बुधवार, 29 अप्रैल 2026

श्रीरामचन्द्र जी और उनके समकालीन लोगों का चरित्र और इतिहास जानने का एकमात्र साधन वाल्मीकि रामायण ही है।

इतिहास का सच जानने के लिए केवल वाल्मीकि रामायण और महाभारत ग्रन्थों पर ही निर्भर रहना पड़ता है।
चुंकि महर्षि वाल्मीकि परशुरामजी और श्री रामचन्द्र जी के समकालीक थे, सीता जी वाल्मीकि आश्रम में रही थी।
महर्षि वाल्मीकि ने प्रजापति ब्रह्मा के निर्देश पर, देवर्षि नारद जी से श्री रामचन्द्र जी का इतिहास और चरित्र सुनकर, और फिर सीता जी से जानकारी सुनिश्चित कर रामायण की रचना की थी। 
इस लिए सगर, महर्षि वशिष्ठ, महर्षि विश्वामित्र, महर्षि अगस्त्य, महर्षि वाल्मीकि, महर्षि भरद्वाज, दशरथ जी,जनक जी, महर्षि ऋष्यश्रङ्ग, रामचन्द्र जी की बड़ी बहन शान्ता, रामचन्द्र जी, परशुरामजी, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, सीता जी,   कौशल्या , सुमित्रा, कैकई, अहिल्या,  शबरी, हनुमान जी, बाली, सुग्रीव, जामवन्त जी, नल-नील,  रावण, कुम्भकरण, विभिषण, शुर्पणखा, केकसी, मन्दोदरी आदि के चरित्र जानने का एकमात्र साधन वाल्मीकि रामायण है।
साथ ही 
रामायण में उल्लेखित विषय ---
परशुरामजी का जन्म, महर्षि जमदग्नि द्वारा अपने क्षेत्र के राजा कार्तवीर्य सहस्रार्जुन का सेना सहित स्वागत-सत्कार करने पर कामधेनु की शक्ति जानकर सहस्रार्जुन का लोभ जागना और कामधेनु का हरण करना, विरोध करने पर उनकी आश्रम तहस नहस करना, क्रोधित परशुरामजी द्वारा कार्तवीर्य सहस्रार्जुन का वध कर दिया।
महाभारत के अनुसार कार्तवीर्य सहस्रार्जुन के वध का बदला लेने हेतु कार्तवीर्य सहस्रार्जुन के पुत्रों ने परशुरामजी के पिता  महर्षि जमदग्नि को समाधि अवस्था में हत्या कर दी। पति की हत्या से व्यथित परशुरामजी की माता रेणुका सती हो गई। इससे क्रोधित होकर परशुरामजी ने कार्तवीर्य सहस्रार्जुन के 21 कुलों का नाश कर दिया।
केवल चन्द्रवंश की शाखा हैहय वंशियों के इक्कीस कुलों का संहार किया था न कि, सभी क्षत्रियों का और बाद में महर्षि ऋचिक द्वारा रोके जाने पर प्रायश्चित स्वरूप अश्वमेध यज्ञ कर विजित भूमि महर्षि कश्यप को दान कर महेन्द्र पर्वत पर तप करने लगे। और देवराज इन्द्र के समक्ष अपने शस्त्र त्याग दिये।
इसी समय शिवजी का पिनाक धनुष जनक जी के यहाँ रखा गया। लेकिन वैष्णव धनुष अपने पास रखा जिसे शिव धनुष टूटने पर चुनोति के रूप में श्रीरामचन्द्र जी को दिया और उसके साथ ही परशुरामजी का वैष्णव तेज और अवतारत्व श्री रामचन्द्र जी में समा गया।

श्री रामचन्द्र जी का विश्वामित्र जी के साथ रहने, धनुर्वेद शिक्षा लेने, राक्षसों के प्रति धारणा बनने, राक्षसों को दण्डित करने, ताड़का वध, गोतम पत्नी अहिल्या का इन्द्र के प्रति आकर्षण और फिर इन्द्र के साथ रमण करना, गोतम का शाप कि, पाषाणवत स्थिर रहकर लोगों की दृष्टि से छुपकर (अदृष्य रहकर), निराहार रहते हुए, (भूख नहीं सताए इसके लिए प्राणायाम की एक क्रिया है, वायु भक्षण) केवल वायु का भक्षण कर श्री रामचन्द्र जी की प्रतीक्षा करना। जब वे इधर से गुजरेंगे तब उनका स्वागत सत्कार करने पर प्राश्चित पूरा होगा। अर्थात दण्ड पूर्ण होगा, अहिल्या ने यही आदेश स्वीकार कर पालन किया। विश्वामित्र जी के साथ श्री रामचन्द्र जी और लक्ष्मण जी का जनक पुरी जाना, रास्ते में गोतम आश्रम सुना दैखकर विश्वामित्र जी से पूछना, विश्वामित्र जी ने अहिल्या के प्राश्चित हेतु तप करने और उनके उद्धार के आदेश पर गोतम आश्रम में जाकर अहिल्या जी के पैर छूकर प्रणाम किया। फिर अहिल्या जी द्वारा प्रस्तुत जलपान और फल कन्द आदि ग्रहण कर अहिल्या जी का प्राश्चित पूर्ण होना और महर्षि गोतम से जा मिलना।
जनक पुरी में महर्षि विश्वामित्र, श्री रामचन्द्र जी और लक्ष्मण जी द्वारा शिवजी का पिनाक धनुष का दर्शन करना, श्री जनक जी का सीता जी के जन्म और विवाह के बारे में प्रतिज्ञा लेने की बात बतलाना, सीता जी से विवाह के इच्छुक राजाओं द्वारा धनुष उठाकर प्रत्यञ्चा चढ़ाने में असफल होने पर जनक जी पर सामुहिक आक्रमण करना और इन्द्र के द्वारा उन सभी अक्रान्ता राजाओं को परास्त कर भगाने का वृतान्त सुनाना,
श्री रामचन्द्र जी द्वारा पुराने शिव धनुष पर सहज ही प्रत्यञ्चा चढ़ाकर टंकार करने पर टुटना धनुष टूटना, परशुरामजी का आगमन, श्री रामचन्द्र जी को वैष्णव धनुष देकर उसपर प्रत्यञ्चा चढ़ाने की चुनौती देना, धनुष देने के साथ ही परशुरामजी का अवतारत्व का पदभार (चार्ज) श्री रामचन्द्र जी में समाहित हो जाने पर परशुरामजी का शान्त होना का इतिहास जानने का एकमेव साधन वाल्मीकि रामायण है।
श्री रामचन्द्र जी का युवराज पद पर सभा की सहमति से चयन, मन्थरा द्वारा भड़काने पर कैकई द्वारा रामचन्द्र जी को चौदह वर्ष का वनवास और भरत का राज्याभिषेक की मांग। श्रीरामचन्द्र जी का वनवास गमन, सीता जी और लक्ष्मण का साथ जाना, वशिष्ठ जी के निर्देश पर वनवास में भी सीताजी पूर्ण राजसी श्रङ्गार सहित रहना।  दशरथ जी की मृत्यु, भरत और शत्रुघ्न को कैकई देश से वापस बुलाना, भरत के लौटने पर का पूरी अयोध्या में तिरस्कार होता देख भरत को किसी अनिष्ट की आशंका, दशरथ जी की अन्त्येष्टि, भरत का श्री रामचन्द्र जी को लौटा लाने के लिए जाना लेकिन श्री रामचन्द्र जी का वापस नहीं आना। भरत श्री रामचन्द्र जी की पादुका लाकर नन्दीग्राम में पादुका स्थापित कर श्री रामचन्द्र जी के प्रतिनिधि के रूप में शासन करना। वनवास में भरत के बार-बार आवागमन की आशंका के चलते चित्रकूट छोड़कर पञ्चवटी जाना, शुर्पणखा की नाक काटने पर शुर्पणखा द्वारा रावण को श्री सीता जी के हरण के लिए दुष्प्रेरित करना, मारिच द्वारा स्वर्णमृग बनकर सीता जी को स्वर्णमृग पालने और वापसी में अयोध्या ले चलने की अभिलाषा प्रकट करना, श्री रामचन्द्र जी द्वारा लक्ष्मण पर सीताजी की अभिरक्षा का भार सोपना, मारिच द्वारा श्री रामचन्द्र जी के स्वर में लक्ष्मण को पुकारने पर सीताजी द्वारा लक्ष्मण जी को श्रीरामचन्द्र जी की सहायतार्थ भेजना। श्री रामचन्द्र जी द्वारा सीताजी को श्री रामचन्द्र जी के सामर्थ्य बतलाने और राक्षसों का छल-कपट कहने पर सीताजी द्वारा लक्ष्मण जी पर आक्षेप लगाकर जबरन भेजना। रावण द्वारा साधुवेश में भिक्षा याचना कर सीताजी का अपहरण करना, जटायु जी द्वारा सीताजी को छुड़ाने के प्रयत्न में प्राण अर्पण करना। फिर श्री रामचन्द्र जी को रावण द्वारा सीताजी के अपहरण की जानकारी देकर प्राण त्याग करना जटायु जी की अन्त्येष्टि, शबरी जी द्वारा सुग्रीव से मिलने का सुझाव। फिर  हनुमान जी से मिलना और सुग्रीव से मैत्री, बाली वध, वर्षा ऋतु समाप्त होने पर अङ्गद, जामवंत जी, नल-नील और हनुमान जी को सीता जी की खोज हेतु विंध्याचल के दक्षिण में एक माह में खोजने हेतु भेजना। उस समय सुग्रीव जी लंका का क्षेत्रफल सौ वर्ग योजन अर्थात लगभग 36×36=1296 वर्ग किलोमीटर बतलाया और लंका के आस-पास आठ द्वीप बतलाये। यह लक्षण केवल लक्ष्यद्वीप पर सही बैठता है सिंहल द्वीप (श्री लंका) पर बिल्कुल नहीं बैठता है।

सुग्रीव द्वारा खोजी दल को तञ्जावुर की सीमा पर लगे द्वार में प्रवेश न करने और पाण्ड्य देश (तमिलनाडु) में प्रवेश न करने की आज्ञा देना।
विंध्याचल के दक्षिण पश्चिम सिरे पर ही एक माह पूर्ण होना। फिर स्वयम्प्रभा की गुफा में प्रवेश करना और वहाँ से विंध्याचल के दक्षिण पश्चिम में खम्बात की खाड़ी में भरुच पहूँचना। जटायु जी के भाई सम्पाति से मुलाकात, और उनके द्वारा रावण की लंका में अशोक वाटिका में सीता जी को बैठे हुए देखकर अङ्गद के खोजी दल को भरुच से ठीक दक्षिण में समुद्र में सौ योजन अर्थात लगभग 1287 किलोमीटर दूर सागर में रावण की लंका नामक द्वीप का पता बतला कर वहाँ अशोक वाटिका में सीता जी के होने की सूचना देना।
जामवंत जी द्वारा उत्साहित करने पर हनुमान जी ने छलांग लगाकर लंका पहूँचना, वहाँ पूरी लंका का सुक्ष्म अवलोकन कर रावण और लंकावासियों का मदिरा और सुन्दरियों के सङ्ग व्यभिचार देखना, हनुमानजी ने लंका में पक्षियों के समान विमान उड़ते देखे।
सीताजी से मिल कर श्री रामचन्द्र जी का सन्देश और मुद्रिका देना। फिर हनुमानजी ने रावण की लंका में निकुम्भला यक्षिणी के कई मन्दिर ध्वस्त किए और मूर्तियाँ तोड़ी।

 विभिषण जी से मिलना, रावण पुत्र अक्षय कुमार का वध कर रावण से मिलना, दूत अवध्य होने विभिषण जी के सुझाव को मानकर हनुमान जी की पूंछ मे आग लगाना, हनुमान जी द्वारा लंका दहन करना। फिर सीता जी से मिलकर श्री रामचन्द्र जी के लिए सीताजी का सन्देश लेकर किष्किन्धा लौटना । श्रीरामचन्द्र जी को सीता जी का सन्देश देना। और पता बतलाना। रावण द्वारा विभिषण का अपमान कर देश निकाला देना। 
सुग्रीव जी द्वारा सम्पूर्ण वानर सेना और यन्त्र आदि एकत्रित कर श्री रामचन्द्र जी की सहायतार्थ लंका अभियान पर निकलना। किष्किन्धा से कोझिकोड और कन्नूर तक पूरी यात्रा पश्चिम घाट पर करना। कर्नाटक केरल सीमा पर पश्चिम घाट में कन्नूर पहूच कर श्री रामचन्द्र जी ने महेन्द्र पर्वत पर चढ़कर अरब सागर और तीन सौ किलोमीटर दूर लक्ष्यद्वीप में टापु पर रावण की लंका देखा। फिर सह्य और मलय पर्वत लांघकर अरब सागर के तट पर पहुँचे और डेरा डाला। विभिषण जी द्वारा श्री रामचन्द्र जी की शरण ग्रहणना श्रीरामचन्द्र जी द्वारा विभिषण जी से मित्रता करना। 
समुद्र से मार्ग देने की प्रार्थना लेकिन मार्ग न देने पर श्री रामचन्द्र जी द्वारा ब्रह्मास्त्र संधान। समुद्र द्वारा विश्वकर्मा पुत्र नल से सेतु बनवाने की राय देना। ब्रह्मास्त्र पश्चिम दिशा में छोड़ना, जिससे उस स्थान पर मरुस्थल बनना।
विश्वकर्म में निपुण नल ने बड़े बड़े यन्त्रों की सहायता से पर्वत शिखर से बड़े-बड़े शिलाखण्ड और बड़े-बड़े पैड़ उखड़वाकर बुलवाये फिर सागर में पैड़ों से जाल बिछा कर उसपर शिलाखण्ड रखवाकर फिर मिट्टी डलवाई। इस प्रकार केरल के कन्नूर से प्रारम्भ कर लक्ष्यद्वीप के किल्तान द्वीप तक पहले दिन चौदह योजन, दुसरे दिन छ योजन, तीसरे, चौथे और पाँचवे दिन एक-एक योजन सेतु बनाकर कुल पाँच दिन में 23 योजन अर्थात 296 किलोमीटर का सेतु बनाया।
श्रीरामचन्द्र जी और लक्ष्मण जी सहित पूरी सेना को मेघनाद द्वारा ब्रह्मास्त्र चलाकर घायल कर देना। जामवन्त जी द्वारा हनुमान जी को सूर्योदय से पहले रातों-रात सब को स्वस्थ्य करने हेतु हिमालय के महाशय पर्वत शिखर से चार चमकीली बुटियाँ - शल्य विकर्णी, सञ्जीव करणी, सावर्ण्य करणी और सन्धानी बुटी सूर्योदय से पहले लाने हेतु पूरा मार्ग बतलाकर भेजना। हनुमान जी छलांग लगा कर हिमालय पहूँचे। इन्द्र की अमरावती पुरी, कुबेर की अलकापुरी, वरुण की वारुणीपुरी, यम की संयमनी पुरी देखना। प्रजापति , इन्द्र, वरुण, द्वादश आदित्य, आठ वसु, एकादश रुद्र सहित स्वर्ग की सभा देखी।
बुटियों को न पहचान पाने के कारण महाशय पर्वत शिखर उखाड़ लाये। और चिकित्सा उपरान्त वापस रख आये। यही कार्य दुबारा मेघनाद द्वारा विभिषण जी पर की गई शक्ति प्रहार को लक्ष्मण जी ने आगे बढ़कर अपने सीने पर झेल लिया। और अचेत हो गये तब भी जामवन्त जी ने हनुमानजी को वापस महाशय पर्वत शिखर पर भेजा और हनुमान जी उक्त चारों बुटियों सहित पर्वत शिखर ले आये और चिकित्सा उपरान्त वापस रख आये।
विभिषण जी द्वारा सूचित करने पर रावण की कुलदेवी रक्षिणी निकुम्भला के मन्दिर में मेघनाद द्वारा किए जा रहे तान्त्रिक हवन का विध्वंस कर हनुमान जी और लक्ष्मण जी ने निकुम्भला मन्दिर ध्वस्त कर निकुम्भला की मूर्ति  तोड़ डाली लक्ष्मण जी द्वारा मेघनाद का वध किया।
बाद में फिर विभिषण जी द्वारा सूचित करने पर  रावण  भी निकुम्भला के गुप्त मन्दिर में तान्त्रिक पूजा, होम- हवन करने लगा तो हनुमान जी और लक्ष्मण ने मन्दिर और मूर्ति तोड़ कर हवन ध्वन्स कर दिया 
इन्द्र द्वारा सारथी मातली सहित रथ श्री रामचन्द्र जी की सहायतार्थ रथ भेजा। मातली की सलाह पर श्री रामचन्द्र जी ने रावण पर महर्षि अगस्त्य द्वारा प्रदत्त ब्रह्मास्त्र चलाकर वध कर दिया।और वह तत्काल ही मर गया था।*
रावण का वध अमान्त फाल्गुन कृष्ण पूर्णिमान्त चैत्र कृष्ण अमावस्या तिथि को सायं सन्ध्या में हुआ।
 श्री रामचन्द्र जी ने विभिषण का राज्याभिषेक करवा कर पुष्पक विमान से चैत्र शुक्ल पञ्चमी तिथि को चित्रकूट में भरद्वाज आश्रम पहूँचे।
चैत्र शुक्ल षष्ठी तिथि को अयोध्या पहूँचे।

 रामराज्य के प्रति अयोध्या वासियों की राय पुछने पर गुप्तचरों ने बतलाया कि, रावण की लंका में रही सीता जी को पटरानी बनाया जाने पर जनता में असन्तोष है। इस कारण दुसरे दिन श्री रामचन्द्र जी ने लक्ष्मण जी के साथ गर्भवती सीता जी को वाल्मीकि आश्रम के पास छुड़वा दिया। वहाँ जाकर लक्ष्मण जी ने सीता जी को सही जानकारी दी।
लव-कुश का जन्म, शिक्षा, और रामायण महाकाव्य कण्ठस्थ करवाया।
फिर श्रीरामचन्द्र जी द्वारा किए जा रहे राजसूय यज्ञ में लव-कुश ने पहली बार रामायण महाकाव्य का गायन कर सुनाया।

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

बौद्धों और जैनों के प्रभाव से सनातन धर्मियों में आये परिवर्तन ---

बौद्धों और जैनों के प्रभाव से सनातन धर्मियों में ये परिवर्तन आये---

1 वेदाध्ययन बन्द हो गया। कई ब्राह्मण ग्रन्थ तो लुप्त हो गये।
बहुत से शुल्बसूत्र, श्रोतसूत्र, गृह्यसूत्र और धर्म सूत्र लुप्त हो गये। यहाँ तक कि, मानव धर्मसूत्र ही नहीं मिलता है।

2 संध्या, पञ्चमहायज्ञ, और अष्टाङ्गयोग छूट गये।
वेदाध्ययन, ब्राह्मण ग्रन्थों का अध्ययन बन्द हो गया।

3 वेदाङ्ग में केवल शिक्षा, व्याकरण और छन्दशास्त्र का अध्ययन जारी रहा कुछ एक विद्वानों ने परवर्ती मयासुर रचित सूर्य सिद्धान्त ज्योतिष ग्रन्थ और वराहमिहिर रचित वृहत संहिता ज्योतिष ग्रंथों की शिक्षा ली और अधिकांश ने होरा शास्त्र का ही अध्ययन किया। 

परिणाम ---
वसन्त विषुव (सायन मेष संक्रान्ति) से प्रारम्भ होने वाला संवत्सर पहले तो चित्रा तारे से 180° पर सूर्य होने वाले दिन निरयन मेष संक्रमण (वैशाखी/ मेषादि/ बैसाख बिहू/ पोइला बैसाख) से प्रारम्भ होने वाला माना जाने लगा जो अभी भी भारत के अधिकांश भाग में प्रचलित है। लेकिन मध्य भारत और पश्चिम भारत में निरयन मेष संक्रमण आधारित चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारम्भ होना माना जाने लगा।

वसन्त विषुव (सायन मेष संक्रान्ति) से प्रारम्भ होने वाला, देवताओं की ऋतु वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतु वाला उत्तरायण केवल उत्तर गोल कहा जाने लगा।और 
शरद विषुव (सायन तुला संक्रान्ति) से प्रारम्भ होने वाला पितरों की ऋतु शरद, हेमन्त और शिशिर ऋतु वाला दक्षिणायन केवल दक्षिण गोल कहा जाने लगा।
और 
दक्षिण परम क्रान्ति (सायन मकर संक्रान्ति) से प्रारम्भ होने वाला दक्षिण तोयन उत्तरायण कहलाने लगा। और 
उत्तर परम क्रान्ति (सायन कर्क संक्रान्ति) से प्रारम्भ होने वाला उत्तर तोयन दक्षिणायन कहलाने लगा।
वसन्त विषुव (सायन मेष संक्रान्ति) से प्रारम्भ होने वाली वसन्त ऋतु एक माह पहले सायन मीन संक्रान्ति से प्रारम्भ होना माना जाने लगा। तदनुसार सभी ऋतुएँ एक माह पहले से प्रारम्भ होना माना जाने लगा।

वसन्त विषुव (सायन मेष संक्रान्ति) से प्रारम्भ होने वाला मधु मास को एक माह पहले वाले सायन मीन संक्रान्ति से प्रारम्भ होना माना जाने लगा। परिणाम स्वरूप मधु- माधव, शुक्र- शचि, नभः नभस्य, ईष-उर्ज, सहस-सहस्य, तपः- तपस्य मास एक माह पहले माने जाने लगे।
धर्मशास्त्र का अङ्ग मुहूर्त शास्त्र तो पुरा ही गड़बड़ा गया।
इतिहास जानने में भी भ्रम होने लगे।
व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार सब तिथियों के अनुसार मनाये जाने लगे।
नक्षत्रों के स्थान पर पश्चिम टर्की, इराक के बेबीलोन और मिश्र में प्रचलित मेष, वृषभादि राशियाँ प्रचलित हो गई।
दशाह के स्थान पर सप्ताह प्रचलित हो गया।
जबकि वेदों में मेष-वृषभादि राशियों और सप्ताह के रविवार सोमवार आदि वारों के नाम भी नहीं है।

ऐसे ही निरुक्त में निघण्टु (कोश) सिखा।
परिणाम --- वेद मन्त्रों के सही अर्थ नही जान पाये।

कल्प में शुल्ब सूत्रों, और श्रोत सूत्रों का ज्ञान बहुत सिमीत लोगों ने सिखा। गृह्य सूत्रों का स्थान कर्मकाण्ड भास्कर, कर्मकाण्ड प्रदीप, ब्रहम नित्य कर्म समुच्चय तथा आह्निक सूत्रावली जैसे निबन्धों ने लिया। 
परिणाम ---इससे मूल अर्थ और क्रिया भूल गए परिणाम यह हुआ कि, विवाह में पाणी ग्रहण के स्थान पर तोरण का मुहूर्त मुख्य हो गया। सप्तपदी और चार फेरे मिलकर सात फेरे हो गये और सप्तपदी भूल ही गए।
गर्भाधान, पुंसवन, जातकर्म , नामकरण , अक्षरारम्भ, विद्यारम्भ और वेदारम्भ संस्कार लुप्त हो गये। 
यज्ञोपवित, उपनयन संस्कार विवाह के समय होने लगे।

धर्मसूत्र का स्थान पहले स्मृतियों ने लिया फिर हेमाद्रि की चतुर्वर्ग चिन्तामणी , माधव की माधवी में पौराणिक सन्दर्भों वाला धर्म प्रचलित हो गया।
उसके बाद कमलाकर भट्ट ने उनके आधार पर निर्णय सिन्धु में सम्पादित किया। और उसकी कुञ्जी धर्म सिन्धु बन गई। अब धर्मसूत्रों के दर्शन दुर्लभ हो गये।
परिणाम स्वरूप व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहारों की तिथियों में अत्यधिक अन्तर होने लगा।

4 उप वेदों में मात्र आयुर्वेद का अध्ययन जारी रहा तथा दक्षिण भारत में गन्धर्ववेद की शिक्षा जारी रही। 
धनुर्वेद में केवल जल्लुकट्टु जैसे मार्शल आर्ट सिखा, तथा स्थापत्य वेद और शिल्प वेद में केवल शिल्प कला सिखी। सेतु निर्माण, पथ निर्माण आदि पर ध्यान नहीं दिया।

5 वेदों, वेदाङ्गो, उपवेदों के स्थान पर पुराणों का महत्व बढ़ गया। यहाँ तक कि, इतिहास ग्रन्थ रामायण और महाभारत तथा ब्राह्मण ग्रन्थों के कर्मकाण्ड भाग की मीमांसा जेमिनी कृत पूर्व मीमांसा और ब्राह्मण ग्रन्थों के ज्ञान काण्ड - ब्रह्म सूत्रों अर्थात आरण्यक और उपनिषदों की मीमांसा बादरायण की उत्तर मीमांसा (शारीरिक सूत्र) का स्थान पर भी पुराणों को देने लगे।
महाभारत के भीष्म पर्व अध्याय 25 से 43 अर्थात श्रीमद्भगवद्गीता धर्म मीमांसा और योग दर्शन का श्रेष्ठतम ग्रन्थ है।
श्रीमद्भगवद्गीता की व्याख्या भी पौराणिक सन्दर्भों से की जाने लगी।

