अभेद दर्शन/अद्वैत वादी के अनुसार जीव और जगत परमात्मा के ही स्वरूप हैं। जीव और जगत परमात्मा से भिन्न नही है और आत्मा अनेक नही है, बल्कि आत्मा एक ही है, जो परमात्मा से अभिन्न है।
वैदिक अभेद दर्शन का आधार ऋग्वेद, शुक्ल यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद मन्त्र संहिताओं के सुक्त और अध्याय हैं। इसमें वैदिक अभेद दर्शन शुद्ध तात्विक दर्शन है।
अद्वैत वेदान्त दर्शन तात्विक दर्शन को ही तार्किक ढङ्ग से समझानें का प्रयास है। ये मुख्य रूप से उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता (महाभारत भीष्म पर्व अध्याय २५ से ४३) तथा विष्णु पुराण आदि के आधार पर बनें उत्तर मीमांसा दर्शन (शारीरिक सुत्र यानी ब्रह्मसुत्र) पर आधारित है।
अद्वैत वेदान्त दर्शन तात्विक दर्शन को ही तार्किक ढङ्ग से समझानें का प्रयास है। ये मुख्य रूप से उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता (महाभारत भीष्म पर्व अध्याय २५ से ४३) तथा विष्णु पुराण आदि के आधार पर बनें उत्तर मीमांसा दर्शन (शारीरिक सुत्र यानी ब्रह्मसुत्र) पर आधारित है।
अद्वैत दर्शन के मुख्य आचार्य आद्यशंकराचार्य जी हैं। अन्य आचार्य सुरेश्वराचार्य (मण्डन मिश्र), हस्तमालकाचार्य, पद्मपादाचार्य, त्रोटकाचार्य, वाचस्पति मिश्र आदि हैं।
जैसे सूर्य का प्रकाश है वैसे ही परमात्मा के विष्णु स्वरूप की शक्ति माया है। माया परमात्मा की परा प्रकृति है, स्व भाव है। अतः जगत भी परमात्मा से अभिन्न है। इसलिए भक्ति भाव से जगत को परमात्मा की लीला कहा जाता है।
जीवभाव मात्र भाव है, जैसे व्यक्ति मे माता या पिता और सन्तान, पति, या पत्नी, सत्ताधीश और प्रजा (शासक और शासित) जैसे अनेक भाव एक साथ रहते हैं ऐसे ही आत्मभाव और जीवभाव दोनों साथ साथ रहते हैं। जिस समय जो प्रधान रूप से उभर कर प्रत्यक्ष होता है, उस समय व्यक्ति के व्यवहार में झलकता है। जो सदैव आत्मभाव में ही रमता हो वह जीवन्मुक्त है।
२ भेदाभेद या द्वैताद्वैत वादी - इनके मुख्य आचार्य निम्बार्काचार्य हैं। वे उपनिषदों, ब्रह्मसुत्र, और पुराणों के आधार पर मानते हैं कि, वेदों में अभेद, अद्वैत और भेद या द्वैत दोनों ही प्रकार के मन्त्र हैं। इसलिए दोनों ही मान्य हैं।
३ त्रेतवाद या विशिष्टाद्वैत वाद --- आर्य समाज के प्रवर्तक महर्षि दयानन्द सरस्वती जी का दर्शन त्रेतवाद कहलाता है। इसका मुख्य आधार कृष्ण यजुर्वेदीय श्वेताश्वतरोपनिषद है।
रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैत दर्शन स्मृतियों अर्थात रामायण, महाभारत, विष्णु पुराण आदि पूराणों सहित वेदान्त अर्थात उपनिषदों और ब्रह्म सुत्र के आधार पर ही अपना मतवाद प्रस्तुत करता है।
विशिष्टाद्वैत वेदान्त दर्शन के मुख्य आचार्य रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैत दर्शन और आर्य समाज के प्रवर्तक महर्षि दयानन्द सरस्वती का त्रेतवाद भी लगभग लगभग समान ही है।
