शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

नामकरण कैसे करें?

*नामकरण के लिए कैसे करें? कौनसी पद्यति सही है? प्राचीन संस्कृत पद्यति के आधार पर जन्माक्षर लें और नाम के अक्षरों का योगांक लें या यवन अवकहड़ा चक्र और कीरो की हिब्रू न्युमरोलॉजी  के आधार पर?*

नामकरण के लिए क्या सही ?  प्राचीन संस्कृत पद्यति? या अवकहड़ा चक्र और कीरो अंकविद्या?



जन्मनाम निर्धारण प्राचीन संस्कृत पद्यति से।

देखिये अग्निपुराण अध्याय 293 श्लोक 10 से 15 तक।
यह विधि अग्नि पुराण मन्त्र - विद्या के अन्तर्गत नक्षत्र - चक्र, राशि चक्र और सिद्धादादि मन्त्र शोधन प्रकार में दी गई है उसमे नामकरण की दृष्टि से आवश्यक संशोधन कर तैयार गई है।
जन्मलग्न के नक्षत्र चरण के अनुसार जन्मनाम/ देह नाम रखें।
नही बने तो अपवाद में दशम भाव स्पष्ट के नक्षत्र चरणानुसार कर्मनाम भी रख सकते हैं।
सुर्य के नक्षत्र चरणानुसार गुरु प्रदत्त अध्यात्मिक नाम / आत्म नाम।
तन्त्र क्रिया हेतु तान्त्रिक आचार्य प्रदत्त नाम मानस नाम जन्म कालिक चन्द्रमा के नक्षत्र चरणानुसार रखें।

प्राचीन संस्कृत पद्यति -- 

राशि /नक्षत्र चरण १ २ ३ ४  
मेष / अश्विनी अ अ अ अ मेष / भरणी आ आ आ आ मेष / कृतिका इ                  
                             १ २ ३ ४
वृष / कृतिका इ ई ई
वृष / रोहिणी उ उ ऊ ऊ
वृष / मृगशिर्ष ऋ ऋ  
                             १ २ ३ ४
मिथुन/ मृगशिर्ष ऋ ऋ
मिथुन/ आर्द्रा ए ए ऐ ऐ
मिथुन/पुनर्वसु ओ ओ औ 
                              १ २ ३ ४
कर्क / पुनर्वसु औ
कर्क / पुष्य अं अं अः अः
कर्क / आश्लेषा क का ख खा 
                               १ २ ३ ४
सिंह / मघा ग गा घ घा
सिंह/पुर्वाफाल्गुनि च चा छ छा
सिंह/उत्तराफाल्गनि ज
                                 १ २ ३ ४
कन्या/उत्तराफाल्गुनि जा झ झा
कन्या / हस्त ट टा ठ ठा
कन्या / चित्रा ड डा   
                                 १ २ ३ ४
तुला / चित्रा ढ ढा
तुला / स्वाती त ता थ था
तुला / विशाखा द दा ध    
                                  १ २ ३ ४
वृश्चिक/ विशाखा धा
वृश्चिक/ अनुराधा न न ना नृ
वृश्चिक/ ज्यैष्ठा प पा फ फा
                                   १ २ ३ ४
धनु / मुल ब बा भ भा
धनु / पुर्वाषाढ़ा म म मा मृ
धनु / उत्तराषाढ़ा य
                                    १ २ ३ ४
मकर/ उत्तराषाढ़ा य य या
मकर / श्रवण र र रा रृ
मकर / धनिष्ठा ल ल
                                     १ २ ३ ४
कुम्भ / धनिष्ठा ला लृ
कुम्भ / शतभिषा व व वा वृ
कुम्भ / पुर्वाभाद्रपद श शा ष  
                                      १ २ ३ ४
मीन / पुर्वाभाद्रपद षा
मीन / उत्तराभाद्रपद स स सा सृ
मीन / रेवती ह ह हा हृ

मात्रा लगाने की विधि / नियम --

प्रथम एवम् त्रतीय चरण में मुल स्वर हैं। द्वितीय और चतुर्थ चरण में आ से औ तक की मात्रा वाले अक्षर जन्मनाम का प्रथमाक्षर रहेगा।

जिन नक्षत्रों में प्रथम और त्रतीय चरण में अलग अलग वर्ण हो उनमें द्वितीय चरण में प्रथम चरण के वर्ण में और चतुर्थ चरण में त्रतीय चरण के वर्ण में ००ं-००' से ००ं-२०' तक ा की मात्रा लगायें। तदनुसार ही आगे भी ००ं-२१' से ००-४०' तक ि की मात्रा लगायें।००ं-४१' से ०१ं-००' तक ई की मात्रा ।०१ं-०१' से ०१ं-२०' तक ु की मात्रा।०१ं-२१' से ०१ं-४०' तक ू की मात्रा।०१ं-४१' से ०२ं-००' तक ृ की मात्रा।०२ं-०१' से ०२ं-२०' तक े की मात्रा।०२ं-२१ से ०२ं-४०' तक ै की मात्रा। ०२ं-४१' से ०३ं-००' तक ो की आत्रा । और , ०३ं-००' से ०३ं-२०' तक ौ की मात्रा लगाकर नाम का प्रथमाक्षर रखें।

जबकि, जिन नक्षत्रों में चारों चरणों में एक ही व्यञ्जन हो वहाँ प्रथम एवम् द्वितीय चरण में मुल वर्ण से नाम का प्रथमाक्षर रहेगा।जबकि, तृतीय और चतुर्थ चरण में ००ं-००' से ००ं-४०' तक ा की मात्रा लगायें। तदनुसार ही आगे भी ००ं-४१' से ०१-२०' तक ि की मात्रा लगायें। ०१ं-२१' से ०२ं-००' तक ई की मात्रा ।०२ं-०१' से ०२ं-४०' तक ु की मात्रा । ०२ं-४१' से ०३ं-२० तक ू की मात्रा।और चतुर्थ चरण में ०३ं-२१' से ०४ं-००' तक ृ की मात्रा।०४ं-०१' से ०४ं-४०' तक े की मात्रा।०४ं-४१ से ०५ं-२०' तक ै की मात्रा। ०५ं-२१ से ०६ं-००' तक ो की आत्रा । और , ०६ं-०१' से ०६ं-४०' तक ौ की मात्रा लगाकर नाम का प्रथमाक्षर रखें।

