*यह वर्णन वाल्मीकि रामायण/ युद्ध काण्ड/ सर्ग 74 में है। श्लोक 67 और वाल्मीकि रामायण/ लङ्का काण्ड/ सर्ग 101 के आधार पर लिखा गया है।*
मेघनाद ने ब्रह्मास्त्र चला कर एक-एक कर पूरी सेना को घायल कर दिया।
केवल हनुमान जी जैसे कुछेक लोग ही सुरक्षित रह गये।
मेघनाद के ब्रह्मास्त्र की विशेषता थी कि, वह बम के समान न होकर मशीनगन के समान था जो एक साथ सबको घायल नहीं कर पाता था। बल्कि मध्याह्न से रात के प्रथम प्रहर तक सक्रिय रहा।
दुसरा यह कि, वह सामने पड़ने पर ही वार करता था। एक-एक को अलग-अलग घायल करता था।
इस ब्रह्मास्त्र से श्री रामचन्द्र जी, लक्ष्मण जी पहले ही घायल हो गए थे।
जाम्बवन्त जी भी घायल पड़े थे, तब उन्हें विभिषण जी मिलने गये, तब उन्होंने हनुमानजी को बुलाया और उन्हें हिमालय पर्वत पर महाशय पर्वत का पता बतलाया। वहाँ अत्यन्त चमकदार चार बुटियों विशल्यकरणी, सञ्जीव करणी, सावर्ण्य करणी और सन्धानी बुटी का परिचय दिया।
हनुमान जी ने जो छलांग लगाई वह वाल्मीकि रामायण, किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 67 में वर्णित समुद्र तट पर विन्द्याचल के दक्षिण पश्चिम शिखर से लक्ष्यद्वीप (रावण की लङ्का) के लिए लगाईं गई छलाङ्ग जैसी ही थी। जैसे राकेट उड़ता है, तब भूमि पर जैसा दबाव बनाकर उड़ता है, ठीक वैसा ही प्रभाव हनुमानजी की छलाङ्ग लगाने पर हुआ। जिस पर्वत शिखर से उछले वह धँस गया। हनुमान जी के वेग से आसपास खड़े वानर भी उड़ गए।
जब हनुमान जी हिमालय पर पहूँचे तो उन्होंने ब्रह्माजी (सम्भवतः प्रजापति), इन्द्र, वरुणादि आदित्यों, वसुओं, रुद्र शंकर जी और कुबेर को देखा। कैलाश पर्वत देखा।
फिर महाशय पर्वत पर चमकती हुई चारों बुटियाँ दिखी। लेकिन जैसे ही नीचे उतरे वे अदृष्य हो गई। सम्भवतः कोण बदलने से उनका चमकीला पन नही दिखता होगा; इसलिए हनुमान जी उस पर्वत शिखर को ही उखाड़ कर दोनों हथेलियों पर रखकर शीघ्र ही लौट आये। न तो कोई कालनेमी मिला, न कालनेमी ने सभी बुटियों को दीपक जैसा चमकदार बनाया, बल्कि नीचे उतरने पर कोण बदल जाने पर तो उनकी चमक ही गायब हो जाने के कारण हनुमान जी को पहचानने में भ्रम हुआ तो वे पर्वत शिखर ही उखाड़ लाये।
यह वर्णन वाल्मीकि रामायण/ युद्ध काण्ड/ सर्ग 74 में है। श्लोक 67 में पर्वत शिखर उखाड़ लाना बतलाया है साथ ही श्लोक 77 में वही पर्वत शिखर महाशय पर्वत पर वापस रख आने का वर्णन है।
शल्य विकर्णी बुटी को सुंघाने से शरीर में अन्दर तक धँसे हुए अस्त्र (शायद नुकीले छर्रे जैसे कुछ होंगे) अपने आप बाहर निकल गये, सञ्जीवक बुटी से घाव तुरन्त ठीक हो गये। सावर्ण्य करणी बुटी से त्वचा ठीक पूर्वत हो गई।
वाल्मीकि रामायण/ लङ्का काण्ड/ सर्ग 101 में रावण विभिषण जी पर बर्छी (शक्ति) चलाता है, लक्ष्मण जी विभिषण जी को हटा कर स्वयम् वह बर्छी सीने पर झेल लेते हैं। और घायल हो मुर्छित हो जाते हैं, तब श्लोक 30 में सुषेण हनुमान जी को जाम्बवन्त जी द्वारा पहले बतलाये गए महाशय पर्वत पर जाकर विशल्यकरणी, सञ्जीव करणी, सावर्ण्य करणी और सन्धानी बुटी वापस लाने का कहते हैं। तब भी हनुमान जी पूर्ववत उछल कर गये और श्लोक 38 के अनुसार हनुमान जी ने पर्वत शिखर को हिलाकर उखाड़कर पूर्ववत ही दोनों हथेलियों पर रखकर वापस ले आये। श्री रामचन्द्र जी ने लक्ष्मण के शरीर से बरछी पहले ही निकाल दी थी, सुषेण जी ने बुटियाँ सुंघाकर तुरन्त घाव अच्छे कर दिए।
इस यात्रा में भी न कालनेमी मिला न भरत जी का तीर लगा, न हनुमानजी लङ्गड़े हुए।
इस प्रकरण में एक कुछ बातें और भी स्पष्ट होती है।
1 जो पर्वत शिखर उखाड़ कर लाये थे वह दोनों हथेलियों पर रखा जा सकता था अर्थात अधिकतम एक वर्ग मीटर आधार वाला था।
2 हनुमान जी का उछलने (न कि, उड़ने) का वर्णन ठीक वैसा है जैसे राकेट लांच होता है। किष्किन्धा काण्ड सर्ग 67 में विन्द्याचल के दक्षिण पश्चिम शिखर से रावण की लङ्का तक की छलाङ्ग लगाने का वर्णन भी ठीक इसी प्रकार का है ।
3 पहली बार हनुमान जी महोदय पर्वत शिखर वापस रख आएं थे, ऐसे ही सम्भवतः दुसरी बार भी वापस रख आये होंगे। क्योंकि हिमालय की इतनी उपयोगी जड़ी बूटी को दक्षिण की इतनी गर्मी और समुद्री हवाओं में निश्चित ही खराब हो जाती।
4 हनुमानजी को कालनेमी द्वारा भ्रमित करने और सभी बुकियों को चमकीला बनाने की कहानी मन गड़न्त है। ऐसे ही लौटते समय भरत जी के बाण से घायल होकर लङ्गड़े होने की कहानी भी मन गड़न्त ही है।
5 प्रजापति, इन्द्र, द्वादश आदित्य, अष्ट वसु, शंकर जी सहित एकादश रुद्र इन तैंतीस देवताओं की सभा (स्वर्ग) हिमालय पर कैलाश पर्वत के आस-पास ही है।
6 सुमेरु के चारो ओर पूर्व में इन्द्र की अमरावती पुरी, पश्चिम में वरुण की वारुणी पुरी, उत्तर में कुबेर की अलका पुरी और दक्षिण में यम की संयमनी पुरी हिमालय पर कैलाश शिखर के आस-पास ही कहीं है।
7 बाल काण्ड, सर्ग 48 में गोतम ऋषि की पत्नी अहिल्या का जार इन्द्र इसी हिमालय की अलका पुरी से आया था।
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