गणपति।
हिरण्यगर्भ को सृष्टि रचना के कर्तव्य पालन का कोई सुत्र नहीं मिल रहा था इसके कारण हिरण्यगर्भ को रोष हुआ। इस रोष की झुंझलाहट में पञ्च मुखी हिरण्यगर्भ ब्रह्मा की भृकुटी से अर्धनारीश्वर महारुद्र प्रकट हुए। प्रजापति भी इनके बाद हुए। फिर सनक, सनन्दन, सनत्कुमार, सनातन और नारद हुए। फिर धर्म-धृति और काम-रति हुए। हिरण्यगर्भ से सर्व प्रथम उत्पन्न होने के कारण अर्धनारीश्वर महारुद्र महादेव भी कहलाते हैं।
चतुर्मुख प्रजापति के से दक्ष- प्रसुति , रुचि -आकुति, कर्दम-देवहुति और स्वायम्भुव मनु-शतरूपा हुए। इसी समय अर्धनारीश्वर महारुद्र ने स्वयम् को शंकर और उमा के रूप में विभाजित कर लिया।
रुद्र अन्तरिक्ष स्थानी देवता हैं। शंकर जी और उमा कैलाश वासी हैं।
इस कारण पूरी पृथ्वी पर शिव परिवार की पूजा होती है। अरब प्रायद्वीप - सऊदी अरब, यमन, ओमान, संयुक्त अरब अमीरात, जोर्डन, स्वेज, लेबनान, लिबिया, साइप्रस, फिलिस्तीन (इजराइल), मिश्र, सीरिया, इराक, टर्की, आर्मेनिया, अज़रबैजान, उज़्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, कज़ाकस्तान,
पूर्वी अफ्रीका में इरिट्रिया, इथियोपिया, केनिया, सुडान,
दक्षिण अमेरिका, मध्य अमेरिका, सब जगह शिव परिवार की मूर्तियाँ बना कर पूजा जाता था।
वैदिक काल में समुदाय (कबीले) को गण और समुदाय के मुखिया को गणपति कहते थे।
शंकर जी के गणों में
नन्दी वृषभ (जाति समझ नहीं आई)
श्रङ्गी (जाति पता नही।)
भृङ्गी (जाति पता नही।)
वीरभद्र , भद्रकाली
वासुकी नाग,
पुष्पदन्त गन्धर्व,
मणिभद्र यक्ष,
रावण राक्षस,
विनायक पिशाच
छत्तीस यक्षिणियाँ।
चौंसठ योगिनियाँ।
संस्कार विहिन, निरग्नि, निर्ग्रन्थ, आचार भ्रष्ट, यहाँ तक कि,जननेन्द्रिय की नस मार लेने वाले, समाज से बहिष्कृत व्रात्य गण और विचित्र चेहरे वाले, उग्र, उन्मत्त, और भयानक स्वभाव वाले यौद्धा प्रमथ गण और उनके स्वामी लम्बोदर, गजानन विनायक गण हैं।
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व्रात्य का अर्थ ऐसे श्रमण जो संस्कार विहिन हो, निरग्नि हो, निर्ग्रन्थ हो, आचार भ्रष्ट हो, यहाँ तक कि, जिसने जननेन्द्रिय की नस मार ली हो समाज से बहिष्कृत ऐसे लोग व्रात्य कहलाते थे।
व्रात्य लोगों में, सन्यास आश्रम में ऋषभदेव, जड़ भरत जैसे ज्ञानी भी हुए और जैन मुनि बाहुबली भी हुए तो अघोरी भी व्रात्य की श्रेणी में आते हैं।पहले शंकर जी और बाद में विनायक गजानन भी व्रात्यपति कहलाए।
मङ्गोलिया वासी प्रमथ गण विचित्र चेहरे वाले, उग्र, उन्मत्त, और भयानक स्वभाव वाले यौद्धा थे। सम्भवतः वीरभद्र , भद्रकाली और नन्दी गण भी प्रमथ गणों में से ही थे। विनायक गजानन इनके गणपति थे।
पहले शंकर जी और बाद में विनायक गजानन भी व्रात्यपति कहलाए। व्रात गणों और प्रमथ गणों के गणपति गजानन विनायक थे।
