गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

जो सरकार निकम्मी है वो सरकार बदलनी है; नारे का वास्तविक अर्थ।

*जो सरकार निकम्मी है वो सरकार बदलनी है; नारे का अर्थ अब समझ में आया।*
हमारे बचपन में चुनावी रैलियाँ और आमसभाओं में एक नारा विपक्षी दल अवश्य लगवाते थे -- जो सरकार निकम्मी है वो सरकार बदलनी है।
बच्चों को बिल्ला लगाकर हाथ में झण्डा देकर मोहल्ला रैलियाँ भी निकालते थे। बहुत से बच्चे सभी राजनीतिक दलों की रैलियों में जाकर झण्डे, डण्डे और बिल्ला संग्रहण कर अमेरिकी कथाकार मार्क ट्वैन की भाषा में स्वयम् को बहुमुल्य सम्पत्ति का स्वामी बनकर इठलाता रहता था।
लेकिन तब सभी रैलियों में जाने वाले/ माता- पिता के दबाव में केवल किसी एक रैली में में ही जाकर सन्तोष कर लेने को विवश बच्चे और किसी भी रेली में भाग नहीं ले पाने वाले के कारण घर में ही नारा लगाने वाले बच्चों से लेकर नारा लगवाने वाले वरिष्ठ जनों तक किसी को भी इस नारे का छिपा हुआ मूल अर्थ पता नहीं होता था। जो कई वर्षों से न समझ आने वाले बजट को हर साल समझने के असफल प्रयत्न से समझ आया कि,
निकम्मी सरकार वह होती है जो सम्भावना होते हुए भी राजनीतिक भाषा में भोली-भाली (वास्तविक अर्थ - मूर्ख) जनता को करों के बोझ से दबा कर कुचलने में कमी रख दे। और सरकार को सम्भावित आय प्राप्त करने से महरूम रख दे।
इसलिए हम सन 1957 से लगातार हर दस-पन्द्रह वर्ष में तो तथाकथित निकम्मी सरकार बदलते रहे हैं और नेताओं पर होने वाले खर्च और कर बढ़ाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेती है।
हमने सभी दलों के छुटभैय्ए नेताओं को कमाने के भरपूर अवसर देकर ईंट-पत्थर तोड़ने हेतु अपनी खोपड़ी का उपयोग कर अपना ही सिर फोड़ते रहे।

1 टिप्पणी:

  1. बात तो सही है। लेकिन किया क्या जा सकता है। खरी बात कहने के लिए साधु वाद

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