गुरुवार, 7 मई 2026

मूर्ति पूजा निषेध।

श्रुति अर्थात वेदों पर आधारित ब्राह्म धर्म और ब्राह्मण ग्रन्थों पर आधारित ब्राह्मण धर्म में प्रतिमा या मूर्ति पूजा, अभिषेक, षोडशोपचार पूजन को निषिद्ध और घृणित कर्म माना जाता है।
लिङ्ग और योनि की प्रतिमा/ मूर्ति बनाकर जलाभिषेक और षोडशोपचार पूजन करने वाले शिश्नेदेवाः को दूर करने की प्रार्थना की गई है।
*ऋग्वेद सप्तम मण्डल/ सूक्त 21 मन्त्र 05 में कहा है कि,*
मन्त्र ---
*न यातव इन्द्र जुजुवुर्ना न वन्दना शविष्ठ वेद्यभि।न श्रीरर्द्धयो विष्णुनस्य जन्तोर्मा शिश्नदेवाः अपि गुऋतम् नः।।*

 *ऋषि वसिष्ठ इंद्र से शिश्नेदैवाः अर्थात लिङ्ग और भग (शिवलिङ्ग) की पूजा करने वाले यातुधान अर्थात (असुर, दैत्य दानव, आदि शत्रुओं से सुरक्षा की प्रार्थना कर रहे हैं।*

मन्त्र का अर्थ ---

*"हे बलवान इंद्र!* 
(दुष्ट, कृतघ्न, अधार्मिक, विलासी) *शिश्नेदैवाः अर्थात लिङ्ग और भग (शिवलिङ्ग) की पूजा करने वाले यातुधानों * अर्थात (असुर, दैत्य दानव, आदि) शत्रुओं से हमारी रक्षा कीजिए।*
*लिङ्गपूजक असूर लोग हमें परेशान न कर सकें; उन पर हमारी दृष्टि पड़ने, उनकी छाया पड़ने, उनके स्पर्श दोष से, हमारी समृद्धि को आधी न हो पाए। हे सर्वव्यापी विष्णु देव! उनसे हमारी रक्षा कीजिए।*
शुक्ल यजुर्वेद अध्याय 32 मन्त्र 03 में भी स्पष्ट कहा है कि,
*न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यशः।*
*हिरण्यगर्भ इत्येष मा मा हिंसीदित्येषा यस्मान्न जातः इत्येषः॥*
उस परमात्मा की कोई प्रतिमा (मूर्ति, चित्र या तुलना) नहीं है। जिसका नाम या कीर्ति महान (बहुत बड़ी) है।
वही ब्रह्मांड का रचयिता हिरण्यगर्भ है। वह हमारी हिंसा न करे। (अर्थात हमारी रक्षा करें/ निर्भय करें) वह ईश्वर किसी से उत्पन्न नहीं हुआ है, वह अजन्मा है।

शुक्ल यजुर्वेद अध्याय 40 का प्रथम और द्वितीय मन्त्र ही कहता है कि,
*ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥1।।*

अर्थात 
इस जगत में जो कुछ भी है, वह सब ईश परमात्मा से व्याप्त है। अतः त्यागपूर्वक ही भोग करना चाहिए, किसी के धन लोभ-लालच न करें।

*कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्मं लिप्यते नरे।।2।।*
अर्थात 
कर्तव्य मान कर ही कर्म करते हुए ही सौ वर्ष जीने की इच्छा करे। क्योंकि इसके अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं है जिससे कर्मों का लेप न हो। अर्थात कर्म बन्धन न हो इसलिए कर्म करते हुए ही जीवन व्यतीत करें।
न अकर्मण्यता हो, न कर्मासक्ति हो और न फलाशा / फलासक्ति हो।

स्पष्ट है कि, केवल शास्त्रोक्त विधि से शास्त्रोक्त कर्म ही करें। अर्थात यज्ञ के लिए ही यज्ञ करे। सेवा मय जीवन व्यतीत करें। 
क्योंकि मैं परमात्मा का हूँ और शरीर जगत का हिस्सा है। अतः हर समय परमात्मा का ही स्मरण, ध्यान, चिन्तन रखते हुए शरीर को पञ्चमहायज्ञ रूपी जगत सेवा में निवेश करें।
ब्राह्मण ग्रन्थों मे़ और शुल्बसूत्रों, श्रोत सूत्रों और गृह्यसूत्रों में भी केवल मण्डप में मण्डल बनाकर, बेदी बनाकर अग्रिहोत्र का ही वर्णन है। धर्मसूत्रों में माता -पिता, आचार्य, अतिथि आदि की सेवा -पूजा का ही उल्लेख है।

अब इसमें किसी देवता विशेष की सेवा-पूजा, अनुष्ठान आदि का कोई आदेश/निर्देश है ही नहीं। बल्कि मूर्ति पूजा का तो स्पष्ट निषेध किया है।
अतः देव नहलाना, पञ्चोपचार)/ दशोपचार या षोडशोपचार पूजा करके धर्म विरुद्ध आचरण करके नर्क का मार्ग प्रशस्त न किया जाए।
उल्लेखनीय है कि, अन्य लेखों में यह प्रमाणित कर चुका हूँ कि, द्वापरयुग तक भारत में मठ, मन्दिर और मूर्ति पूजा का नामो-निशान तक नहीं था। सर्वप्रथम श्रमण मतावलम्बी ईराक, सऊदी अरब, सीरिया, टर्की, युनान और मिश्र से मूर्ति पूजा सीख कर आये। और भारत में पहले तान्त्रिकों द्वारा दबे-छुपे मूर्ति पूजा प्रारम्भ की और अनुयाई बढ़ने पर मठों में मन्दिर/ स्तूप आदि में मूर्तिपूजा प्रारम्भ की।
इसी प्रकार भागवत कथा, शिव पुराण सुनना भी कोई धर्म-कर्म नहीं है। वास्तविक धर्म तो अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य ही है। दृढ़तापूर्वक धर्मपालन में सहयोगी शोच, सन्तोष,तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान रूपी पाँच नियम है।
तथा ब्रह्म यज्ञ के अन्तर्गत संध्या, गायत्री मन्त्र जप, वेदाध्ययन, अष्टाङ्ग योग सहित ब्रह्म यज्ञ अग्निहोत्र कर देवयज्ञ,मानव सेवा रूपी नृयज्ञ, बलिवैश्वदेव सहित सर्व प्राणी और वनस्पतियों की सेवा और बुजुर्गों की सेवा रूष पितृ यज्ञ पाँच महायज्ञ है।