सोमवार, 14 सितंबर 2026

प्रति वर्ष अधिकांश व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहारों एक दो दिन या एक माह का अन्तर क्यों आता है - इसका कारण और निवारण।

प्रति वर्ष अधिकांश व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहारों एक दो दिन या एक माह का अन्तर क्यों आता है - इसका कारण और निवारण।

1 गणितागत मतभेद ---
वेधशाला से प्राप्त आकड़ों (डेटा) पर आधारित वेधतुल्य पञ्चाङ्गो में भी दो मत हैं।

(क) *भारत में  प्रचलित नक्षत्रीय पद्यति पर आधारित निरयन सौर संक्रमण आधारित निरयन सौर मास और निरयन चन्द्रमा के आधार पर निरयन सौर-चान्द्रमासों वाले पञ्चाङ्ग। ये प्रायः लाहिरी अयनांश के आधार पर ही निकलते हैं। लेकिन कुछ शुद्ध चित्रा पक्षीय अयनांश के आधार पर भी निवलते हैं।*
*लाहिरी अयनांश और शुद्ध चित्रा पक्षीय अयनांश में 22 मार्च 285 ईस्वी को मात्र 03" विकला का अन्तर था जो वर्तमान में चित्रा तारे के निरन्तर विचलन के परिणाम स्वरूप लगभग 01' कला (अर्थात 60 विकला) से अधिक का अन्तर हो गया है। लेकिन भारतीय ज्योतिषी इसे नगण्य मानते हैं।*
(ख) उक्त दृग्तुल्य पञ्चाङ्गो के अतिरिक्त कुछ स्थानीय स्तर पर सूर्य सिद्धान्त के मकरन्द और ग्रह लाघव नामक करण ग्रन्थों पर आधारित स्थूल गणित वाले पञ्चाङ्ग भी प्रचलित हैं। जिनके निरयन सौर संक्रमण, और निरयन चन्द्रमा तथा निरयन ग्रहों की स्थिति प्रायः गलत ही होती है। परिणाम स्वरूप सूर्य के निरयन संक्रमण का समय तथा तिथि और  चन्द्रमा के नक्षत्र का प्रारम्भ और समाप्ति का समय भी गलत ही रहता है। गुरु बृहस्पति एवम् शुक्र का अस्त और उदय का दिन और समय भी गलत ही रहता है। इसलिए व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार भी प्रायः गलत ही रहते हैं। कई बार अधिक मास भी गलत ही बतलाइए थे।
लेकिन ग्रहगणित ज्योतिष (सिद्धान्त ज्योतिष अर्थात एस्ट्रोनॉमी) का ज्ञान नहीं होने के कारण मन्दिरों के पुजारियों का समर्थन इन परम्परागत पञ्चाङ्ग को अभी तक प्रचलन में बनाए हुए हैं।
(ग) ऐसे ही गुजरात में किसी अन्य करण ग्रन्थ के आधार पर पञ्चाङ्ग निकलते हैं
पहले महाराष्ट्र में लोकमान्य बालगङ्गाधर तिळेक के गणित के आधार पर श्री मोरोपन्त छत्रे, लगभग 04° अंश कम वाला झीटापक्षीय अयनांश पर पञ्चाङ्ग निकालते थे। जो कभी भी लोकप्रचलित नहीं हो पाया। इसकी वर्तमान स्थिति ज्ञात नहीं है।

*पञ्चाङ्गो में उक्त गणितीय त्रुटि के अलावा धर्मशास्त्रिय मत भिन्नता महत्वपूर्ण कारण है।
इसे समझने के लिए कुछ पारिभाषिक शब्दावली और कुछ तथ्यों का ज्ञान आवश्यक है।*

*निरयन सौर मास - अर्थात जिस निरयन राशि में सूर्य स्थित हो उसे सौर माह कहते हैं।
चन्द्रमा जिस नक्षत्र में स्थित हो उसे नक्षत्र कहते हैं।*
*चान्द्र सौर मास जिसे प्रायः चान्द्रमास ही लिख देते हैं - अमावस्या समाप्ति समय से अमावस्या समाप्ति समय तक अमान्त चान्द्रसौर मास (अंग्रेजी में लूनी-सोलर मन्थ) या चान्द्र मास या अमान्त मास कहलाता है।*
*पूर्णिमा समाप्ति समय से पूर्णिमा समाप्ति समय तक पूर्णिमान्त मास कहलाता है।*

*सूर्य से चन्द्रमा की प्रत्येक बारह अंश (डिग्री) का अन्तर तिथि कहलाती है।*
और
*दो सूर्योदय के बीच का समय वार कहलाता है। अर्थात वार सूर्योदय से बदलता है।*  (न कि, ब्रह्म मुहूर्त या मध्यरात्रि से।)
*ऐसे ही सूर्योदय पश्चात छः घटि अर्थात 02 घण्टे 24 मिनट अर्थात तीन मुहूर्त तक जो तिथि रहे वह शाकल्यपादिता तिथि कहलाती है। और बहुत से धार्मिक कार्यों, व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार आदि में उक्त शाकल्यपादिता तिथि को पूरे दिन-रात वही तिथि है ऐसा मान लिया जाता है। कुछ प्रकरणों में 04 घण्टे 48 मिनट अर्थात छः मुहूर्त व्यापिनी तिथि को पूरे दिन माना जाता है।*
*कुछ व्रत सूर्योदय के समय जो तिथि रहती है उस सूर्योदय व्यापिनी  तिथि के अनुसार इस लिए मनाए जाते हैं क्योंकि उन व्रत पर्व में मुख्य पूजा सूर्योदय के समय ही होती है। अर्थात उन व्रत पर्वों का पर्वकाल ही सूर्योदय का समय होता है।* *लेकिन यह नियम सभी व्रत पर्व, उत्सव और त्यौहारों में इसलिए लागू नहीं होता है क्योंकि, सभी व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहारों का पर्वकाल अलग-अलग होता है।*
*कोई प्रातः काल व्यापिनी तिथि में मनाते हैं तो कुछ पूर्वाह्न व्यापिनी तिथि में मनाते हैं, तो कोई मध्याह्न काल व्यापिनी तिथि में मनाते हैं तो कुछ अपराह्न काल व्यापिनी तिथि में मनाते हैं। कोई सूर्यास्त कालीन तिथि में मनाते हैं तो कुछ  प्रदोषकाल व्यापिनी तिथि में मनाते हैं तो कुछ पूर्व रात्रि व्यापिनी तिथि में मनाते हैं। कुछ मध्यरात्रि कालीन तिथि में मनाते हैं तो कुछ महानिशिथ काल व्यापिनी तिथि में मनाते हैं। कुछ तो उत्तर रात्रि कालीन तिथि में तो कुछ अरुणोदय कालीन व्यापिनी तिथि अर्थात ब्रह्म मुहूर्त मे जो तिथि हो उसमें मनाते हैं। तो कुछ चन्द्रोदय कालीन तिथि में मनाते हैं। ये सब पर्वकाल कहलाते हैं।*
*पर्वकाल के विषय में भी पौराणिक साहित्य में मतभेद के कारण धर्मशास्त्र पर निबन्धकारों ने अलग-अलग मत व्यक्त किए हैं। यह बहुत गहन विषय है।*

*इसके अलावा दक्षिण भारत में निरयन सौर मास में चन्द्रमा का नक्षत्र के आधार पर व्रत, पर्व उत्सव और त्यौहार मनाये जाते हैं वहाँ सौर- चान्द्रमास (लूनी-सोलर मन्थ) का उपयोग न के बराबर बहुत कम होता है। इसलिए तिथियाँ भी लगभग अप्रचलित है।*
*जैसे निरयन मेष राशि के सूर्य में अर्थात मेष मास में पुनर्वसु नक्षत्र में श्रीराम जयन्ती मनाते हैं और  निरयन सिंह राशि के सूर्य (सिंह मास) में रोहिणी नक्षत्र में श्रीकृष्ण जयन्ती मनाते हैं। और निरयन सिंह राशि के सूर्य (सिंह मास) में श्रवण नक्षत्र में वामन जयन्ती ओणम नाम से मनाते हैं। 
फिर उसमें भी आचार्यों के सम्प्रदाय के अनुसार मतभेद हैं जैसे कुछ सूर्योदय कालीन चन्द्र नक्षत्र देखकर व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार मनाते हैं तो कुछ पूर्वकालीन चन्द्र नक्षत्र के अनुसार व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार मनाते हैं।*
*यह मतभेद उत्तर भारत में भी वैष्णव सम्प्रदायों में प्रचलित है। उत्तर भारत में भी कुछ सूर्योदय कालीन (उदिया) तिथि के अनुसार व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार मनाते हैं तो विष्णु, देवी शंकर, सूर्य और गणपति पाँचो देवों को पूजने वाले स्मार्त मतावलम्बी पूर्वकालीन तिथि के अनुसार व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार मनाते हैं।*
*सौर-चान्द्रमासों में तिथि के साथ-साथ पर्वकाल में चन्द्रमा के नक्षत्र के अनुसार देवी पूजा विधान है जैसे महाराष्ट्र में ज्येष्ठा गौरी व्रत में भाद्रपद शुक्ल षष्ठी तिथि में अनुराधा नक्षत्र में आह्वान, भाद्रपद शुक्ल सप्तमी तिथि में ज्येष्ठा नक्षत्र में पूजन, भाद्रपद शुक्ल अष्टमी तिथि में मूल नक्षत्र में विसर्जन करते हैं और बङ्गाल में नवरात्र में आश्विन शुक्ल सप्तमी तिथि में मूल नक्षत्र में सरस्वती देवी का आह्वान, आश्विन शुक्ल अष्टमी तिथि में पूर्वाषाढ़ नक्षत्र में सरस्वती देवी का पूजन, आश्विन शुक्ल नवमी तिथि में उत्तराषाढ़ नक्षत्र में सरस्वती देवी को बलिदान, तथा आश्विन शुक्ल दशमी तिथि में श्रवण नक्षत्र में सरस्वती देवी का विसर्जन होता है।
इतने सारे तथ्यों को पञ्चाङ्गकार ध्यान में रखकर धर्मशास्त्रियों से चर्चा कर अपनी पञ्चाङ्ग में व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार बतलाते हैं।*

*अथर्ववेदोक्त दिन और रात के मुहूर्त तथा प्रातःकाल, मध्याह्न, मध्याह्न काल सन्ध्या काल, प्रदोषकाल, महानिशिथ काल जैसे विषयों पर प्रथक आलेख देखना चाहिए।*

*सनातन वैदिक धर्मियों के सभी व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार चूंकि सिद्धान्त ज्योतिष अर्थात एस्ट्रोनॉमी पर आधारित हैं और वेधशालाएँ भारत शासन के अधीन हैं इसलिए भारत शासन को चाहिए कि पूरे भारत वर्ष के लिए संस्कृत, हिन्दी और सांवैधानिक मान्यता प्राप्त सभी प्रादेशिक भाषाओं में अगले वर्ष के लिए ऑनलाइन पञ्चाङ्ग, ऑफलाइन पञ्चाङ्ग और पुस्तकाकार पञ्चाङ्ग छापकर जन साधारण के लिए सस्ते मुल्य पर उपलब्ध करवाए।*  जिसमें 
 *विषुव सम्पात से गणना आरम्भ कर औसत सुर्योदय समय भारतीय मानक समय 06:00 बजे  के लिए* ---* 

 *वेदिक सायन सौर मास के गते अनुसार*

 *सायन प्रधियों (राशियों) में सूर्य चन्द्रमा एवम् सभी ग्रहों और पात (राहु-केतु) के सायन भोगांश, शर और क्रान्ति,विशुवांश आदि का ज्योतिष पत्रक (इफेमेरीज़/ अल्मनाक) की सारणी हो।* 

*वेदिक 12 मासों की आरम्भ की सायन संक्रान्तियाँ तथा सायन प्रधियों (राशियों) में सुर्य, चन्द्रमा, ग्रहों और पातों के प्रवेश का समय भिन्न रंग के गाढ़े अक्षरों में दर्शानें वाली सारणी भी प्रथक से दी जाये।*

 *वास्तविक भोगांश वाले वेदिक 27 नक्षत्रों  में सुर्य, चन्द्रमा, सभी ग्रहों एवम् पातों के प्रवेश का समयकी सारणी दी जाये।*

*(1)  सायन संक्रान्ति  गते, (2) सूर्योदय समय का वेदिक सायन सौर मास गतांश का समाप्ति समय, (3) के साथ दशाह के वासर, (4) निरयन सौर मास संक्रमण गतांश समाप्ति समय, (5) निरयन सौर मास गते, (6) सायन सौर संक्रान्ति आधारित चान्द्र मास और निरयन सौर संक्रमण आधारित चैत्र वैशाख आदि चान्द्रमास के नाम सहित शुक्लपक्ष में 01 से 120 तक चन्द्र कलाओं का समाप्ति समय जिसमें   01 से 30 तक तिथी समाप्ति का समय, स्पष्ट दिखाने के लिए बोल्ड अक्षरों में दर्शाया जाए।* 
और 
*(7) सूर्य और चन्द्रमा के सायन भोगांशादि के योग से निर्मित योग का समाप्ति समय, (8)  शुद्ध चान्द्र मास के अमावस्या गते , (9) चन्द्र दर्शन गते, (10) ग्रेगोरियन केलेण्डर के दिनांक, और (11) सप्ताह के वार दर्शक सारणी हो।*

*सामने वाले पृष्ठ पर अलग से सारणियों में*

 *वेदिक सायन संवत्सर, वेदिक उत्तरायण (पौराणिक उत्तर गोल)/ वेदिक दक्षिणायन (पौराणिक दक्षिण गोल), उत्तर तोयन (पौराणिक दक्षिणायन) / दक्षिण तोयन (पौराणिक उत्तरायण), वेदिक ऋतु / पौराणिक ऋतु , वेदिक सायन सौर मास / पौराणिक सायन सौर मास , निरयन सौर मास, सायन सौर संक्रान्तियों पर आधारित चान्द्र मास, निरयन सौर संक्रमण आधारित चैत्र वैशाख आदि चान्द्र मास का प्रारम्भ का समय सहित वास्तविक व्यतिपात और वैधृतिपात प्रारम्भ और अन्त का समय दर्शाया जाए।*
इसके अलावा *सम्प्रदायों के मतानुसार व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार दर्शाये जाए।* 

 *साथ ही प्रथक प्रथक सारणियों में भी* 

 *वेदिक सायन कलियुग संवत्सर प्रारम्भ समय,सायन सौर संक्रान्तियों पर आधारित चान्द्र संवत को युग संवत्सर (के नाम से) प्रारम्भ का समय सायन सौर संक्रान्तियों पर आधारित चान्द्र मासों का प्रारम्भ समय दर्शाया जाए।*

 *युधिष्ठिर  निरयन सौर संवत्सर एवम् निरयन सौर विक्रम संवत्सर का प्रारम्भ समय, निरयन सौर मास आरम्भ समय दर्शाया जाए* 

 *निरयन सौर संक्रमण आधारित चान्द्र संवत्सर शकाब्द का प्रारम्भ समय* 
 *निरयन सौर संक्रमण आधारित चैत्र वैशाख आदि चान्द्र मास के प्रारम्भ का समय दर्शाया जाए।* 

 *वास्तविक व्यतिपात वैधृतिपात प्रारम्भ और अन्त का समय दर्शाया जाए।* 
 *श्रोत्रिय (वेदिक), स्मार्त, पौराणिक, और  प्रत्यैक मत, सम्प्रदाय और पन्थ के आधार पर उन मत, सम्प्रदाय और पन्थ के नाम सहित प्रारम्भ और अन्त के समय सहित दर्शाया जाए।*

 *जिसमें अधिकांश व्रत पर्व, उत्सव और त्योहारों के संक्रान्ति वर्तमान अंश या संक्रान्ति गतांश या संक्रान्ति गते को आधार बनाया जाए।*
 *केवल महाशिवरात्रि को व्याघ तारा रातभर दिखना चाहिए इसलिए इसे नाक्षत्रीय पद्यति पर आश्रित निरयन सौर धनु मास के २०°१३'१३" वर्तमानांश या गतांश हो उस रात में दर्शाया जाए।* 
 *होली, जन्माष्टमी, दिवाली जैसे जो व्रत पर्व, उत्सव और त्योहार में ऋतु विशेष दर्शाई जाती है; लेकिन एकाष्टका, पूर्णिमा, अष्टका या अमावस्या का भी महत्व है उन व्रत पर्व, उत्सव और त्योहारों को सायन सौर संक्रान्ति आधारित चान्द्रमासों की एकाष्टका पूर्णिमा, तिथि अष्टका या अमावस्या के दिन दर्शाया जाए।*

*जहाँ सौर मास और चन्द्रमा के नक्षत्र से व्रत, पर्व, उत्सव और त्योहार मनाते हैं जैसे बङ्गाल में नवरात्र में मूल नक्षत्र से श्रवण नक्षत्र तक में सरस्वती आव्हान, पूजन, बलिदान, विसर्जन आदि और महाराष्ट्र में ज्येष्ठा आव्हान, पूजन, बलिदान, विसर्जन आदि ज्येष्ठा आदि नक्षत्र में तथा तमिलनाडु में ओणम को सौर सिंह मास में श्रवण नक्षत्र और असमान भोगांश वाले सत्ताइस नक्षत्र के आधार पर सम्बन्धित नक्षत्र के अनुसार दर्शाया जाए।*

साथ ही *महामहोपाध्याय पं. श्रीकृष्णदत्त जी शास्त्री रचित स्मार्त कर्मकलाप या  गृहस्थ कर्मकलाप का आधार लेकर वैदिक संहिताओं, ब्राह्मण ग्रन्थों, शुल्ब सूत्रों, श्रोत सूत्रों, गृह्य सूत्रों, धर्म सूत्रों और पूर्व मीमांसा ग्रन्थ के आधार पर पर्वकाल सहित वैदिक कर्मकाण्ड के लिए विधि-विधान और निषेधाज्ञाओं के आधार पर वैदिक कर्मकलाप ग्रन्थ तैयार किया जाए। जिसे केवल लागत मूल्य पर प्रकाशित कर जन साधारण हेतु सुलभ करवाया जाए। और इसका ऑनलाइन और ऑफ लाइन संस्करण भी उपलब्ध कराया जाए।*

सोमवार, 7 सितंबर 2026

भगवान श्रीरामचन्द्र क लिए नल द्वारा तैयार किया गया राम सेतु केरल के कन्नुर से लक्ष्यद्वीप के किल्तान द्वीप तक 296 कि.मी का वास्तविक रामसेतु।

