शनिवार, 18 अक्टूबर 2025

शरीरान्तर्वर्ती प्रज्ञानात्मा और प्रत्यागात्मा दो पक्षी का अर्थ।


शरीरान्तर्वर्ती प्रज्ञानात्मा और प्रत्यागात्मा दो पक्षी का अर्थ।

कठोपनिषद अध्याय 01/वल्ली 03/ मन्त्र 01 , 

ऋतम् पिबन्तौ सुकृतस्य लोके, गुहाम् प्रविष्टौ परमें परार्धे ;
छाँयातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति, पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः।

तीनबार नचिकेता अग्नि चयनकर्ता पञ्चाग्निसेवी  आत्मज्ञ, ब्रह्मवेत्ता ,परमगति को प्राप्त धीर पुरुष यह कहते हैं कि,
सुकर्मों (पुण्यों) के फलस्वरूप प्राप्त लोक में,(देश, कुटुम्ब,परिवार और योनि, तथा देह /प्रकारान्तर से मानव देह में  अंगुष्ठ प्रमाण पुरुष या बुद्धि आकाश में चित्त मे प्रविष्ट होकर ऋत का पान करने वाले अर्थात परम सत्य परमेश्वरीय विधि के पालन करने वाले छाँया और धूप के समान प्रत्यागात्मा (पुरुष-प्रकृति) (अन्तरात्मा) ब्रह्म (सवितृ  -सावित्री) और  प्रज्ञात्मा  (प्रज्ञानात्मा)  परब्रह्म (परमपुरुष/ दिव्य पुरुष - पराप्रकृति) (विष्णु - माया) हैं।

सुकर्मों (पुण्यों) के फलस्वरूप प्राप्त लोक में, अर्थात, कुटुम्ब,परिवार और योनि मे, तथा देह /प्रकारान्तर से मानव देह में 
अंगुष्ठ प्रमाण पुरुष अर्थात बुद्धि आकाश में चित्त 
ऋत का पान करने वाले अर्थात परम सत्य परमेश्वरीय विधि के पालन करने वाले 
छाँया और धूप के समान अर्थात प्रत्यागात्मा (पुरुष-प्रकृति) (अन्तरात्मा) ब्रह्म (सवितृ  -सावित्री) और  प्रज्ञात्मा  (प्रज्ञानात्मा)  परब्रह्म (परमपुरुष/ दिव्य पुरुष - पराप्रकृति) (विष्णु - माया)। जिसेे वेदान्तती बिम्ब और प्रति
ऋग्वेद मण्डल 01/सुक्त 164/ मन्त्र 20, 
अथर्ववेद काण्ड 09/ सुक्त14/मन्त्र 20, 
मुण्डकोपनिषद मुण्डक 03/खण्ड01/ मन्त्र 01
श्वेताश्वतरोपनिषद अध्याय 04/ मन्त्र 06

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया, समानम् वृक्षम् परिषस्वजाते ;
तयोरन्यः पिप्पलम्  स्वादन्त्यनश्नन्नन्यो, अभिचाकशीति।

प्रत्यागात्मा (पुरुष-प्रकृति) (अन्तरात्मा) ब्रह्म (सवितृ  -सावित्री) और  प्रज्ञात्मा  (प्रज्ञानात्मा)  परब्रह्म (परमपुरुष/ दिव्य पुरुष - पराप्रकृति) (विष्णु - माया) ये दो पक्षी एकसाथ/ युक्त होकर मित्रता पुर्वक एक ही (पिप्पल) वृक्ष का आश्रय लेकर  अर्थात प्रत्यैक देह में यानि एक ही शरीर में रहते हैं।
उनमें से प्रत्यागात्मा (पुरुष-प्रकृति) (अन्तरात्मा) ब्रह्म (सवितृ  -सावित्री)  जो  पिप्पल वृक्ष के फल यानि कर्मफल भोगकर्ता पुरुष गुणों के सङ्ग के कारण गुण सङ्गानुसार विभिन्न योनियों में प्रवेश करता है। और दुसरा पक्षी प्रज्ञात्मा  (प्रज्ञानात्मा)  परब्रह्म (परमपुरुष/ दिव्य पुरुष - पराप्रकृति) (विष्णु - माया)  केवल दृष्टाभाव से केवल देखता रहता है।

मुण्डकोपनिषद मुण्डक 03/खण्ड01/मन्त्र 02
श्वेताश्वतरोपनिषद अध्याय 04/ मन्त्र 07

समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोनीशया, शोचति मुह्यमान;
जुष्टम् यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य , महिमानमिति वीतशोकः।

(संगति --- प्रत्यागात्मा (पुरुष-प्रकृति) (अन्तरात्मा) ब्रह्म (सवितृ  -सावित्री) और  प्रज्ञात्मा  (प्रज्ञानात्मा)  परब्रह्म (परमपुरुष/ दिव्य पुरुष - पराप्रकृति) (विष्णु - माया) ये दो पक्षी एकसाथ/ युक्त होकर मित्रता पुर्वक एक ही (पिप्पल) वृक्ष का आश्रय लेकर  अर्थात प्रत्यैक देह में / एक ही शरीर में रहते हैं।
उनमें से प्रत्यागात्मा (पुरुष-प्रकृति) (अन्तरात्मा) ब्रह्म (सवितृ  -सावित्री)  जो  पिप्पल वृक्ष के फल यानि कर्मफल भोगकर्ता पुरुष गुणों के सङ्ग के कारण गुण सङ्गानुसार विभिन्न योनियों में प्रवेश करता है।)

अर्थ --- इस समान वृक्ष पर (शरीर में) प्रत्यागात्मा (अन्तरात्मा) भोगों में निमग्न होकर अनीश होकर (आत्मसंयम स्वनियन्त्रण नही होने के कारण अनीश अर्थात ऐश्वर्य रहित होकर) मोहित होकर (गलत को ही सही मानकर / अनात्मा में आत्मभाव होने से) शोचनीय अवस्था में रहता है। वही प्रत्यागात्मा (अन्तरात्मा)  जब प्रज्ञात्मा  (प्रज्ञानात्मा)  परब्रह्म (परमपुरुष/ दिव्य पुरुष - पराप्रकृति) (विष्णु - माया) की महिमा को देखता है तब संसर्ग के प्रभाव से वीतशोक  (शोकरहित) होक जाता है। आनन्द का अनुभव करता है तब प्रत्यागात्मा (अन्तरात्मा)  जब प्रज्ञात्मा  (प्रज्ञानात्मा)  परब्रह्म से जुड़ जाता है। युक्त हो जाता है। अब वह अनुभव करता है कि मूलतः पहले से ही युक्त था ही।

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