शनिवार, 13 जून 2026

भारत में मूर्ति पूजा के पूरातत्वीय प्रमाण

 *देवस्थान के प्रारम्भिक प्रमाण वाल्मीकि रामायण में मिलते हैं जहाँ कोशल्या जी विष्णु पूजा करतीं थीं। श्री रामचन्द्र जी विष्णु के स्थान पर जाते थे। सीता जी जनकपुरी में उमा पार्वती के स्थान पर जातीं थीं।*
*लेकिन इनमें न किसी ढाँचे का उल्लेख है न किसी रूप या प्रतिमा का। इसलिए स्पष्ट है कि जैसे यज्ञों में मण्डलों पर ही देवताओं का आह्वान, स्थापना और पूजन होता है, वैसे ही इन स्थानों पर भी मण्डलों में ही देवता की पूजा होती थी। आज तक भी लोग श्री यन्त्र, बीसा यन्त्र आदि में देवताओं की पूजा करते हैं।*

वाल्मीकि रामायण में उल्लेखित ---
*अगार, देवतागार या देवगृह मतलब जहाँ केवल आवश्यक होने पर स्नानादि कर पवित्र होकर ही प्रवेश किया जा सकता है।*
 *अग्नि अगार अर्थात हवन शाला या पूजन कक्ष जो आवासीय परिसर में ही होता है।*
 *आगार का अर्थ है -- जहाँ मण्डप बनाकर मण्डल में देवताओं का आह्वान,यज्ञ- हवन कर नैवेद्य अर्पित कर, स्वस्तिवाचन, ब्राह्मण भोजन दान दक्षिणा द्वारा सन्तुष्ट कर आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है।*
*वाल्मीकि रामायण/ अयोध्या काण्ड/2/4/38*
*दशरथ जी ने राज्याभिषेक के लिए वासुदेव का आगार बनवाया।*
*अयोध्या काण्ड 2/25/16*
*श्रीरामचन्द्र जी ने देवतागार में प्रवेश कर देवताओं को प्रणाम किया।*
*सुन्दर काण्ड 5/15/15*
*हनुमान जी ने रावण के महल में अतुल देवतागार देखा।*
*आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में मुण्डन, उपनयन, विवाह आदि संस्कार के पहले किये जाने वाले माता पूजन कक्ष में अखण्ड दीप जलता है वहाँ स्नान कर बिना सिले रेशमी अधोवस्त्र में ही जाया जा सकता है। यह एक परिवार का नीजी होता है।*

*चैत्य - राज प्रासाद के निकट या वाटिका आदि मे खुले परिसर में चबुतरे में पूज्य वृक्ष के नीचे मण्डल में देवताओं का आह्वान, यज्ञ-हवन और बलिदान कर पूजन कर प्रदक्षिणा करने योग्य स्थान। इसमें मण्डप नहीं होता है। यह एक कुल के लोगों का नीजी होता है।*
*वाल्मीकि रामायण/बालकाण्ड/1/66/8*
*क्षीरस्वामी टीका के अनुसार "चित्यायां भवं चैत्यम् ।*
*अर्थात् चिति = वेदी पर जो हो वह चैत्य, और जिसमें देवता आकर निवास करें वह आयतन*। 

*आयतन/देवायतन --- यह सार्वजनिक स्थान होता है। क्षीरस्वामी टीका के अनुसार आ+यत+अन अर्थात जहाँ प्रयत्न पूर्वक देवता को लाया जाएँ । अर्थात जहाँ मंत्रों से देवता का आह्वान किया जाए। जिसमें देवता आकर निवास करें वह आयतन कहलाता है।*
 *बहु खण्डिय शिखर युक्त स्थाई भवन में विभिन्न देवताओं या किसी देवता विशेष के लिए उपयुक्त मण्डप में स्थाई मण्डल और यज्ञवेदी बनाकर अग्नि प्रज्वलित हो , कलश , जयति (अर्थात जौ या गेहूं के ज्वारे) हो तीन गन्नों और मालाओं की झांँकी हो। क्यारी में तुलसी का पौधा, पीपल और वट वृक्ष, बेल-पत्र, आँवला, और शमी के पौधे होते हैं। अशोक भी होता है।*

जैसे होली और गोवर्धन पूजा के समय करते हैं। *यहाँ सामुहिक उत्सव मनाये जाते हैं।*
*यहाँ सार्वजनिक सन्ध्या, यज्ञ-होम, ब्राह्मण भोजन, दान-दक्षिणा, स्वस्तिवाचन होता है।*
*वाल्मीकि रामायण/ बालकाण्ड/1/5/16 मे कहा है कि, अयोध्या देवायतनों से शोभायमान थी।*

*फिर महाभारत में तीर्थयात्रा प्रकरण में वृक्षों में, तालाब आदि जल स्रोतों में यक्ष गन्धर्वों और नागों का वास मानने का और अनार्यों में इन वृक्षों, यक्षों और नागों की पूजा प्रचलित थी इसके प्रमाण हैं। लेकिन इसके लिए मात्र चबुतरे बना कर पूजा करते थे।आज भी भिन्न भिन्न पर्वोत्सवों पर चबुतरे के बीच लगे वृक्ष की पूजा होती है और तुलसी के पौधे में महा सति वृन्दा की, पीपल वृक्ष में विष्णु की, वट वृक्ष में ब्रह्मा की और शमी मे देवी की पूजा होती है।*
*निषाद, किरात आदि वनवासी जातियों ने डायनासोर के अण्डों को शिवलिङ्ग मानकर पूजना प्रारम्भ किया। जो आजतक प्रचलित है।*
*बाद में नर्मदा नदी में देवास जिले की बागली तहसील में धाराजी के जल प्रपात से बनने वाले बेलनाकार पत्थरों को बाणासुर द्वारा प्राण प्रतिष्ठित शिवलिङ्ग मानकर पूजना प्रारम्भ हुआ। लेकिन सरदार सरोवर के बेक वाटर से वह झरना भी नहीं रहा और बाणेश्वर शिवलिङ्ग बनना भी बन्द हो गये। लेकिन अब सनावद और पेशवा बाजीराव प्रथम की समाधि स्थल सनावद तहसील के रावेर के निकट ही खरगोन जिले की बड़वाह तहसील के ग्राम बकावाँ में शिवलिङ्ग गड़ने का कारोबार प्रारम्भ हो गया। और शिवलिङ्ग धड़ल्ले से बेंचे और खरीदे जा रहे हैं।*
*शाक्त पन्थ में बिजोरा निम्बू में मातृका लिङ्ग मानकर पूजा आज भी होती है।* 
*ऐसे ही वैष्णवों ने कम से कम दस-बारह लाख वर्ष पुराने ऑक्टोपस उपवर्ग के स्वविड नामक वर्तमान समुद्री जन्तु के दूर के सम्बन्धी कपालपाद (Cephalopod सेफैलोपॉड) नामक समुद्री जीव का चक्राकार कवच  में 
 चक्राकार और शङ्खाकार संरचना देखकर शालिग्राम शिला को विष्णु लिङ्ग मानकर पूजना प्रारम्भ किया साथ में चल चढ़ाने आदि के लिए समुद्री जीव शंख रखना प्रारम्भ किया। ये सब परम्परा आज तक प्रचलित है।*
*ऐसे ही त्रिकोणीय पत्थर में देवी तथा पत्थर पर पत्थर रखकर भैरव एवम् चिकने लगभग तिकोने गोल पत्थर में गजानन विनायक की पूजा होने लगी। लेकिन ये सब प्रथाएँ अनार्यों में ही प्रचलित थी। आर्यजन अर्थात श्रेष्ठ जनों में तब भी और आज भी यज्ञ परम्परा ही प्रचलित थी जो गुरुकुलों में आज भी प्रचलित है।*
*इसके प्रमाण भी मिले हैं जैसे वैदिक सभ्यता जिसमें महाभारत युद्ध तक सरस्वती नदी सदानीरा थी। लेकिन महाभारत युद्ध के बाद हिमालय में आये कुछ उभारों के कारण यमुना और अन्य सहायक नदियों के बहाव की दिशा बदलने से पश्चिम भारत की सारस्वत नागर सभ्यता-संस्कृति के बहुत से नगर उजड़ गए। इन उभारों को पञ्च केदार के रूप में जाना जाता है। पुरातत्वीय उत्खनन में जिनमें राखीगढ़ी, लोथल, मोहनजोदड़ो , हड़प्पा आदि के अवशेष पाए गए हैं। ये लोग विदेश यात्रा करते थे, इनके नगरों में विदेशियों का आगमन होता रहता था, तथा कुछ विदेशी बस्तियाँ भी थी।*  
*इनमें कुछ श्रमण मार्गी लोग तान्त्रिक मतावलम्बी थे, और लिङ्ग पूजा करते थे ये व्यावसायिक गतिविधियों से प्रायः दूर रहने के कारण निर्धन और रुग्ण थे। भारतीय आर्य जन इन्हें अस्पृश्य मानते थे। ये लोग नवीन स्थान के प्रति असहज होकर मातृभूमि के लगाव या जनसंख्या कम होने से उपलब्ध संसाधनों पर कब्जा करने या असामर्थ्य वश वहीं रुक गये। परिणाम स्वरूप बहुत बुरी हालत में मरते गए।*
*जबकि समझदार आर्य जन आस-पास के हरे-भरे उपजाऊ भू भाग में बस गये। जो लोग सूखे के दौरान भी नहीं हटे उनके ही अवशेष भी पाये गए हैं।* 
*इस प्रकार महाभारत काल में अनार्य दास-दस्युओं, तान्त्रिकों, श्रमणों, व्रात्यों में प्रतिमा पूजन और मूर्ति पूजा प्रचलित थी।*

वर्तमान मन्दिर इसी देवायतन की नकल है। उदाहरणार्थ महाकाल मंदिर में महाकाल के उपर चान्दी का श्री यन्त्र बना है। 
देवी मन्दिरों में बीसा यन्त्र बना रहता है। 
विष्णु मन्दिर में शालिग्राम शिला  चक्र और शंख जैसी संरचना बने और शंख शालिग्राम शिला और तुलसी क्यारी होती है।

इनके कुछ पुरातत्त्वीय प्रमाण नीचे दिए गए हैं।

1   बघोर-I के मूल 1983 के शोध-पत्र "An Upper Palaeolithic Shrine in India?"के अनुसार 1980–82 में सीधी जिले की सोन घाटी में स्थित बघोर-I स्थल का उत्खनन G. R. Sharma और J. Desmond Clark के नेतृत्व  में किया गया।उनके साथ Jonathan Mark Kenoyer तथा J. N. Pal भी जुड़े थे।

 पूजा-मंच की संरचना, त्रिकोणाकार शिला के आयाम, पीले रंग (yellow pigment) के प्रयोग तथा उसके शक्ति-यन्त्र 
  उत्खनन में पत्थरका एक वृत्ताकार पूजा-मंच (platform) मिला, जिसके मध्य में एक प्राकृतिक त्रिकोणाकार रंगीन पत्थर रखा हुआ था। त्रिकोणाकार शिला के आयाम, पीले रंग (yellow pigment) के प्रयोग तथा उसके शक्ति-यन्त्र मिला।
इस स्थल को उत्तर पुरापाषाण (Upper Palaeolithic) काल के अंतिम चरण का माना गया है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार इसकी तिथि लगभग 10,000–9,000 ईसा पूर्व (या लगभग 11,000–12,000 वर्ष पूर्व) मानी जाती है। 
पुरातत्वविदों ने देखा कि निकटवर्ती क्षेत्र के कोल और बैगा समुदाय आज भी त्रिकोणाकार प्राकृतिक पत्थरों को "माई" (मातृदेवी) के रूप में पूजते हैं। बघोर-I में मिला पत्थर भी उसी प्रकार का था और एक विशेष मंच पर स्थापित था। इस आधार पर उत्खननकर्ताओं ने यह परिकल्पना प्रस्तुत की कि यह संभवतः किसी देवी अथवा स्त्री-तत्त्व (female principle) का पूजा-स्थल रहा होगा। इसे एक अनुष्ठानिक (ritual) स्थल माना जाता है।
स्वयं उत्खननकर्ताओं ने भी "मूर्ति-पूजा" का सबसे प्राचीन बहुत प्रबल संभावना" (strong probability) की बात कही थी, न कि पूर्ण निश्चितता की। 

2  उड़ीसा (ओडिशा) की राजधानी भुवनेश्वर (Bhubaneswar) के निकट  उदयगिर गुफा (Udayagiri Caves) में स्थित हाथी गुम्बा (Hāthigumphā) में
कलिङ्ग के राजा खारवेल (Kharavela) का पहली शताब्दी ईसा पूर्व का अभिलेख मिला है जिसका संबंधित भाग कुछ स्थानों पर क्षतिग्रस्त है और उसके पाठ (reading) को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं उसके आधार पर ऐसा दावा किया जाता है कि, किसी नन्दराजा द्वारा कलिङ्ग पर आक्रमण कर कोई धार्मिक धरोहर या एक पूजनीय वस्तु या जैन प्रतीक या जिन-प्रतिमा 
 मगध ले जाई गई थी, और मगध में स्थापित किया था। परन्तु उसका सटीक स्वरूप निश्चित नहीं है।
कई शताब्दियों बाद खारवेल ने मगध पर अभियान किया। उसने उस प्रतिमा को पुनः कलिङ्ग वापस लाकर प्रतिष्ठित किया।
जैन परम्परा का मत है कि वह अग्रजिन (Agra-Jina) अथवा प्रथम जिन, अर्थात् (आदिनाथ) ऋषभदेव  (Rishabhanatha)  की प्रतिमा थी।
इस आधार पर यह माना जाता है कि, ईसा पूर्व चौथी–पाँचवीं शताब्दी तक पूर्वी भारत में जैन प्रतिमा-पूजा का कोई विकसित रूप विद्यमान था। जैन परम्परा के अनुसार उस नन्द शासक की पहचान महापद्म नन्द के रूप में करना सम्भावित तथ्य है, परन्तु पूर्णतः सिद्ध नहीं है।
3 मथुरा से 24 कि.मी. दक्षिण पश्चिम में सोंख नामक स्थान पर 1966 से 1974 के बीच जर्मन पुरातत्ववेत्ता हर्बर्ट हर्टेल के निर्देशन में हुए उत्खनन में ईसापूर्व 800 से 400 तक के खम्भों के गड्ढे, मिट्टी के घर आदि ग्रामीण बसावट के प्रमाण प्राप्त हुए।
इसके अतिरिक्त मोर्य का ईसा पूर्व पहली शताब्दी के अर्धवृत्ताकार नाग मन्दिर मिला;जिसका पुनर्निर्माण कुषाण काल में हुआ। यहाँ श्रमणों द्वारा पूजित यक्ष- यक्षिणी, नाग और मातृका की टेराकोटा (पकी मिट्टी) की प्रतिमाएँ भी मिली।

मध्यप्रदेश में विदिशा जिले में बेतवा और बेस नदी के सङ्मम क्षेत्र में बेसनगर (भिलसा) में  शुंग राजा 'भागभद्र' के शासनकाल में तक्षशिला के युनानी (ग्रीक) राजा 'एंटियालसिडस' के राजदूत श्रीकृष्ण और बलराम के उपासक  हेलियोडोरस ने 113 ईसापूर्व में गरुड़ध्वज स्तम्भ का निर्माण करवाया था।

4 इसके अलावा पाणिनि की अष्टाध्याई में उल्लेखित वर्णनो में तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व मे देव स्थानों का वर्णन महाभारत के वर्णनों से मैल खाता है।
लेकिन पाणिनि की अष्टाध्याई पर पतञ्जली के महाभाष्य में दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में विष्णु, शिव, देवी देवताओं की प्रतिमाओं और मूर्तियों के वर्णन के आधार पर पहली बार ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में सनातन वैदिक धर्म में मूर्ति पूजा के प्रमाण माना जाता है।
और ईसा की दुसरी और पहली शताब्दी में कुषाण वंश के कनिष्क के समय मन्दिरों  और चैत्यों में मानवीय आकार की विकसित और बढ़ी मूर्तियों की पूजा प्रारम्भ हुई।

शुक्रवार, 12 जून 2026

भारत की दुरावस्था के कारण।


भारत की दुर्दशा के प्रमुख कारण गुरुकुलों की समाप्ति, वेदाध्ययन , पञ्च महायज्ञ और अष्टाङ्ग योग साधना बन्द होना तथा विदेश यात्रा पर प्रतिबन्ध के कारण कुप मण्डुकता रहे।

जिन्हें आज दलित और पिछड़ा कहा जा रहा है इन सब कुलों/ वंशों का लगभग एक हजार वर्ष पहले बल्कि कई स्थानों पर तो उससे भी आगे तक किसी ना किसी क्षेत्र में शासन रहा है। 
ऊँच-नीच के सर्व प्रथम प्रमाण जैन-बौद्ध साहित्य में ही पाए जाते हैं। स्पष्ट है कि, किसी का भी मत परिवर्तन के लिए ऐसे दुष्प्रचार आवश्यक रहे होंगे।
फिर इनके व्यवसाय के नाम पर जाति मान लिया गया।
इन सभी व्यवसायों का भी अपरिहार्य महत्वपूर्ण स्थान हमारे समाज में मान्य था। कोई ऊँच नीच का भेद-भाव नहीं रहा।

इस्लामी आक्रांताओं के भारत में आगमन पूर्व कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है कि, इन लोगों के प्रति कोई दुर्भावना या भेद-भाव या अत्याचार हुआ हो। यह सत्य है कि, इस्लामी आक्रांताओं के जासूस पीर फकिरों की जादूगरी से चमत्कृत होने, जजिया कर देने से बचने और आक्रांताओं के अत्याचार से बचने के लिए सर्वाधिक मतांतरण इन्हीं लोगों का हुआ। इसलिए सनातन वैदिक वर्णाश्रम धर्म को बदनाम करने लगे।

गुरुवार, 11 जून 2026

अण्डाकार शिवलिङ्ग और अण्डाकार विष्णु लिङ्ग शालिग्राम पूजन।

वैदिक काल में भी तन्त्र मतावलम्बियों में चोरी-चुपके मूर्ति पूजा प्रचलित थी ही।  वैदिक उन्हें शिश्नेदेवाः कहते थे। और उनके संसर्ग को भी पाप समझते थे।

