्मशास्त्रिय मत भिन्नता महत्वपूर्ण कारण है।
इसे समझने के लिए कुछ पारिभाषिक शब्दावली और कुछ तथ्यों का ज्ञान आवश्यक है।*
*निरयन सौर मास - अर्थात जिस निरयन राशि में सूर्य स्थित हो उसे सौर माह कहते हैं।
चन्द्रमा जिस नक्षत्र में स्थित हो उसे नक्षत्र कहते हैं।*
*चान्द्र सौर मास जिसे प्रायः चान्द्रमास ही लिख देते हैं - अमावस्या समाप्ति समय से अमावस्या समाप्ति समय तक अमान्त चान्द्रसौर मास (अंग्रेजी में लूनी-सोलर मन्थ) या चान्द्र मास या अमान्त मास कहलाता है।*
*पूर्णिमा समाप्ति समय से पूर्णिमा समाप्ति समय तक पूर्णिमान्त मास कहलाता है।*
*सूर्य से चन्द्रमा की प्रत्येक बारह अंश (डिग्री) का अन्तर तिथि कहलाती है।*
और
*दो सूर्योदय के बीच का समय वार कहलाता है। अर्थात वार सूर्योदय से बदलता है।* (न कि, ब्रह्म मुहूर्त या मध्यरात्रि से।)
*ऐसे ही सूर्योदय पश्चात छः घटि अर्थात 02 घण्टे 24 मिनट अर्थात तीन मुहूर्त तक जो तिथि रहे वह शाकल्यपादिता तिथि कहलाती है। और बहुत से धार्मिक कार्यों, व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार आदि में उक्त शाकल्यपादिता तिथि को पूरे दिन-रात वही तिथि है ऐसा मान लिया जाता है। कुछ प्रकरणों में 04 घण्टे 48 मिनट अर्थात छः मुहूर्त व्यापिनी तिथि को पूरे दिन माना जाता है।*
*कुछ व्रत सूर्योदय के समय जो तिथि रहती है उस सूर्योदय व्यापिनी तिथि के अनुसार इस लिए मनाए जाते हैं क्योंकि उन व्रत पर्व में मुख्य पूजा सूर्योदय के समय ही होती है। अर्थात उन व्रत पर्वों का पर्वकाल ही सूर्योदय का समय होता है।* *लेकिन यह नियम सभी व्रत पर्व, उत्सव और त्यौहारों में इसलिए लागू नहीं होता है क्योंकि, सभी व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहारों का पर्वकाल अलग-अलग होता है।*
*कोई प्रातः काल व्यापिनी तिथि में मनाते हैं तो कुछ पूर्वाह्न व्यापिनी तिथि में मनाते हैं, तो कोई मध्याह्न काल व्यापिनी तिथि में मनाते हैं तो कुछ अपराह्न काल व्यापिनी तिथि में मनाते हैं। कोई सूर्यास्त कालीन तिथि में मनाते हैं तो कुछ प्रदोषकाल व्यापिनी तिथि में मनाते हैं तो कुछ पूर्व रात्रि व्यापिनी तिथि में मनाते हैं। कुछ मध्यरात्रि कालीन तिथि में मनाते हैं तो कुछ महानिशिथ काल व्यापिनी तिथि में मनाते हैं। कुछ तो उत्तर रात्रि कालीन तिथि में तो कुछ अरुणोदय कालीन व्यापिनी तिथि अर्थात ब्रह्म मुहूर्त मे जो तिथि हो उसमें मनाते हैं। तो कुछ चन्द्रोदय कालीन तिथि में मनाते हैं। ये सब पर्वकाल कहलाते हैं।*
*पर्वकाल के विषय में भी पौराणिक साहित्य में मतभेद के कारण धर्मशास्त्र पर निबन्धकारों ने अलग-अलग मत व्यक्त किए हैं। यह बहुत गहन विषय है।*
*इसके अलावा दक्षिण भारत में निरयन सौर मास में चन्द्रमा का नक्षत्र के आधार पर व्रत, पर्व उत्सव और त्यौहार मनाये जाते हैं वहाँ सौर- चान्द्रमास (लूनी-सोलर मन्थ) का उपयोग न के बराबर बहुत कम होता है। इसलिए तिथियाँ भी लगभग अप्रचलित है।*
*जैसे निरयन मेष राशि के सूर्य में अर्थात मेष मास में पुनर्वसु नक्षत्र में श्रीराम जयन्ती मनाते हैं और निरयन सिंह राशि के सूर्य (सिंह मास) में रोहिणी नक्षत्र में श्रीकृष्ण जयन्ती मनाते हैं। और निरयन सिंह राशि के सूर्य (सिंह मास) में श्रवण नक्षत्र में वामन जयन्ती ओणम नाम से मनाते हैं।
फिर उसमें भी आचार्यों के सम्प्रदाय के अनुसार मतभेद हैं जैसे कुछ सूर्योदय कालीन चन्द्र नक्षत्र देखकर व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार मनाते हैं तो कुछ पूर्वकालीन चन्द्र नक्षत्र के अनुसार व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार मनाते हैं।*