एक बार वाल्मीकि रामायण अवश्य पढ़ें।
हो सके तो भारत का नक्शा साथ में रखना।
तो पता चलेगा कि, 
1 सुग्रीव जी ने सीता खोजी दल को पाण्ड्य देश में प्रवेश करने से ही इन्कार कर रखा था। इसलिए दक्षिण दिशा में  सीता खोजी दल ने कभी तमिलनाडु में प्रवेश ही नहीं किया।
और  सुग्रीव जी श्री रामचन्द्र जी और लक्ष्मण जी को कभी तमिलनाडु लेकर कभी नहीं गये।
2 अङ्गद, जामवन्त जी, हनुमानजी आदि सहित दक्षिण में सीत खोजी दल ने विंध्याचल  से सीता जी की खोज प्रारम्भ की। और वसन्त ऋतु प्रारम्भ होने तक वे विन्ध्याचल के दक्षिण पश्चिमी सिरे तक पहूँच गए थे जहाँ से एक ओर (दक्षिण में) प्रसवण गिरी दिख रहा था, निकट ही पश्चिम में समुद्र था। जिसके पानी में भीगे हुए पङ्ख और परागकण चिपके (चकवा) पक्षी स्वयम्प्रभा की गुफा से निकल रहे थे। उस गुफा में प्रवेश कर वह दल दूसरी ओर सागर तट पर एक शिखर पर पहूँचा। अर्थात खम्बात की खाड़ी के पूर्वी तट पर भरुच पहूँचे; जहाँ उन्हें जटायु जी के भाई सम्पाति मिले और उन्होंने वहाँ से लगभग 1287 किलोमीटर (सौ योजन) दूर दक्षिण दिशा में रावण की लङ्का (लक्ष्यद्वीप के किल्तान द्वीप) में अशोक वाटिका में सीता जी को बैठे देखा। और सीता खोजी दल को बतलाया।
श्री हनुमानजी ने वहीं से सौ योजन की छलाङ्ग लगाकर समुद्र पार किया था। मतलब बीच में कोई भू भाग नहीं था, अन्यथा वे दोड़़ते हुए भी जा सकते थे।
3 लौटते समय हनुमान जी उसी मार्ग से न लौटकर सीधे कर्नाटक के हम्पी में सुग्रीव की राजधानी पहूंचे मतलब वे पश्चिम घाट पर होते हुए हम्पी पहूँचे और वानर दल खम्बात के भरुच से सीधे पश्चिम घाट होते हुए कर्नाटक के हम्पी पहूँचे।

4 शरद ऋतु के प्रारम्भ में सुग्रीव जी की सेना सहित श्री रामचन्द्र जी और लक्ष्मण जी कर्नाटक के हम्पी से पश्चिम घाट (सह्याद्रि पर्वत) पर चलते हुए कर्नाटक सीमा और केरल सीमा के मिलन स्थल सह्य और मलय पर्वत के मिलन स्थल कोझीकोड होते हुए  कन्नूर पहूँचे। जहाँ श्री रामचन्द्र जी ने इजीमाला पर्वत के महेन्द्र शिखर पर चढ़कर पश्चिम सागर (अरब सागर) देखा।
कन्नूर में ही डेरा डालकर वहीँ से पाँच दिन में  296 किलोमीटर का सेतु बना कर लक्ष्यद्वीप के किल्तान द्वीप पर पहूँचे।
पहले दिन 14 योजन सेतु बना। दुसरे दिन 6 योजन और बना कर कुल बीस योजन सेतु बना। तीसरे चौथे और पाँचवें दिन एक एक एक योजन सेतु बढ़ा कर तीसरे दिन कुल 21 योज का सेतु बना।
चौथे दिन कुल 22 योजन सेतु बना। और पाँचवे दिन कुल 23 योजन सेतु बना। अर्थात 23×12.87= 296 किलोमीटर का सेतु बना।
जिसे प्रोग्रेसिव टोटल जोड़कर सौ योजन कहा गया। 14+20+21+22+23= 100 योजन लिख दिया। जबकि उथले समुद्र में पहले दिन 14 योजन सेतु बना, दुसरे दिन सेतु 14 से 20 योजन हुआ, तीसरे दिन से गहराई बढ़ने के कारण एक-एक योजन ही बढ़ा और तीसरे दिन 20 से 21 दिन हुआ । चौथे दिन 21 से 22 योजन हुआ और पाँचवे दिन बचा हुआ सेतु एक योजन बढ़ा कर 22 से कुल 23 योजन का सेतु बना लिया।
इसी प्रकार 100 योजन विस्तार वाली लङ्का पुरी का मतलब है रावण की लङ्का का क्षेत्रफल 100 वर्ग योजन था। (अर्थात लगभग 10 योजन लम्बी और 10 योजन चौड़ी = 100 वर्ग योजन था।) अर्थात 128.7×187.7 = 16563.69 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल था।।

नासा ने केवल इतना कहा था कि, धनुषकोडी से श्रीलंका के बीच मन्नार की खाड़ी में एडम ब्रिज (सिंहल द्वीप से भारत मे आने के लिए आदम के द्वारा उपयोग किया गया सेतु) प्राकृतिक संरचना नहीं लगता है। मानव निर्मित संरचना लगती है।
आई टी सेल द्वारा प्रसारित झूठी अफवाह के कारण में गीता प्रेस ने कल्याण में एक लेख छपा था। बाद में नासा का स्पष्टीकरण प्राप्त हुआ तो सम्पादक श्री राधेश्याम खेमका जी ने खेद प्रकट कर पाठकों से क्षमा प्रार्थना की।

शनिवार, 5 सितंबर 2026

मन्त्र सिद्धि

वास्तविकता यह है कि, किसी भी देवता के किसी भी मन्त्र की सिद्धि के लिए सर्वप्रथम उस देवता के वैदिक मन्त्र दृष्टा से दीक्षा लेकर उनके आदेशानुसार अमावस्या से अमावस्या पर्यन्त या पूर्णिमा से पूर्णिमा तक कृच्छ चान्द्रायण व्रत करके अपनी व्यक्तिगत समस्त धन-सम्पदा दान करके, ग्राम/ नगर के मध्य खड़ा होकर अपने द्वारा किए गए समस्त मानसिक, वाचिक और शारीरिक अपराध अर्थात पापों को सार्वजनिक रूप से प्रकट कर स्वीकार कर क्षमा प्रार्थना करना होता है।
फिर गुरु के निर्देशानुसार किसी तपोस्थली पर बैठ कर नैष्टिक ब्रह्मचर्य पालन करते हुए नित्य पञ्च महायज्ञ करते हुए जीवन निर्वाह हेतु अत्यावश्यक केवल फल आदि सात्विक आहार लेते हुए पहले उस देवता के कमसे कम दस लाख मन्त्र जप करें या पुरुश्चरण पूर्ण कर जप किए गए मन्त संख्या का दशांश आहुति देकर अग्निहोत्र करें, फिर जप किए गए मन्त्र संख्या का शतांश तर्पण करें, फिर जप किए गए मन्त्र संख्या का सहस्त्रांश श्राद्ध करें , फिर जप किए गए मन्त्र संख्या का दश सहस्त्रांश ब्राह्मण भोजन कराकर उन्हें समुचित दक्षिणा प्रदान करें। उन्हें सौ कदम छोड़ने जाकर कमी के लिए क्षमा प्रार्थना कर आशिर्वाद लें।
उसके बाद गुरु के आदेश पर उस देवता के पौराणिक मन्त्र का निर्धारित संख्या में जप, होम, तर्पण, श्राद्ध, और ब्राह्मण भोजन करवा कर वैदिक मन्त्र जप में रह गई कमी की पूर्णता कर मन्त्र को पुष्ट करें।
फिर गुरुजनों को प्रणाम कर उनसे बीज मन्त्र सीखकर उसका जप कर देवता को प्रकट प्रणाम पूजा आदि कर उस देवता द्वारा प्रदत्त शक्ति को धारण कर लें।
इसके बाद वैदिक मन्त्र, पौराणिक मन्त्र और बीज मन्त्र का एक हजार जप रोज करता हुआ सायन सौर संक्रान्ति , निरयन सौर संक्रमण, शुक्ल पक्ष की अष्टमी, पूर्णिमा, कृष्ण पक्ष की अष्टमी और अमावस्या को वैदिक मन्त्र के साथ 108 आहुति देकर पौराणिक मन्त्र जप कर एकसौ आठ बार बीज मन्त्र पढ़कर देवता को प्रकट कर उनकी सेवा पूजा कर कृपा प्राप्त कर पुष्टि करता रहे।
जब भी सार्वजनिक हित में अत्यावश्यक हो
बीज मन्त्र का उच्चारण कर जल छिड़क कर आये सङ्कट से मुक्ति दिला सकता है।
या किसी भी धुल या तिनके आदि किसी भी वस्तु को अभिमन्त्रित कर फैंक कर शत्रु पर प्रहार कर उसे यथोचित दण्ड दे सकता है।
केवल बीज मन्त्र का जप नहीं होता है।

शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

शिवलिङ्ग पर मुखाकृति बनाना शैव और पाशुपत आगम के विरुद्ध है।

सारस्वत (सिन्धु घाटी की) सभ्यता के समय इराक और सीरिया से आकर बसे तान्त्रिक व्यापारियों द्वारा मोहन जोदड़ो में उनके घरों में छुपकर लिङ्ग और योनि के प्रतिक और ध्यान मुद्रा में बैठे पशुपालक (पशुपति) की प्रतिमाएँ बनाकर पूजना प्रारम्भ कर दिया था।
वैदिक लोग इनका विरोध करते थे।
फिर 
लगभग 345 ईसा पूर्व से 329 ईसापूर्व में महापद्मनन्द राजा के समय शालिग्राम शिला विष्णु लिङ्ग, जलाधारी में फिट बेलनाकार शिवलिङ्, मातृलिङ्ग बिजोरा निम्बू, बेडोल चौड़ा चिकना पत्थर का विनायक लिङ्ग, और त्रिकोणीय पत्थर का भैरव लिङ्ग तो प्रचलित होने लगे थे।
उसी समय जैनों ने चैत्य (मन्दिर) बनाकर ऋषभदेव की मूर्ति बनाकर पूजा प्रारम्भ कर दी थी।
लेकिन किसी भी लिङ्ग अर्थात चिह्न पर आँख-नाक और चेहरा बनाना प्रचलित नहीं था। सम्भवतः कुछ शैवों ने ऐसा प्रयोग किया होगा तो शैव आगम, पाशुपत आगम में इसे निषिद्ध घोषित कर दिया।
लेकिन आजकल तो उज्जैन के महाकालेश्वर मन्दिर में महाकाल ज्योतिर्लिङ्ग पर भाँग आदि से चेहरा बना कर निषेधाज्ञाओं का उलङ्घन तो किया ही; बल्कि शिवलिङ्ग पर कभी अर्धनारीश्वर तो नारायण-श्रीहरि, तो कभी विनायक की मुखाकृति बनाना प्रारम्भ कर दिया। जो आगम ग्रन्थों की आज्ञाओं का सर्वथा उलङ्घन है।
ऐसे ही इसके देख-देखी सिन्दूर पुती विनायक प्रतिमों और भैरव प्रतिमाओं पर भी चेहरा बनाना प्रारम्भ हो गया है। ये सभी आगमोक्त निषिद्ध कर्म हैं।

गुरुवार, 13 अगस्त 2026

मेकाले के मानस पुत्रों का षड़यंत्र।

इन अंग्रेजी में सोचने वाले मेकाले पुत्रों को भारत देश और राष्ट्र नहीं दिखता है, अमेरिका और रूस जैसा केवल एक राजनीतिक गठबन्धन ही लगता है। या अमेरिका और चीन जैसा क्षेत्रों को हड़प कर बना एक राष्ट्र लगता है।
यदि सुत्त पिटक पढ़ो तो पता लगता है कि, सिद्धार्थ गोतम बुद्ध स्वयम् वेदों और ब्राह्मणों का अत्यधिक आदर करते थे।
चार सौ साल बाद श्रीलंकाई और तत्कालीन ब्रह्म देश म्यांमार के बौद्धों द्वारा संचालित अभिधम्मपिटक में वेद विरुद्ध मत और ब्राह्मण विरोधी मत घुसाए गए।
भगवान श्रीकृष्ण के चचेरे भाई अरिष्टनेमी जो जैनियों के तीर्थंकर हैं तक अष्टाङ्ग योग साधना और सांख्य दर्शन जैसे वेदों के प्रति आसक्ति दर्शन के ही अनुयाई थे।
गुरु ग्रन्थ साहिब में अधिकांश पद कबीरदास जी रचित हैं। और वेदों और ब्राह्मणों के प्रति अतिशय आदर दर्शाया गया है। गुरु नानक देव के पुत्र चन्द्र देव ने उदासीन अखाड़ा की स्थापना की थी, और उदासीन अखाड़ा के साधु सन्त अमृतसर हरि मन्दिर साहिब में यज्ञ-हवन, पूजा-पाठ और योग साधना करते थे।
वह तो अंग्रेजो ने मास्टर ताराचंद जैसे अपने अनुयायियों के माध्यम से खालसा पन्थ के अनुयायियों को सनातन धर्म से अलग हो कर अल्पसंख्यक कहलाने के लाभ बतलाये और भड़काया।
भगवान श्री कृष्ण के सबसे अधिक भक्त और मन्दिर दक्षिण भारत में तमिलनाडु, केरल, आन्ध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में हैं।
भगवान श्री रामचन्द्र जी के वन गमन सम्बन्धित महत्वपूर्ण तीर्थ महाराष्ट्र, कर्नाटक और केरल में है।
महेन्द्र पर्वत के आस-पास भगवान परशुराम जी के द्वारा स्थापित परशुरामेश्वरम मन्दीर केरल में गुरुवायुर, कोझिकोड और कण्णुर क्षेत्र में है। वहाँ श्रीकृष्ण भक्त भी हैं।
उसके बाद सर्वाधिक श्रीकृष्ण भक्त बङ्गाल और उड़ीसा में है।
सौर सम्प्रदाय के मन्दिर गुजरात और उड़ीसा में हैं।
पुरे भारत का प्रत्येक सम्प्रदाय वेदों को सर्वोच्च प्रमाण मानता है।
यह सब मेकाले के मानस पुत्रों को नहीं दिखता।
पूरे विश्व में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर भाषा बदल जाती है। फिर भी भारत में संस्कृत मूल और तमिल मूल की भाषाएँ ही प्रचलित है।
ऐसे ही पूरे विश्व में भौगोलिक परिस्थितियों के अनुकूल पहनावा, वेश-भूषा भी बदलती है। लेकिन मेकाले के मानस पुत्र भाषा भेद और भुषा भेद ही दर्शाकर भारत को विभिन्न संस्कृतियों का गठबंधन सिद्ध करते रहते हैं। और अनेकता में एकता बतला कर भारतियों की प्रशंसा बटोरने में सफल हो जाते हैं।
जबकि छद्म रूप से वे भारत को विभिन्न टुकड़ों में बँटा हुआ सिद्ध करते हैं।

बुधवार, 12 अगस्त 2026

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी से मेरे मतभेद।

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी से मेरे मतभेद -
1 आर्य समाजी ॐ को देवनागरी में जैसा लिखा जाता है वैसा ही पढ़ा जाता है के आधार पर ओ३म् लिखते हैं। जबकि मैं ॐ ही लिखता हूँ।

2 महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी देव, देवता, सिद्ध, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर , नाग,असुर, दैत्य, दानव, राक्षस आदि योनि नहीं मानते थे। देवलोक, पाताल, नर्क आदि भी नहीं मानते थे।
लेकिन मैं मानता हूँ।
3 महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी राम कृष्ण आदि को केवल महा पुरुष मानते थे। मैं उर्ध्व लोक के सिद्ध पुरुषों को ऋत के नियमों के अनुसार निर्धारित कार्य पूर्ण करने के लिए जन्मे अलोकिक व्यक्ति मानता हूँ।

4 महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ईश्वर, जीव और प्रकृति को अनादि मानते थे।
 त्रेतवादी थे। जीवों की संख्या अनन्त लेकिन निश्चित मानते थे।
ईश्वर की प्रेरणा से गुण साम्यावस्था वाली प्रकृति में विक्षोभ होने से सत्व, रज और तमोगुण प्रकट हुए।
इन्हीं से जगत और जीवों की देह बनी।


वैदिक अभेदवादी मैं परमात्मा का ही लीला में सर्वरूपों में प्रकटीकरण मानता हूँ।
परमात्मा के विश्वात्मा ॐ सङ्कल्प से परमात्मा प्रज्ञात्मा परब्रह्म परमेश्वर परम दिव्य पुरुष विष्णु और परा प्रकृति माया के रूप में प्रकट होकर स्वयम् ही प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) ब्रह्म पुरुष प्रभविष्णु (सवितृ) और प्रकृति श्री लक्ष्मी ( सावित्री) के स्वरूप में प्रकट होकर जीवात्मा अपर ब्रह्म नारायण जीव श्री हरि और नारायणी परा प्रकृति कमला (पद्मा) के स्वरूप में प्रकट होते हैं और अपः तत्व की सृष्टि करते हैं। फिर भूतात्मा वाणी हिरण्यगर्भ ब्रह्मा प्राण (चेतना या देही) त्वष्टा और धारयित्व (धृति या अवस्था) रचना के स्वरूप में प्रकट होते हैं तथा त्वष्टा ने सृष्टि के ब्रह्माण्डो के भुवनों के सूर्य और ग्रह आदि की रचना करते हैं। फिर वाणी हिरण्यगर्भ सनक, सनन्दन, सनत्कुमार, सनातन और नारद को प्रकट करते हैं। फिर वाणी हिरण्यगर्भ ब्रह्मा अर्धनारीश्वर एक रुद्र को प्रकट करते हैं। फिर धर्म और धृति तथा काम और रति को प्रकट करते हुए स्वयम्
सूत्रात्मा प्रजापति ब्रह्मा और सरस्वती के स्वरूप में प्रकट होते हैं। सूत्रात्मा ओज और कान्ति दक्ष प्रथम प्रसुति, रुचि - आकुति, कर्दम-देवहुति, स्वायम्भुव मनु-शतरूपा तथा शंकर- उमा की जोड़ियाँ प्रकट करते हैं।
ये जोड़ियाँ ही मैथुनिक सृष्टि प्रारम्भ करते हैं।
फिर प्रजापति सृष्टि ब्रह्माण्डों के भुवनों में लोक स्थापित करते हैं।
इन्हीं में हमारे अठारह भुवन और सोलह लोक भी सम्मिलित हैं।
भुवन मतलब आवास योग्य भूमि और लोक मतलब भुवन में जहाँ जीवों के वास होने से जैविक चेतना से भुवन आलोकित हो।
फिर प्रजापति और सरस्वती और (1)मरीची-सम्भूति, (2) भृगु-ख्याति, (3) अङ्गिरा-स्मृति, (4) वशिष्ट-ऊर्ज्जा, (5) अत्रि-अनसुया, (6) पुलह-क्षमा, (7) पुलस्य-प्रीति, (8) कृतु-सन्तति भू स्थानीय प्रजापतियों को जन्म देते हैं।स्वायम्भुव मन्वन्तर के सभी ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मण इन्हीं की सन्तान थे। और इन्हीं के गुरुकुल में शिक्षित थे।
फिर प्रजापति ने स्वयम् को अणुरात्मा वाचस्पति और वाक के स्वरूप में प्रकट किया। ये ही स्वर्गलोक के प्रजापति इन्द्र (तेज) और शचि (विद्युत) के स्वरूप में प्रकट हुए। 
वाचस्पति और वाक ने अग्नि और स्वाहा तथा पितरः और स्वधा को प्रकट किया।
तथा वायु और शिवा को भी प्रकट किया।
अग्नि से तीन+तीन अर्थात छ: अग्नि हुए। इन छहों अग्नि के सात सात पुत्र हुए इस प्रकार उनचास अग्नि हो गये।
ऐसे ही पितरः के तीन+ तीन छः पितर हुए। जिसमें (१) अग्निष्वात (२) बहिर्षद और (३) कव्यवाह तीन निराकार और (४) अर्यमा, (५) अनल (६) सोम और (७) यम चार साकार हैं। अर्यमा मुख्य हैं इन्हीं की पत्नी स्वधा है।
ऐसे ही वायु के भी तीन+तीनः वायु हुए। उन छहों के सात- सात पुत्र हुए। ये ही आंधी, तुफान, झंझावात के देवता उनचास मरुद्गण कहलाये। मुख्य मरुद्गण (1) आवह, (2) प्रवह, (3) संवह, (4) उद्वह, (5) विवह, (6) परिवह और (7) परावह है। ये सातों सैन्य प्रमुख के समान गणवेश धारण करते है।