मीढ गण, नन्दी गण आदि अनेक गणों के गणपति शंकर जी थे। साथ ही इन गणों के गणपति भी भगवान शंकर ही थे। वे सभी गणों के प्रिय पति और उनकी पशुधन रूपी निधि के संरक्षक भी थे। इसलिए उन्हें निधिपति भी कहते थे। इसलिए भगवान शंकर जी महा गणाधिपति भी कहलाते हैं। लेकिन बाद में , शंकर भगवान ने निधिपति का कार्यभार अपने मित्र और देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर को सोप दिया। और रुद्र गणों के गणपति का कार्यभार गजानन विनायक को सोप दिया। देवसेनापति नियुक्त होने के बाद रुद्रगणों का रक्षकण कार्य शंकर जी ने कार्तिकेय को सोप दिया। तथा रुद्र गणों का दण्डनायक (कोतवाल) का कार्य भैरवनाथ को सोप दिया। वीरभद्र को रुद्रगणों का सैन्य नायक नियुक्त किये गए। चण्डी की अधीनस्थ भद्रकाली वीरभद्र की सहायक बनी।जैसे गणराज्य का अध्यक्ष उस गण का गणपति होने के नाते प्रथम नागरिक कहलाता है। प्रथम निमन्त्रण गणपति को दिया जाता है। इसलिए गणपति प्रथम पूज्य कहलाते हैं।शुक्ल पक्ष की मध्याह्न व्यापनी चतुर्थी को विनायक चतुर्थी कहते हैं। विनायक चतुर्थी को ब्रह्मणस्पति सूक्त का पाठ होता है। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को गजानन विनायक को जन्मदिन के उपहार में गणपति पद मिला था, इसलिए संकष्टी चतुर्थी भाद्रपद शुक्ल की विनायक चतुर्थी को मध्याह्न में गजानन जन्मोत्सव मनाते हैं।शेष कृष्ण पक्ष की संकष्टी चतुर्थी व्रत में गणेश अथर्व शीर्ष का पाठ करते हैं।
श्री पाण्डुरङ्ग वामन काणे ने धर्मशास्त्र का इतिहास भाग -1 पृष्ठ 186 पर स्पष्टीकरण लिखा है कि, अष्ट विनायक - 1 सम्मित, 2 उस्मित, 3 मित, 4 देवयजन, 5 शाल, 6 कटंकट, 7 कुष्माण्ड, और 8 राजपुत्र ये आठों पिशाच हैं और शिवगण हैं।
विनायक मूलतः विघ्न डालते हैं, शंकर जी के समान ही गजानन ने भी अपने ही विवाह में एक हजार विघ्न उपस्थित किए थे। इस लिए भय वश इन्हें प्रथम निमन्त्रण देते हैं और भोग आदि देकर सन्तुष्ट करने का प्रयत्न किया जाता है। जैसे मोहल्ले के गुण्डे को भिया आपके घर का कार्यक्रम है, ध्यान रखिएगा कहकर चने के झाड़ पर चढ़ा देते हैं, तो वह प्रसन्न होकर विघ्न नहीं डालता है। बल्कि आस-पास के दुसरे मोहल्ले के गुण्डों से भी बचाता है।
वर्तमान में जिन्हें भूत-प्रेत समझा जाता है वस्तुतः वे पिशाच होते हैं, जो क्षणिक दृश्यमान और अदृश्य होते रहते हैं, बिमार कर देते हैं, शिकार व्यक्ति को आवेशित कर देते हैं, खून चूसते हैं, खाद्य या मदिरा आदि तथा बीड़ी, सिगरेट, गांजा आदि मांगते हैं, देने वाले पर प्रसन्न हो जाते हैं, बावड़ियों, इमली के पेड़ आदि पर निवास करते हैं। वेदों में इन्हें रक्षोहा कहा जाता है।