नवरात्र में सप्तमी से नवमी तक प्रातः महा सरस्वती अवतार (कौशिकी) और विजया दशमी को मध्याह्न में महालक्ष्मी अवतार (महिशासुर मर्दिनी) की उपासना होती है।
शरद पुर्णिमा को लक्ष्मी पूजा (कलश में), और अमावस्या (दीपावली को मध्यरात्रि में) महाकाली अवतार (नारायण की योगनिद्रा) की आराधना होती है।
साथ ही धनतेरस को धन्वन्तरि की, धन तेरस से यम द्वितीया तक यमराज के लिए दीपदान ताकि, सर्वपितृ अमावस्या को जो पितर नहीं लौट पाए, आकाशदीप के प्रकाश में उनका मार्ग प्रकाशित हो जाए।
बलि प्रतिपदा को राजा बलि की, यम द्वितीया को चित्रगुप्त की आराधना होती है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें