वेदों में वसन्त सम्पात, शरद सम्पात, उत्तर परम क्रान्ति, दक्षिण परम क्रान्ति, वसन्त से शरद सम्पात के बीच उत्तर गोल की तीन ऋतु वसन्त, ग्रीष्म एवम् वर्षा तथा मधु-माधव, शुक्र-शचि एवम् नभः-नभस्य मास के साथ ही शरद सम्पात से वसन्त सम्पात के बीच दक्षिण गोल की शरद, हेमन्त एवम् शिशिर ऋतु तथा ईष-उर्ज, सहस-सहस्य एवम् तपः- तपस्य मास का स्पष्ट वर्णन है।
उक्त द्वादश मासों के प्रत्येक माह को तीस-तीस अंशों का मानकर इन तीस-तीस अंशों को प्रथक-प्रथक द्वादश प्रधय कहा गया है। लेकिन द्वादश प्रधि के नाम नहीं पाये जाते हैं। यह ज्योतिष के गणित स्कन्ध का विषय है।
साथ ही क्रान्तिवृत के उत्तर-दक्षिण में आठ-नौं अंश चौड़ी नक्षत्र पट्टी में एक, दो या अनेक ताराओं द्वारा निर्मित स्थाई सत्ताइस-अट्ठाइस आकृतियों को नक्षत्र संज्ञा दी गई है। और इन प्रत्येक नक्षत्र का नाम और देवता निर्धारित किए गए हैं। लेकिन इन नक्षत्रों का विस्तार असमान है। क्रान्तिवृत में सभी नक्षत्रों के भोगांश (देशांश) अर्थात कोणीय दूरी अलग-अलग है तथा विषुव वृत में सभी नक्षत्रों के उत्तर दक्षिण शर (अक्षांश) भी अलग-अलग हैं। इसलिए नक्षत्रिय गणना पद्यति विकसित नहीं की जा सकती है।
फिर भी ग्रहों और चन्द्रमा का सञ्चरण नक्षत्रों में ही माना गया है न कि, प्रधि में। साथ ही अथर्ववेद, तैत्तिरीय संहिता, तैत्तिरीय ब्राह्मण, तैत्तिरीय आरण्यक और अन्य ब्राह्मण ग्रन्थों, सूत्र ग्रन्थों में चित्रा तारे को क्रान्तिवृत और नक्षत्र पट्टी के बिल्कुल मध्य में अर्थात 180° पर बतलाया गया है। तदनुसार चित्रा तारे से 180° पर क्रान्तिवृत और नक्षत्र पट्टी का प्रारम्भ बिन्दु माना गया है। और इसी आधार पर अश्विनी नक्षत्र को प्रथम नक्षत्र माना जाने लगा। लेकिन जिस समय जिस नक्षत्र पर वसन्त सम्पात होता है, उस अवधि में उस नक्षत्र का नाम सर्वप्रथम लिया जाता है। लगभग 25,780 वर्ष की अवधि में वसन्त सम्पात सभी नक्षत्रों में घूम लेता है। इस आधार पर जिस ग्रन्थ या जिस घटना के समय वसन्त सम्पात, शरद सम्पात या उत्तर-दक्षिण परम क्रान्ति का उल्लेख किया जाता है, या किसी नक्षत्र के साथ ऋतु दर्शाई जाती है उस आधार पर लगभग 25,800 वर्ष की कालावधि में वर्ष निर्धारित किया जाता है। यह पद्धति इतिहास जानने में अत्यन्त उपयोगी सिद्ध हुई है।
(श्री शंकर बालकृष्ण दीक्षित जी ने भारतीय ज्योतिष में इस तथ्य को ही स्थापित किया है। इस बात को वेदकाल निर्णय नामक पुस्तक में तथा इन्दौर पञ्चाङ्ग शोधन कमेटी की रिपोर्ट में परिष्ठ 4 अयनांश निर्णय में 233 पृष्ठों में श्री दीनानाथ शास्त्री चुलेट ने सप्रमाण सिद्ध किया है। इन्दौर पञ्चाङ्ग शोधन कमेटी की रिपोर्ट पीडीएफ इण्टरनेट आर्काइव पर उपलब्ध है।) लगभग सभी विद्वानों ने इसी आधार पर चित्रा पक्षीय अयनांश को मान्य किया है। इसलिए इसे झुठलाया नहीं जा सकता।
इतिहास की घटनाओं के समय निर्धारण के लिए तत्कालीन किसी नक्षत्र विशेष में वसन्त सम्पात होने के आधार पर काल निर्धारण लोकमान्य श्री बालगङ्गाधर तिलेक जी ने भी उनकी पुस्तक ओरायन में किया है।
सूत्र ग्रन्थों के रचनाकाल से रामायण और महाभारत इतिहास ग्रन्थों के रचनाकाल के बीच जब चित्रा तारे से 180° पर रेवती नक्षत्र का योग तारा स्थित था, तब रेवती नक्षत्र के योग तारा को नक्षत्र पट्टी का आदि बिन्दु और अश्विनी नक्षत्र का प्रारम्भ बिन्दु माना जाने लगा। लेकिन वर्तमान में उस स्थान पर कोई तारा नही है और यदि रेवती नक्षत्र का योग तारा झीटापिशियम तारे को माना जाए तो वह तारा लगभग नौं अंश पीछे खिसक चुका है। इस कारण वर्तमान मे अश्विन्यादि बिन्दु पर कोई तारा नही है।
लेकिन पौराणिक युग के सिद्धान्त ज्योतिष के विद्वानों ने एक खोज की कि, उक्त अश्विन्यादि बिन्दु और वसन्त सम्पात के अन्तर को अयनांश नाम दिया गया जिसे अंग्रेजी में प्रिसेशन ऑफ इक्विनाक्स कहते हैं। सूर्य, चन्द्रमा और ग्रहों के सायन भोगांश में से उक्त अयनांश घटाकर निरयन राशि अंशादि बना लिया।
पश्चिम टर्की, मिश्र और इराक में प्रचलित असमान विस्तार वाली द्वादश राशियों को परवर्ती युरोपीय गणितज्ञों द्वारा प्रत्येक राशि को निश्चित तीस-तीस अंशों की नियत कर दी। आचार्य वराहमिहिर के समय भारत में उक्त ग्रीक राशियों को अपनाने में असमान विस्तार वाले सत्ताइस नक्षत्रों को 13°20' का नियत कर दिया। इस प्रकार उनके अनुसार यवन राशियाँ और भारतीय नक्षत्रों का समायोजन हो गया। लेकिन इस चक्कर में असमान विस्तार वाले तेरह अरे (वास्तविक राशियाँ) और असमान विस्तार वाले वैदिक नक्षत्र गुम हो गये और तीस-तीस अंशों की बारह राशियाँ और तेरह अंश बीस कला वाले सत्ताइस नवीन नक्षत्र प्रचलित हो गये। इसे निरयन पद्धति कहा गया। निरयन पद्धति में सायन भोगांश में से अयनांश घटाकर निरयन राशि अंशादि बतलाना आसान हो गया। जो आज तक प्रचलित है।
उल्लेखनीय है कि, वैदिक अट्ठाईस नक्षत्रों में से अभिजित नक्षत्र का योग तारा नक्षत्र पट्टी से बहुत दूर उत्तर में खिसक जाने के कारण वर्तमान में सत्ताईस नक्षत्र ही मानना उचित है।
आचार्य वराहमिहिर ने तेरह अरों शब्द का प्रयोग वास्तविक राशियों के लिए किया था। लेकिन सर्पधारी राशि या ऑफियुकस या ओफियुचस (Ophiuchus) राशि भी नक्षत्र पट्टी से बाहर निकल जाती है। अतः भारतीय सन्दर्भ में असमान विस्तार वाली बारह राशियाँ ही मानना उचित होगा।
