श्री कुमार अवधेश सिंह जी की फेसबुक वाल से प्राप्त जानकारी के अनुसार ---
कबीर दास इस्लामिक सुन्नत, रोजा, नमाज़, कलमा, काबा, बांग और ईद पर क़ुरबानी का स्पष्ट खंडन करते थे। सिखों के प्रसिद्ध ग्रन्थ गुरु ग्रन्थ साहिब में कबीर साहिब के इस्लाम संबंधी चिंतन को यहाँ पर प्रस्तुत किया जा रहा है।
मुझे भी उनका यह मत उचित ही प्रतीत होता है।
१. सुन्नत का खंडन
काजी तै कवन कतेब बखानी ॥
पदत गुनत ऐसे सभ मारे किनहूं खबरि न जानी ॥१॥ रहाउ ॥
सकति सनेहु करि सुंनति करीऐ मै न बदउगा भाई ॥
जउ रे खुदाइ मोहि तुरकु करैगा आपन ही कटि जाई ॥२॥
सुंनति कीए तुरकु जे होइगा अउरत का किआ करीऐ ॥
अरध सरीरी नारि न छोडै ता ते हिंदू ही रहीऐ ॥३॥
छाडि कतेब रामु भजु बउरे जुलम करत है भारी ॥
कबीरै पकरी टेक राम की तुरक रहे पचिहारी ॥४॥८॥
सन्दर्भ- राग आसा कबीर पृष्ठ 477
अर्थात कबीर जी कहते हैं ओ काजी तो कौनसी किताब का बखान करता है। पढ़ते हुऐ, विचरते हुऐ सब को ऐसे मार दिया जिनको पता ही नहीं चला। जो धर्म के प्रेम में सख्ती के साथ मेरी सुन्नत करेगा सो मैं नहीं कराऊँगा। यदि खुदा सुन्नत करने ही से ही मुसलमान करेगा तो अपने आप लिंग नहीं कट जायेगा। यदि सुन्नत करने से ही मुस्लमान होगा तो औरत का क्या करोगे? अर्थात कुछ नहीं और अर्धांगि नारी को छोड़ते नहीं इसलिए हिन्दू ही रहना अच्छा है। ओ काजी! क़ुरान को छोड़! राम भज। तू बड़ा भारी अत्याचार कर रहा है, मैंने तो राम की टेक पकड़ ली हैं, मुस्लमान सभी हार कर पछता रहे है।
२. रोजा, नमाज़, कलमा, काबा का खंडन
रोजा धरै निवाज गुजारै कलमा भिसति न होई ॥
सतरि काबा घट ही भीतरि जे करि जानै कोई ॥२॥
सन्दर्भ- राग आसा कबीर पृष्ठ 480
अर्थात मुसलमान रोजा रखते हैं और नमाज़ गुजारते है। कलमा पढ़ते है। और कबीर जी कहते हैं इन किसी से बहिश्त न होगी। इस घट (शरीर) के अंदर ही सत्तर काबा के अगर कोई विचार कर देखे तो।
कबीर हज काबे हउ जाइ था आगै मिलिआ खुदाइ ॥
सांई मुझ सिउ लरि परिआ तुझै किन्हि फुरमाई गाइ ॥१९७॥
सन्दर्भ- राग आसा कबीर पृष्ठ 1375
अर्थात कबीर जी कहते हैं मैं हज करने काबे जा रहा था आगे खुदा मिल गया , वह खुदा मुझसे लड़ पड़ा और बोला ओ कबीर तुझे किसने बहका दिया।
३. हिंसा (क़ुरबानी) का खंडन
जउ सभ महि एकु खुदाइ कहत हउ तउ किउ मुरगी मारै ॥१॥
मुलां कहहु निआउ खुदाई ॥ तेरे मन का भरमु न जाई ॥१॥ रहाउ ॥
पकरि जीउ आनिआ देह बिनासी माटी कउ बिसमिलि कीआ ॥
जोति सरूप अनाहत लागी कहु हलालु किआ कीआ ॥२॥
किआ उजू पाकु कीआ मुहु धोइआ किआ मसीति सिरु लाइआ ॥
