सभी गाँवो में एक ही मन्दिर हो जिसमें सभी वैदिक देव और देवताओं के मण्डप शुल्ब सूत्रों के अनुसार मण्डप हों और मण्डप में मण्डल भी शुल्ब सूत्रों के अनुसार हो। जहाँ उन देवताओं का आव्हान, स्थापन, पूजन, यजन कर विसर्जन किया जाता रहे। सभी मण्डपों में यज्ञ बेदी भी शुल्ब सुत्रों के अनुसार बनी हो। *जहाँ उक्त मण्डपों में स्थित मण्डल पर* ---
परमात्मा
ॐ
परब्रह्म-
विष्णु और माया।
ब्रह्म-
प्रभविष्णु और श्री, लक्ष्मी तथा सवितृ और सावित्री।
अपर ब्रह्म -
नारायण और नारायणी तथा श्री हरि- कमलासना, गजसेविता लक्ष्मी।
हिरण्यगर्भ (पञ्चमुखी ब्रह्मा) और वाणी,
त्वष्टा-रचना
तथा
सनक, सननन्दन, सनत्कुमार , सनातन, नारद
धर्म और उनकी तेरह पत्नियाँ - (१) श्रद्धा, (२) लक्ष्मी, (३) धृति, (४) तुष्टि, (५) पुष्टि, (६) मेधा, (७) क्रिया, (८) बुद्धि, (९) लज्जा, (१०) वपु, (११) शान्ति, (१२) सिद्धि, (१३) कीर्ति )
काम और रति
एवम्
अर्धनारीश्वर एकरुद्र।
प्रजापति (चतुर्मुख ब्रह्मा) और सरस्वती,
इन्द्र और शचि, दक्ष (प्रथम) और प्रसुति, रुचि और आकुति, कर्दम और देवहुति, स्वायम्भुव मनु और शतरूपा
तथा
शंकर और उमा,
एवम्
मरीची और सम्भूति, भृगु और ख्याति, अङ्गिरा और स्मृति, वशिष्ट और ऊर्ज्जा, अत्रि और अनसुया, पुलह और क्षमा, पुलस्य और प्रीति, कृतु और सन्तति।
वाचस्पति और वाक ,
अग्नि और स्वाहा, पितर और स्वधा,
ब्रह्मणस्पति और सुनृता,
द्वादश आदित्य ---
(1) विष्णु, (2) सवितृ, (3) त्वष्टा, (4) इन्द्र, (5) वरुण, (6) विवस्वान, (7) पूषा, (8) भग, (9) अर्यमा, (10) मित्र, (11) अंशु और (12) धातृ) और उनकी शक्तियाँ,
ब्रहस्पति- शुभा, ममता , तारा,
अष्ट वसु---
(1) प्रभास (आकाश) - प्रभासा।
(2) प्रत्युष (सूर्य/देव) - प्रत्युषा या दीक्षा
(3) धर्म (वसु-पुत्र) - धृति ।
(4) ध्रुव (अचल/ध्रुव तारा) - ध्रुवा या धरणी
(5) अर्क (सूर्य/देव) - अर्का
(6) अनिल (वायु) - अनिला या शिवा
(7) अनल (अग्नि) - अनला या शांडिली
(8) अप् (जल) - आप (या सरिता)
पशुपति-पार्वती
एकादश रुद्र----
(1) हर, (2) त्र्यम्बकं, (3) वृषाकपि, (4) कपर्दी, (5) अजैकपात, (6) अहिर्बुधन्य, (7) अपराजित, (8) रैवत, (9) बहुरूप, (10) कपाली और (11) शम्भु (शंकर) और उनकी शक्तियाँ,
गणपति और सिद्धि ,
सोम और वर्चा,
सदसस्पति और समिति।
मही।
भारती।
अधिदेव
अष्टादित्य-
(1)मार्तण्ड {विवस्वान}, (2) इन्द्र, (3) वरुण, (4) मित्र, (5) धाता, (6) भग, (7) अंश और (8) अर्यमा ।
द्वादश तुषितगण।
(1) बुद्धि, (2) मन, (3) उदान, (4) व्यान, (5) प्राण, (6) समान, (7) अपान, (8) श्रोत, (9) स्पर्ष, (10) चक्षु, (11) रसना और (12) घ्राण ।
सरस्वती।
द्वादश साध्यगण ।
(1) मन, (2) अनुमन्ता, (3) प्राण, (4) अपान, (5) विति , (6) हय, (7) हन्स, (8) विभु, (9) प्रभु, (10) नय, (11) नर और (12) नारायण ।
चौरासी सिद्ध गण
प्रणेताओं के पुत्र दक्ष द्वितीय।(शंकर जी के श्वसुर)
अध्यात्म- दुसरे अष्ट वसु।
(1) द्रोण, (2) प्राण, (3) ध्रुव, (4) अर्क, (5) अग्नि (6) दोष, (7) वसु और (8) विभावसु।
मरुद्गण ।
(1) आवह, (2) प्रवह, (3) संवह, (4) उद्वह, (5) विवह, (6) परिवह और (7) परावह । और इन सातों के छ:छ: पुत्र।
दस विश्वैदेवगण।
(1) दक्ष (द्वितीय), (2) कृतु, (3) सत्य, (4) काल (यम), (5) काम, (6) मुनि, (7) एल पुरुरवा, (8) श्रव, (9) रोचमान, (10) आर्द्रवान ।
इळा।
प्रभास वसु और (ब्रहस्पति की बहन) वरस्त्री के पुत्र देवशिल्पी विश्वकर्मा।
(शुक्राचार्य के पुत्र) त्वष्टा।
अधिभूत- दुसरे एकादश रुद्र।
(1) मन्यु, (2) मन , (3) महिनस, (4) महान, (5) शिव, (6) उग्ररेता, (7) भव, (8) काल, (9) वामदेव, (10) धृतवृत और (11) मृगव्याध।
या मतान्तर से अन्य नाम
(1) सर्प, (2) निऋति,(3) पिनाकी, (4) कपाली, (5) स्थाणु, (6) ईशान नाम और (7) दहन भी।
अनेकरुद्र ।
(विशेले कीट पतङ्ग, सर्प, बिच्छू, घोघा (कपर्दी) और सीपी (युनियो, पाईला), सिंह, व्याघ्र आदि हिन्सक प्राणी, रोगाणु (बैक्टरिया), विषाणु (वायरस), फफुन्द, काई, आतंकी, गुण्डे, बदमाश, चोर, उचक्के, डाकु, लुटेरे, वनवासी, पुलिस, सेना आदि रुलाने वाले सभी अनेकरुद्र ।
शुक्राचार्य के पौत्र , त्वष्टापुत्र त्रिशिरा विश्वरूप हैं।
यह्व ( महादेव) ।
(1) ईशित्व- वशित्व, (2) अणिमा-लघिमा, (3) महिमा- गरिमा और (4) प्रकाम्य - प्राप्ति) सिद्धियों के अधिदेवता अष्ट विनायक । (1)सम्मित-उस्मित, (2) मित- देवयजन, (3) शाल - कटंकट और (4) कुष्माण्ड - राजपुत्र ।
ईला नामक रौद्री के पुत्र एल भैरव। ( या वैवस्वतमनु की पुत्री ईला और बुध के पुत्र एल पुरुरवा।) ।
और
राजा के स्थान हों। जहाँ उन देवों, देवताओं का आह्वान, स्थापन, पूजन और यजन किया जा सके।
प्राचीन काल में केवल स्थान बनाया जाता था। जिसमें न कोई पद चिह्न होते थे, न चित्र होता था, न प्रतिमा होती थी और न ही मूर्ति होती थी। मण्डप में केवल मण्डल बने होते थे। जिस पर सम्बन्धित देव/देवता की धारणा और ध्यान किया जाता था।
*इससे कुछ मिलता- जुलता प्रयोग यज्ञों में किया जाता है। और जैन लोगों में भी मण्डल पूजा के रूप में प्रचलित है।*
