गुरुवार, 26 फ़रवरी 2026

ग्रहण काल में क्या करें - क्या न करें।

प्रथम तथ्य तो यह है कि, मूर्ति पूजा जैसे अवैदिक कर्म को छोड़कर ग्रहण की अवधि में भी कोई भी वैदिक कर्म में कोई रोक नहीं है।-  
ग्रहण के समय में 
1 ब्रह्मयज्ञ अर्थात शास्त्र पठन-पाठन, ॐ का जप, गायत्री मन्त्र का जप, या कोई भी वैदिक मन्त्र जप करना ही चाहिए। नदी में खुले आसमान के नीचे करना और भी अधिक अच्छा माना जाता है।
2 देव यज्ञ - वैद मन्त्रो के साथ अग्निहोत्र करके देवताओं को आहुति देना चाहिए।
3 नृयज्ञ - गुरुकुलों, ब्रह्मचारियों, रोगी, बालकों असहायों और अशक्तों की सेवा करना ही चाहिए।
4 भूत यज्ञ, गो, आदि पाल्य पशुओं, कुत्ता, कौवा, चींटी आदि जन्तुओं, पेड़-पौधे आदि वनस्पतियों की सेवा पञ्च बलि निकालना करना ही चाहिए।
सूखा मेवा , स्वर्ण आदि का दान करना ही चाहिए।
5 पितृ यज्ञ -- अशक्त, असहाय और रुग्ण वृद्धौ , गुरुजनों , नगर में प्रवेश न करने वाले संन्यासियों की सेवा करना ही श्राद्ध है।
यह श्राद्ध कर्म करना ही चाहिए। भूखे बच्चे, वृद्ध, बिमार या गर्भवती स्त्रियों से यदि भूख सहन नहीं हो पा रही हो तो उन्हें सुखे मेवे या सेब जैसे गुदादार फल या शकरकन्द (रतालू) जैसे कन्द-फल आदि से उनकी भूख मिटाने का प्रयत्न करें।
फिर भी न रह पाए तो तुलसी दल, दुर्वा, कुश, स्वर्ण, चान्दी आदि रखकर सुरक्षित किया हुआ पका भोजन भी खिला सकते हैं।
यही श्राद्ध कर्म है।

ये सभी वैदिक कर्तव्य कर्म आवश्यक है करना ही चाहिए।
लेकिन मूर्ति पूजा और विशेषकर लिङ्ग-योनि स्पर्श और पूजा पूर्णतः निषिद्ध है।

होलिका दहन वैदिक नव सस्येष्टि कर्म का ही विकृत संस्करण है। और धुलि वन्दना और वसन्तोत्सव भी वैदिक कर्म है।
इसलिए चन्द्रग्रहण में होलिका दहन, धूलिवन्दन, वसन्तोत्सव का कोई निषेध नहीं है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें