प्रहलाद जानी जिनको चुनरीवाला माताजी भी कहते थे, क्योंकि, वे चुनरी ओढ़ते थे। गुजरात के रहने वाले जानी ने दावा किया था कि वे 1940 से 2020 तक (करीब 80 साल) बिना अन्न-जल के रहे, जिसे उन्होंने देवी अंबा की कृपा बताया।
भारतीय रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) के वैज्ञानिकों ने उन पर 2010 में कड़ी निगरानी में एक अध्ययन किया था, जिसमें दावा किया गया कि वे बिना कुछ खाए-पिए रह सकते थे।
उनका जन्म 13 अगस्त 1929 को गुजरात के चराडा गांव में हुआ था। उन्होंने दावा किया था कि 11 साल की उम्र में देवी अंबा के दर्शन के बाद उन्होंने अन्न-जल का पूरी तरह त्याग कर दिया था।
तब से वे हमेशा एक महिला की तरह श्रृंगार करते थे, लाल साड़ी (चुनरी) पहनते थे और नाक में नथ पहनते थे, इसलिए उन्हें 'माताजी' कहा जाता था।
2003 और 2010 में दो बार उनका वैज्ञानिक परिक्षण भी हुआ।
अहमदाबाद के स्टर्लिंग अस्पताल में डॉक्टरों और वैज्ञानिकों की टीम (जिसमें DRDO के वैज्ञानिक भी शामिल थे) ने उन पर दो बार रिसर्च की।
2010 के परीक्षण के दौरान उन्हें 15 दिनों तक लगातार CCTV की कड़ी निगरानी में रखा गया। इस दौरान उन्होंने न तो कुछ खाया-पिया और न ही शौच या मूत्र त्याग किया।
डॉक्टर यह देखकर हैरान थे कि उनके मूत्राशय (bladder) में मूत्र बनता था, लेकिन वह शरीर द्वारा फिर से सोख लिया जाता था।
रहस्यमयी सिद्धांत: वैज्ञानिकों का अनुमान था कि उनके शरीर ने भूख और प्यास के प्रति एक अत्यधिक अनुकूलन (extreme adaptation) विकसित कर लिया था। जानी जी का स्वयं का मानना था कि उनके तालू (palate) में एक छेद है जिससे उन्हें "दिव्य अमृत" प्राप्त होता है।
वे गुजरात के अंबाजी मंदिर के पास एक गुफा में रहते थे। 91 वर्ष की आयु में 26 मई 2020 को गुजरात के बनासकांठा में उनका निधन हुआ।
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