बुधवार, 29 अप्रैल 2026

श्रीरामचन्द्र जी और उनके समकालीन लोगों का चरित्र और इतिहास जानने का एकमात्र साधन वाल्मीकि रामायण ही है।

इतिहास का सच जानने के लिए केवल वाल्मीकि रामायण और महाभारत ग्रन्थों पर ही निर्भर रहना पड़ता है।
चुंकि महर्षि वाल्मीकि परशुरामजी और श्री रामचन्द्र जी के समकालीक थे, सीता जी वाल्मीकि आश्रम में रही थी।
महर्षि वाल्मीकि ने प्रजापति ब्रह्मा के निर्देश पर, देवर्षि नारद जी से श्री रामचन्द्र जी का इतिहास और चरित्र सुनकर, और फिर सीता जी से जानकारी सुनिश्चित कर रामायण की रचना की थी। 
इस लिए सगर, महर्षि वशिष्ठ, महर्षि विश्वामित्र, महर्षि अगस्त्य, महर्षि वाल्मीकि, महर्षि भरद्वाज, दशरथ जी,जनक जी, महर्षि ऋष्यश्रङ्ग, रामचन्द्र जी की बड़ी बहन शान्ता, रामचन्द्र जी, परशुरामजी, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, सीता जी,   कौशल्या , सुमित्रा, कैकई, अहिल्या,  शबरी, हनुमान जी, बाली, सुग्रीव, जामवन्त जी, नल-नील,  रावण, कुम्भकरण, विभिषण, शुर्पणखा, केकसी, मन्दोदरी आदि के चरित्र जानने का एकमात्र साधन वाल्मीकि रामायण है।
साथ ही 
रामायण में उल्लेखित विषय ---
परशुरामजी का जन्म, महर्षि जमदग्नि द्वारा अपने क्षेत्र के राजा कार्तवीर्य सहस्रार्जुन का सेना सहित स्वागत-सत्कार करने पर कामधेनु की शक्ति जानकर सहस्रार्जुन का लोभ जागना और कामधेनु का हरण करना, विरोध करने पर उनकी पत्नी और परशुराम जी की माता का वध करना, परशुरामजी द्वारा केवल चन्द्रवंश की शाखा हैहय वंशियों के इक्कीस कुलों का संहार किया था न कि, सभी क्षत्रियों का और बाद में प्रायश्चित कर विजित भूमि का दान कर महेन्द्र पर्वत पर तप करने जाने का इतिहास जानने का एकमात्र साधन वाल्मीकि रामायण है।