वैवस्वत मन्वन्तर में प्रचेताओं के पुत्र दक्ष द्वितीय यज्ञ विध्वंस के बाद प्रजापति ने विधि- विधान में संशोधन कर यज्ञ में रुद्र का भाग देना स्वीकार कर लिया तो शुक्राचार्य और दधिचि आदि ने शैव मत की स्थापना कर दी।
शुक्राचार्य के पुत्र त्वष्टा ने शाक्त मत की स्थापना कर दी और त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप ने तन्त्र मत की स्थापना कर दी। भारत में  दत्तात्रेय और उनके शिष्य कार्तवीर्य सहस्रार्जुन तथा रावण ने तन्त्र मत का प्रचार किया।
रामायण काल तक भारत में मूर्ति पूजा प्रचलित नहीं थी। अयोध्या में भगवान विष्णु के स्थान (स्थानक) और जनकपुरी में भगवती उमा के स्थान (स्थानक) का उल्लेख है। लेकिन लक्ष्यद्वीप में किल्तान द्वीप में स्थित रावण की राजधानी लङ्का में राक्षसों द्वारा पूजित यक्षिणी निकुम्भला की मूर्ति वाले मन्दिरों का ही उल्लेख पाया जाता है।
महाभारत में भी राक्षसों में ही मूर्ति पूजा और बलि प्रथा का उल्लेख मिलता है।
बाद में कुछ वन वासियों को नर्मदा घाटी में जब डायनासोर के अण्डों के जीवाश्म मिले तो उन लोगों ने उन्हें पूजना प्रारम्भ कर दिया।
उनके देखा देखी बाणासुर ने भी नर्मदा के जल प्रपात धाराजी में प्राकृतिक रूप से बनने वाले अण्डाकार पत्थरों को शिवलिङ्ग मानकर पूजना प्रारम्भ कर दिया। जिसे वनवासियों ने भी अपना लिया। अण्डाकार शिवलिङ्ग को स्थिर खड़ा रखने के लिए एक आधार बनाया जिसे जलाधारी कहा जाता है।
उधर वेद विरोधी नास्तिक अनीश्वरवादी जैन लोगों ने अरब प्रायद्वीप में प्रचलित विनायक और भैरव आदि की मूर्ति पूजा प्रारम्भ की तो, वैदिक वर्णाश्रम धर्मावलम्बी विष्णु उपासकों ने भी नेपाल में काली गण्डकी नदी में हिमालय काटकर बहाकर लाये जीवाश्मों को  मुक्तिधाम से दामोदर कुण्ड तक 65 किलोमीटर क्षेत्र में सेफैलोपॉड
(कपालपाद) की सर्पिल कक्षों को जोड़ने वाली 89 प्रकार की सीवन रेखा से बनी प्रतिमा स्वरूप (Suture Pattern) के शालिग्राम को विष्णु के चिह्न (विष्णु लिङ्ग) के रूप में पूजना प्रारम्भ कर दिया।
फिर ईरान की मीड संस्कृति के पुरोहितों को भगवान श्रीकृष्ण ने   साम्म के कुष्ठ रोग निवारण हेतु बुलाया तो पहले तो वे अथर्ववेदीय यज्ञ करते रहे। किन्तु जनमेजय के बाद उन्होंने ईरान में प्रचलित सूर्य पूजा के लिए सूर्य की मूर्ति स्थापित कर पूजा करने और गुजरात और उड़ीसा में मन्दिर बनाना प्रारम्भ कर दिया।
महाराष्ट्र और तमिलनाडु में विनायक गजानन की प्रतिमा पूजन प्रारम्भ हो गया। बङ्गाल में दूर्गा प्रतिमा पूजा होने लगी तो फिर दक्षिण भारत में वैष्णवों ने भी विष्णु, नारायण और श्रीहरि की मूर्ति बनाकर पूजना प्रारम्भ कर दिया।

अर्थात शैवों ने साढ़े छः हजार वर्ष पुराने जीवाश्म डायनासोर के अण्डों को शिव चिह्न (शिवलिङ्ग) के रूप में पूजना प्रारम्भ किया तो वैष्णवों ने भी चालिस करोड़ वर्ष पहले के और
सोलह करोड़ से अठारह करोड़ वर्ष पहले जब हिमालय के स्थान पर ऋग्वेद में उल्लेखित उत्तर सागर (टेथिस सागर) था; तब जुरासिक काल में समुद्र में विलुप्त हो चुके समुद्री अकशेरुकी जीवों का एक उपवर्ग अमोनोइडिया (Ammonoidea) जिन्हें आम तौर पर अमोनाइट्स (Ammonites) कहते हैं; समुद्री जीवों का एक विलुप्त हो चुका उपवर्ग (subclass) है। ये जीव कड़क (सख्त) चक्राकार खोल के अन्दर रहते थे। इस उपवर्ग का ऑक्टोपस - स्वविड के दूर के सम्बन्धी कपालपाद (Cephalopod सेफैलोपॉड) नामक समुद्री जीव का चक्राकार कवच  है। जो लाखों वर्ष में दबाव के कारण पत्थर जैसे बन गये केल्सियम और सिलिका से भरने से बने छिद्र और रेखाओ वाले कवच का जीवाश्म है।
हिमालय बनने पर उत्तर 
सागर उठा तब काली गण्डकी नदी ने हिमालय काटकर इन जीवाश्मों को बहाकर मुक्तिधाम से दामोदर कुण्ड तक 65 किलोमीटर क्षेत्र में  सर्पिल कक्षों को जोड़ने वाली 89 प्रकार की सीवन रेखा (Suture Pattern) बनी हैं।
जिनमें  
1 अमोनाइट का चक्राकार कवच सुदर्शन शालिग्राम सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

2 पास-पास दो कुण्डलित कवच वाला लक्ष्मी नारायण शालिग्राम,
 
3 पत्तीनुमा धारियों वाले वनमाली कवच, 

4 कवच का खुला सिरा टूटने से बना घोड़े के मूह जैसा कवच हयग्रीव शालिग्राम,
और

5 चपटा बहने से मछली के आकार वाला कवच मत्स्य शालिग्राम,
ये पाँच अधिक प्रसिद्ध है।

बुधवार, 10 जून 2026

उपवेद और वर्ण व्यवस्था।

ऋग्वेद का उपवेद आयुर्वेद विप्र वर्ण ने अपनाया। 
वन से जड़ी-बूटियों और खदानों से अयस्क लाकर, सङ्ग्रहण कर, चुर्ण, आसव-अरिष्ट, रसायन बनाने के लिए होम- हवन कर, भट्टियाँ लगा कर रस रसायन बना करऔषधि तैयार कर के रखते थे। 
नियमित जीवन के लिए पञ्च महायज्ञ और अष्टाङ्ग योग फिर भी दुर्घटना या युद्ध आदि के कारण घायल और रुग्ण होने पर नाड़ी परिक्षा और रक्त, कफ, मल- मुत्र परिक्षण करवा कर फिर प्राकृतिक चिकित्सा, औषधियों से चिकित्सा, पञ्चकर्म चिकित्सा, शल्य चिकित्सा और हाथ- पैर मोड़ना, दबाना, छिद्रण, मालिश, जोक से रक्त चुसवाना जैसे अनेक प्रकार से चिकित्सा करते थे। यह कार्य एक प्रकार की तपस्या ही है।

यजुर्वेद का उपवेद धनुर्वेद और अर्थशास्त्र क्षत्रियों ने अपनाया।
सामाजिक व्यवस्थापन हेतु दिन-रात सजग रहना, क्षेत्र रक्षण, देश की सुरक्षा हेतु युद्ध, बलिदान होने को तैयार रहना भी तप ही है।

सामवेद का उपवेद गन्धर्ववेद (नाट्य सङ्गीत) वैश्यों ने अपनाया क्यों कि, इसमें खर्च बहुत अधिक लगता है।
इस लिए धनार्जन करना और व्ययन, निवेश करना , बचत करना और अकाल आदि के समय कर्मियों, कलाकारों का भरण-पोषण करना भी एक त्याग- तपस्या ही है।

अथर्ववेद का उपवेद कार्मिक शुद्रों ने अपनाया।
ये लोग राजन्य वर्ग और सम्पन्न वैश्यों के आदेश- निर्देश पर पथ, सेतु, बांध, भवन, कुए-बावड़ी, तालाब, धर्मशाला, विद्यालय, चिकित्सालय-औषधालय आदि के भवन बनाना और शिल्पकला और चित्र कला द्वारा सजाने का कार्य करते हैं।
भारी भरकम बोझ ढोकर समुचित स्थान पर लगाकर सन्तुलन बनाए रखना जैसे कठिन कार्य भी एक प्रकार का तप करना ही है।

व्रात्य और व्रात्य पति।

व्रात्य का अर्थ ऐसे श्रमण जो संस्कार विहिन हो, निरग्नि हो, निर्ग्रन्थ हो, आचार भ्रष्ट हो, यहाँ तक कि, जिसने जननेन्द्रिय की नस मार ली हो समाज से बहिष्कृत ऐसे लोग व्रात्य कहलाते थे।
व्रात्य लोगों में, सन्यास आश्रम में ऋषभदेव, जड़ भरत जैसे ज्ञानी भी हुए और जैन मुनि बाहुबली भी हुए तो अघोरी भी व्रात्य की श्रेणी में आते हैं।

पहले शंकर जी और बाद में विनायक गजानन भी व्रात्यपति कहलाए।

सोमवार, 8 जून 2026

आकर्षण, आसक्ति (लगाव), राग/ अनुराग ,भ्रम और मोह तथा प्रेम और भक्ति में अन्तर

आकर्षण, आसक्ति (लगाव), राग/ अनुराग ,भ्रम और मोह तथा प्रेम और भक्ति में अन्तर होता है।
किसी भी विषय से सम्बन्धित ज्ञानेंन्द्रि के सम्पर्क में आने के साथ उस ज्ञानेन्द्रि से मन का संयोजन होने पर उस विषय के प्रति आकर्षण उत्पन्न हो जाता है। आकर्षण उत्पन्न होते ही कर्मेंन्द्रियाँ उस विषय भोग के लिए सक्रिय और तत्पर हो उठती है। या यूं कहें कि, उस विषय से सम्बन्धित वस्तु, स्थान या व्यक्ति को प्राप्त करने में लग जाती है।
आकर्षण का विरोधी भाव विकर्षण है। जिसका परिणाम उच्चाटन होता है । व्यक्ति उससे दूर हो जाना चाहता है। लेकिन मन ही मन स्मरण बढ़ता जाता है।
मतलब आकर्षक आसानी से समाप्त नहीं होता।

आकर्षण से उस विषय की स्मृति बारम्बार होती रहती है, या कहें चित्त में बनी रहती है। परिणाम स्वरूप उस विषय (वस्तु, व्यक्ति या स्थान) के प्रति लगाव हो जाता है। इसी लगाव के लिए उपयुक्त शब्द आसक्ति है। वह विषय व्यक्ति से चिपक जाता है। हटाये नहीं हटता। बल्कि और दृढ़ता से चिपकता जाता है।

परिणाम स्वरूप उसके प्रति राग उत्पन्न होता है। उससे व्यक्ति को सुखानुभूति होने लगती है। इससे अनुराग उत्पन्न हो कर व्यक्ति अनुरक्त हो जाता है। उसी में घुल-मिल जाता है।

परिणाम स्वरूप व्यक्ति को हर समय, प्रत्येक गतिविधि में उस विषय की अनुभूति होने लगती है। यह उसका भ्रम होता है।

लेकिन जब व्यक्ति उस भ्रम को ही सत्य समझने लगता है तो भ्रम के स्थाई भाव को मोह कहते हैं।
परिणाम स्वरूप व्यक्ति उस विषय में मोहित हो जाता है। जिसे फारसी भाषा में दीवानह' कहा जाता है, जिसका अर्थ उन्मादग्रस्त, विक्षिप्त या पागल होता है। किसी व्यक्ति के प्रति आसक्ति में मोहित होकर उन्मादी हुए व्यक्ति को उर्दू में दीवाना कहते हैं।

प्रेम इन सबसे पूर्णतः भिन्न भावना है।
प्रेम का आधार गुणों के प्रति श्रद्धा होता है।
किसी भी सद्गुण सम्पन्न व्यक्ति के प्रति प्रायः सभी सदाचारियों को सहज ही प्रेम उपजता है। प्रेम उमड़ता है।
बालक के गुणों से उपजे प्रेम को वात्सल्य कहते हैं।
आजकल लोग भाषाई अज्ञान वश वात्सल्य भाव को माँ की ममता कहते हैं। जबकि ममता का अर्थ मेरापन होता है। ममता अहंकार का परिणाम है। इसीलिए अहन्त- ममता अर्थात मैं- मेरा शब्द साथ में ही आते हैं।
प्रेम प्राकृतिक भाव है। प्रेम न किया जाता है, न हो जाता है। बल्कि प्रेम सनातन भाव है; जो सदा से था। है और सदा रहेगा।
प्रेम सद्गुणों के प्रति श्रद्धा से होता है; ज्ञान से होता है। प्रेम किसी विषय, व्यक्ति, वस्तु या स्थान के प्रति नहीं होता।

जब प्रेम में आदर, सम्मान जुड़ जाता है तब वही प्रेम भक्ति कहलाता है।

गुरुवार, 28 मई 2026

लगभग उन्नीस हजार श्लोक वाले गरुड़ पुराण और राजस्थान के पाली जिले के ग्राम सोजत के पण्डित रामेश्वर जी श्रीमाली के मार्गदर्शन में जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह के मंत्री लधराज द्वारा राजस्थानी हिन्दी में सम्पादित छोटी पुस्तिका श्री विष्णु सारोद्धर्म में अन्तर।

*लगभग उन्नीस हजार श्लोक वाले गरुड़ पुराण और राजस्थान के पाली जिले के ग्राम सोजत के पण्डित रामेश्वर जी श्रीमाली के मार्गदर्शन में जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह के मंत्री लधराज द्वारा राजस्थानी हिन्दी में सम्पादित छोटी पुस्तिका श्री विष्णु सारोद्धर्म में अन्तर।*


*गरुड़ पुराण।*
*गीता प्रेस संस्करण  कोड 72। सबसे शुद्ध और प्रचलित है।*

*अठारह महापुराणों में से एक  भगवान विष्णु द्वारा गरुड़ जी को सुनाया गया गरुड़ पुराण लगभग उन्नीस हजार श्लोकों में भगवान विष्णु और गरुड़ के संवाद पर आधारित पूर्व खण्ड और उत्तर खण्ड दो खण्ड दो खण्डों में जीवन और मरण दोनों की नियमावली (मैन्युअल) है।*
*पूर्व खण्ड बताता है कि , कैसे जीना है और  उत्तर खण्ड बताता है मरने के बाद क्या होगा इसलिए उत्तर खण्ड को प्रेत कल्प भी कहते हैं। गरुड़ पुराण  के मुख्य देवता भगवान विष्णु  हैं।*
*गरुड़ पुराण का रचनाकाल चौथी से दसवीं शताब्दी के बीच, कई बार संशोधित हुआ।*

 *गरुड़ पुराण की  तीन बड़ी सीख।*

*1 कर्म का फल निश्चित है जैसा कर्म करोगे, तो वैसी योनि और वैसा ही स्वर्ग या नर्क मिलेगा।*
*2 दान-श्राद्ध का महत्त्व ,गया में पिंडदान, अन्नदान, गौदान से प्रेत योनि छूटती है।*
*3 विष्णु भक्ति ही तारने वाली है। अंत समय में ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र ही यम के फंदों से बचाता है।*

*विषय सूची।
*पूर्व खण्ड - आचार काण्ड जीवन सुधारने के लिए आयुर्वेद, नीति, धर्म की बातें हैं जो गृहस्थ के काम की हैं।*

*यह जीवन जीने की कला सिखाता है। मृत्यु से पहले का ज्ञान।*

*1 सृष्टि वर्णन --* 
*ब्रह्मांड की उत्पत्ति, 14 लोक, युग धर्म*
*2 सूर्य-चंद्र वंश वर्णन और चौबीस अवतार--*
 *राजाओं की वंशावली, विष्णु के चौबीस अवतार*
*3 धर्म-नीति --*
*दान, व्रत, तीर्थ, एकादशी, तुलसी माहात्म्य*
*4 आयुर्वेद--*
 *रोग, औषधि, रस-रसायन, नाड़ी परीक्षा* 
*5 ज्योतिष --* 
*ग्रह, नक्षत्र, शकुन-अपशकुन, स्वप्न फल*
*6 व्याकरण और छन्द --* *संस्कृत व्याकरण, काव्य शास्त्र* 
*7 रत्न और वास्तु --* *मणि-माणिक्य की पहचान, गृह निर्माण नियम*
*8 राजनीति --*
*राजा के कर्तव्य, युद्ध नीति*

*द्वितीय खण्ड  --* 
*उत्तर खण्ड / प्रेत कल्प पाप का भय नरकों का वर्णन पढ़कर मनुष्य पाप से बचता है।इसी भाग के कारण गरुड़ पुराण सबसे ज्यादा जाना जाता है।*

*मृत्यु के बाद का ज्ञान।*
*1 मृत्यु के लक्षण --* *मनुष्य को मरने से पहले कैसे संकेत मिलते हैं।*
*2 यममार्ग का वर्णन --*
*मृत्यु के बाद जीवात्मा सैंतालीस दिन में यमलोक कैसे पहुँचती है। वैतरणी नदी, यमदूत।*
*3 चोरासी लाख योनियाँ--* 
*किन किन कर्मों के अनुसार कौन-कौन सी योनि मिलती है।*
*4 नरक वर्णन--*   *तामिस्र, अंधतामिस्र, रौरव, कुंभीपाक आदि अट्ठाईस प्रकार के नर्क ।*
 *किस पाप से कौन-सा नर्क मिलता है।*
*5 प्रेत योनि --*
*प्रेत कौन बनता है, प्रेत बाधा से मुक्ति कैसे हो।*
*6 श्राद्ध-तर्पण --* *अंत्येष्टि, दशगात्र, सपिण्डीकरण, पिण्डदान, गया श्राद्ध की विधि।*
*7 मोक्ष उपाय--*
 *गीता पाठ, विष्णु सहस्रनाम, गया में पिंडदान से मुक्ति।*

 *परम्परा अनुसार घर में मृत्यु होने पर तेरह दिन तक प्रेत कल्प का पाठ कराते हैं। लेकिन आजकल उसके स्थान पर राजस्थान के सोजत के पण्डित रामेश्वर जी श्रीमाली की रचना विष्णु सारोद्धर्म मृत्यु उपरान्त तेरह दिनों तक गरुड़ पुराण के नाम से कर्मकाण्डी पण्डित लोग सुनाते हैं।*
*मान्यता है कि गरुड़ पुराण द्वितीय खण्ड प्रेत कल्प का पाठ मृतक की आत्मा को यममार्ग में कष्ट नहीं होता और सद्गति मिलती है।*
 लेकिन 
*राजस्थान के सोजत के पण्डित रामेश्वर जी श्रीमाली की रचना विष्णु सारोद्धर्म नामक पुस्तिका का पाठ कर सन्तोष कर लिया जाता है।*

*ध्यान रखें कि, श्री विष्णु सारोद्धर्म नामक पुस्तक महामहोपाध्याय पण्डित श्री कृष्णदत्त शास्त्री रचित स्मार्त कार्यकलाप या गृहस्थ कर्मकलाप से पूर्णतः असम्बन्धित और बिल्कुल भिन्न पुस्तक है।*


*श्री विष्णु सारोद्धर्म पुस्तिका।*
*राजस्थानी-मालवी क्षेत्र में गृहस्थों में बहुत प्रचलित श्री विष्णु सारोद्धर्म पुस्तिका वैष्णव कर्मकाण्ड की छोटी पुस्तिका है। इसमें विष्णु पूजा, व्रत, तिलक, तुलसी माहात्म्य, एकादशी विधि आदि का सार दिया गया है।*

*विष्णु सारोद्धर्म पुस्तिका के वास्तविक रचयिता राजस्थान के पाली जिले के ग्राम सोजत के पण्डित रामेश्वर जी श्रीमाली कहे जा सकते हैं । उन्ही के मार्गदर्शन में राजस्थानी हिन्दी में विष्णु सारोद्धर्म पुस्तिका का सम्पादन जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह के मंत्री लधराज ने किया था।*
*सत्रहवीं शताब्दी में जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह के मंत्री लधराज ने स्वयम्  उनके ग्रंथों में संस्कृत के प्रकांड पण्डित और कर्मकाण्ड, पुराण, धर्मशास्त्र के ज्ञाता राजस्थान के सोजत के पण्डित रामेश्वर जी श्रीमाली का उल्लेख किया है ।*