6 *इसी प्रकार वैदिक सूक्तों और ब्राह्मण ग्रन्थों के आरण्यकों और उपनिषदों में उल्लेखित दार्शनिक विचारों से प्रेरित लेकिन स्वतन्त्र विचारकों की रचनाएँ ईश्वर कृष्ण की सांख्य कारिकाएँ, कपिल मुनि का सांख्य दर्शन, पतञ्जली का योग दर्शन श, गोतम का न्याय दर्शन और कणाद का वैशेषिक दर्शन को इतना महत्व दिया जाने लगा कि, वैदिक दृष्टि से सोचना-समझना बिल्कुल बन्द हो गया और उक्त चार दर्शनो के आधार पर सोचने-समझने लगे।* 
*यहाँ तक तो फिर भी चलाया जा सकता है, लेकिन उससे भी आगे बौद्धों के सर्वास्तिवाद, जैनों के अनेकान्तवाद, बढ़कर नागार्जुन के शुन्यवाद,मैत्रेयनाथ का योगाचार- विज्ञान वाद, पाशुपत दर्शन पर आधारित असङ्ग और वसुगुप्त का त्रिक दर्शन अर्थात कश्मीरी शैव-शाक्त दर्शन के आधार पर सोचने-विचारने और समझने लगे।*
*ये लोग वैद, वैदिक धर्म, वैदिक कर्मकाण्ड, वैदिक दर्शन, वैदिक संस्कृति और वैदिक वर्णाश्रम व्यवस्था को स्वाभाविक रूप से नहीं स्वीकारते बल्कि सन्देह की दृष्टि से देखते हैं।*
*तथाकथित वैदिक दर्शनों सांख्य दर्शन, योग दर्शन, न्याय दर्शन और वैशेषिक दर्शन के आधार पर विचार कर निकाले गए निष्कर्षों को वैदिक निष्कर्ष मानते हैं।*
*जैसे बिना वेदाध्ययन, बिना संध्या किये, बिना पञ्च महायज्ञ किये, अष्टाङ्ग योग के यम नियमों का पालन किये या मनुस्मृति के दश धर्म लक्षणों को स्वभाव में उतारे बिना, पूर्ण ईश्वर प्रणिधान की आशा करते हैं।*
*उक्त साधना के बिना सीधे धारणा, ध्यान और समाधि तक पहूँचने के स्वप्न देखते हैं।*
*माया अर्थात प्रकृति का अंश अहंकार-मन, चित्त-बुद्धि रूप अन्तःकरण को शुद्ध करने की कल्पना करते हैं।*
जबकि, 
अधियज्ञ/अधिकरण अर्थात शासन --- प्रत्यगात्मा/अन्तरात्मा - (पुरुष और प्रकृति) परब्रह्म - (प्रभविष्णु और श्री लक्ष्मी /सवितृ-सावित्री) अधियज्ञ और अधिष्ठान (शासन) हैं। 
उन्ही के करण अर्थात यन्त्र या औजार ---

अधिकरण (निकटतम मुख्य करण)-- जीवात्मा अपर ब्रह्म --(अपर पुरुष और अपरा पृकृति अर्थात जीव और आयु) (नारायण और नारायणी अर्थात श्रीहरि और कमलासना गज सेविता लक्ष्मी जो समुद्र मन्थन से निकली कही जाती है।) तथा 
भूतात्मा (प्राण अर्थात चेतना और धृति/ धारण शक्ति धारयित्व अर्थात देहि और अवस्था) हिरण्यगर्भ अर्थात पञ्चमुखी ब्रह्मा और वाणी (त्वष्टा और रचना)।
जीवात्मा (अपर ब्रह्म) और भूतात्मा (हिरण्यगर्भ) दोनों अधिकरण अर्थात मुख्य करण या निकटतम यन्त्र हैं।

अभि करण अर्थात सहायक यन्त्र---- 
सुत्रात्मा (ओज और आभा अर्थात कान्ति) प्रजापति (चतुर्मुख ब्रह्मा) और सरस्वती (दक्ष और प्रसुति) तथा 
अणुरात्मा (तेज और विद्युत) वाचस्पति और वाक (इन्द्र और शचि) अभिकरण अर्थात अधिनस्थ करण हैं अर्थात जैसे जेक के साथ टामी लगती है या बल्ब के साथ स्वीच लगता है या पंखे के साथ रेग्युलेटर होता है या रिमोट होता है। उसे अभिकरण कहते हैं।

अन्तः करण अर्थात जो करण अन्दर हो।----
 चित-बुद्धि और अहंकार-मन
और बहिर्करण----
पञ्च मुख्य प्राण और पञ्च उपप्राण, 
पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ और पञ्च कर्मेंद्रियाँ तथा 
पञ्च महाभूत और पञ्च तन्मात्रा।
अतः ये प्राकृतिक तत्व हैं, इसलिए या तो यह माना जाए कि ये शुद्ध ही है या यह मानलो कि ये शुद्ध हो ही नहीं सकते। जैसे हम नित्य तीन बार स्नान करें तो भी शरीर स्वच्छ नहीं रह सकता। न निर्मल हो सकता है।
वैसे ही उक्त प्राकृतिक पदार्थ प्रकृति की ओर ही रुझान रखेंगे।
हमें केवल इन तत्वों के प्रति मैं और मेरा वाला भाव अहन्ता ममता त्यागना होगा। 
इसीलिए अपरिग्रह साधना है, ता कि, वाह्य वस्तुओं के प्रति ममता न रहे। कोई अनजाने में ले ले, बतला कर लेले, मांग कर ले ले, लेकर नहीं लौटाए तब भी उसके प्रति विरोध, क्रोध, द्वेश नहीं हो यह अक्रोध ही अहिंसा साधना है।
सभी चीजों का मूल तत्व ही देखना जैसे सुनार आभुषणों में केवल स्वर्ण देखता है, कारीगर या कलाकार केवल डिजाइन दैखता है। वैसे ही हमें सब वस्तुओं में एक परमात्मा को देखने का स्वभाव बनाना और बनाये रखना सत्य की साधना है।
सब-कुछ ब्रह्म का है, सब-कुछ परमात्मा की लीला मात्र है। इसमें वास्तविकता कुछ नहीं है। यह जान लेने की साधना अस्तेय, निर्लोभता है।
सबसे अन्त में लिङ्ग भेद मिटता है।
सृष्टि के भैदों से मुक्त होकर अभेद मूल तत्व परमात्मा को ही जानना यह ब्रह्मचर्य साधना है।
इतना सब होने फर ही सब-कुछ परमात्मा का ही है सब-कुछ परमात्मा ही है, जान लेने, मान लेने पर ही ईश्वर प्रणिधान सम्भव है। इसलिए यही लक्ष्य है।

अलग-अलग पुराणों में अलग-अलग देवों/ देवताओं की महत्ता और शेष सब को गौण, आधीन बतलाने के कारण सबके अलग-अलग इष्ट देव बन गये । सबमें परमात्मा देखने के बजाय स्व रचित या कारिगर से बनवाई मूर्ति में ही ब्रह्मभाव लाना और उससे परे जगत देखने के बजाय पूरी सृष्टि परमात्मा की लीला मात्र है मानकर उसके सृजेता, सञ्चालक, और निवारक के रूप में ईश्वर भाव लाकर समर्पण करना आसान है।

सुबह शाम घर में मूर्तिपूजा, आरती करना, भोग लगाना तथा शेष समय और मन्दिर या मूर्ति के बाहर ईश्वर नहीं देखना नास्तिकता अनीश्वरवाद ही है।

रविवार, 26 अप्रैल 2026

सभी गाँवो में एक ही मन्दिर हो जहाँ, परमात्मा , ॐ, सब देव और सभी देवताओं के स्थान हों।

सभी गाँवो में एक ही मन्दिर हो जिसमें सभी वैदिक देव और देवताओं के मण्डप शुल्ब सूत्रों के अनुसार मण्डप हों और मण्डप में मण्डल भी शुल्ब सूत्रों के अनुसार हो। जहाँ उन देवताओं का आव्हान, स्थापन, पूजन, यजन कर विसर्जन किया जाता रहे। सभी मण्डपों में यज्ञ बेदी भी शुल्ब सुत्रों के अनुसार बनी हो। *जहाँ उक्त मण्डपों में स्थित मण्डल पर* ---
परमात्मा 
  परब्रह्म
विष्णु और माया

ब्रह्म- 
प्रभविष्णु और श्री, लक्ष्मी तथा सवितृ और सावित्री।

अपर ब्रह्म
नारायण और नारायणी तथा श्री हरि- कमलासना, गजसेविता लक्ष्मी।

हिरण्यगर्भ (पञ्चमुखी ब्रह्मा) और वाणी,

 त्वष्टा-रचना 
तथा 
सनक, सननन्दन, सनत्कुमार , सनातन, नारद 
धर्म और उनकी तेरह पत्नियाँ - (१) श्रद्धा, (२) लक्ष्मी, (३) धृति, (४) तुष्टि, (५) पुष्टि, (६) मेधा, (७) क्रिया, (८) बुद्धि, (९) लज्जा, (१०) वपु, (११) शान्ति, (१२) सिद्धि, (१३) कीर्ति ) 
काम और रति
एवम्
अर्धनारीश्वर एकरुद्र।

प्रजापति (चतुर्मुख ब्रह्मा) और सरस्वती,
 
इन्द्र और शचि, दक्ष (प्रथम) और प्रसुति, रुचि और आकुति, कर्दम और देवहुति, स्वायम्भुव मनु और शतरूपा
तथा
शंकर और उमा,
एवम्
 मरीची और सम्भूति,  भृगु और ख्याति,  अङ्गिरा और स्मृति,  वशिष्ट और ऊर्ज्जा,  अत्रि और अनसुया,  पुलह और क्षमा,  पुलस्य और प्रीति,  कृतु और सन्तति।

वाचस्पति और वाक ,
 अग्नि और स्वाहा, पितर और स्वधा,

 ब्रह्मणस्पति और सुनृता, 
द्वादश आदित्य ---
(1) विष्णु, (2) सवितृ, (3) त्वष्टा, (4) इन्द्र, (5) वरुण, (6) विवस्वान, (7) पूषा, (8) भग, (9) अर्यमा, (10) मित्र, (11) अंशु और (12) धातृ) और उनकी शक्तियाँ,

 ब्रहस्पति- शुभा, ममता , तारा
अष्ट वसु---
(1) प्रभास (आकाश) -  प्रभासा।
(2) प्रत्युष (सूर्य/देव) - प्रत्युषा या दीक्षा 
(3) धर्म (वसु-पुत्र) -  धृति ।
(4) ध्रुव (अचल/ध्रुव तारा) -  ध्रुवा या धरणी
(5) अर्क (सूर्य/देव) - अर्का
(6) अनिल (वायु) - अनिला या शिवा 
(7) अनल (अग्नि) - अनला या शांडिली 
(8) अप् (जल) - आप (या सरिता)

पशुपति-पार्वती   
एकादश रुद्र----
(1) हर, (2) त्र्यम्बकं, (3) वृषाकपि, (4) कपर्दी, (5) अजैकपात, (6) अहिर्बुधन्य, (7) अपराजित, (8) रैवत, (9) बहुरूप, (10) कपाली और (11) शम्भु (शंकर) और उनकी शक्तियाँ,

 गणपति और सिद्धि ,
सोम और वर्चा,
सदसस्पति और समिति। 
मही
भारती
अधिदेव 
अष्टादित्य
  (1)मार्तण्ड {विवस्वान}, (2) इन्द्र, (3) वरुण, (4) मित्र, (5) धाता, (6) भग, (7) अंश और (8) अर्यमा ।

 द्वादश तुषितगण।  
 (1) बुद्धि, (2) मन, (3) उदान, (4) व्यान, (5) प्राण, (6) समान, (7) अपान, (8) श्रोत, (9) स्पर्ष, (10) चक्षु, (11) रसना और (12) घ्राण ।

सरस्वती
द्वादश साध्यगण । 
 (1) मन, (2) अनुमन्ता, (3) प्राण, (4) अपान, (5) विति , (6) हय, (7) हन्स, (8) विभु, (9) प्रभु, (10) नय, (11) नर और (12) नारायण
चौरासी सिद्ध गण

प्रणेताओं के पुत्र दक्ष द्वितीय।(शंकर जी के श्वसुर)
अध्यात्म- दुसरे अष्ट वसु। 
 (1) द्रोण, (2) प्राण, (3) ध्रुव, (4) अर्क, (5) अग्नि (6) दोष, (7) वसु और (8) विभावसु।  
मरुद्गण ।  
(1) आवह, (2) प्रवह, (3) संवह, (4) उद्वह, (5) विवह, (6) परिवह और (7) परावहऔर इन सातों के छ:छ: पुत्र।

दस विश्वैदेवगण। 
(1) दक्ष (द्वितीय), (2) कृतु, (3) सत्य, (4) काल (यम), (5) काम, (6) मुनि, (7) एल पुरुरवा, (8) श्रव, (9) रोचमान, (10) आर्द्रवान । 
इळा

 प्रभास वसु और (ब्रहस्पति की बहन) वरस्त्री के पुत्र देवशिल्पी विश्वकर्मा। 
(शुक्राचार्य के पुत्र) त्वष्टा। 

 अधिभूत-  दुसरे एकादश रुद्र। 
 (1) मन्यु, (2) मन , (3) महिनस, (4) महान, (5) शिव, (6) उग्ररेता, (7) भव, (8) काल, (9) वामदेव, (10) धृतवृत और (11) मृगव्याध
 या मतान्तर से अन्य नाम 
(1) सर्प, (2) निऋति,(3) पिनाकी, (4) कपाली, (5) स्थाणु, (6) ईशान नाम और (7) दहन भी।

अनेकरुद्र
(विशेले कीट पतङ्ग, सर्प, बिच्छू, घोघा (कपर्दी) और सीपी (युनियो, पाईला), सिंह, व्याघ्र आदि हिन्सक प्राणी, रोगाणु (बैक्टरिया), विषाणु (वायरस), फफुन्द, काई, आतंकी, गुण्डे, बदमाश, चोर, उचक्के, डाकु, लुटेरे, वनवासी, पुलिस, सेना आदि रुलाने वाले सभी अनेकरुद्र ।

शुक्राचार्य के पौत्र , त्वष्टापुत्र त्रिशिरा विश्वरूप हैं।

यह्व ( महादेव) । 

(1) ईशित्व- वशित्व, (2) अणिमा-लघिमा, (3) महिमा- गरिमा और (4) प्रकाम्य - प्राप्ति) सिद्धियों के अधिदेवता अष्ट विनायक ।  (1)सम्मित-उस्मित, (2) मित- देवयजन, (3) शाल - कटंकट और (4) कुष्माण्ड - राजपुत्र
  

 ईला नामक रौद्री के पुत्र एल भैरव। ( या वैवस्वतमनु की पुत्री ईला और बुध के पुत्र एल पुरुरवा।) ।
और
राजा के स्थान हों। जहाँ उन देवों, देवताओं का आह्वान, स्थापन, पूजन और यजन किया जा सके।


प्राचीन काल में केवल स्थान बनाया जाता था। जिसमें न कोई पद चिह्न होते थे, न चित्र होता था, न प्रतिमा होती थी और न ही मूर्ति होती थी। मण्डप में केवल मण्डल बने होते थे। जिस पर सम्बन्धित देव/देवता की धारणा और ध्यान किया जाता था।
*इससे कुछ मिलता- जुलता प्रयोग यज्ञों में किया जाता है। और जैन लोगों में भी मण्डल पूजा के रूप में प्रचलित है।*

शंकरजी और उनके शिष्य शुक्राचार्य जी द्वारा स्थापित तथा अत्रि पुत्र दत्तात्रेय द्वारा अपने शिष्य राजा कार्तवीर्य सहस्रार्जुन और रावण द्वारा प्रचलित वेद विरुद्ध तन्त्र परम्परा के अनुयाई कुछ तान्त्रिक भारत में भी गुप्त रूप से तन्त्र क्रिया करते थे और छोटी छोटी मूर्तियाँ रखकर पूजा करते थे। लेकिन मठ- मन्दिर नहीं होते थे। पहले ईरान में भी मीढ लोग इसी मत के थे। इसलिए शंकर जी को मीढीश कहते हैं। वर्तमान में नाथ पन्थ इन्हीं का उत्तरवर्ती रूप है। 
परवर्ती काल में मङ्गोलिया से तुर्किस्तान के देश होते हुए युनान के निकट क्रीट तक फैले तान्त्रिक लोग, इराक, टर्की, युनान, मिश्र,  युरोप, अफ्रीका और उत्तर अमेरिका, मध्य अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप में इस तन्त्र मत का फैलाव हुआ और वहाँ मठ मन्दिर और मूर्ति पूजा प्रचलित हुई। लेकिन तब भी भारत में वैदिक काल में मूर्ति पूजा नहीं होती थी
स्वायम्भुव मनु-शतरूपा के तीसरी पीढ़ी में जन्मे ऋषभदेव जी जिन्होंने दक्ष प्रजापति प्रथम द्वारा स्थापित और  अपने पूर्वजो मनु शतरुपा, प्रियव्रत, आग्नीध्र और अजनाभ (नाभि) द्वारा पालित वर्णाश्रम धर्म का पालन करते हुए अन्तिम अवस्था में संन्यास ग्रहण किया था। और उनके पुत्र भरत चक्रवर्ती ने भी उसका पालन किया। 
लेकिन ऋषभदेव के पुत्र बाहुबली ने युवावस्था में ही संन्यास ग्रहण कर लिया था। उसे आदर्श मानने वाले जैन पन्थ ने ऋषभदेव जी को अपना पहला तीर्थंकर घोषित कर श्रमण मत के अन्तर्गत  तन्त्र परम्परा अपना ली और मठ, मन्दिर और मूर्ति पूजा प्रारम्भ कर दी।
व्यापार और राजनीति के कारण उक्त देशों के सम्पर्क में भारतीय राजनयिक और व्यापारी आये परिणाम स्वरूप भारत में सर्वप्रथम श्रमण मतावलम्बियों ने तन्त्र मतानुसार मठ- मन्दिर और मूर्ति पूजा प्रारम्भ की। इसमें मुख्य रूप से जैन व्यापारी प्रमुख थे।
भारत में भी सर्वप्रथम शिवलिङ्ग- योनि की पूजा प्रारम्भ हुई। फिर ध्यान मुद्रा में बैठे शंकर जी, रुद्र और अम्बिका, काली, चामुण्डा, भैरव- भैरवी, गजानन विनायक और नन्दी की मूर्ति पूजा प्रचलन में आई।
शैव-शाक्त, गाणपत्य के बाद ईरान से आये मग ब्राह्मणों ने सूर्य की मूर्ति और मन्दिर की पूजा प्रारम्भ की।
अन्त में विष्णु, लक्ष्मी नारायण, हिरण्यगर्भ ब्रह्मा और प्रजापति ब्रह्मा की मूर्तियाँ बनने लगी।
श्रीकृष्ण की मुर्ति पूजा होने लगी, फिर श्री रामचन्द्र जी मुर्तियाँ पूजी जाने लगी। फिर चौबीस अवतारों की पूजा प्रारम्भ हुई।
फिर तो शिव परिवार, शिव अवतार, चण्डिका के अवतारों, विनायक गजानन और उनके अवतारों की मूर्तियाँ पूजी जाने लगी, शितला देवी भी पूजी जाने लगी।
इसलिए किसी अन्य स्थान पर मूर्ति पूजक यदि चाहें तो उनके लिए उपर्युक्तानुसार मण्डप में मण्डल पर उक्त देवों/ देवताओं की मूर्ति  स्थापित कर उनके लिए भी ऐसा ही एक मन्दिर बना दिया जाए।

गुरुकुल शिक्षा क्या है?

कई गुरुकुल हैं, जहाँ वेद, ब्राह्मण ग्रन्थ, शिक्षा (उच्चारण/ फोनेटिक), व्याकरण, निरुक्त (भाषा शास्त्र),निघण्टु (शब्दकोश),छन्द शास्त्र, ज्योतिष (एस्ट्रोनॉमी और संहिता), ब्रह्माण्ड के नक्शे मण्डल- मण्डप बनाने के लिए शुल्बसूत्र, संस्कार, नित्यकर्म और व्रत,पर्व, उत्सव और त्यौहार मनाने के विधि-विधान के लिए गृह्यसूत्र, अश्वमेध, राजसूय जैसे बड़े सत्र वाले बड़े यज्ञों की विधि विधान के लिए श्रोतसूत्र नीति, कर्तव्याकर्तव्य, राजनीति और अर्थशास्त्र का ज्ञान और के निर्णय हेतु धर्मसूत्र (चार कल्प) (आदि सब मिलाकर षडवेदाङ्ग), के साथ आवश्यक और योग्यतानुसार आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद (नाट्य, सङ्गीत) शिल्पवेद स्थापत्य वेद (चार उपवेद) के शास्त्र, ब्राह्मण ग्रन्थों की कर्मकाण्ड सम्बन्धी पूर्व मीमांसा उपनिषदों के ब्रह्मज्ञान की उत्तर मीमांसा, सांवय दर्शन - कर्म मीमांसा और अष्टाङ्गयोग हेतु श्रीमद्भगवद्गीता, और योग दर्शन, न्याय दर्शन, और वैशेषिक दर्शन, वाल्मीकि रामायण और महाभारत (इतिहास) तथा विष्णु पुराण का अध्ययन करवाया जाता है।
साथ ही आधुनिकता शिक्षा भी दी जाती है। वे सफल शिक्षक, डॉक्टर, इञ्जिनियर, सैन्य अधिकारी, न्यायाधीश, अकाउण्टेण्ट, व्यवस्थापक और प्रशासक और शासक बनते है।

शनिवार, 25 अप्रैल 2026

सभी गाँवो में एक ही मन्दिर हो जिसमें सृष्टि क्रम में सब देव और देवता हों।

सभी गाँवो में एक ही मन्दिर हो जिसमें सभी वैदिक देव और देवताओं के मण्डप शुल्ब सूत्रों के अनुसार मण्डप हों और मण्डप में मण्डल भी शुल्ब सूत्रों के अनुसार हो। जहाँ उन देवताओं का आव्हान, स्थापन, पूजन, यजन कर विसर्जन किया जाता रहे। सभी मण्डपों में यज्ञ बेदी भी शुल्ब सुत्रों के अनुसार बनी हो। *जहाँ उक्त मण्डपों में स्थित मण्डल पर* ---

परमात्मा
परब्रह्म
विष्णु और माया

ब्रह्म
प्रभविष्णु और श्री, लक्ष्मी तथा सवितृ और सावित्री

अपर ब्रह्म
नारायण और नारायणी तथा श्री हरि- कमलासना, गजसेविता लक्ष्मी।

हिरण्यगर्भ (पञ्चमुखी ब्रह्मा) और वाणी,

 त्वष्टा-रचना 
तथा 
सनक, सननन्दन, सनत्कुमार , सनातन, नारद 
धर्म और उनकी तेरह पत्नियाँ - (१) श्रद्धा, (२) लक्ष्मी, (३) धृति, (४) तुष्टि, (५) पुष्टि, (६) मेधा, (७) क्रिया, (८) बुद्धि, (९) लज्जा, (१०) वपु, (११) शान्ति, (१२) सिद्धि, (१३) कीर्ति ) 
काम और रति
एवम्
अर्धनारीश्वर एकरुद्र

प्रजापति (चतुर्मुख ब्रह्मा) और सरस्वती,
 
इन्द्र-शचि, दक्ष (प्रथम)-प्रसुति, रुचि-आकुति, कर्दम-देवहुति, स्वायम्भुव मनु-शतरूपा
तथा
शंकर- उमा,
एवम्
 मरीची-सम्भूति,  भृगु-ख्याति,  अङ्गिरा-स्मृति,  वशिष्ट-ऊर्ज्जा,  अत्रि-अनसुया,  पुलह-क्षमा,  पुलस्य-प्रीति,  कृतु-सन्तति।

वाचस्पति और वाक ,
 अग्नि-स्वाहा, पितर-स्वधा,

 ब्रह्मणस्पति और सुनृता
द्वादश आदित्य
(1) विष्णु, (2) सवितृ, (3) त्वष्टा, (4) इन्द्र, (5) वरुण, (6) विवस्वान, (7) पूषा, (8) भग, (9) अर्यमा, (10) मित्र, (11) अंशु और (12) धातृ) और उनकी शक्तियाँ,

 ब्रहस्पति- शुभा, ममता , तारा
अष्ट वसु - (1) प्रभास (आकाश) -  प्रभासा।
(2) प्रत्युष (सूर्य/देव) - प्रत्युषा या दीक्षा 
(3) धर्म (वसु-पुत्र) -  धृति ।
(4) ध्रुव (अचल/ध्रुव तारा) -  ध्रुवा या धरणी
(5) अर्क (सूर्य/देव) - अर्का
(6) अनिल (वायु) - अनिला या शिवा 
(7) अनल (अग्नि) - अनला या शांडिली 
(8) अप् (जल) - आप (या सरिता)

पशुपतिऔर पार्वती -
 एकादश रुद्र- (1) हर, (2) त्र्यम्बकं, (3) वृषाकपि, (4) कपर्दी, (5) अजैकपात, (6) अहिर्बुधन्य, (7) अपराजित, (8) रैवत, (9) बहुरूप, (10) कपाली और (11) शम्भु (शंकर) और उनकी शक्तियाँ,

 गणपतिऔर सिद्धि -  
सोम और वर्चा,

 सदसस्पति और समिति
मही-भारती-सरस्वती- इळा।
 अधिदेव - अष्टादित्य -
  (1)मार्तण्ड {विवस्वान}, (2) इन्द्र, (3) वरुण, (4) मित्र, (5) धाता, (6) भग, (7) अंश और (8) अर्यमा। 

 अध्यात्म - दुसरे वसु
(1) द्रोण, (2) प्राण, (3) ध्रुव, (4) अर्क, (5) अग्नि (6) दोष, (7) वसु और (8) विभावसु। 

 अधिभूतदुसरे एकादश रुद्र
(1) मन्यु, (2) मन , (3) महिनस, (4) महान, (5) शिव, (6) उग्ररेता, (7) भव, (8) काल, (9) वामदेव, (10) धृतवृत और (11) मृगव्याध।
 या मतान्तर से अन्य नाम (1) सर्प, (2) निऋति,(3) पिनाकी, (4) कपाली, (5) स्थाणु, (6) ईशान नाम और (7) दहन भी। ।

द्वादश तुषितगण - 
(1) बुद्धि, (2) मन, (3) उदान, (4) व्यान, (5) प्राण, (6) समान, (7) अपान, (8) श्रोत, (9) स्पर्ष, (10) चक्षु, (11) रसना और (12) घ्राण ।