ये सर्वोच्च सत्ता परब्रह्म परमेश्वर, अनेकजीव और जगत (प्रकृति) तीनों को अनादि, अविनाशी मानते हैं। इनके अनुसार जगत के अन्तर्गत जीव अर्थात शरीर के अन्दर जीव और जीव में ब्रह्म का वास होता है। यही विशिष्टाद्वैत दर्शन है।
विशिष्टाद्वैत/ त्रेतवाद में परब्रह्म को परमेश्वर अर्थात सर्वोच्च शासक माना जाता है। लेकिन परब्रह्म परमेश्वर को तानाशाह नहीं माना जाता है। परब्रह्म परमेश्वर सर्वसमर्थ और सर्वज्ञ माना जाता है, जबकि जीव को अल्प सामर्थ्यवान और अल्पज्ञ माना जाता है। जगत को जड़ मानते हैं। इस प्रकार जीव और जगत दोनों ही परब्रह्म परमेश्वर के अधीन मानते हैं।
४ त्रेतवाद का ही एक रूप त्रिक दर्शन है जिसे प्रत्यभिज्ञा दर्शन या कश्मीरी शैव दर्शन भी कहते हैं; जिसके मुख्य आचार्य वसुगुप्त,और उनके शिष्य कल्लट, सोमनन्द तथा सोमानन्द के पुत्र और शिष्य उत्पलाचार्य, उत्पलाचार्य के शिष्य अभिनव गुप्त हैं। अभिनव गुप्त नें प्रत्यभिज्ञा दर्शन सुव्यवस्थित व्याख्या प्रस्तुत की। बौद्धधर्म के माध्यमिक दर्शन (नागार्जुन और कुमारलात के शुन्यवाद), योगाचार (आचार्य मैत्रेयनाथ, असङ्ग और वसुबन्धु और कुमारलात के विज्ञान वाद) और आचार्य बोधिसत्व मञ्जुश्री के वज्रयान शाखा का ही उत्तरवर्ती स्वरूप कश्मीरी शैव दर्शन त्रिक दर्शन है, जिसमें वज्रयान के तन्त्र को उपनिषदों (वेदान्त) से जोड़ने का प्रयास किया गया । ये शिव को परब्रह्म परमेश्वर मानते हैं।
शुद्धाद्वेत दर्शन के मुख्य आचार्य वल्लभाचार्य जी हैं। शुद्धाद्वेत दर्शन त्रिक दर्शन का वैष्णव स्वरूप है। ये श्रीकृष्ण को परब्रह्म परमेश्वर मानते हैं। शुद्धाद्वेत दर्शन का मुख्य आधार श्रीमद्भागवत पुराण, अन्य पुराण, श्रीमद्भगवद्गीता, उपनिषद और ब्रह्मसूत्र है।
त्रिक दर्शन और शुद्धाद्वेत दोनों दर्शन परमेश्वर शिव या कृष्ण के अलावा विभिन्न श्रेणियों वाली अनेक जीवात्मा मानते है परब्रह्म परमेश्वर (विष्णु या शिव), जीवात्मा तथा जगत को अनादि अनश्वर मानते हैं, परब्रह्म परमेश्वर, जीवात्मा और जगत को स्वतन्त्र और प्रथक-प्रथक मानते हैं। लेकिन ये दर्शन स्वयम् को शुद्ध अद्वैत दर्शन मानते हैं। लेकिन परब्रह्म के अलावा विभिभिन्न स्तरों वाली अनेक जीवात्मा और जगत को अनादि, अविनाशी मानने वाले दर्शन को अभेद वादी या अद्वैत वादी नही कहा जा सकता।
त्रिक दर्शन तो इब्राहीमी मजहबों के समान शिव की तानाशाही (स्वतन्त्र इच्छा) स्वीकार्य करता है।
५ त्रेतवाद का ही एक रूप द्वैतवाद है। इसके आचार्य मध्वाचार्य हैं। ये विशिष्टाद्वैतवादियों, शुद्धाद्वेत वादियों और त्रेत वादी प्रत्यभिज्ञा वादियों के समान भ्रमित न करते हुए स्वयं को सत्यनिष्ठा के साथ द्वैतवादी मानते हैं क्योंकि ये परब्रह्म परमेश्वर, जीव और जगत को अनादि, अनश्वर और प्रथक-प्रथक सत्ता मानते हैं। ये उपनिषदों और पुराणों के आधार पर अपना मत सिद्ध करते हैं।
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