नाम की संस्कृत, / हिन्दी या मराठी वर्तनी के अक्षरों के अंक।

नाम सरनेम सहित जन्म नाम के अंको को जोड़कर प्राप्त योगफल का ईकाई अंक जन्मसमय के सायन सौर गतांश के ईकाई अंक दोनों एक ही हो।

0- अ, क, ट, प, ष, अः, क्ष, ऽ 0

1- आ, ख, ठ, फ, स, त्र , 1

 2- इ, ई, ग, ड, ब, ह , 2

 3- उ, ऊ, घ, ढ, भ, 3

 4- ऋ, ङ, ण, म, 4
  
 5- ए, च, त, य, 5

 6- ऐ, छ, थ, र, ज्ञ, 6

 7- ओ, ज, द, द, ल, ड़,ॉ 7

 8- औ, झ, ध, व, ढ़ 8
 
 9- अं, ञ, न, श, 9

  0- अ, अः, क, ट, प, ष, ऽ 0


अब नीचे देखिए।⤵️

जन्म नाम जानने का या अवकहोड़ा चक्र जिसका नाम ही विचित्र है और आधारहीन है।

राशि /नक्षत्र चरण १ २ ३ ४  
  
मेष / अश्विनि चु चे चो ला मेष / भरणी ली लू ले लो मेष / कृतिका अ    
                 
                            १ २ ३ ४

वृष / कृतिका इ उ ए
वृष / रोहिणी ओ वा वी वु
वृष / मृगशिर्ष वे वो  

                           १ २ ३ ४

मिथुन/ मृगशिर्ष का की
मिथुन/ आर्द्रा कु ङ ग छ
मिथुन/पुनर्वसु के को ह 

                          १ २ ३ ४

कर्क / पुनर्वसु ही
कर्क / पुष्य हु हे हो ड़ा 
कर्क / आश्लेषा डि डु डे डो

                               १ २ ३ ४

सिंह / मघा मा मे मी मू
सिंह/पुर्वाफाल्गुनि मो टा टी टू
सिंह/उत्तराफाल्गनि टे

                                   १ २ ३ ४

कन्या/उत्तराफाल्गुनि टो पा पी
कन्या / हस्त पु ष ण ठ
कन्या / चित्रा पे पो   

                                  १ २ ३ ४

तुला / चित्रा रा री
तुला / स्वाती रु रे रो ता
तुला / विशाखा ति तू ते  

                                 १ २ ३ ४

वृश्चिक/ विशाखा तो
वृश्चिक/ अनुराधा ना नी नू ने
वृश्चिक/ ज्यैष्ठा नो या यी यू

                                  १ २ ३ ४

धनु / मुल ये यो भा भी
धनु / पुर्वाषाढ़ा भू धा फा ढ़ा
धनु / उत्तराषाढ़ा भे

                                 १ २ ३ ४

मकर/ उत्तराषाढ़ा भो जा जी
मकर/ अभिजित जू जे जो खा
मकर / श्रवण खी खू खे खो
मकर / धनिष्ठा गा गी             

                                  १ २ ३ ४

कुम्भ / धनिष्ठा गु गे
कुम्भ / शतभिषा गो सा सी सू
कुम्भ / पुर्वाभाद्रपद से सो दा  

                                      १ २ ३ ४

मीन / पुर्वाभाद्रपद दी
मीन / उत्तराभाद्रपद दू थ झ ञ
मीन / रेवती दे दो चा ची

जो महानुभाव उक्त अवकहोड़ा/अवकहड़ा चक्र को भारतीय ऋषि मुनियों की रचना मानते हैं कृपया विचार कर बतलायें कि, कौन से भारतीय ऋषि संस्कृत नही जानते थे। जिन्हें यह नही पता था कि, 
1 संस्कृत में ङ (आर्द्रा 2),ण (हस्त 3), से कोई शब्द नही बनता। किसी शब्द का प्रथमाक्षर ङ और ण नही होता।
2 पूरे अवकहड़ा चक्र में ब वर्ण है ही नही। ब के लिए कोई राशि/ नक्षत्र/ नक्षत्र चरण मे स्थान नही है?
कृपया बतलायें कि, बबीता की राशि/ नक्षत्र/ चरण कौनसा है। वृष राशि/ रोहिणी नक्षत्र/ तृतीय चरण तो "वा" वाणी के लिये है न कि, "ब" बबीता के लिए। ऐसा क्यो?
3 कौनसा संस्कृत विद्वान ऐसी बे सिर पेर की अक्षर व्यवस्था बनायेगा? जबकि संस्कृत वर्ण प्रधान भाषा है न कि, अक्षर प्रधान।

ऐसे महान ऋषि और उनके अनुयायियों के लिए हमारे पास कोई शब्द नही है।

सम्भवतया वराहमिहिर के समय प्रचलित हुई उपर्युक्त यमन पद्यति / यवन पद्यति है इसके ही समान ही कीरो की आंग्ल / चाल्डियन / हिब्रु पद्यति (और तथाकथित भारतीय कश्मीरी पद्यति) द्वारा नामाक्षरों के अंको के योगांक वाली पद्यति है। जिसका कोई आधार सिद्ध नही होता। ⤵️

जन्म नाम कीअंग्रेजी स्पेल्लिंग के अक्षरों के अंको का योग का योग या योग कें अंकों का योगांक ग्रेगोरियन केलेण्डर की सुर्योदय वाली दिनांक एक ही हो।
जन्म नाम कीअंग्रेजी स्पेल्लिंग के अक्षरों के अंक

1 = A. I. J. Q. Y = 1
2 = B. K. R. = 2
3 = C. G. L. S. = 3
4 = D. M. T = 4
5 = E. H. N. X = 5
6 = U. V. W = 6
7 = O. Z = 7
8 = F. P = 8

शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

भारत की दुरावस्था के दोषी कौन?

