विष्णु पुराण अध्याय 09 श्लोक 01 से 08 तक में ज्योतिष चक्र और शिशुमार चक्र का वर्णन में उल्लेख के अनुसार भगवान नारायण श्रीहरि का वास स्थान शिशुमार चक्र के हृदय (केन्द्र) में है। यही वैकुण्ठ लोक कहलाता है।
(कृपया देखें विष्णु पुराण अध्याय 09 श्लोक 01 से 08 तक में ज्योतिष चक्र और शिशुमार चक्र का वर्णन। )
शिशुमार चक्र को लघु सप्त ऋषि चक्र या ध्रुवमत्स्य तारामंडल भी कहते हैं, अंग्रेजी में इसे अर्सा माइनर कांस्टेलेशन (Ursa Major
Constellation) कहते हैं। इस वैकुण्ठ लोक में भगवान श्रीमन्नारायण श्रीहरि का वास स्थान है।
इसी वेकुण्ठ लोक के अन्तर्गत ही साकेत धाम से उत्तर प्रदेश के अयोध्या नगर में भगवान श्रीरामचन्द्र जी का अवतरण (उतरना) हुआ था और काल द्वारा उनके कार्यकाल समाप्त होने की सुचना देने पर तीनों भाइयों सहित सरयु नदी में उतरकर वापस साकेत धाम ही पधारे थे।
इसी वेकुण्ठ लोक के अन्तर्गत ही गोलोक धाम से महा तपस्वी नर नारायण में से एक नारायण ऋषि भगवान श्रीकृष्ण के रूप में उत्तर प्रदेश के मथुरा नगर में उनके मामा कंस के कारागार में अवतरण (उतरना) हुआ था।
कृपया देखें विष्णु पुराण,पञ्चम अंश/ प्रथम अध्याय/ श्लोक 60 से 82 तक में उल्लेख के अनुसार
क्षीर सागर के तट पर हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के नेतृत्व में नारायण की स्तुति करने पर प्रकट होकर नारायण ने देवताओं के समक्ष एक श्वेत और एक कृष्ण केश उखाड़कर भूमि पर पटके और कहा ये दोनों पृथ्वी पर अवतार लेकर दैत्यों का नाश करेंगे।
देवगण भी अपने अपने अंश से अवतार लेकर दैत्यों से युद्ध करें। श्लोक 60 से 63 तक।
वसुदेव के घर देवकी के आठवें गर्भ से यह श्याम केश अवतार लेगा। और कालनेमी के अवतार कंस का वध करेगा। श्लोक 64-65
फिर नारायण ने योगनिद्रा को आदेश दिया कि, शेष नामक मैरा अंश अपने अंशांश से देवकी के सातवें गर्भ में स्थित होगा। उसे वसुदेव की दुसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर देना। और लोग समझेंगे कि, देवकी का गर्भपात हो गया। रोहिणी के गर्भ में संकर्षित होने से वह संकर्षण कहलाएगा। श्लोक 72 से 76 तक।
तदन्तर मैं देवकी के आठवें गर्भ में स्थित होऊँगा। उस समय तू यशोदा के गर्भ से चली जाना। श्लोक 77 तक।
श्लोक 78 --- वर्षा ऋतु में नभस मास (प्रकारान्तर से अमान्त श्रावण मास) में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को निशा (रात्रि) में जन्म लूँगा। और तू नवमी को उत्पन्न होगी। श्लोक 78
वासूदेव जी मुझे यशोदा जी के शयन गृह में ले जाएंगे और तुझे देवकी के शयनगृह में लेजाएँगे।
कंस द्वारा शिला पर पटकने पर तू आकाश मे स्थित हो जाएगी। श्लोक 79 एवम् 80
इन्द्र तुम्हें प्रणाम करेगा। फिर तुम्हें भगिनी रूप से स्वीकार करेगा। श्लोक 81
तू शुम्भ-निशुम्भ आदि सहस्रों दैत्यों का संहार कर समस्त पृथ्वी को सुशोभित करेगी। श्लोक 82
