सोमवार, 19 जून 2023

आचार्य, गुरु और शिष्य

 उपनिषद और श्रीमद्भभग्वद्गीता भी आत्मज्ञ के पास शिष्यभाव से जाकर पुछने पर गुरु द्वारा ज्ञान प्रदान करने पर ही आत्मज्ञान होने का ही निर्देश करते हैं।
क्योंकि, ज्ञान किसी कर्म का फल नही।
वह गुमा हुआ चौथा साँथी तु स्वयम् है कहानी के समान हमारा वास्तविक स्वरूप जो हम भूले हुए हैं और जीवभाव से ग्रस्त है उसके निवारणार्थ ही शिष्य को गुरु के पास जाने का निर्देश है।
 केनोपनिषद में तो स्पष्ट ही कहा है कि, शिष्य गुरु से किस प्रकार प्रश्न करेगा और गुर क्या उत्तर देगा।
कठोपनिषद में यम नचिकेता को उपदेश देते हैं तब नचिकेता को ज्ञान हुआ। प्रश्नोपनिषद में पिप्पलाद सबके संशय और भ्रम निवारण कर ज्ञान देते हैं।
मुण्डकोपनिषद में अङ्गिरा शौनक को ज्ञान प्रदान करते हैं।
तैत्तरीयोपनिषद में गुरुकुल और आचार्य शिष्य की सामुहिक प्रार्थना का उल्लेख है।
छान्दोग्योपनिषद और वृहदारण्यकोपनिषद में तो कई कहानियाँ है जिसमें एक आचार्य दुसरे आचार्य के पास ज्ञान प्राप्त्यर्थ जाकर पुछता है और आचार्य उसे ज्ञान प्रदान करते हैं।
इसके अलावा भी छान्दोग्योपनिषद में अग्नि और वायु को ज्ञान नही हुआ जबकि, यक्ष रूपी ब्रह्म प्रत्यक्ष थे। किन्तु भगवती उमा के कथन मात्र से इन्द्र को तत्काल स्मृति/ ज्ञान हो गया।

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