दोष  उन सभी लोगों को दे रहा हूँ, जिन्हें चन्द्रवंशियों और नाग वंशियों के महाभारत काल से आज तक के राजा-महाराजा, सामन्तों का जिन्होंने सामुहिक रूप से सीमा पर जाकर  विधर्मी विदेशी आक्रान्ताओ से युद्ध करने, लड़ने भिड़ने के बजाय किले में छुपकर बैठ गये।
जनता लूटती मरती रही और और ये राजा, महाराजा, और उनके सामन्त बिल में छुपकर बैठ रहे।
बाद में साका और जोहर करने के बजाय उन्हें सीमा में घुसने ही नही देने के लिए ईरान और अफगानिस्तान तथा तुर्किस्तान की सीमाओं पर डटे रहना चाहिए था। लेकिन ये अपनी जागीरों/ स्टेट में ही आपस में लड़ते मरते रहे।
और
आक्रमणकारियों की सेना में भर्ती होकर अपने देशवासियों और स्वजाति बन्धुओं (भारतियों) का संहार करने वाले सैनिकों 
और उन देशवासियों का जिन्होंने अपने खेत खलिहान रोन्दते, दुकान - मकान लूटने वाले विदेशी सैनिकों का जरा भी सामुहिक प्रतिरोध नहीं किया।

मैं उन सभी लोगों का विरोध करता हूँ जो;
इन सब लोगों को दोषी ठहराने के बजाय उनकी उक्त मुर्खतापूर्ण कार्रवाइयों का गुणगान करते फिरते हैं और दोष केवल कर्मकाण्डियों, शास्त्रियों और आचार्यों को ही देते हैं। जिनकी रक्षा का भार उक्त निकम्मे डरपोक राजाओं, सामन्तों और सैनिकों का था।

गुरुवार, 16 जुलाई 2026

प्रारब्ध और पराक्रम का प्रभाव।

1 प्रकृति आयु की गणना श्वास प्रश्वास की संख्या में करतीं हैं।
इसलिए प्राणायाम साधना द्वारा और लम्बी और गहरी श्वास लेने के अभ्यास को आदत में / मसल मेमोरी में डाल देने से ही स्वस्थ्य शरीर, दीर्घायु जीवन और स्वस्थ हुआ जा सकता है।
2 अनन्त जन्मों के सञ्चित कर्मों में से इस जन्म में भोगे जा सकने योग्य कर्म फलों के समुच्चय के उदय को प्रारब्ध कहते हैं ।
3 प्रारब्ध के अनुसार निर्धारित ---
 देश ( अर्थात लोक, ग्रह, महाद्वीप, राष्ट्र, राज्य, प्रदेश, सम्भाग, जिला, तहसील, ब्लाक, ग्राम/नगर, मोहल्ला/ कॉलोनी)।
 काल ( अर्थात कल्प, मन्वन्तर, युग, संवत्सर, अयन, तोयन, ऋतु , मास, पक्ष, दिनांक, और घटि, पल, विपलात्मक समय।)
वंश, कुल, कुटुम्ब और परिवार में , मात-पिता, बड़े-छोटे भाई- बहन, भाभी - जीजा, ताऊ-काका,भुआ, ताई-काकी, फुफा, मामा-मौसी, मामी-मौसा, चचेरे, फुफेरे, ममेरे, मौसेरे भाई- बहन, भाभी - जीजा आदि के बीच जन्म होना, स्व देश, स्व कुल, स्वयम् के परिवार में 
या 
पर देव, अन्य कुल, किसी अन्य परिवार में पालन- पोषण होना, 
शारीरिक बनावट, स्वास्थ्य, सुघड़ता, स्वभाव, आदतें, रुचियाँ-अरुचियाँ, योग्यताएँ- निर्योग्यता, कौशल और पारिवारिक सुख-सुविधाएँ तथा सम्पततियाँ, और आय- व्यय रूपी परिस्थितियों के साथ बच्चे का जन्म होता है।
लेकिन 
4 इनमें विकास करना, वहीँ अटके रहना, घटाना ये सब कर्म पर निर्भर करता है।
यह सही है कि, अधिकांश लोग स्वयम् को परिस्थितियों का दास मानकर परिस्थितियों के अनुसार ही कर्म करते हैं।
किन्तु 
5 सत्वगुण प्रधान, निश्चयात्मकमिका बुद्धि वाले विवेकी पुरुष (शरीर रूपी पुर मे रहने वाला व्यक्ति) समाज में रह रहे लोगों के गुण-दोषों और उनसे उन्हें हुए लाभ हानि को देख-समझकर और गुरुजनों (वरिष्ठ जनों) द्वारा दी गई शिक्षा को अपना कर शुद्र (सेवक), से वैश्य (स्वामी), और फिर क्षत्रिय (शासक) और विप्र (वेदज्ञ), और ब्राह्मण (वेदों को आत्मसात कर आत्मज्ञानी) हो जाता है।
लेकिन 
6 रजोगुण प्रधान आधि-व्याधि, स्त्यान, प्रमाद, आलस्य, संशय, भ्रम, अवरति आदि विक्षेपों से विक्षिप्त और आधिदैविक, अधिभौतिक और आध्यात्मिक दुखों और दौर्मनस्य के कारण पर्याप्त पराक्रम न करने के कारण कष्ट भोगता हुआ, कुछ सुधार करके जैसे-तैसे जी लेता है।

7 तमोगुणी अविवेकी पुरुष तो स्वयम् में केवल गुण ही देख पाता है, बतलाने पर भी दोष नहीं मानता तो सुधार करने का प्रश्न ही नहीं होता इसलिए परिस्थितियों और दुसरों को दोष देकर
आधि-व्याधि, स्त्यान, प्रमाद, आलस्य, संशय, भ्रम, अवरति आदि विक्षेपों से विक्षिप्त और आधिदैविक, अधिभौतिक और आध्यात्मिक दुखों और दौर्मनस्य को अनिवार्य (जिना निवारण नहीं हो सकता ऐसा) मानकर सदा कष्टित, पीड़ित और दुःखी रहता है । फिर भी नहीं सुधरता है और जीवन बर्बाद कर लेता है।

