शनिवार, 18 अक्टूबर 2025

विष्णु से लेकर प्रजापति तक किसी भी देव- देवता का कोई आवास स्थान नहीं है।

विष्णु मतलब सर्वव्यापी। सर्वव्यापी है तो एकदेशीय; हो एक ही स्थान पर रहे यह तो सम्भव ही नहीं है। यहाँ सिर है वहाँ पेर है,ऐसा भी नहीं है। वे तो हर समय सभी जगह एक समान रूप से रहते हैं। इसलिए विष्णु लोक नामक कोई स्थान नहीं है। 
भु भव मतलब होना। प्रभव मतलब हुआ। प्रभविष्णु और सवितृ मतलब जिससे सृष्टि हुई। जिससे सृजन हुआ। 
सवितृ मतलब जो प्रसवित हुआ। जिससे सृष्टि उत्पन्न हुई। जिसने सृष्टि उत्पन्न की।
सावित्री मन्त्र का देवता इन्हें ही माना गया है।
वैसे इसमें विवाद भी है कि, भर्गो देवस्य धीमहि है, अर्थात ध्यान तो भर्ग देव का किया जा रहा है तो तत् सवितुः वरेण्यम के आधार पर मन्त्र का देवता सवितृ को क्यों मानें।
इसका सीधा-सा उत्तर है कि, यह नियम है कि, जिस सूक्त या जिस मन्त्र में पहले जो नाम आता है, उसे ही सूक्त या मन्त्र का देवता माना जाता है।
अज्ञान नाशक ज्ञान स्वरूप भर्ग किसी देवता नाम नहीं बल्कि सवितृ का विशेषण है। भर्ग शब्द गुण सूचक है संज्ञा नहीं है। छन्दस अर्थात वैदिक संस्कृत में आकारान्त पूर्लिङ्ग शब्द नहीं होता है। जैसे राजन का हिन्दी में राजा, मातृ-पितृ का हिन्दी में माता-पिता हो जाता है, वैसे ही सवितृ का सविता हो जाता है। लेकिन जैसे पञ्चतन्त्र में लौकिक संस्कृत में 
"उदये सविता रक्तो रक्तश्चस्तमये तथा।
सम्पतौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता॥" 
में जहाँ सविता आया है, वहाँ उसे स्त्रीलिङ्ग माना जाता है। इसी कारण नारियों के नाम सविता देखे जाते हैं।
इस लिए प्रभविष्णु प्रकाश स्वरूप देव सवितृ हैं सृष्टि के सृजेता हैं।
जब सृष्टि ही नहीं थी, जिसको स्वयम् सृष्टि की प्रसुति हुई। जिसने स्वयम् सृष्टि को प्रसुत किया उसका कोई स्थान/ लोक कहाँ से आयेगा।
मतलब स्पष्ट है कि, प्रभविष्णु विष्णु के समान सर्वव्यापी तो नहीं लेकिन किसी एक स्थान पर ही रहने वाले एकदेशीय भी नहीं है।
विष्णु की तुलना आकाश से और प्रभविष्णु की तुलना सूर्य से होती है।
सृष्टि प्रसुत हो गई तो उस सृष्टि के रूप में नारायण श्रीहरि ही प्रसुत हुए।  वह सम्पूर्ण सृष्टि नारायण ही है। श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 32 में जिस काल के रूप में अर्जुन ने दर्शन किए थे वह स्वरूप नारायण का ही था।
अब बतलाओ क्या वह काल स्वरूप नारायण किस स्थान पर रहता होगा? लेकिन चूंकि वह स्वरूप है, इसलिए सर्वव्यापी भी नहीं है, रूपवान की सीमा होती ही है, तभी तो वह दृष्य है। वह तरङ्गाकार है।
अतः वह सृष्टि या नारायण ध्रुव तारे के आस-पास लघु सप्तर्षि मण्डल में, या क्षीर सागर में तो नहीं रह सकता। यह तो निश्चित है।😃
उस सृष्टि के केन्द्र या नारायण की नाभि से हिरण्यगर्भ (पञ्चमुख) ब्रह्मा हुएजिन्होंने त्वष्टा के रूप में ब्रह्माण्ड को गढ़ा; सुतार के समान ब्रह्माण्ड के गोलों को घड़ा। अतः हिरण्यगर्भ को भी रहने के लिए कोई स्थान विशेष नहीं था। मतलब हिरण्यगर्भ ब्रह्मा तक किसी भी देव का कोई निवास स्थान नहीं है।हिरण्यगर्भ ब्रह्मा स्वयम् अण्डाकार स्वरूप है। उपर एक सिरा उभरा हुआ होने से पञ्च मुखी कहलाते हैं।
हिरण्यगर्भ ब्रह्मा से प्रजापति ब्रह्मा हुए। ये स्वयम् ब्रह्माण्ड ही हैं। ये भी अण्डाकार ही थे, लेकिन ब्रह्माण्ड का रूप बदलता रहता है,निश्चित रूप नहीं है, इसलिए इन्हें पञ्च मुखी से चतुर्मुखी होना मान लिया गया। ये प्रजापति विश्वरूप हैं।
हिरण्यगर्भ से महारुद्र, सनक, सनन्दन, सनत्कुमार, सनातन और नारद भी हुए।
(पौराणिक कथा है कि, रुद्र ने ब्रह्मा का पाँचवा सिर काट दिया था।)
फिर भी जो स्वयम् ब्रह्माण्ड स्वरूप हो, वह कहाँ रहेगा? मतलब सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही प्रजापति है।

फिर इनका लोक क्यों कहलाता है? इस प्रश्न के उत्तर के लिए लोक का अर्थ समझना होगा।
जहाँ आलोक (प्रकाश) हो, वह लोक कहलाता है। जैसे हमारे सूर्य मार्तण्ड से प्रकाशित समस्त स्थान मृत्यु लोकौ कहलाता है।
इसलिए जहाँ नारायण श्रीहरि का आलोक फैला है, वह पूरी सृष्टि नारायण का लोक, जहाँ हिरण्यगर्भ ब्रह्मा का आलोक फैला है, मतलब समस्त ब्रह्माण्ड वह ब्रह्म लोक, जहाँ प्रजापति का आलोक फैला है वह सत्य लोक कहलाता है।

रहने के लिए ब्रह्माण्ड में बहुत से गोले सृजित हो चुके थे। मतलब प्रजापति ब्रह्मा के द्वारा उत्पन्न प्रजा के निवास के लिए पर्याप्त आवास स्थल हो गये थे। आवास प्रबन्ध हो चुका था इसलिए पहली बार निवासियों के रूप में प्रजापति ने प्रजा का सृजन किया।

भूमि के प्रजापति दक्ष-प्रसुति, रुचि-आकुति, कर्दम-देवहुति, और स्वायम्भुव मनु-शतरूपा हुए। इन्होंने मैथुनिक प्रजा की सृष्टि की। समस्त जीव-जन्तु, वनस्पति, जड़-चेतन योनियाँ इनकी ही सन्तान है।
अन्तरिक्ष के प्रजापति एकादश रुद्र- रौद्रियाँ है, और सप्त पितरः-स्वधा हैं।
स्वर्ग के प्रजापति इन्द्र-शचि, अग्नि -स्वाहा, धर्म और उनकी तेरह पत्नियाँ है।

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