*चुंकि महाराजा जसवंतसिंह के मंत्री लधराज संस्कृत नहीं जानते थे, इसलिए संस्कृत के आधार पर बने ग्रंथ उन्होंने पण्डित रामेश्वर श्रीमाली जैसे विद्वानों से सुनकर लिखे।*

बुधवार, 27 मई 2026

शान्ताकारम भुजगशयन विष्णु स्तुति।

 


*शान्ताकारम् भुजगशयनम् पद्मनाभम् सुरेशम्विश्वाधारम् गगनसदृशम् मेघवर्णम् शुभाङ्गम्।लक्ष्मीकान्तम् कमलनयनम् योगिभिर्ध्यानगम्यम्वन्दे विष्णुम् भवभयहरम् सर्वलोकैकनाथम्॥*

यह श्लोक वेद, ब्राह्मण ग्रन्थों, सूत्र ग्रन्थों में रामायण महाभारत या पुराणों में नहीं मिलता है।
लेकिन महाभारत का अनुशासन पर्व, अध्याय 149 (भीष्म-युधिष्ठिर संवाद) में उल्लेखित विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र के पाठ से पूर्व पढ़ा जाने वाला ध्यान श्लोक के रूप में सर्वप्रिय विष्णु स्तुति है।


 इसमें प्रायः अधिकांश लोग "योगिभिर्ध्यानगम्य्म" का सही उच्चारण नहीं कर पाते हैं
सही उच्चारण के लिए अन्वय करके सीख सकते हैं।
*योगिभिर्ध्यानगम्य्म् ।*
*योगिभिः ध्यान गम्यम्।*
*योगिभि र् ध्यान गम्यम्।*

शान्ताकारम् भुजग शयनम् पद्मनाभम् सुरेशम्

 विश्वाधारम् गगन सदृशम् मेघवर्णम् शुभाङ्गम्।

लक्ष्मीकान्तम् कमलनयनम्

 योगिभि र् ध्यान गम्यम्  वन्दे विष्णुम्

 भवभय हरम् सर्वलोक एक नाथम्॥

स्मार्त गृहस्थों के लिए शुद्ध हिन्दी में लिखित पास्कर गृह्यसूत्र, मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति आदि के प्रमाण सहित कर्मकाण्ड का सम्पूर्ण ग्रन्थ स्मार्त कर्मकलाप या गृहस्थ कर्मकलाप ग्रन्थ।

*महामहोपाध्याय पं. श्रीकृष्णदत्त जी शास्त्री रचित और गीता प्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित स्मार्त कर्मकलाप या  गृहस्थ कर्मकलाप में प्रत्येक विधि के साथ मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य, पारस्कर गृह्यसूत्र आदि के प्रमाण सहित संस्कृत मंत्रों के साथ सरल हिन्दी में अर्थ सहित हिन्दी में लिखा गया गृहस्थों के लिए सम्पूर्ण कर्मकांड का लगभग 900-1000 पृष्ठ का वृहद ग्रंथ विश्वकोश है।*
*काशी के विद्वान अग्निहोत्री पं. प्रभुदत्त जी शास्त्री ने भी गीता प्रेस की विश्वसनीयता के साथ स्मार्त कर्मकलाप या  गृहस्थ कर्मकलाप की प्रशंसा की थी।*
*पहले कर्मकांड की सारी पुस्तकें संस्कृत में पद्धति रूप में थीं। पुरोहितों के अलावा कोई समझ नहीं पाता था।*

*महामहोपाध्याय पं. श्रीकृष्णदत्त जी शास्त्री ने कर्मकलाप में पहली बार हर विधि को हिन्दी में समझाकर लिखा लगभग 900 पृष्ठों का प्रामाणिक ग्रन्थ है।*
*लेखक पं. श्रीकृष्णदत्त जी ने स्वयं लिखा है कि;*
 *"संस्कृत न जानने वाले हिन्दी पढ़े-लिखे गृहस्थ भी सारे कर्मकांड समझ सकें, इसलिए मैंने यह ग्रंथ लिखा। इसके बिना कर्मकांड अधूरा ही रह जाता है।"* 
*पुरोहित न मिले तो भी सामान्य गृहस्थ स्वयम् पढ़कर कर्म कर सकते हैं।*

*स्मार्त कर्मकलाप या गृहस्थ कर्मकलाप ग्रंथ की संक्षिप्त विषय सूची ---*
*कर्मकलाप में जन्म से मृत्यु तक के सारे संस्कार और नित्य-नैमित्तिक कर्म हैं।*
*प्रथम खण्ड  -- नित्य कर्म।*
*1  प्रातः स्मरण, शौच, स्नान विधि।*
*2 संध्योपासन -- त्रिकाल संध्या, गायत्री जप, तर्पण।*
*3 पंचदेव पूजा, तुलसी-शालिग्राम पूजा।*
*4 बलिवैश्वदेव, भोजन विधि, शयन विधि।*

*द्वितीय खण्ड -- षोडश संस्कार।*
*1 गर्भाधान से अन्त्येष्टि तक षोडष संस्कार --* 
*नामकरण, अन्नप्राशन, मुंडन, यज्ञोपवीत, विवाह आदि सभी संस्कार।*
*2 हिन्दी में प्रत्येक संस्कार की सामग्री सूची, मंत्र, विधि, प्रयोजन।

*तृतीय खण्ड -- व्रत-पर्व-त्योहार*
*1 एकादशी, पूर्णिमा, अमावस्या, संक्रांति व्रत।*
*2 गणेश चतुर्थी, नवरात्र, दीपावली, होली, शिवरात्रि - पूजा विधि, कथा, उद्यापन।*

*चतुर्थ खण्ड --  श्राद्ध-तर्पण।*
*1 एकोदिष्ट, पार्वण, महालय श्राद्ध विधि।*
*2 पिंडदान, ब्राह्मण भोजन, गया श्राद्ध का महत्त्व।*

*पञ्चम खण्ड--- ज्योतिष प्रकरण।*

*1 गणित ज्योतिष--* *तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण आदि पंचांग देखना,* 
*2 फलित ज्योतिष --* 
*मुहूर्त, कुंडली के मूल सिद्धांत, ग्रह शांति।*
*3 यात्रा, गृह प्रवेश, विवाह मुहूर्त कैसे निकालें।*

*षष्ठ खण्ड --*  
*वैदिक कर्मकांड।*
*1 अग्निहोत्र, दर्श-पौर्णमास आदि श्रौत कर्मों का संक्षिप्त परिचय।*
*2 रुद्राभिषेक, नवग्रह शांति, सत्यनारायण व्रत कथा।*

*गीता प्रेस गोरखपुर की किसी भी दुकान पर - कोड 567 महामहोपाध्याय पं. श्रीकृष्णदत्त जी शास्त्री रचित और गीता प्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित स्मार्त कर्मकलाप या  गृहस्थ कर्मकलाप  मिल सकती है।*
*ऑनलाइन मंगाना चाहें तो --* *http://gitapress.org  से मंगवा सकते हैं।*
*पहले तो मुल्य लगभग ₹250/- या ₹300/- था।*

गुरुवार, 14 मई 2026

हिन्दू शब्द के अर्थ में मतभिन्नता पर मीमांसा।

क्या ऐसे सभी उदाहरण देखने के बाद भी यह स्वीकारना उचित होगा कि, तान्त्रिक नाथ, जैन, बौद्ध, खालसा, लिङ्गायत को सनातन वैदिक धर्मी माना जाए।
सिन्धु नदी के पूर्व में बसे गेहुंआ रङ्ग के लोगों के लिए ईरान के पारसियों के धर्मग्रन्थ जेन्द अवेस्ता में पारसियों के आचार्य जरुथ्रुस्ट द्वारा श्रीकृष्ण द्वेपायन व्यास जी (भगवान वेदव्यास जी) से हुए संवाद के प्रकरण में वेदव्यास जी के काले रङ्ग को देख कर पारसी भाषा में उन्हें हिन्दू कहा था। जैसे युरोपीय लोग भारतियों, अमेरिका और आस्ट्रेलिया के मूल निवासियों ब्लेक कहते हैं।
इस आधार पर ईरानी पारसी भारतियों को हिन्दू कहते थे। इसलिए अरबी जातियों के इस्लामी आक्रांताओं ने भी भारतियों को हिन्दू कहा।
संविधान ने गत तीन हजार वर्षों से भारत में निवास करने वाली सभी जातियों को हिन्दू कहा है। जिसमें टर्की से आकर बसे चन्द्रवंशी पुरु, यदु, तुर्वसु, अनु और दृह्यु की सन्तान, ईरानी परशु (पर्शियन), तिब्बती शक, कुषाण और मङ्गोलियाई हूण सम्मिलित हैं। फिर चाहे वे भारत में जन्मे तान्त्रिक नाथ, जैन, बौद्ध, खालसा या लिङ्गायत किसी भी पन्थ के अनुयाई हो; सभी को हिन्दू माना है। यहाँ हिन्दू से तात्पर्य दीर्घावधि से भारतीय भूमि में निवासरत और भारतीय मत, पन्थ और संस्कृति को अपना चुकी जनता से है।
जबकि, इस्लामी आक्रांताओं से बचकर भारत में बसे जरुथ्रुस्ट के अनुयाई पारसी, और अब्राहमिक मतावलम्बी यहुदी, ईसाई, मुस्लिम और बहाई पन्थ के लोगों को गैर हिन्दू कहा है।
तात्पर्य यह कि, भारतीय संविधान में हिन्दू शब्द मत, पन्थ, सम्प्रदाय के अर्थ में प्रयोग नहीं किया गया है। बल्कि मूल भारतीय जन के अर्थ में प्रयोग किया है।
जबकि सावरकर और हेडगॉवार, मुञ्जे, गोल वर्कर के अनुयाई हिन्दू महासभा, रा.स्व.से. संघ और उसके अनुशंङ्गी संगठन जनसंघ, विश्व हिन्दू परिषद, बजरङ्ग दल, भा. ज.पा. आदि सभी सङ्गठन विभाजन पश्चात वर्तमान भारत में रह रहे सभी भारतवासियों को हिन्दू कहते हैं।
रा. स्व. से. संघ का हिन्दू यथार्थवादी किसी भी सिद्धान्त से मैल नहीं खाता है। बल्कि शुद्ध काल्पनिक अवधारणा है।
किसी के कुछ भी मान लेने मात्र से सत्य नहीं बदल जाता।

अवतार रहस्य

जब दृढ़तापूर्वक वर्णाश्रम धर्म का पालन करने के उपरान्त जीवन मुक्त हुआ व्यवस्था सम्बन्धी विशेष योग्यता को धारी कोई पुरुष या स्त्री स्वैच्छिक रूप से वैकुण्ठ में किसी लोक विशेष में भविष्य में सृष्टि हित के किसी कार्य विशेष के सम्पादन के लिए अपना अस्तित्व बनाए रखता है। तब तदनुरूप परिस्थिति उत्पन्न होते ही ऋत की व्यवस्था के अनुसार वह मुक्त महापुरुष/स्त्री शरीर धारण कर मृत्युलोक में उतरता है उसे अवतरण कहते हैं, और उस महापुरुष/ स्त्री को अवतार कहते हैं।
उसके सहयोग हेतु देवताओं के लोक से कोई देवांश भूमि पर उतरते है।
ये पूरा समुह कुछ निर्धारित कार्य पूर्ण करने तक की समयावधि के लिए ही आते हैं और कार्य पूर्ण होने पर वापस अपने लोक में लौट जाते हैं।
इसमें कुछ अपवाद जो मृत्युलोक में ही कुछ कार्य शेष रहने के लिए रुकते भी हैं जैसे कल्कि अवतार को शास्त्रार्थ का शिक्षण प्रशिक्षण के लिए भगवान परशुराम जी अवतार का कार्यभार समाप्त होने पर भगवान श्री रामचन्द्र जी को अवतार का कार्यभार सोप कर स्वयम् तप करते हुए भूमि पर ही रहते हैं। और रुद्रांश हनुमानजी भी भूमि पर ही रह रहे हैं। ये चिरञ्जीवी कहलाते हैं।
जबकि काल के द्वारा कार्य पूर्ण होने का सन्देश देने पर भगवान श्री रामचन्द्र जी, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न तुरन्त साकेत लोक लौट गए। और बाली का ऋण उतारने का अन्तिम शेष कार्य पूर्ण कर जरा के रूप में जन्मे बाली के साधारण सा जहर बुझा तीर एड़ी में लगने पर अपनी लीला संवरण कर गोलोक पधार गये।
भगवान परशुराम और भगवान श्री राम आमने-सामने आने पर नहीं जानते थे कि, परशुरामजी का अवतारत्व वैष्णव धनुष हस्तान्तरण के माध्यम से श्री रामचन्द्र जी में समाहित हो जाएगा। और भगवान परशुराम केवल ऋषि रहकर तप करते हुए कल्कि अवतार को धनुर्वेद का शिक्षण प्रशिक्षण देने तक रुकेंगे।
भागवत पुराण के अनुसार द्वारिका के ब्राह्मण आठ पुत्रों को लेने पश्चिम सागर से होते हुए पाताल में नाग लोक में शेषनाग के महल में विराजमान अष्टभुजा धारी भगवान भूमा के समक्ष उपस्थित होने पर भगवान भूमा नारायण द्वारा बतलाया गया कि, हे कृष्ण तुम पिछले जन्म में नारायण ऋषि थे और अर्जुन नर नामक ऋषि थे। तुम दोनों ने नर नारायण पर्वत पर तप किया था। तुमसे मिलने के लिए इन ब्राह्मण बालकों को लाया गया था। तुम इन्हें लेजाकर ब्राह्मण को सोप दो।
ये सब तथ्य सिद्ध करते हैं कि, भगवान विष्णु और माया को या भगवान प्रभविष्णु और श्री लक्ष्मी को भगवान नारायण और नारायणी को या भगवान श्रीहरि और कमलासना गज सेवित कमला को भूमि पर जन्म नहीं लेना पड़ता है।
सभी अवतार अलग-अलग लोक से आये और वहीं वापस लौटे भी।
धर्म आधारित इसी व्यवस्था को अपनी-अपनी विचारधारा के अनुसार अलग-अलग नाम-रूपों में सभी पन्थों ने अपनाया।
जैनों ने अनीश्वरवादी विचारों के अनुकूल तीर्थंकर कहा। तो, बौद्धों ने भौतिक दृष्टिकोण से बोधिसत्व कहा। और अब्राहमिक मतावलम्बियों ने नबी कहा और खालसा पन्थ ने गुरु कहकर स्वीकारा।

शुक्रवार, 8 मई 2026

वास्तविक धर्म, कर्तव्य कर्म और निषिद्ध कर्म।

मनुस्मृति (6/92) के अनुसार धर्म के 10 मुख्य लक्षण हैं,  
*धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।धीर्विद्या सत्यमक्रोधो, दशकं धर्मलक्षणम्॥*
अर्थात 
*धृति (धैर्य), क्षमा, दम (मन पर नियंत्रण), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (पवित्रता), इन्द्रिय-निग्रह (इंद्रियों पर नियंत्रण), धी (बुद्धि), विद्या (ज्ञान), सत्य (सत्यता), और अक्रोध (क्रोध न करना)।*
जो व्यक्तिगत आचरण और नैतिकता को परिभाषित करते हैं।

*महाभारत/अनशासन पर्व। अध्याय 115*: भीष्म पितामह के अनुसार धर्म के 13 लक्षण गिनाए हैं:  
    *सत्यं शौचं दया क्षान्तिस्त्यागः सन्तोष आर्जवम्।*  
    *दमः शमस्तपः साम्यं तितिक्षोपरतिर्धृतिः॥* 115.11  
   *सत्य, पवित्रता, दया, क्षमा, त्याग, संतोष, सरलता, इन्द्रिय-निग्रह, मन-निग्रह, तप, समता, सहिष्णुता, वैराग्य और धैर्य।*

पतञ्जली के योग दर्शन में भी 
*अहिंसा, सत्य अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह* 
ये पाँच यम अर्थात धर्म कहे गए हैं।
 और  उक्त धर्म पालन मे सहायक और सहयोगी पाँच नियम बतलाये हैं।
*शोच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान।*

इसलिए ही ब्राह्मण ग्रन्थों में 

1 *संध्या, वेदाध्ययन और अष्टाङ्गयोग ब्रह्म यज्ञ*  

2 *पर्यावरण व्यवस्था और रोगाणु-, जीवाणु-किटाणु नाशक अग्निहोत्र रूपी देव यज्ञ*, 

3 *मानव सेवा, ब्रह्मचारी, संन्यासी, बिमार और अशक्तों की सेवा सेवा तथा गुरुकुल, चिकित्सालय, औषधालय आदि की व्यवस्था में सहयोग रूपी नृयज्ञ*,

4 *पशु-पक्षी और वनस्पतियों की सेवा रूपी बलिवैश्वदेव कर्म और भूत यज्ञ* एवम

5 *बुजुर्गो की सेवा, उनकी अतृप्त इच्छाएँ पूरी करने हेतु कुए, बावड़ी, तालाब, धर्मशाला, सदावृत , पुस्तकालय, वाचनालय आदि के निर्माण, रखरखाव और सञ्चालन में सहयोग करना रूपी पितृ यज्ञ श्राद्ध कर्म* 
करने को नित्य कर्म घोषित किया गया है।

*इसके विधि विधान कर्मकाण्ड भास्कर, ब्रह्म नित्य कर्म समुच्चय, आह्निक सूत्रावली, और सबसे सरलतम गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित नित्य कर्म पूजा प्रकाश में उपलब्ध है।*

और
*श्रुति अर्थात वेदों पर आधारित ब्राह्म धर्म और ब्राह्मण ग्रन्थों पर आधारित ब्राह्मण धर्म में प्रतिमा या मूर्ति पूजा, अभिषेक, षोडशोपचार पूजन को निषिद्ध और घृणित कर्म माना जाता है।*

*लिङ्ग और योनि की प्रतिमा/ मूर्ति बनाकर अभिषेक और षोडशोपचार पूजन करने वाले शिश्नेदेवाः को दूर करने की प्रार्थना की गई है।*

*ऋग्वेद सप्तम मण्डल/ सूक्त 21 मन्त्र 05 में कहा है कि,*
मन्त्र ---
*न यातव इन्द्र जुजुवुर्ना न वन्दना शविष्ठ वेद्यभि। न श्रीरर्द्धयो विष्णुनस्य जन्तोर्मा शिश्नदेवाः अपि गुऋतम् नः।।*

 *ऋषि वसिष्ठ इंद्र से शिश्नेदैवाः अर्थात लिङ्ग और भग (शिवलिङ्ग) की पूजा करने वाले यातुधान अर्थात (असुर, दैत्य दानव, आदि शत्रुओं से सुरक्षा की प्रार्थना कर रहे हैं।*

अर्थात ---

*"हे बलवान इंद्र!* 
(दुष्ट, कृतघ्न, अधार्मिक, विलासी) *शिश्नेदैवाः अर्थात लिङ्ग और भग (शिवलिङ्ग) की पूजा करने वाले यातुधानों अर्थात (असुर, दैत्य दानव, आदि) शत्रुओं से हमारी रक्षा कीजिए।*
*लिङ्गपूजक असूर लोग हमें परेशान न कर सकें; उन पर हमारी दृष्टि पड़ने, उनकी छाया पड़ने, उनके स्पर्श दोष से, हमारी समृद्धि को आधी न हो पाए। हे सर्वव्यापी विष्णु देव! उनसे हमारी रक्षा कीजिए।*