गुरुवार, 25 जून 2026

मृत्यु उपरान्त गति

 मृत्यु पर क्या होता है?
व्यक्ति का *स्वत्व* (स्व पन) समाप्त हो जाता है। इसलिए देह को *अमुक व्यक्ति की देह* कहा जाता है *न कि, अमुक व्यक्ति।* 
ऐसा कहा जाता है कि, " *क* " मर गया यह उसकी (" *क* " की) लाश पड़ी है। 
अब उसका कोई *स्व भाव* (स्वभाव) नहीं बचा।
आँखे, कान, नाक, जीभ, त्वचा सभी दिख रहे हैं लेकिन ज्ञानेन्द्रियाँ नहीं रही। मृत देह न देख सकती है, न सुन सकती है, न स्पर्ष का अनुभव कर सकती है, न सुंघ सकती है, न चख सकती है।
हाथ-पैर, मुँह होते हुए भी न चल नहीं सकती है। न बोल सकती है।
न कोई संकल्प कर सकती है क्योंकि अब मन नहीं रहा, न किसी क्रिया के प्रति मैं लेटा हूँ ऐसा अहम पाल सकती है, न विचार कर सकती है क्योंकि अब बुद्धि नहीं रही, न जाग्रत है, न स्वप्न में है, न निद्रा में है, न समाधि में है न सचेत (होश में) है और न अचेत (बेहोश) है क्योंकि अब चित्त नहीं रहा।।
अब शरीर में न न स्पन्दन है, न तेज (गर्मी) है, न ओज- कान्ति है न अब यह किसी सन्तान को जन्म दे सकती है क्योंकि अब रेतधा- स्वधा नहीं रहा।अब उसके गुण धर्म किसी अगली पीढ़ी में अन्तरित नहीं हो सकते हैं, क्यों कि, सुत्रात्मा नहीं रहा।

अब वह न बालक, युवा या वृद्ध नहीं कहलाता है क्योंकि जब देही ही नहीं रहा तो, अवस्था किसकी होगी। 

इन सब का कारण एक ही है कि, उस *क नामक* व्यक्ति के प्राण निकल गए। लोग कह रहे हैं कि, उसके प्राण पखेरू उड़ गए। अब वह (देही) नहीं रहा।
अरे! पर अचानक क्या हुआ? थोड़ी देर पहले तो लोग कह रहे थे कि, *"क"* नामक उस व्यक्ति के प्राण नहीं निकल पा रहे हैं क्योंकि इनका जीव तो इसके पुत्र में अटका है।
पुत्र आया, *क* ने आँखे खोली, हाथ उठाकर पुत्र के सर पर रखा, पुत्र ने सर गोद में लेकर चम्मच से गङ्गा जल पिलाया, तुलसी दल मुँह में रखा और *क* के प्राण निकल गए।
अब जीव की परलोक की ओर गति प्रारम्भ हो गई।
इस जन्म के भले-बुरे कर्मानुसार भगवान के पार्षद या देव दूत या यम दूत अपनी रीति-नीति अनुसार उसे सम्बन्धित लोक के मार्ग से ले जाएंगे। और कर्मफल अनुसार निर्धारित लोक में निर्धारित अवधि के लिए सुख-दुःख भोगने हेतु तदनुकूल शरीर में रखा जाएगा। या कर्म फलानुसार मृत्युलोक में किसी योनि में जन्म मिलेगा।

अब बचा जीव जिसकी निर्धारित आयु होती है। यह आयु ही जीव की शक्ति होती है। जीवात्मा और आयु को संयुक्त रूप से जीवात्मा कहते हैं। 
अर्थात मृत्यु उपरान्त गति इस जीवात्मा की होती है। यह जीवात्मा प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) का कही जा सकती है। क्योंकि प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) इसी जीवात्मा के केन्द्र में रहती है।
अतः जीवात्मा के साथ ही प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) की गति भी होती है। जैसे चलता वाहन है, उसमें बैठे सभी लोगों की यात्रा उस वाहन के साथ स्वतः होती है। ऐसे ही जीवात्मा के साथ प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) की गति भी होती है। सुविधाएँ या कष्ट पीड़ा जो भी भोग होते हैं इस जीवात्मा को ही प्राप्त होते हैं। लेकिन जीवभाव में स्थित प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) भी मोह वश उन सुविधाओं से सुखी या कष्टों के कारण दुखी होता है।
लेकिन यदि प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) का झुकाव प्रज्ञात्मा की ओर रहता है तो वह मार्ग की सुख सुविधाओं के प्रति तटस्थ रहकर केवल दृष्टा भाव से देखता रहता है लेकिन अप्रभावित ही रहता है।

जिस लोक में जीवात्मा को भेजा जाता है वहाँ जीवात्मा के प्रति आकृष्ट प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) तो वहाँ जीवात्मा को मिलने वाली सुविधाओं से सुखी अनुभव करता है या कष्टों से दुखी होता है। लेकिन यदि इन सब अनुभवों से सांसारिक सुख सुविधाओं के प्रति विरक्त होकर प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) का रुझान प्रज्ञात्मा की और होने लगे तो विवेक जागृत होने से प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) की लगन प्रज्ञात्मा परब्रह्म की ओर हो जाती है और प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) प्रज्ञात्मा परब्रह्म की शरण ले लेता है और श्रेय मार्ग पर कल्याण को प्राप्त कर लेता है। और उसी देव योनि में रहते हुए भी मुक्त हो जाता है।
इसके विपरित जीव भाव के प्रति आकृष्ट प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) को जीवात्मा को प्राप्त योनि का भोग पूर्ण होने पर पुनः मृत्यु लोक में जन्म लेना पड़ता है। सुकर्मों का फल भोगकर लौटे जीवात्मा का जन्म श्रेष्ठ (आर्य) परिवार में होता है और कुकर्मों का भोग कर लौटे जीवात्मा को मृत्यु लोक में भी दास/ दस्युओं के घर जन्म लेना पड़ता है। फिर स्वयम् का कल्याण या पुनरावर्तन या निम्न योनियों में जन्म या पातालादि में अन्धतम लोकों में नर्कादि भोग भोगने हेतु तदनुकूल योनि में जाना पड़ता है।
 इससे स्पष्ट हो गया कि, जन्म, मृत्यु, लोक- लोकान्तर गति, और वास हेतु तदनुकूल योनि में जन्म लेना यह सब जीवात्मा का होता है।
जीवात्मा से जुड़े प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) इन्हें स्वानुभुति मान लेता है और उस लोक के भोग भोगकर मृत्यु लोक में पुनर्जन्म को प्राप्त होता है। लेकिन विवेकवान प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) प्रज्ञात्मा की से युक्त होकर प्रज्ञावान होने के कारण उक्त सभी विषयों को तटस्थ भाव से केवल देखता रहता है। उनसे प्रभावित नहीं होता है। इसलिए वह क्रम मुक्ति के द्वारा मोक्ष प्राप्त कर लेता है।