*यह मतभेद उत्तर भारत में भी वैष्णव सम्प्रदायों में प्रचलित है। उत्तर भारत में भी कुछ सूर्योदय कालीन (उदिया) तिथि के अनुसार व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार मनाते हैं तो विष्णु, देवी शंकर, सूर्य और गणपति पाँचो देवों को पूजने वाले स्मार्त मतावलम्बी पूर्वकालीन तिथि के अनुसार व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार मनाते हैं।*
*सौर-चान्द्रमासों में तिथि के साथ-साथ पर्वकाल में चन्द्रमा के नक्षत्र के अनुसार देवी पूजा विधान है जैसे महाराष्ट्र में ज्येष्ठा गौरी व्रत में भाद्रपद शुक्ल षष्ठी तिथि में अनुराधा नक्षत्र में आह्वान, भाद्रपद शुक्ल सप्तमी तिथि में ज्येष्ठा नक्षत्र में पूजन, भाद्रपद शुक्ल अष्टमी तिथि में मूल नक्षत्र में विसर्जन करते हैं और बङ्गाल में नवरात्र में आश्विन शुक्ल सप्तमी तिथि में मूल नक्षत्र में सरस्वती देवी का आह्वान, आश्विन शुक्ल अष्टमी तिथि में पूर्वाषाढ़ नक्षत्र में सरस्वती देवी का पूजन, आश्विन शुक्ल नवमी तिथि में उत्तराषाढ़ नक्षत्र में सरस्वती देवी को बलिदान, तथा आश्विन शुक्ल दशमी तिथि में श्रवण नक्षत्र में सरस्वती देवी का विसर्जन होता है।
इतने सारे तथ्यों को पञ्चाङ्गकार ध्यान में रखकर धर्मशास्त्रियों से चर्चा कर अपनी पञ्चाङ्ग में व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार बतलाते हैं।*
*अथर्ववेदोक्त दिन और रात के मुहूर्त तथा प्रातःकाल, मध्याह्न, मध्याह्न काल सन्ध्या काल, प्रदोषकाल, महानिशिथ काल जैसे विषयों पर प्रथक आलेख देखना चाहिए।*
*सनातन वैदिक धर्मियों के सभी व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार चूंकि सिद्धान्त ज्योतिष अर्थात एस्ट्रोनॉमी पर आधारित हैं और वेधशालाएँ भारत शासन के अधीन हैं इसलिए भारत शासन को चाहिए कि पूरे भारत वर्ष के लिए संस्कृत, हिन्दी और सांवैधानिक मान्यता प्राप्त सभी प्रादेशिक भाषाओं में अगले वर्ष के लिए ऑनलाइन पञ्चाङ्ग, ऑफलाइन पञ्चाङ्ग और पुस्तकाकार पञ्चाङ्ग छापकर जन साधारण के लिए सस्ते मुल्य पर उपलब्ध करवाए।* जिसमें
*विषुव सम्पात से गणना आरम्भ कर औसत सुर्योदय समय भारतीय मानक समय 06:00 बजे के लिए* ---*
*वेदिक सायन सौर मास के गते अनुसार*
*सायन प्रधियों (राशियों) में सूर्य चन्द्रमा एवम् सभी ग्रहों और पात (राहु-केतु) के सायन भोगांश, शर और क्रान्ति,विशुवांश आदि का ज्योतिष पत्रक (इफेमेरीज़/ अल्मनाक) की सारणी हो।*
*वेदिक 12 मासों की आरम्भ की सायन संक्रान्तियाँ तथा सायन प्रधियों (राशियों) में सुर्य, चन्द्रमा, ग्रहों और पातों के प्रवेश का समय भिन्न रंग के गाढ़े अक्षरों में दर्शानें वाली सारणी भी प्रथक से दी जाये।*
*वास्तविक भोगांश वाले वेदिक 27 नक्षत्रों में सुर्य, चन्द्रमा, सभी ग्रहों एवम् पातों के प्रवेश का समयकी सारणी दी जाये।*
*(1) सायन संक्रान्ति गते, (2) सूर्योदय समय का वेदिक सायन सौर मास गतांश का समाप्ति समय, (3) के साथ दशाह के वासर, (4) निरयन सौर मास संक्रमण गतांश समाप्ति समय, (5) निरयन सौर मास गते, (6) सायन सौर संक्रान्ति आधारित चान्द्र मास और निरयन सौर संक्रमण आधारित चैत्र वैशाख आदि चान्द्रमास के नाम सहित शुक्लपक्ष में 01 से 120 तक चन्द्र कलाओं का समाप्ति समय जिसमें 01 से 30 तक तिथी समाप्ति का समय, स्पष्ट दिखाने के लिए बोल्ड अक्षरों में दर्शाया जाए।*
और