शुक्ल यजुर्वेद अध्याय 32 मन्त्र 03 में भी स्पष्ट कहा है कि,
*न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः।*
*हिरण्यगर्भ इत्येष मा मा हिंसीदित्येषा यस्मान्न जातः इत्येषः॥*
*उस परमात्मा की कोई प्रतिमा (मूर्ति, चित्र या तुलना) नहीं है। जिसका नाम या कीर्ति महान (बहुत बड़ी) है।*
*वही ब्रह्मांड का रचयिता हिरण्यगर्भ है। वह हमारी हिंसा न करे। (अर्थात हमारी रक्षा करें/ निर्भय करें) वह ईश्वर किसी से उत्पन्न नहीं हुआ है, वह अजन्मा है।*

*शुक्ल यजुर्वेद अध्याय 40 का प्रथम और द्वितीय मन्त्र कहता है कि*,
*ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥1।।*
अर्थात 
*इस जगत में जो कुछ भी है, वह सब ईश परमात्मा से व्याप्त है। अतः त्यागपूर्वक ही भोग करना चाहिए, किसी के धन लोभ-लालच न करें।*

*कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्मं लिप्यते नरे।।2।।*
अर्थात 
*कर्तव्य मान कर ही कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करे। क्योंकि इसके अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है जिससे कर्मों का लेप न हो। अर्थात कर्म बन्धन न हो इसलिए कर्म करते हुए ही जीवन व्यतीत करें।*
न अकर्मण्यता हो, न कर्मासक्ति हो और न फलाशा / फलासक्ति हो।

स्पष्ट है कि, *केवल शास्त्रोक्त विधि से शास्त्रोक्त कर्म ही करें। अर्थात यज्ञ के लिए ही यज्ञ करे। सेवा मय जीवन व्यतीत करें।* 
क्योंकि *मैं परमात्मा का हूँ और शरीर जगत का हिस्सा है। अतः हर समय परमात्मा का ही स्मरण, ध्यान, चिन्तन रखते हुए शरीर को पञ्चमहायज्ञ रूपी जगत सेवा में निवेश करें।*
*ब्राह्मण ग्रन्थों में और शुल्बसूत्रों, श्रोत सूत्रों और गृह्यसूत्रों में भी केवल मण्डप में मण्डल बनाकर, बेदी बनाकर अग्रिहोत्र का ही वर्णन है। धर्मसूत्रों में माता -पिता, आचार्य, अतिथि आदि की सेवा -पूजा का ही उल्लेख है।*

अब इसमें *किसी देवता विशेष की सेवा-पूजा, अनुष्ठान आदि का कोई आदेश/निर्देश है ही नहीं। बल्कि मूर्ति पूजा का तो स्पष्ट निषेध किया है।*
*अतः देव नहलाना, पञ्चोपचार/ दशोपचार या षोडशोपचार पूजा करके धर्म विरुद्ध आचरण करके नर्क का मार्ग प्रशस्त न किया जाए।*
*उल्लेखनीय है कि, अन्य लेखों में यह प्रमाणित कर चुका हूँ कि, द्वापरयुग तक भारत में मठ, मन्दिर और मूर्ति पूजा का नामो-निशान तक नहीं था।*
 *सर्वप्रथम श्रमण मतावलम्बी ईराक, सऊदी अरब, सीरिया, टर्की, युनान और मिश्र से मूर्ति पूजा सीख कर आये।* और 
*भारत में पहले तान्त्रिकों द्वारा दबे-छुपे मूर्ति पूजा प्रारम्भ की और अनुयाई बढ़ने पर मठों में मन्दिर/ स्तूप आदि में मूर्तिपूजा प्रारम्भ की।*
*इसी प्रकार भागवत कथा, शिव पुराण सुनना भी कोई धर्म-कर्म नहीं है। वास्तविक धर्म तो अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह ही है।* *दृढ़तापूर्वक धर्मपालन में सहयोगी शोच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान रूपी पाँच नियम है।*
तथा *ब्रह्म यज्ञ के अन्तर्गत संध्या, गायत्री मन्त्र जप, वेदाध्ययन, अष्टाङ्ग योग सहित ब्रह्म यज्ञ अग्निहोत्र कर देवयज्ञ, मानव सेवा रूपी नृयज्ञ, बलिवैश्वदेव सहित सर्व प्राणी और वनस्पतियों की सेवा रूपी भूतयज्ञ और बुजुर्गों की सेवा रूपी पितृ यज्ञ ये पाँच महायज्ञ है।*

लेकिन *महाभारत युद्ध के पश्चात जन साधारण इनके बजाय मठ, मन्दिरों में प्रतिष्ठित मूर्तियों या घर पर ही देवालय बना कर उसमे रखी देवी-देवताओं, अवतारों, आचार्यों, गुरु जनों, पितरों की मूर्तियों, प्रतिमाओं या चित्रों की पञ्चोपचार, दशोपचार या षोडशोपचार पूजन करने में अपना कल्याण और श्रेय समझने लगे हैं।*
*उससे उत्पन्न सबसे बड़ा दोष कि, उन मूर्तियों आदि में भगवान की धारणा कर परमात्मा के ईश्वर स्वरूप में भी पूर्ण श्रद्धा भक्ति और समर्पण रहित हो कर ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि*, 
*हे भगवान, मुझे यह चाहिए/ वह चाहिये और इसके लिए आप ऐसा- ऐसा कर दीजिए। ताकि, मुझे सफलता पूर्वक वाञ्छित भोग प्राप्त हो सके।*
*मतलब भगवान को निरा अज्ञानी मूर्ख समझकर उसे अपनी वैध/ अवैध माँगे मनवाने के लिए स्वयम् द्वारा सुझाए गए उपायों का पालन करने की सलाह देकर उसके बदले उपास/ उपवास समझकर लङ्घन करने, कोई स्तुति - स्तोत्र पाठ करने, मन्त्र जप करने, मन्दिर में कोई मूल्यवान भेंट चढ़ा कर, या भागवत कथा, या वायु पुराण का एक भाग शिव पुराण पाठ- प्रवचन आदि का आयोजन करवा कर शिवपुराणोक्त टोटके करके स्वयम् को महान आस्तिक, सच्चा ईश्वर वादी और परम भक्त सिद्ध करते हैं।*
*दुसरी हानि यह हुई कि, मन्दिर परिसर या मूर्ति में ही ईश्वर हैं बाहर ईश्वर नहीं है। सर्वव्यापी को सिमीत एकदेशीय मान लिया।*
*तीसरा दोष माता-पिता, आचार्य -गुरुजन, योग्य अतिथि के प्रति पूज्यभाव समाप्त हो गया।*
आजकल कुछ लोग नानी बाई का मायरा का पाठ करवाते हैं, लेकिन न, करने वाला; न, करवाने वाला और न ही, श्रोतागण कोई भी  *श्रीकृष्ण के प्रति पुत्र भाव रखने वाले भक्त नरसिंह मेहता का अपने इष्ट के प्रति विश्वास पर ध्यान नहीं देते हैं।*
*सबको केवल अपने द्वारा किए गए टोटकों, छल-कपट, षड़यन्त्रों, और सकाम आराधना के नाम पर किये गए कर्मों से ही परिणाम प्राप्ति का विश्वास रहता है।*
 *मेने ऐसा किया इस लिए ऐसा हो गया। मेने ऐसा नहीं किया वरना ऐसा हो जाता। मैं नहीं होता तो ऐसा नहीं हो पाता, मैं नहीं रहूँगा तो दुनिया रुक जाएगी। मरते दम तक इसी भ्रम में जीते हैं।*
जबकि यह नहीं देखते समझते कि, *जब मैं नहीं जन्मा था तब भी विश्व सुचारू रूप से चल रहा था, विकास कर रहा था। और जहाँ मैं नहीं हूँ वहाँ भी जगत सुचारू रूप से चल रहा है।*
इसलिए मेरा होना या न होना दोनों से विश्व में कोई अन्तर नहीं पड़ने वाला है।
यही स्थिति घर गृहस्थी की भी है। *जब नहीं थे तब भी गृहस्थी चल रही थी जब मैं नहीं रहूँगा तब भी गृहस्थी ऐसे ही चलेगी।*
क्योंकि *सञ्चालक तो परमात्मा का ईश्वरीय स्वरूप है। कोई व्यक्ति या समूह नहीं।*
मूर्ति पूजा के ऐसे परिणाम जानने के कारण ही वेदों में मूर्ति पूजा निषिद्ध की गई है।
मुझे ज्ञात है कि, मूर्ति पूजा के पक्षधर सगुण सर्वव्यापी विष्णु, सगुण कूटाकृति प्रभविष्णु, सगुण साकार नारायण श्रीहरि, प्रथम पूर्ण साकार हिरण्यगर्भ, प्रथम सावयव प्रजापति के वर्णन के आधार पर साकार देवों और सावयव प्रजापति आदि देवताओं का प्रमाण देकर मूर्ति पूजा सिद्ध करने का कुतर्क देंगे। उनसे सविनय एक ही अनुरोध है कि, आप स्वयम् भी सावयव हैं, आपका सिर मुख, हाथ- पेर सब है तो क्या कोई आपकी मूर्ति बनाकर पूजता है ऐसी कोई जानकारी है आपको? मतलब देवताओं के मुखादि अङ्ग होने से उनकी मूर्ति बनाकर कोई पूजता था यह प्रमाणित नहीं होता।
दूसरा कुतर्क का खण्डन मैं पहले ही वाल्मीकि रामायण में देवों के स्थान होने लेकिन उन स्थानों पर किसी आकृति वाली मूर्ति का उल्लेख नहीं होने, जैसे यज्ञ में मण्डप में मण्डल बनाकर उसपर देवों और देवताओं का आह्वान किया जाता है, और हम लोग मण्डप में मण्डल पर उन देवताओं की पूजा आदि करते हैं, वैसे ही जनकपुरी में श्री सीताजी का भगवती उमा की पूजा करने जाने का वर्णन है। कहीं किसी मूर्ति/ प्रतिमा या चित्र होने का उल्लेख नहीं है।
इसी प्रकार श्री रामचन्द्र जी द्वारा अयोध्या काण्ड में युवराज पद पर अभिषेक के पहले जाने के वर्णन में भी भगवान विष्णु के स्थान पर किसी मूर्ति/ प्रतिमा या चित्र होने का उल्लेख नहीं है।
ठीक इसी प्रकार विदर्भ राजकमारी श्री रुक्मिणी जी के विदर्भ की राजधानी के निकट ही अम्बिका देवी के स्थान पर पूजा करने जाना भी समझना चाहिए। ध्यान रखें महाराष्ट्र के विदर्भ (नागपुर क्षेत्र) से मध्यप्रदेश के धार जिले के अमझेरा की अम्बिका मन्दिर में रुक्मिणी जी का पूजा करने आना शुद्ध काल्पनिक है।
1178 में रचित एवम 1185 में प्रकाशित 
तमिल कवि कम्बन की  ईरामावतारम् महाकाव्य और 1574 से 1577 ईस्वी के बीच अवधि कवि भक्त तुलसीदास जी रचित रामचरितमानस में भगवान श्रीरामचन्द्र जी द्वारा तमिलनाडु में रामेश्वरम शिवलिङ्ग की स्थापना का प्रमाण न दें। क्योंकि ये रचनाएं अत्यधिक आधुनिक काल की रचना है अतः कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है।
इसी प्रकार ब्रह्माण्ड पुराण का भाग अध्यात्म रामायण ईस्वी की दहवीं से पन्द्रहवीं शताब्दी की रचना है। और आनन्द रामायण भी ईस्वी की पन्द्रहवीं शताब्दी की रचना है। इसलिए इतिहास के विषय में ये भी कोई प्रामाणिक ग्रन्थ नहीं है।
 दूसरी बात श्री रामचन्द्र जी केरल के कोझीकोड और कन्नूर होते हुए लक्ष्यद्वीप के किल्तान द्वीप में स्थित रावण की लङ्का गये थे। श्री रामचन्द्र जी कभी तमिलनाडु गये ही नहीं।

गुरुवार, 7 मई 2026

मूर्ति पूजा निषेध।

श्रुति अर्थात वेदों पर आधारित ब्राह्म धर्म और ब्राह्मण ग्रन्थों पर आधारित ब्राह्मण धर्म में प्रतिमा या मूर्ति पूजा, अभिषेक, षोडशोपचार पूजन को निषिद्ध और घृणित कर्म माना जाता है।
लिङ्ग और योनि की प्रतिमा/ मूर्ति बनाकर जलाभिषेक और षोडशोपचार पूजन करने वाले शिश्नेदेवाः को दूर करने की प्रार्थना की गई है।
*ऋग्वेद सप्तम मण्डल/ सूक्त 21 मन्त्र 05 में कहा है कि,*
मन्त्र ---
*न यातव इन्द्र जुजुवुर्ना न वन्दना शविष्ठ वेद्यभि।न श्रीरर्द्धयो विष्णुनस्य जन्तोर्मा शिश्नदेवाः अपि गुऋतम् नः।।*

 *ऋषि वसिष्ठ इंद्र से शिश्नेदैवाः अर्थात लिङ्ग और भग (शिवलिङ्ग) की पूजा करने वाले यातुधान अर्थात (असुर, दैत्य दानव, आदि शत्रुओं से सुरक्षा की प्रार्थना कर रहे हैं।*

मन्त्र का अर्थ ---

*"हे बलवान इंद्र!* 
(दुष्ट, कृतघ्न, अधार्मिक, विलासी) *शिश्नेदैवाः अर्थात लिङ्ग और भग (शिवलिङ्ग) की पूजा करने वाले यातुधानों * अर्थात (असुर, दैत्य दानव, आदि) शत्रुओं से हमारी रक्षा कीजिए।*
*लिङ्गपूजक असूर लोग हमें परेशान न कर सकें; उन पर हमारी दृष्टि पड़ने, उनकी छाया पड़ने, उनके स्पर्श दोष से, हमारी समृद्धि को आधी न हो पाए। हे सर्वव्यापी विष्णु देव! उनसे हमारी रक्षा कीजिए।*
शुक्ल यजुर्वेद अध्याय 32 मन्त्र 03 में भी स्पष्ट कहा है कि,
*न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः।*
*हिरण्यगर्भ इत्येष मा मा हिंसीदित्येषा यस्मान्न जातः इत्येषः॥*
उस परमात्मा की कोई प्रतिमा (मूर्ति, चित्र या तुलना) नहीं है। जिसका नाम या कीर्ति महान (बहुत बड़ी) है।
वही ब्रह्मांड का रचयिता हिरण्यगर्भ है। वह हमारी हिंसा न करे। (अर्थात हमारी रक्षा करें/ निर्भय करें) वह ईश्वर किसी से उत्पन्न नहीं हुआ है, वह अजन्मा है।

शुक्ल यजुर्वेद अध्याय 40 का प्रथम और द्वितीय मन्त्र ही कहता है कि,
*ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥1।।*

अर्थात 
इस जगत में जो कुछ भी है, वह सब ईश परमात्मा से व्याप्त है। अतः त्यागपूर्वक ही भोग करना चाहिए, किसी के धन लोभ-लालच न करें।

*कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्मं लिप्यते नरे।।2।।*
अर्थात 
कर्तव्य मान कर ही कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करे। क्योंकि इसके अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है जिससे कर्मों का लेप न हो। अर्थात कर्म बन्धन न हो इसलिए कर्म करते हुए ही जीवन व्यतीत करें।
न अकर्मण्यता हो, न कर्मासक्ति हो और न फलाशा / फलासक्ति हो।

स्पष्ट है कि, केवल शास्त्रोक्त विधि से शास्त्रोक्त कर्म ही करें। अर्थात यज्ञ के लिए ही यज्ञ करे। सेवा मय जीवन व्यतीत करें। 
क्योंकि मैं परमात्मा का हूँ और शरीर जगत का हिस्सा है। अतः हर समय परमात्मा का ही स्मरण, ध्यान, चिन्तन रखते हुए शरीर को पञ्चमहायज्ञ रूपी जगत सेवा में निवेश करें।
ब्राह्मण ग्रन्थों मे़ और शुल्बसूत्रों, श्रोत सूत्रों और गृह्यसूत्रों में भी केवल मण्डप में मण्डल बनाकर, बेदी बनाकर अग्रिहोत्र का ही वर्णन है। धर्मसूत्रों में माता -पिता, आचार्य, अतिथि आदि की सेवा -पूजा का ही उल्लेख है।

अब इसमें किसी देवता विशेष की सेवा-पूजा, अनुष्ठान आदि का कोई आदेश/निर्देश है ही नहीं। बल्कि मूर्ति पूजा का तो स्पष्ट निषेध किया है।
अतः देव नहलाना, पञ्चोपचार)/ दशोपचार या षोडशोपचार पूजा करके धर्म विरुद्ध आचरण करके नर्क का मार्ग प्रशस्त न किया जाए।
उल्लेखनीय है कि, अन्य लेखों में यह प्रमाणित कर चुका हूँ कि, द्वापरयुग तक भारत में मठ, मन्दिर और मूर्ति पूजा का नामो-निशान तक नहीं था। सर्वप्रथम श्रमण मतावलम्बी ईराक, सऊदी अरब, सीरिया, टर्की, युनान और मिश्र से मूर्ति पूजा सीख कर आये। और भारत में पहले तान्त्रिकों द्वारा दबे-छुपे मूर्ति पूजा प्रारम्भ की और अनुयाई बढ़ने पर मठों में मन्दिर/ स्तूप आदि में मूर्तिपूजा प्रारम्भ की।
इसी प्रकार भागवत कथा, शिव पुराण सुनना भी कोई धर्म-कर्म नहीं है। वास्तविक धर्म तो अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य ही है। दृढ़तापूर्वक धर्मपालन में सहयोगी शोच, सन्तोष,तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान रूपी पाँच नियम है।
तथा ब्रह्म यज्ञ के अन्तर्गत संध्या, गायत्री मन्त्र जप, वेदाध्ययन, अष्टाङ्ग योग सहित ब्रह्म यज्ञ अग्निहोत्र कर देवयज्ञ,मानव सेवा रूपी नृयज्ञ, बलिवैश्वदेव सहित सर्व प्राणी और वनस्पतियों की सेवा और बुजुर्गों की सेवा रूष पितृ यज्ञ पाँच महायज्ञ है।

बुधवार, 29 अप्रैल 2026

श्रीरामचन्द्र जी और उनके समकालीन लोगों का चरित्र और इतिहास जानने का एकमात्र साधन वाल्मीकि रामायण ही है।