शंकरजी और उनके शिष्य शुक्राचार्य जी द्वारा स्थापित तथा अत्रि पुत्र दत्तात्रेय द्वारा अपने शिष्य राजा कार्तवीर्य सहस्रार्जुन और रावण द्वारा प्रचलित वेद विरुद्ध तन्त्र परम्परा के अनुयाई कुछ तान्त्रिक भारत में भी गुप्त रूप से तन्त्र क्रिया करते थे और छोटी छोटी मूर्तियाँ रखकर पूजा करते थे। लेकिन मठ- मन्दिर नहीं होते थे। पहले ईरान में भी मीढ लोग इसी मत के थे। इसलिए शंकर जी को मीढीश कहते हैं। वर्तमान में नाथ पन्थ इन्हीं का उत्तरवर्ती रूप है।
परवर्ती काल में मङ्गोलिया से तुर्किस्तान के देश होते हुए युनान के निकट क्रीट तक फैले तान्त्रिक लोग, इराक, टर्की, युनान, मिश्र, युरोप, अफ्रीका और उत्तर अमेरिका, मध्य अमेरिका, दक्षिणी अमेरिका महाद्वीप में इस तन्त्र मत का फैलाव हुआ और वहाँ मठ मन्दिर और मूर्ति पूजा प्रचलित हुई। लेकिन तब भी भारत में वैदिक काल में मूर्ति पूजा नहीं होती थी।
स्वायम्भुव मनु-शतरूपा के तीसरी पीढ़ी में जन्मे ऋषभदेव जी जिन्होंने दक्ष प्रजापति प्रथम द्वारा स्थापित और अपने पूर्वजो मनु शतरुपा, प्रियव्रत, आग्नीध्र और अजनाभ (नाभि) द्वारा पालित वर्णाश्रम धर्म का पालन करते हुए अन्तिम अवस्था में संन्यास ग्रहण किया था। और उनके पुत्र भरत चक्रवर्ती ने भी उसका पालन किया।
लेकिन ऋषभदेव के पुत्र बाहुबली ने युवावस्था में ही संन्यास ग्रहण कर लिया था। उसे आदर्श मानने वाले जैन पन्थ ने ऋषभदेव जी को अपना पहला तीर्थंकर घोषित कर श्रमण मत के अन्तर्गत तन्त्र परम्परा अपना ली और मठ, मन्दिर और मूर्ति पूजा प्रारम्भ कर दी।
व्यापार और राजनीति के कारण उक्त देशों के सम्पर्क में भारतीय राजनयिक और व्यापारी आये परिणाम स्वरूप भारत में सर्वप्रथम श्रमण मतावलम्बियों ने तन्त्र मतानुसार मठ- मन्दिर और मूर्ति पूजा प्रारम्भ की। इसमें मुख्य रूप से जैन व्यापारी प्रमुख थे।
भारत में भी सर्वप्रथम शिवलिङ्ग- योनि की पूजा प्रारम्भ हुई। फिर ध्यान मुद्रा में बैठे शंकर जी, रुद्र और अम्बिका, काली, चामुण्डा, भैरव- भैरवी, गजानन विनायक और नन्दी की मूर्ति पूजा प्रचलन में आई।
शैव-शाक्त, गाणपत्य के बाद ईरान से आये मग ब्राह्मणों ने सूर्य की मूर्ति और मन्दिर की पूजा प्रारम्भ की।
अन्त में विष्णु, लक्ष्मी नारायण, हिरण्यगर्भ ब्रह्मा और प्रजापति ब्रह्मा की मूर्तियाँ बनने लगी।
श्रीकृष्ण की मुर्ति पूजा होने लगी, फिर श्री रामचन्द्र जी मुर्तियाँ पूजी जाने लगी। फिर चौबीस अवतारों की पूजा प्रारम्भ हुई।
फिर तो शिव परिवार, शिव अवतार, चण्डिका के अवतारों, विनायक गजानन और उनके अवतारों की मूर्तियाँ पूजी जाने लगी, शितला देवी भी पूजी जाने लगी।
इसलिए किसी अन्य स्थान पर मूर्ति पूजक यदि चाहें तो उनके लिए उपर्युक्तानुसार मण्डप में मण्डल पर उक्त देवों/ देवताओं की मूर्ति स्थापित कर उनके लिए भी ऐसा ही एक मन्दिर बना दिया जाए।
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