खगोलविद जब भी किसी आकाशीय पिण्ड की सूचना देते हैं तो पिण्ड की स्थिति 88 (अठासी) तारामण्डल में और तेरह साईन में दर्शाते हैं। न कि, राशि अंशों में। सायन पोजीशन बतलाने के लिए 000°00'00" से 359°59'59" तक में बतलाते हैं। अर्थात 000 अंश से 360 अंश तक बतलाते हैं न कि, साईन डिग्री मिनट सेकण्ड में।
अर्थात राशि अशं कला विकला भी एस्ट्रोनॉमी की नहीं बल्कि ऐस्ट्रॉलजी की भाषा है।
वेद, ब्राह्मण ग्रन्थों, सूत्र ग्रन्थों, और यहाँ तक कि, वाल्मीकि रामायण और श्रीकृष्ण द्वेपायन व्यास कृत महाभारत में भी सर्वत्र एक समान वर्णन पाया जाता है कि, अमुक ग्रह अमुक नक्षत्र में स्थित है या अमुक ग्रह अमुक नक्षत्र को पीड़ा दे रहा है। कहीं भी यह वर्णन नहीं है कि, अमुक ग्रह किस प्रधि में स्थित है।
अर्थात प्रधि, ऋतुओं, गोल में सूर्य की स्थिति, अयन और तोयन (परम क्रान्ति की ओर सूर्य की गति) का सम्बन्ध केवल सूर्य से है।
अतः क्रान्तिवृत में सूर्य के भोगांश तथा क्रान्ति और विषुव वृत के उत्तर-दक्षिण क्रान्ति की गणना सूर्य के लिए की गई थी। बाद में ज्योतिष के सूर्य सिद्धान्त, आर्य भट्टीय, सिद्धान्त शिरोमणि आदि ग्रन्थों के गणिताध्याय में चन्द्रमा और ग्रहों की गति की गणना कर ग्रह स्थिति भोगांश, क्रान्ति और शर के साथ दर्शाने की गणना तैयार हुई।
लेकिन खगोल शास्त्र में फिक्स्ड ज्ञोडिएक में नक्षत्रों के प्रारम्भ, समाप्ति और विस्तार का उल्लेख किया जाता है। जिसे गोलाध्याय कहते हैं।
संहिता ज्योतिष का मुख्य आधार नक्षत्रों में ग्रहों और चन्द्रमा की स्थिति है, लेकिन सूर्य की ऋतु और माहों का भी महत्व है। होरा शास्त्र या जातक फलित ज्योतिष संहिता ज्योतिष के सिद्धान्तो का ही अनुसरण करता है।
अर्थात नक्षत्र पद्धति का आधार चन्द्रमा है। क्योंकि लगभग 27.322 दिन में चन्द्रमा पूरी नक्षत्र पट्टी में घूम लेता है। जबकि प्रधि, सौर मास, ऋतु, गोल, अयन, तोयन और संवत्सर का आधार सूर्य है। जिसके लिए सायन गणना ही उपयुक्त है।
किसी भी स्थान पर समय को दर्शाने के लिए सूर्य, चन्द्र और ग्रहों के भोगांश, क्रान्ति और शर दर्शाने भर से काम नहीं चल सकता, क्योंकि, इस स्थिति की आवृत्ति होती रहती है; जबकि, यदि इसके साथ सूर्य , चन्द्रमा और ग्रहों की स्थिति नक्षत्रों में स्थिति दर्शाई जाए तो, इन सभी स्थितियों की आवृत्ति संयोजन करोड़ों वर्ष में भी नहीं हो पाती है। इसलिए एतिहासिक घटना का ठीक-ठीक समय ज्ञात करने के लिए सूर्य चन्द्रमा और ग्रहों की सायन पोजीशन और नक्षत्रों में स्थिति दोनों साथ-साथ जानना अत्यावश्यक है। इसलिए सायन गणना और नक्षत्रिय पद्धति दोनों का ही ज्ञान आवश्यक है।