शनिवार, 13 जून 2026

भारत में मूर्ति पूजा के पूरातत्वीय प्रमाण

 *देवस्थान के प्रारम्भिक प्रमाण वाल्मीकि रामायण में मिलते हैं जहाँ कोशल्या जी विष्णु पूजा करतीं थीं। श्री रामचन्द्र जी विष्णु के स्थान पर जाते थे। सीता जी जनकपुरी में उमा पार्वती के स्थान पर जातीं थीं।*
*लेकिन इनमें न किसी ढाँचे का उल्लेख है न किसी रूप या प्रतिमा का। इसलिए स्पष्ट है कि जैसे यज्ञों में मण्डलों पर ही देवताओं का आह्वान, स्थापना और पूजन होता है, वैसे ही इन स्थानों पर भी मण्डलों में ही देवता की पूजा होती थी। आज तक भी लोग श्री यन्त्र, बीसा यन्त्र आदि में देवताओं की पूजा करते हैं।*

वाल्मीकि रामायण में उल्लेखित ---
*अगार, देवतागार या देवगृह मतलब जहाँ केवल आवश्यक होने पर स्नानादि कर पवित्र होकर ही प्रवेश किया जा सकता है।*
 *अग्नि अगार अर्थात हवन शाला या पूजन कक्ष जो आवासीय परिसर में ही होता है।*
 *आगार का अर्थ है -- जहाँ मण्डप बनाकर मण्डल में देवताओं का आह्वान,यज्ञ- हवन कर नैवेद्य अर्पित कर, स्वस्तिवाचन, ब्राह्मण भोजन दान दक्षिणा द्वारा सन्तुष्ट कर आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है।*
*वाल्मीकि रामायण/ अयोध्या काण्ड/2/4/38*
*दशरथ जी ने राज्याभिषेक के लिए वासुदेव का आगार बनवाया।*
*अयोध्या काण्ड 2/25/16*
*श्रीरामचन्द्र जी ने देवतागार में प्रवेश कर देवताओं को प्रणाम किया।*
*सुन्दर काण्ड 5/15/15*
*हनुमान जी ने रावण के महल में अतुल देवतागार देखा।*
*आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में मुण्डन, उपनयन, विवाह आदि संस्कार के पहले किये जाने वाले माता पूजन कक्ष में अखण्ड दीप जलता है वहाँ स्नान कर बिना सिले रेशमी अधोवस्त्र में ही जाया जा सकता है। यह एक परिवार का नीजी होता है।*

*चैत्य - राज प्रासाद के निकट या वाटिका आदि मे खुले परिसर में चबुतरे में पूज्य वृक्ष के नीचे मण्डल में देवताओं का आह्वान, यज्ञ-हवन और बलिदान कर पूजन कर प्रदक्षिणा करने योग्य स्थान। इसमें मण्डप नहीं होता है। यह एक कुल के लोगों का नीजी होता है।*
*वाल्मीकि रामायण/बालकाण्ड/1/66/8*
*क्षीरस्वामी टीका के अनुसार "चित्यायां भवं चैत्यम् ।*
*अर्थात् चिति = वेदी पर जो हो वह चैत्य, और जिसमें देवता आकर निवास करें वह आयतन*। 

*आयतन/देवायतन --- यह सार्वजनिक स्थान होता है। क्षीरस्वामी टीका के अनुसार आ+यत+अन अर्थात जहाँ प्रयत्न पूर्वक देवता को लाया जाएँ । अर्थात जहाँ मंत्रों से देवता का आह्वान किया जाए। जिसमें देवता आकर निवास करें वह आयतन कहलाता है।*
 *बहु खण्डिय शिखर युक्त स्थाई भवन में विभिन्न देवताओं या किसी देवता विशेष के लिए उपयुक्त मण्डप में स्थाई मण्डल और यज्ञवेदी बनाकर अग्नि प्रज्वलित हो , कलश , जयति (अर्थात जौ या गेहूं के ज्वारे) हो तीन गन्नों और मालाओं की झांँकी हो। क्यारी में तुलसी का पौधा, पीपल और वट वृक्ष, बेल-पत्र, आँवला, और शमी के पौधे होते हैं। अशोक भी होता है।*

जैसे होली और गोवर्धन पूजा के समय करते हैं। *यहाँ सामुहिक उत्सव मनाये जाते हैं।*
*यहाँ सार्वजनिक सन्ध्या, यज्ञ-होम, ब्राह्मण भोजन, दान-दक्षिणा, स्वस्तिवाचन होता है।*
*वाल्मीकि रामायण/ बालकाण्ड/1/5/16 मे कहा है कि, अयोध्या देवायतनों से शोभायमान थी।*