वाचस्पति स्वयम् विज्ञानात्मा ब्रह्मणस्पति और सुनृता के स्वरूप में प्रकट होते हैं। ये ब्राह्मणों के अध्यक्ष कहे जाते हैं। वेद मन्त्रों को ब्रह्म कहते हैं। और सभी मन्त्रों के ये दृष्टा हैं।
विज्ञानात्मा ब्रह्मणस्पति और सुनृता से चित्त और चेत द्वादश आदित्य प्रकट हुए।
  (1) विष्णु, (2) सवितृ, (3) त्वष्टा, (4) इन्द्र, (5) वरुण, (6) विवस्वान, (7) पूषा, (8) भग, (9) अर्यमा, (10) मित्र, (11) अंशु और (12) धातृ।

फिर ब्रह्मणस्पति स्वयम् ज्ञानात्मा ब्रहस्पति और तारा के स्वरूप में प्रकट हुए। ज्ञानात्मा ब्रहस्पति से बुद्धि और बोध आठ वसु हुए।
(1) प्रभास, (2) प्रत्युष, (3) धर्म, (4) ध्रुव, (5) अर्क, (6) अनिल, (7) अनल और (8) अप् ।
 ज्ञानात्मा ब्रहस्पति स्वयम् लिङ्गात्मा पशुपति के स्वरूप में प्रकट हुए।
लिङ्गात्मा पशुपति से अहंकार और अस्मिता एकादश रुद्र हुए।
(1) हर, (2) त्र्यम्बकं, (3) वृषाकपि, (4) कपर्दी, (5) अजैकपात, (6) अहिर्बुधन्य, (7) अपराजित, (8) रैवत, (9) बहुरूप, (10) कपाली और (11) शम्भु (शंकर)।

 लिङ्गात्मा पशुपति स्वयम् मनसात्मा गणपति के स्वरूप में प्रकट हुए। ये गणपति लम्बोदर गजानन विनायक से अलग हैं। कबिलों को गण कहते हैं। गणों के अध्यक्ष गणराज्य के नायक गणपति कहलाते हैं।
 लिङ्गात्मा गणपति से मन और संकल्प सोम राजा और वर्चा प्रकट हुए।
 मनसात्मा गणपति ने स्वयम् को स्व सदसस्पति और स्वभाव मही के स्वरूप में प्रकट हुए।
 स्वभाव मही स्वयम् सात्विक स्वभाव स्वाहा भारती, राजसी स्वभाव वषट सरस्वती और तामसी स्वभाव स्वधा इळा (इला या तृण देवी इरा) के स्वरूप में प्रकट हुई।
इन्हीं से यह भौतिक पदार्थ और भौतिक जगत उत्पन्न हुआ। शरीर बने।

5 महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने पञ्च महायज्ञ को आवश्यक तो माना लेकिन योग साधना पर अधिक जोर दिया।

मेरा मत है कि, वेदों और ब्राह्मण ग्रन्थों के अनुसार पञ्च महायज्ञ के ब्रह्म यज्ञ के अन्तर्गत ही अष्टाङ्ग योग अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह (पञ्चयम/ धर्म), शोच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान (पञ्च नियम/ अनुशासन), चौरासी आसन (शरीर की स्थिरता), प्राणायाम (स्व नियन्त्रित श्वास-प्रश्वास के माध्यम से समस्त शारीरिक अन्तःक्रियाएँ स्व नियन्त्रण में लाकर, प्रत्याहार के माध्यम से मन का इन्द्रियों की ओर भटकाव स्व नियन्त्रण में लेकर स्वस्थ्य तन- मन प्राप्त कर धारणा द्वारा सिखी गई शिक्षा धारण करते हुए स्वाध्याय, वेद पाठ, वेदाध्ययन, सन्ध्योपासना, कर ध्यान पूर्वक गायत्री मन्त्र जप करना। ब्रह्मचर्य आश्रम में यह अभ्यास आदत में ढालना, मसल्स मेमोरी में उतार देना। फिर देव यज्ञ से आत्म समर्पण/ ईश्वर प्रणिधान हो पाता है। भूत यज्ञ से प्रकृति के प्रति कर्तव्य पालन और अतिथि यज्ञ से मानवों के प्रति कर्तव्य भावना जागृत होती है। पितृ यज्ञ श्राद- तर्पण, और सामाजिक कार्यों में सहयोग कर के सामाजिकता आती है।इस प्रकार ग्रहस्थाश्रम में पञ्च महायज्ञ स्वाभाविक रूप से हो पाएँगे।
वानप्रस्थ आश्रम में अध्ययन- अध्यापन, ध्यान - समाधि अभ्यास, संयम (कुछ ही समय में धारणा-ध्यान- समाधि में स्थित होकर) 
संयम से तन्मयता प्राप्त कर वाञ्छित जानकारी और ज्ञान प्राप्त कर लिया जाता है।
इस प्रकार परमात्मा में तन्मय होकर आत्मज्ञान प्राप्त होता है।
पञ्च महायज्ञ सम्पूर्ण स्वस्थ्य और स्वस्थ जीवन प्रणाली है।

6 महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी विवाह में वर की आदर्श अवस्था (वय) 48 वर्ष और वधू की वय (अवस्था) 16 वर्ष मानते थे।
जबकि मैं विवाह में वर की आदर्श वय (अवस्था) 24-25 वर्ष और वधू की आदर्श अवस्था (वय) 21-22 वर्ष मानता हूँ।
48 वर्ष तक ब्रह्मचर्य पालन करने वाले पुरुष को विवाह करने की आवश्यकता ही नहीं रहती है।

7 महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी विधवा विवाह को अनुचित नहीं मानते थे।
श्रद्धानन्द जी ने तो विधवा विवाह को सामाजिक आन्दोलन में सम्मिलित कर लिया।
लेकिन महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती जी नियोग को भी उचित मानते थे।
जबकि मैं नियोग से पूर्णतः असहमत हूँ।
यदि पुत्र ही इकलौती सन्तान हो। और उसकी निःसंतान नव विवाहिता वधु विधवा हो जाए, तो उसका पुनर्विवाह कर उसकी सन्तान को गोद लेना नियोग की तुलना में अनन्त गुना श्रेष्ठ होगा।

सोमवार, 10 अगस्त 2026

ब्राह्मण और क्षत्रियों की दुरावस्था।

शत वर्षिय दशराज युद्ध के बाद से ही मूल क्षत्रिय - मनुर्भरतों का तो अस्तित्व ही समाप्त हो गया।
फिर उज़्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, तिब्बत और कश्मीर के सूर्यवंशी अयोध्या में बसाये गए। और टर्की से आये चन्द्र वंशियों तथा सीरिया से आये नागों को उज़्बेकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, तिब्बत और कश्मीर में बसाया गया। लेकिन वे भी चन्द्र वंशियों के सामने नहीं टिक पाये। और प्रयागराज तथा बिहार, झारखण्ड में बस गये।
ईराक के असुरों ने सेवन सिस्टर्स के असम मणिपुर, त्रिपुरा, नगालैंड तथा श्री लङ्का आदि में फैल गये। अफ्रीका से आये राक्षस लक्ष्यद्वीप में बस गये।
दास-दस्यु (दृविड़) तमिलनाडु में बस गये। चोर (चोल) कर्नाटक में और आन्ध्र प्रदेश में आन्ध्र बस गये। 
ब्रह्मर्षियों की सन्तान जो हरियाणा में बसी थी और स्वायम्भुव मनु-शतरूपा के पुत्र प्रियव्रत सन्तान जो पञ्जाब, सिन्ध, बलुचिस्तान और अफगानिस्तान में बसी थी। जिन्हें मनुर्भरत कहा जाता था। तथा उत्तानपादासन और ध्रुव की सन्तान ईरान में बसी थी वे सब चारों ओर से ययाति के पाँचो पुत्रों (चन्द्रवंशियों) और नागों से घिर गए।
जब वैदिक काल के बाद ब्राह्मण ग्रन्थों के रचनाकाल से सूत्र ग्रन्थों के रचनाकाल त्रेतायुग में ही यह हाल था तो अब तो कलियुग में समय ही उनका है।

शनिवार, 8 अगस्त 2026

ब्रह्म यज्ञ और देव यज्ञ।

सूर्योदय से कम-से-कम दो घण्टे पहले शय्या त्याग कर शौच स्नान, ब्रह्मयज्ञ अर्थात अष्टाङ्ग योग साधना, सन्ध्या, गायत्री मन्त्र जप, उदयीमान सूर्य को अर्घ्य देकर दैनिक अग्निहोत्र करने से सूर्योपासना स्वतः हो जाती है। किसी भी देवता विशेष की स्वतन्त्र आराधना केवल निषिद्ध सकामोपासना में होती है।
अन्यथा सदाचारी जीवन जीते हुए, समत्व भाव धारण कर निश्चयात्मकमिका बुद्धि से चित्त में निरन्तर परमात्मा को ध्यान में बनाये रखते हुए शास्त्रोक्त विधि से ही केवल शास्त्रोक्त कर्म करने वाले योगी का योगक्षेम परमात्मा स्वयम् वहन करते हैं।

गुण मिलान में दोष।

 गुण मिलान का आधार  चन्द्रमा किस राशि/नक्षत्र में है बस यही गुणों का आधार है।

राशि और नक्षत्र के योग से 36 योग बनते हैं।
पूरी कुण्डली में 

1 किस ग्रह, भाव (खाने) का बल और शुभाशुभत्व कैसा है?

2कौन-सा ग्रह किस भाव (खाने) का स्वामी होकर किस भाव (खाने) में बैठा है?

3 किस-किस भाव (खाने) को देख रहा है?

4 किस भाव (खाने) के स्वामी को देख रहा है?

5 किस भाव (खाने) के स्वामी द्वारा देखा जा रहा है?

इन सब का कोई महत्व नहीं है।

ऐसे ही पूरी कुण्डली के 12 भाव (खानों) में से पाँच भाव(खाने) 1,4,7,8 और 12 वें भाव (खाने) में मङ्गल हो तो कुण्डली माङ्गलिक कहलाती है।
इसका फल माना जाता है कि, लाइफ पार्टनर (पति या पत्नी) की आयु क्षय करता है।
इस दोष का हरण करने के लिए सामने वाले (वर या वधू) की कुण्डली में इन्हीं 1,4,7,8 और 12 वें भाव (खाने) में से किसी भी भाव (खाने) में, मङ्गल > शनि > सूर्य > राहु > केतु में से कोई एक भी ग्रह हो तो माङ्गलिक मिलान ठीक हो जाता है।

शास्त्रों में तो और भी बहुत से परिहार भी बतलाये हैं, जिनका ज्ञान नगण्य ज्योतिषियों को है।
जैसे 3,6, या 11 वें भाव में भी यदि मङ्गल > शनि > सूर्य > राहु > केतु में से कोई एक भी ग्रह हो तो माङ्गलिक दोष का परिहार हो जाता है।
जिसकी कुण्डली में माङ्गलिक दोष है उसकी कुण्डली में मङ्गल उच्च का हो या नीच का हो या वक्री या अस्त हो तो भी माङ्गलिक दोष का परिहार हो जाता है।
और भी आयु अधिक होना (मतलब केवल बाल विवाह में ही निषेध था।) और 25 से अधिक या 27 से अधिक गुण मिलने पर भी माङ्गलिक दोष का परिहार हो जाता है।
लेकिन यह जानकारी नगण्य पारम्परिक ज्योतिषियों को है।

मतलब उनके मतानुसार तो दोनों एक दूसरे की आयु क्षीण करके मर जाएंगे और बच्चे अनाथ हो जाएंगे उसे अच्छा मानते हैं।🤔

ऐसे मुर्खतापूर्ण सिद्धान्तों में मेरी रत्ती मात्र भी श्रद्धा नहीं है।
लेकिन जब कोई ज्योतिषी से पूछता है तो, ज्योतिषी का कर्तव्य है कि, प्रचलित परम्परा अनुसार उत्तर दे। इसलिए वह भी बतलाता हूँ।

शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

नामकरण कैसे करें?

*नामकरण के लिए कैसे करें? कौनसी पद्यति सही है? प्राचीन संस्कृत पद्यति के आधार पर जन्माक्षर लें और नाम के अक्षरों का योगांक लें या यवन अवकहड़ा चक्र और कीरो की हिब्रू न्युमरोलॉजी  के आधार पर?*

नामकरण के लिए क्या सही ?  प्राचीन संस्कृत पद्यति? या अवकहड़ा चक्र और कीरो अंकविद्या?



जन्मनाम निर्धारण प्राचीन संस्कृत पद्यति से।

देखिये अग्निपुराण अध्याय 293 श्लोक 10 से 15 तक।
यह विधि अग्नि पुराण मन्त्र - विद्या के अन्तर्गत नक्षत्र - चक्र, राशि चक्र और सिद्धादादि मन्त्र शोधन प्रकार में दी गई है उसमे नामकरण की दृष्टि से आवश्यक संशोधन कर तैयार गई है।
जन्मलग्न के नक्षत्र चरण के अनुसार जन्मनाम/ देह नाम रखें।
नही बने तो अपवाद में दशम भाव स्पष्ट के नक्षत्र चरणानुसार कर्मनाम भी रख सकते हैं।
सुर्य के नक्षत्र चरणानुसार गुरु प्रदत्त अध्यात्मिक नाम / आत्म नाम।
तन्त्र क्रिया हेतु तान्त्रिक आचार्य प्रदत्त नाम मानस नाम जन्म कालिक चन्द्रमा के नक्षत्र चरणानुसार रखें।

प्राचीन संस्कृत पद्यति -- 

राशि /नक्षत्र चरण १ २ ३ ४  
मेष / अश्विनी अ अ अ अ मेष / भरणी आ आ आ आ मेष / कृतिका इ                  
                             १ २ ३ ४
वृष / कृतिका इ ई ई
वृष / रोहिणी उ उ ऊ ऊ
वृष / मृगशिर्ष ऋ ऋ  
                             १ २ ३ ४
मिथुन/ मृगशिर्ष ऋ ऋ
मिथुन/ आर्द्रा ए ए ऐ ऐ
मिथुन/पुनर्वसु ओ ओ औ 
                              १ २ ३ ४
कर्क / पुनर्वसु औ
कर्क / पुष्य अं अं अः अः
कर्क / आश्लेषा क का ख खा 
                               १ २ ३ ४
सिंह / मघा ग गा घ घा
सिंह/पुर्वाफाल्गुनि च चा छ छा
सिंह/उत्तराफाल्गनि ज
                                 १ २ ३ ४
कन्या/उत्तराफाल्गुनि जा झ झा
कन्या / हस्त ट टा ठ ठा
कन्या / चित्रा ड डा   
                                 १ २ ३ ४
तुला / चित्रा ढ ढा
तुला / स्वाती त ता थ था
तुला / विशाखा द दा ध    
                                  १ २ ३ ४
वृश्चिक/ विशाखा धा
वृश्चिक/ अनुराधा न न ना नृ
वृश्चिक/ ज्यैष्ठा प पा फ फा
                                   १ २ ३ ४
धनु / मुल ब बा भ भा
धनु / पुर्वाषाढ़ा म म मा मृ
धनु / उत्तराषाढ़ा य
                                    १ २ ३ ४
मकर/ उत्तराषाढ़ा य य या
मकर / श्रवण र र रा रृ
मकर / धनिष्ठा ल ल
                                     १ २ ३ ४
कुम्भ / धनिष्ठा ला लृ
कुम्भ / शतभिषा व व वा वृ
कुम्भ / पुर्वाभाद्रपद श शा ष  
                                      १ २ ३ ४
मीन / पुर्वाभाद्रपद षा
मीन / उत्तराभाद्रपद स स सा सृ
मीन / रेवती ह ह हा हृ

मात्रा लगाने की विधि / नियम --

प्रथम एवम् त्रतीय चरण में मुल स्वर हैं। द्वितीय और चतुर्थ चरण में आ से औ तक की मात्रा वाले अक्षर जन्मनाम का प्रथमाक्षर रहेगा।

जिन नक्षत्रों में प्रथम और त्रतीय चरण में अलग अलग वर्ण हो उनमें द्वितीय चरण में प्रथम चरण के वर्ण में और चतुर्थ चरण में त्रतीय चरण के वर्ण में ००ं-००' से ००ं-२०' तक ा की मात्रा लगायें। तदनुसार ही आगे भी ००ं-२१' से ००-४०' तक ि की मात्रा लगायें।००ं-४१' से ०१ं-००' तक ई की मात्रा ।०१ं-०१' से ०१ं-२०' तक ु की मात्रा।०१ं-२१' से ०१ं-४०' तक ू की मात्रा।०१ं-४१' से ०२ं-००' तक ृ की मात्रा।०२ं-०१' से ०२ं-२०' तक े की मात्रा।०२ं-२१ से ०२ं-४०' तक ै की मात्रा। ०२ं-४१' से ०३ं-००' तक ो की आत्रा । और , ०३ं-००' से ०३ं-२०' तक ौ की मात्रा लगाकर नाम का प्रथमाक्षर रखें।

जबकि, जिन नक्षत्रों में चारों चरणों में एक ही व्यञ्जन हो वहाँ प्रथम एवम् द्वितीय चरण में मुल वर्ण से नाम का प्रथमाक्षर रहेगा।जबकि, तृतीय और चतुर्थ चरण में ००ं-००' से ००ं-४०' तक ा की मात्रा लगायें। तदनुसार ही आगे भी ००ं-४१' से ०१-२०' तक ि की मात्रा लगायें। ०१ं-२१' से ०२ं-००' तक ई की मात्रा ।०२ं-०१' से ०२ं-४०' तक ु की मात्रा । ०२ं-४१' से ०३ं-२० तक ू की मात्रा।और चतुर्थ चरण में ०३ं-२१' से ०४ं-००' तक ृ की मात्रा।०४ं-०१' से ०४ं-४०' तक े की मात्रा।०४ं-४१ से ०५ं-२०' तक ै की मात्रा। ०५ं-२१ से ०६ं-००' तक ो की आत्रा । और , ०६ं-०१' से ०६ं-४०' तक ौ की मात्रा लगाकर नाम का प्रथमाक्षर रखें।

नाम की संस्कृत, / हिन्दी या मराठी वर्तनी के अक्षरों के अंक।

नाम सरनेम सहित जन्म नाम के अंको को जोड़कर प्राप्त योगफल का ईकाई अंक जन्मसमय के सायन सौर गतांश के ईकाई अंक दोनों एक ही हो।