मरुद्गण - (1) आवह, (2) प्रवह, (3) संवह, (4) उद्वह, (5) विवह, (6) परिवह और (7) परावह । 
अनेकरुद्र - 
विशेले कीट पतङ्ग, सर्प, बिच्छू, घोघा (कपर्दी) और सीपी (युनियो, पाईला), सिंह, व्याघ्र आदि हिन्सक प्राणी, रोगाणु (बैक्टरिया), विषाणु (वायरस), फफुन्द, काई, आतंकी, गुण्डे, बदमाश, चोर, उचक्के, डाकु, लुटेरे, वनवासी, पुलिस, सेना आदि रुलाने वाले सभी अनेकरुद्र

द्वादश साध्यगण-
 (1) मन, (2) अनुमन्ता, (3) प्राण, (4) अपान, (5) विति , (6) हय, (7) हन्स, (8) विभु, (9) प्रभु, (10) नय, (11) नर और (12) नारायण। 
चौरासी सिद्ध गण

प्रभास वसु और (ब्रहस्पति की बहन) वरस्त्री के पुत्र देवशिल्पी विश्वकर्मा
शुक्राचार्य के पुत्र) त्वष्टा हैं।

यह्व ( महादेव)  यहुदियों का इष्ट  याहवेह ।

(1) ईशित्व- वशित्व, (2) अणिमा-लघिमा, (3) महिमा- गरिमा और (4) प्रकाम्य - प्राप्ति) सिद्धियों के अधिदेवता अष्ट विनायक । (1)सम्मित-उस्मित, (2) मित- देवयजन, (3) शाल - कटंकट और (4) कुष्माण्ड - राजपुत्र
  
दस विश्वैदेवगण
(1) दक्ष (द्वितीय), (2) कृतु, (3) सत्य, (4) काल (यम), (5) काम, (6) मुनि, (7) एल पुरुरवा, (8) श्रव, (9) रोचमान, (10) आर्द्रवान

 शुक्राचार्य के पौत्र , त्वष्टापुत्र त्रिशिरा विश्वरूप हैं। 
ईला नामक रौद्री के पुत्र एल भैरव हैं। ( या वैवस्वतमनु की पुत्री ईला और बुध के पुत्र एल पुरुरवा
और
राजा के स्थान हों। जहाँ उन देवों, देवताओं का आह्वान, स्थापन, पूजन और यजन किया जा सके।


प्राचीन काल में केवल स्थान बनाया जाता था। जिसमें न कोई पद चिह्न होते थे, न चित्र होता था, न प्रतिमा होती थी और न ही मूर्ति होती थी। मण्डप में केवल मण्डल बने होते थे। जिस पर सम्बन्धित देव/देवता की धारणा और ध्यान किया जाता था।
*इससे कुछ मिलता- जुलता प्रयोग यज्ञों में किया जाता है। और जैन लोगों में भी मण्डल पूजा के रूप में प्रचलित है।*

शंकरजी और उनके शिष्य शुक्राचार्य जी द्वारा स्थापित तथा अत्रि पुत्र दत्तात्रेय द्वारा अपने शिष्य राजा कार्तवीर्य सहस्रार्जुन और रावण द्वारा प्रचलित वेद विरुद्ध तन्त्र परम्परा के अनुयाई कुछ तान्त्रिक भारत में भी गुप्त रूप से तन्त्र क्रिया करते थे और छोटी छोटी मूर्तियाँ रखकर पूजा करते थे। लेकिन मठ- मन्दिर नहीं होते थे। पहले ईरान में भी मीढ लोग इसी मत के थे। इसलिए शंकर जी को मीढीश कहते हैं। वर्तमान में नाथ पन्थ इन्हीं का उत्तरवर्ती रूप है। 
परवर्ती काल में मङ्गोलिया से तुर्किस्तान के देश होते हुए युनान के निकट क्रीट तक फैले तान्त्रिक लोग, इराक, टर्की, युनान, मिश्र, युरोप, अफ्रीका और उत्तर अमेरिका, मध्य अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप में इस तन्त्र मत का फैलाव हुआ और वहाँ मठ मन्दिर और मूर्ति पूजा प्रचलित हुई। लेकिन तब भी भारत में वैदिक काल में मूर्ति पूजा नहीं होती थी।
स्वायम्भुव मनु-शतरूपा के तीसरी पीढ़ी में जन्मे ऋषभदेव जी जिन्होंने दक्ष प्रजापति प्रथम द्वारा स्थापित और अपने पूर्वजो मनु शतरुपा, प्रियव्रत, आग्नीध्र और अजनाभ (नाभि) द्वारा पालित वर्णाश्रम धर्म का पालन करते हुए अन्तिम अवस्था में संन्यास ग्रहण किया था। और उनके पुत्र भरत चक्रवर्ती ने भी उसका पालन किया। 
लेकिन ऋषभदेव के पुत्र बाहुबली ने युवावस्था में ही संन्यास ग्रहण कर लिया था। उसे आदर्श मानने वाले जैन पन्थ ने ऋषभदेव जी को अपना पहला तीर्थंकर घोषित कर श्रमण मत के अन्तर्गत तन्त्र परम्परा अपना ली और मठ, मन्दिर और मूर्ति पूजा प्रारम्भ कर दी।
व्यापार और राजनीति के कारण उक्त देशों के सम्पर्क में भारतीय राजनयिक और व्यापारी आये परिणाम स्वरूप भारत में सर्वप्रथम श्रमण मतावलम्बियों ने तन्त्र मतानुसार मठ- मन्दिर और मूर्ति पूजा प्रारम्भ की। इसमें मुख्य रूप से जैन व्यापारी प्रमुख थे।
भारत में भी सर्वप्रथम शिवलिङ्ग- योनि की पूजा प्रारम्भ हुई। फिर ध्यान मुद्रा में बैठे शंकर जी, रुद्र और अम्बिका, काली, चामुण्डा, भैरव- भैरवी, गजानन विनायक और नन्दी की मूर्ति पूजा प्रचलन में आई।
शैव-शाक्त, गाणपत्य के बाद ईरान से आये मग ब्राह्मणों ने सूर्य की मूर्ति और मन्दिर की पूजा प्रारम्भ की।
अन्त में विष्णु, लक्ष्मी नारायण, हिरण्यगर्भ ब्रह्मा और प्रजापति ब्रह्मा की मूर्तियाँ बनने लगी।
श्रीकृष्ण की मुर्ति पूजा होने लगी, फिर श्री रामचन्द्र जी मुर्तियाँ पूजी जाने लगी। फिर चौबीस अवतारों की पूजा प्रारम्भ हुई।
फिर तो शिव परिवार, शिव अवतार, चण्डिका के अवतारों, विनायक गजानन और उनके अवतारों की मूर्तियाँ पूजी जाने लगी, शितला देवी भी पूजी जाने लगी।
इसलिए किसी अन्य स्थान पर मूर्ति पूजक यदि चाहें तो उनके लिए उपर्युक्तानुसार मण्डप में मण्डल पर उक्त देवों/ देवताओं की मूर्ति स्थापित कर उनके लिए भी ऐसा ही एक मन्दिर बना दिया जाए।

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

तमिल कवि तिरुक्कुरल रचियता दृविड़ सन्त आलावार तिरुवल्लुवर शुद्ध सनातन वैदिक धर्मी वैष्णव महाभागवत थे। न कि, जैन।

कुछ लोग तमिल कवि दृविड़ सन्त आलावार
तिरुवल्लुवर को उनके द्वारा रचित तिरुक्कुरल में सर्वप्रथम ऋग्वेद के अहिंसा सूक्त के दृष्टा ऋषि ऋषभदेव की स्तुति करने और अहिंसा को महत्व देने के आधार पर जैन घोषित करते हैं। जबकि तमिल कवि दृविड़ सन्त तिरुवल्लुवर शुद्ध वैदिक सनातन धर्मी वैष्णव महाभागवत थे।
इस बात को प्रमाणित करने के लिए निम्नलिखित तथ्य उपलब्ध हैं।⤵️
गृहस्थाश्रम का प्रशंसक, ईश्वर स्तुति करने वाला ईश्वर वादी युद्ध नीति की शिक्षा देने वाला, कृषि कर्म का प्रशंसक जैन कैसे हो सकता है?
रामानुजाचार्य जी द्वारा इन्हें आदर देते हुए आलवार सन्तों में मानना;
 और
नाथ मुनि द्वारा इसे नालयिर दिव्य प्रबन्धम् में अन्य आलवार सन्तों की रचनाओं के साथ सम्पादित करना भी इनका वैदिक धर्मी वैष्णव होना ही सिद्ध करता हैं।
तिरु अनन्तपुरम्
तिरुपति बालाजी 
ऐसे ही जहाँ कहीँ भी श्री वाचक तमिल शब्द तिरु आया है वहाँ सभी स्थानों पर वैष्णव परम्परा ही है।
श्रवणबेलगोला में या किसी भी जैसे तीर्थ या जैन सन्त के नाम में तिरु शब्द नहीं मिलता है।

 तिरुवल्लुवर ने श्रङ्गार शतक और नीति शतक के रचयिता भृतहरि के समान धर्म, अर्थ और काम पर तमिल भाषा में अर्थशास्त्र लिखा है।
ध्यान रखें वैदिक परम्परा में अर्थशास्त्र धर्म सूत्र (धर्मशास्त्र) का अङ्ग है।
मनुस्मृति और कौटिल्य अर्थशास्त्र में भी धर्म, अर्थ और काम तीनों का ही वर्णन है।

भृतहरि ने वैराग्य शतक भी रचा था। जो अर्थशास्त्र का विषय नहीं है। इसलिए इन्होंने छोड़ दिया।

ऋषभदेव स्वायम्भुव मनु-शतरूपा के पाँचवी पीढ़ी पर हुए।
स्वायम्भुव मनु-शतरूपा-> उत्तानपादासन और प्रियव्रत।
प्रियव्रत -> आग्नीध्र 
आग्नीध्र -> ऋषभदेव 
ऋषभदेव -> बाहुबली और भरत चक्रवर्ती जो बाद में जड़ भरत कहलाये।
स्वायम्भुव मनु-शतरूपा, ऋषभदेव और भरत चक्रवर्ती ने वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुसार वृद्धावस्था में संन्यास ग्रहण किया था। जबकि भरत चक्रवर्ती से परास्त होकर बाहुबली ने युवावस्था में ही संन्यास ले लिया और कर्नाटक में श्रमण बेलगोला में निवास किया था। इसलिए जैन लोगों उन्हें जैन घोषित कर दिया। और ऋग्वेद में अहिंसा सूक्त के दृष्टा होने से ऋषभदेव को अपना पहला तीर्थंकर घोषित कर दिया।
जब युरोपीय लोगों ने मोहनजोदड़ो और हड़प्पा में पद्मासनस्थ मूर्ति और तान्त्रिकों की लिङ्ग और योनि की मूर्ति देखी तो जैनों ने उसे जैन श्रमण संस्कृति घोषित कर दिया। इस हिसाब से तो सभी नाथ योगी जैन थे।

दृविड़ वेद (तमिल भाषा में नालयिर दिव्य प्रबन्धम्) क्या है?

दृविड़ तमिल लोगों के अनुसार भगवान में डूबे हुए बारह आलवार संतों द्वारा छठी से नौवीं सदी के बीच रचित नालयिर दिव्य प्रबंधम् नामक द्रविड़ वेद कुल चार हजार (4000) वैष्णव भक्ति के पद हैं। ये तमिल वैष्णव परंपरा का ग्रंथ-संग्रह है।
रामानुजाचार्य के अनुसार तमिल नालयिर दिव्य प्रबंधम् वेदों का सार है। संस्कृत वेद देवभाषा में हैं, जबकि नालयिर दिव्य प्रबंधम्द्र विड़ वेद तमिल भाषा होने से आम तमिल भाषी लोग भी समझ सकते हैं। दृविड़ तमिल लोग इसे सनातन वैदिक धर्म के वेदों के बराबर मानते हैं।
वे मानते हैं कि,
वेद ब्रह्म का ज्ञान देते हैं, द्रविड़ वेद ब्रह्म का प्रेम सिखाते हैं।
कभी-कभी तिरुक्कुरल (Tirukkural) को भी तमिल के नैतिक 'वेद' के रूप में संदर्भित किया जाता है, लेकिन 'द्रविड़ वेद' का सीधा संबंध आलवारों की भक्ति रचनाओं से है। 

नालयिर दिव्य प्रबंधम् का चार भागों में सम्पादन दसवीं शताब्दी में *नाथमुनि* ने किया।

1 मुदलायिरम् में 947 पद हैं। (तमिल इसे ऋग्वेद के समान मानते हैं।)
2 इरंडामायिरम् में 1134 हैं। तमिल इसे यजुर्वेद के समान मानते हैं।
3 मून्रामायिरम् में 593 पद हैं। तमिल इसे सामवेद के समान मानते हैं।
नम्मालवार की रचना तिरुवाय्मोली के 1102 पदों को तमिल लोग सामवेद के समान मानते हैं।
वेदांत देशिक ने कहा - "वेद में जो गूढ़ है, वो तिरुवाय्मोली में स्पष्ट है"।
4 नानकामायिरम् में 1326 पद हैं। तमिल इसे अथर्ववेद के समान मानते हैं।
रामानुज, वेदांत देशिक, मणवाल मामुनि ने इस पर भाष्य लिखे। 
इनमें नारायण और उनके अवतारों की भक्ति। श्रीरंगम, तिरुपति, कांची के मंदिरों का वर्णन। भगवान को नायक और भक्त को नायिका मानकर प्रेम के पद। आण्डाल की तिरुप्पावै मार्गशीर्ष महीने में रोज गाई जाती है।
तिरुपति, श्रीरंगम, मेलकोटे में रोज वेद पारायण के बाद *दिव्य प्रबंध पारायण* होता है।

नालयिर दिव्य प्रबंधम्द्र में मुख्य रूप से नम्मालवार तिरुवाय्मोली रचित 1352 पद । 
तिरुमंगई आलवार रचित 1361 पद ।
गोदादेवी के पिता पेरियालवार रचित 473 पद। 
एकमात्र महिला आललवार *आण्डाल* रचित तिरुप्पावै ।


किंचितकरम ट्रस्ट (Kinchitkaram Trust)
 संस्कृत और द्रविड़ वेदों का संरक्षण. अनुवाद, पुस्तकों का प्रकाशन कैलेंडर का प्रकाशन प्राचीन तमिल और संस्कृत टीकाओं का अंग्रेजी में अनुवाद करने का कार्य करता है

गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

बाइबल

अ ब्राह्म , अब्राहम 
अत्रि-अनसुया के पुत्र चन्द्रमा पुत्र बुध, बुध और वैवस्वत मनु (श्राद्ध देव) की पुत्री इला के पुत्र *एल* पुरुरवा ही एल, इलाही, अल्लाह हैं जिन्हें बाइबल में (देवताओं में वरिष्ठ / महादेव का वाचक यह्व) से याहवेह कहा है। पुरुरवा और इराक के नगर उर की वासी, तिब्बत में स्थित अमरावती पुरी के ईशान कोण में स्थित इन्द्र सभा की नर्तकी उर्वशी (उर वासी) का पुत्र आयु ही आदम है। आ दम (दम मतलब प्राण)।‌
इन्द्र सभा से अवकाश लेकर उर्वशी ने पुरुरवा से अस्थाई काण्ट्रैक्ट मेरिज मुता निकाह किया।
 प्रसुति अवस्था में उर्वशी उर नगर चली गई थी। फिर आयु का फिडिंग समय पूर्ण होने पर पुरुरवा को सोप गई और इन्द्र सभा में जॉइन कर लिया।
आरामी भाषा में रचित तनख (बायबल ओल्ड टेस्टामेंट की पहली पुस्तक उत्पत्ति) के अनुसार यहोवा (एल पुरुरवा) ने आदम (आयु) को दक्षिण पूर्व टर्की के युफ्रेटिस घाँटि में ईलाझी शहर में अदन वाटिका में अकेले ही पाला था। उसके साथ स्वर्भानु की पुत्री प्रभांशी (या प्रभुचि) को रखा था जिसे वह हव्ययती कहता था।
सुरसा की सन्तान सर्प/नाग वंशी सीरिया वासी ने आयु (आदम) को पिता (एल पुरुरवा)के विरुद्ध भड़का कर उसकी आज्ञा के विरुद्ध बुद्धि वृक्ष का अधपका/ कच्चा फल तोड़ कर खा लिया। इस कारण वह स्वयम् भी अल्प बुद्धि का ही रहा। (और बेचारा एल याहवेह बुद्धिहीन/ मुर्ख ही रह गया ।😂 इस कारण) एल पुरुरवा ने आयु (आदम) को अदन वाटिका से निकाल दिया। आयु प्रभांशी / प्रभुचि (हव्ययती) की सलाह पर आर्मेनिया गया। फिर वहाँ से इराक, इरान होते हुए व्यापारिक जहाजियों के साथ से सिंहल द्वीप पहूँच गया। सिंहल द्वीप श्रीलंका में श्रीपाद पर्वत शिखर पर किसी श्रीमान पुरुष के चरण चिह्न बने हैं। वह श्रीलंकाई सनातनियों का तीर्थ स्थल था। उसे ही अब्राहमिक मतावलम्बी यहुदी, ईसाई, इस्लाम और बहाई पन्थ वाले आदम शिखर (एडम पिक) कहते हैं। और उनका तीर्थ मानते हैं।
श्रीलंका से केरल होता हुआ वापस टर्की पहूँचा। तब तक एल पुरुरवा बुढ़ा होने लगा था। इसलिए उसने भी आयु (आदम) को क्षमा कर दिया।
इसी आयु (आदम) और प्रभांशी / प्रभुचि (हव्ययती) का पुत्र नहुष (न्युहु) हुआ। नहुष का विवाह शंकर जी और पार्वती जी की पुत्री अशोक सुन्दरी से हुआ।
नहुष और अशोक सुन्दरी का पुत्र ययाति (अब्राहम) हुआ। 
ययाति (अब्राहम) की प्रथम पत्नी शुक्राचार्य जी की पुत्री देवयानी (सारेह) से यदु (यदुवंशियों के पूर्वज) और तुर्वसु हुए।
ययाति (अब्राहम) की दुसरी पत्नी वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा (हागार या हाजिरा) जो देवयानी (सारेह) की दासी थी के पुत्र पुरु (भारतीय चन्द्र वंशियों के पितामह), अनु और दृह्यु हुए।

बाइबल पुराना नियम (ओल्ड टेस्टामेंट) में अब्राहम की आर्मेनिया से इजराइल तक की यात्रा और संघर्ष, याहवेह का आज्ञाकारी भक्त होना। अब्राहम के पुत्र इसहाक जो किसी फरिश्ते से कुश्ती लड़ा इसलिए उसका नाम इज्राएल पड़ा। दासी हागार/ हाजिरा के पुत्र इस्माइल की बलि देने से याहवेह ने बचाया फिर इस्माइल का स्वेज (सिनाई) में बसना।
अब्राहम का वंश वर्णन, वंशजों की कथा है।
फिर न्युहु का जल प्रलय का वर्णन (शतपथ ब्राह्मण, मत्स्य पुराण, बाइबल) और इराक की प्राचीन कथाओं में भी वर्णित है। आगे न्युहु का वंश वर्णन है।
मुसा और जोसेफ की कथा, मिश्र की दासता से मुक्त होने हेतु इजराइलियों को एकत्र कर लाल सागर पार कर इजराइल में बसना। याहवेह द्वारा मुसा को दस कानून लिखित शिलालेख (टेन टेस्टामेंट) देना। उसके आधार पर यहुदा के नाम पर यहुदी पन्थ स्थापित करना।
फिर दाउद की भजन संहिता है, सुलेमान (सोलोमन) की कथा है।
बाइबल नया नियम में यीशु के जन्म से बारह वर्ष तक का वर्णन। फिर तीस से तैंतीस वर्षायु के बीच यहुदियों में मूल यहुदी पन्थ के सिद्धान्तों तथा मूल यहुदी पन्थ के सिद्धान्तों में बौद्ध मत के अनुसार सुधार करने का उपदेश देना। इससे नाराज यहुदी पुरोहितों ने रोमन ऑफिसर पिलातुस को शिकायत कर क्रुस पर बांधकर कीलें ठोंकने का दण्ड दिलवाना।
शुक्रवार को अपराह्न में यीशु को क्रुस पर टांगना और सूर्यास्त के पहले उतार कर कपड़े में लपेटकर गुफा में रखना।
जहाँ अनुयायियों ने उपचार कर ठीक कर दिया।
शनिवार को यीशु का दूर भाग जाना और रविवार को उपदेश दे कर वापस स्वर्ग (भारत के कश्मीर में लौट आना) का ग्रीक भाषा में वर्णन है।


बुधवार, 15 अप्रैल 2026

भुमध्य रेखा (इक्वेटर) अर्थात 00° अक्षांश, और प्राचीन काल में अवन्तिका पुरी से गुजरने वाली मध्याह्न रेखा (प्राइम मेरिडियन) थी जैसे वर्तमान में ग्रीनविच रेखा मध्याह्न रेखा (प्राइम मेरिडियन) है।

भुमध्य रेखा (इक्वेटर) अर्थात 00° अक्षांश, और प्राचीन काल में अवन्तिका पुरी से गुजरने वाली मध्याह्न रेखा (प्राइम मेरिडियन) थी जैसे वर्तमान में ग्रीनविच रेखा मध्याह्न रेखा (प्राइम मेरिडियन) है।


1 भूमध्य रेखा (Equator) पृथ्वी के बीचों-बीच 0° अक्षांश पर स्थित एक काल्पनिक रेखा है, जो पृथ्वी को उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध में विभाजित करती है। 
और


2 कर्क रेखा (Tropic of Cancer) उत्तरी गोलार्द्ध में भूमध्य रेखा (Equator) के समांतर 
 उत्तर में पश्चिम से पूर्व की ओर खींची गई एक काल्पनिक रेखा है।
ये दोनों समानांतर है।
इसलिए कभी क्रास नहीं हो सकती है।


3 ग्रीनविच रेखा (Prime Meridian) 
 देशांतर (longitude) पर स्थित एक काल्पनिक रेखा है, जो इंग्लैंड के लंदन में ग्रीनविच स्थित रॉयल ऑब्जर्वेटरी से होकर गुजरती है। यह दुनिया का मुख्य समय क्षेत्र (GMT) और अंतरराष्ट्रीय मानक समय निर्धारित करती है, जो पृथ्वी को पूर्वी और पश्चिमी गोलार्द्ध में बांटती है। 
प्राइम मेरिडियन (Prime Meridian) को हिंदी में प्रधान मध्याह्न रेखा या प्रधान याम्योत्तर कहा जाता है। यह 
 देशांतर (longitude) पर स्थित एक काल्पनिक रेखा है

4 ठीक ऐसे ही (ग्रीनविच नामक स्थान के समान ही) प्राचीन काल में उज्जैन से गुजरने वाली (Prime Meridian) 
 देशांतर (longitude) से दुनिया का मुख्य समय क्षेत्र अवन्तिका माध्य समय (AMT) और अंतरराष्ट्रीय मानक समय निर्धारित करती थी, जो पृथ्वी को पूर्वी और पश्चिमी गोलार्द्ध में बांटती थी। 

प्राचीन काल में उज्जैन से निकलने वाली देशान्तर रेखा 75:46 के मध्याह्न (मध्यम मध्याह्न) समय को ही विश्व का मानक समय मानकर अन्य देशों के मध्य से गुजरने वाली मध्याह्न रेखा के माध्यमिक मध्याह्न समय के अन्तर के आधार पर+ या - समयान्तर माना जाता था।
जैसे आजकल भारत की मध्याह्न रेखा ग्रीनविच (प्राइम मेरिडियन) रेखा से 82° 30' देशान्तर रेखा लिखते हैं। और ग्रीनविच माध्यमिक मध्याह्न से देशान्तर रेखा 
82° 30' का समयान्तर 05 घण्टे 30 मिनट लिखते हैं।
वैसे पहले उज्जैन से गुजरने वाली देशान्तर रेखा से करते थे। उस समय उज्जैन से गुजरने वाली देशान्तर रेखा को 00° देशान्तर रेखा कहते थे। जैसे आजकल पूर्व देशान्तर 75°46' कहते हैं।

5 अक्षांश रेखाएं परस्पर समानान्तर हैं। लेकिन देशान्तर रेखाएँ उत्तर ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव पर मिल जाती है इसलिए दो देशान्तर रेखाओं में भूमध्य रेखा पर सर्वाधिक दूरी 40,075 ÷ 360 = 111.319 किलोमीटर लगभग होती है। जबकि दोनों ध्रुवों पर शुन्य होती है।


6 दो अक्षांशों के बीच परस्पर दूरी --- पृथ्वी के अंडाकार (elliptical) आकार के कारण, भूमध्य रेखा पर अक्षांशों के बीच परस्पर दूरी थोड़ी कम (लगभग 110.57
 किमी) और ध्रुवों पर थोड़ी अधिक (लगभग-लगभग 111.7 किमी) होती है।

7 इक्वेटर (भू मध्य रेखा) और लाइन ऑफ केन्सर (कर्क रेखा) को उज्जैन से गुजरने वाली प्राचीन प्रधान याम्योत्तर मध्याह्न रेखा काटती है।
लेकिन भूमध्य रेखा (इक्वेटर) और कर्क रेखा (ट्रॉपिक ऑफ केन्सर) परस्पर समानान्तर होने से एक दुसरे को कभी नहीं काटती ।

उज्जैन से गुजरने वाली देशान्तर रेखापूर्व देशान्तर 75°46' कर्क रेखा को काटती है और भूमध्य रेखा को भी काटती है। 
गुजरने वाली देशान्तर रेखापूर्व देशान्तर 75°46' कर्क रेखा को काटती है और भूमध्य रेखा को जहाँ काटती उसी स्थान को लंकोदय कहते हैं। यहाँ आजकल कोई द्वीप नहीं है। पहले रहा होगा।

लेकिन भूमि पर वृत्त बनाने वाली भूमध्य रेखा और कर्क रेखा आपस में कभी नहीं मिलती। बल्कि भूमध्य रेखा और कर्क रेखा के बीच की सभी स्थानों पर दूरी लगभग 2,635 किलोमीटर ही रहती है।

