परमात्मा
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विश्वात्मा
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प्रज्ञात्मा
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परम पुरुष परा प्रकृति
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प्रत्यगात्मा
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पुरुष प्रकृति
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जीवात्मा
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अपर पुरुष(जीव) (आयु)अपराप्रकृति
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भूतात्मा
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प्राण (देही) (अवस्था)धारयित्व
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सूत्रात्मा
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ओज(रेतधा) (स्वधा)आभा
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अणुरात्मा
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तेज विद्युत
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विज्ञानात्मा
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चित्त (चेत)वृत्तियाँ
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ज्ञानात्मा
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बुद्धि (मेधा)बोध
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लिङ्गात्मा
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अहंकार अस्मिता
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मनसात्मा
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मन संकल्प
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स्व
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स्वभाव
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स्वाहा वषट स्वधा
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अधिदेव अध्यात्म अधिभूत
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प्राणउपप्राण ज्ञानेन्द्रियाँकर्मेन्द्रियाँ भूत तन्मात्रा
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कारण शरीर सूक्ष्म शरीर स्थूल शरीर
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चक्र उपचक्र संस्थान तन्त्र सिद्धि उपसिद्धि
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सुषुम्ना पिङ्गला इड़ा
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कौशिका
परमात्मा के इस ॐ संकल्पके साथ ही (विश्वात्मा ॐ के अंशमात्र में) प्रज्ञात्मा हुआ। प्रज्ञात्मा परब्रह्म स्वरूप को समझने के लिए परम पुरुष और पराप्रकृति के रूप मे जानते/ समझते हैं।
प्रज्ञात्मा परब्रह्म ने स्वयम् को प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) स्वरूप में प्रकट किया। प्रत्यगात्मा ब्रह्म को पुरुष और प्रकृति के स्वरूप में जानते हैं।
प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) ब्रह्म ने स्वयम् को जीवात्मा स्वरूप में प्रकट किया। जीवात्मा अपरब्रह्म को अपर पुरुष जीव और आयु त्रिगुणात्मक अपरा प्रकृति के रूप में जाना जाता है।
जीवात्मा अपरब्रह्म ने स्वयम् को भूतात्मा स्वरूप में प्रकट किया। इन्हे समझने के लिए प्राण और धारयित्व अथवा चेतना और धृति अथवा देही और अवस्था के रूप में जाना जाता है। प्राण भी अधिकरण है। अर्थात मुख्य करण है।
भूतात्मा हिरण्यगर्भ ब्रह्मा नें स्वयम् को सुत्रात्मा स्वरूप में प्रकट किया।
सुत्रात्मा प्रजापति को समझने की दृष्टि से ओज और आभा (Ora) या रेतधा और स्वधा कहा जाता है।
प्रजापति नें स्वयम् को अणुरात्मा स्वरूप में प्रकट किया। अणुरात्मा वाचस्पति को समझने के लिए इन्हे तेज और विद्युत के रूप में समझते हैं।
अणुरात्मा से विज्ञानात्मा हुआ इसे चित्त और चेत या चित्त और वृत्तियों के रूमें समझा जा सकता है।
विज्ञानात्मा से ज्ञानात्मा हुआ। इसे बुद्धि और बोध या बुद्धि और मेधा के रूप में समझा जाता है।
ज्ञानात्मा से लिङ्गात्मा हुआ ।लिङ्गात्मा पशुपति को अहंकार और अस्मिता के रूप में समझा जा सकता है।
लिङ्गात्मा से मनसात्मा हुआ।मनसात्मा गणपति को मन और संकल्प के रूप में समझ सकते है।
मनसात्मा से "स्व" हुआ।
स्व की शक्ति "स्वभाव" है।
स्वभाव तीन स्वरूप में विभक्त हुआ ---
(1) वैकारिक स्वभाव अर्थात स्वाहा (स्व का हनन या समर्पण)।
(2) तेजस स्वभाव या वषटकार (मस्तिष्क सम्बन्धी/ वैचारिक)
3) भूतादिक स्वभाव अर्थात स्वधा (स्व को धारण करना है अर्थात स्वार्थ)।
1 सात्विक स्वभाव / स्वाहा भारती से अधिदेव हुआ।
1 अधिदेव को हम पञ्च मुख्य प्राण और पञ्च उपप्राण [(1) उदान -देवदत्त, (2) व्यान - धनञ्जय, (3) प्राण - कृकल, (4) समान - नाग, (5) अपान -कुर्म)] के रूप में जानते हैं।
2 राजसी स्वभाव/ वषट सरस्वती से अध्यात्म हुआ।
2अध्यात्म को हम पञ्चज्ञानेन्द्रिय तथा पञ्च कर्मेन्द्रिय [(१)श्रोत - वाक (कण्ठ) , (२) त्वक - हस्त , (३) चक्षु - पाद , (४) रसना - उपस्थ (शिश्न या भग) और (५) घ्राण - पायु (गुदा)] के रूप में जानते हैं।
3 तामसी स्वभाव/ स्वधा/ ईळा से अधिभूत हुआ।
(3) अधिभूत को हम पञ्च महाभूत और पञ्च तन्मात्रा [(1)आकाश -शब्द, (2) वायु - स्पर्ष, (3) अग्नि - रूप, (4) जल - रस और (5) भूमि - गन्ध ] के रूप में जानते हैं।
अधिदेव (अष्टादित्य) से कारण-शरीर हुआ।
कारण शरीर को हम हटयोग और तन्त्रमत के चार् मुख्य चक्र और चार उप चक्र [(1) ब्रह्मरन्ध्र चक्र - आज्ञा चक्र, (2) अनाहत- विशुद्ध चक्र, (3) मणिपुरचक्र - स्वाधिस्ठानचक्र और (4) मूलाधार चक्र - कुण्डलिनी)] के रूप में जानते हैं।
अध्यात्म (द्वितीयअष्टवसु) से सुक्ष्म शरीर हुआ।
सुक्ष्म शरीर को हम संस्थान और तन्त्र के रूप में जानते हैं।[(1)मस्तिष्क - तन्त्रिका तन्त्र, (2) हृदय - श्वसन तन्त्र, (3) यकृत - पाचन तन्त्र और (4) लिङ्ग - जनन तन्त्र) के रूप में जानते है।]
अधिभूत (अष्टमूर्ति एकादश रुद्र) से लिङ्ग शरीर हुआ।
लिङ्गशरीर को हम अष्ट सिद्धि (चार मुख्य सिद्धि एवम चार उप सिद्धि) [(1) ईशित्व- वशित्व, (2) अणिमा-लघिमा, (3) महिमा- गरिमा और (4) प्रकाम्य - प्राप्ति) के रूप में जानते हैं।
कारण-शरीर (साध्यगण) से सुशुम्ना (नाड़ी) हुई।
सुक्ष्मशरीर से पिङ्गला (नाड़ी) हुई।
लिङ्ग शरीर (यह्व) से ईड़ा (नाड़ी) हुई।
(1)सुशुम्ना (2) पिङ्गला और (3) ईड़ा का संयुक्त संघात ही ---
पिण्ड (पदार्थ) है जिसे भौतिकि में एलिमेण्ट का एटम कहते हैं। जीव विज्ञान में कोषिका ( सेल Cell) कहते हैं। तथा मेडिकल साइन्स की दृष्टि से तन (शरीर) है।
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