भारत में यज्ञ कर्म, व्रत पर्व, उत्सव और त्यौहार मनाने के लिए मुख्य आधार यह है कि, निश्चित गोल, निश्चित अयन में निश्चित ऋतु में उल्लेखित मधु-माधव आदि सौर मास, में चन्द्रमा की किसी नक्षत्र विशेष में स्थिति हो न कि, चान्द्रमास की तिथियाँ। वेदों में तिथियाँ प्रचलित नहीं थी। केवल उदृष्टका (शुक्ल प्रतिपदा), एकाष्टका (शुक्लाष्टमी), पूर्णिमा, व्यष्टका (कृष्ण प्रतिपदा) और अष्टका (कृष्णाष्टमी) और अमावस्या तिथि का ही उल्लेख है।
बाद में चान्द्र मास में सम्बन्धित नक्षत्र में पड़ने वाली तिथि से जोड़ दिया गया। इसमें त्रुटि यह हो गई कि, सूर्य की सायन संक्रान्ति वाले मधु-माधव आदि सायन सौर मास के स्थान पर पौराणिक काल में प्रचलित निरयन सौर संक्रमण आधारित सौर मास पर आधारित चैत्र-वैशाख आदि चान्द्र मासों की तिथि स्वीकार कर ली गई।
इसके दो कारण थे।
प्रथम -- शिवरात्रि पर्व का आधार बिल्वपत्र के पेड़ पर बैठकर व्याघ (बहेलिए) द्वारा रात-भर मृगशीर्ष नक्षत्र (ओरायन) के तारों का पीछा करते हुए व्याघ तारा लुब्धक (सिरियस केनिस मेजर) देखते हुए चारों प्रहर में मुंह धोने और बेल पत्र तोड़कर गिराने को शंकर जी ने अपनी पूजा मानकर व्याघ (बहेलिए) को दर्शन देकर वरदान दे दिया यह कहानी है।
चूंकि रात-भर व्याघ (लुब्धक) का दर्शन निरयन सौर धनु राशि के 20°13' वाले दिन (वर्तमान में 05 जनवरी के आस-पास) को ही हो सकता है, जो निरयन सौर मकर संक्रमण आधारित अमान्त माघ मास में ही सम्भव है। इसलिए निरयन सौर मकर मास में पड़ने वाली शिव की तिथि चतुर्दशी को शिवरात्रि मनाई जाने लगी।
दुसरा --- निरयन सौर संक्रमण आधारित चैत्र-वैशाख आदि चान्द्र मासों में किसी भी निर्धारित तिथि पर व्रत पर्व के लिए निर्धारित चन्द्रमा का नक्षत्र या उसके आगे-पीछे का नक्षत्र होना।
जैसे अमान्त चैत्र शुक्ल नवमी को चन्द्रमा पुनर्वसु या पुष्य नक्षत्र में चन्द्रमा होने पर राम नवमी मनाना। अमान्त श्रावण कृष्ण अष्टमी तिथि को प्रायः रोहिणी नक्षत्र में चन्द्रमा होने पर श्रीकृष्ण जन्माष्टमी मनाना आदि।
लेकिन यह ध्यान नहीं दिया गया कि, इस कारण व्रत पर्व उत्सव और त्यौहारों की ऋतुएँ गड़बड़ा जाएगी। दुसरा चन्द्रमा की किसी विशेष नक्षत्र में स्थिति असमान भोग वाले वास्तविक नक्षत्र में है भी या नहीं ली गई। इसलिए तिथि प्रणाली अनुचित ही है।
इसी कारण वेदों में उदृष्टका, चन्द्र दर्शन, एकाष्टका, पूर्णिमा, व्यष्टका, एकाष्टका और अमावस्या के अलावा किसी तिथि का उल्लेख नहीं किया गया है।
उसके स्थान पर मधु-माधव आदि मास और चन्द्रमा का वास्तविक नक्षत्र में होना ही दर्शाया गया है। और यही पद्धति ही उचित है।