जउ दिल महि कपटु निवाज गुजारहु किआ हज काबै जाइआ ॥३॥
सन्दर्भ विलास प्रभाती कबीर पृष्ठ 1350
अर्थात कबीर जी कहते है ओ मुसलमानों। जब तुम सब में एक ही खुदा बताते हो तो तुम मुर्गी को क्यों मारते हो। ओ मुल्ला! खुदा का न्याय विचार कर कह। तेरे मन का भ्रम नहीं गया है। पकड़ करके जीव ले आया, उसकी देह को नाश कर दिया, कहो मिटटी को ही तो बिस्मिल किया। तेरा ऐसा करने से तेरा पाक उजू क्या, मुह धोना क्या, मस्जिद में सिजदा करने से क्या, अर्थात हिंसा करने से तेरे सभी काम बेकार हैं।
कबीर भांग माछुली सुरा पानि जो जो प्रानी खांहि ॥
तीरथ बरत नेम कीए ते सभै रसातलि जांहि ॥२३३॥
सन्दर्भ विलास प्रभाती कबीर पृष्ठ 1377
अर्थात कबीर जी कहते हैं जो प्राणी भांग, मछली और शराब पीते हैं, उनके तीर्थ व्रत नेम करने पर भी सभी रसातल को जायेंगे।
रोजा धरै मनावै अलहु सुआदति जीअ संघारै ॥
आपा देखि अवर नही देखै काहे कउ झख मारै ॥१॥
काजी साहिबु एकु तोही महि तेरा सोचि बिचारि न देखै ॥
खबरि न करहि दीन के बउरे ता ते जनमु अलेखै ॥१॥ रहाउ ॥
सन्दर्भ रास आगा कबीर पृष्ठ 483
अर्थात ओ काजी साहिब तू रोजा रखता हैं अल्लाह को याद करता है, स्वाद के कारण जीवों को मारता है। अपना देखता हैं दूसरों को नहीं देखता हैं। क्यों समय बर्बाद कर रहा हैं। तेरे ही अंदर तेरा एक खुदा हैं। सोच विचार के नहीं देखता हैं। ओ दिन के पागल खबर नहीं करता हैं इसलिए तेरा यह जन्म व्यर्थ है।
४. बांग का खंडन
कबीर मुलां मुनारे किआ चढहि सांई न बहरा होइ ॥
जा कारनि तूं बांग देहि दिल ही भीतरि जोइ ॥१८४॥
सन्दर्भ- राग आसा कबीर पृष्ठ 1374
अर्थात कबीर जी कहते हैं की ओ मुल्ला। खुदा बहरा नहीं जो ऊपर चढ़ कर बांग दे रहा है। जिस कारण तू बांग दे रहा हैं उसको दिल ही में तलाश कर।
इसके ठीक विपरीत कबीर साहिब श्री राम के गुणगान करते और गौसेवा के लिए प्रेरणा देते मिलते है। प्रमाण देखिये-
कबीर कूता राम का, मुतिया मेरा नाऊँ।गले राम की जेवडी ज़ित खैंचे तित जाऊँ।।”
कबीर निरभै राम जपि, जब लग दीवै बाती।तेल घटया बाती बुझी, सोवेगा दिन राति।।”
” जाति पांति पूछै नहिं कोई। हरि को भजै सो हरि का होई।।”
साधो देखो जग बौराना,सांची कहौं तो मारन धावै,झूठे जग पतियाना।
अब मोहि राम भरोसा तेरा,
जाके राम सरीखा साहिब भाई, सों क्यूँ अनत पुकारन जाई॥
जा सिरि तीनि लोक कौ भारा, सो क्यूँ न करै जन को प्रतिपारा॥
कहै कबीर सेवौ बनवारी, सींची पेड़ पीवै सब डारी॥114॥
कस्तूरी कुंडल बसे, मृग ढूँढत बन माहि !!
