आई.टी.कम्पनियों को भी वर्क फ्रॉम होम चालू करना ही पड़ेगा। अन्यथा अधिक वेतन की माँग जोर पकड़ेगी।
प्राचीन भारतीय व्यवस्था अति श्रेष्ठ थी। सौनार, लौहार, सुतार, ताम्बे-पीतल के बर्तन बनाने वाले ठठेरा, मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्हार, रुईं धुनकर गादी- तकिये, रजाई भरने और सूत कातने वाले पिञ्जारे, कपड़े बुनने वाले तन्तुवाय (जुलाहे), बाँस के कारिगर गाँछे जैसे विश्वकर्माओं के घर के आगे उसका कार्यस्थल (वर्कशॉप) होता था, बच्चे और बहुएँ तक हाथ बंटाते हुए प्रशिक्षित हो जाते थे।
व्यापारी के घर के आगे दुकान होती थी घर वाले भी दुकान सम्भाल लेते थे।
केवल किसानों और ईंट निर्माता कुम्हारों को ही गांव से सटे हुए लेकिन बाहर काम करने जाना पड़ता था
और पचास वर्ष से अधिक अवस्था के विद्वान गाँव के निकट लेकिन गांव से बिल्कुल अलग रहकर गुरुकुल चलाते थे।
कोई बे रोजगार नहीं रहता था।
केवल उच्च शिक्षा हेतु विद्यार्थियों और व्यापारियों को लम्बी यात्राएँ करना पड़ती थी।
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