जातक का जन्म यदि जातक का जन्म यदि शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा के होरा में हुआ हो, या कृष्ण पक्ष में और सूर्य के होरा में हुआ है तो उसपर विंशोत्तरी महादशा लागू होगी।
इससे विपरीत जातक का जन्म यदि
शुक्ल पक्ष में सूर्य के होरा में हुआ हो, या कृष्ण पक्ष में और चन्द्रमा के होरा में हुआ है तो उसपर षोडषोत्तरी महादशा लागू होगी।
यदि विंशोत्तरी महादशा लागू हो तो ---
विंशोत्तरी महादशा अंतर्दशा प्रत्यन्तर दशा किन ग्रहों की चल रही है यह देखते हैं।
विंशोत्तरी महादशा
1 महादशेश, अन्तर्दशेश और प्रत्यन्तर दशा स्वामी जिस ग्रह के नक्षत्र में है, वह ग्रह चलित चक्र में जिस भाव में स्थित हो उस भाव का फल ग्रह अपनी प्रकृति और ग्रह जिस राशि और नक्षत्र में स्थित है, उस राशि और नक्षत्र के स्वभाव के अनुसार सूचित करता है।
2 महादशेश, अन्तर्दशेश और प्रत्यन्तर दशा स्वामी जिस चलित चक्र में जिस भाव में स्थित हो, उस भाव का फल ग्रह अपनी प्रकृति और ग्रह जिस राशि और नक्षत्र में स्थित है, उस राशि और नक्षत्र के स्वभाव के अनुसार सूचित करता है।
3 महादशेश, अन्तर्दशेश और प्रत्यन्तर दशा स्वामी जिस ग्रह के नक्षत्र में है, वह ग्रह जिन-जिन भावों का स्वामी हो उन-उन भावों का फल ग्रह अपनी प्रकृति और ग्रह जिस राशि और नक्षत्र में स्थित है, उस राशि और नक्षत्र के स्वभाव के अनुसार सूचित करता है।
4 महादशेश, अन्तर्दशेश और प्रत्यन्तर दशा स्वामी ग्रह जिन-जिन भावों का स्वामी हो उन-उन भावों का फल ग्रह अपनी प्रकृति और ग्रह जिस राशि और नक्षत्र में स्थित है, उस राशि और नक्षत्र के स्वभाव के अनुसार सूचित करता है।
5 महादशेश, अन्तर्दशेश और प्रत्यन्तर दशा स्वामी ग्रह जिन जिन भावों में स्थित ग्रह तथा जिन जिन भावों के स्वामी ग्रहों द्वारा दखा जात है , उन-उन भावों का फल भी ग्रह अपनी प्रकृति और ग्रह जिस राशि और नक्षत्र में स्थित है, उस राशि और नक्षत्र के स्वभाव के अनुसार सूचित करता है।
वक्री अस्त आदि स्थिति भी ध्यान रखना होता है। वक्री और अस्त ग्रहों के नक्षत्र में स्थित ग्रह फल सूचित नहीं कर पाते हैं।
ऐसे ही अस्त ग्रह भी फल सूचित नहीं कर पाते हैं। मङ्गल, और शनि वक्री हो तो उनका अशुभ फल कम हो जाता है। गुरु बृहस्पति और शुक्र ग्रह अतिचार हो तो उनका शुभ फल कम हो जाता है।
फिर उक्त ग्रहों का गोचर देखा जाता है। कि वे महादशा, अन्तर्दशा और प्रत्यन्तर दशा के स्वामी ग्रह जिस भाव में, जिस राशि और नक्षत्र में भ्रमण कर रहे हैं, उस भाव और राशि-नक्षत्र के अनुसार फल सूचित करता है। फिर यह देखते हैं कि,
महादशा, अन्तर्दशा और प्रत्यन्तर दशा के स्वामी उस भाव और राशि-नक्षत्र में कब-तक रहेंगे। वक्री अस्त आदि स्थिति भी ध्यान रखना होता है।
ग्रहों और भावों का बलाबल भी षडबल में देखकर ध्यान रखना चाहिए।
षोडश वर्गों की विभिन्न सञ्ज्ञाओं के फल भी ध्यान रखना चाहिए। तथा मैत्री चक्र और उच्च-नीच, मूल त्रिकोण और स्व राशि और अधिमित्र, मित्र, सम, शत्रु और अधिशत्रु के वर्ग में स्थिति का षड बल में स्थान बल में समावेश हो जाता है, फिर भी प्रथक से भी ध्यान रखना चाहिए।
जैमिनी पद्धति के कारक और रश्मि आदि पर भी ध्यान देना चाहिए। जैमिनी पद्धति में चर दशा चलती है, अतः चर दशा भी देखना चाहिए।
गोचर में ग्रहों के बलाबल के विचार हेतु अष्टक वर्ग का ध्यान रखना आवश्यक है।
यदि षोडषोत्तरी महादशा लागू हो रही हो तो
षोडषोत्तरी महादशेश, अन्तर्दशेश और प्रत्यन्तर दशा स्वामी जिन भावों के स्वामी हैं और चलित चक्र में जिस भाव में स्थित हैं (बैठे हैं) और उन ग्रहों की दृष्टि जिन भावों पर है, तथा उन ग्रहों पर जिन ग्रहों की दृष्टि है, वे ग्रह जिन भावों के स्वामी हैं और जिन भावों में स्थित है उन भावों के अनुसार उन भावों का ही फल ग्रह अपनी प्रकृति के अनुसार सूचित करेगा।
