मंगलवार, 28 अप्रैल 2026

बौद्धों और जैनों के प्रभाव से सनातन धर्मियों में आये परिवर्तन ---

बौद्धों और जैनों के प्रभाव से सनातन धर्मियों में ये परिवर्तन आये---

1 वेदाध्ययन बन्द हो गया। कई ब्राह्मण ग्रन्थ तो लुप्त हो गये।
बहुत से शुल्बसूत्र, श्रोतसूत्र, गृह्यसूत्र और धर्म सूत्र लुप्त हो गये। यहाँ तक कि, मानव धर्मसूत्र ही नहीं मिलता है।

2 संध्या, पञ्चमहायज्ञ, और अष्टाङ्गयोग छूट गये।
वेदाध्ययन, ब्राह्मण ग्रन्थों का अध्ययन बन्द हो गया।

3 वेदाङ्ग में केवल शिक्षा, व्याकरण और छन्दशास्त्र का अध्ययन जारी रहा कुछ एक विद्वानों ने परवर्ती मयासुर रचित सूर्य सिद्धान्त ज्योतिष ग्रन्थ और वराहमिहिर रचित वृहत संहिता ज्योतिष ग्रंथों की शिक्षा ली और अधिकांश ने होरा शास्त्र का ही अध्ययन किया। 

परिणाम ---
वसन्त विषुव (सायन मेष संक्रान्ति) से प्रारम्भ होने वाला संवत्सर पहले तो चित्रा तारे से 180° पर सूर्य होने वाले दिन निरयन मेष संक्रमण (वैशाखी/ मेषादि/ बैसाख बिहू/ पोइला बैसाख) से प्रारम्भ होने वाला माना जाने लगा जो अभी भी भारत के अधिकांश भाग में प्रचलित है। लेकिन मध्य भारत और पश्चिम भारत में निरयन मेष संक्रमण आधारित चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारम्भ होना माना जाने लगा।

वसन्त विषुव (सायन मेष संक्रान्ति) से प्रारम्भ होने वाला, देवताओं की ऋतु वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतु वाला उत्तरायण केवल उत्तर गोल कहा जाने लगा।और 
शरद विषुव (सायन तुला संक्रान्ति) से प्रारम्भ होने वाला पितरों की ऋतु शरद, हेमन्त और शिशिर ऋतु वाला दक्षिणायन केवल दक्षिण गोल कहा जाने लगा।
और 
दक्षिण परम क्रान्ति (सायन मकर संक्रान्ति) से प्रारम्भ होने वाला दक्षिण तोयन उत्तरायण कहलाने लगा। और 
उत्तर परम क्रान्ति (सायन कर्क संक्रान्ति) से प्रारम्भ होने वाला उत्तर तोयन दक्षिणायन कहलाने लगा।
वसन्त विषुव (सायन मेष संक्रान्ति) से प्रारम्भ होने वाली वसन्त ऋतु एक माह पहले सायन मीन संक्रान्ति से प्रारम्भ होना माना जाने लगा। तदनुसार सभी ऋतुएँ एक माह पहले से प्रारम्भ होना माना जाने लगा।

वसन्त विषुव (सायन मेष संक्रान्ति) से प्रारम्भ होने वाला मधु मास को एक माह पहले वाले सायन मीन संक्रान्ति से प्रारम्भ होना माना जाने लगा। परिणाम स्वरूप मधु- माधव, शुक्र- शचि, नभः नभस्य, ईष-उर्ज, सहस-सहस्य, तपः- तपस्य मास एक माह पहले माने जाने लगे।
धर्मशास्त्र का अङ्ग मुहूर्त शास्त्र तो पुरा ही गड़बड़ा गया।
इतिहास जानने में भी भ्रम होने लगे।
व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार सब तिथियों के अनुसार मनाये जाने लगे।
नक्षत्रों के स्थान पर पश्चिम टर्की, इराक के बेबीलोन और मिश्र में प्रचलित मेष, वृषभादि राशियाँ प्रचलित हो गई।
दशाह के स्थान पर सप्ताह प्रचलित हो गया।
जबकि वेदों में मेष-वृषभादि राशियों और सप्ताह के रविवार सोमवार आदि वारों के नाम भी नहीं है।

ऐसे ही निरुक्त में निघण्टु (कोश) सिखा।
परिणाम --- वेद मन्त्रों के सही अर्थ नही जान पाये।

कल्प में शुल्ब सूत्रों, और श्रोत सूत्रों का ज्ञान बहुत सिमीत लोगों ने सिखा। गृह्य सूत्रों का स्थान कर्मकाण्ड भास्कर, कर्मकाण्ड प्रदीप, ब्रहम नित्य कर्म समुच्चय तथा आह्निक सूत्रावली जैसे निबन्धों ने लिया। 
परिणाम ---इससे मूल अर्थ और क्रिया भूल गए परिणाम यह हुआ कि, विवाह में पाणी ग्रहण के स्थान पर तोरण का मुहूर्त मुख्य हो गया। सप्तपदी और चार फेरे मिलकर सात फेरे हो गये और सप्तपदी भूल ही गए।
गर्भाधान, पुंसवन, जातकर्म , नामकरण , अक्षरारम्भ, विद्यारम्भ और वेदारम्भ संस्कार लुप्त हो गये। 
यज्ञोपवित, उपनयन संस्कार विवाह के समय होने लगे।