पञ्चाङ्ग का दुसरा उपयोग --- कृषि, व्यापारिक यात्रा, युद्धों के लिए यात्रा, संस्कारों के लिए समुचित समय निर्धारण हेतु ऋतु ज्ञान होना तथा रात्रि में चन्द्रमा के प्रकाश की उपलब्धि बतलाना है।
इसमें भी मधु-माधव आदि सायन सौर मास और चन्द्रमा की अमावस्या-पूर्णिमा और अर्ध चन्द्र (अष्टका-एकाष्टका) दर्शाना पर्याप्त है। अन्य किसी तिथि के स्थान पर सम्बन्धित देवता का नक्षत्र लेना पर्याप्त है। जैसे प्रथम मास मधु मास में (पौराणिक माधव मास) में पुनर्वसु नक्षत्र पर चन्द्रमा हो तब श्रीराम जन्मोत्सव मनाना और पञ्चम मास नभस मास (पौराणिक नभस्य मास) में रोहिणी नक्षत्र में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाना और श्रवण नक्षत्र के चन्द्रमा में वामन जयन्ती मनाना ही उचित पद्धति है।
सृष्टि उत्पत्ति और ज्योतिष।
परमात्मा के ॐ सङ्कल्प के साथ प्रकट परब्रह्म विष्णु और उनकी शक्ति माया द्वारा इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए स्व संकल्प से ब्रह्म प्रभविष्णु सवितृ और उनकी शक्ति सावित्री श्री लक्ष्मी को प्रकट किया। और उन्हें ॐ संकल्प का अर्थ विस्तार किया। यही ज्ञान वेद कहलाता है।
इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए ब्रह्म से अपर ब्रह्म नारायण (श्रीहरि) और नारायणी (कमलासना गज लक्ष्मी) प्रकट हुए। ब्रह्म द्वारा इन्हें वेद प्राप्त हुए। अपर ब्रह्म से वाणी- हिरण्यगर्भ (विश्वकर्मा) प्रकट हुए। अपर ब्रह्म से इन्हें वेद प्राप्त हुए। हिरण्यगर्भ (विश्वकर्मा) को त्वष्टा (सृष्टि के गोलों, भुवनों, और लोको के सृजक) और उनकी शक्ति रचना के रूप में जाना जाता है। हिरण्यगर्भ (अण्डाकार पञ्च मुखी ब्रह्मा ब्रह्मा) से प्रजापति (गोलाकार चतुर्मुख ब्रह्मा) और उनकी शक्ति सरस्वती हुए। साथ ही अर्धनारीश्वर एक रुद्र (महारुद्र), सनक, सनन्दन, सनत्कुमार, सनातन और नारद हुए। लेकिन ये अकेले होने के कारण सृष्टि विस्तार नहीं कर सकते थे। फिर धर्म और उनकी शक्ति धृति तथा काम और उनकी शक्ति रति को उत्पन्न किया।
इन्हें हिरण्यगर्भ से वेद प्राप्त हुए। प्रजापति ने दक्ष (प्रथम) प्रजापति और प्रसुति, रुचि प्रजापति और आकुति, कर्दम प्रजापति और देवहुति, स्वायम्भुव मनु और शतरूपा की जोड़ी उत्पन्न की। जिनके द्वारा प्रजा उत्पत्ति हुई। इनके अलावा 1 मरीचि, 2 अङ्गिरा, 3 वशिष्ठ, 4 भृगु, 5 अत्रि, 6 कृतु 7 पुलह और 8 पुलस्य ऋषियों को प्रजापति के रूप में उत्पन्न किया। जिनके विवाह दक्ष-प्रसुति की कन्याओं से कराया। इन सबको प्रजापति से वेद (ज्ञान) प्राप्त हुआ। फिर अर्धनारीश्वर रुद्र ने स्वयम् को पुरुष शंकर और स्त्री उमा के स्वरूप में विभक्त किया। इन सब को प्रजापति से वेद प्राप्त हुए थे।