श्री रामचन्द्र जी का विश्वामित्र जी के साथ रहने, धनुर्वेद शिक्षा लेने, राक्षसों के प्रति धारणा बनने, राक्षसों को दण्डित करने, ताड़का वध, गोतम पत्नी अहिल्या का इन्द्र के प्रति आकर्षण और फिर इन्द्र के साथ रमण करना, गोतम का शाप कि, पाषाणवत स्थिर रहकर लोगों की दृष्टि से छुपकर (अदृष्य रहकर), निराहार रहते हुए, (भूख नहीं सताए इसके लिए प्राणायाम की एक क्रिया है, वायु भक्षण) केवल वायु का भक्षण कर श्री रामचन्द्र जी की प्रतीक्षा करना। जब वे इधर से गुजरेंगे तब उनका स्वागत सत्कार करने पर प्राश्चित पूरा होगा। अर्थात दण्ड पूर्ण होगा, अहिल्या ने यही आदेश स्वीकार कर पालन किया। विश्वामित्र जी के साथ श्री रामचन्द्र जी और लक्ष्मण जी का जनक पुरी जाना, रास्ते में गोतम आश्रम सुना दैखकर विश्वामित्र जी से पूछना, विश्वामित्र जी ने अहिल्या के प्राश्चित हेतु तप करने और उनके उद्धार के आदेश पर गोतम आश्रम में जाकर अहिल्या जी के पैर छूकर प्रणाम किया। फिर अहिल्या जी द्वारा प्रस्तुत जलपान और फल कन्द आदि ग्रहण कर अहिल्या जी का प्राश्चित पूर्ण होना और महर्षि गोतम से जा मिलना।
जनक पुरी में महर्षि विश्वामित्र, श्री रामचन्द्र जी और लक्ष्मण जी द्वारा शिवजी का पिनाक धनुष का दर्शन करना, श्री जनक जी का सीता जी के जन्म और विवाह के बारे में प्रतिज्ञा लेने की बात बतलाना, सीता जी से विवाह के इच्छुक राजाओं द्वारा धनुष उठाकर प्रत्यञ्चा चढ़ाने में असफल होने पर जनक जी पर सामुहिक आक्रमण करना और इन्द्र के द्वारा उन सभी अक्रान्ता राजाओं को परास्त कर भगाने का वृतान्त सुनाना,
श्री रामचन्द्र जी द्वारा पुराने शिव धनुष पर सहज ही प्रत्यञ्चा चढ़ाकर टंकार करने पर टुटना धनुष टूटना, परशुरामजी का आगमन, श्री रामचन्द्र जी को वैष्णव धनुष देकर उसपर प्रत्यञ्चा चढ़ाने की चुनौती देना, धनुष देने के साथ ही परशुरामजी का अवतारत्व का पदभार (चार्ज) श्री रामचन्द्र जी में समाहित हो जाने पर परशुरामजी का शान्त होना का इतिहास जानने का एकमेव साधन वाल्मीकि रामायण है।
श्री रामचन्द्र जी का युवराज पद पर सभा की सहमति से चयन, मन्थरा द्वारा भड़काने पर कैकई द्वारा रामचन्द्र जी को चौदह वर्ष का वनवास और भरत का राज्याभिषेक की मांग। श्रीरामचन्द्र जी का वनवास गमन, सीता जी और लक्ष्मण का साथ जाना, वशिष्ठ जी के निर्देश पर वनवास में भी सीताजी पूर्ण राजसी श्रङ्गार सहित रहना।  दशरथ जी की मृत्यु, भरत और शत्रुघ्न को कैकई देश से वापस बुलाना, भरत के लौटने पर का पूरी अयोध्या में तिरस्कार होता देख भरत को किसी अनिष्ट की आशंका, दशरथ जी की अन्त्येष्टि, भरत का श्री रामचन्द्र जी को लौटा लाने के लिए जाना लेकिन श्री रामचन्द्र जी का वापस नहीं आना। भरत श्री रामचन्द्र जी की पादुका लाकर नन्दीग्राम में पादुका स्थापित कर श्री रामचन्द्र जी के प्रतिनिधि के रूप में शासन करना। वनवास में भरत के बार-बार आवागमन की आशंका के चलते चित्रकूट छोड़कर पञ्चवटी जाना, शुर्पणखा की नाक काटने पर शुर्पणखा द्वारा रावण को श्री सीता जी के हरण के लिए दुष्प्रेरित करना, मारिच द्वारा स्वर्णमृग बनकर सीता जी को स्वर्णमृग पालने और वापसी में अयोध्या ले चलने की अभिलाषा प्रकट करना, श्री रामचन्द्र जी द्वारा लक्ष्मण पर सीताजी की अभिरक्षा का भार सोपना, मारिच द्वारा श्री रामचन्द्र जी के स्वर में लक्ष्मण को पुकारने पर सीताजी द्वारा लक्ष्मण जी को श्रीरामचन्द्र जी की सहायतार्थ भेजना। श्री रामचन्द्र जी द्वारा सीताजी को श्री रामचन्द्र जी के सामर्थ्य बतलाने और राक्षसों का छल-कपट कहने पर सीताजी द्वारा लक्ष्मण जी पर आक्षेप लगाकर जबरन भेजना। रावण द्वारा साधुवेश में भिक्षा याचना कर सीताजी का अपहरण करना, जटायु जी द्वारा सीताजी को छुड़ाने के प्रयत्न में प्राण अर्पण करना। फिर श्री रामचन्द्र जी को रावण द्वारा सीताजी के अपहरण की जानकारी देकर प्राण त्याग करना जटायु जी की अन्त्येष्टि, शबरी जी द्वारा सुग्रीव से मिलने का सुझाव। फिर  हनुमान जी से मिलना और सुग्रीव से मैत्री, बाली वध, वर्षा ऋतु समाप्त होने पर अङ्गद, जामवंत जी, नल-नील और हनुमान जी को सीता जी की खोज हेतु विंध्याचल के दक्षिण में एक माह में खोजने हेतु भेजना। उस समय सुग्रीव जी लंका का क्षेत्रफल सौ वर्ग योजन अर्थात लगभग 36×36=1296 वर्ग किलोमीटर बतलाया और लंका के आस-पास आठ द्वीप बतलाये। यह लक्षण केवल लक्ष्यद्वीप पर सही बैठता है सिंहल द्वीप (श्री लंका) पर बिल्कुल नहीं बैठता है।