धर्मसूत्र का स्थान पहले स्मृतियों ने लिया फिर हेमाद्रि की चतुर्वर्ग चिन्तामणी , माधव की माधवी में पौराणिक सन्दर्भों वाला धर्म प्रचलित हो गया।
उसके बाद कमलाकर भट्ट ने उनके आधार पर निर्णय सिन्धु में सम्पादित किया। और उसकी कुञ्जी धर्म सिन्धु बन गई। अब धर्मसूत्रों के दर्शन दुर्लभ हो गये।
परिणाम स्वरूप व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहारों की तिथियों में अत्यधिक अन्तर होने लगा।

4 उप वेदों में मात्र आयुर्वेद का अध्ययन जारी रहा तथा दक्षिण भारत में गन्धर्ववेद की शिक्षा जारी रही। 
धनुर्वेद में केवल जल्लुकट्टु जैसे मार्शल आर्ट सिखा, तथा स्थापत्य वेद और शिल्प वेद में केवल शिल्प कला सिखी। सेतु निर्माण, पथ निर्माण आदि पर ध्यान नहीं दिया।

5 वेदों, वेदाङ्गो, उपवेदों के स्थान पर पुराणों का महत्व बढ़ गया। यहाँ तक कि, इतिहास ग्रन्थ रामायण और महाभारत तथा ब्राह्मण ग्रन्थों के कर्मकाण्ड भाग की मीमांसा जेमिनी कृत पूर्व मीमांसा और ब्राह्मण ग्रन्थों के ज्ञान काण्ड - ब्रह्म सूत्रों अर्थात आरण्यक और उपनिषदों की मीमांसा बादरायण की उत्तर मीमांसा (शारीरिक सूत्र) का स्थान पर भी पुराणों को देने लगे।
महाभारत के भीष्म पर्व अध्याय 25 से 43 अर्थात श्रीमद्भगवद्गीता धर्म मीमांसा और योग दर्शन का श्रेष्ठतम ग्रन्थ है।
श्रीमद्भगवद्गीता की व्याख्या भी पौराणिक सन्दर्भों से की जाने लगी।

6 *इसी प्रकार वैदिक सूक्तों और ब्राह्मण ग्रन्थों के आरण्यकों और उपनिषदों में उल्लेखित दार्शनिक विचारों से प्रेरित लेकिन स्वतन्त्र विचारकों की रचनाएँ ईश्वर कृष्ण की सांख्य कारिकाएँ, कपिल मुनि का सांख्य दर्शन, पतञ्जली का योग दर्शन श, गोतम का न्याय दर्शन और कणाद का वैशेषिक दर्शन को इतना महत्व दिया जाने लगा कि, वैदिक दृष्टि से सोचना-समझना बिल्कुल बन्द हो गया और उक्त चार दर्शनो के आधार पर सोचने-समझने लगे।* 
*यहाँ तक तो फिर भी चलाया जा सकता है, लेकिन उससे भी आगे बौद्धों के सर्वास्तिवाद, जैनों के अनेकान्तवाद, बढ़कर नागार्जुन के शुन्यवाद,मैत्रेयनाथ का योगाचार- विज्ञान वाद, पाशुपत दर्शन पर आधारित असङ्ग और वसुगुप्त का त्रिक दर्शन अर्थात कश्मीरी शैव-शाक्त दर्शन के आधार पर सोचने-विचारने और समझने लगे।*
*ये लोग वैद, वैदिक धर्म, वैदिक कर्मकाण्ड, वैदिक दर्शन, वैदिक संस्कृति और वैदिक वर्णाश्रम व्यवस्था को स्वाभाविक रूप से नहीं स्वीकारते बल्कि सन्देह की दृष्टि से देखते हैं।*
*तथाकथित वैदिक दर्शनों सांख्य दर्शन, योग दर्शन, न्याय दर्शन और वैशेषिक दर्शन के आधार पर विचार कर निकाले गए निष्कर्षों को वैदिक निष्कर्ष मानते हैं।*
*जैसे बिना वेदाध्ययन, बिना संध्या किये, बिना पञ्च महायज्ञ किये, अष्टाङ्ग योग के यम नियमों का पालन किये या मनुस्मृति के दश धर्म लक्षणों को स्वभाव में उतारे बिना, पूर्ण ईश्वर प्रणिधान की आशा करते हैं।*
*उक्त साधना के बिना सीधे धारणा, ध्यान और समाधि तक पहूँचने के स्वप्न देखते हैं।*
*माया अर्थात प्रकृति का अंश अहंकार-मन, चित्त-बुद्धि रूप अन्तःकरण को शुद्ध करने की कल्पना करते हैं।*
जबकि, 
अधियज्ञ/अधिकरण अर्थात शासन --- प्रत्यगात्मा/अन्तरात्मा - (पुरुष और प्रकृति) परब्रह्म - (प्रभविष्णु और श्री लक्ष्मी /सवितृ-सावित्री) अधियज्ञ और अधिष्ठान (शासन) हैं। 
उन्ही के करण अर्थात यन्त्र या औजार ---

