शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2025

जीवन पद्यति

बिना वेद मन्त्रों के कण्ठस्थ किये आगे दर्शाये गए कोई भी कार्य नहीं किए जा सकते। इसलिए सर्वप्रथम वेद मन्त्र कण्ठस्थ कराये जाते थे।
निरुक्त, व्याकरण और छन्द के ज्ञान बिना छन्दस (वैदिक संस्कृत) में गति नहीं हो सकती।
वेदाङ्ग और उप वेदों के ज्ञान बिना वेद, ब्राह्मण, और दर्शन में कोई गति नहीं हो सकती यह बात गत कुछ वर्षों में समझ आ गई।
शिक्षा के ज्ञान बिना उच्चारण नहीं कर सकते। उच्चारण बदलने पर शब्द का अर्थ बदल जाता है।
निरुक्त के बिना शब्दों के अर्थ समझ नहीं आते तो वाक्य कैसे समझेंगे?
निघण्टु के बिना लगभग समानार्थी शब्दों का कहाँ क्या अर्थ होगा यह समझ नहीं आता।
व्याकरण के बिना वाक्य समझ नहीं आते। 
छन्द शास्त्र के ज्ञान के बिना काव्य का अर्थ का अनर्थ हो सकता है।
ज्योतिष के ज्ञान के बिना उचित स्थान (वास्तु) और उचित समय (मुहूर्त) के ज्ञान के बिना धर्म पालन सम्भव नहीं है, धर्म सूत्रों के ज्ञान बिना क्या करना, कैसे करना, क्या मानकर करना? क्या समझ कर करना? कैसे करना का ज्ञान सम्भव नहीं है। मतलब जीवन जीना ही सम्भव नहीं है।
(ये जीना भी कोई जीना है लल्लू😃, जीना तो है उसी का जिसने ये ज्ञान जाना, है काम मानवों का, औरों के काम आना।पर हित सरिस धरम नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।) 
धर्म ज्ञान के बिना अर्थ और काम पुरुषार्थ सिद्ध हो ही नहीं सकते। तो मौक्ष की तो कल्पना ही बहुत दूर की बात हो गई।
बिना शुल्ब सूत्र के ज्ञान के न आवास बन सकता है, न कार्यस्थल, न कृषि क्षेत्र निर्धारित किया जा सकता है। न बेदी बन सकती है, न मण्डप। बेदी और मण्डप के बिना कर्म नहीं हो सकते।
गृह्य सूत्रों के ज्ञान बिना संस्कारित नहीं हुआ जा सकता, न व्रत, पर्व, उत्सव मनाये जा सकते हैं।
श्रोत सूत्रों के ज्ञान के बिना परमार्थ (यज्ञ) नहीं हो सकता। यज्ञ मतलब विष्णु अर्थ कर्म अर्थात सर्वव्यापी विष्णु के निमित्त कर्म अर्थात सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय कर्म श्रोत सूत्रों के ज्ञान बिना सम्भव नहीं है।
इन सबके ज्ञान होने पर भी आयुर्वेद के ज्ञान के बिना उपयुक्त जीवन शैली, उचित औषधि (जड़ी-बुटी, वनस्पति, रसायन) का ज्ञान नहीं हो सकता, बिना पदार्थ ज्ञान और उनके समुचित उपयोग जाने बिना उचित कर्म कैसे हो सकते हैं?
अस्त्र-शस्त्र निर्माण, रखरखाव और सञ्चालन के ज्ञान के बिना बिना परेशानी परमार्थ कर्म (निर्बाध यज्ञ) नहीं कर सकते।
वाद्य यन्त्र निर्माण, रखरखाव, वादन और गायन सीखे बिना सामगान नहीं हो सकता, सामगान सुनकर भी तदनुसार भाव मन में नहीं आ सकते तो आपकी स्तुति निरर्थक ही हो जाएगी। साथ ही मञ्च निर्माण, रख रखाव और सञ्चालन के ज्ञान बिना मञ्च तैयार नहीं हो सकता। और अभिनय के ज्ञान के बिना भावाभिव्यक्ति सम्भव नहीं है।
मतलब गायन, वादन, अभिनय (बॉडी लैंग्वेज) जाने बिना न आप किसी को प्रसन्न कर सकते हो, न प्रसन्न रख सकते हो, न आकर्षित कर सकते हो, न अनुकूल कर सकते हो। 
पथ, सेतु, भवन, दुर्ग, मूर्ति , प्रतिमा गढ़ना और यान (परिवहन संसाधन) के निर्माण, रखरखाव एवम् सदुपयोग का ज्ञान स्थापत्य के बिना सामान्य जीवन सम्भव नहीं है। अन्यथा कोई भी आपके अज्ञान का लाभ उठा लेगा। और
व्यवहार के ज्ञान के बिना तो जीवन का हर क्षेत्र अधूरा ही होगा। न सामाजिक जीवन, न उद्यम, न व्यवसाय, न कृषि, न राजनीति आदि कोई भी कार्य नहीं कर सकते अतः अर्थशास्त्र का ज्ञान प्रत्येक कदम पर आवश्यक है।
आपने देखा होगा कि, शुल्ब सूत्रों में सैद्धांतिक और व्यावहारिक गणित, और ब्रह्माण्ड विज्ञान, धनुर्वेद और स्थापत्य और गन्धर्व वेद (सङ्गीत और नाट्य शास्त्र) में भौतिकी तथा सैन्य शास्त्र, आयुर्वेद में रसायन शास्त्र, जीव विज्ञान तथा चिकित्सा शास्त्र तथा अर्थ शास्त्र में वाणिज्य का सम्पूर्ण ज्ञान निहित है।
शिक्षा,निरुक्त, व्याकरण और छन्द शास्त्र में सम्पूर्ण भाषा शास्त्र निहित है।
पञ्च महायज्ञ के ब्रह्मयज्ञ के अन्तर्गत अष्टाङ्ग योग निहित है।