8 नेताजी मेरिडियन और इक्वेटर का अलग-अलग अर्थ नही समझ पाये। और दोनों का अर्थ भूमध्य रेखा समझ बैठे। और 
 *कह गए कि, उज्जैन में भूमध्य रेखा और कर्क रेखा एक दूसरे को काटती है।*

मंगलवार, 14 अप्रैल 2026

अक्षय तृतीया

आज के लगभग 2420 वर्ष पहले (लगभग 395 ईसापूर्व) कृतिका नक्षत्र के योग तारा (सात तारों में से मुख्य तारा) पर वसन्त सम्पात अर्थात वसन्त विषुव दिवस था। उस दिन उत्तर ध्रुव पर सूर्योदय और दक्षिण ध्रुव पर सूर्यास्त होता है। सूर्य भूमध्य रेखा से उत्तर दिशा में बढ़ने लगता है। दिन रात बराबर होते हैं और फिर उत्तरी गोलार्ध में दिन बढ़ने और रात छोटी होने लगती है। दक्षिण गोलार्ध में इससे विपरीत दिन छोटे और रात बड़ी होने लगती है।

जिस दिन उक्त योग बना उस दिन वैशाख शुक्ल तृतीया तिथि थी।
इसलिए वैशाख शुक्ल तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया कहा गया।
तभी से अक्षय तृतीया का पर्व मनाया जा रहा है।
गणना अनुसार त्रेतायुग का प्रारम्भ भी अक्षय तृतीया को हुआ था।

युगादि भी होने के कारण इस पर्व का महत्व और भी बढ़ गया।
युगादि तिथियों में स्नान श्राद्ध - तर्पणादि और दान किया जाता है। 
वसन्त विषुव अर्थात वैदिक नव संवत्सर प्रारम्भ दिवस होने से कृषक लोग भूमि का बंटवारा अक्षय तृतीया को ही करते हैं।
इस दिन पूरे दिन मुहुर्त शुभ माना जाता है।

*अक्षय तृतीया और परशुराम जयन्ती 19 अप्रैल 2026 रविवार को है।*
इन्दौर में 
सूर्योदय 06:04 बजे होगा।
मध्यान्ह 12:26 बजे होगा।
मध्याह्न काल 11:10 बजे से 01:42 बजे तक रहेगा।
सूर्यास्त 06:47 बजे होगा।
गोधुलि वेला 06:47 से 07:10 बजे तक रहेगी।

सायं सन्ध्या 06:47 से 07:55 बजे तक रहेगी।
प्रदोषकाल 06:47 हे रात 09:03 बजे तक रहेगा।

तृतीया तिथि 19 अप्रैल 2026 रविवार को दिन में 10:49 बजे से 20 अप्रैल 2026 सोमवार को प्रातः 07:27 बजे तक रहेगी।

*अक्षय तृतीया 20 अप्रैल 2026 सोमवार को क्यों नहीं।* 
*स्पष्टीकरण* 

*20 अप्रैल 2026 सोमवार को तृतीया तिथि 7:27 बजे तक रहेगी।* 

20 अप्रैल 2026 सोमवार को इन्दौर में उपरी कोर दृष्य 
सूर्योदय 06:02:27
सूर्यास्त 18:49:38
दिनमान 12:46:10
प्रातः काल 12:46:10÷5= 02:33:14

*प्रातः काल सूर्योदय 06:02:27 बजे से 08:35:41 बजे तक रहेगा।*

जबकि शास्त्रीय *नियमानुसार तो उदिया तृतीया यदि तीन मुहूर्त अर्थात 06 घटि अर्थात प्रातः काल के बाद तक हो तभी अक्षय तृतीया के रूप में मान्य है।*
*इसलिए प्रातः काल समाप्ति 08:36 बजे के भी 01 घण्टा 09 मिनट पहले (02 घटि 52 पल 30 विपल) पहले ही 07:27 बजे समाप्त हो जाने वाली तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया कैसे माना जा सकता है?*
दुसरा 
*युगादि पर किया जाने वाला श्राद्ध तर्पण अपराह्न व्यापी तृतीया में ही हो सकता है। जबकि तृतीया तिथि प्रातः काल में ही समाप्त हो चुकी होगी।*
श्राद्ध में उदिया तिथि का कोई महत्व नहीं होता है। अपराह्न काल वाली तिथि ही मान्य होती है।

वैदिक काल में असमान क्षेत्र वाले नक्षत्र और मधु, माधव आदि महिनों के नाम से ही जानी जाने वाली तीस-तीस अंशो वाली सायन प्रधि (प्रधियाँ) ही प्रचलित थी (जिसे आजकल सायन राशियाँ कहा जाता है।)

*भारत में विक्रमादित्य के समय आचार्य वराहमिहिर ने 13°20' के समान क्षेत्र वाले नक्षत्र, और पश्चिम टर्की, इराक के बेबीलोन और मिश्र में प्रचलित पशुओं की आकृति वाली समान तीस-तीस अंशो वाली निरयन मेषादि राशियों तथा रविवार आदि वारों का प्रचलन प्रारम्भ किया। इसके पहले मेष वृषभादि निरयन राशियाँ, 13°20' के समान भोग वाले नक्षत्र और सोमवार/ बुधवार भारत में कोई नहीं जानता था।*
*अतः सोमवार बुधवार को पढ़ने वाली तृतीया विशेष पुण्यदाई मानना केवल पौराणिक परम्परा है। श्रोत/ स्मार्त मत नहीं है।*

*अक्षय तृतीया पर विवाह करने वालों को रिक्ता तिथि चतुर्थी में विवाह करना पड़ेगा यह भी एक मुद्दा है, लेकिन अक्षय तृतीया पर विवाह शास्त्रीय मत न होकर केवल परम्परा मात्र है इसलिए विचारणीय नहीं है। फिर भी समस्या तो है ही।*
ध्यान रखें श्रोत - स्मार्त मतानुसार सर्वकालिक तिथि ही महत्व रखती है।
*जहाँ उदिया तिथि ग्राह्य होती है वहाँ भी शाकल्यपादिता तिथि अर्थात तीन मुहूर्त अर्थात छः घटि तक (सूर्योदय के बाद 02 घण्टे 24 मिनट तक) रहे तभी मान्य होती है।* 
वास्तव में तो दिनमान को पाँच से भाग देकर (दिनमान÷5=) तीन मुहूर्त या छः घटि निकालते हैं।
*20 अप्रैल 2026 को तृतीया तिथि सूर्योदय के बाद केवल 03 घटि 32 पल तक ही रहेगी।* अर्थात दो मुहूर्त भी नहीं है।
*जबकि 19 अप्रैल 2026 रविवार को तृतीया तिथि दिन में 10:49 बजे लगेगी। अतः मध्याह्न व्यापी, अपराह्न व्यापी प्रदोषकाल व्यापी तथा पूर्ण रात्रि व्यापी तिथि है।*
*अतः अक्षय तृतीया 19 अप्रैल 2026 रविवार को ही है।*

सोमवार, 13 अप्रैल 2026

निरयन मेष संक्रमण से नक्षत्रीय नव संवत्सर युधिष्ठिर संवत और विक्रम संवत का प्रारम्भ।

*युधिष्ठिर संवत 5163 विक्रम संवत 2083 का प्रारम्भ, वैशाखी, निरयन मेष संक्रमण 14 अप्रैल 2026 मङ्गलवार को प्रातः 09:33 बजे होगा।*
*पुण्यकाल सूर्योदय समय (इन्दौर में 06:21 बजे से) दोपहर 12:45 बजे तक रहेगा।* 
*धार्मिक प्रयोजन मे युधिष्ठिर संवत 5163 विक्रम संवत 2083 का प्रारम्भ निरयन मेष संक्रमण के समय दिन में 09:33 बजे से होगा।*
*लेकिन व्यवहार में सूर्योदय से ही लागू होगा। इन्दौर में सूर्योदय समय 06:21 बजे होगा ‌।*

वैशाखी पर्व भी 14 अप्रैल मङ्गलवार को है। यह खालसा पन्थ की बैसाखी से मिलता है, लेकिन खालसा पन्थ नानक पन्थी पञ्चाङ्ग के आधार पर अमृतसर के लिए बैसाखी निर्धारित करते हैं।

*ब्राह्मण ग्रंथों और श्रोत सूत्र -गृह्य सूत्र ग्रन्थों में क्रान्ति वृत के ठीक मध्य में चित्रा तारे को माना गया है। अर्थात चित्रा तारे को भूमि द्वारा सूर्य के परिभ्रमण पथ के ठीक मध्य में अर्थात 180° पर माना गया है। इसलिए क्रान्तिवृत और नक्षत्र पट्टी का प्रारम्भ बिन्दु चित्रा तारे से 180° पर माना गया है। यही अश्विनी नक्षत्र का प्रारम्भ बिन्दु होता है। इसे निरयन मेषादि बिन्दु पर भी कहते हैं।*

*आकाश का नित्य अवलोकन करने वाले किसान आदि और तारों (Star's) को पहचानने वाले खगोल शास्त्री आकाश में देख सकते हैं कि, निरयन मेष संक्रमण/ वैशाखी (14 अप्रैल) को सूर्योदय के ठीक पहले चित्रा तारा पश्चिम में अस्त हो रहा होगा। और सूर्यास्त के ठीक बाद में चित्रा तारा पूर्व में उदय हो रहा होगा। यह नक्षत्रीय नव संवत्सर प्रारम्भ होने की पहचान है।*

*पञ्जाब हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उड़ीसा और नेपाल में जिन दो सूर्योदय के बीच निरयन मेष संक्रमण होता है उसी दिन वैशाखी से नव वर्ष मनाते हैं। चूंकि मङ्गलवार और बुधवार के सूर्योदय के बीच निरयन मेष संक्रमण होगा इसलिए 14 अप्रैल 2026 मङ्गलवार को सूर्योदय के समय वैशाखी से नव वर्ष मनाते हैं। इसी दिन यहाँ विक्रम संवत 2083 का प्रारम्भ होगा।*
*उत्तर प्रदेश में सतुआ संक्रान्ति कहते हैं।*

*बङ्गाल और असम में में जिन दो मध्यरात्रियों के बीच में निरयन मेष संक्रमण होता है उसके आधार पर नववर्ष प्रारम्भ करते हैं। चुंकि,13 उपरान्त 14 अप्रैल 2026 सोमवार Tuesday को मध्यरात्रि के बाद मेष संक्रमण होगा इसलिए बङ्गाल में नबा वर्ष पाहेला बोईशाख 14 अप्रैल 2026 मङ्गलवार से प्रारम्भ होगा। बङ्गाल में लोग परस्पर सुभो नोबो बोरशो कह कर बधाई देते हैं।*

*उड़ीसा में 14 अप्रैल से पणा संक्रान्ति या महा बिशुबा के रूप में नव वर्ष मनाएंगे।*

*त्रिपुरा में भी 14 अप्रैल को निरयन मेष संक्रमण से ही नव वर्ष प्रारम्भ होता है।*

*असम में निरयन मेष संक्रमण 14 अप्रैल से ही बिहू या बोहाग बिहू और रोंगोली बिहू नाम से नव वर्ष मनाएंगे। बोहाग बिहु का प्रथम दिन गोरू बिहू कहलाता है।*

*तमिल नाडु में सोमवार को सूर्यास्त के बाद निरयन मेष संक्रमण होने के कारण तमिल नाडु में 14 अप्रैल 2025 से पथाण्डु के नाम से नव वर्ष मनाएंगे।*
पुडुचेरी में भी तमिलनाडु के समान ही निरयन मेष संक्रमण दिवस से ही नव वर्ष मनाते हैं।

*सोमवार को सूर्योदय पश्चात 18 घटि अर्थात 07 घणटे 12 मिनट के बाद निरयन मेष संक्रमण होने से केरलम में 14 अप्रैल को विषुकानी नाम से नववर्ष मनाएंगे।*

इसके अलावा श्रीलङ्का, म्यांमार, कम्बोडिया, लाओस, थाईलैंड और सिङ्गापूर में बसे तमिल, मलयाली जन भी निरयन मेष संक्रमण के दिन से ही नववर्ष प्रारम्भ करते हैं।

अर्थात *सातवाहन वंश और शक और कुषाणों द्वारा शासित पश्चिम भारत और मध्य भारत के पौराणिक मतावलम्बियों को छोड़कर शेष उत्तर भारत, पूर्वी भारत, और दक्षिण भारत में तथा बाङ्ग्ला देश, श्रीलङ्का, म्यांमार, कम्बोडिया, लाओस, थाईलैंड और सिङ्गापूर में बसे तमिल, मलयाली जन भी निरयन सौर संक्रमण से प्रारम्भ होने वाला नव संवत्सर और मेष-वृषभादि मास तथा वैशाखी, विषु, माघ बिहू आदि पर्व मनाते हैं।*

बुधवार, 8 अप्रैल 2026

भारत पर विदेशी शासन का संक्षिप्त इतिहास।

धर्म की रक्षा करने से धर्म भी रक्षा करता है।
वैदिक वर्णश्रम धर्म छोड़कर जाति प्रथा अपनाई, पञ्च महायज्ञ छोड़कर जैनों और बौद्धों की नकल कर मठ, मन्दिर में मूर्ति पूजा प्रारम्भ कर दी तो देश से अफगानिस्तान, तध्य और पूर्वी तुर्किस्तान, तिब्बत, म्यांमार, श्री लङ्का सब कट गये। और अन्त में 1947 में पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बाङ्लादेश) और पश्चिमी पाकिस्तान कट गये।
सर्वप्रथम दिवोदास और सुदासद के समय टर्की (तुर्किये) से चन्द्र वंशी और सीरिया से नाग वंशी आये और दशराज युद्ध के समय उत्तर में तुर्किस्तान (ब्रह्मावर्त) भारत से कट गया।
 महाभारत काल में ही इराक के असूर धर्म से संस्कारित जरुथ्रुस्ट ने ईरान मे पारसी मत चलाकर सनातन वैदिक वर्णश्रम धर्म को हानि पहूँचाई। ईरान में पारसी मत ने सनातन वैदिक वर्णश्रम धर्म को समाप्त कर दिया। और ईरान भारत से कट गया।
श्रमण मत के जैन पन्थ और 1857 ईसा पूर्व में बौद्ध पन्थ का उदय हुआ। उन्होंने सनातन वर्णाश्रम वैदिक धर्म का नाश किया। मङ्गोलिया भारत से कट गया। और तिब्बत भी लगभग-लगभग कट ही गया।
भगवान श्रीकृष्ण पर आक्रमण करने के लिए यमन से काल यमन को आमन्त्रित करने वाला जरासन्ध चन्द्रवंशी यादव था।
जब 550 ईसापूर्व में पारसी (कुरेश)का आक्रमण हुआ, अफगानिस्तान तक पारसी धर्म फैल गया। 
फिर भारत खण्ड-खण्ब होने लगै।
326 ईस्वी पूर्व सिकन्दर के आक्रम से उत्तर पश्चिम प्रान्त कट गया। पश्चिम को भारत की फूट परस्ती पता चल गई।
123 ई.पू. से 200 ई. तक शको ने भारत पर आक्रमण किया।
60 से 240ई.तक कुषाणो ने भारत पर आक्रमण किया।।
और 425ई. से 500ईस्वी तक हूणो ने भारत पर आक्रमण किया। 

1200 ईस्वी पूर्व मूसा के समय और 2000 वर्ष पहले यीशु के साथ कश्मीर और त्रिपुरा में यहुदी बस गए और भारत में अब्राहमिक मत का प्रारम्भ हुआ। फिर यीशु के शिष्य सेंट थॉमस (थोमा) ने 52 ईस्वी में केरल के कोडुंगल्लूर (मुज़िरिस) के पास मल्यान्कारा (Maliankara) में भारत के पहले चर्च की स्थापना की थी। उन्होंने केरल और तमिलनाडु के तटीय क्षेत्रों में कुल सात और आधे चर्च (एझरा पल्ली) स्थापित किए, जिनमें से पलयार, कोट्टाकावू, और निरनम प्रमुख हैं।
सनातन वैदिक वर्णाश्रम धर्म पर हमले बढ़ गये।
सन 622 में सऊदी अरब में इस्लाम की स्थापना के समय से मोहमद ने अपने अनुयायियों को गजवा ए हिन्द का लक्ष्य दिया। और इराक के खलिफा ने गजवा ए हिन्द के लक्ष्य प्राप्ति के लिए सन 638 से 711 के 74 वर्षा में इराक के नौ खलिफाओं ने 15 बार सिन्ध पर आक्रमण किया। 
24 जून 1206 को दिल्ली पर कुतुबुद्दीन ऐबक ने इस्लामी सत्ता स्थापित की।
20 मई 1498 से केरलम के कोळीकोट बन्दरगाह पर पुर्तगाली (वास्को डी गामा) के द्वारा युरोपीयन का आक्रमण प्रारम्भ हुआ।
1605 से 1885 तक नीदरलैंड्स के डचों का प्रभुत्व रहा।
1664 में फ्रेंच भारत आये 1668 में पहली फैक्ट्री खोली, और 1673 से पाण्डु चेरी में शासन करने लगे।
1600 में अंग्रेज भारत आये और 1665 से राज करने लगे।
 इस समय न गांधी न कम्युनिस्ट और न कांग्रेस का जन्म हुआ था।
तब हमारी राष्ट्रियता को किसने क्षति पहूँचाई थी?

मंगलवार, 7 अप्रैल 2026

पौराणिकों के झूठ।

पौराणिकों पर अब्राहमिक मत विशेषकर ईस लाम का कितना प्रभाव था यह इस बात से स्पष्ट होता है कि, याहवेह किसी लोक विशेष में रहता है और मूसा को दस नियम (कानून) लिखित शिलालेख देने नीचे उतरा था।
ऐसे ही अल्लाह से मिलने येरुशलम से बुर्राक नामक गधी पर बैठ कर मोह मद गया था।
चार फ़रिश्ते अल्लाह का सिंहासन उठाये रहते हैं।
फिर वह एकदेशीय जीव निराकार कैसे हो सकता है।
लेकिन अब्राहमिक मतावलम्बी उसे निराकार कहते हैं।
ऐसी ही बुद्धी हीनता पौराणिकों ने दर्शाई।
सर्वव्यापी विष्णु, नार (प्रकृति या जल) पर अयन करने वाले एक देशी नारायण को एक ही व्यक्ति बतला दिया।
वत्रासुर, शम्भर आदि अनेक असुरों, दैत्यों का वध करने वाले इन्द्र को सदा पराजित होने वाला बतला दिया। और परेशान देवताओं की सहायतार्थ श्री हरि को पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ता है। वह भी एक छोटे से क्षेत्र लङ्का द्वीप/ लङ्का पुरी, मथुरा के राजाओं को मारने के लिए!
पञ्च मुखी (अण्डाकार) हिरण्यगर्भ ब्रह्मा और चतुर्मुख प्रजापति ब्रह्मा को एक बतलाने के लिए रुद्र के हाथों ब्रह्मा का सिर कटवा दिया।
उसके पीछे भी अनेक कारण जोड़ लिए।
1 वाणी-हिरण्यगर्भ ब्रह्मा की मानस सन्तान प्रजापति ब्रह्मा और सरस्वती। अर्थात प्रजापति की शक्ति सरस्वती।
सरस्वती को देख कर प्रजापति कामुक हो गये और (उषा के पीछे-पीछे सूर्य के रूपक से) सरस्वती के पीछे प्रजापति ब्रह्मा दौड़े। इस लिए रुद्र ने एक सिर काट डाला।
हिरण्यगर्भ ब्रह्मा का ऊपरी सिरा वेद विरुद्ध असुरों के हित में मन्त्रोच्चार कर रहा था इसलिए तन्त्र रचियता रुद्र ने तान्त्रिक क्रिया करने के आरोप में ब्रह्मा का ऊपरी सिर काट डाला।
ज्योतिर्लिङ्ग का सिरा नहीं खोज पाने के बाद भी खोज लिया कहकर झूठ बोलने वाला सिर काट डाला।
अपराधी को दण्ड देने से रुद्र को ब्रह्म हत्या का पाप के रूप में वह ब्रह्मशिर चिपक गया।
इतनी बे-सिर-पैर की कल्पना सनातन वैदिक धर्म में घुसा दी। इन पौराणिकों से बड़ा पापी और कौन हो सकता है।
जिन्होंने सती के आत्मदाह की झूठी कहानी गढ़ी। देवी देवता अमर होते हैं तो सती मर कैसे गई?
महा विशविज्ञानी भगवान शंकरजी सती की मृत्यु से विक्षिप्त कैसे हो सकते है?
शंकर जी ने सती की भस्मीभूत देह का शव कन्धे पर कैसे लटकाया?
शंकर जी के कन्धे पर टंगी सड़ी गली लाश के इक्कावन टूकड़े क्यों करना पड़े? वो भी भगवान विष्णु को!
शंकर जी को तब तक भी होंश नहीं आना भी आश्चर्य जनक है।
देवी सती का पुनर्जन्म भी हुआ!
हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के मानस पुत्र कामदेव को भी भस्म कर दिया!
कामदेव का भी पुनर्जन्म हुआ। 
पतिव्रता नारी रतिदेवी ने कामदेव के दुसरे जन्म वाले स्वरूप को भी अपना पति मान लिया!
शंकर भगवान को नशेड़ी बतला दिया।
वैरागी भगवान शंकरजी और योगेश्वर श्रीकृष्ण को कामुक बतला दिया। ब्रह्मचारी हनुमानजी का गुरु की पुत्री से विवाह करवा दिया और पसीने से मछली को गर्भवती होना भी बतला दिया। और मकर ध्वज को पुत्र बतला दिया।

इतने झूठ तो कोई बड़ा अपराधी भी नहीं बोलता होगा।

सोमवार, 6 अप्रैल 2026

महाभारत के अनुसार दक्ष द्वितीय के यज्ञ मे सती ने आत्मदाह नहीं किया। बल्कि शंकर-पार्वती दक्ष यज्ञ में साथ में गये थे और साथ में ही सहर्ष लौट आये।

*प्रचेताओं के पुत्र दक्ष द्वितीय की पुत्री सती पार्वती ने दक्ष यज्ञ में आत्मदाह नहीं किया। वे जीवित ही शंकर जी के साथ कैलाश लौटी थी।*
*यदि दक्ष यज्ञ में सती आत्मदाह करती, सती का पुनर्जन्म होता और पार्वती के रूप में शंकर जी से विवाह होता तो वाल्मीकि भी रामायण में कुछ तो उल्लेख करते ही।*
*कृपया गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित महाभारत पञ्चम खण्ड,शान्ति पर्व/ मौक्ष पर्व/ अध्याय २८४ पृष्ठ ५१६६ या संक्षिप्त महाभारत का पृष्ठ १२८१ देखें।*
*महाभारत में  उल्लेखित दक्षयज्ञ विध्वंस की कथा के अनुसार प्रचेताओं के पुत्र दक्ष द्वितीय  द्वारा किए गए यज्ञ में सभी देवताओं और ऋषियों को बुलाया लेकिन शंकर पार्वती को नहीं बुलाया।*
*देवताओं को समुह में जाते देख पार्वती ने शंकर जी से पुछा, तब शंकर जी ने पार्वती को बतलाया कि, दक्ष (द्वितीय) यज्ञ कर रहे हैं, उसमें उनके निमन्त्रण / आह्वान पर देवता यज्ञभाग लेने जा रहे हैं।*
*पार्वती द्वारा यह आपत्ति जताई कि, आप रुद्र को यज्ञभाग लेने हेतु क्यों आमन्त्रित नहीं किया गया।*
*तब शंकर जी बतलाते हैं कि, इसमें दक्ष का कोई दोष नहीं है। सृष्टि के आदि में प्रजापति ब्रह्मा ने रुद्र को यज्ञभाग न देने का विधान किया गया था। इसलिए मुझे नहीं बुलाया।*
*दक्ष द्वारा यज्ञ में न बुलाने और यज्ञभाग न देने की जानकारी से रुष्ट पार्वती (न कि, सती) को साथ लेकर स्वयम् शंकर जी दक्ष यज्ञ स्थल पर गये। वहाँ पार्वती अपनी नाराज़गी प्रकट करती है। केवल दधीचि पार्वती का समर्थन करते हैं। शेष सब मौन ही रहते हैं। दक्ष पर पार्वती के रोष का कोई प्रभाव न देखकर पार्वती जी और रुष्ट हो गई। इसे देखकर शंकरजी ने वीरभद्र और भद्रकाली का आह्वान किया। और वीरभद्र और भद्रकाली को दक्षयज्ञ विध्वंस का आदेश दिया। वीरभद्र और भद्रकाली को दक्षयज्ञ विध्वंस कर दक्ष द्वितीय का सिर काट दिया। और देवताओं को भी प्रताड़ित किया।*
*फिर प्रजापति ब्रह्मा ने नियमों में संशोधन कर भविष्य में रुद्र को यज्ञभाग देने का नियम बना दिया तब, शंकर जी ने दक्ष द्वितीय को पुनर्जीवित किया। और सहर्ष पार्वती जी को लेकर वापस लौट गए।*
*क्या महाभारत ग्रन्थ गलत है?  यदि शिव पुराण सही है तो महाभारत गलत है। शिव पुराण गलत है।*
*शिवपुराण जो वस्तूतः वायु पुराण की रुद्र संहिता नामक अध्याय है, गलत है।* 
 *क्योंकि वायु पुराण में महाभारत के पश्चात आधुनिक काल की रचना है। वायु पुराण में आधुनिक काल तक के भारत के अधिकांश राजवंशों और राजाओं का इतिहास दिया है। मतलब अत्यधिक नवीनतम रचना है।* अतः 
*वरीयता तो प्राचीन ग्रन्थ महाभारत की ही रहेगी।*
*अतः महाभारत में वर्णित तथ्य ही सही है कि,प्रचेताओं के पुत्र दक्ष द्वितीय की पुत्री सती पार्वती ने दक्ष यज्ञ में आत्मदाह नहीं किया। वे जीवित ही शंकर जी के साथ कैलाश लौटी थी।*
*इसलिए सती की भस्मीभूत देह को लेकर शंकर जी द्वारा विक्षिप्त होकर पूरे भारत वर्ष में भ्रमण करना भी गलत ही है। भगवान विष्णु द्वारा शंकर भगवान के कन्धे पर लटकी सती की भस्मीभूत देह के इक्कावन टूकड़े करना भी गलत है। सती के भस्मीभूत देह के टुकड़े भारत भूमि पर जहाँ- जहाँ गिरे वहाँ-वहाँ शक्तिपीठ बनना भी गलत है।*
*पौराणिकों ने देवी सती की मृत्यु होना बतला दिया, जबकि शंकर-पार्वती देवता हैं अतः एक मन्वन्तर आयु वाले हैं। अर्थात अमर हैं।*
*यदि सती जलकर भस्म हो गई थी तो उनकी मृत देह कहाँ से आ गई?*
 *पौराणिकों ने भगवान शंकर को विक्षिप्त होना बतला दिया। जबकि वे महान विश विज्ञानी और वितरागी/ वैराग्यवान हैं। उन्हें कैसा शौक और कैसा मोह।*
*पौराणिकों ने भगवान विष्णु द्वारा मृत देह के इक्कावन टूकड़े करने वाला बतला दिया।*
क्या ऐसा पुराण और पौराणिक कथा सही हो सकती है? या केवल सनातन वैदिक धर्म के देवी देवताओं का अपमान करने के उद्देश्य से रची गई बौद्ध रचना है?*
*ध्यान रखें बौद्ध मत की वज्रयान शाखा के तान्त्रिक बौद्धों में ऐसी ही कथा/ कहानियाँ और मठ- मन्दिर पाये जाते हैं। वैदिक धर्म में नहीं।* 