*फिर महाभारत में तीर्थयात्रा प्रकरण में वृक्षों में, तालाब आदि जल स्रोतों में यक्ष गन्धर्वों और नागों का वास मानने का और अनार्यों में इन वृक्षों, यक्षों और नागों की पूजा प्रचलित थी इसके प्रमाण हैं। लेकिन इसके लिए मात्र चबुतरे बना कर पूजा करते थे।आज भी भिन्न भिन्न पर्वोत्सवों पर चबुतरे के बीच लगे वृक्ष की पूजा होती है और तुलसी के पौधे में महा सति वृन्दा की, पीपल वृक्ष में विष्णु की, वट वृक्ष में ब्रह्मा की और शमी मे देवी की पूजा होती है।*
*निषाद, किरात आदि वनवासी जातियों ने डायनासोर के अण्डों को शिवलिङ्ग मानकर पूजना प्रारम्भ किया। जो आजतक प्रचलित है।*
*बाद में नर्मदा नदी में देवास जिले की बागली तहसील में धाराजी के जल प्रपात से बनने वाले बेलनाकार पत्थरों को बाणासुर द्वारा प्राण प्रतिष्ठित शिवलिङ्ग मानकर पूजना प्रारम्भ हुआ। लेकिन सरदार सरोवर के बेक वाटर से वह झरना भी नहीं रहा और बाणेश्वर शिवलिङ्ग बनना भी बन्द हो गये। लेकिन अब सनावद और पेशवा बाजीराव प्रथम की समाधि स्थल सनावद तहसील के रावेर के निकट ही खरगोन जिले की बड़वाह तहसील के ग्राम बकावाँ में शिवलिङ्ग गड़ने का कारोबार प्रारम्भ हो गया। और शिवलिङ्ग धड़ल्ले से बेंचे और खरीदे जा रहे हैं।*
*शाक्त पन्थ में बिजोरा निम्बू में मातृका लिङ्ग मानकर पूजा आज भी होती है।* 
*ऐसे ही वैष्णवों ने कम से कम दस-बारह लाख वर्ष पुराने ऑक्टोपस उपवर्ग के स्वविड नामक वर्तमान समुद्री जन्तु के दूर के सम्बन्धी कपालपाद (Cephalopod सेफैलोपॉड) नामक समुद्री जीव का चक्राकार कवच  में 
 चक्राकार और शङ्खाकार संरचना देखकर शालिग्राम शिला को विष्णु लिङ्ग मानकर पूजना प्रारम्भ किया साथ में चल चढ़ाने आदि के लिए समुद्री जीव शंख रखना प्रारम्भ किया। ये सब परम्परा आज तक प्रचलित है।*
*ऐसे ही त्रिकोणीय पत्थर में देवी तथा पत्थर पर पत्थर रखकर भैरव एवम् चिकने लगभग तिकोने गोल पत्थर में गजानन विनायक की पूजा होने लगी। लेकिन ये सब प्रथाएँ अनार्यों में ही प्रचलित थी। आर्यजन अर्थात श्रेष्ठ जनों में तब भी और आज भी यज्ञ परम्परा ही प्रचलित थी जो गुरुकुलों में आज भी प्रचलित है।*
*इसके प्रमाण भी मिले हैं जैसे वैदिक सभ्यता जिसमें महाभारत युद्ध तक सरस्वती नदी सदानीरा थी। लेकिन महाभारत युद्ध के बाद हिमालय में आये कुछ उभारों के कारण यमुना और अन्य सहायक नदियों के बहाव की दिशा बदलने से पश्चिम भारत की सारस्वत नागर सभ्यता-संस्कृति के बहुत से नगर उजड़ गए। इन उभारों को पञ्च केदार के रूप में जाना जाता है। पुरातत्वीय उत्खनन में जिनमें राखीगढ़ी, लोथल, मोहनजोदड़ो , हड़प्पा आदि के अवशेष पाए गए हैं। ये लोग विदेश यात्रा करते थे, इनके नगरों में विदेशियों का आगमन होता रहता था, तथा कुछ विदेशी बस्तियाँ भी थी।*  
*इनमें कुछ श्रमण मार्गी लोग तान्त्रिक मतावलम्बी थे, और लिङ्ग पूजा करते थे ये व्यावसायिक गतिविधियों से प्रायः दूर रहने के कारण निर्धन और रुग्ण थे। भारतीय आर्य जन इन्हें अस्पृश्य मानते थे। ये लोग नवीन स्थान के प्रति असहज होकर मातृभूमि के लगाव या जनसंख्या कम होने से उपलब्ध संसाधनों पर कब्जा करने या असामर्थ्य वश वहीं रुक गये। परिणाम स्वरूप बहुत बुरी हालत में मरते गए।*
*जबकि समझदार आर्य जन आस-पास के हरे-भरे उपजाऊ भू भाग में बस गये। जो लोग सूखे के दौरान भी नहीं हटे उनके ही अवशेष भी पाये गए हैं।* 
*इस प्रकार महाभारत काल में अनार्य दास-दस्युओं, तान्त्रिकों, श्रमणों, व्रात्यों में प्रतिमा पूजन और मूर्ति पूजा प्रचलित थी।*

वर्तमान मन्दिर इसी देवायतन की नकल है। उदाहरणार्थ महाकाल मंदिर में महाकाल के उपर चान्दी का श्री यन्त्र बना है। 
देवी मन्दिरों में बीसा यन्त्र बना रहता है। 
विष्णु मन्दिर में शालिग्राम शिला  चक्र और शंख जैसी संरचना बने और शंख शालिग्राम शिला और तुलसी क्यारी होती है।

इनके कुछ पुरातत्त्वीय प्रमाण नीचे दिए गए हैं।

1   बघोर-I के मूल 1983 के शोध-पत्र "An Upper Palaeolithic Shrine in India?"के अनुसार 1980–82 में सीधी जिले की सोन घाटी में स्थित बघोर-I स्थल का उत्खनन G. R. Sharma और J. Desmond Clark के नेतृत्व  में किया गया।उनके साथ Jonathan Mark Kenoyer तथा J. N. Pal भी जुड़े थे।

 पूजा-मंच की संरचना, त्रिकोणाकार शिला के आयाम, पीले रंग (yellow pigment) के प्रयोग तथा उसके शक्ति-यन्त्र 
  उत्खनन में पत्थरका एक वृत्ताकार पूजा-मंच (platform) मिला, जिसके मध्य में एक प्राकृतिक त्रिकोणाकार रंगीन पत्थर रखा हुआ था। त्रिकोणाकार शिला के आयाम, पीले रंग (yellow pigment) के प्रयोग तथा उसके शक्ति-यन्त्र मिला।
इस स्थल को उत्तर पुरापाषाण (Upper Palaeolithic) काल के अंतिम चरण का माना गया है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार इसकी तिथि लगभग 10,000–9,000 ईसा पूर्व (या लगभग 11,000–12,000 वर्ष पूर्व) मानी जाती है। 
पुरातत्वविदों ने देखा कि निकटवर्ती क्षेत्र के कोल और बैगा समुदाय आज भी त्रिकोणाकार प्राकृतिक पत्थरों को "माई" (मातृदेवी) के रूप में पूजते हैं। बघोर-I में मिला पत्थर भी उसी प्रकार का था और एक विशेष मंच पर स्थापित था। इस आधार पर उत्खननकर्ताओं ने यह परिकल्पना प्रस्तुत की कि यह संभवतः किसी देवी अथवा स्त्री-तत्त्व (female principle) का पूजा-स्थल रहा होगा। इसे एक अनुष्ठानिक (ritual) स्थल माना जाता है।
स्वयं उत्खननकर्ताओं ने भी "मूर्ति-पूजा" का सबसे प्राचीन बहुत प्रबल संभावना" (strong probability) की बात कही थी, न कि पूर्ण निश्चितता की। 