फिर प्रजापति ब्रह्मा ने वैदिक मन्त्रों के पद्यभाग ऋचाओं के ऋग्वेद नाम से अग्नि को, गद्य भाग यजुष को यजुर्वेद के नाम से वायु को, गायन योग्य साम भाग को सामवेद नाम से सूर्य को और शेष भाग को अथर्वाआङ्गरस अङ्गिरा ऋषि को प्रदान कर मृत्यु लोक भूमण्डल में प्रजाओं को प्रदान करने का कार्य सोपा। तब से वेदों को श्रुति परम्परा से अन्तरित होने के कारण श्रुति कहा जाने लगा। और इस ज्ञान का रचियता परमात्मा होने से वेद अपौरुषेय कहलाते हैं। इन वैदिक संहिताओं की ब्रह्मर्षियों द्वारा की गई व्याख्या ब्राह्मण ग्रन्थ कहलाते हैं। इनको समझने के लिए ऋषियों ने षड वेदाङ्गो और चार उपवेद की रचना की। 1 उच्चारण के लिए शिक्षा के ग्रन्थ रचे, 2 शब्द व्युत्पत्ति और भाषा विज्ञान समझने के लिए यास्क आदि ऋषियों ने निरुक्त , और अमरसिंह आदि ने अमरकोश जैसे शब्दकोश निघण्टु रचा, 3 वाक्य निर्माण और वाक्य विन्यास जानने के लिए पाणिनि आदि ऋषियों ने अष्टाध्याई आदि व्याकरण रचा जिस पर वररुचि रचना की और पतञ्जली ने महाभाष्य लिखा, राजा भोज ने महाभाष्य पर वृत्ति की रचना की, 4 छन्दों की रचना और अर्थ ज्ञान हेतु पिङ्गल आदि ऋषियों ने छन्दशास्त्र रचा, 5 सूर्य ने उनके शिष्य मायासुर को ब्रह्माण्ड विज्ञान और सिद्धान्त ज्योतिष का ज्ञान दिया। 6 (क)बहुत से ऋषियों ने अपने-अपने वेद और ब्राह्मण ग्रन्थ और शाखा के अनुसार सृष्टि और ब्रह्माण्ड, भुवन और लोकों की प्रतिकृति सम्बन्धित देवताओं के आह्वान, और स्थापना हेतु नियत स्थान दर्शाने हेतु मण्डप और वेदी निर्माण हेतु शुल्ब सूत्रों की रचना की। (6 ख) बड़े यज्ञों के विधि-विधान और निषेध ज्ञान हेतु श्रोत सूत्रों की रचना की। इनकी मीमांसा हेतु जेमिनी ने पूर्व मीमांसा ग्रन्थ रचा (6 ग) बहुत से ऋषियों ने अपने-अपने वेद और ब्राह्मण ग्रन्थ और शाखा के अनुसार दैनिक कर्म,संस्कार, व्रत पर्व उत्सव और त्यौहारों के विधि-विधान और निषेध ज्ञान हेतु गृह्य सूत्रों की रचना की। और (6 घ) अपने क्षेत्र, काल और प्रजा को ध्यान रखते हुए बहुत से ऋषियों ने अपने-अपने वेद और ब्राह्मण ग्रन्थ और शाखा के अनुसार राजा - प्रजा, ग्राम, कुल, कुटुम्ब, परिवार के सदस्यों के अहिंसा , सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शोच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय, ईश्वर प्रणिधान, दया, करुणा, क्षमा, दान, त्याग, तितिक्षा आदि सार्वभौमिक, सर्वकालिक आचरण नियम, कर्तव्य और निषेध तथा अधिकार, विवाह - उत्तराधिकार आदि के नियमों हेतु धर्मसूत्र रचे। जिनकी स्मृति के आधार पर बाद में अलग-अलग राज्यों के संविधान स्मृति ग्रन्थों के नाम से रचे गए।