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

मानव योनि श्रेष्ठतम है।

वाल्मीकि रामायण में बाली, सुग्रीव, हनुमान जी, अङ्गद आदि ने कई बार स्वयम् को मानवों से निम्नतर योनि कहा है।
मानवों से उच्चतर केवल देवताओं को ही माना गया है।
गन्धर्व भी मूलतः मानव जाति के ही थे। इनमेऔ कुछ देवताओं की सन्निधि पाकर देव गन्धर्व कहलाये। जैसे मानवों में भी कई ऋषि, राजन आदि देवताओं के निकटतम सम्पर्क में ही नहीं थे अपितु भ्रगु जैसे ऋषिगण तो देवताओं को छोड़ों देवों को भी दण्डित करते थे।
महाराजा रैवत तो पुत्री को भी ब्रह्मा जी के लोक में ले गए थे। मान्धाता, दीलिप, रघु, दशरथ, महाराज मुचुकुंद आदि देवासुर संग्राम में देवताओं के पक्ष में लड़ते थे।
यक्षों (मङ्गोल) और राक्षसों (निग्रो) को बन्धु (भाई) माना जाता है। लेकिन यक्षराज मणिभद्र और शंकरजी के मित्र कुबेर जैसे कुछ यक्ष देवयक्ष कहलाते हैं। लेकिन ये अपवाद ही होते हैं।
यों तो हम (नागपाल, नागरथ सरनेम वाले कालबेलिया) नागों की भी पूजा करते हैं। गो माता की भी पूजा करते हैं। पीपल आदि वृक्षों की भी पूजा करते हैं। लेकिन इन सब योनियों से मानव योनि श्रेष्ठतम है।

शुक्रवार, 20 मार्च 2026

अवतार ईश्वर नहीं होता, सिद्ध व्यक्ति का उच्च लोक से निर्धारित समय के लिए निश्चित कार्यक्रम के अन्तर्गत कार्य विशेष के लिए उतर कर, जन्म लेकर कार्य पूर्ण होने पर पुनः उसी लोक में लौटने को अवतार कहते हैं।

परमात्मा सर्वोच्च है। परमात्मा के संविधान को ही वेदों में ऋत कहा गया है।
परमात्मा ने जिस कल्याण स्वरूप ॐ सञ्कल्प से स्वयम् को परब्रह्म परमेश्वर विष्णु और माया के प्रथम सगुण निरञ्जन निराकार स्वरूप में प्रकट होकर सृजन प्रारम्भ किया उसी सञ्कल्प के अन्तर्गत पुनः विष्णु ने कल्प रचना की कल्पना की। जो उनकी कल्पना है, वही हमारे लिए सृष्टि है।
इसलिए जगत को माया और स्वप्नवत कहा जाता है।
चूंकि जो भी हम अनुभव कर रहे हैं वस्तुतः भगवान विष्णु की कल्पना में वह बहुत पहले हो चुका है। शुटिंग होकर रील तो कब की बन चुकी हम आज अनन्त डायमेंशन में अभी अनुभव कर रहे हैं।
भगवान श्री रामचन्द्र जी को बाली वध का बदला चुकाने हेतु श्रीकृष्ण जन्म में जरा के बाण से मृत्यु वरण ।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने नारायण स्वरूप में स्थित होकर अर्जून से स्पष्ट कहा है कि, तेरे और मेरे अनेक जन्म हो चुके हैं, मैं जानता हूँ लेकिन तु नहीं जानता है।
षड ऐश्वर्यवान व्यक्ति को ही भगवान कहते हैं।भगवान और साधारण व्यक्ति में इतना ही अन्तर होता है।
इसके दो प्रमाण वाल्मीकि रामायण से और एक प्रमाण भागवत पुराण से दे रहा हूँ।
1 जनक जी के यहाँ पिनाक धनुष भङ्ग से क्रोधित होकर जब भगवान परशुराम जी ने श्री रामचन्द्र जी को वैष्णव धनुष पर प्रत्यञ्चा चढ़ाने की चुनौती देते हुए जैसे ही वैष्णव धनुष श्री रामचन्द्र जी के हाथ में दिया वैसे ही भगवान श्री परशुराम जी का वैष्णव तेज (अवतार पद का चार्ज) श्री रामचन्द्र जी के शरीर में अन्तरित हो गया।
अब परशुराम जी केवल ऋषि रह गये और श्री रामचन्द्र जी को अवतार का पदभार मिल गया।
मतलब अवतारत्व निर्धारित कार्यकाल में निर्धारित कार्य पूर्ण करने हेतु ईश्वर प्रदत्त पदभार है। इसका प्रमाण है कि,
2 जब भगवान श्री रामचन्द्र जी की अवतार अवधि पूर्ण हो गई तो उन्हें अपना कार्यभार वापस लौटा कर लीला संवरण करने का निर्देश देने स्वयम् काल ही पधारे । और श्री रामचन्द्र जी ने सरयु में जल समाधि लेकर देह त्याग दी।
3 श्रीमद्भागवत पुराण में श्रीकृष्ण के यज्ञ में आकर एक ब्राह्मण अपने सात पुत्रों की जन्मते ही मृत्यु का दोष राजा पर लगाकर श्रीकृष्ण को दोषी ठहराते हैं तो, अर्जुन उनके गर्भस्थ शिशु की रक्षा का भार लेते हैं। लेकिन असफल होने पर आत्मदाह कर प्रायश्चित करने जा रहे होते हैं तभी भगवान श्रीकृष्ण का यज्ञ पूर्ण होने पर वे अर्जून को लेकर पश्चिम सागर होते हुए क्षीर सागर में शेषनाग के महल में सिंहासनारुड़़  अष्टभुजा धारी भगवान भूमा के सम्मुख करबद्ध उपस्थित होते हैं। तब भगवान भूमा नारायण श्री कृष्ण जी को कहते हैं कि, तुमसे मिलने के लिए ही मेने तुम्हे यहाँ बुलाया है।
तुम गत जन्म में नारायण ऋषि थे और अर्जुन नर ऋषि थे। तुम दोनों नर नारायण ने कठोर तप किया था।
फिर ब्राह्मण बालकों को सोप कर वापस लौटा देते हैं।
ये तीनों प्रमाण सिद्ध करते हैं कि, भगवान विष्णु या नारायण स्वयम जन्म नहीं लेते बल्कि किसी योग्य तपस्वी ऋषि को किसी कार्य विशेष को पूर्ण करने के लिए आवश्यक सामर्थ्य प्रदान कर अवतार का कार्यभार सोपते हैं।
इससे सिद्ध होता है कि, जब  वैकुण्ठ लोक के किसी देश का क्षत्रप के रूप में पदस्थ कोई आत्मज्ञ/ब्रह्मज्ञानी व्यक्ति किसी विशेष प्रयोजन को पूर्ण करने हेतु निर्धारित कार्य काल के लिए नियुक्त किया जाता है तो उसके उच्च लोक से उतरने की घटना को अवतरण कहते हैं। इसलिए वह षड ऐश्वर्यवान व्यक्ति अवतार कहलाता है। लेकिन वह ईश्वर नहीं होता है।
इसलिए ही भगवान श्री रामचन्द्र जी साकेत लोक से उतरे थे और पुनः साकेत लोक में अपना कार्य देखने लौट गए।और भगवान श्रीकृष्ण गोलोक से अवतरित हुए और वापस लौट कर गोलोक का कार्य भार ग्रहण कर लिया।
हमारे सौ-सवासौ वर्ष उन लोकों के लिए क्षण मात्र होता है, इसलिए वहाँ कोई कमी नहीं लगती है।

वैदिक उत्तरायण सूर्य की स्थिति उत्तर गोलार्ध में लेकिन ऋतुएँ केवल सौर मास पर आधारित नहीं होती।

संवत्सर -  वसन्त विषुव से अगले वसन्त विषुव तक लगभग 365 दिन 05 घण्टे 48 मिनट 45.2 सेकण्ड हम संवत्सर के साथ वसते (रहते) हैं; फिर संवत्सर पीछे रह जाता है और हम अगले संवत्सर के साथ हो लेते हैं। 
वैदिक अयन शब्द का ठीक-ठीक अर्थ आज तक मुझे नहीं मिला। अयन मतलब उत्तर में गति या उत्तर में स्थिति। जैसे नारायण नार (जल) में ही स्थिति और जल में ही गति?
या
उत्तर दिशा की ओर गति?
उत्तरायण का अर्थ यदि सूर्य की स्थिति या गति उत्तरी गोलार्ध में लेते हैं तो इसके समर्थन में ---
शतपथ ब्राह्मण 2/1/3 तथा तै.सं. 6/5/3 तथा नारायण उपनिषद अनु. 80 में *देवा ऋतवः वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतु उत्तरायण में होती है।* 
यहाँ कहीँ भी शरद ऋतु के आधे भाग का तो नाम ही नहीं है। और वसन्त ऋतु को भी आधी नहीं बतलाया गया। बल्कि वसन्त, ग्रीष्म वर्षा ऋतु ही कहा है।
और
मैत्रायण्युपनिषद में उत्तरायण और नारायण उपनिषद अनु 80
*उदगयन शब्द और देवयान / देवलोक शब्द स्पष्ट आये हैं।* 
महाभारत भीष्म पर्व के अध्याय 25 से 43 के अन्तर्गत भगवान श्रीकृष्ण ने विभूति वर्णन अध्याय 10 श्लोक 35 में ऋतुओं में वसन्त ऋतु कहा है। जो उसकी पूर्णता का सूचक है।
और देवयान मार्ग वर्णन अध्याय 08 श्लोक 24 में उत्तरायण के छः महीने कहा है। अर्थात   देवयान मार्ग में उत्तरायण के पूरे छः महीने आते हैं और मैत्रायण्युपनिषद तथा नारायण उपनिषद अनु 80 में भी उत्तरायण को ही देवयान कहा है। तथा शतपथ ब्राह्मण 2/1/3 तथा तै.सं. 6/5/3 तथा नारायण उपनिषद अनु. 80 में देवा ऋतवः वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतु । कथन से स्पष्ट हो जाता है कि, वसन्त सम्पात से शरद सम्पात के बीच का समय उत्तरायण होता है।
लेकिन 
यदि उत्तर की ओर गति माने तो दक्षिण परम क्रान्ति से उत्तर परम क्रान्ति सायन मकर संक्रान्ति (22 दिसम्बर) से सायन कर्क (22 जून) तक मानना होगा।
लगभग सभी पुराणों और  पञ्चाङ्ग निर्माण के ग्रह गणित के सिद्धान्त ग्रन्थ इसका समर्थन करते हैं।
यहाँ यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि, उत्तरायण - दक्षिणायन शब्द वैदिक हैं पौराणिक नहीं और कोई गणितीय अवधारणा भी नहीं है।  अतः ये प्रमाण कोटि में नहीं आते हैं।

ऋतु - शतपथ ब्राह्मण 2/1/3 तथा तै.सं. 6/5/3 तथा नारायण उपनिषद अनु. 80 में *देवा ऋतवः वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतु उत्तरायण में होती है को प्रमाण मानें तो मधुमास वसन्त सम्पात से प्रारम्भ मानना होगा। और ईष मासारंभ शरद सम्पात से मानना होगा।

लेकिन यदि दक्षिण परम क्रान्ति सायन मकर संक्रान्ति (22 दिसम्बर) से उत्तर परम क्रान्ति  सायन कर्क (22 जून) तक उत्तरायण मानकर सायन मीन संक्रान्ति से वसन्त सम्पात (सायन मेष संक्रान्ति) तक मधुमास मानें तो फिर एक समस्या और है कि, दक्षिणी गोलार्ध में दक्षिण अफ्रीका महाद्वीप, दक्षिण अमेरिका महाद्वीप, आस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैण्ड के निवासियों के लिए वसन्त सम्पात (सायन मेष संक्रान्ति) के समय वसन्त ऋतु मानें या शरद ऋतु?  और शरद सम्पात (सायन तुला संक्रान्ति) के समय शरद ऋतु माना जाए या वसन्त ऋतु ?
जब उत्तर अमेरिका महाद्वीप और अफ्रीका महाद्वीप के उत्तर में ग्रीष्म ऋतु होती है, गर्मी पड़ती है तभी दक्षिण अमेरिका महाद्वीप और अफ्रीका महाद्वीप के दक्षिण भाग में शिशिर ऋतु रहती है। ठण्ड पड़ती है।
भूमध्य रेखीय देशों में बारहों मास ग्रीष्म और वर्षा होती रहती है। तो मरुस्थलीय क्षेत्रों में वर्षा होती ही नहीं तो वर्षा ऋतु कैसे होगी।
ध्रुवीय प्रदेशों में सदैव शीत ही रहती है ग्रीष्म ऋतु की कल्पना ही नहीं की जा सकती।
अतः ऋतुओं को महीनों से नहीं जोड़ा जा सकता है।
हमने जो वैदिक मधु- माधव मास अर्थात वसन्त सम्पात से सायन मिथुन संक्रान्ति तक वसन्त ऋतु मानी है यह दक्षिण में हरियाणा पञ्जाब से उत्तर में ताजिकिस्तान अर्थात उत्तर अक्षांश 30°
 40° उत्तर अक्षांश तक ही सही है। और पौराणिक मधु-माधव मास अर्थात सायन मीन संक्रान्ति से सायन वृषभ संक्रान्ति तक मानें तो यह उज्जैन लगभग उत्तर अक्षांश 20° से उत्तर अक्षांश 30° तक पञ्जाब हरियाणा तक ही सही रहेगा।

मंगलवार, 17 मार्च 2026

भारतीय राजनीति अधिकांश समय ही सनातन वैदिक वर्णाश्रम धर्म और संस्कृति तथा भारतीय हितों के विरुद्ध ही रही

कितने ही प्रमाण दे दो कि, रा.स्व.से.संघ युरोपीय अब्राहमिक मत के हित साधन हेतु इटली के फासिस्ट दल के अनुकरण में सावरकर, हेडगऺवार और मुञ्जे ने बहुत सोच समझ कर खड़ी की गई संस्था है।
यह संस्था वैदिक सनातन वर्णाश्रम धर्म और भारतवर्ष के विरुद्ध और  राजनीतिक विचारधारा में  व्यक्तिवाद तथा आर्थिक विचारधारा में पूँजीवाद को भारत में स्थापित करने के उद्देश्य से बनाई गई संस्था है।
लेकिन छोटे कार्यकर्ताओं में यह प्रचार किया जाता है कि, संघ का सोच ही राष्ट्रवाद है तथा प्रत्येक भारतीय हिन्दू है चाहे उसका मत, पन्थ, सम्प्रदाय पारसी, यहुदी, ईसाई, इस्लाम, वाहबी आदि अब्राहमिक मत हो या तान्त्रिक, खालसा, जैन, बौद्ध, लिङ्गायत, नाथ पन्थ हो। भारतीय शब्द के स्थान पर हिन्दू और भारतीयता के स्थान पर हिन्दुत्व , व्यक्तिवादी पूंजीवादी फासिस्ट विचारधारा को राष्रवाद नाम देकर केवल भ्रमित कर दिया जाता है।
इस कारण जन सामान्य में भी रा.स्व.से.संघ को सनातन धर्म-संस्कृति और भारत राष्ट्र हितैषी राष्ट्रवादी सङ्गठन ही मानने का भ्रम त्यागना नहीं चाहता है।
दुर्भाग्य से भारत में साम्यवादी विचारधारा नास्तिक के स्थान पर केवल इस्लामी विचार बन कर रह गई। उसके देखा-देखी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने सेकुलरिज्म का अर्थ सनातन धर्म का विरोध और ईसाई - मुस्लिमों का तुष्टिकरण मान लिया। यही विचारधारा लोहियावादी समाजवादियों ने भी अपना ली। अंग्रेजों के कट्टर अनुयाई द्रविड़ दलों का एजेंडा शुरुआत से अति सिमीत दृविड़, तमिल पक्ष और उत्तर भारतियों तथा हिन्दी विरोध ही रहा।
परिणाम स्वरूप दयानन्द सरस्वती जी के अनुयाई शुद्ध भारतीय राजनयिक विचारधारा वाले महर्षि दयानन्द सरस्वती, श्रद्धानन्द जी से प्रेरित उस काल के आर्यसमाजी लाला लाजपतराय के अनुयाई सचिंद्रनाथ सान्याल द्वारा अमर बलिदानी खुदीराम बोस जैसे क्रान्तिकारियों से प्रभावित और प्रेरित होकर  साम्यवादी भारतीय क्रांतिकारी संगठन -- हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी और   पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल, श्री चन्द्रशेखर आजाद, श्री भगतसिंह, श्री राजगुरु, श्री अशफाक उल्ला खाँ जैसे लोगों की हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन (एचआरए) 
श्री चन्द्रशेखर आजाद ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन ( एचआरए ) का नाम में  सोशलिस्टब्द जोड़ कर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन कर दिया। 19 दिसम्बर 1927 को पण्डित रामप्रसाद बिस्मिल जी को गोरखपुर जेल में 27 फरवरी 1931 को चन्द्रशेखर तिवारी "आजाद" को प्रयागराज के अल्फ्रेड पार्क में और 23 मार्च 1931 को लाहोर जेल में सरदार भगतसिंह जी अमर बलिदान के बाद उक्त राष्ट्रीय आन्दोलन कमजोर हुआ उसके बाद कोई शुद्ध सनातन वैदिक भारतीय विचारधारा वाला राजनीतिक दल नहीं रहा।
इस रिक्त स्थान का लाभ उठाने के लिए अंग्रेजी शासन योजना बना ही रहा था।
इसके बाद अंग्रेजों का चातुर्य देखने और शिक्षा लेने जैसा रहा।
उन्होंने सर सय्यद अहमद और मोहम्मद इकबाल को सनातन धर्मियों के विरुद्ध भड़काया। भीमराव रामोजी सपकाले (अम्बेडकर) को वैदिक सनातन वर्णाश्रम धर्म के विरुद्ध भड़काया।

सार्वदेशक हिन्दू सभा ---
लाला लाजपतराय, मदन मोहन मालवीय द्वारा सार्वदेशक हिन्दू सभा सङ्गठन की स्थापना हरिद्वार में 1907 में की।
फिर 
राजनितिक दल के रूप में हरिद्वार में सर्वदेशक हिन्दू सभा की स्थापना 1915 लाला लाजपतराय, मदन मोहन मालवीय द्वारा की गई।

सार्वदेशिक हिन्दू सभा के अध्यक्ष ---
1915 से 1921 तक पण्डित मदन मोहन मालवीय सार्वदेशिक हिन्दू सभा के अध्यक्ष थे।

1921 से 1931 तक 
लाला लाजपत राय सार्वदेशिक हिन्दू सभा के अध्यक्ष रहे ।

इसके बाद अंग्रेजों का चातुर्य देखने और शिक्षा लेने जैसा रहा। लाला लाजपत राय जैसे शुद्ध सनातन वैदिक वर्णाश्रम धर्म संस्कृति के पोषक कट्टर भारतीय राष्ट्र वादी लाला लाजपत राय के बाद 1931 में बालकृष्ण शिवराम मुञ्जे हिन्दू महासभा के अध्यक्ष बने बन गये। 
और अंग्रेज़ो का कुटिल राजनीतिक खेल प्रारम्भ हो गया।

1931 से 1937 तक
बालकृष्ण शिवराम मुञ्जे अध्यक्ष रहे।
उधर हिन्दू सभा के पञ्जाब शाखा के अध्यक्ष भाई परमानन्द त्यागी ने 1933 में मुस्लिमों को अफगानिस्तान भेजने और द्विराष्ट्र सिद्धान्त का स्वीकार करने का लाभ लेने के लिए अंग्रेजी शासन तत्पर होगया।

अखिल भारतीय हिन्दू महासभा
1937 से 1943 तक अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के अध्यक्ष विनायक दामोदर सावरकर  रहे। 
विनायक दामोदर सावरकर ने सार्वदेशिक हिन्दू सभाका नाम हिन्दू महासभा नाम कर के इटली के फासिस्ट दल का अनुयाई बना दिया दिया।

1945 से 1946 तक डॉक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के अध्यक्ष रहे।
डॉक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने 21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली में भारतीय जनसङ्घ की स्थापना की और जो 06 अप्रैल 1980 से भारतीय जनता पार्टी कहलाती है।

 बालकृष्ण शिवराम मुञ्जे जो सार्वदेशिक हिन्दू सभा के 1931 – 37 तक अध्यक्ष रहे वे केशव बलराम हेडगेवार के राजनीतिक अनुयाई थे। लेकिन उसी समय केशव बलराम हेडगेवार आखिल भारतीय हिन्दू महासभा के उपसभापति रहे। 
केशव बलिराम हेडग॑वार के राजनीतिक अनुयाई बालकृष्ण शिवराम मुंजे का योगदान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को बनवाने में  बहुत अधिक रहा। संघ के संस्थापक और बालकृष्ण शिवराम मुंजे के राजनितिक गुरु  डॉक्टर केशव बलिराम हेडग॑वार ने अपने शिष्य बालकृष्ण शिवराम मुञ्जे को इटली के फासिस्ट दल के अनुसार सङ्गठन बनाने का प्रशिक्षण लेने इटली  भेजा। जब मुञ्जे दल का सञ्चालन का और शाखा लगाने का
प्रशिक्षण ले कर लौटे तब डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में 27 सितम्बर 1925 ईस्वी में भारत में वैसा ही सङ्गठन राष्ट्रीय स्वयम् सेवक सङ्घ की स्थापना की।
लेकिन 
सावरकर की हिन्दू महासभा गांधी जी जैसा जन आन्दोलन खड़ा नहीं कर पाई। यह टीस सावरकर और उसके अनुयायियों को सदैव खलती रहती है। इसलिए विनायक दामोदर सावरकर सदैव से ही गांधी जी का विरोध करते रहे।

सोमवार, 9 मार्च 2026

बिना खाए-पीए 80 वर्ष तक रहने वाले स्व. श्री प्रहलाद ज्ञानी जो 91 वर्ष जीवित रहे।

प्रहलाद जानी जिनको चुनरीवाला माताजी भी कहते थे, क्योंकि, वे चुनरी ओढ़ते थे। गुजरात के रहने वाले जानी ने दावा किया था कि वे 1940 से 2020 तक (करीब 80 साल) बिना अन्न-जल के रहे, जिसे उन्होंने देवी अंबा की कृपा बताया। 

भारतीय रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) के वैज्ञानिकों ने उन पर 2010 में कड़ी निगरानी में एक अध्ययन किया था, जिसमें दावा किया गया कि वे बिना कुछ खाए-पिए रह सकते थे। 
 उनका जन्म 13 अगस्त 1929 को गुजरात के चराडा गांव में हुआ था। उन्होंने दावा किया था कि 11 साल की उम्र में देवी अंबा के दर्शन के बाद उन्होंने अन्न-जल का पूरी तरह त्याग कर दिया था।
तब से वे हमेशा एक महिला की तरह श्रृंगार करते थे, लाल साड़ी (चुनरी) पहनते थे और नाक में नथ पहनते थे, इसलिए उन्हें 'माताजी' कहा जाता था।
2003 और 2010 में दो बार उनका वैज्ञानिक परिक्षण भी हुआ।
अहमदाबाद के स्टर्लिंग अस्पताल में डॉक्टरों और वैज्ञानिकों की टीम (जिसमें DRDO के वैज्ञानिक भी शामिल थे) ने उन पर दो बार रिसर्च की।
 2010 के परीक्षण के दौरान उन्हें 15 दिनों तक लगातार CCTV की कड़ी निगरानी में रखा गया। इस दौरान उन्होंने न तो कुछ खाया-पिया और न ही शौच या मूत्र त्याग किया।
डॉक्टर यह देखकर हैरान थे कि उनके मूत्राशय (bladder) में मूत्र बनता था, लेकिन वह शरीर द्वारा फिर से सोख लिया जाता था।
रहस्यमयी सिद्धांत: वैज्ञानिकों का अनुमान था कि उनके शरीर ने भूख और प्यास के प्रति एक अत्यधिक अनुकूलन (extreme adaptation) विकसित कर लिया था। जानी जी का स्वयं का मानना था कि उनके तालू (palate) में एक छेद है जिससे उन्हें "दिव्य अमृत" प्राप्त होता है।
 वे गुजरात के अंबाजी मंदिर के पास एक गुफा में रहते थे। 91 वर्ष की आयु में 26 मई 2020 को गुजरात के बनासकांठा में उनका निधन हुआ।

गुरुवार, 5 मार्च 2026

ग्राम की चारों दिशाओं में क्षेत्रपाल प्रतिमा।

चित्र में माता जी के आगे-आगे दो बालक समान वीर हनुमान जी जैसे और कालभैरव देखे होंगे ये वीर कहलाते हैं; ये ही गाँव के चारों ओर क्षेत्रपाल के रूप में स्थापित किए जाते थे।
अधिकांश गाँवों में केवल खेड़ापति हनुमान ही होते हैं लेकिन जहाँ नाथ सम्प्रदाय का गढ़ और तान्त्रिक अधिक होते हैं, वहाँ भैरव प्रतिमा भी रहती है। जिसमें प्रायः धड़ से ऊपर-ऊपर धड़ और मुख ही होता है।

शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

भारत कैसा हो?

