परमात्मा सर्वोच्च है। परमात्मा के संविधान को ही वेदों में ऋत कहा गया है।
परमात्मा ने जिस कल्याण स्वरूप ॐ सञ्कल्प से स्वयम् को परब्रह्म परमेश्वर विष्णु और माया के प्रथम सगुण निरञ्जन निराकार स्वरूप में प्रकट होकर सृजन प्रारम्भ किया उसी सञ्कल्प के अन्तर्गत पुनः विष्णु ने कल्प रचना की कल्पना की। जो उनकी कल्पना है, वही हमारे लिए सृष्टि है।
इसलिए जगत को माया और स्वप्नवत कहा जाता है।
चूंकि जो भी हम अनुभव कर रहे हैं वस्तुतः भगवान विष्णु की कल्पना में वह बहुत पहले हो चुका है। शुटिंग होकर रील तो कब की बन चुकी हम आज अनन्त डायमेंशन में अभी अनुभव कर रहे हैं।
भगवान श्री रामचन्द्र जी को बाली वध का बदला चुकाने हेतु श्रीकृष्ण जन्म में जरा के बाण से मृत्यु वरण ।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने नारायण स्वरूप में स्थित होकर अर्जून से स्पष्ट कहा है कि, तेरे और मेरे अनेक जन्म हो चुके हैं, मैं जानता हूँ लेकिन तु नहीं जानता है।
षड ऐश्वर्यवान व्यक्ति को ही भगवान कहते हैं।भगवान और साधारण व्यक्ति में इतना ही अन्तर होता है।
इसके दो प्रमाण वाल्मीकि रामायण से और एक प्रमाण भागवत पुराण से दे रहा हूँ।
1 जनक जी के यहाँ पिनाक धनुष भङ्ग से क्रोधित होकर जब भगवान परशुराम जी ने श्री रामचन्द्र जी को वैष्णव धनुष पर प्रत्यञ्चा चढ़ाने की चुनौती देते हुए जैसे ही वैष्णव धनुष श्री रामचन्द्र जी के हाथ में दिया वैसे ही भगवान श्री परशुराम जी का वैष्णव तेज (अवतार पद का चार्ज) श्री रामचन्द्र जी के शरीर में अन्तरित हो गया।
अब परशुराम जी केवल ऋषि रह गये और श्री रामचन्द्र जी को अवतार का पदभार मिल गया।
मतलब अवतारत्व निर्धारित कार्यकाल में निर्धारित कार्य पूर्ण करने हेतु ईश्वर प्रदत्त पदभार है। इसका प्रमाण है कि,
2 जब भगवान श्री रामचन्द्र जी की अवतार अवधि पूर्ण हो गई तो उन्हें अपना कार्यभार वापस लौटा कर लीला संवरण करने का निर्देश देने स्वयम् काल ही पधारे । और श्री रामचन्द्र जी ने सरयु में जल समाधि लेकर देह त्याग दी।
3 श्रीमद्भागवत पुराण में श्रीकृष्ण के यज्ञ में आकर एक ब्राह्मण अपने सात पुत्रों की जन्मते ही मृत्यु का दोष राजा पर लगाकर श्रीकृष्ण को दोषी ठहराते हैं तो, अर्जुन उनके गर्भस्थ शिशु की रक्षा का भार लेते हैं। लेकिन असफल होने पर आत्मदाह कर प्रायश्चित करने जा रहे होते हैं तभी भगवान श्रीकृष्ण का यज्ञ पूर्ण होने पर वे अर्जून को लेकर पश्चिम सागर होते हुए क्षीर सागर में शेषनाग के महल में सिंहासनारुड़़ अष्टभुजा धारी भगवान भूमा के सम्मुख करबद्ध उपस्थित होते हैं। तब भगवान भूमा नारायण श्री कृष्ण जी को कहते हैं कि, तुमसे मिलने के लिए ही मेने तुम्हे यहाँ बुलाया है।
तुम गत जन्म में नारायण ऋषि थे और अर्जुन नर ऋषि थे। तुम दोनों नर नारायण ने कठोर तप किया था।
फिर ब्राह्मण बालकों को सोप कर वापस लौटा देते हैं।
ये तीनों प्रमाण सिद्ध करते हैं कि, भगवान विष्णु या नारायण स्वयम जन्म नहीं लेते बल्कि किसी योग्य तपस्वी ऋषि को किसी कार्य विशेष को पूर्ण करने के लिए आवश्यक सामर्थ्य प्रदान कर अवतार का कार्यभार सोपते हैं।
इससे सिद्ध होता है कि, जब वैकुण्ठ लोक के किसी देश का क्षत्रप के रूप में पदस्थ कोई आत्मज्ञ/ब्रह्मज्ञानी व्यक्ति किसी विशेष प्रयोजन को पूर्ण करने हेतु निर्धारित कार्य काल के लिए नियुक्त किया जाता है तो उसके उच्च लोक से उतरने की घटना को अवतरण कहते हैं। इसलिए वह षड ऐश्वर्यवान व्यक्ति अवतार कहलाता है। लेकिन वह ईश्वर नहीं होता है।
इसलिए ही भगवान श्री रामचन्द्र जी साकेत लोक से उतरे थे और पुनः साकेत लोक में अपना कार्य देखने लौट गए।और भगवान श्रीकृष्ण गोलोक से अवतरित हुए और वापस लौट कर गोलोक का कार्य भार ग्रहण कर लिया।
हमारे सौ-सवासौ वर्ष उन लोकों के लिए क्षण मात्र होता है, इसलिए वहाँ कोई कमी नहीं लगती है।
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