इतिहास का सच जानने के लिए केवल वाल्मीकि रामायण और महाभारत ग्रन्थों पर ही निर्भर रहना पड़ता है।
चुंकि महर्षि वाल्मीकि परशुरामजी और श्री रामचन्द्र जी के समकालीक थे, सीता जी वाल्मीकि आश्रम में रही थी।
महर्षि वाल्मीकि ने प्रजापति ब्रह्मा के निर्देश पर, देवर्षि नारद जी से श्री रामचन्द्र जी का इतिहास और चरित्र सुनकर, और फिर सीता जी से जानकारी सुनिश्चित कर रामायण की रचना की थी। 
इस लिए सगर, महर्षि वशिष्ठ, महर्षि विश्वामित्र, महर्षि अगस्त्य, महर्षि वाल्मीकि, महर्षि भरद्वाज, दशरथ जी,जनक जी, महर्षि ऋष्यश्रङ्ग, रामचन्द्र जी की बड़ी बहन शान्ता, रामचन्द्र जी, परशुरामजी, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, सीता जी,   कौशल्या , सुमित्रा, कैकई, अहिल्या,  शबरी, हनुमान जी, बाली, सुग्रीव, जामवन्त जी, नल-नील,  रावण, कुम्भकरण, विभिषण, शुर्पणखा, केकसी, मन्दोदरी आदि के चरित्र जानने का एकमात्र साधन वाल्मीकि रामायण है।
साथ ही 
रामायण में उल्लेखित विषय ---
परशुरामजी का जन्म, महर्षि जमदग्नि द्वारा अपने क्षेत्र के राजा कार्तवीर्य सहस्रार्जुन का सेना सहित स्वागत-सत्कार करने पर कामधेनु की शक्ति जानकर सहस्रार्जुन का लोभ जागना और कामधेनु का हरण करना, विरोध करने पर उनकी आश्रम तहस नहस करना, क्रोधित परशुरामजी द्वारा कार्तवीर्य सहस्रार्जुन का वध कर दिया।
महाभारत के अनुसार कार्तवीर्य सहस्रार्जुन के वध का बदला लेने हेतु कार्तवीर्य सहस्रार्जुन के पुत्रों ने परशुरामजी के पिता  महर्षि जमदग्नि को समाधि अवस्था में हत्या कर दी। पति की हत्या से व्यथित परशुरामजी की माता रेणुका सती हो गई। इससे क्रोधित होकर परशुरामजी ने कार्तवीर्य सहस्रार्जुन के 21 कुलों का नाश कर दिया।
केवल चन्द्रवंश की शाखा हैहय वंशियों के इक्कीस कुलों का संहार किया था न कि, सभी क्षत्रियों का और बाद में महर्षि ऋचिक द्वारा रोके जाने पर प्रायश्चित स्वरूप अश्वमेध यज्ञ कर विजित भूमि महर्षि कश्यप को दान कर महेन्द्र पर्वत पर तप करने लगे। और देवराज इन्द्र के समक्ष अपने शस्त्र त्याग दिये।
इसी समय शिवजी का पिनाक धनुष जनक जी के यहाँ रखा गया। लेकिन वैष्णव धनुष अपने पास रखा जिसे शिव धनुष टूटने पर चुनोति के रूप में श्रीरामचन्द्र जी को दिया और उसके साथ ही परशुरामजी का वैष्णव तेज और अवतारत्व श्री रामचन्द्र जी में समा गया।

श्री रामचन्द्र जी का विश्वामित्र जी के साथ रहने, धनुर्वेद शिक्षा लेने, राक्षसों के प्रति धारणा बनने, राक्षसों को दण्डित करने, ताड़का वध, गोतम पत्नी अहिल्या का इन्द्र के प्रति आकर्षण और फिर इन्द्र के साथ रमण करना, गोतम का शाप कि, पाषाणवत स्थिर रहकर लोगों की दृष्टि से छुपकर (अदृष्य रहकर), निराहार रहते हुए, (भूख नहीं सताए इसके लिए प्राणायाम की एक क्रिया है, वायु भक्षण) केवल वायु का भक्षण कर श्री रामचन्द्र जी की प्रतीक्षा करना। जब वे इधर से गुजरेंगे तब उनका स्वागत सत्कार करने पर प्राश्चित पूरा होगा। अर्थात दण्ड पूर्ण होगा, अहिल्या ने यही आदेश स्वीकार कर पालन किया। विश्वामित्र जी के साथ श्री रामचन्द्र जी और लक्ष्मण जी का जनक पुरी जाना, रास्ते में गोतम आश्रम सुना दैखकर विश्वामित्र जी से पूछना, विश्वामित्र जी ने अहिल्या के प्राश्चित हेतु तप करने और उनके उद्धार के आदेश पर गोतम आश्रम में जाकर अहिल्या जी के पैर छूकर प्रणाम किया। फिर अहिल्या जी द्वारा प्रस्तुत जलपान और फल कन्द आदि ग्रहण कर अहिल्या जी का प्राश्चित पूर्ण होना और महर्षि गोतम से जा मिलना।
जनक पुरी में महर्षि विश्वामित्र, श्री रामचन्द्र जी और लक्ष्मण जी द्वारा शिवजी का पिनाक धनुष का दर्शन करना, श्री जनक जी का सीता जी के जन्म और विवाह के बारे में प्रतिज्ञा लेने की बात बतलाना, सीता जी से विवाह के इच्छुक राजाओं द्वारा धनुष उठाकर प्रत्यञ्चा चढ़ाने में असफल होने पर जनक जी पर सामुहिक आक्रमण करना और इन्द्र के द्वारा उन सभी अक्रान्ता राजाओं को परास्त कर भगाने का वृतान्त सुनाना,
श्री रामचन्द्र जी द्वारा पुराने शिव धनुष पर सहज ही प्रत्यञ्चा चढ़ाकर टंकार करने पर टुटना धनुष टूटना, परशुरामजी का आगमन, श्री रामचन्द्र जी को वैष्णव धनुष देकर उसपर प्रत्यञ्चा चढ़ाने की चुनौती देना, धनुष देने के साथ ही परशुरामजी का अवतारत्व का पदभार (चार्ज) श्री रामचन्द्र जी में समाहित हो जाने पर परशुरामजी का शान्त होना का इतिहास जानने का एकमेव साधन वाल्मीकि रामायण है।
श्री रामचन्द्र जी का युवराज पद पर सभा की सहमति से चयन, मन्थरा द्वारा भड़काने पर कैकई द्वारा रामचन्द्र जी को चौदह वर्ष का वनवास और भरत का राज्याभिषेक की मांग। श्रीरामचन्द्र जी का वनवास गमन, सीता जी और लक्ष्मण का साथ जाना, वशिष्ठ जी के निर्देश पर वनवास में भी सीताजी पूर्ण राजसी श्रङ्गार सहित रहना।  दशरथ जी की मृत्यु, भरत और शत्रुघ्न को कैकई देश से वापस बुलाना, भरत के लौटने पर का पूरी अयोध्या में तिरस्कार होता देख भरत को किसी अनिष्ट की आशंका, दशरथ जी की अन्त्येष्टि, भरत का श्री रामचन्द्र जी को लौटा लाने के लिए जाना लेकिन श्री रामचन्द्र जी का वापस नहीं आना। भरत श्री रामचन्द्र जी की पादुका लाकर नन्दीग्राम में पादुका स्थापित कर श्री रामचन्द्र जी के प्रतिनिधि के रूप में शासन करना। वनवास में भरत के बार-बार आवागमन की आशंका के चलते चित्रकूट छोड़कर पञ्चवटी जाना, शुर्पणखा की नाक काटने पर शुर्पणखा द्वारा रावण को श्री सीता जी के हरण के लिए दुष्प्रेरित करना, मारिच द्वारा स्वर्णमृग बनकर सीता जी को स्वर्णमृग पालने और वापसी में अयोध्या ले चलने की अभिलाषा प्रकट करना, श्री रामचन्द्र जी द्वारा लक्ष्मण पर सीताजी की अभिरक्षा का भार सोपना, मारिच द्वारा श्री रामचन्द्र जी के स्वर में लक्ष्मण को पुकारने पर सीताजी द्वारा लक्ष्मण जी को श्रीरामचन्द्र जी की सहायतार्थ भेजना। श्री रामचन्द्र जी द्वारा सीताजी को श्री रामचन्द्र जी के सामर्थ्य बतलाने और राक्षसों का छल-कपट कहने पर सीताजी द्वारा लक्ष्मण जी पर आक्षेप लगाकर जबरन भेजना। रावण द्वारा साधुवेश में भिक्षा याचना कर सीताजी का अपहरण करना, जटायु जी द्वारा सीताजी को छुड़ाने के प्रयत्न में प्राण अर्पण करना। फिर श्री रामचन्द्र जी को रावण द्वारा सीताजी के अपहरण की जानकारी देकर प्राण त्याग करना जटायु जी की अन्त्येष्टि, शबरी जी द्वारा सुग्रीव से मिलने का सुझाव। फिर  हनुमान जी से मिलना और सुग्रीव से मैत्री, बाली वध, वर्षा ऋतु समाप्त होने पर अङ्गद, जामवंत जी, नल-नील और हनुमान जी को सीता जी की खोज हेतु विंध्याचल के दक्षिण में एक माह में खोजने हेतु भेजना। उस समय सुग्रीव जी लंका का क्षेत्रफल सौ वर्ग योजन अर्थात लगभग 36×36=1296 वर्ग किलोमीटर बतलाया और लंका के आस-पास आठ द्वीप बतलाये। यह लक्षण केवल लक्ष्यद्वीप पर सही बैठता है सिंहल द्वीप (श्री लंका) पर बिल्कुल नहीं बैठता है।

सुग्रीव द्वारा खोजी दल को तञ्जावुर की सीमा पर लगे द्वार में प्रवेश न करने और पाण्ड्य देश (तमिलनाडु) में प्रवेश न करने की आज्ञा देना।
विंध्याचल के दक्षिण पश्चिम सिरे पर ही एक माह पूर्ण होना। फिर स्वयम्प्रभा की गुफा में प्रवेश करना और वहाँ से विंध्याचल के दक्षिण पश्चिम में खम्बात की खाड़ी में भरुच पहूँचना। जटायु जी के भाई सम्पाति से मुलाकात, और उनके द्वारा रावण की लंका में अशोक वाटिका में सीता जी को बैठे हुए देखकर अङ्गद के खोजी दल को भरुच से ठीक दक्षिण में समुद्र में सौ योजन अर्थात लगभग 1287 किलोमीटर दूर सागर में रावण की लंका नामक द्वीप का पता बतला कर वहाँ अशोक वाटिका में सीता जी के होने की सूचना देना।
जामवंत जी द्वारा उत्साहित करने पर हनुमान जी ने छलांग लगाकर लंका पहूँचना, वहाँ पूरी लंका का सुक्ष्म अवलोकन कर रावण और लंकावासियों का मदिरा और सुन्दरियों के सङ्ग व्यभिचार देखना, हनुमानजी ने लंका में पक्षियों के समान विमान उड़ते देखे।
सीताजी से मिल कर श्री रामचन्द्र जी का सन्देश और मुद्रिका देना। फिर हनुमानजी ने रावण की लंका में निकुम्भला यक्षिणी के कई मन्दिर ध्वस्त किए और मूर्तियाँ तोड़ी।

 विभिषण जी से मिलना, रावण पुत्र अक्षय कुमार का वध कर रावण से मिलना, दूत अवध्य होने विभिषण जी के सुझाव को मानकर हनुमान जी की पूंछ मे आग लगाना, हनुमान जी द्वारा लंका दहन करना। फिर सीता जी से मिलकर श्री रामचन्द्र जी के लिए सीताजी का सन्देश लेकर किष्किन्धा लौटना । श्रीरामचन्द्र जी को सीता जी का सन्देश देना। और पता बतलाना। रावण द्वारा विभिषण का अपमान कर देश निकाला देना। 
सुग्रीव जी द्वारा सम्पूर्ण वानर सेना और यन्त्र आदि एकत्रित कर श्री रामचन्द्र जी की सहायतार्थ लंका अभियान पर निकलना। किष्किन्धा से कोझिकोड और कन्नूर तक पूरी यात्रा पश्चिम घाट पर करना। कर्नाटक केरल सीमा पर पश्चिम घाट में कन्नूर पहूच कर श्री रामचन्द्र जी ने महेन्द्र पर्वत पर चढ़कर अरब सागर और तीन सौ किलोमीटर दूर लक्ष्यद्वीप में टापु पर रावण की लंका देखा। फिर सह्य और मलय पर्वत लांघकर अरब सागर के तट पर पहुँचे और डेरा डाला। विभिषण जी द्वारा श्री रामचन्द्र जी की शरण ग्रहणना श्रीरामचन्द्र जी द्वारा विभिषण जी से मित्रता करना। 
समुद्र से मार्ग देने की प्रार्थना लेकिन मार्ग न देने पर श्री रामचन्द्र जी द्वारा ब्रह्मास्त्र संधान। समुद्र द्वारा विश्वकर्मा पुत्र नल से सेतु बनवाने की राय देना। ब्रह्मास्त्र पश्चिम दिशा में छोड़ना, जिससे उस स्थान पर मरुस्थल बनना।
विश्वकर्म में निपुण नल ने बड़े बड़े यन्त्रों की सहायता से पर्वत शिखर से बड़े-बड़े शिलाखण्ड और बड़े-बड़े पैड़ उखड़वाकर बुलवाये फिर सागर में पैड़ों से जाल बिछा कर उसपर शिलाखण्ड रखवाकर फिर मिट्टी डलवाई। इस प्रकार केरल के कन्नूर से प्रारम्भ कर लक्ष्यद्वीप के किल्तान द्वीप तक पहले दिन चौदह योजन, दुसरे दिन छ योजन, तीसरे, चौथे और पाँचवे दिन एक-एक योजन सेतु बनाकर कुल पाँच दिन में 23 योजन अर्थात 296 किलोमीटर का सेतु बनाया।
श्रीरामचन्द्र जी और लक्ष्मण जी सहित पूरी सेना को मेघनाद द्वारा ब्रह्मास्त्र चलाकर घायल कर देना। जामवन्त जी द्वारा हनुमान जी को सूर्योदय से पहले रातों-रात सब को स्वस्थ्य करने हेतु हिमालय के महाशय पर्वत शिखर से चार चमकीली बुटियाँ - शल्य विकर्णी, सञ्जीव करणी, सावर्ण्य करणी और सन्धानी बुटी सूर्योदय से पहले लाने हेतु पूरा मार्ग बतलाकर भेजना। हनुमान जी छलांग लगा कर हिमालय पहूँचे। इन्द्र की अमरावती पुरी, कुबेर की अलकापुरी, वरुण की वारुणीपुरी, यम की संयमनी पुरी देखना। प्रजापति , इन्द्र, वरुण, द्वादश आदित्य, आठ वसु, एकादश रुद्र सहित स्वर्ग की सभा देखी।
बुटियों को न पहचान पाने के कारण महाशय पर्वत शिखर उखाड़ लाये। और चिकित्सा उपरान्त वापस रख आये। यही कार्य दुबारा मेघनाद द्वारा विभिषण जी पर की गई शक्ति प्रहार को लक्ष्मण जी ने आगे बढ़कर अपने सीने पर झेल लिया। और अचेत हो गये तब भी जामवन्त जी ने हनुमानजी को वापस महाशय पर्वत शिखर पर भेजा और हनुमान जी उक्त चारों बुटियों सहित पर्वत शिखर ले आये और चिकित्सा उपरान्त वापस रख आये।
विभिषण जी द्वारा सूचित करने पर रावण की कुलदेवी रक्षिणी निकुम्भला के मन्दिर में मेघनाद द्वारा किए जा रहे तान्त्रिक हवन का विध्वंस कर हनुमान जी और लक्ष्मण जी ने निकुम्भला मन्दिर ध्वस्त कर निकुम्भला की मूर्ति  तोड़ डाली लक्ष्मण जी द्वारा मेघनाद का वध किया।
बाद में फिर विभिषण जी द्वारा सूचित करने पर  रावण  भी निकुम्भला के गुप्त मन्दिर में तान्त्रिक पूजा, होम- हवन करने लगा तो हनुमान जी और लक्ष्मण ने मन्दिर और मूर्ति तोड़ कर हवन ध्वन्स कर दिया 
इन्द्र द्वारा सारथी मातली सहित रथ श्री रामचन्द्र जी की सहायतार्थ रथ भेजा। मातली की सलाह पर श्री रामचन्द्र जी ने रावण पर महर्षि अगस्त्य द्वारा प्रदत्त ब्रह्मास्त्र चलाकर वध कर दिया।और वह तत्काल ही मर गया था।*
रावण का वध अमान्त फाल्गुन कृष्ण पूर्णिमान्त चैत्र कृष्ण अमावस्या तिथि को सायं सन्ध्या में हुआ।
 श्री रामचन्द्र जी ने विभिषण का राज्याभिषेक करवा कर पुष्पक विमान से चैत्र शुक्ल पञ्चमी तिथि को चित्रकूट में भरद्वाज आश्रम पहूँचे।
चैत्र शुक्ल षष्ठी तिथि को अयोध्या पहूँचे।

 रामराज्य के प्रति अयोध्या वासियों की राय पुछने पर गुप्तचरों ने बतलाया कि, रावण की लंका में रही सीता जी को पटरानी बनाया जाने पर जनता में असन्तोष है। इस कारण दुसरे दिन श्री रामचन्द्र जी ने लक्ष्मण जी के साथ गर्भवती सीता जी को वाल्मीकि आश्रम के पास छुड़वा दिया। वहाँ जाकर लक्ष्मण जी ने सीता जी को सही जानकारी दी।
लव-कुश का जन्म, शिक्षा, और रामायण महाकाव्य कण्ठस्थ करवाया।
फिर श्रीरामचन्द्र जी द्वारा किए जा रहे राजसूय यज्ञ में लव-कुश ने पहली बार रामायण महाकाव्य का गायन कर सुनाया।

मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

बौद्धों और जैनों के प्रभाव से सनातन धर्मियों में आये परिवर्तन ---

बौद्धों और जैनों के प्रभाव से सनातन धर्मियों में ये परिवर्तन आये---

1 वेदाध्ययन बन्द हो गया। कई ब्राह्मण ग्रन्थ तो लुप्त हो गये।
बहुत से शुल्बसूत्र, श्रोतसूत्र, गृह्यसूत्र और धर्म सूत्र लुप्त हो गये। यहाँ तक कि, मानव धर्मसूत्र ही नहीं मिलता है।

2 संध्या, पञ्चमहायज्ञ, और अष्टाङ्गयोग छूट गये।
वेदाध्ययन, ब्राह्मण ग्रन्थों का अध्ययन बन्द हो गया।

3 वेदाङ्ग में केवल शिक्षा, व्याकरण और छन्दशास्त्र का अध्ययन जारी रहा कुछ एक विद्वानों ने परवर्ती मयासुर रचित सूर्य सिद्धान्त ज्योतिष ग्रन्थ और वराहमिहिर रचित वृहत संहिता ज्योतिष ग्रंथों की शिक्षा ली और अधिकांश ने होरा शास्त्र का ही अध्ययन किया। 

परिणाम ---
वसन्त विषुव (सायन मेष संक्रान्ति) से प्रारम्भ होने वाला संवत्सर पहले तो चित्रा तारे से 180° पर सूर्य होने वाले दिन निरयन मेष संक्रमण (वैशाखी/ मेषादि/ बैसाख बिहू/ पोइला बैसाख) से प्रारम्भ होने वाला माना जाने लगा जो अभी भी भारत के अधिकांश भाग में प्रचलित है। लेकिन मध्य भारत और पश्चिम भारत में निरयन मेष संक्रमण आधारित चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारम्भ होना माना जाने लगा।