!! ज्यो घट घट राम है, दुनिया देखे नाही !!
श्री राम जी के गुणगान के अनेक प्रमाण कबीर रचनावली में मिलते है। बहुत कम लोग जानते है कि कबीर दास ने गौरक्षा के लिए अपना विवाह करवाने से मना कर दिया था। उनके वधुपक्ष वाले उनके विवाह में गोमांस परोसने की योजना बना रहे थे। कबीर दास गौप्रेमी थे। उन्होंने स्पष्ट कह दिया। अगर गौमाता कटी तो वह विवाह नहीं करेंगे। अंत में कबीर दास ने वह गौ एक ब्राह्मण को दे दी। तब जाकर उनका विवाह संपन्न हुआ।
इन सभी प्रमाणों से यह सिद्ध होता है कि दलित संत वेद, तीर्थ, जप, राम-कृष्ण,यज्ञपवीत, गौरक्षा आदि वैदिक परम्पराओं में अटूट विश्वास रखते थे एवं इस्लाम की मान्यताओं के कटु आलोचक थे।
कबीर की साधना ---
कबीर की योग साधना वज्रयानी बौद्ध मत के चौरासी सिद्धों और नौ नाथों की परम्परा का अनुसरण है।
इसीकारण कबीर की साधना पद्यति में में योग और भक्ति गड्ड-मड्ड लगती है। लेकिन यज्ञ और मीमांसा दर्शन पर ध्यान नही दिया गया है। जातिप्रथा का कट्टर विरोध के मूल में भी सिद्धों की परम्परा ही है। उनकी भाषा भी सिद्धों के अनुरूप ही है।
कबीर का दर्शन ---
कबीर के मत में *ब्रह्म एक ही है लेकिन माया के कारण हीं वह अनेक रूपों में दिखायी पड़ता है* ।
यह संसार कागद की पुड़िया,
बुंद परे गलि जाना है।
कबीर का *जीव माया रहित होकर ही ब्रह्म हो जाता है। जगत भी जीव और ब्रह्म से पृथक सत्ता नहीं है। एक ओर जहॉं जगत ब्रह्म की अभिव्यक्ति है वहीं दूसरी ओर वह पंचभौतिक रूपों में जीव के अस्तित्व का नियामक है। इस तरह एक बिन्दु पर ब्रह्म, जीव और जगत एक-दूसरे से अभिन्न हो जाते हैं।* इसी आधार पर कबीर का अद्वैत दर्शन प्रमाणित होता है।
रज गुण, तम गुण, सत गुण कहिबे, य सव तेरी माया।
चौथे पद को जो जन चिन्हे तिनहि परमु पद पाया।
कबीरदास जी के अनुसार *निर्गुण में ही गुण और गुण में ही निर्गुण समाया हुआ है। परस्पराबलम्बन के कारण ब्रह्म की सत्ता रूपात्मक जगत से पृथक नहीं रह पाती इसलिए वह निर्गुण होकर भी इस सृष्टि के कण-कण में समाया हुआ है।*
नाति सरूप वरण नहीं जाके धटि-धटि रहया समायो ।
कबीर का *ब्रह्म निर्गुण और अद्वैत होकर भी भक्ति का विषय बनता है इसलिए वह अद्वैत ब्रह्म और सगुण के बीच का ब्रह्म है।*
उनके अनुसार *यह जगत ब्रह्म की अभिव्यक्ति है। वह उस एक अकेले ब्रह्म का ही फैलाव है।*
कबीर कहते हैं
एके राम देख्या सबहि में, कहे कबीर मनमाना।
माटि एक भेख धरि नाना, तामें ब्रह्म समाना।
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