2  उड़ीसा (ओडिशा) की राजधानी भुवनेश्वर (Bhubaneswar) के निकट  उदयगिर गुफा (Udayagiri Caves) में स्थित हाथी गुम्बा (Hāthigumphā) में
कलिङ्ग के राजा खारवेल (Kharavela) का पहली शताब्दी ईसा पूर्व का अभिलेख मिला है जिसका संबंधित भाग कुछ स्थानों पर क्षतिग्रस्त है और उसके पाठ (reading) को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं उसके आधार पर ऐसा दावा किया जाता है कि, किसी नन्दराजा द्वारा कलिङ्ग पर आक्रमण कर कोई धार्मिक धरोहर या एक पूजनीय वस्तु या जैन प्रतीक या जिन-प्रतिमा 
 मगध ले जाई गई थी, और मगध में स्थापित किया था। परन्तु उसका सटीक स्वरूप निश्चित नहीं है।
कई शताब्दियों बाद खारवेल ने मगध पर अभियान किया। उसने उस प्रतिमा को पुनः कलिङ्ग वापस लाकर प्रतिष्ठित किया।
जैन परम्परा का मत है कि वह अग्रजिन (Agra-Jina) अथवा प्रथम जिन, अर्थात् (आदिनाथ) ऋषभदेव  (Rishabhanatha)  की प्रतिमा थी।
इस आधार पर यह माना जाता है कि, ईसा पूर्व चौथी–पाँचवीं शताब्दी तक पूर्वी भारत में जैन प्रतिमा-पूजा का कोई विकसित रूप विद्यमान था। जैन परम्परा के अनुसार उस नन्द शासक की पहचान महापद्म नन्द के रूप में करना सम्भावित तथ्य है, परन्तु पूर्णतः सिद्ध नहीं है।
3 मथुरा से 24 कि.मी. दक्षिण पश्चिम में सोंख नामक स्थान पर 1966 से 1974 के बीच जर्मन पुरातत्ववेत्ता हर्बर्ट हर्टेल के निर्देशन में हुए उत्खनन में ईसापूर्व 800 से 400 तक के खम्भों के गड्ढे, मिट्टी के घर आदि ग्रामीण बसावट के प्रमाण प्राप्त हुए।
इसके अतिरिक्त मोर्य का ईसा पूर्व पहली शताब्दी के अर्धवृत्ताकार नाग मन्दिर मिला;जिसका पुनर्निर्माण कुषाण काल में हुआ। यहाँ श्रमणों द्वारा पूजित यक्ष- यक्षिणी, नाग और मातृका की टेराकोटा (पकी मिट्टी) की प्रतिमाएँ भी मिली।

मध्यप्रदेश में विदिशा जिले में बेतवा और बेस नदी के सङ्मम क्षेत्र में बेसनगर (भिलसा) में  शुंग राजा 'भागभद्र' के शासनकाल में तक्षशिला के युनानी (ग्रीक) राजा 'एंटियालसिडस' के राजदूत श्रीकृष्ण और बलराम के उपासक  हेलियोडोरस ने 113 ईसापूर्व में गरुड़ध्वज स्तम्भ का निर्माण करवाया था।

4 इसके अलावा पाणिनि की अष्टाध्याई में उल्लेखित वर्णनो में तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व मे देव स्थानों का वर्णन महाभारत के वर्णनों से मैल खाता है।
लेकिन पाणिनि की अष्टाध्याई पर पतञ्जली के महाभाष्य में दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में विष्णु, शिव, देवी देवताओं की प्रतिमाओं और मूर्तियों के वर्णन के आधार पर पहली बार ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में सनातन वैदिक धर्म में मूर्ति पूजा के प्रमाण माना जाता है।
और ईसा की दुसरी और पहली शताब्दी में कुषाण वंश के कनिष्क के समय मन्दिरों  और चैत्यों में मानवीय आकार की विकसित और बढ़ी मूर्तियों की पूजा प्रारम्भ हुई।

शुक्रवार, 12 जून 2026

भारत की दुरावस्था के कारण।


भारत की दुर्दशा के प्रमुख कारण गुरुकुलों की समाप्ति, वेदाध्ययन , पञ्च महायज्ञ और अष्टाङ्ग योग साधना बन्द होना तथा विदेश यात्रा पर प्रतिबन्ध के कारण कुप मण्डुकता रहे।

जिन्हें आज दलित और पिछड़ा कहा जा रहा है इन सब कुलों/ वंशों का लगभग एक हजार वर्ष पहले बल्कि कई स्थानों पर तो उससे भी आगे तक किसी ना किसी क्षेत्र में शासन रहा है। 
ऊँच-नीच के सर्व प्रथम प्रमाण जैन-बौद्ध साहित्य में ही पाए जाते हैं। स्पष्ट है कि, किसी का भी मत परिवर्तन के लिए ऐसे दुष्प्रचार आवश्यक रहे होंगे।
फिर इनके व्यवसाय के नाम पर जाति मान लिया गया।
इन सभी व्यवसायों का भी अपरिहार्य महत्वपूर्ण स्थान हमारे समाज में मान्य था। कोई ऊँच नीच का भेद-भाव नहीं रहा।

इस्लामी आक्रांताओं के भारत में आगमन पूर्व कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है कि, इन लोगों के प्रति कोई दुर्भावना या भेद-भाव या अत्याचार हुआ हो। यह सत्य है कि, इस्लामी आक्रांताओं के जासूस पीर फकिरों की जादूगरी से चमत्कृत होने, जजिया कर देने से बचने और आक्रांताओं के अत्याचार से बचने के लिए सर्वाधिक मतांतरण इन्हीं लोगों का हुआ। इसलिए सनातन वैदिक वर्णाश्रम धर्म को बदनाम करने लगे।

गुरुवार, 11 जून 2026

अण्डाकार शिवलिङ्ग और अण्डाकार विष्णु लिङ्ग शालिग्राम पूजन।

वैदिक काल में भी तन्त्र मतावलम्बियों में चोरी-चुपके मूर्ति पूजा प्रचलित थी ही।  वैदिक उन्हें शिश्नेदेवाः कहते थे। और उनके संसर्ग को भी पाप समझते थे।