वसन्त विषुव (सायन मेष संक्रान्ति) से प्रारम्भ होने वाला, देवताओं की ऋतु वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतु वाला उत्तरायण केवल उत्तर गोल कहा जाने लगा।और 
शरद विषुव (सायन तुला संक्रान्ति) से प्रारम्भ होने वाला पितरों की ऋतु शरद, हेमन्त और शिशिर ऋतु वाला दक्षिणायन केवल दक्षिण गोल कहा जाने लगा।
और 
दक्षिण परम क्रान्ति (सायन मकर संक्रान्ति) से प्रारम्भ होने वाला दक्षिण तोयन उत्तरायण कहलाने लगा। और 
उत्तर परम क्रान्ति (सायन कर्क संक्रान्ति) से प्रारम्भ होने वाला उत्तर तोयन दक्षिणायन कहलाने लगा।
वसन्त विषुव (सायन मेष संक्रान्ति) से प्रारम्भ होने वाली वसन्त ऋतु एक माह पहले सायन मीन संक्रान्ति से प्रारम्भ होना माना जाने लगा। तदनुसार सभी ऋतुएँ एक माह पहले से प्रारम्भ होना माना जाने लगा।

वसन्त विषुव (सायन मेष संक्रान्ति) से प्रारम्भ होने वाला मधु मास को एक माह पहले वाले सायन मीन संक्रान्ति से प्रारम्भ होना माना जाने लगा। परिणाम स्वरूप मधु- माधव, शुक्र- शचि, नभः नभस्य, ईष-उर्ज, सहस-सहस्य, तपः- तपस्य मास एक माह पहले माने जाने लगे।
धर्मशास्त्र का अङ्ग मुहूर्त शास्त्र तो पुरा ही गड़बड़ा गया।
इतिहास जानने में भी भ्रम होने लगे।
व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार सब तिथियों के अनुसार मनाये जाने लगे।
नक्षत्रों के स्थान पर पश्चिम टर्की, इराक के बेबीलोन और मिश्र में प्रचलित मेष, वृषभादि राशियाँ प्रचलित हो गई।
दशाह के स्थान पर सप्ताह प्रचलित हो गया।
जबकि वेदों में मेष-वृषभादि राशियों और सप्ताह के रविवार सोमवार आदि वारों के नाम भी नहीं है।

ऐसे ही निरुक्त में निघण्टु (कोश) सिखा।
परिणाम --- वेद मन्त्रों के सही अर्थ नही जान पाये।

कल्प में शुल्ब सूत्रों, और श्रोत सूत्रों का ज्ञान बहुत सिमीत लोगों ने सिखा। गृह्य सूत्रों का स्थान कर्मकाण्ड भास्कर, कर्मकाण्ड प्रदीप, ब्रहम नित्य कर्म समुच्चय तथा आह्निक सूत्रावली जैसे निबन्धों ने लिया। 
परिणाम ---इससे मूल अर्थ और क्रिया भूल गए परिणाम यह हुआ कि, विवाह में पाणी ग्रहण के स्थान पर तोरण का मुहूर्त मुख्य हो गया। सप्तपदी और चार फेरे मिलकर सात फेरे हो गये और सप्तपदी भूल ही गए।
गर्भाधान, पुंसवन, जातकर्म , नामकरण , अक्षरारम्भ, विद्यारम्भ और वेदारम्भ संस्कार लुप्त हो गये। 
यज्ञोपवित, उपनयन संस्कार विवाह के समय होने लगे।

धर्मसूत्र का स्थान पहले स्मृतियों ने लिया फिर हेमाद्रि की चतुर्वर्ग चिन्तामणी , माधव की माधवी में पौराणिक सन्दर्भों वाला धर्म प्रचलित हो गया।
उसके बाद कमलाकर भट्ट ने उनके आधार पर निर्णय सिन्धु में सम्पादित किया। और उसकी कुञ्जी धर्म सिन्धु बन गई। अब धर्मसूत्रों के दर्शन दुर्लभ हो गये।
परिणाम स्वरूप व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहारों की तिथियों में अत्यधिक अन्तर होने लगा।

4 उप वेदों में मात्र आयुर्वेद का अध्ययन जारी रहा तथा दक्षिण भारत में गन्धर्ववेद की शिक्षा जारी रही। 
धनुर्वेद में केवल जल्लुकट्टु जैसे मार्शल आर्ट सिखा, तथा स्थापत्य वेद और शिल्प वेद में केवल शिल्प कला सिखी। सेतु निर्माण, पथ निर्माण आदि पर ध्यान नहीं दिया।

5 वेदों, वेदाङ्गो, उपवेदों के स्थान पर पुराणों का महत्व बढ़ गया। यहाँ तक कि, इतिहास ग्रन्थ रामायण और महाभारत तथा ब्राह्मण ग्रन्थों के कर्मकाण्ड भाग की मीमांसा जेमिनी कृत पूर्व मीमांसा और ब्राह्मण ग्रन्थों के ज्ञान काण्ड - ब्रह्म सूत्रों अर्थात आरण्यक और उपनिषदों की मीमांसा बादरायण की उत्तर मीमांसा (शारीरिक सूत्र) का स्थान पर भी पुराणों को देने लगे।
महाभारत के भीष्म पर्व अध्याय 25 से 43 अर्थात श्रीमद्भगवद्गीता धर्म मीमांसा और योग दर्शन का श्रेष्ठतम ग्रन्थ है।
श्रीमद्भगवद्गीता की व्याख्या भी पौराणिक सन्दर्भों से की जाने लगी।

6 *इसी प्रकार वैदिक सूक्तों और ब्राह्मण ग्रन्थों के आरण्यकों और उपनिषदों में उल्लेखित दार्शनिक विचारों से प्रेरित लेकिन स्वतन्त्र विचारकों की रचनाएँ ईश्वर कृष्ण की सांख्य कारिकाएँ, कपिल मुनि का सांख्य दर्शन, पतञ्जली का योग दर्शन श, गोतम का न्याय दर्शन और कणाद का वैशेषिक दर्शन को इतना महत्व दिया जाने लगा कि, वैदिक दृष्टि से सोचना-समझना बिल्कुल बन्द हो गया और उक्त चार दर्शनो के आधार पर सोचने-समझने लगे।* 
*यहाँ तक तो फिर भी चलाया जा सकता है, लेकिन उससे भी आगे बौद्धों के सर्वास्तिवाद, जैनों के अनेकान्तवाद, बढ़कर नागार्जुन के शुन्यवाद,मैत्रेयनाथ का योगाचार- विज्ञान वाद, पाशुपत दर्शन पर आधारित असङ्ग और वसुगुप्त का त्रिक दर्शन अर्थात कश्मीरी शैव-शाक्त दर्शन के आधार पर सोचने-विचारने और समझने लगे।*
*ये लोग वैद, वैदिक धर्म, वैदिक कर्मकाण्ड, वैदिक दर्शन, वैदिक संस्कृति और वैदिक वर्णाश्रम व्यवस्था को स्वाभाविक रूप से नहीं स्वीकारते बल्कि सन्देह की दृष्टि से देखते हैं।*
*तथाकथित वैदिक दर्शनों सांख्य दर्शन, योग दर्शन, न्याय दर्शन और वैशेषिक दर्शन के आधार पर विचार कर निकाले गए निष्कर्षों को वैदिक निष्कर्ष मानते हैं।*
*जैसे बिना वेदाध्ययन, बिना संध्या किये, बिना पञ्च महायज्ञ किये, अष्टाङ्ग योग के यम नियमों का पालन किये या मनुस्मृति के दश धर्म लक्षणों को स्वभाव में उतारे बिना, पूर्ण ईश्वर प्रणिधान की आशा करते हैं।*
*उक्त साधना के बिना सीधे धारणा, ध्यान और समाधि तक पहूँचने के स्वप्न देखते हैं।*
*माया अर्थात प्रकृति का अंश अहंकार-मन, चित्त-बुद्धि रूप अन्तःकरण को शुद्ध करने की कल्पना करते हैं।*
जबकि, 
अधियज्ञ/अधिकरण अर्थात शासन --- प्रत्यगात्मा/अन्तरात्मा - (पुरुष और प्रकृति) परब्रह्म - (प्रभविष्णु और श्री लक्ष्मी /सवितृ-सावित्री) अधियज्ञ और अधिष्ठान (शासन) हैं। 
उन्ही के करण अर्थात यन्त्र या औजार ---

अधिकरण (निकटतम मुख्य करण)-- जीवात्मा अपर ब्रह्म --(अपर पुरुष और अपरा पृकृति अर्थात जीव और आयु) (नारायण और नारायणी अर्थात श्रीहरि और कमलासना गज सेविता लक्ष्मी जो समुद्र मन्थन से निकली कही जाती है।) तथा 
भूतात्मा (प्राण अर्थात चेतना और धृति/ धारण शक्ति धारयित्व अर्थात देहि और अवस्था) हिरण्यगर्भ अर्थात पञ्चमुखी ब्रह्मा और वाणी (त्वष्टा और रचना)।
जीवात्मा (अपर ब्रह्म) और भूतात्मा (हिरण्यगर्भ) दोनों अधिकरण अर्थात मुख्य करण या निकटतम यन्त्र हैं।

अभि करण अर्थात सहायक यन्त्र---- 
सुत्रात्मा (ओज और आभा अर्थात कान्ति) प्रजापति (चतुर्मुख ब्रह्मा) और सरस्वती (दक्ष और प्रसुति) तथा 
अणुरात्मा (तेज और विद्युत) वाचस्पति और वाक (इन्द्र और शचि) अभिकरण अर्थात अधिनस्थ करण हैं अर्थात जैसे जेक के साथ टामी लगती है या बल्ब के साथ स्वीच लगता है या पंखे के साथ रेग्युलेटर होता है या रिमोट होता है। उसे अभिकरण कहते हैं।

अन्तः करण अर्थात जो करण अन्दर हो।----
 चित-बुद्धि और अहंकार-मन
और बहिर्करण----
पञ्च मुख्य प्राण और पञ्च उपप्राण, 
पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ और पञ्च कर्मेंद्रियाँ तथा 
पञ्च महाभूत और पञ्च तन्मात्रा।
अतः ये प्राकृतिक तत्व हैं, इसलिए या तो यह माना जाए कि ये शुद्ध ही है या यह मानलो कि ये शुद्ध हो ही नहीं सकते। जैसे हम नित्य तीन बार स्नान करें तो भी शरीर स्वच्छ नहीं रह सकता। न निर्मल हो सकता है।
वैसे ही उक्त प्राकृतिक पदार्थ प्रकृति की ओर ही रुझान रखेंगे।
हमें केवल इन तत्वों के प्रति मैं और मेरा वाला भाव अहन्ता ममता त्यागना होगा। 
इसीलिए अपरिग्रह साधना है, ता कि, वाह्य वस्तुओं के प्रति ममता न रहे। कोई अनजाने में ले ले, बतला कर लेले, मांग कर ले ले, लेकर नहीं लौटाए तब भी उसके प्रति विरोध, क्रोध, द्वेश नहीं हो यह अक्रोध ही अहिंसा साधना है।
सभी चीजों का मूल तत्व ही देखना जैसे सुनार आभुषणों में केवल स्वर्ण देखता है, कारीगर या कलाकार केवल डिजाइन दैखता है। वैसे ही हमें सब वस्तुओं में एक परमात्मा को देखने का स्वभाव बनाना और बनाये रखना सत्य की साधना है।
सब-कुछ ब्रह्म का है, सब-कुछ परमात्मा की लीला मात्र है। इसमें वास्तविकता कुछ नहीं है। यह जान लेने की साधना अस्तेय, निर्लोभता है।
सबसे अन्त में लिङ्ग भेद मिटता है।
सृष्टि के भैदों से मुक्त होकर अभेद मूल तत्व परमात्मा को ही जानना यह ब्रह्मचर्य साधना है।
इतना सब होने फर ही सब-कुछ परमात्मा का ही है सब-कुछ परमात्मा ही है, जान लेने, मान लेने पर ही ईश्वर प्रणिधान सम्भव है। इसलिए यही लक्ष्य है।

अलग-अलग पुराणों में अलग-अलग देवों/ देवताओं की महत्ता और शेष सब को गौण, आधीन बतलाने के कारण सबके अलग-अलग इष्ट देव बन गये । सबमें परमात्मा देखने के बजाय स्व रचित या कारिगर से बनवाई मूर्ति में ही ब्रह्मभाव लाना और उससे परे जगत देखने के बजाय पूरी सृष्टि परमात्मा की लीला मात्र है मानकर उसके सृजेता, सञ्चालक, और निवारक के रूप में ईश्वर भाव लाकर समर्पण करना आसान है।

सुबह शाम घर में मूर्तिपूजा, आरती करना, भोग लगाना तथा शेष समय और मन्दिर या मूर्ति के बाहर ईश्वर नहीं देखना नास्तिकता अनीश्वरवाद ही है।

रविवार, 26 अप्रैल 2026

सभी गाँवो में एक ही मन्दिर हो जहाँ, परमात्मा , ॐ, सब देव और सभी देवताओं के स्थान हों।

सभी गाँवो में एक ही मन्दिर हो जिसमें सभी वैदिक देव और देवताओं के मण्डप शुल्ब सूत्रों के अनुसार मण्डप हों और मण्डप में मण्डल भी शुल्ब सूत्रों के अनुसार हो। जहाँ उन देवताओं का आव्हान, स्थापन, पूजन, यजन कर विसर्जन किया जाता रहे। सभी मण्डपों में यज्ञ बेदी भी शुल्ब सुत्रों के अनुसार बनी हो। *जहाँ उक्त मण्डपों में स्थित मण्डल पर* ---
परमात्मा 
  परब्रह्म
विष्णु और माया

ब्रह्म- 
प्रभविष्णु और श्री, लक्ष्मी तथा सवितृ और सावित्री।

अपर ब्रह्म
नारायण और नारायणी तथा श्री हरि- कमलासना, गजसेविता लक्ष्मी।

हिरण्यगर्भ (पञ्चमुखी ब्रह्मा) और वाणी,

 त्वष्टा-रचना 
तथा 
सनक, सननन्दन, सनत्कुमार , सनातन, नारद 
धर्म और उनकी तेरह पत्नियाँ - (१) श्रद्धा, (२) लक्ष्मी, (३) धृति, (४) तुष्टि, (५) पुष्टि, (६) मेधा, (७) क्रिया, (८) बुद्धि, (९) लज्जा, (१०) वपु, (११) शान्ति, (१२) सिद्धि, (१३) कीर्ति ) 
काम और रति
एवम्
अर्धनारीश्वर एकरुद्र।

प्रजापति (चतुर्मुख ब्रह्मा) और सरस्वती,
 
इन्द्र और शचि, दक्ष (प्रथम) और प्रसुति, रुचि और आकुति, कर्दम और देवहुति, स्वायम्भुव मनु और शतरूपा
तथा
शंकर और उमा,
एवम्
 मरीची और सम्भूति,  भृगु और ख्याति,  अङ्गिरा और स्मृति,  वशिष्ट और ऊर्ज्जा,  अत्रि और अनसुया,  पुलह और क्षमा,  पुलस्य और प्रीति,  कृतु और सन्तति।

वाचस्पति और वाक ,
 अग्नि और स्वाहा, पितर और स्वधा,

 ब्रह्मणस्पति और सुनृता, 
द्वादश आदित्य ---
(1) विष्णु, (2) सवितृ, (3) त्वष्टा, (4) इन्द्र, (5) वरुण, (6) विवस्वान, (7) पूषा, (8) भग, (9) अर्यमा, (10) मित्र, (11) अंशु और (12) धातृ) और उनकी शक्तियाँ,

 ब्रहस्पति- शुभा, ममता , तारा
अष्ट वसु---
(1) प्रभास (आकाश) -  प्रभासा।
(2) प्रत्युष (सूर्य/देव) - प्रत्युषा या दीक्षा 
(3) धर्म (वसु-पुत्र) -  धृति ।
(4) ध्रुव (अचल/ध्रुव तारा) -  ध्रुवा या धरणी
(5) अर्क (सूर्य/देव) - अर्का
(6) अनिल (वायु) - अनिला या शिवा 
(7) अनल (अग्नि) - अनला या शांडिली 
(8) अप् (जल) - आप (या सरिता)

पशुपति-पार्वती   
एकादश रुद्र----
(1) हर, (2) त्र्यम्बकं, (3) वृषाकपि, (4) कपर्दी, (5) अजैकपात, (6) अहिर्बुधन्य, (7) अपराजित, (8) रैवत, (9) बहुरूप, (10) कपाली और (11) शम्भु (शंकर) और उनकी शक्तियाँ,

 गणपति और सिद्धि ,
सोम और वर्चा,
सदसस्पति और समिति। 
मही
भारती
अधिदेव 
अष्टादित्य
  (1)मार्तण्ड {विवस्वान}, (2) इन्द्र, (3) वरुण, (4) मित्र, (5) धाता, (6) भग, (7) अंश और (8) अर्यमा ।

 द्वादश तुषितगण।  
 (1) बुद्धि, (2) मन, (3) उदान, (4) व्यान, (5) प्राण, (6) समान, (7) अपान, (8) श्रोत, (9) स्पर्ष, (10) चक्षु, (11) रसना और (12) घ्राण ।

सरस्वती
द्वादश साध्यगण । 
 (1) मन, (2) अनुमन्ता, (3) प्राण, (4) अपान, (5) विति , (6) हय, (7) हन्स, (8) विभु, (9) प्रभु, (10) नय, (11) नर और (12) नारायण
चौरासी सिद्ध गण

प्रणेताओं के पुत्र दक्ष द्वितीय।(शंकर जी के श्वसुर)
अध्यात्म- दुसरे अष्ट वसु। 
 (1) द्रोण, (2) प्राण, (3) ध्रुव, (4) अर्क, (5) अग्नि (6) दोष, (7) वसु और (8) विभावसु।  
मरुद्गण ।  
(1) आवह, (2) प्रवह, (3) संवह, (4) उद्वह, (5) विवह, (6) परिवह और (7) परावहऔर इन सातों के छ:छ: पुत्र।

दस विश्वैदेवगण। 
(1) दक्ष (द्वितीय), (2) कृतु, (3) सत्य, (4) काल (यम), (5) काम, (6) मुनि, (7) एल पुरुरवा, (8) श्रव, (9) रोचमान, (10) आर्द्रवान । 
इळा

 प्रभास वसु और (ब्रहस्पति की बहन) वरस्त्री के पुत्र देवशिल्पी विश्वकर्मा। 
(शुक्राचार्य के पुत्र) त्वष्टा। 

 अधिभूत-  दुसरे एकादश रुद्र। 
 (1) मन्यु, (2) मन , (3) महिनस, (4) महान, (5) शिव, (6) उग्ररेता, (7) भव, (8) काल, (9) वामदेव, (10) धृतवृत और (11) मृगव्याध
 या मतान्तर से अन्य नाम 
(1) सर्प, (2) निऋति,(3) पिनाकी, (4) कपाली, (5) स्थाणु, (6) ईशान नाम और (7) दहन भी।

अनेकरुद्र
(विशेले कीट पतङ्ग, सर्प, बिच्छू, घोघा (कपर्दी) और सीपी (युनियो, पाईला), सिंह, व्याघ्र आदि हिन्सक प्राणी, रोगाणु (बैक्टरिया), विषाणु (वायरस), फफुन्द, काई, आतंकी, गुण्डे, बदमाश, चोर, उचक्के, डाकु, लुटेरे, वनवासी, पुलिस, सेना आदि रुलाने वाले सभी अनेकरुद्र ।

शुक्राचार्य के पौत्र , त्वष्टापुत्र त्रिशिरा विश्वरूप हैं।

यह्व ( महादेव) । 

(1) ईशित्व- वशित्व, (2) अणिमा-लघिमा, (3) महिमा- गरिमा और (4) प्रकाम्य - प्राप्ति) सिद्धियों के अधिदेवता अष्ट विनायक ।  (1)सम्मित-उस्मित, (2) मित- देवयजन, (3) शाल - कटंकट और (4) कुष्माण्ड - राजपुत्र
  