विष्णु पुराण,पञ्चम अंश/ तृतीय अध्याय/ श्लोक 26 और 27 में उल्लेख के अनुसार
योग निद्रा को कन्स द्वारा पाषाण शिला पर पटकने के प्रयत्न के समय कन्स के हाथ से छूटकर योगनिद्रा देवी आकाश में शस्त्र युक्त, अष्टभुजा देवी के स्वरूप में प्रकट हुई। श्लोक 26
और कन्स को फटकारते हुए कहा कि, तेरा वध करने वाला अन्यत्र जन्म ले चुका है। श्लोक 27
मिर्जापुर उत्तरप्रदेश मे स्थित *महामाया, योगमाया आद्य शक्ति, एकानंशा, विन्ध्यवासनी देवी* का मन्दिर है।
वैष्णव परंपरा में महामाया, योगमाया *आद्य शक्ति* , एकानंशा देवी को *नारायणी* की संज्ञा दी गई है, और वह विष्णु की माया की शक्तियों के अवतार के रूप में कार्य करती हैं। ऐसे ही भागवत पुराण दशम स्कन्ध अध्याय 89 श्लोक 59 से 60 तक में शेषशाई भूमा नारायण ने अर्जून और श्रीकृष्ण को पूर्व जन्म में महातपस्वी नर और नारायण ऋषि बतलाया है। कृपया देखें भागवत पुराण दशम स्कन्ध अध्याय 89 श्लोक 52 से 65 तक ।
जरा नामक एक बहेलिए ने गलती से उन पर तीर चला देने को निमित्त बनाकर गुजरात के प्रभास क्षेत्र में एक पीपल के पेड़ के नीचे विश्राम करते समय अपने नश्वर शरीर का त्याग कर वापस गोलोक धाम पधारे थे। (यह स्थान सोमनाथ के निकट है।)
अर्थात भगवान श्रीमन्नारायण श्रीहरि से भगवान श्रीरामचन्द्र जी और भगवान श्रीकृष्ण अलग-अलग व्यक्तित्व थे।
यों तो ईशावास्यम् जगत सर्वम् यत् किञ्चित जगत्याम् जगत शुक्ल यजुर्वेद अध्याय 40 का प्रथम मन्त्र के अनुसार और
सर्व खल्विदम् ब्रह्म, अयम् आत्मा ब्रह्म, तत् त्वम् असि के अनुसार तो सब-कुछ परमात्मा ही है। परमात्मा के अलावा कुछ है ही नहीं।
भक्त ध्रुव और प्रहलाद भगवान नारायण श्रीहरि के भक्त थे, जिनका वास स्थान शिशुमार चक्र के हृदय (केन्द्र) में है।
ऋष्यमूक पर्वत के पास ऋषि मतङ्ग के आश्रम में गुरु मतङ्ग ऋषि की सेवा रत शबरी को अपने गुरु मतङ्ग ऋषि के देहावसान के समय माता सीताजी की खोज में निकले भगवान श्रीरामचन्द्र जी के मतङ्ग आश्रम पधारने की सूचना के आधार पर शबरी ने वन गमन के दौरान माता सीताजी की खोज में निकले भगवान श्रीरामचन्द्र जी की प्रतीक्षा की थी। और भगवान श्रीरामचन्द्र जी के आगमन पर उनका स्वागत कर उनकी सेवा सुश्रुषा की थी और सुग्रीव का नाम-पता बतला कर उनसे सहयोग लेने का सुझाव दिया था।
द्रुपद पुत्री अग्निजा महाराज युधिष्ठिर की धर्मपत्नी द्रोपदी को अपने सखा भगवान श्रीकृष्ण का अनन्य आश्रय प्राप्त था। वे जब भी असाधारण सङ्कट अनुभव करतीं थीं तत्काल भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण कर (आह्वान कर) सङ्कट मुक्त करने की प्रार्थना करतीं थीं। और भगवान श्रीकृष्ण तत्काल उपस्थित होकर उनकी यथायोग्य सहायता कर उन्हें उस सङ्कट से मुक्त कर देते थे।
भक्त नृसिंह मेहता, भक्त सूरदास और मीरा बाई भी इन्हीं भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य भक्त थी।
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