वैवस्वत मन्वन्तर में प्रचेताओं के पुत्र दक्ष द्वितीय यज्ञ विध्वंस के बाद प्रजापति ने विधि- विधान में संशोधन कर यज्ञ में रुद्र का भाग देना स्वीकार कर लिया तो शुक्राचार्य और दधिचि आदि ने शैव मत की स्थापना कर दी।
शुक्राचार्य के पुत्र त्वष्टा ने शाक्त मत की स्थापना कर दी और त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप ने तन्त्र मत की स्थापना कर दी। भारत में  दत्तात्रेय और उनके शिष्य कार्तवीर्य सहस्रार्जुन तथा रावण ने तन्त्र मत का प्रचार किया।
रामायण काल तक भारत में मूर्ति पूजा प्रचलित नहीं थी। अयोध्या में भगवान विष्णु के स्थान (स्थानक) और जनकपुरी में भगवती उमा के स्थान (स्थानक) का उल्लेख है। लेकिन लक्ष्यद्वीप में किल्तान द्वीप में स्थित रावण की राजधानी लङ्का में राक्षसों द्वारा पूजित यक्षिणी निकुम्भला की मूर्ति वाले मन्दिरों का ही उल्लेख पाया जाता है।
महाभारत में भी राक्षसों में ही मूर्ति पूजा और बलि प्रथा का उल्लेख मिलता है।
बाद में कुछ वन वासियों को नर्मदा घाटी में जब डायनासोर के अण्डों के जीवाश्म मिले तो उन लोगों ने उन्हें पूजना प्रारम्भ कर दिया।
उनके देखा देखी बाणासुर ने भी नर्मदा के जल प्रपात धाराजी में प्राकृतिक रूप से बनने वाले अण्डाकार पत्थरों को शिवलिङ्ग मानकर पूजना प्रारम्भ कर दिया। जिसे वनवासियों ने भी अपना लिया। अण्डाकार शिवलिङ्ग को स्थिर खड़ा रखने के लिए एक आधार बनाया जिसे जलाधारी कहा जाता है।
उधर वेद विरोधी नास्तिक अनीश्वरवादी जैन लोगों ने अरब प्रायद्वीप में प्रचलित विनायक और भैरव आदि की मूर्ति पूजा प्रारम्भ की तो, वैदिक वर्णाश्रम धर्मावलम्बी विष्णु उपासकों ने भी नेपाल में काली गण्डकी नदी में हिमालय काटकर बहाकर लाये जीवाश्मों को  मुक्तिधाम से दामोदर कुण्ड तक 65 किलोमीटर क्षेत्र में सेफैलोपॉड
(कपालपाद) की सर्पिल कक्षों को जोड़ने वाली 89 प्रकार की सीवन रेखा से बनी प्रतिमा स्वरूप (Suture Pattern) के शालिग्राम को विष्णु के चिह्न (विष्णु लिङ्ग) के रूप में पूजना प्रारम्भ कर दिया।
फिर ईरान की मीड संस्कृति के पुरोहितों को भगवान श्रीकृष्ण ने   साम्म के कुष्ठ रोग निवारण हेतु बुलाया तो पहले तो वे अथर्ववेदीय यज्ञ करते रहे। किन्तु जनमेजय के बाद उन्होंने ईरान में प्रचलित सूर्य पूजा के लिए सूर्य की मूर्ति स्थापित कर पूजा करने और गुजरात और उड़ीसा में मन्दिर बनाना प्रारम्भ कर दिया।
महाराष्ट्र और तमिलनाडु में विनायक गजानन की प्रतिमा पूजन प्रारम्भ हो गया। बङ्गाल में दूर्गा प्रतिमा पूजा होने लगी तो फिर दक्षिण भारत में वैष्णवों ने भी विष्णु, नारायण और श्रीहरि की मूर्ति बनाकर पूजना प्रारम्भ कर दिया।

अर्थात शैवों ने साढ़े छः हजार वर्ष पुराने जीवाश्म डायनासोर के अण्डों को शिव चिह्न (शिवलिङ्ग) के रूप में पूजना प्रारम्भ किया तो वैष्णवों ने भी चालिस करोड़ वर्ष पहले के और
सोलह करोड़ से अठारह करोड़ वर्ष पहले जब हिमालय के स्थान पर ऋग्वेद में उल्लेखित उत्तर सागर (टेथिस सागर) था; तब जुरासिक काल में समुद्र में विलुप्त हो चुके समुद्री अकशेरुकी जीवों का एक उपवर्ग अमोनोइडिया (Ammonoidea) जिन्हें आम तौर पर अमोनाइट्स (Ammonites) कहते हैं; समुद्री जीवों का एक विलुप्त हो चुका उपवर्ग (subclass) है। ये जीव कड़क (सख्त) चक्राकार खोल के अन्दर रहते थे। इस उपवर्ग का ऑक्टोपस - स्वविड के दूर के सम्बन्धी कपालपाद (Cephalopod सेफैलोपॉड) नामक समुद्री जीव का चक्राकार कवच  है। जो लाखों वर्ष में दबाव के कारण पत्थर जैसे बन गये केल्सियम और सिलिका से भरने से बने छिद्र और रेखाओ वाले कवच का जीवाश्म है।
हिमालय बनने पर उत्तर 
सागर उठा तब काली गण्डकी नदी ने हिमालय काटकर इन जीवाश्मों को बहाकर मुक्तिधाम से दामोदर कुण्ड तक 65 किलोमीटर क्षेत्र में  सर्पिल कक्षों को जोड़ने वाली 89 प्रकार की सीवन रेखा (Suture Pattern) बनी हैं।
जिनमें  
1 अमोनाइट का चक्राकार कवच सुदर्शन शालिग्राम सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

2 पास-पास दो कुण्डलित कवच वाला लक्ष्मी नारायण शालिग्राम,
 
3 पत्तीनुमा धारियों वाले वनमाली कवच, 

4 कवच का खुला सिरा टूटने से बना घोड़े के मूह जैसा कवच हयग्रीव शालिग्राम,
और

5 चपटा बहने से मछली के आकार वाला कवच मत्स्य शालिग्राम,
ये पाँच अधिक प्रसिद्ध है।