 ईला नामक रौद्री के पुत्र एल भैरव। ( या वैवस्वतमनु की पुत्री ईला और बुध के पुत्र एल पुरुरवा।) ।
और
राजा के स्थान हों। जहाँ उन देवों, देवताओं का आह्वान, स्थापन, पूजन और यजन किया जा सके।


प्राचीन काल में केवल स्थान बनाया जाता था। जिसमें न कोई पद चिह्न होते थे, न चित्र होता था, न प्रतिमा होती थी और न ही मूर्ति होती थी। मण्डप में केवल मण्डल बने होते थे। जिस पर सम्बन्धित देव/देवता की धारणा और ध्यान किया जाता था।
*इससे कुछ मिलता- जुलता प्रयोग यज्ञों में किया जाता है। और जैन लोगों में भी मण्डल पूजा के रूप में प्रचलित है।*

शंकरजी और उनके शिष्य शुक्राचार्य जी द्वारा स्थापित तथा अत्रि पुत्र दत्तात्रेय द्वारा अपने शिष्य राजा कार्तवीर्य सहस्रार्जुन और रावण द्वारा प्रचलित वेद विरुद्ध तन्त्र परम्परा के अनुयाई कुछ तान्त्रिक भारत में भी गुप्त रूप से तन्त्र क्रिया करते थे और छोटी छोटी मूर्तियाँ रखकर पूजा करते थे। लेकिन मठ- मन्दिर नहीं होते थे। पहले ईरान में भी मीढ लोग इसी मत के थे। इसलिए शंकर जी को मीढीश कहते हैं। वर्तमान में नाथ पन्थ इन्हीं का उत्तरवर्ती रूप है। 
परवर्ती काल में मङ्गोलिया से तुर्किस्तान के देश होते हुए युनान के निकट क्रीट तक फैले तान्त्रिक लोग, इराक, टर्की, युनान, मिश्र,  युरोप, अफ्रीका और उत्तर अमेरिका, मध्य अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप में इस तन्त्र मत का फैलाव हुआ और वहाँ मठ मन्दिर और मूर्ति पूजा प्रचलित हुई। लेकिन तब भी भारत में वैदिक काल में मूर्ति पूजा नहीं होती थी
स्वायम्भुव मनु-शतरूपा के तीसरी पीढ़ी में जन्मे ऋषभदेव जी जिन्होंने दक्ष प्रजापति प्रथम द्वारा स्थापित और  अपने पूर्वजो मनु शतरुपा, प्रियव्रत, आग्नीध्र और अजनाभ (नाभि) द्वारा पालित वर्णाश्रम धर्म का पालन करते हुए अन्तिम अवस्था में संन्यास ग्रहण किया था। और उनके पुत्र भरत चक्रवर्ती ने भी उसका पालन किया। 
लेकिन ऋषभदेव के पुत्र बाहुबली ने युवावस्था में ही संन्यास ग्रहण कर लिया था। उसे आदर्श मानने वाले जैन पन्थ ने ऋषभदेव जी को अपना पहला तीर्थंकर घोषित कर श्रमण मत के अन्तर्गत  तन्त्र परम्परा अपना ली और मठ, मन्दिर और मूर्ति पूजा प्रारम्भ कर दी।
व्यापार और राजनीति के कारण उक्त देशों के सम्पर्क में भारतीय राजनयिक और व्यापारी आये परिणाम स्वरूप भारत में सर्वप्रथम श्रमण मतावलम्बियों ने तन्त्र मतानुसार मठ- मन्दिर और मूर्ति पूजा प्रारम्भ की। इसमें मुख्य रूप से जैन व्यापारी प्रमुख थे।
भारत में भी सर्वप्रथम शिवलिङ्ग- योनि की पूजा प्रारम्भ हुई। फिर ध्यान मुद्रा में बैठे शंकर जी, रुद्र और अम्बिका, काली, चामुण्डा, भैरव- भैरवी, गजानन विनायक और नन्दी की मूर्ति पूजा प्रचलन में आई।
शैव-शाक्त, गाणपत्य के बाद ईरान से आये मग ब्राह्मणों ने सूर्य की मूर्ति और मन्दिर की पूजा प्रारम्भ की।
अन्त में विष्णु, लक्ष्मी नारायण, हिरण्यगर्भ ब्रह्मा और प्रजापति ब्रह्मा की मूर्तियाँ बनने लगी।
श्रीकृष्ण की मुर्ति पूजा होने लगी, फिर श्री रामचन्द्र जी मुर्तियाँ पूजी जाने लगी। फिर चौबीस अवतारों की पूजा प्रारम्भ हुई।
फिर तो शिव परिवार, शिव अवतार, चण्डिका के अवतारों, विनायक गजानन और उनके अवतारों की मूर्तियाँ पूजी जाने लगी, शितला देवी भी पूजी जाने लगी।
इसलिए किसी अन्य स्थान पर मूर्ति पूजक यदि चाहें तो उनके लिए उपर्युक्तानुसार मण्डप में मण्डल पर उक्त देवों/ देवताओं की मूर्ति  स्थापित कर उनके लिए भी ऐसा ही एक मन्दिर बना दिया जाए।

गुरुकुल शिक्षा क्या है?

कई गुरुकुल हैं, जहाँ वेद, ब्राह्मण ग्रन्थ, शिक्षा (उच्चारण/ फोनेटिक), व्याकरण, निरुक्त (भाषा शास्त्र),निघण्टु (शब्दकोश),छन्द शास्त्र, ज्योतिष (एस्ट्रोनॉमी और संहिता), ब्रह्माण्ड के नक्शे मण्डल- मण्डप बनाने के लिए शुल्बसूत्र, संस्कार, नित्यकर्म और व्रत,पर्व, उत्सव और त्यौहार मनाने के विधि-विधान के लिए गृह्यसूत्र, अश्वमेध, राजसूय जैसे बड़े सत्र वाले बड़े यज्ञों की विधि विधान के लिए श्रोतसूत्र नीति, कर्तव्याकर्तव्य, राजनीति और अर्थशास्त्र का ज्ञान और के निर्णय हेतु धर्मसूत्र (चार कल्प) (आदि सब मिलाकर षडवेदाङ्ग), के साथ आवश्यक और योग्यतानुसार आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद (नाट्य, सङ्गीत) शिल्पवेद स्थापत्य वेद (चार उपवेद) के शास्त्र, ब्राह्मण ग्रन्थों की कर्मकाण्ड सम्बन्धी पूर्व मीमांसा उपनिषदों के ब्रह्मज्ञान की उत्तर मीमांसा, सांवय दर्शन - कर्म मीमांसा और अष्टाङ्गयोग हेतु श्रीमद्भगवद्गीता, और योग दर्शन, न्याय दर्शन, और वैशेषिक दर्शन, वाल्मीकि रामायण और महाभारत (इतिहास) तथा विष्णु पुराण का अध्ययन करवाया जाता है।
साथ ही आधुनिकता शिक्षा भी दी जाती है। वे सफल शिक्षक, डॉक्टर, इञ्जिनियर, सैन्य अधिकारी, न्यायाधीश, अकाउण्टेण्ट, व्यवस्थापक और प्रशासक और शासक बनते है।

शनिवार, 25 अप्रैल 2026

सभी गाँवो में एक ही मन्दिर हो जिसमें सृष्टि क्रम में सब देव और देवता हों।

सभी गाँवो में एक ही मन्दिर हो जिसमें सभी वैदिक देव और देवताओं के मण्डप शुल्ब सूत्रों के अनुसार मण्डप हों और मण्डप में मण्डल भी शुल्ब सूत्रों के अनुसार हो। जहाँ उन देवताओं का आव्हान, स्थापन, पूजन, यजन कर विसर्जन किया जाता रहे। सभी मण्डपों में यज्ञ बेदी भी शुल्ब सुत्रों के अनुसार बनी हो। *जहाँ उक्त मण्डपों में स्थित मण्डल पर* ---

परमात्मा
परब्रह्म
विष्णु और माया

ब्रह्म
प्रभविष्णु और श्री, लक्ष्मी तथा सवितृ और सावित्री

अपर ब्रह्म
नारायण और नारायणी तथा श्री हरि- कमलासना, गजसेविता लक्ष्मी।

हिरण्यगर्भ (पञ्चमुखी ब्रह्मा) और वाणी,

 त्वष्टा-रचना 
तथा 
सनक, सननन्दन, सनत्कुमार , सनातन, नारद 
धर्म और उनकी तेरह पत्नियाँ - (१) श्रद्धा, (२) लक्ष्मी, (३) धृति, (४) तुष्टि, (५) पुष्टि, (६) मेधा, (७) क्रिया, (८) बुद्धि, (९) लज्जा, (१०) वपु, (११) शान्ति, (१२) सिद्धि, (१३) कीर्ति ) 
काम और रति
एवम्
अर्धनारीश्वर एकरुद्र

प्रजापति (चतुर्मुख ब्रह्मा) और सरस्वती,
 
इन्द्र-शचि, दक्ष (प्रथम)-प्रसुति, रुचि-आकुति, कर्दम-देवहुति, स्वायम्भुव मनु-शतरूपा
तथा
शंकर- उमा,
एवम्
 मरीची-सम्भूति,  भृगु-ख्याति,  अङ्गिरा-स्मृति,  वशिष्ट-ऊर्ज्जा,  अत्रि-अनसुया,  पुलह-क्षमा,  पुलस्य-प्रीति,  कृतु-सन्तति।

वाचस्पति और वाक ,
 अग्नि-स्वाहा, पितर-स्वधा,

 ब्रह्मणस्पति और सुनृता
द्वादश आदित्य
(1) विष्णु, (2) सवितृ, (3) त्वष्टा, (4) इन्द्र, (5) वरुण, (6) विवस्वान, (7) पूषा, (8) भग, (9) अर्यमा, (10) मित्र, (11) अंशु और (12) धातृ) और उनकी शक्तियाँ,

 ब्रहस्पति- शुभा, ममता , तारा
अष्ट वसु - (1) प्रभास (आकाश) -  प्रभासा।
(2) प्रत्युष (सूर्य/देव) - प्रत्युषा या दीक्षा 
(3) धर्म (वसु-पुत्र) -  धृति ।
(4) ध्रुव (अचल/ध्रुव तारा) -  ध्रुवा या धरणी
(5) अर्क (सूर्य/देव) - अर्का
(6) अनिल (वायु) - अनिला या शिवा 
(7) अनल (अग्नि) - अनला या शांडिली 
(8) अप् (जल) - आप (या सरिता)

पशुपतिऔर पार्वती -
 एकादश रुद्र- (1) हर, (2) त्र्यम्बकं, (3) वृषाकपि, (4) कपर्दी, (5) अजैकपात, (6) अहिर्बुधन्य, (7) अपराजित, (8) रैवत, (9) बहुरूप, (10) कपाली और (11) शम्भु (शंकर) और उनकी शक्तियाँ,

 गणपतिऔर सिद्धि -  
सोम और वर्चा,

 सदसस्पति और समिति
मही-भारती-सरस्वती- इळा।
 अधिदेव - अष्टादित्य -
  (1)मार्तण्ड {विवस्वान}, (2) इन्द्र, (3) वरुण, (4) मित्र, (5) धाता, (6) भग, (7) अंश और (8) अर्यमा। 

 अध्यात्म - दुसरे वसु
(1) द्रोण, (2) प्राण, (3) ध्रुव, (4) अर्क, (5) अग्नि (6) दोष, (7) वसु और (8) विभावसु। 

 अधिभूतदुसरे एकादश रुद्र
(1) मन्यु, (2) मन , (3) महिनस, (4) महान, (5) शिव, (6) उग्ररेता, (7) भव, (8) काल, (9) वामदेव, (10) धृतवृत और (11) मृगव्याध।
 या मतान्तर से अन्य नाम (1) सर्प, (2) निऋति,(3) पिनाकी, (4) कपाली, (5) स्थाणु, (6) ईशान नाम और (7) दहन भी। ।

द्वादश तुषितगण - 
(1) बुद्धि, (2) मन, (3) उदान, (4) व्यान, (5) प्राण, (6) समान, (7) अपान, (8) श्रोत, (9) स्पर्ष, (10) चक्षु, (11) रसना और (12) घ्राण ।

मरुद्गण - (1) आवह, (2) प्रवह, (3) संवह, (4) उद्वह, (5) विवह, (6) परिवह और (7) परावह । 
अनेकरुद्र - 
विशेले कीट पतङ्ग, सर्प, बिच्छू, घोघा (कपर्दी) और सीपी (युनियो, पाईला), सिंह, व्याघ्र आदि हिन्सक प्राणी, रोगाणु (बैक्टरिया), विषाणु (वायरस), फफुन्द, काई, आतंकी, गुण्डे, बदमाश, चोर, उचक्के, डाकु, लुटेरे, वनवासी, पुलिस, सेना आदि रुलाने वाले सभी अनेकरुद्र

द्वादश साध्यगण-
 (1) मन, (2) अनुमन्ता, (3) प्राण, (4) अपान, (5) विति , (6) हय, (7) हन्स, (8) विभु, (9) प्रभु, (10) नय, (11) नर और (12) नारायण। 
चौरासी सिद्ध गण

प्रभास वसु और (ब्रहस्पति की बहन) वरस्त्री के पुत्र देवशिल्पी विश्वकर्मा
शुक्राचार्य के पुत्र) त्वष्टा हैं।

यह्व ( महादेव)  यहुदियों का इष्ट  याहवेह ।

(1) ईशित्व- वशित्व, (2) अणिमा-लघिमा, (3) महिमा- गरिमा और (4) प्रकाम्य - प्राप्ति) सिद्धियों के अधिदेवता अष्ट विनायक । (1)सम्मित-उस्मित, (2) मित- देवयजन, (3) शाल - कटंकट और (4) कुष्माण्ड - राजपुत्र
  
दस विश्वैदेवगण
(1) दक्ष (द्वितीय), (2) कृतु, (3) सत्य, (4) काल (यम), (5) काम, (6) मुनि, (7) एल पुरुरवा, (8) श्रव, (9) रोचमान, (10) आर्द्रवान

 शुक्राचार्य के पौत्र , त्वष्टापुत्र त्रिशिरा विश्वरूप हैं। 
ईला नामक रौद्री के पुत्र एल भैरव हैं। ( या वैवस्वतमनु की पुत्री ईला और बुध के पुत्र एल पुरुरवा
और
राजा के स्थान हों। जहाँ उन देवों, देवताओं का आह्वान, स्थापन, पूजन और यजन किया जा सके।


प्राचीन काल में केवल स्थान बनाया जाता था। जिसमें न कोई पद चिह्न होते थे, न चित्र होता था, न प्रतिमा होती थी और न ही मूर्ति होती थी। मण्डप में केवल मण्डल बने होते थे। जिस पर सम्बन्धित देव/देवता की धारणा और ध्यान किया जाता था।
*इससे कुछ मिलता- जुलता प्रयोग यज्ञों में किया जाता है। और जैन लोगों में भी मण्डल पूजा के रूप में प्रचलित है।*

शंकरजी और उनके शिष्य शुक्राचार्य जी द्वारा स्थापित तथा अत्रि पुत्र दत्तात्रेय द्वारा अपने शिष्य राजा कार्तवीर्य सहस्रार्जुन और रावण द्वारा प्रचलित वेद विरुद्ध तन्त्र परम्परा के अनुयाई कुछ तान्त्रिक भारत में भी गुप्त रूप से तन्त्र क्रिया करते थे और छोटी छोटी मूर्तियाँ रखकर पूजा करते थे। लेकिन मठ- मन्दिर नहीं होते थे। पहले ईरान में भी मीढ लोग इसी मत के थे। इसलिए शंकर जी को मीढीश कहते हैं। वर्तमान में नाथ पन्थ इन्हीं का उत्तरवर्ती रूप है। 
परवर्ती काल में मङ्गोलिया से तुर्किस्तान के देश होते हुए युनान के निकट क्रीट तक फैले तान्त्रिक लोग, इराक, टर्की, युनान, मिश्र, युरोप, अफ्रीका और उत्तर अमेरिका, मध्य अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप में इस तन्त्र मत का फैलाव हुआ और वहाँ मठ मन्दिर और मूर्ति पूजा प्रचलित हुई। लेकिन तब भी भारत में वैदिक काल में मूर्ति पूजा नहीं होती थी।
स्वायम्भुव मनु-शतरूपा के तीसरी पीढ़ी में जन्मे ऋषभदेव जी जिन्होंने दक्ष प्रजापति प्रथम द्वारा स्थापित और अपने पूर्वजो मनु शतरुपा, प्रियव्रत, आग्नीध्र और अजनाभ (नाभि) द्वारा पालित वर्णाश्रम धर्म का पालन करते हुए अन्तिम अवस्था में संन्यास ग्रहण किया था। और उनके पुत्र भरत चक्रवर्ती ने भी उसका पालन किया। 
लेकिन ऋषभदेव के पुत्र बाहुबली ने युवावस्था में ही संन्यास ग्रहण कर लिया था। उसे आदर्श मानने वाले जैन पन्थ ने ऋषभदेव जी को अपना पहला तीर्थंकर घोषित कर श्रमण मत के अन्तर्गत तन्त्र परम्परा अपना ली और मठ, मन्दिर और मूर्ति पूजा प्रारम्भ कर दी।
व्यापार और राजनीति के कारण उक्त देशों के सम्पर्क में भारतीय राजनयिक और व्यापारी आये परिणाम स्वरूप भारत में सर्वप्रथम श्रमण मतावलम्बियों ने तन्त्र मतानुसार मठ- मन्दिर और मूर्ति पूजा प्रारम्भ की। इसमें मुख्य रूप से जैन व्यापारी प्रमुख थे।
भारत में भी सर्वप्रथम शिवलिङ्ग- योनि की पूजा प्रारम्भ हुई। फिर ध्यान मुद्रा में बैठे शंकर जी, रुद्र और अम्बिका, काली, चामुण्डा, भैरव- भैरवी, गजानन विनायक और नन्दी की मूर्ति पूजा प्रचलन में आई।
शैव-शाक्त, गाणपत्य के बाद ईरान से आये मग ब्राह्मणों ने सूर्य की मूर्ति और मन्दिर की पूजा प्रारम्भ की।
अन्त में विष्णु, लक्ष्मी नारायण, हिरण्यगर्भ ब्रह्मा और प्रजापति ब्रह्मा की मूर्तियाँ बनने लगी।
श्रीकृष्ण की मुर्ति पूजा होने लगी, फिर श्री रामचन्द्र जी मुर्तियाँ पूजी जाने लगी। फिर चौबीस अवतारों की पूजा प्रारम्भ हुई।
फिर तो शिव परिवार, शिव अवतार, चण्डिका के अवतारों, विनायक गजानन और उनके अवतारों की मूर्तियाँ पूजी जाने लगी, शितला देवी भी पूजी जाने लगी।
इसलिए किसी अन्य स्थान पर मूर्ति पूजक यदि चाहें तो उनके लिए उपर्युक्तानुसार मण्डप में मण्डल पर उक्त देवों/ देवताओं की मूर्ति स्थापित कर उनके लिए भी ऐसा ही एक मन्दिर बना दिया जाए।

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

तमिल कवि तिरुक्कुरल रचियता दृविड़ सन्त आलावार तिरुवल्लुवर शुद्ध सनातन वैदिक धर्मी वैष्णव महाभागवत थे। न कि, जैन।