0- अ, क, ट, प, ष, अः, क्ष, ऽ 0

1- आ, ख, ठ, फ, स, त्र , 1

 2- इ, ई, ग, ड, ब, ह , 2

 3- उ, ऊ, घ, ढ, भ, 3

 4- ऋ, ङ, ण, म, 4
  
 5- ए, च, त, य, 5

 6- ऐ, छ, थ, र, ज्ञ, 6

 7- ओ, ज, द, द, ल, ड़,ॉ 7

 8- औ, झ, ध, व, ढ़ 8
 
 9- अं, ञ, न, श, 9

  0- अ, अः, क, ट, प, ष, ऽ 0


अब नीचे देखिए।⤵️

जन्म नाम जानने का या अवकहोड़ा चक्र जिसका नाम ही विचित्र है और आधारहीन है।

राशि /नक्षत्र चरण १ २ ३ ४  
  
मेष / अश्विनि चु चे चो ला मेष / भरणी ली लू ले लो मेष / कृतिका अ    
                 
                            १ २ ३ ४

वृष / कृतिका इ उ ए
वृष / रोहिणी ओ वा वी वु
वृष / मृगशिर्ष वे वो  

                           १ २ ३ ४

मिथुन/ मृगशिर्ष का की
मिथुन/ आर्द्रा कु ङ ग छ
मिथुन/पुनर्वसु के को ह 

                          १ २ ३ ४

कर्क / पुनर्वसु ही
कर्क / पुष्य हु हे हो ड़ा 
कर्क / आश्लेषा डि डु डे डो

                               १ २ ३ ४

सिंह / मघा मा मे मी मू
सिंह/पुर्वाफाल्गुनि मो टा टी टू
सिंह/उत्तराफाल्गनि टे

                                   १ २ ३ ४

कन्या/उत्तराफाल्गुनि टो पा पी
कन्या / हस्त पु ष ण ठ
कन्या / चित्रा पे पो   

                                  १ २ ३ ४

तुला / चित्रा रा री
तुला / स्वाती रु रे रो ता
तुला / विशाखा ति तू ते  

                                 १ २ ३ ४

वृश्चिक/ विशाखा तो
वृश्चिक/ अनुराधा ना नी नू ने
वृश्चिक/ ज्यैष्ठा नो या यी यू

                                  १ २ ३ ४

धनु / मुल ये यो भा भी
धनु / पुर्वाषाढ़ा भू धा फा ढ़ा
धनु / उत्तराषाढ़ा भे

                                 १ २ ३ ४

मकर/ उत्तराषाढ़ा भो जा जी
मकर/ अभिजित जू जे जो खा
मकर / श्रवण खी खू खे खो
मकर / धनिष्ठा गा गी             

                                  १ २ ३ ४

कुम्भ / धनिष्ठा गु गे
कुम्भ / शतभिषा गो सा सी सू
कुम्भ / पुर्वाभाद्रपद से सो दा  

                                      १ २ ३ ४

मीन / पुर्वाभाद्रपद दी
मीन / उत्तराभाद्रपद दू थ झ ञ
मीन / रेवती दे दो चा ची

जो महानुभाव उक्त अवकहोड़ा/अवकहड़ा चक्र को भारतीय ऋषि मुनियों की रचना मानते हैं कृपया विचार कर बतलायें कि, कौन से भारतीय ऋषि संस्कृत नही जानते थे। जिन्हें यह नही पता था कि, 
1 संस्कृत में ङ (आर्द्रा 2),ण (हस्त 3), से कोई शब्द नही बनता। किसी शब्द का प्रथमाक्षर ङ और ण नही होता।
2 पूरे अवकहड़ा चक्र में ब वर्ण है ही नही। ब के लिए कोई राशि/ नक्षत्र/ नक्षत्र चरण मे स्थान नही है?
कृपया बतलायें कि, बबीता की राशि/ नक्षत्र/ चरण कौनसा है। वृष राशि/ रोहिणी नक्षत्र/ तृतीय चरण तो "वा" वाणी के लिये है न कि, "ब" बबीता के लिए। ऐसा क्यो?
3 कौनसा संस्कृत विद्वान ऐसी बे सिर पेर की अक्षर व्यवस्था बनायेगा? जबकि संस्कृत वर्ण प्रधान भाषा है न कि, अक्षर प्रधान।

ऐसे महान ऋषि और उनके अनुयायियों के लिए हमारे पास कोई शब्द नही है।

सम्भवतया वराहमिहिर के समय प्रचलित हुई उपर्युक्त यमन पद्यति / यवन पद्यति है इसके ही समान ही कीरो की आंग्ल / चाल्डियन / हिब्रु पद्यति (और तथाकथित भारतीय कश्मीरी पद्यति) द्वारा नामाक्षरों के अंको के योगांक वाली पद्यति है। जिसका कोई आधार सिद्ध नही होता। ⤵️

जन्म नाम कीअंग्रेजी स्पेल्लिंग के अक्षरों के अंको का योग का योग या योग कें अंकों का योगांक ग्रेगोरियन केलेण्डर की सुर्योदय वाली दिनांक एक ही हो।
जन्म नाम कीअंग्रेजी स्पेल्लिंग के अक्षरों के अंक

1 = A. I. J. Q. Y = 1
2 = B. K. R. = 2
3 = C. G. L. S. = 3
4 = D. M. T = 4
5 = E. H. N. X = 5
6 = U. V. W = 6
7 = O. Z = 7
8 = F. P = 8

शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

भारत की दुरावस्था के दोषी कौन?

दोष  उन सभी लोगों को दे रहा हूँ, जिन्हें चन्द्रवंशियों और नाग वंशियों के महाभारत काल से आज तक के राजा-महाराजा, सामन्तों का जिन्होंने सामुहिक रूप से सीमा पर जाकर  विधर्मी विदेशी आक्रान्ताओ से युद्ध करने, लड़ने भिड़ने के बजाय किले में छुपकर बैठ गये।
जनता लूटती मरती रही और और ये राजा, महाराजा, और उनके सामन्त बिल में छुपकर बैठ रहे।
बाद में साका और जोहर करने के बजाय उन्हें सीमा में घुसने ही नही देने के लिए ईरान और अफगानिस्तान तथा तुर्किस्तान की सीमाओं पर डटे रहना चाहिए था। लेकिन ये अपनी जागीरों/ स्टेट में ही आपस में लड़ते मरते रहे।
और
आक्रमणकारियों की सेना में भर्ती होकर अपने देशवासियों और स्वजाति बन्धुओं (भारतियों) का संहार करने वाले सैनिकों 
और उन देशवासियों का जिन्होंने अपने खेत खलिहान रोन्दते, दुकान - मकान लूटने वाले विदेशी सैनिकों का जरा भी सामुहिक प्रतिरोध नहीं किया।

मैं उन सभी लोगों का विरोध करता हूँ जो;
इन सब लोगों को दोषी ठहराने के बजाय उनकी उक्त मुर्खतापूर्ण कार्रवाइयों का गुणगान करते फिरते हैं और दोष केवल कर्मकाण्डियों, शास्त्रियों और आचार्यों को ही देते हैं। जिनकी रक्षा का भार उक्त निकम्मे डरपोक राजाओं, सामन्तों और सैनिकों का था।

गुरुवार, 16 जुलाई 2026

प्रारब्ध और पराक्रम का प्रभाव।

1 प्रकृति आयु की गणना श्वास प्रश्वास की संख्या में करतीं हैं।
इसलिए प्राणायाम साधना द्वारा और लम्बी और गहरी श्वास लेने के अभ्यास को आदत में / मसल मेमोरी में डाल देने से ही स्वस्थ्य शरीर, दीर्घायु जीवन और स्वस्थ हुआ जा सकता है।
2 अनन्त जन्मों के सञ्चित कर्मों में से इस जन्म में भोगे जा सकने योग्य कर्म फलों के समुच्चय के उदय को प्रारब्ध कहते हैं ।
3 प्रारब्ध के अनुसार निर्धारित ---
 देश ( अर्थात लोक, ग्रह, महाद्वीप, राष्ट्र, राज्य, प्रदेश, सम्भाग, जिला, तहसील, ब्लाक, ग्राम/नगर, मोहल्ला/ कॉलोनी)।
 काल ( अर्थात कल्प, मन्वन्तर, युग, संवत्सर, अयन, तोयन, ऋतु , मास, पक्ष, दिनांक, और घटि, पल, विपलात्मक समय।)
वंश, कुल, कुटुम्ब और परिवार में , मात-पिता, बड़े-छोटे भाई- बहन, भाभी - जीजा, ताऊ-काका,भुआ, ताई-काकी, फुफा, मामा-मौसी, मामी-मौसा, चचेरे, फुफेरे, ममेरे, मौसेरे भाई- बहन, भाभी - जीजा आदि के बीच जन्म होना, स्व देश, स्व कुल, स्वयम् के परिवार में 
या 
पर देव, अन्य कुल, किसी अन्य परिवार में पालन- पोषण होना, 
शारीरिक बनावट, स्वास्थ्य, सुघड़ता, स्वभाव, आदतें, रुचियाँ-अरुचियाँ, योग्यताएँ- निर्योग्यता, कौशल और पारिवारिक सुख-सुविधाएँ तथा सम्पततियाँ, और आय- व्यय रूपी परिस्थितियों के साथ बच्चे का जन्म होता है।
लेकिन 
4 इनमें विकास करना, वहीँ अटके रहना, घटाना ये सब कर्म पर निर्भर करता है।
यह सही है कि, अधिकांश लोग स्वयम् को परिस्थितियों का दास मानकर परिस्थितियों के अनुसार ही कर्म करते हैं।
किन्तु 
5 सत्वगुण प्रधान, निश्चयात्मकमिका बुद्धि वाले विवेकी पुरुष (शरीर रूपी पुर मे रहने वाला व्यक्ति) समाज में रह रहे लोगों के गुण-दोषों और उनसे उन्हें हुए लाभ हानि को देख-समझकर और गुरुजनों (वरिष्ठ जनों) द्वारा दी गई शिक्षा को अपना कर शुद्र (सेवक), से वैश्य (स्वामी), और फिर क्षत्रिय (शासक) और विप्र (वेदज्ञ), और ब्राह्मण (वेदों को आत्मसात कर आत्मज्ञानी) हो जाता है।
लेकिन 
6 रजोगुण प्रधान आधि-व्याधि, स्त्यान, प्रमाद, आलस्य, संशय, भ्रम, अवरति आदि विक्षेपों से विक्षिप्त और आधिदैविक, अधिभौतिक और आध्यात्मिक दुखों और दौर्मनस्य के कारण पर्याप्त पराक्रम न करने के कारण कष्ट भोगता हुआ, कुछ सुधार करके जैसे-तैसे जी लेता है।

7 तमोगुणी अविवेकी पुरुष तो स्वयम् में केवल गुण ही देख पाता है, बतलाने पर भी दोष नहीं मानता तो सुधार करने का प्रश्न ही नहीं होता इसलिए परिस्थितियों और दुसरों को दोष देकर
आधि-व्याधि, स्त्यान, प्रमाद, आलस्य, संशय, भ्रम, अवरति आदि विक्षेपों से विक्षिप्त और आधिदैविक, अधिभौतिक और आध्यात्मिक दुखों और दौर्मनस्य को अनिवार्य (जिना निवारण नहीं हो सकता ऐसा) मानकर सदा कष्टित, पीड़ित और दुःखी रहता है । फिर भी नहीं सुधरता है और जीवन बर्बाद कर लेता है।

गुरुवार, 25 जून 2026

मृत्यु उपरान्त गति

 मृत्यु पर क्या होता है?
व्यक्ति का *स्वत्व* (स्व पन) समाप्त हो जाता है। इसलिए देह को *अमुक व्यक्ति की देह* कहा जाता है *न कि, अमुक व्यक्ति।* 
ऐसा कहा जाता है कि, " *क* " मर गया यह उसकी (" *क* " की) लाश पड़ी है। 
अब उसका कोई *स्व भाव* (स्वभाव) नहीं बचा।
आँखे, कान, नाक, जीभ, त्वचा सभी दिख रहे हैं लेकिन ज्ञानेन्द्रियाँ नहीं रही। मृत देह न देख सकती है, न सुन सकती है, न स्पर्ष का अनुभव कर सकती है, न सुंघ सकती है, न चख सकती है।
हाथ-पैर, मुँह होते हुए भी न चल नहीं सकती है। न बोल सकती है।
न कोई संकल्प कर सकती है क्योंकि अब मन नहीं रहा, न किसी क्रिया के प्रति मैं लेटा हूँ ऐसा अहम पाल सकती है, न विचार कर सकती है क्योंकि अब बुद्धि नहीं रही, न जाग्रत है, न स्वप्न में है, न निद्रा में है, न समाधि में है न सचेत (होश में) है और न अचेत (बेहोश) है क्योंकि अब चित्त नहीं रहा।।
अब शरीर में न न स्पन्दन है, न तेज (गर्मी) है, न ओज- कान्ति है न अब यह किसी सन्तान को जन्म दे सकती है क्योंकि अब रेतधा- स्वधा नहीं रहा।अब उसके गुण धर्म किसी अगली पीढ़ी में अन्तरित नहीं हो सकते हैं, क्यों कि, सुत्रात्मा नहीं रहा।

अब वह न बालक, युवा या वृद्ध नहीं कहलाता है क्योंकि जब देही ही नहीं रहा तो, अवस्था किसकी होगी। 

इन सब का कारण एक ही है कि, उस *क नामक* व्यक्ति के प्राण निकल गए। लोग कह रहे हैं कि, उसके प्राण पखेरू उड़ गए। अब वह (देही) नहीं रहा।
अरे! पर अचानक क्या हुआ? थोड़ी देर पहले तो लोग कह रहे थे कि, *"क"* नामक उस व्यक्ति के प्राण नहीं निकल पा रहे हैं क्योंकि इनका जीव तो इसके पुत्र में अटका है।
पुत्र आया, *क* ने आँखे खोली, हाथ उठाकर पुत्र के सर पर रखा, पुत्र ने सर गोद में लेकर चम्मच से गङ्गा जल पिलाया, तुलसी दल मुँह में रखा और *क* के प्राण निकल गए।
अब जीव की परलोक की ओर गति प्रारम्भ हो गई।
इस जन्म के भले-बुरे कर्मानुसार भगवान के पार्षद या देव दूत या यम दूत अपनी रीति-नीति अनुसार उसे सम्बन्धित लोक के मार्ग से ले जाएंगे। और कर्मफल अनुसार निर्धारित लोक में निर्धारित अवधि के लिए सुख-दुःख भोगने हेतु तदनुकूल शरीर में रखा जाएगा। या कर्म फलानुसार मृत्युलोक में किसी योनि में जन्म मिलेगा।

अब बचा जीव जिसकी निर्धारित आयु होती है। यह आयु ही जीव की शक्ति होती है। जीवात्मा और आयु को संयुक्त रूप से जीवात्मा कहते हैं। 
अर्थात मृत्यु उपरान्त गति इस जीवात्मा की होती है। यह जीवात्मा प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) का कही जा सकती है। क्योंकि प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) इसी जीवात्मा के केन्द्र में रहती है।
अतः जीवात्मा के साथ ही प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) की गति भी होती है। जैसे चलता वाहन है, उसमें बैठे सभी लोगों की यात्रा उस वाहन के साथ स्वतः होती है। ऐसे ही जीवात्मा के साथ प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) की गति भी होती है। सुविधाएँ या कष्ट पीड़ा जो भी भोग होते हैं इस जीवात्मा को ही प्राप्त होते हैं। लेकिन जीवभाव में स्थित प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) भी मोह वश उन सुविधाओं से सुखी या कष्टों के कारण दुखी होता है।
लेकिन यदि प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) का झुकाव प्रज्ञात्मा की ओर रहता है तो वह मार्ग की सुख सुविधाओं के प्रति तटस्थ रहकर केवल दृष्टा भाव से देखता रहता है लेकिन अप्रभावित ही रहता है।

जिस लोक में जीवात्मा को भेजा जाता है वहाँ जीवात्मा के प्रति आकृष्ट प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) तो वहाँ जीवात्मा को मिलने वाली सुविधाओं से सुखी अनुभव करता है या कष्टों से दुखी होता है। लेकिन यदि इन सब अनुभवों से सांसारिक सुख सुविधाओं के प्रति विरक्त होकर प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) का रुझान प्रज्ञात्मा की और होने लगे तो विवेक जागृत होने से प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) की लगन प्रज्ञात्मा परब्रह्म की ओर हो जाती है और प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) प्रज्ञात्मा परब्रह्म की शरण ले लेता है और श्रेय मार्ग पर कल्याण को प्राप्त कर लेता है। और उसी देव योनि में रहते हुए भी मुक्त हो जाता है।
इसके विपरित जीव भाव के प्रति आकृष्ट प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) को जीवात्मा को प्राप्त योनि का भोग पूर्ण होने पर पुनः मृत्यु लोक में जन्म लेना पड़ता है। सुकर्मों का फल भोगकर लौटे जीवात्मा का जन्म श्रेष्ठ (आर्य) परिवार में होता है और कुकर्मों का भोग कर लौटे जीवात्मा को मृत्यु लोक में भी दास/ दस्युओं के घर जन्म लेना पड़ता है। फिर स्वयम् का कल्याण या पुनरावर्तन या निम्न योनियों में जन्म या पातालादि में अन्धतम लोकों में नर्कादि भोग भोगने हेतु तदनुकूल योनि में जाना पड़ता है।
 इससे स्पष्ट हो गया कि, जन्म, मृत्यु, लोक- लोकान्तर गति, और वास हेतु तदनुकूल योनि में जन्म लेना यह सब जीवात्मा का होता है।
जीवात्मा से जुड़े प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) इन्हें स्वानुभुति मान लेता है और उस लोक के भोग भोगकर मृत्यु लोक में पुनर्जन्म को प्राप्त होता है। लेकिन विवेकवान प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) प्रज्ञात्मा की से युक्त होकर प्रज्ञावान होने के कारण उक्त सभी विषयों को तटस्थ भाव से केवल देखता रहता है। उनसे प्रभावित नहीं होता है। इसलिए वह क्रम मुक्ति के द्वारा मोक्ष प्राप्त कर लेता है।

शनिवार, 13 जून 2026

भारत में मूर्ति पूजा के पूरातत्वीय प्रमाण

 *देवस्थान के प्रारम्भिक प्रमाण वाल्मीकि रामायण में मिलते हैं जहाँ कोशल्या जी विष्णु पूजा करतीं थीं। श्री रामचन्द्र जी विष्णु के स्थान पर जाते थे। सीता जी जनकपुरी में उमा पार्वती के स्थान पर जातीं थीं।*
*लेकिन इनमें न किसी ढाँचे का उल्लेख है न किसी रूप या प्रतिमा का। इसलिए स्पष्ट है कि जैसे यज्ञों में मण्डलों पर ही देवताओं का आह्वान, स्थापना और पूजन होता है, वैसे ही इन स्थानों पर भी मण्डलों में ही देवता की पूजा होती थी। आज तक भी लोग श्री यन्त्र, बीसा यन्त्र आदि में देवताओं की पूजा करते हैं।*

