*होलाष्टक*
पौराणिक कथाओं के अनुसार हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु की एक बहन और प्रह्लाद जी की भुआ असम के राजा विप्रचित्ति की रानी सिंहिका थी जिसका पुत्र स्वर्भानु (राहु) था और दुसरी बहन होलिका थी जिसने तपस्या करके अग्नि में न जलने का वरदान प्राप्त कर रखा था। लेकिन हर वरदान की कुछ सीमाएँ एवम् पारिस्थितिक शर्तें होती है।
ये दोनों बहनें जब हिरण्यकशिपु से मिलने आई उसके पहले सिंहिका पुत्र स्वर्भानु की सलाह पर हिरण्यकशिपु ने फाल्गुन शुक्ल अष्टमी तिथि से चतुर्दशी तक आठ दिन प्रह्लाद जी को मारने के लिए अनेक प्रयत्न किये। प्रह्लाद जी को बहुतेरी प्रताड़ना दी गई। लेकिन प्रह्लाद जी की रक्षा उनके इष्टदेव भगवान नारायण श्रीहरि करते रहे।
अन्ततः होलिका ने प्रस्ताव रखा कि, मुझे अग्नि नहीं जला सकेगी ऐसा वरदान प्राप्त है। अतः कल (फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को) मैं सार्वजनिक महोत्सव के रूप में प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि स्नान करूंगी। परिणाम स्वरूप प्रह्लाद जल कर मर जाएगा। और मैं बची रहूँगी।
लेकिन भगवान नारायण श्रीहरि की कृपा से हो उल्टा गया। होलिका जल गई और प्रह्लाद जी सुरक्षित रहे।
व्यास (विपाशा), रावी (इरावति) और सतलुज नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों में अर्थात धवलपुर, लुधियाना, शिमला, फिरोजपुर, गुरदासपुर, होशियारपुर, कांगड़ा,कपूरथला और अजमेर - पुष्कर के आस-पास के क्षेत्रों के लोगों की मान्यता हैं कि, हिरण्यकशिपु ने इस क्षेत्र में प्रह्लाद जी का उत्पीड़न किया था।
इसलिए धवलपुर, लुधियाना, शिमला, फिरोजपुर, गुरदासपुर, होशियारपुर, कांगड़ा,कपूरथला और अजमेर - पुष्कर के आस-पास के क्षेत्रों फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से पूर्णिमा तक होलाष्टक में कोई शुभ कार्य नहीं करने की परम्परा है।
मुहूर्त चिंतामणि शुभाशुभ प्रकरण श्लोक 40 तथा मुहूर्त गणपति श्लोक 204 के अनुसार होलाष्टक का दोष विशेष रूप से व्यास (विपाशा), रावी (इरावति) और सतलुज नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों में वर्जित माना गया है।
यह मुख्य रूप से उत्तर पश्चिम भारत के पंजाब, हिमाचल प्रदेश का कुछ भाग और अजमेर (पुष्कर) क्षेत्र में ही मान्य है।
अर्थात
धवलपुर, लुधियाना, शिमला, फिरोजपुर, गुरु दासपुर, होशियारपुर, कांगड़ा, कपूरथला, अजमेर, पुष्कर आदि नगरों के आस-पास का क्षेत्र में ही मान्य है; अन्य क्षेत्र: यह दोष हर जगह मान्य नहीं है।
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