कुछ लोग तमिल कवि दृविड़ सन्त आलावार
तिरुवल्लुवर को उनके द्वारा रचित तिरुक्कुरल में सर्वप्रथम ऋग्वेद के अहिंसा सूक्त के दृष्टा ऋषि ऋषभदेव की स्तुति करने और अहिंसा को महत्व देने के आधार पर जैन घोषित करते हैं। जबकि तमिल कवि दृविड़ सन्त तिरुवल्लुवर शुद्ध वैदिक सनातन धर्मी वैष्णव महाभागवत थे।
इस बात को प्रमाणित करने के लिए निम्नलिखित तथ्य उपलब्ध हैं।⤵️
गृहस्थाश्रम का प्रशंसक, ईश्वर स्तुति करने वाला ईश्वर वादी युद्ध नीति की शिक्षा देने वाला, कृषि कर्म का प्रशंसक जैन कैसे हो सकता है?
रामानुजाचार्य जी द्वारा इन्हें आदर देते हुए आलवार सन्तों में मानना;
 और
नाथ मुनि द्वारा इसे नालयिर दिव्य प्रबन्धम् में अन्य आलवार सन्तों की रचनाओं के साथ सम्पादित करना भी इनका वैदिक धर्मी वैष्णव होना ही सिद्ध करता हैं।
तिरु अनन्तपुरम्
तिरुपति बालाजी 
ऐसे ही जहाँ कहीँ भी श्री वाचक तमिल शब्द तिरु आया है वहाँ सभी स्थानों पर वैष्णव परम्परा ही है।
श्रवणबेलगोला में या किसी भी जैसे तीर्थ या जैन सन्त के नाम में तिरु शब्द नहीं मिलता है।

 तिरुवल्लुवर ने श्रङ्गार शतक और नीति शतक के रचयिता भृतहरि के समान धर्म, अर्थ और काम पर तमिल भाषा में अर्थशास्त्र लिखा है।
ध्यान रखें वैदिक परम्परा में अर्थशास्त्र धर्म सूत्र (धर्मशास्त्र) का अङ्ग है।
मनुस्मृति और कौटिल्य अर्थशास्त्र में भी धर्म, अर्थ और काम तीनों का ही वर्णन है।

भृतहरि ने वैराग्य शतक भी रचा था। जो अर्थशास्त्र का विषय नहीं है। इसलिए इन्होंने छोड़ दिया।

ऋषभदेव स्वायम्भुव मनु-शतरूपा के पाँचवी पीढ़ी पर हुए।
स्वायम्भुव मनु-शतरूपा-> उत्तानपादासन और प्रियव्रत।
प्रियव्रत -> आग्नीध्र 
आग्नीध्र -> ऋषभदेव 
ऋषभदेव -> बाहुबली और भरत चक्रवर्ती जो बाद में जड़ भरत कहलाये।
स्वायम्भुव मनु-शतरूपा, ऋषभदेव और भरत चक्रवर्ती ने वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुसार वृद्धावस्था में संन्यास ग्रहण किया था। जबकि भरत चक्रवर्ती से परास्त होकर बाहुबली ने युवावस्था में ही संन्यास ले लिया और कर्नाटक में श्रमण बेलगोला में निवास किया था। इसलिए जैन लोगों उन्हें जैन घोषित कर दिया। और ऋग्वेद में अहिंसा सूक्त के दृष्टा होने से ऋषभदेव को अपना पहला तीर्थंकर घोषित कर दिया।
जब युरोपीय लोगों ने मोहनजोदड़ो और हड़प्पा में पद्मासनस्थ मूर्ति और तान्त्रिकों की लिङ्ग और योनि की मूर्ति देखी तो जैनों ने उसे जैन श्रमण संस्कृति घोषित कर दिया। इस हिसाब से तो सभी नाथ योगी जैन थे।

दृविड़ वेद (तमिल भाषा में नालयिर दिव्य प्रबन्धम्) क्या है?

दृविड़ तमिल लोगों के अनुसार भगवान में डूबे हुए बारह आलवार संतों द्वारा छठी से नौवीं सदी के बीच रचित नालयिर दिव्य प्रबंधम् नामक द्रविड़ वेद कुल चार हजार (4000) वैष्णव भक्ति के पद हैं। ये तमिल वैष्णव परंपरा का ग्रंथ-संग्रह है।
रामानुजाचार्य के अनुसार तमिल नालयिर दिव्य प्रबंधम् वेदों का सार है। संस्कृत वेद देवभाषा में हैं, जबकि नालयिर दिव्य प्रबंधम्द्र विड़ वेद तमिल भाषा होने से आम तमिल भाषी लोग भी समझ सकते हैं। दृविड़ तमिल लोग इसे सनातन वैदिक धर्म के वेदों के बराबर मानते हैं।
वे मानते हैं कि,
वेद ब्रह्म का ज्ञान देते हैं, द्रविड़ वेद ब्रह्म का प्रेम सिखाते हैं।
कभी-कभी तिरुक्कुरल (Tirukkural) को भी तमिल के नैतिक 'वेद' के रूप में संदर्भित किया जाता है, लेकिन 'द्रविड़ वेद' का सीधा संबंध आलवारों की भक्ति रचनाओं से है। 

नालयिर दिव्य प्रबंधम् का चार भागों में सम्पादन दसवीं शताब्दी में *नाथमुनि* ने किया।

1 मुदलायिरम् में 947 पद हैं। (तमिल इसे ऋग्वेद के समान मानते हैं।)
2 इरंडामायिरम् में 1134 हैं। तमिल इसे यजुर्वेद के समान मानते हैं।
3 मून्रामायिरम् में 593 पद हैं। तमिल इसे सामवेद के समान मानते हैं।
नम्मालवार की रचना तिरुवाय्मोली के 1102 पदों को तमिल लोग सामवेद के समान मानते हैं।
वेदांत देशिक ने कहा - "वेद में जो गूढ़ है, वो तिरुवाय्मोली में स्पष्ट है"।
4 नानकामायिरम् में 1326 पद हैं। तमिल इसे अथर्ववेद के समान मानते हैं।
रामानुज, वेदांत देशिक, मणवाल मामुनि ने इस पर भाष्य लिखे। 
इनमें नारायण और उनके अवतारों की भक्ति। श्रीरंगम, तिरुपति, कांची के मंदिरों का वर्णन। भगवान को नायक और भक्त को नायिका मानकर प्रेम के पद। आण्डाल की तिरुप्पावै मार्गशीर्ष महीने में रोज गाई जाती है।
तिरुपति, श्रीरंगम, मेलकोटे में रोज वेद पारायण के बाद *दिव्य प्रबंध पारायण* होता है।

नालयिर दिव्य प्रबंधम्द्र में मुख्य रूप से नम्मालवार तिरुवाय्मोली रचित 1352 पद । 
तिरुमंगई आलवार रचित 1361 पद ।
गोदादेवी के पिता पेरियालवार रचित 473 पद। 
एकमात्र महिला आललवार *आण्डाल* रचित तिरुप्पावै ।


किंचितकरम ट्रस्ट (Kinchitkaram Trust)
 संस्कृत और द्रविड़ वेदों का संरक्षण. अनुवाद, पुस्तकों का प्रकाशन कैलेंडर का प्रकाशन प्राचीन तमिल और संस्कृत टीकाओं का अंग्रेजी में अनुवाद करने का कार्य करता है

गुरुवार, 16 अप्रैल 2026

बाइबल

अ ब्राह्म , अब्राहम 
अत्रि-अनसुया के पुत्र चन्द्रमा पुत्र बुध, बुध और वैवस्वत मनु (श्राद्ध देव) की पुत्री इला के पुत्र *एल* पुरुरवा ही एल, इलाही, अल्लाह हैं जिन्हें बाइबल में (देवताओं में वरिष्ठ / महादेव का वाचक यह्व) से याहवेह कहा है। पुरुरवा और इराक के नगर उर की वासी, तिब्बत में स्थित अमरावती पुरी के ईशान कोण में स्थित इन्द्र सभा की नर्तकी उर्वशी (उर वासी) का पुत्र आयु ही आदम है। आ दम (दम मतलब प्राण)।‌
इन्द्र सभा से अवकाश लेकर उर्वशी ने पुरुरवा से अस्थाई काण्ट्रैक्ट मेरिज मुता निकाह किया।
 प्रसुति अवस्था में उर्वशी उर नगर चली गई थी। फिर आयु का फिडिंग समय पूर्ण होने पर पुरुरवा को सोप गई और इन्द्र सभा में जॉइन कर लिया।
आरामी भाषा में रचित तनख (बायबल ओल्ड टेस्टामेंट की पहली पुस्तक उत्पत्ति) के अनुसार यहोवा (एल पुरुरवा) ने आदम (आयु) को दक्षिण पूर्व टर्की के युफ्रेटिस घाँटि में ईलाझी शहर में अदन वाटिका में अकेले ही पाला था। उसके साथ स्वर्भानु की पुत्री प्रभांशी (या प्रभुचि) को रखा था जिसे वह हव्ययती कहता था।
सुरसा की सन्तान सर्प/नाग वंशी सीरिया वासी ने आयु (आदम) को पिता (एल पुरुरवा)के विरुद्ध भड़का कर उसकी आज्ञा के विरुद्ध बुद्धि वृक्ष का अधपका/ कच्चा फल तोड़ कर खा लिया। इस कारण वह स्वयम् भी अल्प बुद्धि का ही रहा। (और बेचारा एल याहवेह बुद्धिहीन/ मुर्ख ही रह गया ।😂 इस कारण) एल पुरुरवा ने आयु (आदम) को अदन वाटिका से निकाल दिया। आयु प्रभांशी / प्रभुचि (हव्ययती) की सलाह पर आर्मेनिया गया। फिर वहाँ से इराक, इरान होते हुए व्यापारिक जहाजियों के साथ से सिंहल द्वीप पहूँच गया। सिंहल द्वीप श्रीलंका में श्रीपाद पर्वत शिखर पर किसी श्रीमान पुरुष के चरण चिह्न बने हैं। वह श्रीलंकाई सनातनियों का तीर्थ स्थल था। उसे ही अब्राहमिक मतावलम्बी यहुदी, ईसाई, इस्लाम और बहाई पन्थ वाले आदम शिखर (एडम पिक) कहते हैं। और उनका तीर्थ मानते हैं।
श्रीलंका से केरल होता हुआ वापस टर्की पहूँचा। तब तक एल पुरुरवा बुढ़ा होने लगा था। इसलिए उसने भी आयु (आदम) को क्षमा कर दिया।
इसी आयु (आदम) और प्रभांशी / प्रभुचि (हव्ययती) का पुत्र नहुष (न्युहु) हुआ। नहुष का विवाह शंकर जी और पार्वती जी की पुत्री अशोक सुन्दरी से हुआ।
नहुष और अशोक सुन्दरी का पुत्र ययाति (अब्राहम) हुआ। 
ययाति (अब्राहम) की प्रथम पत्नी शुक्राचार्य जी की पुत्री देवयानी (सारेह) से यदु (यदुवंशियों के पूर्वज) और तुर्वसु हुए।
ययाति (अब्राहम) की दुसरी पत्नी वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा (हागार या हाजिरा) जो देवयानी (सारेह) की दासी थी के पुत्र पुरु (भारतीय चन्द्र वंशियों के पितामह), अनु और दृह्यु हुए।

बाइबल पुराना नियम (ओल्ड टेस्टामेंट) में अब्राहम की आर्मेनिया से इजराइल तक की यात्रा और संघर्ष, याहवेह का आज्ञाकारी भक्त होना। अब्राहम के पुत्र इसहाक जो किसी फरिश्ते से कुश्ती लड़ा इसलिए उसका नाम इज्राएल पड़ा। दासी हागार/ हाजिरा के पुत्र इस्माइल की बलि देने से याहवेह ने बचाया फिर इस्माइल का स्वेज (सिनाई) में बसना।
अब्राहम का वंश वर्णन, वंशजों की कथा है।
फिर न्युहु का जल प्रलय का वर्णन (शतपथ ब्राह्मण, मत्स्य पुराण, बाइबल) और इराक की प्राचीन कथाओं में भी वर्णित है। आगे न्युहु का वंश वर्णन है।
मुसा और जोसेफ की कथा, मिश्र की दासता से मुक्त होने हेतु इजराइलियों को एकत्र कर लाल सागर पार कर इजराइल में बसना। याहवेह द्वारा मुसा को दस कानून लिखित शिलालेख (टेन टेस्टामेंट) देना। उसके आधार पर यहुदा के नाम पर यहुदी पन्थ स्थापित करना।
फिर दाउद की भजन संहिता है, सुलेमान (सोलोमन) की कथा है।
बाइबल नया नियम में यीशु के जन्म से बारह वर्ष तक का वर्णन। फिर तीस से तैंतीस वर्षायु के बीच यहुदियों में मूल यहुदी पन्थ के सिद्धान्तों तथा मूल यहुदी पन्थ के सिद्धान्तों में बौद्ध मत के अनुसार सुधार करने का उपदेश देना। इससे नाराज यहुदी पुरोहितों ने रोमन ऑफिसर पिलातुस को शिकायत कर क्रुस पर बांधकर कीलें ठोंकने का दण्ड दिलवाना।
शुक्रवार को अपराह्न में यीशु को क्रुस पर टांगना और सूर्यास्त के पहले उतार कर कपड़े में लपेटकर गुफा में रखना।
जहाँ अनुयायियों ने उपचार कर ठीक कर दिया।
शनिवार को यीशु का दूर भाग जाना और रविवार को उपदेश दे कर वापस स्वर्ग (भारत के कश्मीर में लौट आना) का ग्रीक भाषा में वर्णन है।


बुधवार, 15 अप्रैल 2026

भुमध्य रेखा (इक्वेटर) अर्थात 00° अक्षांश, और प्राचीन काल में अवन्तिका पुरी से गुजरने वाली मध्याह्न रेखा (प्राइम मेरिडियन) थी जैसे वर्तमान में ग्रीनविच रेखा मध्याह्न रेखा (प्राइम मेरिडियन) है।

भुमध्य रेखा (इक्वेटर) अर्थात 00° अक्षांश, और प्राचीन काल में अवन्तिका पुरी से गुजरने वाली मध्याह्न रेखा (प्राइम मेरिडियन) थी जैसे वर्तमान में ग्रीनविच रेखा मध्याह्न रेखा (प्राइम मेरिडियन) है।


1 भूमध्य रेखा (Equator) पृथ्वी के बीचों-बीच 0° अक्षांश पर स्थित एक काल्पनिक रेखा है, जो पृथ्वी को उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध में विभाजित करती है। 
और


2 कर्क रेखा (Tropic of Cancer) उत्तरी गोलार्द्ध में भूमध्य रेखा (Equator) के समांतर 
 उत्तर में पश्चिम से पूर्व की ओर खींची गई एक काल्पनिक रेखा है।
ये दोनों समानांतर है।
इसलिए कभी क्रास नहीं हो सकती है।


3 ग्रीनविच रेखा (Prime Meridian) 
 देशांतर (longitude) पर स्थित एक काल्पनिक रेखा है, जो इंग्लैंड के लंदन में ग्रीनविच स्थित रॉयल ऑब्जर्वेटरी से होकर गुजरती है। यह दुनिया का मुख्य समय क्षेत्र (GMT) और अंतरराष्ट्रीय मानक समय निर्धारित करती है, जो पृथ्वी को पूर्वी और पश्चिमी गोलार्द्ध में बांटती है। 
प्राइम मेरिडियन (Prime Meridian) को हिंदी में प्रधान मध्याह्न रेखा या प्रधान याम्योत्तर कहा जाता है। यह 
 देशांतर (longitude) पर स्थित एक काल्पनिक रेखा है

4 ठीक ऐसे ही (ग्रीनविच नामक स्थान के समान ही) प्राचीन काल में उज्जैन से गुजरने वाली (Prime Meridian) 
 देशांतर (longitude) से दुनिया का मुख्य समय क्षेत्र अवन्तिका माध्य समय (AMT) और अंतरराष्ट्रीय मानक समय निर्धारित करती थी, जो पृथ्वी को पूर्वी और पश्चिमी गोलार्द्ध में बांटती थी। 

प्राचीन काल में उज्जैन से निकलने वाली देशान्तर रेखा 75:46 के मध्याह्न (मध्यम मध्याह्न) समय को ही विश्व का मानक समय मानकर अन्य देशों के मध्य से गुजरने वाली मध्याह्न रेखा के माध्यमिक मध्याह्न समय के अन्तर के आधार पर+ या - समयान्तर माना जाता था।
जैसे आजकल भारत की मध्याह्न रेखा ग्रीनविच (प्राइम मेरिडियन) रेखा से 82° 30' देशान्तर रेखा लिखते हैं। और ग्रीनविच माध्यमिक मध्याह्न से देशान्तर रेखा 
82° 30' का समयान्तर 05 घण्टे 30 मिनट लिखते हैं।
वैसे पहले उज्जैन से गुजरने वाली देशान्तर रेखा से करते थे। उस समय उज्जैन से गुजरने वाली देशान्तर रेखा को 00° देशान्तर रेखा कहते थे। जैसे आजकल पूर्व देशान्तर 75°46' कहते हैं।

5 अक्षांश रेखाएं परस्पर समानान्तर हैं। लेकिन देशान्तर रेखाएँ उत्तर ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव पर मिल जाती है इसलिए दो देशान्तर रेखाओं में भूमध्य रेखा पर सर्वाधिक दूरी 40,075 ÷ 360 = 111.319 किलोमीटर लगभग होती है। जबकि दोनों ध्रुवों पर शुन्य होती है।


6 दो अक्षांशों के बीच परस्पर दूरी --- पृथ्वी के अंडाकार (elliptical) आकार के कारण, भूमध्य रेखा पर अक्षांशों के बीच परस्पर दूरी थोड़ी कम (लगभग 110.57
 किमी) और ध्रुवों पर थोड़ी अधिक (लगभग-लगभग 111.7 किमी) होती है।

7 इक्वेटर (भू मध्य रेखा) और लाइन ऑफ केन्सर (कर्क रेखा) को उज्जैन से गुजरने वाली प्राचीन प्रधान याम्योत्तर मध्याह्न रेखा काटती है।
लेकिन भूमध्य रेखा (इक्वेटर) और कर्क रेखा (ट्रॉपिक ऑफ केन्सर) परस्पर समानान्तर होने से एक दुसरे को कभी नहीं काटती ।

उज्जैन से गुजरने वाली देशान्तर रेखापूर्व देशान्तर 75°46' कर्क रेखा को काटती है और भूमध्य रेखा को भी काटती है। 
गुजरने वाली देशान्तर रेखापूर्व देशान्तर 75°46' कर्क रेखा को काटती है और भूमध्य रेखा को जहाँ काटती उसी स्थान को लंकोदय कहते हैं। यहाँ आजकल कोई द्वीप नहीं है। पहले रहा होगा।

लेकिन भूमि पर वृत्त बनाने वाली भूमध्य रेखा और कर्क रेखा आपस में कभी नहीं मिलती। बल्कि भूमध्य रेखा और कर्क रेखा के बीच की सभी स्थानों पर दूरी लगभग 2,635 किलोमीटर ही रहती है।

8 नेताजी मेरिडियन और इक्वेटर का अलग-अलग अर्थ नही समझ पाये। और दोनों का अर्थ भूमध्य रेखा समझ बैठे। और 
 *कह गए कि, उज्जैन में भूमध्य रेखा और कर्क रेखा एक दूसरे को काटती है।*