सुग्रीव द्वारा खोजी दल को तञ्जावुर की सीमा पर लगे द्वार में प्रवेश न करने और पाण्ड्य देश (तमिलनाडु) में प्रवेश न करने की आज्ञा देना।
विंध्याचल के दक्षिण पश्चिम सिरे पर ही एक माह पूर्ण होना। फिर स्वयम्प्रभा की गुफा में प्रवेश करना और वहाँ से विंध्याचल के दक्षिण पश्चिम में खम्बात की खाड़ी में भरुच पहूँचना। जटायु जी के भाई सम्पाति से मुलाकात, और उनके द्वारा रावण की लंका में अशोक वाटिका में सीता जी को बैठे हुए देखकर अङ्गद के खोजी दल को भरुच से ठीक दक्षिण में समुद्र में सौ योजन अर्थात लगभग 1287 किलोमीटर दूर सागर में रावण की लंका नामक द्वीप का पता बतला कर वहाँ अशोक वाटिका में सीता जी के होने की सूचना देना।
जामवंत जी द्वारा उत्साहित करने पर हनुमान जी ने छलांग लगाकर लंका पहूँचना, वहाँ पूरी लंका का सुक्ष्म अवलोकन कर रावण और लंकावासियों का मदिरा और सुन्दरियों के सङ्ग व्यभिचार देखना, हनुमानजी ने लंका में पक्षियों के समान विमान उड़ते देखे।
सीताजी से मिल कर श्री रामचन्द्र जी का सन्देश और मुद्रिका देना। फिर हनुमानजी ने रावण की लंका में निकुम्भला यक्षिणी के कई मन्दिर ध्वस्त किए और मूर्तियाँ तोड़ी।