अधिकरण (निकटतम मुख्य करण)-- जीवात्मा अपर ब्रह्म --(अपर पुरुष और अपरा पृकृति अर्थात जीव और आयु) (नारायण और नारायणी अर्थात श्रीहरि और कमलासना गज सेविता लक्ष्मी जो समुद्र मन्थन से निकली कही जाती है।) तथा 
भूतात्मा (प्राण अर्थात चेतना और धृति/ धारण शक्ति धारयित्व अर्थात देहि और अवस्था) हिरण्यगर्भ अर्थात पञ्चमुखी ब्रह्मा और वाणी (त्वष्टा और रचना)।
जीवात्मा (अपर ब्रह्म) और भूतात्मा (हिरण्यगर्भ) दोनों अधिकरण अर्थात मुख्य करण या निकटतम यन्त्र हैं।

अभि करण अर्थात सहायक यन्त्र---- 
सुत्रात्मा (ओज और आभा अर्थात कान्ति) प्रजापति (चतुर्मुख ब्रह्मा) और सरस्वती (दक्ष और प्रसुति) तथा 
अणुरात्मा (तेज और विद्युत) वाचस्पति और वाक (इन्द्र और शचि) अभिकरण अर्थात अधिनस्थ करण हैं अर्थात जैसे जेक के साथ टामी लगती है या बल्ब के साथ स्वीच लगता है या पंखे के साथ रेग्युलेटर होता है या रिमोट होता है। उसे अभिकरण कहते हैं।

अन्तः करण अर्थात जो करण अन्दर हो।----
 चित-बुद्धि और अहंकार-मन
और बहिर्करण----
पञ्च मुख्य प्राण और पञ्च उपप्राण, 
पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ और पञ्च कर्मेंद्रियाँ तथा 
पञ्च महाभूत और पञ्च तन्मात्रा।
अतः ये प्राकृतिक तत्व हैं, इसलिए या तो यह माना जाए कि ये शुद्ध ही है या यह मानलो कि ये शुद्ध हो ही नहीं सकते। जैसे हम नित्य तीन बार स्नान करें तो भी शरीर स्वच्छ नहीं रह सकता। न निर्मल हो सकता है।
वैसे ही उक्त प्राकृतिक पदार्थ प्रकृति की ओर ही रुझान रखेंगे।
हमें केवल इन तत्वों के प्रति मैं और मेरा वाला भाव अहन्ता ममता त्यागना होगा। 
इसीलिए अपरिग्रह साधना है, ता कि, वाह्य वस्तुओं के प्रति ममता न रहे। कोई अनजाने में ले ले, बतला कर लेले, मांग कर ले ले, लेकर नहीं लौटाए तब भी उसके प्रति विरोध, क्रोध, द्वेश नहीं हो यह अक्रोध ही अहिंसा साधना है।
सभी चीजों का मूल तत्व ही देखना जैसे सुनार आभुषणों में केवल स्वर्ण देखता है, कारीगर या कलाकार केवल डिजाइन दैखता है। वैसे ही हमें सब वस्तुओं में एक परमात्मा को देखने का स्वभाव बनाना और बनाये रखना सत्य की साधना है।
सब-कुछ ब्रह्म का है, सब-कुछ परमात्मा की लीला मात्र है। इसमें वास्तविकता कुछ नहीं है। यह जान लेने की साधना अस्तेय, निर्लोभता है।
सबसे अन्त में लिङ्ग भेद मिटता है।
सृष्टि के भैदों से मुक्त होकर अभेद मूल तत्व परमात्मा को ही जानना यह ब्रह्मचर्य साधना है।
इतना सब होने फर ही सब-कुछ परमात्मा का ही है सब-कुछ परमात्मा ही है, जान लेने, मान लेने पर ही ईश्वर प्रणिधान सम्भव है। इसलिए यही लक्ष्य है।

अलग-अलग पुराणों में अलग-अलग देवों/ देवताओं की महत्ता और शेष सब को गौण, आधीन बतलाने के कारण सबके अलग-अलग इष्ट देव बन गये । सबमें परमात्मा देखने के बजाय स्व रचित या कारिगर से बनवाई मूर्ति में ही ब्रह्मभाव लाना और उससे परे जगत देखने के बजाय पूरी सृष्टि परमात्मा की लीला मात्र है मानकर उसके सृजेता, सञ्चालक, और निवारक के रूप में ईश्वर भाव लाकर समर्पण करना आसान है।

सुबह शाम घर में मूर्तिपूजा, आरती करना, भोग लगाना तथा शेष समय और मन्दिर या मूर्ति के बाहर ईश्वर नहीं देखना नास्तिकता अनीश्वरवाद ही है।

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