चेतावनी।
सनातन वैदिक धर्म, जाति (मूल भारतीयता) और ऋषभदेव के पुत्र भरत चक्रवर्ती का राज्य क्षेत्र भारतवर्ष (राष्ट्र-राज्य) की सुरक्षा तभी सम्भव है; जब प्रत्येक नागरिक स्वस्थ्य, सुघड़, सुन्दर, सम्पन्न, समृद्ध,सुखी, सानन्द और बलवान होने के साथ-साथ बुद्धिमान, विवेकवान, चतुर, आशु निर्णय क्षमता युक्त, कट्टर वैदिक सनातन धर्म और संस्कृति का पालक-पोषक, केवल भारतवर्ष (स्वराष्ट्र) के प्रति निष्ठावान, कर्तव्य पथ में सजग प्रहरी होकर धनुर्वेद (सैन्यशास्त) निपुण हो और ऐसे सब नागरिक मिलकर सशक्त, समृद्ध, भविष्य की तकनीकी और रणनीति को ध्यान में रखते हुए अस्त्र-शस्त्रादि से सम्पन्न, समृद्ध, उन अस्त्र-शस्त्रादि के सञ्चालन, संधारण (रखरखाव), और विविध उपयोग जानने वाले कुशल सैनिकों से सेवित हो।


अभी हमें बहुत तैयारी करनी है।
अन्यथा चर्च और मस्जिद ही हमारा भविष्य होगा।

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

ग्रहण काल में क्या करें - क्या न करें।

प्रथम तथ्य तो यह है कि, मूर्ति पूजा जैसे अवैदिक कर्म को छोड़कर ग्रहण की अवधि में भी कोई भी वैदिक कर्म में कोई रोक नहीं है।-  
ग्रहण के समय में 
1 ब्रह्मयज्ञ अर्थात शास्त्र पठन-पाठन, ॐ का जप, गायत्री मन्त्र का जप, या कोई भी वैदिक मन्त्र जप करना ही चाहिए। नदी में खुले आसमान के नीचे करना और भी अधिक अच्छा माना जाता है।
2 देव यज्ञ - वैद मन्त्रो के साथ अग्निहोत्र करके देवताओं को आहुति देना चाहिए।
3 नृयज्ञ - गुरुकुलों, ब्रह्मचारियों, रोगी, बालकों असहायों और अशक्तों की सेवा करना ही चाहिए।
4 भूत यज्ञ, गो, आदि पाल्य पशुओं, कुत्ता, कौवा, चींटी आदि जन्तुओं, पेड़-पौधे आदि वनस्पतियों की सेवा पञ्च बलि निकालना करना ही चाहिए।
सूखा मेवा , स्वर्ण आदि का दान करना ही चाहिए।
5 पितृ यज्ञ -- अशक्त, असहाय और रुग्ण वृद्धौ , गुरुजनों , नगर में प्रवेश न करने वाले संन्यासियों की सेवा करना ही श्राद्ध है।
यह श्राद्ध कर्म करना ही चाहिए। भूखे बच्चे, वृद्ध, बिमार या गर्भवती स्त्रियों से यदि भूख सहन नहीं हो पा रही हो तो उन्हें सुखे मेवे या सेब जैसे गुदादार फल या शकरकन्द (रतालू) जैसे कन्द-फल आदि से उनकी भूख मिटाने का प्रयत्न करें।
फिर भी न रह पाए तो तुलसी दल, दुर्वा, कुश, स्वर्ण, चान्दी आदि रखकर सुरक्षित किया हुआ पका भोजन भी खिला सकते हैं।
यही श्राद्ध कर्म है।

ये सभी वैदिक कर्तव्य कर्म आवश्यक है करना ही चाहिए।
लेकिन मूर्ति पूजा और विशेषकर लिङ्ग-योनि स्पर्श और पूजा पूर्णतः निषिद्ध है।

होलिका दहन वैदिक नव सस्येष्टि कर्म का ही विकृत संस्करण है। और धुलि वन्दना और वसन्तोत्सव भी वैदिक कर्म है।
इसलिए चन्द्रग्रहण में होलिका दहन, धूलिवन्दन, वसन्तोत्सव का कोई निषेध नहीं है।

होलिका दहन के नियम - विधि-निषेध।

1 *फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा का उत्तरार्ध अर्थात भद्रा से रहित हो, प्रदोष व्यापिनी हो, तब होलिका दहन करना चाहिए ।*
2 *यदि दोनों दिन प्रदोष व्यापिनी पूर्णिमा हो, तब दूसरे दिन ही होलिका दहन करना* चाहिए,कारण यही है कि पहले दिन भद्रा से युक्त होलिका दहन उचित नहीं।

3(क) *यदि दूसरे दिन प्रदोष को पूर्णिमा स्पर्श न करें और पहले दिन प्रदोष में भद्रा हो तथा दूसरे दिन शाकल्यपादिता पूर्णिमा तिथि हो अर्थात साढ़े तीन प्रहर तक अथवा उससे अधिक पूर्णिमा तिथि हो और उससे अगले दिन प्रतिपदा वृद्धि गामिनी हो तो ऐसी स्थिति में दूसरे दिन प्रदोष व्यापिनी प्रतिपदा में ही होलिका दहन होना चाहिए।* 


3 (ख) *यदि दूसरे दिन प्रदोष को पूर्णिमा स्पर्श न करें और पहले दिन प्रदोष में भद्रा हो तथा दूसरे दिन शाकल्यपादिता पूर्णिमा तिथि हो अर्थात साढ़े तीन प्रहर तक अथवा उससे अधिक पूर्णिमा तिथि हो औरयदि प्रतिपदा का ह्रास हो तब पहले दिन भद्रा के पुच्छ काल में अथवा भद्रा के मुख को छोड़कर, भद्रा में ही होलिका दहन किया जाना चाहिए।*

4 *यदि दूसरे दिन प्रदोष को पूर्णिमा स्पर्श न करें और पहले दिन निशिथकाल से पहले ही भद्रा समाप्त हो जाए तो भद्रा समाप्त होने पर होलिका दहन करना चाहिए, परंतु यदि भद्रा निशीथकाल से बाद में समाप्त हो तो भद्रा के मुख को छोड़कर, भद्रा काल में ही अथवा पुच्छ काल में होलिका दहन करनी चाहिए ।*

5 *श्री विद्याधर शर्मा गौड़ जी ने निर्णय सिंधु के द्वितीय परिच्छेद के फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा निर्णय में कहा..*

*अथ परेन्हि ग्रस्तोदयस्तदा पूर्व दिने भद्रावर्ज रात्रौ चतुर्थयामे विष्टिपुच्छे वा होलिका कार्या...*
अर्थात 
 *यदि दूसरे दिन ग्रस्तोदय चंद्र ग्रहण हो तो पूर्व दिन ही भद्रा के पुच्छ काल में अथवा उस रात्रि के चतुर्थयाम में होलिका दहन करें।*

6 निष्कर्ष-- *(जैसा कि निर्णय सिंधु में श्री विद्याधर शर्मा गौड़ जी ने कहा)*

*अतः पूर्णिमा तिथि के चतुर्थ प्रहर की प्रथम पाँच घटि अर्थात भद्रा के मुख को छोड़कर पुच्छ काल से पूर्व का समय अधम, पुच्छ काल मध्यम तथा चतुर्थयाम सर्वोत्तम काल के रूप में स्वीकार करना चाहिए।*
इसके अलावा यह सत्य  है कि साधारण नियमानुसार ग्रहण काल में होलिका दहन का निषेध नहीं, परन्तु मूर्धन्य विद्वान विद्याधर शर्मा गौड़ जी के वचनानुसार विशेष परिस्थितियों में ग्रहण काल में होलिका दहन से बचना चाहिए।


7 धूलिवन्दन पर्व *धर्म सिंधु, निर्णय सिंधु तथा अन्य जितने भी ग्रंथ हैं उन सभी में यही प्रमाण प्राप्त होता है कि होलिका विभूति वन्दन/वसंतोत्सव करने हेतु प्रतिपदा, सूर्योदय कालिक होनी चाहिए।*

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2026

अंग्रेजी लिपि के रोमन अपर केस लेटर्स ABCD, लोअर केस लेटर्स abcd और दोनों प्रकार के कर्स्यु लेटर्स का संक्षिप्त इतिहास।

पत्थरों पर या मिट्टी की प्लेट पर कीलों से खोद-खोदकर लिखने हेतु सरल रेखाओं और अर्धवृत्त को जोड़कर ABCD आदि रोमन / लेटिन स्क्रिप्ट का विकास हरियाणा भारत की ब्राह्मी लिपि --> लेबनान की फोनिशियन लिपि --> पश्चिम टर्की की ग्रीक लिपि --> से लेटिन रोमन लिपि का आविष्कार चौथी शताब्दी में हुआ।
लगभग चौथी से आठवीं सदी के बीच कलम (पेन) से लेखन प्रारम्भ होने के पश्चात लेखन में शीघ्रता हेतु अक्षरों को गोलाई दी देकर छोटे लेटर्स abcd बनाए। छापखाने में लोअर केस में रखे जाने के कारण लोअरकेस भी कहलाते हैं। जबकि रोमन लेटर्स अपर केस कहलाते हैं  क्योंकि ये उपर की ट्रे में रखें जाते थे।

बिना हाथ उठाए आर्मेनियाई आरामी (प्राचीन अरबी) लिपि के अनुसरण में बिना हाथ उठाए हस्त लेखन में तेजी हेतु दोनों प्रकार के कर्स्यु लेटर्स सत्रहवीं - अठारहवीं शताब्दी में रचे गये।
इङ्ग्लेण्ड की मूल भाषा एङ्ग्लो-सेक्शन थी जिसे जर्मनी के प्रभावित इङ्लिश में परिवर्तित किया गया।

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

होलाष्टक क्या है? क्यों माना जाता है? शुभकार्यों में कहाँ-कहाँ निषिद्ध है?

 *होलाष्टक* 
पौराणिक कथाओं के अनुसार हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु की एक बहन और प्रह्लाद जी की भुआ असम के राजा विप्रचित्ति की रानी सिंहिका थी जिसका पुत्र स्वर्भानु (राहु) था जो अधिकांशतः हिरण्यकशिपु के पास ही रहता था। और हिरण्यकशिपु का दुसरे पुत्र संह्लाद को विप्रचित्ति ने राहु के जन्म से पहले ही गोद ले रखा था । संह्लाद कामरूप (असम) में रहता था। उसने विभिन्न प्रजाति के विषैले सर्प पाल रखे थे।
और दुसरी बहन होलिका थी जिसने तपस्या करके अग्नि में न जलने का वरदान प्राप्त कर रखा था। लेकिन हर वरदान की कुछ सीमाएँ एवम् पारिस्थितिक शर्तें होती है।
ये दोनों बहनें जब हिरण्यकशिपु से मिलने आई उसके पहले सिंहिका पुत्र स्वर्भानु की सलाह पर हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद जी को मारने के लिए अनेक प्रयत्न किये। लेकिन प्रह्लाद जी अपने इष्ट नारायण श्रीहरि की कृपा से बच जाते थे। सिंहिका और विप्रचित्ति ने प्रह्लाद जी को पत्र लिखकर प्रह्लाद जी को कामरूप में संह्लाद से मिलने भेज दिया और पत्र में सांकेतिक भाषा में प्रह्लाद जी को सर्प गृह बतलाने के बहाने अन्दर बन्द करदेने का निर्देश लि दिया था।
जब संह्लाद ने प्रह्लाद जी को सर्प गृह में बन्द किया तो सर्प गृह खुला रह गया और सर्पों ने संह्लाद को ही डस लिया। लेकिन प्रह्लाद जी ने अपने भाई संह्लाद को बचा लिया। इससे संह्लाद का मन परिवर्तित हो गया।
असफल होने पर लौटते समय पुनः स्वर्भानु की सलाह पर हिरण्यकशिपु ने व्यास (विपाशा), रावी (इरावति) और सतलुज नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों में अर्थात धवलपुर, लुधियाना, शिमला, फिरोजपुर, गुरदासपुर, होशियारपुर, कांगड़ा,कपूरथला और अजमेर - पुष्कर के आस-पास के क्षेत्रों में प्रह्लाद जी को फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से चतुर्दशी तक मारने हेतु बहुत प्रकार की प्रताड़ना दी गई। लेकिन प्रह्लाद जी की रक्षा उनके इष्टदेव भगवान नारायण श्रीहरि करते रहे।
अन्ततः होलिका ने प्रस्ताव रखा कि, मुझे अग्नि नहीं जला सकेगी ऐसा वरदान प्राप्त है। अतः कल (फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को) मैं सार्वजनिक महोत्सव के रूप में प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि स्नान करूंगी। परिणाम स्वरूप प्रह्लाद जल कर मर जाएगा। और मैं बची रहूँगी।
लेकिन भगवान नारायण श्रीहरि की कृपा से हो उल्टा गया। होलिका जल गई और प्रह्लाद जी सुरक्षित रहे।
व्यास (विपाशा), रावी (इरावति) और सतलुज नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों में अर्थात धवलपुर, लुधियाना, शिमला, फिरोजपुर, गुरदासपुर, होशियारपुर, कांगड़ा,कपूरथला और अजमेर - पुष्कर के आस-पास के क्षेत्रों के लोगों की मान्यता हैं कि, हिरण्यकशिपु ने इस क्षेत्र में प्रह्लाद जी का उत्पीड़न किया था। इसलिए धवलपुर, लुधियाना, शिमला, फिरोजपुर, गुरदासपुर, होशियारपुर, कांगड़ा,कपूरथला और अजमेर - पुष्कर के आस-पास के क्षेत्रों फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा तक होलाष्टक में कोई शुभ कार्य नहीं करना चाहिए। यह उस क्षेत्र की परम्परा है।
 
मुहूर्त चिंतामणि शुभाशुभ प्रकरण श्लोक 40 तथा मुहूर्त गणपति श्लोक 204 के अनुसार होलाष्टक का दोष विशेष रूप से व्यास (विपाशा), रावी (इरावति) और सतलुज नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों में वर्जित माना गया है।
यह मुख्य रूप से उत्तर पश्चिम भारत के पंजाब, हिमाचल प्रदेश का कुछ भाग और अजमेर (पुष्कर) क्षेत्र में ही मान्य है।
अर्थात 
धवलपुर, लुधियाना, शिमला, फिरोजपुर, गुरु दासपुर, होशियारपुर, कांगड़ा, कपूरथला,  अजमेर, पुष्कर आदि नगरों के आस-पास का क्षेत्र  में ही मान्य है; अन्य क्षेत्र: यह दोष हर जगह मान्य नहीं है।

 

गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

जो सरकार निकम्मी है वो सरकार बदलनी है; नारे का वास्तविक अर्थ।

*जो सरकार निकम्मी है वो सरकार बदलनी है; नारे का अर्थ अब समझ में आया।*
हमारे बचपन में चुनावी रैलियाँ और आमसभाओं में एक नारा विपक्षी दल अवश्य लगवाते थे -- जो सरकार निकम्मी है वो सरकार बदलनी है।
बच्चों को बिल्ला लगाकर हाथ में झण्डा देकर मोहल्ला रैलियाँ भी निकालते थे। बहुत से बच्चे सभी राजनीतिक दलों की रैलियों में जाकर झण्डे, डण्डे और बिल्ला संग्रहण कर अमेरिकी कथाकार मार्क ट्वैन की भाषा में स्वयम् को बहुमुल्य सम्पत्ति का स्वामी बनकर इठलाता रहता था।
लेकिन तब सभी रैलियों में जाने वाले/ माता- पिता के दबाव में केवल किसी एक रैली में में ही जाकर सन्तोष कर लेने को विवश बच्चे और किसी भी रेली में भाग नहीं ले पाने वाले के कारण घर में ही नारा लगाने वाले बच्चों से लेकर नारा लगवाने वाले वरिष्ठ जनों तक किसी को भी इस नारे का छिपा हुआ मूल अर्थ पता नहीं होता था। जो कई वर्षों से न समझ आने वाले बजट को हर साल समझने के असफल प्रयत्न से समझ आया कि,
निकम्मी सरकार वह होती है जो सम्भावना होते हुए भी राजनीतिक भाषा में भोली-भाली (वास्तविक अर्थ - मूर्ख) जनता को करों के बोझ से दबा कर कुचलने में कमी रख दे। और सरकार को सम्भावित आय प्राप्त करने से महरूम रख दे।
इसलिए हम सन 1957 से लगातार हर दस-पन्द्रह वर्ष में तो तथाकथित निकम्मी सरकार बदलते रहे हैं और नेताओं पर होने वाले खर्च और कर बढ़ाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेती है।
हमने सभी दलों के छुटभैय्ए नेताओं को कमाने के भरपूर अवसर देकर ईंट-पत्थर तोड़ने हेतु अपनी खोपड़ी का उपयोग कर अपना ही सिर फोड़ते रहे।

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

वाल्मीकि रामायण और तमिल कवि कम्बन रचित ईरामावतारम पर आधारित तुलसीदास जी कृत रामचरितमानस में श्री रामचन्द्र जी के इतिहास में आकाश-पाताल का अन्तर है

वाल्मीकि जी का आश्रम अयोध्या के निकट ही था। सीताजी वाल्मीकि आश्रम में रही वहीं कुश और लव का जन्म हुआ। और वाल्मीकि आश्रम में ही लवकुश का शिक्षण -प्रशिक्षण हुआ।
इसी दौरान महर्षि वाल्मीकि जी ने रामायण इतिहास ग्रन्थ रचा और लव कुश को मुखाग्र करवा कर श्री रामचन्द्र जी के अश्वमेध यज्ञ में सुनाने हेतु भेजा।
इस इतिहास का अनुमोदन स्वयम् श्री रामचन्द्र जी ने किया। इस लिए मूल वाल्मीकि रामायण में केवल अश्वमेध यज्ञ तक का ही वर्णन है। उत्तर काण्ड भरद्वाज जी की रचना मानी जाती है।
इसलिए इतिहास के रूप में केवल वाल्मीकि रामायण ही प्रमाण है।

श्री वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्रीरामचन्द्र जी के वास्तविक चरित्र के सच और रावण के परम प्रशंसक तमिल कवि कम्बन द्वारा तमिल भाषा में 1178 ईस्वी में रचित और 1185 ईस्वी में प्रकाशित तमिलईरामावतारम् के आधार पर रचित तुलसीदास जी कृत रामचरितमानस के आधार पर निर्मित लोक मान्यताओं में आकाश पाताल का अन्तर है।
तुलसीदास जी ने प्रयागराज में माघ मेले में कवि कम्बन रचित राम चरित्र पर प्रवचन सूना था।
उसी से प्रभावित होकर तुलसीदास जी ने रामचरितमानस की द्वितीय आवृत्ति लिखी थी। 
वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास जी की रामचरितमानस में कई स्थानों पर अत्यधिक अन्तर है।


वाल्मीकि रामायण के अनुसार ---
कौशल्या जी के पास स्त्री धन के रूप में कोसल प्रदेश के पन्द्रह गावों की जागीर की जमींदारी थी। इस प्रकार आर्थिक रूप से वे आत्मनिर्भर और सक्षम थी।

कैकेई देश की सुन्दर और साहसी राजकुमारी कैकेई से महाराज दशरथ को अत्यधिक लगाव था। इस कारण पटरानी होते हुए भी कौशल्या जी की स्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है।
इसलिए ही सुमित्रा जी ने लक्ष्मण जी को श्रीरामचन्द्र जी के साथ और शत्रुघ्न जी को भरत जी के साथ अटैच कर दिया। यह राजनीति थी।
श्री रामचन्द्र जी, भरत जी, लक्ष्मण जी और शत्रुघ्न जी के जन्म में केवल एक-एक दिन का अन्तर था। मतलब चारों भाई समवयस्क थे।
लेकिन 
जब श्रीराम क्रीड़ा में विजयी होते तो भी उन्हें भरत जी को विजयी घोषित कर देते थे। (यह विवशता की राजनीति कहलाती है।)
मतलब स्पष्ट है कि, उत्तानपाद - सुनीति और सुरुचि तथा ध्रुव जी और उत्तम वाली कहानी रिपिट हो रही थी।
अयोध्या और भारत भूमि में किसी मूर्ति/ प्रतिमा पूजन का उल्लेख नहीं है। लेकिन देवों और देवताओं की आराधना - उपासना हेतु उपासना स्थल / स्थानक होते थे। कौशल्या जी विष्णु उपासक थी।

सूर्यवंश, इक्ष्वाकु वंश, रघुकुल की परम्परा अनुसार श्री रामचन्द्र जी ही उत्तराधिकारी होंगे यह बात कैकई भली-भांति जानती थी और उसने स्वीकार भी कर लिया था। लेकिन 
कैकेई का श्री राम के प्रति प्रेम का तुलसीदास जी का प्रचार मात्र है।

इन्द्र को अपने प्रति आकर्षित देखकर प्रसन्न और उत्साहित होकर अहिल्या जी ने स्वैच्छया इन्द्र को शीघ्रातिशीघ्र उनके साथ रमण कर गोतम ऋषि के लौटने के पहले भाग जाने की सलाह देतीं हैं। मतलब अहिल्या जी भी समान रूप से दोषी थी।
गोतम ऋषि ने अहिल्या जी के उद्धार का उपाय बतलाता कि, श्री रामचन्द्र जी जब यहाँ से गुजरेंगे, तब तक तुम्हें यज्ञ भस्म लपेटे,केवल वायु का सेवन कर (निराहार रहकर) सब लोगों से अदृश्य रहकर (छुपकर) शिलावत स्थिर रहकर तप करना है । जब श्रीरामचन्द्र जी का आतिथ्य, स्वागत - सत्कार करोगी तब तुम दोषमुक्त होंगी।
मतलब अहिल्या जी पत्थर की नहीं बनी थी ।
जब सुनसान आश्रम देखकर श्री रामचन्द्र जी ने महर्षि विश्वामित्र जी से जिज्ञासा प्रकट की, तो महर्षि विश्वामित्र ने इन्द्र-अहिल्या- महर्षि गोतम के पुरे प्रकरण की जानकारी देकर आश्रम में प्रवेश किया। श्री रामचन्द्र जी ने सादर झुक कर माता अहिल्या के चरणों में प्रणाम किया।
अहिल्या जी ने फल-फूल आदि से महर्षि सहित श्री रामचन्द्र जी और लक्ष्मण जी का आतिथ्य सत्कार किया। और महर्षि गौतम के शाप से मुक्त होकर महर्षि गौतम से जा मिली।
अर्थात न तो अहिल्या जी शिला (पाषाण) हुई थी, न रामचन्द्र जी ने अशिष्टता पुर्वक ऋषि पत्नी की पाषाण देह को लात मारी। (चरण नहीं छुआये।) ये सब कवि कम्बन और तुलसीदास जी की कल्पना मात्र है।
मिथिला पहुँचने पर विश्वामित्र जी ने जनक जी और गौतम ऋषि के पुत्र का परिचय कराया और शिव धनुष की जानकारी दी।
महर्षि ने जनक जी से शिव धनुष दिखलाने का कहा। तब जनक जी ने पिनाक धनुष की विशेषता और पिनाक धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने वाले से सीता जी के विवाह का प्रण के विषय में बतलाया।
 एक गाड़ी में सन्दुक में रखे पिनाक धनुष को बहुत से भृत्य धका कर लाये। तब उन्हें बड़े से सन्दुक में रखे शिव धनुष पिनाक के दर्शन करवाए।
महर्षि के निर्देश पर श्री रामचन्द्र जी ने पिनाक पर प्रत्यञ्चा चढ़ा कर ज्यों ही प्रत्यञ्चा कान तक खींच कर टंकार की वैसे ही पुराना होने से धनुष टूट गया।

जनक जी ने प्रण अनुसार सीता जी का विवाह श्री रामचन्द्र जी से करने का प्रस्ताव रखा जिसे महर्षि और श्री रामचन्द्र जी ने स्वीकार किया।

दशरथ जी को सुचित किया गया। वे सदलबल बारात लेकर आये तब अपने छोटे भाइयों की पुत्रियों के विवाह भी दशरथ पुत्रों से करने का प्रस्ताव किया। और सबने सहर्ष स्वीकार किया।
विवाह सम्पन्न हुआ। जब बारात लौट रही थी तब मार्ग में भगवान परशुराम जी का आगमन हुआ। परशुराम जी ने क्रोधित हुए लेकिन श्रीरामचन्द्र जी ने शिष्टता पूर्वक निवेदन किया कि, धनुष पुराना था इसलिए टूट गया। जानबूझकर नहीं तोड़ा। लेकिन परशुराम जी ने नाराज होकर श्री रामचन्द्र जी को वैष्णव धनुष देकर उसपर प्रत्यञ्चा चढ़ा कर दिखलाने की चुनौती दी।
लेकिन जैसे ही परशुरामजी ने वैष्णव धनुष श्रीरामचन्द्र जी के हाथों में दिया वैसे ही भगवान परशुराम जी का अवतारत्व का तेज (चार्ज) श्रीरामचन्द्र जी में प्रवेश कर गया और भगवान परशुराम जी केवल ऋषि ही रह गये। उनको प्राप्त अवतार का प्रभार समाप्त हो गया।(डिस्चार्ज्ड हो गये।) 
मतलब न तो धनुषयज्ञ/ सीता स्वयम्वर हुआ था। न स्वयम्वर में परशुरामजी जी और लक्ष्मण जी का विवाद हुआ। और
अवतारत्व एक दायित्व है। पदभार है। जो अवतार पद के दायित्व निर्वहन कर्ता व्यक्ति के पदभार समाप्त होने पर दूसरे योग्य व्यक्ति को अन्तरित हो सकता है।
एक अवतार दुसरे अवतार को नहीं पहचान पाता है।
सीता जी जनकपुरी में उमादेवी के उपासना स्थल / स्थानक पर उमादेवी की उपासना करतीं थी।  
 श्री रामचन्द्र जी दैनिक पञ्च महायज्ञ के अलावा उपासना स्थलों/ स्थानकों पर जाकर देवों की उपासना करते थे।
अवध राज्य गणराज्य था, गणराज्य के राजा का चुनाव सभी वर्णों के प्रतिनिधियों की समिति करती थी।
श्रीरामचन्द्र जी को युवराज घोषित करने का अनुमोदन भी दशरथ जी ने उक्त समिति से लिया था। तत्पश्चात ही घोषणा की थी।