वाल्मीकि रामायण में उल्लेखित ---
*अगार, देवतागार या देवगृह मतलब जहाँ केवल आवश्यक होने पर स्नानादि कर पवित्र होकर ही प्रवेश किया जा सकता है।*
 *अग्नि अगार अर्थात हवन शाला या पूजन कक्ष जो आवासीय परिसर में ही होता है।*
 *आगार का अर्थ है -- जहाँ मण्डप बनाकर मण्डल में देवताओं का आह्वान,यज्ञ- हवन कर नैवेद्य अर्पित कर, स्वस्तिवाचन, ब्राह्मण भोजन दान दक्षिणा द्वारा सन्तुष्ट कर आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है।*
*वाल्मीकि रामायण/ अयोध्या काण्ड/2/4/38*
*दशरथ जी ने राज्याभिषेक के लिए वासुदेव का आगार बनवाया।*
*अयोध्या काण्ड 2/25/16*
*श्रीरामचन्द्र जी ने देवतागार में प्रवेश कर देवताओं को प्रणाम किया।*
*सुन्दर काण्ड 5/15/15*
*हनुमान जी ने रावण के महल में अतुल देवतागार देखा।*
*आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में मुण्डन, उपनयन, विवाह आदि संस्कार के पहले किये जाने वाले माता पूजन कक्ष में अखण्ड दीप जलता है वहाँ स्नान कर बिना सिले रेशमी अधोवस्त्र में ही जाया जा सकता है। यह एक परिवार का नीजी होता है।*

*चैत्य - राज प्रासाद के निकट या वाटिका आदि मे खुले परिसर में चबुतरे में पूज्य वृक्ष के नीचे मण्डल में देवताओं का आह्वान, यज्ञ-हवन और बलिदान कर पूजन कर प्रदक्षिणा करने योग्य स्थान। इसमें मण्डप नहीं होता है। यह एक कुल के लोगों का नीजी होता है।*
*वाल्मीकि रामायण/बालकाण्ड/1/66/8*
*क्षीरस्वामी टीका के अनुसार "चित्यायां भवं चैत्यम् ।*
*अर्थात् चिति = वेदी पर जो हो वह चैत्य, और जिसमें देवता आकर निवास करें वह आयतन*। 

*आयतन/देवायतन --- यह सार्वजनिक स्थान होता है। क्षीरस्वामी टीका के अनुसार आ+यत+अन अर्थात जहाँ प्रयत्न पूर्वक देवता को लाया जाएँ । अर्थात जहाँ मंत्रों से देवता का आह्वान किया जाए। जिसमें देवता आकर निवास करें वह आयतन कहलाता है।*
 *बहु खण्डिय शिखर युक्त स्थाई भवन में विभिन्न देवताओं या किसी देवता विशेष के लिए उपयुक्त मण्डप में स्थाई मण्डल और यज्ञवेदी बनाकर अग्नि प्रज्वलित हो , कलश , जयति (अर्थात जौ या गेहूं के ज्वारे) हो तीन गन्नों और मालाओं की झांँकी हो। क्यारी में तुलसी का पौधा, पीपल और वट वृक्ष, बेल-पत्र, आँवला, और शमी के पौधे होते हैं। अशोक भी होता है।*

जैसे होली और गोवर्धन पूजा के समय करते हैं। *यहाँ सामुहिक उत्सव मनाये जाते हैं।*
*यहाँ सार्वजनिक सन्ध्या, यज्ञ-होम, ब्राह्मण भोजन, दान-दक्षिणा, स्वस्तिवाचन होता है।*
*वाल्मीकि रामायण/ बालकाण्ड/1/5/16 मे कहा है कि, अयोध्या देवायतनों से शोभायमान थी।*

*फिर महाभारत में तीर्थयात्रा प्रकरण में वृक्षों में, तालाब आदि जल स्रोतों में यक्ष गन्धर्वों और नागों का वास मानने का और अनार्यों में इन वृक्षों, यक्षों और नागों की पूजा प्रचलित थी इसके प्रमाण हैं। लेकिन इसके लिए मात्र चबुतरे बना कर पूजा करते थे।आज भी भिन्न भिन्न पर्वोत्सवों पर चबुतरे के बीच लगे वृक्ष की पूजा होती है और तुलसी के पौधे में महा सति वृन्दा की, पीपल वृक्ष में विष्णु की, वट वृक्ष में ब्रह्मा की और शमी मे देवी की पूजा होती है।*

इसके अलावा पाणिनि की अष्टाध्याई में उल्लेखित वर्णनो में तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व मे देव स्थानों का वर्णन महाभारत के वर्णनों से मैल खाता है।
लेकिन पाणिनि की अष्टाध्याई पर पतञ्जली के महाभाष्य में दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में विष्णु, शिव, देवी देवताओं की प्रतिमाओं और मूर्तियों के वर्णन के आधार पर पहली बार ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी में सनातन वैदिक धर्म में मूर्ति पूजा के प्रमाण माना जाता है।
और ईसा की दुसरी और पहली शताब्दी में कुषाण वंश के कनिष्क के समय मन्दिरों और चैत्यों में मानवीय आकार की विकसित और बढ़ी मूर्तियों की पूजा प्रारम्भ हुई।

*निषाद, किरात आदि वनवासी जातियों ने डायनासोर के अण्डों को शिवलिङ्ग मानकर पूजना प्रारम्भ किया। जो आजतक प्रचलित है।*
*बाद में नर्मदा नदी में देवास जिले की बागली तहसील में धाराजी के जल प्रपात से बनने वाले बेलनाकार पत्थरों को बाणासुर द्वारा प्राण प्रतिष्ठित शिवलिङ्ग मानकर पूजना प्रारम्भ हुआ। लेकिन सरदार सरोवर के बेक वाटर से वह झरना भी नहीं रहा और बाणेश्वर शिवलिङ्ग बनना भी बन्द हो गये। लेकिन अब सनावद और पेशवा बाजीराव प्रथम की समाधि स्थल सनावद तहसील के रावेर के निकट ही खरगोन जिले की बड़वाह तहसील के ग्राम बकावाँ में शिवलिङ्ग गड़ने का कारोबार प्रारम्भ हो गया। और शिवलिङ्ग धड़ल्ले से बेंचे और खरीदे जा रहे हैं।*
*शाक्त पन्थ में बिजोरा निम्बू में मातृका लिङ्ग मानकर पूजा आज भी होती है।* 
*ऐसे ही वैष्णवों ने कम से कम दस-बारह लाख वर्ष पुराने ऑक्टोपस उपवर्ग के स्वविड नामक वर्तमान समुद्री जन्तु के दूर के सम्बन्धी कपालपाद (Cephalopod सेफैलोपॉड) नामक समुद्री जीव का चक्राकार कवच  में चक्राकार और शङ्खाकार संरचना देखकर शालिग्राम शिला को विष्णु लिङ्ग मानकर पूजना प्रारम्भ किया साथ में चल चढ़ाने आदि के लिए समुद्री जीव शंख रखना प्रारम्भ किया। ये सब परम्परा आज तक प्रचलित है।*
*ऐसे ही त्रिकोणीय पत्थर में देवी तथा पत्थर पर पत्थर रखकर भैरव एवम् चिकने लगभग तिकोने गोल पत्थर में गजानन विनायक की पूजा होने लगी। लेकिन ये सब प्रथाएँ अनार्यों में ही प्रचलित थी। आर्यजन अर्थात श्रेष्ठ जनों में तब भी और आज भी यज्ञ परम्परा ही प्रचलित थी जो गुरुकुलों में आज भी प्रचलित है।*
*इसके प्रमाण भी मिले हैं जैसे वैदिक सभ्यता जिसमें महाभारत युद्ध तक सरस्वती नदी सदानीरा थी। लेकिन महाभारत युद्ध के बाद हिमालय में आये कुछ उभारों जिन्हें आजकल पञ्च केदार कहा जाता है उनके कारण यमुना और अन्य सहायक नदियों के बहाव की दिशा बदलने से पश्चिम भारत की सारस्वत नागर सभ्यता-संस्कृति के बहुत से नगर उजड़ गए। पुरातत्वीय उत्खनन में जिनमें राखीगढ़ी, लोथल, मोहनजोदड़ो , हड़प्पा आदि के अवशेष पाए गए हैं। ये लोग विदेश यात्रा करते थे, इनके नगरों में विदेशियों का आगमन होता रहता था, तथा कुछ विदेशी बस्तियाँ भी थी।*  
*इनमें कुछ श्रमण मार्गी लोग तान्त्रिक मतावलम्बी थे, और लिङ्ग पूजा करते थे ये व्यावसायिक गतिविधियों से प्रायः दूर रहने के कारण निर्धन और रुग्ण थे। भारतीय आर्य जन इन्हें अस्पृश्य मानते थे। ये लोग नवीन स्थान के प्रति असहज होकर मातृभूमि के लगाव या जनसंख्या कम होने से उपलब्ध संसाधनों पर कब्जा करने या असामर्थ्य वश वहीं रुक गये। परिणाम स्वरूप बहुत बुरी हालत में मरते गए।*
*जबकि समझदार आर्य जन आस-पास के हरे-भरे उपजाऊ भू भाग में बस गये। जो लोग सूखे के दौरान भी नहीं हटे उनके ही अवशेष भी पाये गए हैं।* 
*इस प्रकार महाभारत काल में अनार्य दास-दस्युओं, तान्त्रिकों, श्रमणों, व्रात्यों में प्रतिमा पूजन और मूर्ति पूजा प्रचलित थी।*

वर्तमान मन्दिर इसी देवायतन की नकल है। उदाहरणार्थ महाकाल मंदिर में महाकाल के उपर चान्दी का श्री यन्त्र बना है। 
देवी मन्दिरों में बीसा यन्त्र बना रहता है। 
विष्णु मन्दिर में शालिग्राम शिला  चक्र और शंख जैसी संरचना बने और शंख शालिग्राम शिला और तुलसी क्यारी होती है।

इण्टरनेट से प्राप्त कुछ पुरातत्त्वीय प्रमाण नीचे दिए गए हैं।

1   बघोर-I के मूल 1983 के शोध-पत्र "An Upper Palaeolithic Shrine in India?"के अनुसार 1980–82 में सीधी जिले की सोन घाटी में स्थित बघोर-I स्थल का उत्खनन G. R. Sharma और J. Desmond Clark के नेतृत्व  में किया गया।उनके साथ Jonathan Mark Kenoyer तथा J. N. Pal भी जुड़े थे।

 पूजा-मंच की संरचना, त्रिकोणाकार शिला के आयाम, पीले रंग (yellow pigment) के प्रयोग तथा उसके शक्ति-यन्त्र मिला।
  उत्खनन में पत्थरका एक वृत्ताकार पूजा-मंच (platform) मिला, जिसके मध्य में एक प्राकृतिक त्रिकोणाकार रंगीन पत्थर रखा हुआ था। त्रिकोणाकार शिला के आयाम, पीले रंग (yellow pigment) के प्रयोग तथा उसके शक्ति-यन्त्र मिला।
इस स्थल को उत्तर पुरापाषाण (Upper Palaeolithic) काल के अंतिम चरण का माना गया है। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार इसकी तिथि लगभग 10,000–9,000 ईसा पूर्व (या लगभग 11,000–12,000 वर्ष पूर्व) मानी जाती है। 
पुरातत्वविदों ने देखा कि निकटवर्ती क्षेत्र के कोल और बैगा समुदाय आज भी त्रिकोणाकार प्राकृतिक पत्थरों को "माई" (मातृदेवी) के रूप में पूजते हैं। बघोर-I में मिला पत्थर भी उसी प्रकार का था और एक विशेष मंच पर स्थापित था। इस आधार पर उत्खननकर्ताओं ने यह परिकल्पना प्रस्तुत की कि यह संभवतः किसी देवी अथवा स्त्री-तत्त्व (female principle) का पूजा-स्थल रहा होगा। इसे एक अनुष्ठानिक (ritual) स्थल माना जाता है।
स्वयं उत्खननकर्ताओं ने भी "मूर्ति-पूजा" का सबसे प्राचीन बहुत प्रबल संभावना" (strong probability) की बात कही थी, न कि पूर्ण निश्चितता की। 

2  उड़ीसा (ओडिशा) की राजधानी भुवनेश्वर (Bhubaneswar) के निकट  उदयगिर गुफा (Udayagiri Caves) में स्थित हाथी गुम्बा (Hāthigumphā) में कलिङ्ग के राजा खारवेल (Kharavela) का पहली शताब्दी ईसा पूर्व का अभिलेख मिला है जिसका संबंधित भाग कुछ स्थानों पर क्षतिग्रस्त है और उसके पाठ (reading) को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं उसके आधार पर ऐसा दावा किया जाता है कि, 345 ईसापूर्व से 321 ईसा पूर्व तक कुल 23 वर्ष तक ही चले नापित जाति के शुद्र नन्द वंश के किसी नन्दराजा द्वारा कलिङ्ग पर आक्रमण कर कोई धार्मिक धरोहर या एक पूजनीय वस्तु या जैन प्रतीक या जिन-प्रतिमा मगध ले जाई गई थी, और मगध में स्थापित किया था। परन्तु उसका सटीक स्वरूप निश्चित नहीं है।
कई शताब्दियों बाद खारवेल ने मगध पर अभियान किया। उसने उस प्रतिमा को पुनः कलिङ्ग वापस लाकर प्रतिष्ठित किया।
जैन परम्परा का मत है कि वह अग्रजिन (Agra-Jina) अथवा प्रथम जिन, अर्थात् (आदिनाथ) ऋषभदेव  (Rishabhanatha)  की प्रतिमा थी।
इस आधार पर यह माना जाता है कि, ईसा पूर्व चौथी–पाँचवीं शताब्दी तक पूर्वी भारत में जैन प्रतिमा-पूजा का कोई विकसित रूप विद्यमान था। जैन परम्परा के अनुसार उस नन्द शासक की पहचान महापद्म नन्द के रूप में करना सम्भावित तथ्य है, परन्तु पूर्णतः सिद्ध नहीं है।

3 मथुरा से 24 कि.मी. दक्षिण पश्चिम में सोंख नामक स्थान पर 1966 से 1974 के बीच जर्मन पुरातत्ववेत्ता हर्बर्ट हर्टेल के निर्देशन में हुए उत्खनन में ईसापूर्व 800 से 400 तक के खम्भों के गड्ढे, मिट्टी के घर आदि ग्रामीण बसावट के प्रमाण प्राप्त हुए।
इसके अतिरिक्त मोर्य का ईसा पूर्व पहली शताब्दी के अर्धवृत्ताकार नाग मन्दिर मिला;जिसका पुनर्निर्माण कुषाण काल में हुआ। यहाँ श्रमणों द्वारा पूजित यक्ष- यक्षिणी, नाग और मातृका की टेराकोटा (पकी मिट्टी) की प्रतिमाएँ भी मिली।

4 मध्यप्रदेश में विदिशा जिले में बेतवा और बेस नदी के सङ्मम क्षेत्र में बेसनगर (भिलसा) में  शुंग राजा 'भागभद्र' के शासनकाल में तक्षशिला के युनानी (ग्रीक) राजा 'एंटियालसिडस' के राजदूत श्रीकृष्ण और बलराम के उपासक  हेलियोडोरस ने 113 ईसापूर्व में गरुड़ध्वज स्तम्भ का निर्माण करवाया था।


शुक्रवार, 12 जून 2026

भारत की दुरावस्था के कारण।


भारत की दुर्दशा के प्रमुख कारण गुरुकुलों की समाप्ति, वेदाध्ययन , पञ्च महायज्ञ और अष्टाङ्ग योग साधना बन्द होना तथा विदेश यात्रा पर प्रतिबन्ध के कारण कुप मण्डुकता रहे।

जिन्हें आज दलित और पिछड़ा कहा जा रहा है इन सब कुलों/ वंशों का लगभग एक हजार वर्ष पहले बल्कि कई स्थानों पर तो उससे भी आगे तक किसी ना किसी क्षेत्र में शासन रहा है। 
ऊँच-नीच के सर्व प्रथम प्रमाण जैन-बौद्ध साहित्य में ही पाए जाते हैं। स्पष्ट है कि, किसी का भी मत परिवर्तन के लिए ऐसे दुष्प्रचार आवश्यक रहे होंगे।
फिर इनके व्यवसाय के नाम पर जाति मान लिया गया।
इन सभी व्यवसायों का भी अपरिहार्य महत्वपूर्ण स्थान हमारे समाज में मान्य था। कोई ऊँच नीच का भेद-भाव नहीं रहा।

इस्लामी आक्रांताओं के भारत में आगमन पूर्व कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है कि, इन लोगों के प्रति कोई दुर्भावना या भेद-भाव या अत्याचार हुआ हो। यह सत्य है कि, इस्लामी आक्रांताओं के जासूस पीर फकिरों की जादूगरी से चमत्कृत होने, जजिया कर देने से बचने और आक्रांताओं के अत्याचार से बचने के लिए सर्वाधिक मतांतरण इन्हीं लोगों का हुआ। इसलिए सनातन वैदिक वर्णाश्रम धर्म को बदनाम करने लगे।

गुरुवार, 11 जून 2026

अण्डाकार शिवलिङ्ग और अण्डाकार विष्णु लिङ्ग शालिग्राम पूजन।

वैदिक काल में भी तन्त्र मतावलम्बियों में चोरी-चुपके मूर्ति पूजा प्रचलित थी ही।  वैदिक उन्हें शिश्नेदेवाः कहते थे। और उनके संसर्ग को भी पाप समझते थे।

वैवस्वत मन्वन्तर में प्रचेताओं के पुत्र दक्ष द्वितीय यज्ञ विध्वंस के बाद प्रजापति ने विधि- विधान में संशोधन कर यज्ञ में रुद्र का भाग देना स्वीकार कर लिया तो शुक्राचार्य और दधिचि आदि ने शैव मत की स्थापना कर दी।
शुक्राचार्य के पुत्र त्वष्टा ने शाक्त मत की स्थापना कर दी और त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप ने तन्त्र मत की स्थापना कर दी। भारत में  दत्तात्रेय और उनके शिष्य कार्तवीर्य सहस्रार्जुन तथा रावण ने तन्त्र मत का प्रचार किया।
रामायण काल तक भारत में मूर्ति पूजा प्रचलित नहीं थी। अयोध्या में भगवान विष्णु के स्थान (स्थानक) और जनकपुरी में भगवती उमा के स्थान (स्थानक) का उल्लेख है। लेकिन लक्ष्यद्वीप में किल्तान द्वीप में स्थित रावण की राजधानी लङ्का में राक्षसों द्वारा पूजित यक्षिणी निकुम्भला की मूर्ति वाले मन्दिरों का ही उल्लेख पाया जाता है।
महाभारत में भी राक्षसों में ही मूर्ति पूजा और बलि प्रथा का उल्लेख मिलता है।
बाद में कुछ वन वासियों को नर्मदा घाटी में जब डायनासोर के अण्डों के जीवाश्म मिले तो उन लोगों ने उन्हें पूजना प्रारम्भ कर दिया।
उनके देखा देखी बाणासुर ने भी नर्मदा के जल प्रपात धाराजी में प्राकृतिक रूप से बनने वाले अण्डाकार पत्थरों को शिवलिङ्ग मानकर पूजना प्रारम्भ कर दिया। जिसे वनवासियों ने भी अपना लिया। अण्डाकार शिवलिङ्ग को स्थिर खड़ा रखने के लिए एक आधार बनाया जिसे जलाधारी कहा जाता है।
उधर वेद विरोधी नास्तिक अनीश्वरवादी जैन लोगों ने अरब प्रायद्वीप में प्रचलित विनायक और भैरव आदि की मूर्ति पूजा प्रारम्भ की तो, वैदिक वर्णाश्रम धर्मावलम्बी विष्णु उपासकों ने भी नेपाल में काली गण्डकी नदी में हिमालय काटकर बहाकर लाये जीवाश्मों को  मुक्तिधाम से दामोदर कुण्ड तक 65 किलोमीटर क्षेत्र में सेफैलोपॉड
(कपालपाद) की सर्पिल कक्षों को जोड़ने वाली 89 प्रकार की सीवन रेखा से बनी प्रतिमा स्वरूप (Suture Pattern) के शालिग्राम को विष्णु के चिह्न (विष्णु लिङ्ग) के रूप में पूजना प्रारम्भ कर दिया।
फिर ईरान की मीड संस्कृति के पुरोहितों को भगवान श्रीकृष्ण ने   साम्म के कुष्ठ रोग निवारण हेतु बुलाया तो पहले तो वे अथर्ववेदीय यज्ञ करते रहे। किन्तु जनमेजय के बाद उन्होंने ईरान में प्रचलित सूर्य पूजा के लिए सूर्य की मूर्ति स्थापित कर पूजा करने और गुजरात और उड़ीसा में मन्दिर बनाना प्रारम्भ कर दिया।
महाराष्ट्र और तमिलनाडु में विनायक गजानन की प्रतिमा पूजन प्रारम्भ हो गया। बङ्गाल में दूर्गा प्रतिमा पूजा होने लगी तो फिर दक्षिण भारत में वैष्णवों ने भी विष्णु, नारायण और श्रीहरि की मूर्ति बनाकर पूजना प्रारम्भ कर दिया।