इतना समस्त ज्ञानार्जन पश्चात ही आपके द्वारा बाल्यावस्था में कण्ठस्थ कये गए वेद मन्त्रों को समझ पाने का प्राथमिक ज्ञान प्राप्त हो पाएगा।

ब्रह्मचर्य आश्रम से ही पञ्च महायज्ञ का अभ्यास (जिसमें योगाभ्यास सम्मिलित है।) के कारण शरीर के अङ्ग प्रत्यङ्ग, संस्थान, और इन्द्रियाँ आपके वश में रहतीं हैं।अन्तःकरण चतुष्ठय पूर्णतः एकाग्र और शान्त रहते हैं। चित्तवृत्तियों का निरोध हो जाता है।
इस कारण समाधि अभ्यास करके वेद मन्त्रों का अर्थ, और आशय समझ आने लगता है। तब कर्म कौशल और व्यावहारिकता आ जाती है। इससे ग्रहस्थ आश्रम में  व्यवहार में तनिक भी कठिनाई नहीं होती है। जीवन सहज और सरल हो जाता है। 
व्यक्ति सफल ग्रहस्थ जीवन जी कर अगली पीढ़ी के मार्गदर्शन के लिए सक्षम हो जाता है।
तब वानप्रस्थाश्रम में प्रवेश कर सकता है। और आरण्यकों का अध्ययन कर श्रेष्ठ गुरु मुख से उपनिषद सुन समझ कर आत्मज्ञान लब्ध कर संन्यास के योग्य हो पाता है।
इसके बिना तन्त्र ज्ञान प्राप्त कर तामसिक तप करके जैन साधु, या ध्यान के नाम पर मानसिक जिम्नास्टिक करके बौद्ध श्रमण, या उपरी थोथा शास्त्राध्ययन कर कथावाचक बाबा बन सकते हैं।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें