गुरुवार, 2 अक्टूबर 2025

कृष्णमूर्ति पद्धति फलित ज्योतिष

कौन कोन से भाव से क्या देखा जाता है, किस राशि का स्वभाव क्या है, नक्षत्रों के स्वभाव, तथा ग्रहों के स्वभाव परम्परागत पद्यति से ही सीखना है। इसके लिए कृष्णमूर्ति सेकण्ड रीडर - जिसका हिन्दी अनुवाद भी हुआ है, तथा जगन शक्ति की पराशरी ज्योतिष : 
फल कथन के मूल सिद्धान्त 
सरल शब्दों में व्याख्या भी कृष्णमूर्ति रीडर सेकण्ड का अनुवाद ही है।

कृष्णमूर्ति रीडर थ्री, फोर और फाइव के आधार पर शेष जानकारी निम्नानुसार है।
कृष्णमूर्ति पद्धति की विशेषता इतनी ही है कि,
1 विंशोत्तरी महादशा पद्धति में नक्षत्रों के जो स्वामी बतलाये हैं उन्हें ही वे नक्षत्र का स्वामी मानते थे।
2 विंशोत्तरी महादशा में 120 वर्ष के जिस अनुपात में ग्रहों के महादशा वर्ष बतलाये हैं; उसी अनुपात में प्रत्येक नक्षत्र केउप नक्षत्र माने हैं। पहला उप नक्षत्र नक्षत्र स्वामी होता है, अगले उपनक्षत्र स्वामी अगली दशा के अनुसार हैं। जैसे महादशा में अन्तर्दशा होती है।
यों भी कह सकते हैं कि, महादशा में अन्तर्दशा वर्ष-मासादि के अनुपात में उपनक्षत्र का भोग अंशादि होते हैं।
एसे ही उप-उप नक्षत्र भी बनाये हैं। 
इनके चार्ट तैयार करके रख दिए थे।

3 कालिदास के उत्तर कालामृत में जो महत्व और उपयोग राशि के नवांश का है; वही महत्व कृष्ण मुर्ति पद्यति में उप नक्षत्र का है। अर्थात 
ये उपनक्षत्र राशि के नवांश के समान महत्व रखते हैं।

4 भाव (हाउस) का सबसे प्रबल सूचक भावस्थ ग्रह जिस ग्रह के नक्षत्र में स्थित है । दुसरे क्रम पर भावस्थ ग्रह, तीसरे क्रम पर भावेश जिस ग्रह के नक्षत्र में स्थित है । और चौथे वरियता क्रम पर भावेश होता है। पञचम क्रम पर भावस्थ और भावेश से युति, प्रतियोग या पूर्ण दृष्टि से देखा जा रहा ग्रह होता है।

5 किसी भाव का फल मिलेगा या नहीं इसके लिए उस भाव का उप नक्षत्रेश और उप नक्षत्रेश जिस ग्रह के नक्षत्र में स्थित हो ये दोनों ग्रह या उत्तर कालामृत के अनुसार उस भाव का नवांशेश का सम्बन्ध सम्बन्धित फल से सम्बन्धित भावों से हो तो फल मिलेगा, नहीं हो तो नहीं मिलेगा।

6 जिस ग्रह की महादशा, अन्तर्दशा, प्रत्यन्तर दशा चल रही हो उस दशा में उक्त सूचकों के अनुरूप फल मिलेगा।
ऐसे ही जिन-जिन भावों के फल कब मिलेंगे यह जानने के लिए भावों के उक्त सूचकों की महादशा, अन्तर्दशा, प्रत्यन्तर दशा आयेगी, और ये महादशा, अन्तर्दशा, प्रत्यन्तर दशा स्वामी ग्रहों का भ्रमण भी सम्बन्धित भावों में और सम्बन्धित भावों के सूचकों के नक्षत्र में आयेगा, तब वह फल मिलता है।

7 केवल विशोत्तरी महादशा ही मान्य है।

8 प्रश्न कुण्डली में -
वार का स्वामी, उस समय का चन्द्रमा के राशि और नक्षत्र का स्वामी तथा उस समय के लग्न के राशि और नक्षत्र का स्वामी।
जिन ग्रहों के नक्षत्र में स्थित हो तथा उक्त पांचों ग्रहों में से उन ग्रहों को हटा दो जो वक्री या अस्त ग्रहों के नक्षत्र में स्थित है।
उन ग्रहों का भी महत्व कम है जो स्वयम् वक्री या अस्त हो।
शेष बचे ग्रहों को राशि-नक्षत्र के अनुसार जमा लो, 
प्रश्न से सम्बन्धित भाव के सूचक ग्रहों के वार, और प्रश्न से सम्बन्धित भाव के सूचक ग्रहों के राशि नक्षत्र में चन्द्रमा के भ्रमण के दिन और प्रश्न से सम्बन्धित भाव के सूचक ग्रहों के लग्न के समय फल मिलेगा ।

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