अर्थात शैवों ने साढ़े छः हजार वर्ष पुराने जीवाश्म डायनासोर के अण्डों को शिव चिह्न (शिवलिङ्ग) के रूप में पूजना प्रारम्भ किया तो वैष्णवों ने भी चालिस करोड़ वर्ष पहले के और
सोलह करोड़ से अठारह करोड़ वर्ष पहले जब हिमालय के स्थान पर ऋग्वेद में उल्लेखित उत्तर सागर (टेथिस सागर) था; तब जुरासिक काल में समुद्र में विलुप्त हो चुके समुद्री अकशेरुकी जीवों का एक उपवर्ग अमोनोइडिया (Ammonoidea) जिन्हें आम तौर पर अमोनाइट्स (Ammonites) कहते हैं; समुद्री जीवों का एक विलुप्त हो चुका उपवर्ग (subclass) है। ये जीव कड़क (सख्त) चक्राकार खोल के अन्दर रहते थे। इस उपवर्ग का ऑक्टोपस - स्वविड के दूर के सम्बन्धी कपालपाद (Cephalopod सेफैलोपॉड) नामक समुद्री जीव का चक्राकार कवच  है। जो लाखों वर्ष में दबाव के कारण पत्थर जैसे बन गये केल्सियम और सिलिका से भरने से बने छिद्र और रेखाओ वाले कवच का जीवाश्म है।
हिमालय बनने पर उत्तर 
सागर उठा तब काली गण्डकी नदी ने हिमालय काटकर इन जीवाश्मों को बहाकर मुक्तिधाम से दामोदर कुण्ड तक 65 किलोमीटर क्षेत्र में  सर्पिल कक्षों को जोड़ने वाली 89 प्रकार की सीवन रेखा (Suture Pattern) बनी हैं।
जिनमें  
1 अमोनाइट का चक्राकार कवच सुदर्शन शालिग्राम सबसे अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है।

2 पास-पास दो कुण्डलित कवच वाला लक्ष्मी नारायण शालिग्राम,
 
3 पत्तीनुमा धारियों वाले वनमाली कवच, 

4 कवच का खुला सिरा टूटने से बना घोड़े के मूह जैसा कवच हयग्रीव शालिग्राम,
और

5 चपटा बहने से मछली के आकार वाला कवच मत्स्य शालिग्राम,
ये पाँच अधिक प्रसिद्ध है।

बुधवार, 10 जून 2026

उपवेद और वर्ण व्यवस्था।

ऋग्वेद का उपवेद आयुर्वेद विप्र वर्ण ने अपनाया। 
वन से जड़ी-बूटियों और खदानों से अयस्क लाकर, सङ्ग्रहण कर, चुर्ण, आसव-अरिष्ट, रसायन बनाने के लिए होम- हवन कर, भट्टियाँ लगा कर रस रसायन बना करऔषधि तैयार कर के रखते थे। 
नियमित जीवन के लिए पञ्च महायज्ञ और अष्टाङ्ग योग फिर भी दुर्घटना या युद्ध आदि के कारण घायल और रुग्ण होने पर नाड़ी परिक्षा और रक्त, कफ, मल- मुत्र परिक्षण करवा कर फिर प्राकृतिक चिकित्सा, औषधियों से चिकित्सा, पञ्चकर्म चिकित्सा, शल्य चिकित्सा और हाथ- पैर मोड़ना, दबाना, छिद्रण, मालिश, जोक से रक्त चुसवाना जैसे अनेक प्रकार से चिकित्सा करते थे। यह कार्य एक प्रकार की तपस्या ही है।

यजुर्वेद का उपवेद धनुर्वेद और अर्थशास्त्र क्षत्रियों ने अपनाया।
सामाजिक व्यवस्थापन हेतु दिन-रात सजग रहना, क्षेत्र रक्षण, देश की सुरक्षा हेतु युद्ध, बलिदान होने को तैयार रहना भी तप ही है।

सामवेद का उपवेद गन्धर्ववेद (नाट्य सङ्गीत) वैश्यों ने अपनाया क्यों कि, इसमें खर्च बहुत अधिक लगता है।
इस लिए धनार्जन करना और व्ययन, निवेश करना , बचत करना और अकाल आदि के समय कर्मियों, कलाकारों का भरण-पोषण करना भी एक त्याग- तपस्या ही है।

अथर्ववेद का उपवेद कार्मिक शुद्रों ने अपनाया।
ये लोग राजन्य वर्ग और सम्पन्न वैश्यों के आदेश- निर्देश पर पथ, सेतु, बांध, भवन, कुए-बावड़ी, तालाब, धर्मशाला, विद्यालय, चिकित्सालय-औषधालय आदि के भवन बनाना और शिल्पकला और चित्र कला द्वारा सजाने का कार्य करते हैं।
भारी भरकम बोझ ढोकर समुचित स्थान पर लगाकर सन्तुलन बनाए रखना जैसे कठिन कार्य भी एक प्रकार का तप करना ही है।

व्रात्य और व्रात्य पति।

व्रात्य का अर्थ ऐसे श्रमण जो संस्कार विहिन हो, निरग्नि हो, निर्ग्रन्थ हो, आचार भ्रष्ट हो, यहाँ तक कि, जिसने जननेन्द्रिय की नस मार ली हो समाज से बहिष्कृत ऐसे लोग व्रात्य कहलाते थे।
व्रात्य लोगों में, सन्यास आश्रम में ऋषभदेव, जड़ भरत जैसे ज्ञानी भी हुए और जैन मुनि बाहुबली भी हुए तो अघोरी भी व्रात्य की श्रेणी में आते हैं।

पहले शंकर जी और बाद में विनायक गजानन भी व्रात्यपति कहलाए।

सोमवार, 8 जून 2026

आकर्षण, आसक्ति (लगाव), राग/ अनुराग ,भ्रम और मोह तथा प्रेम और भक्ति में अन्तर

आकर्षण, आसक्ति (लगाव), राग/ अनुराग ,भ्रम और मोह तथा प्रेम और भक्ति में अन्तर होता है।
किसी भी विषय से सम्बन्धित ज्ञानेंन्द्रि के सम्पर्क में आने के साथ उस ज्ञानेन्द्रि से मन का संयोजन होने पर उस विषय के प्रति आकर्षण उत्पन्न हो जाता है। आकर्षण उत्पन्न होते ही कर्मेंन्द्रियाँ उस विषय भोग के लिए सक्रिय और तत्पर हो उठती है। या यूं कहें कि, उस विषय से सम्बन्धित वस्तु, स्थान या व्यक्ति को प्राप्त करने में लग जाती है।
आकर्षण का विरोधी भाव विकर्षण है। जिसका परिणाम उच्चाटन होता है । व्यक्ति उससे दूर हो जाना चाहता है। लेकिन मन ही मन स्मरण बढ़ता जाता है।
मतलब आकर्षक आसानी से समाप्त नहीं होता।

आकर्षण से उस विषय की स्मृति बारम्बार होती रहती है, या कहें चित्त में बनी रहती है। परिणाम स्वरूप उस विषय (वस्तु, व्यक्ति या स्थान) के प्रति लगाव हो जाता है। इसी लगाव के लिए उपयुक्त शब्द आसक्ति है। वह विषय व्यक्ति से चिपक जाता है। हटाये नहीं हटता। बल्कि और दृढ़ता से चिपकता जाता है।

परिणाम स्वरूप उसके प्रति राग उत्पन्न होता है। उससे व्यक्ति को सुखानुभूति होने लगती है। इससे अनुराग उत्पन्न हो कर व्यक्ति अनुरक्त हो जाता है। उसी में घुल-मिल जाता है।

परिणाम स्वरूप व्यक्ति को हर समय, प्रत्येक गतिविधि में उस विषय की अनुभूति होने लगती है। यह उसका भ्रम होता है।

लेकिन जब व्यक्ति उस भ्रम को ही सत्य समझने लगता है तो भ्रम के स्थाई भाव को मोह कहते हैं।
परिणाम स्वरूप व्यक्ति उस विषय में मोहित हो जाता है। जिसे फारसी भाषा में दीवानह' कहा जाता है, जिसका अर्थ उन्मादग्रस्त, विक्षिप्त या पागल होता है। किसी व्यक्ति के प्रति आसक्ति में मोहित होकर उन्मादी हुए व्यक्ति को उर्दू में दीवाना कहते हैं।

प्रेम इन सबसे पूर्णतः भिन्न भावना है।
प्रेम का आधार गुणों के प्रति श्रद्धा होता है।
किसी भी सद्गुण सम्पन्न व्यक्ति के प्रति प्रायः सभी सदाचारियों को सहज ही प्रेम उपजता है। प्रेम उमड़ता है।
बालक के गुणों से उपजे प्रेम को वात्सल्य कहते हैं।
आजकल लोग भाषाई अज्ञान वश वात्सल्य भाव को माँ की ममता कहते हैं। जबकि ममता का अर्थ मेरापन होता है। ममता अहंकार का परिणाम है। इसीलिए अहन्त- ममता अर्थात मैं- मेरा शब्द साथ में ही आते हैं।
प्रेम प्राकृतिक भाव है। प्रेम न किया जाता है, न हो जाता है। बल्कि प्रेम सनातन भाव है; जो सदा से था। है और सदा रहेगा।
प्रेम सद्गुणों के प्रति श्रद्धा से होता है; ज्ञान से होता है। प्रेम किसी विषय, व्यक्ति, वस्तु या स्थान के प्रति नहीं होता।

जब प्रेम में आदर, सम्मान जुड़ जाता है तब वही प्रेम भक्ति कहलाता है।

गुरुवार, 28 मई 2026

लगभग उन्नीस हजार श्लोक वाले गरुड़ पुराण और राजस्थान के पाली जिले के ग्राम सोजत के पण्डित रामेश्वर जी श्रीमाली के मार्गदर्शन में जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह के मंत्री लधराज द्वारा राजस्थानी हिन्दी में सम्पादित छोटी पुस्तिका श्री विष्णु सारोद्धर्म में अन्तर।

*लगभग उन्नीस हजार श्लोक वाले गरुड़ पुराण और राजस्थान के पाली जिले के ग्राम सोजत के पण्डित रामेश्वर जी श्रीमाली के मार्गदर्शन में जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह के मंत्री लधराज द्वारा राजस्थानी हिन्दी में सम्पादित छोटी पुस्तिका श्री विष्णु सारोद्धर्म में अन्तर।*


*गरुड़ पुराण।*
*गीता प्रेस संस्करण  कोड 72। सबसे शुद्ध और प्रचलित है।*

*अठारह महापुराणों में से एक  भगवान विष्णु द्वारा गरुड़ जी को सुनाया गया गरुड़ पुराण लगभग उन्नीस हजार श्लोकों में भगवान विष्णु और गरुड़ के संवाद पर आधारित पूर्व खण्ड और उत्तर खण्ड दो खण्ड दो खण्डों में जीवन और मरण दोनों की नियमावली (मैन्युअल) है।*
*पूर्व खण्ड बताता है कि , कैसे जीना है और  उत्तर खण्ड बताता है मरने के बाद क्या होगा इसलिए उत्तर खण्ड को प्रेत कल्प भी कहते हैं। गरुड़ पुराण  के मुख्य देवता भगवान विष्णु  हैं।*
*गरुड़ पुराण का रचनाकाल चौथी से दसवीं शताब्दी के बीच, कई बार संशोधित हुआ।*

 *गरुड़ पुराण की  तीन बड़ी सीख।*

*1 कर्म का फल निश्चित है जैसा कर्म करोगे, तो वैसी योनि और वैसा ही स्वर्ग या नर्क मिलेगा।*
*2 दान-श्राद्ध का महत्त्व ,गया में पिंडदान, अन्नदान, गौदान से प्रेत योनि छूटती है।*
*3 विष्णु भक्ति ही तारने वाली है। अंत समय में ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र ही यम के फंदों से बचाता है।*

*विषय सूची।
*पूर्व खण्ड - आचार काण्ड जीवन सुधारने के लिए आयुर्वेद, नीति, धर्म की बातें हैं जो गृहस्थ के काम की हैं।*

*यह जीवन जीने की कला सिखाता है। मृत्यु से पहले का ज्ञान।*

*1 सृष्टि वर्णन --* 
*ब्रह्मांड की उत्पत्ति, 14 लोक, युग धर्म*
*2 सूर्य-चंद्र वंश वर्णन और चौबीस अवतार--*
 *राजाओं की वंशावली, विष्णु के चौबीस अवतार*
*3 धर्म-नीति --*
*दान, व्रत, तीर्थ, एकादशी, तुलसी माहात्म्य*
*4 आयुर्वेद--*
 *रोग, औषधि, रस-रसायन, नाड़ी परीक्षा* 
*5 ज्योतिष --* 
*ग्रह, नक्षत्र, शकुन-अपशकुन, स्वप्न फल*
*6 व्याकरण और छन्द --* *संस्कृत व्याकरण, काव्य शास्त्र* 
*7 रत्न और वास्तु --* *मणि-माणिक्य की पहचान, गृह निर्माण नियम*
*8 राजनीति --*
*राजा के कर्तव्य, युद्ध नीति*

*द्वितीय खण्ड  --* 
*उत्तर खण्ड / प्रेत कल्प पाप का भय नरकों का वर्णन पढ़कर मनुष्य पाप से बचता है।इसी भाग के कारण गरुड़ पुराण सबसे ज्यादा जाना जाता है।*

*मृत्यु के बाद का ज्ञान।*
*1 मृत्यु के लक्षण --* *मनुष्य को मरने से पहले कैसे संकेत मिलते हैं।*
*2 यममार्ग का वर्णन --*
*मृत्यु के बाद जीवात्मा सैंतालीस दिन में यमलोक कैसे पहुँचती है। वैतरणी नदी, यमदूत।*
*3 चोरासी लाख योनियाँ--* 
*किन किन कर्मों के अनुसार कौन-कौन सी योनि मिलती है।*
*4 नरक वर्णन--*   *तामिस्र, अंधतामिस्र, रौरव, कुंभीपाक आदि अट्ठाईस प्रकार के नर्क ।*
 *किस पाप से कौन-सा नर्क मिलता है।*
*5 प्रेत योनि --*
*प्रेत कौन बनता है, प्रेत बाधा से मुक्ति कैसे हो।*
*6 श्राद्ध-तर्पण --* *अंत्येष्टि, दशगात्र, सपिण्डीकरण, पिण्डदान, गया श्राद्ध की विधि।*
*7 मोक्ष उपाय--*
 *गीता पाठ, विष्णु सहस्रनाम, गया में पिंडदान से मुक्ति।*

 *परम्परा अनुसार घर में मृत्यु होने पर तेरह दिन तक प्रेत कल्प का पाठ कराते हैं। लेकिन आजकल उसके स्थान पर राजस्थान के सोजत के पण्डित रामेश्वर जी श्रीमाली की रचना विष्णु सारोद्धर्म मृत्यु उपरान्त तेरह दिनों तक गरुड़ पुराण के नाम से कर्मकाण्डी पण्डित लोग सुनाते हैं।*
*मान्यता है कि गरुड़ पुराण द्वितीय खण्ड प्रेत कल्प का पाठ मृतक की आत्मा को यममार्ग में कष्ट नहीं होता और सद्गति मिलती है।*
 लेकिन 
*राजस्थान के सोजत के पण्डित रामेश्वर जी श्रीमाली की रचना विष्णु सारोद्धर्म नामक पुस्तिका का पाठ कर सन्तोष कर लिया जाता है।*

*ध्यान रखें कि, श्री विष्णु सारोद्धर्म नामक पुस्तक महामहोपाध्याय पण्डित श्री कृष्णदत्त शास्त्री रचित स्मार्त कार्यकलाप या गृहस्थ कर्मकलाप से पूर्णतः असम्बन्धित और बिल्कुल भिन्न पुस्तक है।*


*श्री विष्णु सारोद्धर्म पुस्तिका।*
*राजस्थानी-मालवी क्षेत्र में गृहस्थों में बहुत प्रचलित श्री विष्णु सारोद्धर्म पुस्तिका वैष्णव कर्मकाण्ड की छोटी पुस्तिका है। इसमें विष्णु पूजा, व्रत, तिलक, तुलसी माहात्म्य, एकादशी विधि आदि का सार दिया गया है।*

*विष्णु सारोद्धर्म पुस्तिका के वास्तविक रचयिता राजस्थान के पाली जिले के ग्राम सोजत के पण्डित रामेश्वर जी श्रीमाली कहे जा सकते हैं । उन्ही के मार्गदर्शन में राजस्थानी हिन्दी में विष्णु सारोद्धर्म पुस्तिका का सम्पादन जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह के मंत्री लधराज ने किया था।*
*सत्रहवीं शताब्दी में जोधपुर के महाराजा जसवंतसिंह के मंत्री लधराज ने स्वयम्  उनके ग्रंथों में संस्कृत के प्रकांड पण्डित और कर्मकाण्ड, पुराण, धर्मशास्त्र के ज्ञाता राजस्थान के सोजत के पण्डित रामेश्वर जी श्रीमाली का उल्लेख किया है ।*

*चुंकि महाराजा जसवंतसिंह के मंत्री लधराज संस्कृत नहीं जानते थे, इसलिए संस्कृत के आधार पर बने ग्रंथ उन्होंने पण्डित रामेश्वर श्रीमाली जैसे विद्वानों से सुनकर लिखे।*