इनके अलावा कर्म मीमांसा हेतु श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश श्रीकृष्ण ने दिया। और परमात्मा, आत्मा और जीवात्मा,परब्रह्म परमेश्वर, और जगत - संसार के सम्पूर्ण ज्ञान के लिए वैदिक संहिताओं के अन्तिम भाग की व्याख्या ब्राह्मण ग्रन्थों के अन्तिम भाग में आरण्यकों और उपनिषदों के नाम से रचे गए ब्रह्मसूत्रों की मीमांसा बादरायण ने शारीरिक सूत्र में की। जिसकी व्याख्या/ भाष्य वेदव्यास जी, भगवान आदि शंकराचार्य ने की और उसपर भी पतञ्जली ने अपने महाभाष्य में भी विवेचना की।
इनके अलावा स्वतन्त्र रूप से ईश्वर कृष्ण की सांख्य कारिका और महर्षि कपिल ने सांख्य दर्शन, में तत्व मीमांसा की, पतञ्जली ने योग दर्शन में अष्टांग योग विवेचना की। महर्षि गोतम ने तर्क और प्रमाण शास्त्र पर न्याय दर्शन रचा। और कणाद ने जगत को नौ तत्वों में विभाजित कर वैशेषिक दर्शन रचा। नागार्जुन ने माध्यमिक दर्शन पर अपनी विवेचना प्रस्तुत की।
ऐसे ही १ ऋग्वेद के उपवेद आयुर्वेद में चरक, सुश्रुत आदि ऋषियों ने ग्रन्थ रचे २ यजुर्वेद के उपवेद धनुर्वेद के ग्रन्थ और अर्थशास्त्र के लिए विष्णु गुप्त चाणक्य आदि ने राजनीति के ग्रन्थ अर्थशास्त्र के ग्रन्थ रचे। ३ सामवेद के उपवेद गन्धर्ववेद के अन्तर्गत काव्य, गायन, वादन, वाद्ययंत्रों के निर्माण, उपयोग और रखरखाव के ज्ञान के लिए , नाट्य-नर्तन , मञ्चन आदि के ज्ञान के लिए ग्रन्थ रचे। और ४ अथर्वेद के उपवेद स्थापत्य वेद और शिल्प वेद के ज्ञान के लिए विश्वकर्मा प्रकाश, मायासुर शिलप शास्त्र आदि ग्रंथ और राजा भोज के समराङ्गण सूत्र जैसे ग्रन्थ रचे गए।
द्वापरयुग के अन्त में कलियुग के प्रारम्भ होने के पहले ही वेदव्यास जी ने अपने शिष्यों में पैल को ऋग्वेद, वैषम्पायन को यजुर्वेद , जेमिनी को सामवेद और सुमन्तु को अथर्ववेद का ज्ञान देकर मानवों में ज्ञान प्रसार का काम सोपा।
फिर प्रजापति ब्रह्मा से प्राप्त अपौरुषेय वेदों में अनन्त ब्रह्माण्डों में से केवल हमारे ब्रह्माण्ड की आकाशगङ्गा निहारिका के मार्तण्ड नामक सूर्य के भूमि नामक ग्रह के परिभ्रमण पथ क्रान्ति वृत और भूमि की विषुवत रेखा के समानान्तर आकाश के विषुव वृत और क्रान्ति वृत के तीस-तीस अंशों के समान दूरी वाले द्वादश प्रधेयों और क्रान्तिवृत के उत्तर दक्षिण आठ-नौं अंश चौड़ी पट्टी की नक्षत्र पट्टी में कुछ ताराओं द्वारा निर्मित असमान विस्तार के नक्षत्र तथा सूर्य चन्द्रमा और ग्रहों का वर्णन तो नहीं हो सकता अतः वैदिक ज्योतिर्गणित, वैदिक पञ्चाङ्ग जैसे शब्द तो निरर्थक ही हैं।
अतः ब्राह्मण ग्रन्थों और सूत्र ग्रन्थों में उल्लेखों के आधार पर वैदिक ग्रह गणित और वैदिक पञ्चाङ्ग कहा जा सकता है।
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