*(7) सूर्य और चन्द्रमा के सायन भोगांशादि के योग से निर्मित योग का समाप्ति समय, (8) शुद्ध चान्द्र मास के अमावस्या गते , (9) चन्द्र दर्शन गते, (10) ग्रेगोरियन केलेण्डर के दिनांक, और (11) सप्ताह के वार दर्शक सारणी हो।*
*सामने वाले पृष्ठ पर अलग से सारणियों में*
*वेदिक सायन संवत्सर, वेदिक उत्तरायण (पौराणिक उत्तर गोल)/ वेदिक दक्षिणायन (पौराणिक दक्षिण गोल), उत्तर तोयन (पौराणिक दक्षिणायन) / दक्षिण तोयन (पौराणिक उत्तरायण), वेदिक ऋतु / पौराणिक ऋतु , वेदिक सायन सौर मास / पौराणिक सायन सौर मास , निरयन सौर मास, सायन सौर संक्रान्तियों पर आधारित चान्द्र मास, निरयन सौर संक्रमण आधारित चैत्र वैशाख आदि चान्द्र मास का प्रारम्भ का समय सहित वास्तविक व्यतिपात और वैधृतिपात प्रारम्भ और अन्त का समय दर्शाया जाए।*
इसके अलावा *सम्प्रदायों के मतानुसार व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार दर्शाये जाए।*
*साथ ही प्रथक प्रथक सारणियों में भी*
*वेदिक सायन कलियुग संवत्सर प्रारम्भ समय,सायन सौर संक्रान्तियों पर आधारित चान्द्र संवत को युग संवत्सर (के नाम से) प्रारम्भ का समय सायन सौर संक्रान्तियों पर आधारित चान्द्र मासों का प्रारम्भ समय दर्शाया जाए।*
*युधिष्ठिर निरयन सौर संवत्सर एवम् निरयन सौर विक्रम संवत्सर का प्रारम्भ समय, निरयन सौर मास आरम्भ समय दर्शाया जाए*
*निरयन सौर संक्रमण आधारित चान्द्र संवत्सर शकाब्द का प्रारम्भ समय*
*निरयन सौर संक्रमण आधारित चैत्र वैशाख आदि चान्द्र मास के प्रारम्भ का समय दर्शाया जाए।*
*वास्तविक व्यतिपात वैधृतिपात प्रारम्भ और अन्त का समय दर्शाया जाए।*
*श्रोत्रिय (वेदिक), स्मार्त, पौराणिक, और प्रत्यैक मत, सम्प्रदाय और पन्थ के आधार पर उन मत, सम्प्रदाय और पन्थ के नाम सहित प्रारम्भ और अन्त के समय सहित दर्शाया जाए।*
*जिसमें अधिकांश व्रत पर्व, उत्सव और त्योहारों के संक्रान्ति वर्तमान अंश या संक्रान्ति गतांश या संक्रान्ति गते को आधार बनाया जाए।*
*केवल महाशिवरात्रि को व्याघ तारा रातभर दिखना चाहिए इसलिए इसे नाक्षत्रीय पद्यति पर आश्रित निरयन सौर धनु मास के २०°१३'१३" वर्तमानांश या गतांश हो उस रात में दर्शाया जाए।*
*होली, जन्माष्टमी, दिवाली जैसे जो व्रत पर्व, उत्सव और त्योहार में ऋतु विशेष दर्शाई जाती है; लेकिन एकाष्टका, पूर्णिमा, अष्टका या अमावस्या का भी महत्व है उन व्रत पर्व, उत्सव और त्योहारों को सायन सौर संक्रान्ति आधारित चान्द्रमासों की एकाष्टका पूर्णिमा, तिथि अष्टका या अमावस्या के दिन दर्शाया जाए।*
*जहाँ सौर मास और चन्द्रमा के नक्षत्र से व्रत, पर्व, उत्सव और त्योहार मनाते हैं जैसे बङ्गाल में नवरात्र में मूल नक्षत्र से श्रवण नक्षत्र तक में सरस्वती आव्हान, पूजन, बलिदान, विसर्जन आदि और महाराष्ट्र में ज्येष्ठा आव्हान, पूजन, बलिदान, विसर्जन आदि ज्येष्ठा आदि नक्षत्र में तथा तमिलनाडु में ओणम को सौर सिंह मास में श्रवण नक्षत्र और असमान भोगांश वाले सत्ताइस नक्षत्र के आधार पर सम्बन्धित नक्षत्र के अनुसार दर्शाया जाए।*
साथ ही *महामहोपाध्याय पं. श्रीकृष्णदत्त जी शास्त्री रचित स्मार्त कर्मकलाप या गृहस्थ कर्मकलाप का आधार लेकर वैदिक संहिताओं, ब्राह्मण ग्रन्थों, शुल्ब सूत्रों, श्रोत सूत्रों, गृह्य सूत्रों, धर्म सूत्रों और पूर्व मीमांसा ग्रन्थ के आधार पर पर्वकाल सहित वैदिक कर्मकाण्ड के लिए विधि-विधान और निषेधाज्ञाओं के आधार पर वैदिक कर्मकलाप ग्रन्थ तैयार किया जाए। जिसे केवल लागत मूल्य पर प्रकाशित कर जन साधारण हेतु सुलभ करवाया जाए। और इसका ऑनलाइन और ऑफ लाइन संस्करण भी उपलब्ध कराया जाए।*