बुधवार, 27 मई 2026

शान्ताकारम भुजगशयन विष्णु स्तुति।

*शान्ताकारम् भुजगशयनम् पद्मनाभम् सुरेशम्विश्वाधारम् गगनसदृशम् मेघवर्णम् शुभाङ्गम्।लक्ष्मीकान्तम् कमलनयनम् योगिभिर्ध्यानगम्यम्वन्दे विष्णुम् भवभयहरम् सर्वलोकैकनाथम्॥*

अर्थ ---

*शेषनाग को अनन्त कहते हैं। मतलब प्रकृति - प्रलय काल मे जब गुण साम्यावस्था में प्रकृति ही शेष रहती है,*
 *जिसे एकार्णव अनन्त सागर भी कहते हैं प्रलय उपरान्त भी शेष बची नार नामक प्रकृति के अनन्त सागर रूपी एकार्णव में कमल के समान नाभि (केन्द्र) और कमल की पङ्खुड़ियों के समान नयन वाले, वाले शान्त स्वरूप में स्थित, समस्त धन ऐश्वर्य के स्वामी लक्ष्मी पति, प्रजापति , इन्द्र, द्वादश आदित्य और एकादश रुद्र नामक देवताओं के भी शासक (ऋग्वेद 1/22/20 एवम् ऋग्वेद 01/155/06 के अनुसार चक्रधारी विष्णु परमपद को उक्त देव गण भी टकटकी लगाकर देखते रहते हैं), सम्पूर्ण जगत रूपी शुभ अङ्गो वाले समस्त ब्रह्माण्डों सहित सम्पूर्ण विश्व सृष्टि के आधार घनश्याम आकाश के समान सर्वव्यापी जन्म, मृत्यु , जरा, व्याधि, पीड़ा रूपी कर्म बन्धन के भव भय को हरण करने वाले भगवान नारायण का सर्वव्यापी विष्णु स्वरूप योगियों के ध्यान से कभी हटता ही नहीं। अर्थात सर्वव्यापी विष्णु योगियों के ध्यान में सतत् बने ही रहते हैं।*

यह श्लोक वेद, ब्राह्मण ग्रन्थों, सूत्र ग्रन्थों में रामायण महाभारत या पुराणों में नहीं मिलता है।
लेकिन महाभारत का अनुशासन पर्व, अध्याय 149 (भीष्म-युधिष्ठिर संवाद) में उल्लेखित विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र के पाठ से पूर्व पढ़ा जाने वाला ध्यान श्लोक के रूप में सर्वप्रिय विष्णु स्तुति है।

ऐसा अनुमान है कि, किसी ध्यान योगी ने निम्नांकित वर्णनों को ध्यान में रखते हुए शान्ताकारम भुजगशयन विष्णु स्तुति की रचना की है।* ⤵️

*ऋग्वेद ऋग्वेद 1/22/20 और एतरेय ब्राह्मण ग्रन्थ में विष्णु को परम पद कहा है।और कहा है कि, देवता भी विष्णु परम पद को (टकटकी लगाकर) देखते हैं।*

*तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्॥* ऋग्वेद 1/22/20 ।
तथा 
ऋग्वेद 01/155/06 में वर्णित ---
*विष्णु के हाथ में नियति चक्र है । 90×4 =360 अरों का चक्र है। (चार गुणित नब्बे अर्थात 360अरोंं का संवत्सर चक्र है।) तीनसौ साठ सायन सौर दिनों का संवत्सर ही नियति चक्र कहलाता है।*
*"चतुर्भि: साकं नवतिं च नामभिश्चक्रं न वृत्तं व्यतीँरवीविपत्। बृहच्छरीरो विमिमान ऋक्वभिर्युवाकुमार: प्रत्येत्याहवम् ॥*
" ऋग्वेद 01/155/06
तथा 
*महाभारत, वनपर्व /मार्कण्डेयसमास्यापर्व अध्याय 188, श्लोक 128-134* ।
या
*महाभारत, वनपर्व 3.188.128-134*।
और
*श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कन्ध 12 अध्याय 9, श्लोक 29-34*।
या
*श्रीमद्भागवत 12.9.29-34*।


*महाभारत वनपर्व 3.188.128-134 में वर्णित चिरञजीवी महर्षि मार्कण्डेय जी के द्वारा समाधि अवस्था में प्रलयान्तकाल में वटपत्रशायी भगवान के दर्शन दर्शन के आधार पर रचा है।*

1 *महाभारत, वनपर्व 3.188.128-134* । का अर्थ

*मार्कण्डेय जी कहते हैं - मैंने वहाँ* 
अर्थ
*महाशाखाओं वाला वटवृक्ष  (न्यग्रोध) देखा। उसकी शाखा के दिव्य सुशोभन पत्र पर एक बालक लेटा था। वह श्रीमान्, कमल-नयन, दिव्य लक्षणों से युक्त था। उसने मुझे देखकर कहा - "मार्कण्डेय, तुम थके हो, यहाँ विश्राम करो"। फिर उस अचिन्त्य बालक ने सहसा मुझे ग्रस लिया। उसके उदर में मैंने सम्पूर्ण जगत् देखा। बाद में वह शय्या (पर्यङ्क) पर लेटा बालक अपने पैर का अंगूठा मुख में लिए मुस्कुराता हुआ स्थित था। वह देवदेव जनार्दन था।*

*श्रीमद्भागवत 12.9.29-34*
का अर्थ

*मार्कण्डेय जी ने वट के शुभ पत्र पर लेटे हुए एक बालक* को देखा जो *अपने मुख से अपने चरणकमल को चाट रहा था। उसके उदर में चौदहों भुवन देखकर मुनि विस्मित हो गए। वह साक्षात् अनन्त अच्युत हरि थे। भगवान ने कहा - "हे वत्स मार्कण्डेय, मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूँ, वर माँगो"।*

*मूल वर्णन---*
*महाभारत, वनपर्व /मार्कण्डेयसमास्यापर्वअध्याय 188, श्लोक 128-134*।
*न्यग्रोधं च महाशाखं तत्रापश्यं महाद्युतिम्।* *शाखायां तस्य वृक्षस्य पत्रे दिव्ये सुशोभने॥* 128॥

 *उपविष्टं महाराज बालं पर्यङ्कशायिनम्।* *श्रीमन्तं पद्मपत्राक्षं दिव्यलक्षणलक्षितम्॥ 129॥*  
*स मामालोक्य नयनैर्विशालैः पुरुषोत्तमः।* *उवाच श्लक्ष्णया वाचा प्रीणयन्निव भारत॥ 130॥* *मार्कण्डेय भवान् ज्ञातः क्लान्तः शरणमिच्छसि।* *विश्राम्यतां भवानेह यावदिच्छसि भारत॥ 131॥*   
*इत्युक्तोऽहं तदा तेन बालेनेन्दीवरत्विषा।*  
*अचिन्त्येनाप्रमेयेण विस्मयं परमं गतः॥ 132॥*  
*ततः स बालः सहसा मुखं कृत्वा सुनिर्मलम्।*  
*मां ग्रसित्वा ततः श्रीमानन्तर्धानमितो गतः॥ 133॥*  
*अङ्गुष्ठं स्वं मुखे कृत्वा बालः पर्यङ्कशायिनः।* *आस्ते स्मितमुखः श्रीमान् देवदेवो जनार्दनः॥ 134॥* *महाभारत, वनपर्व 3.188.128-134*

*2. श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कन्ध 12 अध्याय 9, श्लोक 29-34*--- *तत्रैकदारकं शयानं वटपत्रपुटे शुभे।लिहन्तं पादकमलं मुखेन स्वेन पश्यतः॥ 29॥*  
*निलीनं तस्य जठरे भुवनानि चतुर्दश। वीक्ष्य विस्मितहृदयो मुनिर्विस्मयमाययौ॥ 30॥*  
*तं वीक्ष्य बालकं दृष्ट्वा मुनिः परमविस्मितः।अनन्तमच्युतं साक्षात् प्रपेदे शरणं हरिम्॥ 31॥*  
*श्रीभगवानुवाच* *भो भो वत्स महाभाग मार्कण्डेय महामुने।* *तोषितोऽहं भवद्भक्त्या वरं वरय सुव्रत॥ 34॥*

 इसमें प्रायः अधिकांश लोग "योगिभिर्ध्यानगम्य्म" का सही उच्चारण नहीं कर पाते हैं
सही उच्चारण के लिए अन्वय करके सीख सकते हैं।
*योगिभिर्ध्यानगम्य्म् ।*
*योगिभिः ध्यान गम्यम्।*
*योगिभि र् ध्यान गम्यम्।*

शान्ताकारम् भुजग शयनम् पद्मनाभम् सुरेशम्

 विश्वाधारम् गगन सदृशम् मेघवर्णम् शुभाङ्गम्।

लक्ष्मीकान्तम् कमलनयनम्

 योगिभि र् ध्यान गम्यम्  वन्दे विष्णुम्

 भवभय हरम् सर्वलोक एक नाथम्॥






स्मार्त गृहस्थों के लिए शुद्ध हिन्दी में लिखित पास्कर गृह्यसूत्र, मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति आदि के प्रमाण सहित कर्मकाण्ड का सम्पूर्ण ग्रन्थ स्मार्त कर्मकलाप या गृहस्थ कर्मकलाप ग्रन्थ।

*महामहोपाध्याय पं. श्रीकृष्णदत्त जी शास्त्री रचित स्मार्त कर्मकलाप या  गृहस्थ कर्मकलाप में प्रत्येक विधि के साथ मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य, पारस्कर गृह्यसूत्र आदि के प्रमाण सहित संस्कृत मंत्रों के साथ सरल हिन्दी में अर्थ सहित हिन्दी में लिखा गया गृहस्थों के लिए सम्पूर्ण कर्मकांड का लगभग 900-1000 पृष्ठ का वृहद ग्रंथ विश्वकोश है।*  
 पहले गीता प्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित किया गया था लेकिन बाद में उन्होंने छोटी छोटी पुस्तकों में विभाजित कर प्रकाशित करना प्रारम्भ कर दिया।
*काशी के विद्वान अग्निहोत्री पं. प्रभुदत्त जी शास्त्री ने भी गीता प्रेस की विश्वसनीयता के साथ स्मार्त कर्मकलाप या  गृहस्थ कर्मकलाप की प्रशंसा की थी।*
*पहले कर्मकांड की सारी पुस्तकें संस्कृत में पद्धति रूप में थीं। पुरोहितों के अलावा कोई समझ नहीं पाता था।*

*महामहोपाध्याय पं. श्रीकृष्णदत्त जी शास्त्री ने कर्मकलाप में पहली बार हर विधि को हिन्दी में समझाकर लिखा लगभग 900 पृष्ठों का प्रामाणिक ग्रन्थ है।*
*लेखक पं. श्रीकृष्णदत्त जी ने स्वयं लिखा है कि;*
 *"संस्कृत न जानने वाले हिन्दी पढ़े-लिखे गृहस्थ भी सारे कर्मकांड समझ सकें, इसलिए मैंने यह ग्रंथ लिखा। इसके बिना कर्मकांड अधूरा ही रह जाता है।"* 
*पुरोहित न मिले तो भी सामान्य गृहस्थ स्वयम् पढ़कर कर्म कर सकते हैं।*

*स्मार्त कर्मकलाप या गृहस्थ कर्मकलाप ग्रंथ की संक्षिप्त विषय सूची ---*
*कर्मकलाप में जन्म से मृत्यु तक के सारे संस्कार और नित्य-नैमित्तिक कर्म हैं।*
*प्रथम खण्ड  -- नित्य कर्म।*
*1  प्रातः स्मरण, शौच, स्नान विधि।*
*2 संध्योपासन -- त्रिकाल संध्या, गायत्री जप, तर्पण।*
*3 पंचदेव पूजा, तुलसी-शालिग्राम पूजा।*
*4 बलिवैश्वदेव, भोजन विधि, शयन विधि।*

*द्वितीय खण्ड -- षोडश संस्कार।*
*1 गर्भाधान से अन्त्येष्टि तक षोडष संस्कार --* 
*नामकरण, अन्नप्राशन, मुंडन, यज्ञोपवीत, विवाह आदि सभी संस्कार।*
*2 हिन्दी में प्रत्येक संस्कार की सामग्री सूची, मंत्र, विधि, प्रयोजन।

*तृतीय खण्ड -- व्रत-पर्व-त्योहार*
*1 एकादशी, पूर्णिमा, अमावस्या, संक्रांति व्रत।*
*2 गणेश चतुर्थी, नवरात्र, दीपावली, होली, शिवरात्रि - पूजा विधि, कथा, उद्यापन।*

*चतुर्थ खण्ड --  श्राद्ध-तर्पण।*
*1 एकोदिष्ट, पार्वण, महालय श्राद्ध विधि।*
*2 पिंडदान, ब्राह्मण भोजन, गया श्राद्ध का महत्त्व।*

*पञ्चम खण्ड--- ज्योतिष प्रकरण।*

*1 गणित ज्योतिष--* *तिथि, वार, नक्षत्र, योग, करण आदि पंचांग देखना,* 
*2 फलित ज्योतिष --* 
*मुहूर्त, कुंडली के मूल सिद्धांत, ग्रह शांति।*
*3 यात्रा, गृह प्रवेश, विवाह मुहूर्त कैसे निकालें।*

*षष्ठ खण्ड --*  
*वैदिक कर्मकांड।*
*1 अग्निहोत्र, दर्श-पौर्णमास आदि श्रौत कर्मों का संक्षिप्त परिचय।*
*2 रुद्राभिषेक, नवग्रह शांति, सत्यनारायण व्रत कथा।*

*गीता प्रेस गोरखपुर की किसी भी दुकान पर - कोड 567 महामहोपाध्याय पं. श्रीकृष्णदत्त जी शास्त्री रचित और गीता प्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित स्मार्त कर्मकलाप या  गृहस्थ कर्मकलाप  मिल सकती है।*
*ऑनलाइन मंगाना चाहें तो --* *http://gitapress.org  से मंगवा सकते हैं।*
*पहले तो मुल्य लगभग ₹250/- या ₹300/- था।*

गुरुवार, 14 मई 2026

हिन्दू शब्द के अर्थ में मतभिन्नता पर मीमांसा।

क्या ऐसे सभी उदाहरण देखने के बाद भी यह स्वीकारना उचित होगा कि, तान्त्रिक नाथ, जैन, बौद्ध, खालसा, लिङ्गायत को सनातन वैदिक धर्मी माना जाए।
सिन्धु नदी के पूर्व में बसे गेहुंआ रङ्ग के लोगों के लिए ईरान के पारसियों के धर्मग्रन्थ जेन्द अवेस्ता में पारसियों के आचार्य जरुथ्रुस्ट द्वारा श्रीकृष्ण द्वेपायन व्यास जी (भगवान वेदव्यास जी) से हुए संवाद के प्रकरण में वेदव्यास जी के काले रङ्ग को देख कर पारसी भाषा में उन्हें हिन्दू कहा था। जैसे युरोपीय लोग भारतियों, अमेरिका और आस्ट्रेलिया के मूल निवासियों ब्लेक कहते हैं।
इस आधार पर ईरानी पारसी भारतियों को हिन्दू कहते थे। इसलिए अरबी जातियों के इस्लामी आक्रांताओं ने भी भारतियों को हिन्दू कहा।
संविधान ने गत तीन हजार वर्षों से भारत में निवास करने वाली सभी जातियों को हिन्दू कहा है। जिसमें टर्की से आकर बसे चन्द्रवंशी पुरु, यदु, तुर्वसु, अनु और दृह्यु की सन्तान, ईरानी परशु (पर्शियन), तिब्बती शक, कुषाण और मङ्गोलियाई हूण सम्मिलित हैं। फिर चाहे वे भारत में जन्मे तान्त्रिक नाथ, जैन, बौद्ध, खालसा या लिङ्गायत किसी भी पन्थ के अनुयाई हो; सभी को हिन्दू माना है। यहाँ हिन्दू से तात्पर्य दीर्घावधि से भारतीय भूमि में निवासरत और भारतीय मत, पन्थ और संस्कृति को अपना चुकी जनता से है।
जबकि, इस्लामी आक्रांताओं से बचकर भारत में बसे जरुथ्रुस्ट के अनुयाई पारसी, और अब्राहमिक मतावलम्बी यहुदी, ईसाई, मुस्लिम और बहाई पन्थ के लोगों को गैर हिन्दू कहा है।
तात्पर्य यह कि, भारतीय संविधान में हिन्दू शब्द मत, पन्थ, सम्प्रदाय के अर्थ में प्रयोग नहीं किया गया है। बल्कि मूल भारतीय जन के अर्थ में प्रयोग किया है।
जबकि सावरकर और हेडगॉवार, मुञ्जे, गोल वर्कर के अनुयाई हिन्दू महासभा, रा.स्व.से. संघ और उसके अनुशंङ्गी संगठन जनसंघ, विश्व हिन्दू परिषद, बजरङ्ग दल, भा. ज.पा. आदि सभी सङ्गठन विभाजन पश्चात वर्तमान भारत में रह रहे सभी भारतवासियों को हिन्दू कहते हैं।
रा. स्व. से. संघ का हिन्दू यथार्थवादी किसी भी सिद्धान्त से मैल नहीं खाता है। बल्कि शुद्ध काल्पनिक अवधारणा है।
किसी के कुछ भी मान लेने मात्र से सत्य नहीं बदल जाता।