 विभिषण जी से मिलना, रावण पुत्र अक्षय कुमार का वध कर रावण से मिलना, दूत अवध्य होने विभिषण जी के सुझाव को मानकर हनुमान जी की पूंछ मे आग लगाना, हनुमान जी द्वारा लंका दहन करना। फिर सीता जी से मिलकर श्री रामचन्द्र जी के लिए सीताजी का सन्देश लेकर किष्किन्धा लौटना । श्रीरामचन्द्र जी को सीता जी का सन्देश देना। और पता बतलाना। रावण द्वारा विभिषण का अपमान कर देश निकाला देना। 
सुग्रीव जी द्वारा सम्पूर्ण वानर सेना और यन्त्र आदि एकत्रित कर श्री रामचन्द्र जी की सहायतार्थ लंका अभियान पर निकलना। किष्किन्धा से कोझिकोड और कन्नूर तक पूरी यात्रा पश्चिम घाट पर करना। कर्नाटक केरल सीमा पर पश्चिम घाट में कन्नूर पहूच कर श्री रामचन्द्र जी ने महेन्द्र पर्वत पर चढ़कर अरब सागर और तीन सौ किलोमीटर दूर लक्ष्यद्वीप में टापु पर रावण की लंका देखा। फिर सह्य और मलय पर्वत लांघकर अरब सागर के तट पर पहुँचे और डेरा डाला। विभिषण जी द्वारा श्री रामचन्द्र जी की शरण ग्रहणना श्रीरामचन्द्र जी द्वारा विभिषण जी से मित्रता करना। 
समुद्र से मार्ग देने की प्रार्थना लेकिन मार्ग न देने पर श्री रामचन्द्र जी द्वारा ब्रह्मास्त्र संधान। समुद्र द्वारा विश्वकर्मा पुत्र नल से सेतु बनवाने की राय देना। ब्रह्मास्त्र पश्चिम दिशा में छोड़ना, जिससे उस स्थान पर मरुस्थल बनना।
विश्वकर्म में निपुण नल ने बड़े बड़े यन्त्रों की सहायता से पर्वत शिखर से बड़े-बड़े शिलाखण्ड और बड़े-बड़े पैड़ उखड़वाकर बुलवाये फिर सागर में पैड़ों से जाल बिछा कर उसपर शिलाखण्ड रखवाकर फिर मिट्टी डलवाई। इस प्रकार केरल के कन्नूर से प्रारम्भ कर लक्ष्यद्वीप के किल्तान द्वीप तक पहले दिन चौदह योजन, दुसरे दिन छ योजन, तीसरे, चौथे और पाँचवे दिन एक-एक योजन सेतु बनाकर कुल पाँच दिन में 23 योजन अर्थात 296 किलोमीटर का सेतु बनाया।
श्रीरामचन्द्र जी और लक्ष्मण जी सहित पूरी सेना को मेघनाद द्वारा ब्रह्मास्त्र चलाकर घायल कर देना। जामवन्त जी द्वारा हनुमान जी को सूर्योदय से पहले रातों-रात सब को स्वस्थ्य करने हेतु हिमालय के महाशय पर्वत शिखर से चार चमकीली बुटियाँ - शल्य विकर्णी, सञ्जीव करणी, सावर्ण्य करणी और सन्धानी बुटी सूर्योदय से पहले लाने हेतु पूरा मार्ग बतलाकर भेजना। हनुमान जी छलांग लगा कर हिमालय पहूँचे। इन्द्र की अमरावती पुरी, कुबेर की अलकापुरी, वरुण की वारुणीपुरी, यम की संयमनी पुरी देखना। प्रजापति , इन्द्र, वरुण, द्वादश आदित्य, आठ वसु, एकादश रुद्र सहित स्वर्ग की सभा देखी।
बुटियों को न पहचान पाने के कारण महाशय पर्वत शिखर उखाड़ लाये। और चिकित्सा उपरान्त वापस रख आये। यही कार्य दुबारा मेघनाद द्वारा विभिषण जी पर की गई शक्ति प्रहार को लक्ष्मण जी ने आगे बढ़कर अपने सीने पर झेल लिया। और अचेत हो गये तब भी जामवन्त जी ने हनुमानजी को वापस महाशय पर्वत शिखर पर भेजा और हनुमान जी उक्त चारों बुटियों सहित पर्वत शिखर ले आये और चिकित्सा उपरान्त वापस रख आये।
विभिषण जी द्वारा सूचित करने पर रावण की कुलदेवी रक्षिणी निकुम्भला के मन्दिर में मेघनाद द्वारा किए जा रहे तान्त्रिक हवन का विध्वंस कर हनुमान जी और लक्ष्मण जी ने निकुम्भला मन्दिर ध्वस्त कर निकुम्भला की मूर्ति  तोड़ डाली लक्ष्मण जी द्वारा मेघनाद का वध किया।
बाद में फिर विभिषण जी द्वारा सूचित करने पर  रावण  भी निकुम्भला के गुप्त मन्दिर में तान्त्रिक पूजा, होम- हवन करने लगा तो हनुमान जी और लक्ष्मण ने मन्दिर और मूर्ति तोड़ कर हवन ध्वन्स कर दिया 
इन्द्र द्वारा सारथी मातली सहित रथ श्री रामचन्द्र जी की सहायतार्थ रथ भेजा। मातली की सलाह पर श्री रामचन्द्र जी ने रावण पर ब्रह्मास्त्र चलाकर वध कर दिया।
रावण का वध अमान्त फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी और अमावस्या तिथि की सन्धि में हुआ।
 श्री रामचन्द्र जी ने विभिषण का राज्याभिषेक करवा कर पुष्पक विमान से चैत्र शुक्ल पञ्चमी तिथि को चित्रकूट में भरद्वाज आश्रम पहूँचे।
चैत्र शुक्ल षष्ठी तिथि को अयोध्या पहूँचे।

 रामराज्य के प्रति अयोध्या वासियों की राय पुछने पर गुप्तचरों ने बतलाया कि, रावण की लंका में रही सीता जी को पटरानी बनाया जाने पर जनता में असन्तोष है। इस कारण दुसरे दिन श्री रामचन्द्र जी ने लक्ष्मण जी के साथ गर्भवती सीता जी को वाल्मीकि आश्रम के पास छुड़वा दिया। वहाँ जाकर लक्ष्मण जी ने सीता जी को सही जानकारी दी।
लव-कुश का जन्म, शिक्षा, और रामायण महाकाव्य कण्ठस्थ करवाया।
फिर श्रीरामचन्द्र जी द्वारा किए जा रहे राजसूय यज्ञ में लव-कुश ने पहली बार रामायण महाकाव्य का गायन कर सुनाया।

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