जब राजनीति में इस व्यवस्था और प्रथा का दुरुपयोग होने लगा तब यह जातिवाद कहलाता है।
जाति व्यवस्था वर्ण व्यवस्था का विकृत रूप हुआ। फिर भी प्रारम्भ में किसान का बेटा विश्वकर्मा (सुनार, सुतार, लोहार, धातु के बर्तन बनाने वाले ठठेरा, कुम्भकार, शिल्पी, राज मिस्त्री) या वैद्य, शल्यकर्मी (नापित), व्यापारी, सैनिक आदि कुछ भी बन सकता था। आज भी कई कृषक परिवारों में यह होता रहा है।
विश्वकर्मा का पुत्र भी किसान,वैद्य, शल्यकर्मी (नापित), व्यापारी, सैनिक आदि कुछ भी बन सकता था।
आपने देखा होगा कि, पान की खेती कुमरावत (तम्बोली) करते हैं जो मातृ वंश से कुम्भकार (कुम्हार) और पितृ वंश से सूर्यवंशी (क्षत्रिय) थे।
विश्वकर्मा लोगों के परिवार में थोड़ी बहुत कृषि भूमि होती है और वे उसपर कृषि करते भी हैं।
लेकिन हर एक परिवार यह चाह रखता है कि, हमारी बहु हमारे परिवार के काम-काज, प्रथाओं की समझ और जानकारी रखती हो। इस कारण यह जाति व्यवस्था जाति प्रथा में बदल गई।
नेता तन्त्र की खोज जातिवाद तो हमारे सामने ही पनपा।
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