भरत जी और शत्रुघ्न जी को कैकेई देश भेज कर अचानक श्री रामचन्द्र जी को युवराज घोषित करना भी राजनीति थी। जिससे कैकेई पक्ष को सन्देह होना स्वाभाविक था।

वनवास यात्रा में दशरथ जी सुमन्त के साथ रथ से श्रीरामचन्द्र जी - सीता जी और लक्ष्मण जी को अयोध्या नगरी की सीमा तक छोड़ने गए थे।

भरत जी जब अयोध्या लौटे तो नगरवासियों ने उन्हें बहुत बुरा कहा, उनकी और कैकेई की निन्दा की, उनकी अवहेलना की इसका कारण जानकर भरत जी व्यथित हो गये। स्वाभाविक है कि, भरत जी समझ गए कि, श्रीरामचन्द्र जी के स्थान पर उनका राजा होना जनता को स्वीकार्य नहीं है।

अतः भरत जी श्री रामचन्द्र जी को राजकीय सम्मान सहित वापस लेने चित्रकूट गये।
लेकिन न केवल लक्ष्मण जी अपितु श्रीरामचन्द्र जी भी सेना सहित भरत के आगमन पर शंकित हो गये थे। लेकिन उन्होंने धैर्य रखा और भरत की भावभङ्गिमा और गतिविधियों को देखकर निश्चिन्त हो गये।

वाल्मीकि रामायण में भरत जी के नन्दी ग्राम वास के दौरान उर्मिला जी और माण्डवी जी तथा श्रुति कीर्ति जी के विषय में कुछ भी उल्लेख नहीं है।
लोगों ने मन गड़न्त कहानियाँ गढ़ ली है।

लक्ष्मण रेखा की कहानी भी मनगढ़न्त है।

कृपया देखें -- वाल्मीकि रामायण/ बालकाण्ड/ उनचासवाँ सर्ग/ श्लोक 19 से 21 तक। विशेषकर श्लोक 17 और 18
श्री रामचन्द्र जी ने तपस्या कर रही अहिल्या के चरण छूकर प्रणाम माता जी कहा, लेकिन लोग कहते हैं कि, पत्थर बनी अहिल्या को श्री रामचन्द्र जी ने पैर के अङ्गुष्ठ से छुआ।

कर्नाटक -केरल और लक्ष्यद्वीप का मानचित्र (नक्षा) लेकर वाल्मीकि रामायण/ किष्किन्धाकाण्ड/ पचासवाँ सर्ग/ श्लोक ३,7-8, 21, 24, तिरेपनवाँ सर्ग/ श्लोक 1, 2, 5 एवम् छप्पनवाँ सर्ग / श्लोक 1 एवम् 2, तथा अट्ठावनवाँ सर्ग/ श्लोक 15 से 20 तक, इकतालीसवाँ सर्ग/ श्लोक 19 एवम् 20 और युद्ध काण्ड/ सर्ग/श्लोक 70 -71 , और 92 से 94 तथा 103 एवम् एक सौ एकसौ इक्कीसवाँ सर्ग / श्लोक 17, 45 से 48, 52-53,55,60-61,64-65,69, 71 एवम् 72 पढ़ने पर निश्चित ही समझ आ जाएगा कि, 
*हनुमान जी भरुच के पास से समुद्र पार कर लंका गये थे। लोग धनुषकोडी के पास बतलाते हैं।* 
 *रावण की लंका लक्ष्यद्वीप के स्थान पर श्रीलंका मानते है़। श्री रामचन्द्र जी द्वारा कोझीकोड (केरल) से किल्तान द्वीप तक राम सेतु बनवाया था, लेकिन ,लोग तथाकथित एडम ब्रिज को राम सेतु मानते हैं।* 
वाल्मीकि रामायण के काण्ड, सर्ग और श्लोक संख्या सहित प्रमाण नीचे दिए जा रहे हैं।

 *रावण ने वेदाध्ययन किया था ऐसा कोई उल्लेख नहीं मिलता, लेकिन लोग रावण को वेदज्ञ मानते हैं।* 
तैत्तिरीय संहिता और तैत्तिरीय ब्राह्मण का सम्बन्ध श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यास जी के शिष्य वैशम्पायनजी जी से है, यह वर्णन सर्वत्र उपलब्ध है। 
लेकिन लोग कहते हैं कि, यजुर्वेद पर रावण ने भाष्य किया था, और उस भाष्य और यजुर्वेद को गड्ड-मड्ड कर दिया इसलिए इसे कृष्ण यजुर्वेद कहते हैं। जो दक्षिण भारत में कर्मकाण्ड का आधार है।

*रावण अधर्मी तान्त्रिक था यह उल्लेख किष्किन्धाकाण्ड और युद्ध काण्ड में कई बार मिलता है। लेकिन लोग उसे महान शिवभक्त कहते हैं। *
 
वाल्मीकि रामायण/ किष्किन्धाकाण्ड/ इकतालीसवाँ सर्ग/श्लोक 19-20 देखें ---
 *दक्षिणापथ पर सीताजी की खोज कर्ता दल को स्पष्ट निर्देश देते हैं कि, (तञ्जावुर में) पाण्ड्यदेश का सूचना पट्ट देखकर दक्षिण में आगे बढ़ जाना। (पाण्ड्यदेश में प्रवेश न करना।)* 

 और वाल्मीकि रामायण/ युद्धकाण्ड/ चौथा सर्ग देखें --- *किष्किन्धा से पश्चिम घाट पर ही चलते चलते वे सह्य पर्वत पर पहूँच कर सब वानर सह्य पर्वत पर चड़ गये। श्लोक- 70

श्रीरामचन्द्रजी सह्य और मलय पर्वत के विचित्र काननों, नदियों, तथा झरनों की शोभा देखते हुए यात्रा कर रहेथे। श्लोक- 71 

श्री रामचंद्र जी महेन्द्र पर्वत (शायद कण्णूर का ईजीमाला पर्वत) के पास पहूँच कर उसके शिखर पर चढ़ गये। श्लोक- 92 

महेन्द्र पर्वत पर आरुढ़ हो श्री राम जी ने समुद्र को देखा। श्लोक-93 

इस प्रकार वे सह्य और मलय को लाँघखर महेन्द्र पर्वत के समीपवर्ती समुद्र के तट पर जा पहूँचे। श्लोक- 94 

उस (महेन्द्र पर्वत) से उतरकर शीघ्र ही सागर तटवर्ती वन में जा पहूँचे।रामचन्द्रजी की आज्ञा से सुग्रीव ने समुद्र तटीय वन में सेना को ठहरा दिया। पड़ाव डाला। श्लोक- 103* 

*श्री रामचन्द्र जी कभी तमिलनाडु गये ही नहीं और न कहीं भी कोई शिवलिङ्ग स्थापित किया, लेकिन लोग रामेश्वरम श्री रामचन्द्र जी द्वारा स्थापित बतलाते हैं।* 

 *रावण को सिविल इंजीनियरिंग का भी ज्ञान नहीं था, नल नील द्वारा पाँच दिन में राम सेतु तैयार कर दिया इसपर उसे घोर आश्चर्य हुआ। गुप्तचर बतलाते रहे, लेकिन वह उपहास करते हुए दारु पी कर रंगरेलियां करता रहा। ऐसे मुर्ख को राजनीति का पण्डित कहते हैं।* 

वाल्मीकि रामायण/ युद्ध काण्ड/ बानवेंवाँ सर्ग/ श्लोक 66-67 के अनुसार 
 *मेघनाद वध से दुःखी और क्रुद्ध रावण को दी गई राय के आधार पर अमान्त फाल्गुन पूर्णिमान्त चैत्र कृष्ण पक्ष अमावस्या को रावण द्वारा पूर्ण तैयारी से श्री रामचन्द्र जी के विरुद्ध युद्ध होना निश्चित हुआ।* 
और 
वाल्मीकि रामायण/ युद्ध काण्ड/ एकसौ आठवाँ सर्ग/ श्लोक 17-23 के अनुसार
 *अमान्त फाल्गुन पूर्णिमान्त चैत्र कृष्ण पक्ष अमावस्या को सन्ध्या समय हुए इस अन्तिम युद्ध में ही श्री रामचन्द्र जी द्वारा रावण की छाती पर मारा बाण रावण का हृदय वेधता हुआ आर-पार हो गया और पहले धरती में धँस गया। फिर तरकस मे लौट आया।* 
 *रावण की मृत्यु होते ही रावण की मृत शरीर रथ से धरती पर गिर पड़ा।*
*अमान्त फाल्गुन पूर्णिमान्त चैत्र कृष्ण पक्ष की अमावस्या को ब्रह्मास्त्र से हृदय विदीर्ण हो जाने से रावण तत्काल ही मर गया, लेकिन लोग कहते हैं कि, रावण आश्विन शुक्ल दशमी को मरा और उसके मरने से पहले श्रीरामचन्द्र जी ने लक्ष्मण को रावण से राजनीति सीखने भेजा।* 

ऐसे ही
वाल्मीकि रामायण/ युद्ध काण्ड/ एकसौ चौबीसवाँ सर्ग/ श्लोक १ देखें ---
*श्री रामचन्द्र जी वनवास पूर्ण कर चैत्र शुक्ल पञ्चमी को भरद्वाज आश्रम पहूँचे और चैत्र शुक्ल षष्ठी को अयोध्या पहुँचे। लेकिन* 
 *लोग कहते हैं कि, श्री अमान्त आश्विन पूर्णिमान्त कार्तिक कृष्ण अमावस्या को रामचन्द्र जी के अयोध्या लौटने की खुशी में दीपावली मनाई जाती है।*
रावण की लंका कहाँ थी? लक्षद्वीप में या सिंहल द्वीप मे?
*लंका की स्थिति*

*जानने का आधार केवल वाल्मीकीय रामायण ही क्यों*--
महर्षि वाल्मीकि जी का निवास अयोध्या के निकट ही होने और उन्हे बहुत काल तक सीता जी का  सानिध्य प्राप्त हुआ इस कारण श्रीरामचन्द्र जी और सीतामाता का प्रमाणिक इतिहास हमे केवल वाल्मीकीय रामायण में ही मिल सकता है ।

श्री राम जी ने लोकोपवाद से बचाव हेतु गर्भवती सीताजी को लक्ष्मण जी के साथ भिजवा कर सीताजी को वाल्मीकि आश्रम में रखा था।जहाँ लव -कुश का बचपन बीता और  लव-कुश का गुरुकुल भी था महर्षि वाल्मीकि का वह आश्रम ही बना जो श्रीराम के राज्यक्षेत्र में और अयोध्या के निकट ही था।
अतः श्रीराम -सीताजी के विषय में किसी एतिहासिक तथ्य की परीक्षा महर्षि वाल्मीकि प्रणीत श्री मद् वाल्मीकीय रामायण से ही प्रमाणित हो सकता है। योग वाशिष्ठ भी कुछ लोग श्रीराम कालीन रचना मानते हैं किन्तु अधिकांश विद्वान आदिशंकराचार्य के बाद की रचना मानते हैं। अतः अन्य कोई ग्रन्थ इतिहास की दृष्टि से प्रामाणिक नही हो सकता।

गीताप्रेस गोरखपुर से प्रकाशित श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण से श्लोक संख्या अनुवाद --
अब हम वाल्मीकीय रामायण के आधार पर रावण की लंका कहाँ थी कौनसी थी इसकी  की यथार्थ भौगोलिक  स्थिति का परीक्षण करते हैं।
रावण द्वारा सीताजी के अपहरण पश्चात,श्री जटायु द्वारा श्रीराम को बतलाया कि, लंका का राजा राक्षस राज रावण सीताजी का जबरजस्ती अपहरण कर रावण उन्हे दक्षिण दिशा में लंका लंका ले गया है।
सुग्रीव जी की सहायता से सीताजी की खोज की गयी । बालीपुत्र अंगद के नेत्रत्व में  जटायु के भाई सम्पाती जी के मार्गदर्शन से श्री हनुमानजी लंका में सीताजी से मिल कर आये और श्री राम को सीताजी की जानकारी दी।
तब श्रीराम जी ने नल - नील की सहायता से समुद्र पर सेतु बनाकर सीता जी को मुक्त कराया। इतनी जानकारी सबको पता है ।
पर  किसी को सही जानकारी नही मालुम की रावण की लंका कहाँ थी/ कौनसी थी। राम सेतु कितना लम्बा था,और कितने समय में कैसे बना। इसी की जाँच हम वाल्मीकीय रामायण के अरण्य काण्ड, किश्किन्धा काण्ड और युद्ध काण्ड के आधार पर पता लगाने का प्रयत्न करते हैं। सुन्दर काण्ड के अलावा इन्ही तीन काण्डो में लंका की जानकारी दी है।और सेतु निर्माण का विवरण और वर्णन युद्ध काण्ड में है।

सामान्यतया सिंहल द्वीप अर्थात श्रीलंका को रावण की लंका माना जारहा है। जहाँ  रावण ने सीताजी का अपहरण कर उन्हे अशोक वाटिका में अवरुद्ध कर रखा था।
श्रीलंका सरकार का पर्यटन विभाग इसका पुरा लाभ उठाता है।
इसी आधार पर तमिलनाड़ु में धनुष्कोटि, रामसेतु और रामेश्वरम आदि कल्पित किये गये।
जबकि सिंहल द्वीप का नाम श्रीलंका इसलिये पड़ा क्योंकि श्री पाद पर्वत / एडम माउण्टेन पर किन्ही श्रीमान पुरुष के लंक अर्थात पेर के पञ्जे के निशान है।
यहूदियों के अनुसार यहोवा की आज्ञा उल्लघन कर आदम द्वारा बुद्धि वृक्ष का फल खा लेने पर आज्ञा उलंलंघन  के दण्ड स्वरुप आदम को अदन की वाटिका के पुर्वी द्वार से निकाल देने पर वे आदम शिखर पर सिंहल द्वीप पर गिरने सेआदम के पंजे के निशान बन गये ऐसा मानते हैं।
सनातन धर्मी उसे किसी श्रीमान पुरुष के लंक (पेर के पंजे के निशान मानते हैं।इस कारण सिंहल द्वीप को श्रीलंका कहते हैं।केवल लंका नही कहते हैं बल्कि श्रीलंका कहते हैं।
अब देखते हैं वाल्मीकीय रामायण में क्या लिखा है।
काण्ड/सर्ग/ श्लोक संख्या सहित गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित श्रीमद् वाल्मीकीय रामायण के श्लोकों के अर्थ ही दिये जा रहे हैं।क्योंकि गीता प्रेस गोरखपुर प्रकाशन और उनके द्वारा प्रकाशित पौराणिक ग्रन्थों का अनुवाद भी सर्वाधिक प्रामाणिक मान्य है।
जो वाल्मीकीय रामायण स्वयम् पढ़कर विचार करेंगे उनका ज्ञान वर्धन और भ्रम निवारण अधिक होगा।किन्तु जो नही पढ़ पाये उनके लिये प्रस्तुत है।--
आप भी पढ़िये और विचार- मनन कर निष्कर्ष निकालने का प्रयत्न करें।
*पहले अरण्य काण्ड से*--
*वाल्मीकि रामायण /अरण्य काण्ड* / *एकोनसप्तितमः सर्ग* / श्लोक क्रमांक---
श्रीराम को जटायु जी प्राण त्याग के ठीक पहले बतलाते हैं कि यहाँ ( जनःस्थान )  से रावण सीता को साथ लिये यहाँ से दक्षिण दिशा की ओर गया। श्लोक -10
वाल्मीकि रामायण /अरण्य काण्ड* / *अष्टषष्टितमः सर्ग*/
श्रीराम लक्ष्मण सीताजी को खोज करते हुए भी पश्चिम में गये। - 1
सीताजी को खोजने दक्षिण दिशा में गये। श्लोक- 2
*वाल्मीकि रामायण /किष्किन्धा काण्ड/* *एकचत्वारिशः सर्ग*/
पाण्य वंशीय राजाओं के नगरद्वार पर लगे हुए सुवर्णमय कपाट दर्शन करोगे। जो मुक्तामणि यों से विभुषित एवं दिव्य है।
( नोट - यहाँ से पाण्ड्य देश की सीमा आरम्भ होती थी न कि, तंजोर नगर की।किन्तु इस प्रवेश द्वार को  लेण्डमार्क के रुप में देखने भर को ही कहा है।पाण्य देश/ तमिलनाड़ु में प्रवेश करने का निर्देश नही किया है। अर्थात पुर्वी घाट की ओर नही बल्कि पश्चिमी घाट की ओर ही जाने का अप्रत्यक्ष निर्देश है। शायद राक्षसों का प्रभाव लक्षद्वीप से नाशिक तक पश्चिम में ही अधिक था।
कुछ लोग पाण्य देश यानी तमिलनाड़ु देखकर ही उत्साहित होकर पुर्वीघाट की ओर बढ़ने का अनुमान करते हैं। जबकि सुग्रीव ने देखते हुए आगे बढ़ने का निर्देश देते हैं प्रवेश का नही।)
तत्पश्चात समुद्र के तट पर जाकर उसे पार करने के सम्बन्ध में अपने कर्त्तव्य का भली-भाँति निश्चय करके उसका पालन करना।महर्षि अगस्त ने  समुद्र के भीतर एक सुन्दर सुवर्ण मय पर्वत को स्थापित किया, जो महेन्द्र गिरि के नाम से विख्यात है। उसके शिखर तथा वहाँ के वृक्ष विचित्र शोभा सम्पन्न है।वह शोभाशाली पर्वत श्रेष्ठ समुद्र के भीतर गहराई तक घुसा हुआ है। श्लोक- 19 &20

( रावण की लंका का वर्णन) --

*उस समुद्र के उसपार एक द्वीप है, जिसका विस्तार सौ योजन है।वहाँ मनुष्यों की पहूँच नही है। श्लोक*-23
(नोट -- सौ योजन विस्तार मतलब लगभग 100 वर्ग योजन अर्थात 1288 वर्गकि.मी. =36×36 वर्ग कि.मी. वर्ग किलोमीटर।*
जबकि श्रीलंका का क्षेत्रफल 65610 वर्ग कि.मी. है।अर्थात लक्षद्वीप ही सही बैठता है श्रीलंका / सिंहल द्वीप नही।)

उस शक्तिशाली द्वीप में चारों ओर पूरा यत्न करके सीता की विशेष खोज करना। श्लोक - 24
वही देश दुरात्मा राक्षसराज रावण का निवासस्थान है।जो हमारा वध्य है। श्लोक- 25
उस दक्षिण समुद्र के बीच में अङ्गारका नाम से प्रसिद्ध एक राक्षसी रहती है, जो छाया पकड़ कर ही प्राणियों को खीँच लेती है और उन्हे खा जाती है। श्लोक - 26
(नोट - यहाँ अङ्गारका राक्षसी कहा है,नागमाता सुरसा का अन्य नाम अङ्गारका था।)
लंका को लाँघ कर आगे बड़ने पर सौ योजन विस्तृत समुद्र में एक पुष्पितक नामक पर्वत है। श्लोक- 28
पुष्पितक के  चौदह  योजन आगे  सूर्यवान पर्वत बतलाया है। श्लोक - 31 & 32
सुर्यवान पर्वत के बाद वैद्युत पर्वत है। श्लोक- 32
फिर कुञ्जर पर्वत है जिसपर अगस्त्य  का सुन्दर भवन है। श्लोक-34
कुञ्जर पर्वत पर भोगावती नगरी है। श्लोक -36
भोगावती पुरी में सर्पराज वासुकि निवास करते हैं। श्लोक - 38
आगे ऋषभ पर्वत पर चन्दन के पेड़ हैं।जिसका स्पर्ष खतरनाक है। श्लोक 40 & 41
उसके आगे पित्र लोक है जहाँ जाने का निषेध किया है। श्लोक- 44
( नोट रावण की लंका के आसपास इतने सारे द्वीप होना भी लक्षद्वीप को ही सुचित करता है।
सिंहल द्वीप श्रीलंका के आसपास इतने द्वीप नही है।

अब किश्किन्धा काण्ड से --

*वाल्मीकि रामायण/किष्किन्धा काण्ड/पञ्चाशः सर्ग/* 
विन्द्याचल  पर सीता जी की खोज करते करते अंगद, जाम्बवन्त जी और  हनुमानजी सहित वानर विन्द्याचल के नैऋत्य कोण (दक्षिण पश्चिम) वाले शिखर पर जा पहूँचे।वहीँ रहते हुए उनका वह समय जो सुग्रीव ने निश्चित किया था, बीत गया। श्लोक -03
खोजते खोजते उन्हे वहाँ एक गुफा दिखाई दी, जिसका द्वार बन्द नही था। अर्थात खुला था। श्लोक- 07
वह गुफा ऋक्षबिल नाम से विख्यात थी।एक दानव उसकी रक्षा में रहता था। वानर गण बहुत थक गये थे, पानी पीना चाहते थे। श्लोक- 8
लता और वृक्षों से आच्छादित के भीतर से क्रोंच, हंस, सारस,तथा जल से भीगे हुए चक्रवाक पक्षी ( चकवे)  , जिनके अङ्ग कमलों के पराग से रक्त वर्ण के हो रहे थे।, बाहर निकले।उस बिल (गुफा) में उन्हे जल होने का सन्देह हुआ। श्लोक- 9 & 10
हनुमानजी ने कहा निश्चित ही इसमें पानी का कुआँ, या जलाशय होना चाहिये।तभी इस गुफा के द्वारवर्तीवृक्ष हरेभरे हैं। वानरों ने उस गुफा में प्रवेश किया। श्लोक- 16 & 17
उस अन्धेरे बिल (गुफा ) से सिंह,मृग और पक्षी निकलते दिखे। श्लोक - 18
नाना प्रकार के वृक्षों से भरी उस गुफा में वे एक योजन तट एक दुसरे को पकड़े हुए गये। श्लोक- 21
*(एक योजन चलने पर) तब उन्हें वहाँ प्रकाश दिखाई दिया। और अन्धकार रहित वन देखा, वहाँ के सभी वृक्ष सुवर्णमयी थे।* श्लोक - 24
*अर्थात गुफा आरपार खुला था।*
साल,ताल,तमाल,नागकेशर, अशोक,धव, चम्पा, नागवृक्ष और कनेर के वृक्ष फुलों से भरे थे। श्लोक- 26
वानरों ने वहाँ इंट,पत्थर,लकड़ी आदि पार्थिव वस्तुओं से निर्मित और स्वर्ण तथा वैदूर्य मणि से अलङ्कृत भवन देखे। वृक्षों में फुल और फल लगे थे। श्लोक- 30 , 31 & 32
मणि और सुवर्ण जटित पलंग, तथा आसन, और सोने,चाँदी, तथा कांसे के फुलपात्र , अगरु,चन्दन, फल, मूल आदि भोजन सामग्री, बहुमूल्य सवारियाँ, सरस मधु, मुल्यवान वस्त्र, कम्बल, कालीन,मृगचर्म और स्वर्ण के ढेर देखे। श्लोक- 32  से 38
वानरों ने उस गुफा में थोड़ी दूर पर किसी स्त्री को.देखा।जो नियमित आहार करती तपस्या में सलग्न थी। हनुमानजी ने उससे उसका परिचय पुछा। श्लोक- 39 से 41