अवतार रहस्य

जब दृढ़तापूर्वक वर्णाश्रम धर्म का पालन करने के उपरान्त जीवन मुक्त हुआ व्यवस्था सम्बन्धी विशेष योग्यता को धारी कोई पुरुष या स्त्री स्वैच्छिक रूप से वैकुण्ठ में किसी लोक विशेष में भविष्य में सृष्टि हित के किसी कार्य विशेष के सम्पादन के लिए अपना अस्तित्व बनाए रखता है। तब तदनुरूप परिस्थिति उत्पन्न होते ही ऋत की व्यवस्था के अनुसार वह मुक्त महापुरुष/स्त्री शरीर धारण कर मृत्युलोक में उतरता है उसे अवतरण कहते हैं, और उस महापुरुष/ स्त्री को अवतार कहते हैं।
उसके सहयोग हेतु देवताओं के लोक से कोई देवांश भूमि पर उतरते है।
ये पूरा समुह कुछ निर्धारित कार्य पूर्ण करने तक की समयावधि के लिए ही आते हैं और कार्य पूर्ण होने पर वापस अपने लोक में लौट जाते हैं।
इसमें कुछ अपवाद जो मृत्युलोक में ही कुछ कार्य शेष रहने के लिए रुकते भी हैं जैसे कल्कि अवतार को शास्त्रार्थ का शिक्षण प्रशिक्षण के लिए भगवान परशुराम जी अवतार का कार्यभार समाप्त होने पर भगवान श्री रामचन्द्र जी को अवतार का कार्यभार सोप कर स्वयम् तप करते हुए भूमि पर ही रहते हैं। और रुद्रांश हनुमानजी भी भूमि पर ही रह रहे हैं। ये चिरञ्जीवी कहलाते हैं।
जबकि काल के द्वारा कार्य पूर्ण होने का सन्देश देने पर भगवान श्री रामचन्द्र जी, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न तुरन्त साकेत लोक लौट गए। और बाली का ऋण उतारने का अन्तिम शेष कार्य पूर्ण कर जरा के रूप में जन्मे बाली के साधारण सा जहर बुझा तीर एड़ी में लगने पर अपनी लीला संवरण कर गोलोक पधार गये।
भगवान परशुराम और भगवान श्री राम आमने-सामने आने पर नहीं जानते थे कि, परशुरामजी का अवतारत्व वैष्णव धनुष हस्तान्तरण के माध्यम से श्री रामचन्द्र जी में समाहित हो जाएगा। और भगवान परशुराम केवल ऋषि रहकर तप करते हुए कल्कि अवतार को धनुर्वेद का शिक्षण प्रशिक्षण देने तक रुकेंगे।
भागवत पुराण के अनुसार द्वारिका के ब्राह्मण आठ पुत्रों को लेने पश्चिम सागर से होते हुए पाताल में नाग लोक में शेषनाग के महल में विराजमान अष्टभुजा धारी भगवान भूमा के समक्ष उपस्थित होने पर भगवान भूमा नारायण द्वारा बतलाया गया कि, हे कृष्ण तुम पिछले जन्म में नारायण ऋषि थे और अर्जुन नर नामक ऋषि थे। तुम दोनों ने नर नारायण पर्वत पर तप किया था। तुमसे मिलने के लिए इन ब्राह्मण बालकों को लाया गया था। तुम इन्हें लेजाकर ब्राह्मण को सोप दो।
ये सब तथ्य सिद्ध करते हैं कि, भगवान विष्णु और माया को या भगवान प्रभविष्णु और श्री लक्ष्मी को भगवान नारायण और नारायणी को या भगवान श्रीहरि और कमलासना गज सेवित कमला को भूमि पर जन्म नहीं लेना पड़ता है।
सभी अवतार अलग-अलग लोक से आये और वहीं वापस लौटे भी।
धर्म आधारित इसी व्यवस्था को अपनी-अपनी विचारधारा के अनुसार अलग-अलग नाम-रूपों में सभी पन्थों ने अपनाया।
जैनों ने अनीश्वरवादी विचारों के अनुकूल तीर्थंकर कहा। तो, बौद्धों ने भौतिक दृष्टिकोण से बोधिसत्व कहा। और अब्राहमिक मतावलम्बियों ने नबी कहा और खालसा पन्थ ने गुरु कहकर स्वीकारा।

शुक्रवार, 8 मई 2026

वास्तविक धर्म, कर्तव्य कर्म और निषिद्ध कर्म।

मनुस्मृति (6/92) के अनुसार धर्म के 10 मुख्य लक्षण हैं,  
*धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।धीर्विद्या सत्यमक्रोधो, दशकं धर्मलक्षणम्॥*
अर्थात 
*धृति (धैर्य), क्षमा, दम (मन पर नियंत्रण), अस्तेय (चोरी न करना), शौच (पवित्रता), इन्द्रिय-निग्रह (इंद्रियों पर नियंत्रण), धी (बुद्धि), विद्या (ज्ञान), सत्य (सत्यता), और अक्रोध (क्रोध न करना)।*
जो व्यक्तिगत आचरण और नैतिकता को परिभाषित करते हैं।

*महाभारत/अनशासन पर्व। अध्याय 115*: भीष्म पितामह के अनुसार धर्म के 13 लक्षण गिनाए हैं:  
    *सत्यं शौचं दया क्षान्तिस्त्यागः सन्तोष आर्जवम्।*  
    *दमः शमस्तपः साम्यं तितिक्षोपरतिर्धृतिः॥* 115.11  
   *सत्य, पवित्रता, दया, क्षमा, त्याग, संतोष, सरलता, इन्द्रिय-निग्रह, मन-निग्रह, तप, समता, सहिष्णुता, वैराग्य और धैर्य।*

पतञ्जली के योग दर्शन में भी 
*अहिंसा, सत्य अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह* 
ये पाँच यम अर्थात धर्म कहे गए हैं।
 और  उक्त धर्म पालन मे सहायक और सहयोगी पाँच नियम बतलाये हैं।
*शोच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान।*

इसलिए ही ब्राह्मण ग्रन्थों में 

1 *संध्या, वेदाध्ययन और अष्टाङ्गयोग ब्रह्म यज्ञ*  

2 *पर्यावरण व्यवस्था और रोगाणु-, जीवाणु-किटाणु नाशक अग्निहोत्र रूपी देव यज्ञ*, 

3 *मानव सेवा, ब्रह्मचारी, संन्यासी, बिमार और अशक्तों की सेवा सेवा तथा गुरुकुल, चिकित्सालय, औषधालय आदि की व्यवस्था में सहयोग रूपी नृयज्ञ*,

4 *पशु-पक्षी और वनस्पतियों की सेवा रूपी बलिवैश्वदेव कर्म और भूत यज्ञ* एवम

5 *बुजुर्गो की सेवा, उनकी अतृप्त इच्छाएँ पूरी करने हेतु कुए, बावड़ी, तालाब, धर्मशाला, सदावृत , पुस्तकालय, वाचनालय आदि के निर्माण, रखरखाव और सञ्चालन में सहयोग करना रूपी पितृ यज्ञ श्राद्ध कर्म* 
करने को नित्य कर्म घोषित किया गया है।

*इसके विधि विधान कर्मकाण्ड भास्कर, ब्रह्म नित्य कर्म समुच्चय, आह्निक सूत्रावली, और सबसे सरलतम गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित नित्य कर्म पूजा प्रकाश में उपलब्ध है।*

और
*श्रुति अर्थात वेदों पर आधारित ब्राह्म धर्म और ब्राह्मण ग्रन्थों पर आधारित ब्राह्मण धर्म में प्रतिमा या मूर्ति पूजा, अभिषेक, षोडशोपचार पूजन को निषिद्ध और घृणित कर्म माना जाता है।*

*लिङ्ग और योनि की प्रतिमा/ मूर्ति बनाकर अभिषेक और षोडशोपचार पूजन करने वाले शिश्नेदेवाः को दूर करने की प्रार्थना की गई है।*

*ऋग्वेद सप्तम मण्डल/ सूक्त 21 मन्त्र 05 में कहा है कि,*
मन्त्र ---
*न यातव इन्द्र जुजुवुर्ना न वन्दना शविष्ठ वेद्यभि। न श्रीरर्द्धयो विष्णुनस्य जन्तोर्मा शिश्नदेवाः अपि गुऋतम् नः।।*

 *ऋषि वसिष्ठ इंद्र से शिश्नेदैवाः अर्थात लिङ्ग और भग (शिवलिङ्ग) की पूजा करने वाले यातुधान अर्थात (असुर, दैत्य दानव, आदि शत्रुओं से सुरक्षा की प्रार्थना कर रहे हैं।*

अर्थात ---

*"हे बलवान इंद्र!* 
(दुष्ट, कृतघ्न, अधार्मिक, विलासी) *शिश्नेदैवाः अर्थात लिङ्ग और भग (शिवलिङ्ग) की पूजा करने वाले यातुधानों अर्थात (असुर, दैत्य दानव, आदि) शत्रुओं से हमारी रक्षा कीजिए।*
*लिङ्गपूजक असूर लोग हमें परेशान न कर सकें; उन पर हमारी दृष्टि पड़ने, उनकी छाया पड़ने, उनके स्पर्श दोष से, हमारी समृद्धि को आधी न हो पाए। हे सर्वव्यापी विष्णु देव! उनसे हमारी रक्षा कीजिए।*

शुक्ल यजुर्वेद अध्याय 32 मन्त्र 03 में भी स्पष्ट कहा है कि,
*न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः।*
*हिरण्यगर्भ इत्येष मा मा हिंसीदित्येषा यस्मान्न जातः इत्येषः॥*
*उस परमात्मा की कोई प्रतिमा (मूर्ति, चित्र या तुलना) नहीं है। जिसका नाम या कीर्ति महान (बहुत बड़ी) है।*
*वही ब्रह्मांड का रचयिता हिरण्यगर्भ है। वह हमारी हिंसा न करे। (अर्थात हमारी रक्षा करें/ निर्भय करें) वह ईश्वर किसी से उत्पन्न नहीं हुआ है, वह अजन्मा है।*

*शुक्ल यजुर्वेद अध्याय 40 का प्रथम और द्वितीय मन्त्र कहता है कि*,
*ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥1।।*
अर्थात 
*इस जगत में जो कुछ भी है, वह सब ईश परमात्मा से व्याप्त है। अतः त्यागपूर्वक ही भोग करना चाहिए, किसी के धन लोभ-लालच न करें।*

*कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्मं लिप्यते नरे।।2।।*
अर्थात 
*कर्तव्य मान कर ही कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करे। क्योंकि इसके अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है जिससे कर्मों का लेप न हो। अर्थात कर्म बन्धन न हो इसलिए कर्म करते हुए ही जीवन व्यतीत करें।*
न अकर्मण्यता हो, न कर्मासक्ति हो और न फलाशा / फलासक्ति हो।

स्पष्ट है कि, *केवल शास्त्रोक्त विधि से शास्त्रोक्त कर्म ही करें। अर्थात यज्ञ के लिए ही यज्ञ करे। सेवा मय जीवन व्यतीत करें।* 
क्योंकि *मैं परमात्मा का हूँ और शरीर जगत का हिस्सा है। अतः हर समय परमात्मा का ही स्मरण, ध्यान, चिन्तन रखते हुए शरीर को पञ्चमहायज्ञ रूपी जगत सेवा में निवेश करें।*
*ब्राह्मण ग्रन्थों में और शुल्बसूत्रों, श्रोत सूत्रों और गृह्यसूत्रों में भी केवल मण्डप में मण्डल बनाकर, बेदी बनाकर अग्रिहोत्र का ही वर्णन है। धर्मसूत्रों में माता -पिता, आचार्य, अतिथि आदि की सेवा -पूजा का ही उल्लेख है।*

अब इसमें *किसी देवता विशेष की सेवा-पूजा, अनुष्ठान आदि का कोई आदेश/निर्देश है ही नहीं। बल्कि मूर्ति पूजा का तो स्पष्ट निषेध किया है।*
*अतः देव नहलाना, पञ्चोपचार/ दशोपचार या षोडशोपचार पूजा करके धर्म विरुद्ध आचरण करके नर्क का मार्ग प्रशस्त न किया जाए।*
*उल्लेखनीय है कि, अन्य लेखों में यह प्रमाणित कर चुका हूँ कि, द्वापरयुग तक भारत में मठ, मन्दिर और मूर्ति पूजा का नामो-निशान तक नहीं था।*
 *सर्वप्रथम श्रमण मतावलम्बी ईराक, सऊदी अरब, सीरिया, टर्की, युनान और मिश्र से मूर्ति पूजा सीख कर आये।* और 
*भारत में पहले तान्त्रिकों द्वारा दबे-छुपे मूर्ति पूजा प्रारम्भ की और अनुयाई बढ़ने पर मठों में मन्दिर/ स्तूप आदि में मूर्तिपूजा प्रारम्भ की।*
*इसी प्रकार भागवत कथा, शिव पुराण सुनना भी कोई धर्म-कर्म नहीं है। वास्तविक धर्म तो अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह ही है।* *दृढ़तापूर्वक धर्मपालन में सहयोगी शोच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान रूपी पाँच नियम है।*
तथा *ब्रह्म यज्ञ के अन्तर्गत संध्या, गायत्री मन्त्र जप, वेदाध्ययन, अष्टाङ्ग योग सहित ब्रह्म यज्ञ अग्निहोत्र कर देवयज्ञ, मानव सेवा रूपी नृयज्ञ, बलिवैश्वदेव सहित सर्व प्राणी और वनस्पतियों की सेवा रूपी भूतयज्ञ और बुजुर्गों की सेवा रूपी पितृ यज्ञ ये पाँच महायज्ञ है।*

लेकिन *महाभारत युद्ध के पश्चात जन साधारण इनके बजाय मठ, मन्दिरों में प्रतिष्ठित मूर्तियों या घर पर ही देवालय बना कर उसमे रखी देवी-देवताओं, अवतारों, आचार्यों, गुरु जनों, पितरों की मूर्तियों, प्रतिमाओं या चित्रों की पञ्चोपचार, दशोपचार या षोडशोपचार पूजन करने में अपना कल्याण और श्रेय समझने लगे हैं।*
*उससे उत्पन्न सबसे बड़ा दोष कि, उन मूर्तियों आदि में भगवान की धारणा कर परमात्मा के ईश्वर स्वरूप में भी पूर्ण श्रद्धा भक्ति और समर्पण रहित हो कर ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि*, 
*हे भगवान, मुझे यह चाहिए/ वह चाहिये और इसके लिए आप ऐसा- ऐसा कर दीजिए। ताकि, मुझे सफलता पूर्वक वाञ्छित भोग प्राप्त हो सके।*
*मतलब भगवान को निरा अज्ञानी मूर्ख समझकर उसे अपनी वैध/ अवैध माँगे मनवाने के लिए स्वयम् द्वारा सुझाए गए उपायों का पालन करने की सलाह देकर उसके बदले उपास/ उपवास समझकर लङ्घन करने, कोई स्तुति - स्तोत्र पाठ करने, मन्त्र जप करने, मन्दिर में कोई मूल्यवान भेंट चढ़ा कर, या भागवत कथा, या वायु पुराण का एक भाग शिव पुराण पाठ- प्रवचन आदि का आयोजन करवा कर शिवपुराणोक्त टोटके करके स्वयम् को महान आस्तिक, सच्चा ईश्वर वादी और परम भक्त सिद्ध करते हैं।*
*दुसरी हानि यह हुई कि, मन्दिर परिसर या मूर्ति में ही ईश्वर हैं बाहर ईश्वर नहीं है। सर्वव्यापी को सिमीत एकदेशीय मान लिया।*
*तीसरा दोष माता-पिता, आचार्य -गुरुजन, योग्य अतिथि के प्रति पूज्यभाव समाप्त हो गया।*
आजकल कुछ लोग नानी बाई का मायरा का पाठ करवाते हैं, लेकिन न, करने वाला; न, करवाने वाला और न ही, श्रोतागण कोई भी  *श्रीकृष्ण के प्रति पुत्र भाव रखने वाले भक्त नरसिंह मेहता का अपने इष्ट के प्रति विश्वास पर ध्यान नहीं देते हैं।*
*सबको केवल अपने द्वारा किए गए टोटकों, छल-कपट, षड़यन्त्रों, और सकाम आराधना के नाम पर किये गए कर्मों से ही परिणाम प्राप्ति का विश्वास रहता है।*
 *मेने ऐसा किया इस लिए ऐसा हो गया। मेने ऐसा नहीं किया वरना ऐसा हो जाता। मैं नहीं होता तो ऐसा नहीं हो पाता, मैं नहीं रहूँगा तो दुनिया रुक जाएगी। मरते दम तक इसी भ्रम में जीते हैं।*
जबकि यह नहीं देखते समझते कि, *जब मैं नहीं जन्मा था तब भी विश्व सुचारू रूप से चल रहा था, विकास कर रहा था। और जहाँ मैं नहीं हूँ वहाँ भी जगत सुचारू रूप से चल रहा है।*
इसलिए मेरा होना या न होना दोनों से विश्व में कोई अन्तर नहीं पड़ने वाला है।
यही स्थिति घर गृहस्थी की भी है। *जब नहीं थे तब भी गृहस्थी चल रही थी जब मैं नहीं रहूँगा तब भी गृहस्थी ऐसे ही चलेगी।*
क्योंकि *सञ्चालक तो परमात्मा का ईश्वरीय स्वरूप है। कोई व्यक्ति या समूह नहीं।*
मूर्ति पूजा के ऐसे परिणाम जानने के कारण ही वेदों में मूर्ति पूजा निषिद्ध की गई है।
मुझे ज्ञात है कि, मूर्ति पूजा के पक्षधर सगुण सर्वव्यापी विष्णु, सगुण कूटाकृति प्रभविष्णु, सगुण साकार नारायण श्रीहरि, प्रथम पूर्ण साकार हिरण्यगर्भ, प्रथम सावयव प्रजापति के वर्णन के आधार पर साकार देवों और सावयव प्रजापति आदि देवताओं का प्रमाण देकर मूर्ति पूजा सिद्ध करने का कुतर्क देंगे। उनसे सविनय एक ही अनुरोध है कि, आप स्वयम् भी सावयव हैं, आपका सिर मुख, हाथ- पेर सब है तो क्या कोई आपकी मूर्ति बनाकर पूजता है ऐसी कोई जानकारी है आपको? मतलब देवताओं के मुखादि अङ्ग होने से उनकी मूर्ति बनाकर कोई पूजता था यह प्रमाणित नहीं होता।
दूसरा कुतर्क का खण्डन मैं पहले ही वाल्मीकि रामायण में देवों के स्थान होने लेकिन उन स्थानों पर किसी आकृति वाली मूर्ति का उल्लेख नहीं होने, जैसे यज्ञ में मण्डप में मण्डल बनाकर उसपर देवों और देवताओं का आह्वान किया जाता है, और हम लोग मण्डप में मण्डल पर उन देवताओं की पूजा आदि करते हैं, वैसे ही जनकपुरी में श्री सीताजी का भगवती उमा की पूजा करने जाने का वर्णन है। कहीं किसी मूर्ति/ प्रतिमा या चित्र होने का उल्लेख नहीं है।
इसी प्रकार श्री रामचन्द्र जी द्वारा अयोध्या काण्ड में युवराज पद पर अभिषेक के पहले जाने के वर्णन में भी भगवान विष्णु के स्थान पर किसी मूर्ति/ प्रतिमा या चित्र होने का उल्लेख नहीं है।
ठीक इसी प्रकार विदर्भ राजकमारी श्री रुक्मिणी जी के विदर्भ की राजधानी के निकट ही अम्बिका देवी के स्थान पर पूजा करने जाना भी समझना चाहिए। ध्यान रखें महाराष्ट्र के विदर्भ (नागपुर क्षेत्र) से मध्यप्रदेश के धार जिले के अमझेरा की अम्बिका मन्दिर में रुक्मिणी जी का पूजा करने आना शुद्ध काल्पनिक है।
1178 में रचित एवम 1185 में प्रकाशित 
तमिल कवि कम्बन की  ईरामावतारम् महाकाव्य और 1574 से 1577 ईस्वी के बीच अवधि कवि भक्त तुलसीदास जी रचित रामचरितमानस में भगवान श्रीरामचन्द्र जी द्वारा तमिलनाडु में रामेश्वरम शिवलिङ्ग की स्थापना का प्रमाण न दें। क्योंकि ये रचनाएं अत्यधिक आधुनिक काल की रचना है अतः कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है।
इसी प्रकार ब्रह्माण्ड पुराण का भाग अध्यात्म रामायण ईस्वी की दहवीं से पन्द्रहवीं शताब्दी की रचना है। और आनन्द रामायण भी ईस्वी की पन्द्रहवीं शताब्दी की रचना है। इसलिए इतिहास के विषय में ये भी कोई प्रामाणिक ग्रन्थ नहीं है।
 दूसरी बात श्री रामचन्द्र जी केरल के कोझीकोड और कन्नूर होते हुए लक्ष्यद्वीप के किल्तान द्वीप में स्थित रावण की लङ्का गये थे। श्री रामचन्द्र जी कभी तमिलनाडु गये ही नहीं।