*वाल्मीकि रामायण/ किष्किन्धा काण्ड/*  *एकपञ्चाशः सर्ग/*

हनुमानजी ने उसे कहा
हम भूख-प्यास से व्यथित हैं।और जानना चाहते हैं कि,यहाँ यह सब वैभव कैसे है? श्लोक- 02 से 09
तब उस बिल( गुफा) में स्थित उस मेरुसावर्णी की पुत्री स्वयम्प्रभा नामक उस तपस्वी स्त्री  ने उत्तर दिया - मयासुर दानव पहले दानवों का विश्वकर्मा था। उसने तपस्या कर  ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त कर शुक्राचार्य का सारा शिल्प - वैभव प्राप्त किया था।
मयासुर दानव ने यहाँ की सारी वस्तुओं का निर्माण करके कुछ काल तक यहाँ निवास किया था। कुछ काल बाद हेमा नामक अप्सरा से मयासुर दानव का सम्पर्क हो गया, यह जानकर जघानेश पुरन्दर (इन्द्र) ने मयासुर को मार भगाया। तत्पश्चात ब्रह्माजी ने यह गुफा और वैभव उस अप्सरा हेमा को सोप दिया।मेरी प्रिय सखी हेमा अप्सरा द्वारा प्रदत्त इस भवन की रक्षा करती हूँ। तुमलोग पहले फल-मूल खाकर जलपान कर फिर अपना परिचय और आने का प्रयोजन बतलाना। श्लोक   -11 & 19
*वाल्मीकि रामायण/ किष्किन्धा काण्ड/*  *द्विपञ्चाशः सर्ग/*
भोजन जलपान उपरान्त विश्राम करलेने पर हनुमानजी ने अपने सहित सबका परिचय और  राक्षस रावण और उसके द्वारा अपहृत  सीताजी की खोज का वृतान्त कहकर आने का प्रयोजन बतलाया। श्लोक-  01 से 08
हनुमानजी के निवेदन पर स्वयम्प्रभा ने बाहर निकलने हेतु नैत्र मुन्दने को कहा । वानरों के द्वारा आँखे बन्दकर हाथों से ढँकते ही स्वयम्प्रभा ने उन वानरों को गुफा से बाहर पहूँचा दिया।(उस एक योजन लम्बी अर्थात  लगभग 13 कि.मी लम्बी थी ।)
गुफा के बाहर पहूँचाकर उन्हे बतलाया कि, यह विन्द्यगिरि है, इधर  यह प्रसवण गिरि है।सामने सागर लहरा रहा है। ऐसा बतलाकर स्वयम्प्रभा अपनी गुफा म़े लोट गई। श्लोक - 23 से 32
*वाल्मीकि रामायण/ किष्किन्धा काण्ड/*  *त्रिपञ्चाशः सर्ग/*
तदन्तर उन वानरों ने महासागर देखा । श्लोक - 1
वानरों का वह एकमास बीत गया, जिसे राजा सुग्रीव ने लोटने का समय निश्चित किया था।  श्लोक- 2
विन्द्यगिरि के पार्श्ववर्ती पर्वत पर बैठकर वे सभी महात्मा वानर चिन्ता करने लगे। श्लोक-  3
जो वसन्त ऋतु में फलते हैं उन आम आदि वृक्षों की डालियों को मञ्जरी एवम् फूलों के अधिक भार से झुकी हुई तथा सेकड़ो लता बेलों से व्याप्त देख वे सभी सुग्रीव के भय से थर्रा उठे। श्लोक-  4
वे एक दुसरे को बताकर कि, अब वसन्त का समय आना चाहता है, राजा के आदेशानुसार एक माह के भीतर जो काम कर लेना चाहिए था , वह न कर सकने के  या उसे नष्ट कर देने के कारण भय के मारे भूमि पर गिर पड़े। श्लोक- 5
*वाल्मीकि रामायण/ किष्किन्धा काण्ड/*  *चतुःपञ्चाशः सर्ग/*
हनुमानजी जानते थे कि, बालीपुत्र अंगद अष्टाङ्ग बुद्धि, चार प्रकार के बल और चौदह गुणों से सम्पन्न है श्लोक।-  2
अष्टांग बुद्धि - 1-  सुनने की इच्छा रखना; 2 सुनना, 3 सुनकर ग्रहण करना, 4 ग्रहणकर धारण करना,  5उहापोह करना,6 अर्थ या तात्पर्य को समझना,7 तत्व ज्ञान सम्पन्न होना।
चार प्रकार के बल - 1 साम, 2 दण्ड,  3 भेद और चौथा दण्ड।

चौदह गुण -01 देशकाल ज्ञान,0 2 दृढ़ता,0 3 सब प्रकार के कष्टों को सहन करने की क्षमता,04  सभी विषयों का ज्ञान प्राप्त करना,0 5 चातुर्य (चतुरता), 06 उत्साह या बल,07 मन्त्रणा को गुप्त रखना,08 परस्पर विरोधी बातें न करना,09 शूरता,10 अपनी और शत्रु की शक्ति का ज्ञान, श्लोक 11 कृतज्ञता, श्लोक 12 शरणाङगत वत्सलता,  13 अमर्षशीलता,   14  और अचाञ्चल्य, ( स्थैर्य या गाम्भीर्य)।

*वाल्मीकि रामायण/ किष्किन्धा काण्ड/षट्पञ्चाशः सर्ग/*

पर्वत के जिस स्थान पर वे सब वानर आमरण उपवास करने बैठे थे उस स्थान पर गृध्रराज सम्पाति आये। श्लोक- 1 - 2
महागिरि विन्ध्य की कन्दरा से निकलकर सम्पाति ने जब वहाँ बैठे वानरों को देखा तब वे हर्षित होकर बोले - आज दीर्घकाल यह भोजन स्वतः मेरे लिये प्राप्त हो गया । वानरों में जो जो मरता जायेगा उसको में क्रमशः भक्षण करता जाऊँगा। श्लोक- 3 से 5
यह सुन अङ्गद हनुमानजी से बोले । श्लोक - 7
विदेह कुमारी सीताजी का प्रिय करने की इच्छा से गृध्रराज जटायु ने जो साहस पुर्ण कार्य किया था , यह सब आप लोगोंने सुना ही होगा। श्लोक- 9
धर्मज्ञ जटायु ने ही श्रीराम का प्रिय किया है। -12
गृध्रराज जटायु ही सुखी हैं जो युद्ध में रावण के हाथ मारे गये। श्लोक-13
महाराज दशरथ की मृत्यु, जटायु का विनाश और विदेह कुमारी सीता का अपहरण - इन घटनाओं से इस समय वानरों का जीवन संशय में पड़ गया है । श्लोक- 14
श्रीराम और लक्ष्मण को सीता के साथ वन में निवास करना पड़ा, राघव के बाण से बाली का वध हुआ और अब श्रीराम के कोप से  समस्त  राक्षसों का संहार होगा - ये कैकेयी को दिये वरदान से पैदा हुई है। श्लोक 15 &16
अङ्गद के मुख से उस वचन को सुन सम्पाति ने उच्च स्वर में पुछा। श्लोक- 18
यह कौन है जो जो मेरे प्राण प्रिय भाई जटायु के वध की बात कर रहा है। श्लोक - 19
जनः स्थान में राक्षस का गृध्र के साथ किस प्रकार का युद्ध हुआ? अपने भाई का नाम कई दिनों के बाद सुनाई दिया । श्लोक- 20
जटायु मुझसे छोटा गुणज्ञ, और पराक्रम के कारण प्रशंसनीय था। श्लोक- 21
दीर्घकाल के पश्चात आज उसका नाम सुनकर बड़ी प्रसन्नता हुई। आप लोग मुझे नीचे उतार दें । - 22
मुझे मेरे भाई का विनाश का वृतान्त सुनने की   इच्छा है। महाराज दशरथ मेरे भाई के मित्र कैसे हुए? श्लोक- 23
मेरे पंख सुर्य  की किरणों से जल गये हैं,इसलिये मैं उड़ नही सकता। किन्तु इस पर्वत से नीचे उतरना चाहता हूँ। श्लोक-24
*वाल्मीकि रामायण/ किष्किन्धा काण्ड/* *अष्टपञ्चाशः सर्ग/*
सप्पाति जी ने कहा-
एक दिन मेने भी देखा,दुरात्मा रावण सब प्रकार के गहनों से सजी हुई एक रुपवती युवती को हरकर लिये जा रहा था। श्लोक - 15
वह भामिनी 'हा राम ! हा राम! हा लक्ष्मण! की रट लगाती हुई अपने गहने फेंकती छटपटा रही थी। श्लोक- 16
श्रीराम का नाम लेनेसे मैं समझता हूँ, वह सीता ही थी। अब मैं उस राक्षस का घर का पता बतलाता हूँ, सुनो। श्लोक- 18
रावण नामक राक्षस महर्षि विश्रवा का पुत्र और कुबेर का भाई है। वह "लङ्का नामवाली नगरी में निवास करता है।" श्लोक - 19
(ध्यान दें लंका को केवल नगरी कहा है। सिंहल द्वीप/ श्रीलंका जैसा बड़ा स्थान नही हो सकता।) 

*यहाँ से शतयोजन (अर्थात लगभग 1287 कि.मी.) के अन्तर पर समुद्र में एक द्वीप है, वहाँ विश्वकर्मा ने अत्यन्त रमणीय लङ्का पुरी निर्माण किया है।'* श्लोक- 20
(नोट- शत योजन को अनुवादक ने  चार सौ कोस लिखा है अर्थात 1287 कि.मी.।)

उस नगरी की चहारदीवारी बहुत बड़ी है। उसी के भीतर पीले रंग की रेशमी साड़ी पहने सीता दीन भाव से निवास करती है। श्लोक- 23
(नोट- श्रीलंका के आसपास  चाहरदीवारी होना सम्भव नही है।)
बहुत सी राक्षसियों के पहरे में रावण के अन्तःपुर में अवरुद्घ है। श्लोक- 23
लंका चारों ओर से समुद्र से सुरक्षित है।पुरे सौ योजन (1287 कि.मी.) समुद्र को पार कर उसके दक्षिण तट पर पहूँचने पर रावण को देख सकोगे। श्लोक- 24 & 25

(नोट - अर्थात रावण की लंका नगरी खम्बात की खाड़ी के तट से दक्षिण में 1287 कि.मी. दुर  लक्षद्वीप समुह  के द्वीप पड़ते है। अर्थात लंका लक्षद्वीप में थी।  जिसकी राजधानी कवरत्ती है (या किल्तान द्वीप में हो सकती है। )
(नोट - उल्लेखनीय है कि, श्री लंका / सिंहल द्वीप जाने के लिये  भारत की मुख्य भूमि से जाया जा सकता है।
समुद्र पार कर नही जाया जा सकता।समुद्री मार्ग से जाने पर भारत की मुख्य भूमि की परिक्रमा कर जाना होगा और   बहुत अधिक दूरी हो जायेगी।)

*अब आगे का विवरण युद्ध काण्ड से* --
*वाल्मीकि रामायण/ युद्ध काण्ड/*  *चतुर्थ सर्ग/*
रामचन्द्रजी ने सुग्रीव को कहा --
सुग्रीव ! तुम इसी मुहूर्त में प्रस्थान की तैयारी करो। सुर्य देव दिन के मध्य भाग में पहूँचे हैं।इसलिये इस विजय नामक मुहूर्त में हमारी यात्रा उपयुक्त  होगी। श्लोक- 3
आज उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र है। कल चन्द्रमा का हस्त नक्षत्र से योग होगा। इसलिये सुग्रीव ! हमलोग आज ही सारी सेनाओं के साथ यात्रा कर दें। चलते चलते  उन्होनें पर्वत श्रेष्ठ सह्यगिरि को देखा। जिसके आसपास भी सेकड़ो पर्वत थे। श्लोक- 37
उस समय वानर राज सुग्रीव और लक्ष्मण से सम्मानित हुए धर्मात्मा श्रीराम सेनासहित दक्षिण दिशा की ओर बड़े जा रहे थे। श्लोक- 42
(आकाश साफ होने का वर्णन। श्लोक - 46 से 49)
वानर सेना दिन- रात चलती रही। श्लोक - 68
उन्होने रास्ते में कहीँ दो घड़ी भी विश्राम नही लिया। श्लोक- 69
चलते चलते वे सह्य पर्वत पर पहूँच कर सब वानर सह्य पर्वत पर चड़ गये। श्लोक- 70
श्री रामचन्द्रजी सह्य और.मलय पर्वत के विचित्र काननों, नदियों, तथा झरनों की शोभा देखते हुए यात्रा कर रहेथे। श्लोक- 71
श्री रामचंद्र जी महेन्द्र पर्वत (शायद कण्णूर का ईजीमाला पर्वत) के पास पहूँच कर उसके शिखर पर चढ़ गये। श्लोक - 92
महेन्द्र पर्वत पर आरुढ़ हो श्री राम जी ने समुद्र को देखा। श्लोक -93
इस प्रकार वे सह्य और मलय  को लाँघकर महेन्द्र पर्वत के समीपवर्ती समुद्र के तट पर जा पहूँचे। श्लोक- 94
उस (महेन्द्र पर्वत) से उतरकर शीघ्र ही सागर तटवर्ती वन में जा पहूँचे।
रामचन्द्रजी की आज्ञा से सुग्रीव ने समुद्र तटीय वन में सेना को ठहरा दिया। पढ़ाव डाला। श्लोक - 103

(नोट - सुग्रीव बहुत अच्छे भुगोल वेत्ता थे।महेन्द्र  नामक पर्वत बहुत दो से अधिक हैं यह सर्व स्वीकार्य है। सह्य और मलय दोनो पर्वत पश्चिमी घाट पर है। अतः यह महेन्द्र गिरि निश्चित ही पश्चिमी घाँट पर होगा। कुछ लोग विद्वान परम्परा निर्वाह हेतु  *किश्किन्धा काण्ड / एकचत्वारिशः सर्ग/18 से 27* में सुग्रीव जी द्वारा दक्षिणापथ का मार्ग वर्णन करते समय पाण्यदेशान्तर्गत महेन्द्र पर्वत तञ्जोर अथवा तनञ्जोर के निकट बतला कर बंगाल की खाड़ी की ओर जाना बतलाते हैं; उनसे मेरा निवेदन है कि, क्या सुग्रीव जी इतने मुर्ख थे कि,पुर्वी घाट पर उतरने के लिये सेना सहित पहले पश्चिमी पर पहूँच कर श्रम और समय दोनो नष्ट करते? वे पुर्वी घाट पर वे सीधे ही जा सकते थे।)

दिन के अन्त और रात के आरम्भ में चन्द्रोदय होने पर समुद्र में ज्वार आ गया। श्लोक 110- 111 अर्थात जिस दिन सागर तट पर  पहूँचे उस दिन पुर्णिमा थी।

*वाल्मीकीय रामायण/युद्धकाण्ड/एकोनविश सर्ग/*
समुद्र की शरण लेने की विभिषण की सलाह श्लोक- 31

विभिषण की सलाह पर सर्व सम्मति। श्लोक - 40
श्रीराम समुद्र तट पर कुशा बिछाकर धरना देने बैठे। श्लोक -41
*वाल्मीकीय रामायण/युद्धकाण्ड/एकविंश सर्ग/*
इस प्रकार समुद्र तट पर  तीन रात लेटे लेटे बीतने पर भी समुद्र देव प्रकट नही हुए । श्लोक 11-12
श्रीराम समुद्र पर कुपित हो गये। श्लोक- 13
श्रीराम ने अपने धनुष सेबड़े भयंकर बाण समुद्र पर छोड़े। श्लोक-  27
समुद्र मेंहुई हलचल को देख-
लक्ष्मण ने श्री राम का धनुष पकड़ कर रोका। श्लोक- 33
वाल्मीकीय रामायण/युद्धकाण्ड/द्वाविंश सर्ग/
श्रीराम ने ब्रह्मास्त का संधान किया श्लोक-  5
तब समुद्र के मध्य सागर सवयम् उत्थित हुआ। श्लोक- 17
चमकीले सर्पों के साथ जाम्बनद नामक स्वर्णाभूषण युक्त वैदुर्य मणि के सदृष्य श्याम वर्णीय समुद्र प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हुआ। श्लोक - 18
समुद्र ने पार होने का उपाय बतलाने का आश्वासन दिया। श्लोक - 29
श्री राम ने पुछा अमोघ ब्रह्मास्त्र किस स्थान पर छोड़ुँ? श्लोक - 30
समुद्र ने कहा कि,मेरे उत्तर तट पर द्रुमकुल्य नामक स्थान है। श्लोक 32
द्रमकुल्य स्थान में आभीर लोग रहते हैं। वे पापी दस्यु हैं।और मेरा ही पानी पीते हैं। श्लोक- 33
उनके स्पर्ष से मुझे भी पाप लगता है। कृपया उस स्थान पर/ उन पर   ब्रह्मास्त्र छोड़िये। श्लोक - 34
तदनुसार श्री राम ने द्रमकुल्य देश पर ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया। श्लोक - 35
वह स्थान पर मरुस्थल बन गया। श्लोक- 36
उस स्थान का नाम मरुकान्तार पड़ गया।
वह भूमि दुधारू पशुओं और विभिन्न औषधियों से सम्पन्न होगी यह वरदान दिया। श्लोक - 43
समुद्र ने विश्वकर्मा पुत्र नल का परिचय दिया और बतलाया कि नल समस्त विश्वकर्म (इंजीनियरिंग) का ज्ञाता है। श्लोक- 45
यह महोत्साही वानर पिता के समान योग्य है।मैं इसके कार्य को धारण करुँगा। श्लोक - 46
तब नल ने उठकर श्रीराम से बोला - 
मैं पिता के समान सामर्थ्य पुर्वक समुद्र पर सेतु निर्माण करुँगा। श्लोक -  48
समुद्र ने मुझे स्मरण करवा दिया है। मैं बिना पुछे अपने गुणों को नही बतला सकता था।  अतः चुप था। श्लोक- 52
मैं सागर पर सेतु निर्माण में सक्षम हूँ। अतः सभी वानर मिल कर सेतु निर्माण आज ही आरम्भ करदें। श्लोक 53
वानर गण वन से बड़े बड़े वृक्ष और पर्वत शिखर / बड़े बड़े पत्थर/ चट्टानें ले आये। श्लोक- 55
महाकाय  महाबली वानर यन्त्रों ( मशीनों) की सहायता से बड़े बड़े पर्वत शिखर / शिलाओं को तोड़ कर/ उखाड़़ कर समुद्र तक परिवहन (ट्रांस्पोर्ट) कर लाये। श्लोक -60
कुछ बड़े बड़े शिलाखण्डों से समुद्र पाटने लगे।कोई सुत पकड़े हुए था। श्लोक - 61
कोई नापने के लिये दण्ड पकड़े़ था, कोई सामग्री जुटाते थे। वृक्षों से सेतु बाँधा जा रहा था। श्लोक-  64 & 65

पहले दिन उन्होने चौदह योजन लंबा सेतु बाँधा। श्लोक-69

(नोट - तट वर्ती क्षेत्र में केवल भराव करने से काम चल गया अतः  180 कि.मी. पुल बन गया। आगे गहराई बढ़़ने और तरङ्गो/ लहरों का वेग बढ़ने से गति धीमी हो जायेगी।)

दुसरे दिन बीस का योजन सेतु तैयार हो गया  श्लोक 69

(अर्थात दुसरे दिन (20- 14 = 6 योजन  सेतु बना।छः  योजन अर्थात 77 कि.मी. पुल बना कर सेतु की कुल लम्बाई बीस योजन अर्थात 257 कि.मी. हो गई। आगे गहराई बढ़ने और तरङ्गो/ लहरों का वेग बढ़ने से गति धीमी हो गई।दुसरे दिन गति लगभग आधी ही रह गई।)

तीसरे दिन कुल इक्कीस योजन का सेतु निर्माण कर लिया। श्लोक 70
(अर्थात तीसरे दिन एक योजन  यानी 12.87 कि.मी. सेतु बन पाया और सेतु की कुल लम्बाई 21 योजन = 270 कि.मी. हो गई।

(नोट - गति कम पड़़ना स्वाभाविक ही है। दुसरे दिन गति आधी रह गई और तीसरे दिन से तो  एक एक योजन अर्थात  प्रतिदिन 12.87 कि.मी. ही पुल  बनने लगा।)

चौथे दिन वानरों ने बाईस योजन तक का सेतु बनाया। श्लोक- 71
(अर्थात एक योजन / 12.87 कि.मी.वृद्धि हुई और कुल 22 योजन =   283 कि.मी. पुल बना।)
पाँचवें दिन वानरों ने कुल 23 योजन सेतु बना लिया। श्लोक- 72
(अर्थात एक योजन वृद्धि कर सेतु की कुल लम्बाई 23 योजन = 296 कि.मी. हो गई।)
इस प्रकार विश्वकर्मा पुत्र नल ने  ( पाँच दिन में वानरों की सहायता से भारत की मुख्य भूमि से रावण की लंका तक   23 योजन = लगभग 300 कि.मी. का )  सेतु समुद्र में  तैयार कर दिया।
नोट - इस प्रकार भारत की मुख्य भूमि पश्चिमी घाट के केरल की नीलगिरी के कोजीकोड से  किल्तान द्वीप की ओर दुरी लगभग तीन सौ तीन कि.मी. का सेतु / पुल तैयार कर लिया।)

सुचना - पुरातत्व विदों द्वारा केरल के कण्णूर से लक्ष्यद्वीप के किल्तान द्वीप के बीच वास्तविक रामसेतु खोजा जाना चाहिए।

(सूचना - अर्थात रावण की लंका नगरी खम्बात की खाड़ी के तट जहाँ से हनुमानजी ने सीताजी की खोज हेतू छलांग लगाई थी से दक्षिण में 1287 कि.मी. दुर  लक्षद्वीप समुह  के द्वीप पड़ते है। तथा  पश्चिमी घाँट के केरल की नीलगिरी के कण्णूर  से  किल्तान द्वीप की ओर दुरी लगभग तीनसौ तीन कि.मी.है।दोनो ठीक बैठती है। अर्थात लंका लक्षद्वीप में थी।  राजधानी कवरत्ती है या किल्तान द्वीप में हो सकती है। कण्णूर और लक्ष्यद्वीप का घनिष्ठ राजनीतिक सम्बन्ध भी सदा से रहा है। कण्णूर से सोलोमन के मन्दिर के लिए लकड़ियाँ जहाज द्वारा गई थी। ईराक के उर से व्यापारिक सम्बन्ध भी थे।)

(नोट यह विशुद्ध विश्वकर्म / इंजीनियरिंग का कमाल था। न कि राम नाम लिखने से पत्थर तैराने का  कोई चमत्कार। तैरते पिण्डों को बान्ध कर पुल बनाना भी इंजीनियरिंग ही है किन्तु यहाँ उस तकनीकी का प्रयोग नही हुआ।
किन्तु नाम लिखने से पत्थर नही तैरते बल्कि जैविकीय गतिविधियों से निर्मित कुछ पाषाण नुमा संरचना समुद्र में तैरती हुई कई स्थानों में पायी। जाती है। इसमें कोई चमत्कार नही है। पाषाण नुमा संरचनाएँ जो बीच में पोली / खाली होती है उनमें हवा हरी रह जाती है। ऐसे पत्थरों का घनत्व एक ग्राम प्रति घन सेण्टीमीटर से कम होने के कारण वे भी बर्फ के समान तैरते हैं। )
नोट --श्लोक 76 में सेतु की लम्बाई शत योजन और चौड़ाई दश योजन लिखा है। निश्चित ही यह श्लोक प्रक्षिप्त है क्यों कि,  नई दिल्ली से आन्ध्रप्रदेश के चन्द्रपुर से आगे असिफाबाद तक की दुरी के बराबर  सेतु की लम्बाई 1288 कि.मी. कोई मान भी लेतो 129 कि.मी. चौड़ा पुल तो मुर्खता सीमा के पार की सोच लगती है। दिल्ली से हस्तिनापुर की दुरी भी 110 कि.मी. है। उससे भी बीस कि.मी.अधिक चौड़ा पुल तो अकल्पनीय है।

अस्तु यह स्पष्ट है कि, दासता युग में सूफियों के इन्द्रजाल अर्थात वैज्ञानिक और कलात्मक जादुगरी से प्रभावित कुछ लोगों ने मिलकर पुराने ग्रन्थों में भी ऐसे चमत्कार बतलाने के उद्देश्य से ऐसे प्रक्षिप्त श्लोक डाल दिये। जो मूल रचना से कतई मैल नही खाते। ऐसे ही

श्लोक 78 में वानरों की संख्या सहत्र कोटि यानी एक अरब जनसंख्या बतलाई है।
भारत की जनसंख्या के बराबर एक अरब वा्नर  श्रीलंका में भी नही समा पाते।

अस्तु शास्त्राध्ययन में स्वविवेक जागृत रखना होता है।

खम्बात की खाड़ी के तट कोरोमण्डल दहेज के लूवारा ग्राम के परशुराम मन्दिर  से हनुमानजी ने सीताजी की खोज हेतू छलांग लगाई थी से दक्षिण में 1287 कि.मी. दुर लक्षद्वीप समुह  का किल्तान द्वीप पड़ता है। तथा केरल के  पश्चिमी घाँट के  नीलगिरी के कोजीकोड  के रामनाट्टुकारा और पन्थीराम्कवु या कन्नुर से  किल्तान द्वीप की ओर दुरी लगभग तीन सौ तीन कि.मी.है। दोनो ठीक बैठती है अर्थात लंका लक्षद्वीप में थी।   राजधानी कवरत्ती है या किल्तान द्वीप में रावण की लंका हो सकती है।

पुरे प्रकरण को पढ़कर भारत का नक्षा  एटलस  लेकर जाँचे।
कि,  भारत के पश्चिमी घाँट के केरल की नीलगिरी के कण्णूर (केरल) से  किल्तान द्वीप की ओर दुरी लगभग तीनसौ तीन कि.मी. है। और गुजरात के खम्बात की खाड़ी से दहेज नामक स्थान से किल्तान की दुरी भी लगभग 1290 कि.मी. है।
अस्तु लगभग किल्तान द्वीप के आसपास ही रावण की लंका रही होगी। लक्षद्वीप में किल्तान द्वीप राजधानी करवत्ती से उत्तर में है।
अध्ययन कर पता लगाया जा सकता है कि किल्तान या करवत्ती या कोई डुबा हुआ द्वीप में से रावण की लंका कौनसा द्वीप था।
यह कार्य पुरातत्व विभाग और पुरातत्व शास्त्रियों का कार्य है।

रामेश्वरम कहाँ है ---

परशुराम जी का मूल नाम राम है। परशु धारण करनें के कारण उनका नाम परशुराम पड़ गया। यह भी सम्भव है कि, अयोध्या नरेश श्री राम की ख्याति बड़नें के कारण विशिष्ठिकृत नाम के रूप में परशुराम नाम प्रचलित हुआ हो।

रामायण में श्रीराम द्वारा रामेश्वरम शिवलिङ्ग स्थापना का वर्णन नही है। किन्तु वाल्मीकि रामायण के बहुत बाद के राक्षसों और विशेषकर रावण के प्रति आस्थावान तमिल कवि कम्बन की रचना इरामावतारम् के आधार पर यह मान्य हुआ। 

केरल में त्रिशुर भी गुरुवायूर से 38 कि.मी दूर त्रिशुर के शिवलिङ्ग की स्थापना परशुराम जी ने की थी।

अतः सम्भव है कि, कवि कम्बन ने त्रिशुर वाले रामेश्वरम ज्योतिर्लिङ्ग का वर्णन करनें में स्व स्थान तमिलनाड़ु में वर्णित कर दिया हो या बाद में किसी ने परिवर्तन किया हो। अतः त्रिशुर ही वास्तविक रामेश्वरम होना चाहिए।