वक्री अस्त आदि स्थिति भी ध्यान रखना होता है। वक्री और अस्त ग्रहों के नक्षत्र में स्थित ग्रह फल सूचित नहीं कर पाते हैं।
ऐसे ही अस्त ग्रह भी फल सूचित नहीं कर पाते हैं। मङ्गल, और शनि वक्री हो तो उनका अशुभ फल कम हो जाता है। गुरु बृहस्पति और शुक्र ग्रह अतिचार हो तो उनका शुभ फल कम हो जाता है।
फिर उक्त ग्रहों का गोचर देखा जाता है। कि वे महादशा, अन्तर्दशा और प्रत्यन्तर दशा के स्वामी ग्रह किस भाव में भ्रमण कर रहे हैं, उस भाव में कब-तक रहेंगे, वक्री अस्त आदि स्थिति भी ध्यान रखना होता है।
षोडषोत्तरी महादशा के अलावा उत्तर भारत में विंशोत्तरी महादशा भी सर्वमान्य है। इसलिए षोडषोत्तरी महादशा के अलावा विंशोत्तरी महादशा अंतर्दशा प्रत्यन्तर दशा देखते हैं।
गम्भीर रोग और मरणासन्न अवस्था हो तो कालचक्र दशा भी देखना चाहिए।
इन सब का कॉमन फल जातक को बतलाया जाता है।
विशेष --- कुण्डली देखने के लिए बलाबल और भृगु पद्यति के योग आदि का ज्ञान भी आवश्यक है।
स्थान बल ग्रहों का मित्र की राशि में < अधिमित्र की राशि में < स्व राशि में < मूल त्रिकोण मे और < उच्च राशि में < उच्चांश मे स्थान बल बढ़ता रहता है।
शत्रु की राशि में > अधिशत्रु की राशि में > नीच राशि में > नीचांश मे स्थान बल घटता रहता है।
दिग्बल - लग्न (पूर्व) , चतुर्थ भाव (पाताल, गहराई/ उत्तर), सप्तम भाव (पश्चिम) और दशम भाव (आकाश, उँचाई/ दक्षिण) की दिशाओं तथा ग्रहों तथा राशियों की दिशा के आधार पर गणना करते हैं।
भाव स्पष्ट के जितने निकट ग्रह स्पष्ट हो तो ग्रह और भाव बली होते हैं, लेकिन यदि ग्रह स्पष्ट भाव सन्धि में हो तो भाव और ग्रह निर्बल हो जाता है।
ऐसे ही ग्रह और भाव समान कारकत्व दर्शाते हों तो उन भावों में वह ग्रह और भाव बली होता है। विपरित स्थिति में ग्रह और भाव बल क्षीण हो जाताहै है।
सूर्य पूर्व में, चंद्रमा उत्तर-पश्चिम (वायव्य कोण) में, मंगल दक्षिण में, बुध उत्तर में, बृहस्पति उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) में, शुक्र दक्षिण-पूर्व (आग्नेय कोण) में, शनि पश्चिम में, राहु दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य कोण) दिशा को सूचित करता है।
मेष, सिंह, धनु राशि पूर्व का, वृषभ, कन्या, मकर राशि दक्षिण का, मिथुन, तुला, कुम्भ राशि पश्चिम को सूचित करतीं हैं।
काल बल --
उत्तर गोल, शुक्ल पक्ष, दिन में सूर्य, मङ्गल, गुरु ब्रहस्पति और नेपच्यून सर्वाधिक बली होते हैं। और चन्द्रमा, शनि, युरेनस और राहु-केतु ग्रह सर्वाधिक निर्बल रहते हैं।
दक्षिण गोल, कृष्ण पक्ष, और रात्रि में चन्द्रमा , शुक्र, शनि, युरेनस और राहु-केतु बली होते हैं। और सूर्य, मङ्गल, गुरु ब्रहस्पति और नेपच्यून निर्बल रहते हैं।
बुध सम (न्युट्रल) ग्रह है।
दृग्बल ग्रहों पर पड़ने वाली शुभ दृष्टि की गणना करके ज्ञात किया जाता है।
चेष्टा बल - ग्रह की वक्री, मार्गी, अतिचार आदि गति के आधार पर विस्तृत गणनाओं द्वारा ज्ञात किया जाता है।
वृत के 360° के विभिन्न भागों के दृष्टियोग
युति 000° अन्तर।
बारहवाँ भाग 30° अन्तर।
प्रथम नवांश 40° अन्तर।
अष्टमांश 45° अन्तर।
षष्ठांश 45° अन्तर।
पञ्चमांश 72° अन्तर।
द्वितीय नवांश 80° अन्तर।
चतुर्थांश 90° अन्तर।
तृतियांश 120° अन्तर।
135° अन्तर।
150° अन्तर।
चतुर्थ नवांश 160° अन्तर।
प्रतियोग 180° अन्तर।
समक्रान्ति समान दिशा में और
समक्रान्ति विपरीत दिशा में
व्यतिपात योग जब दो ग्रहों के सायनांश का योग 180° हो।
वैधृतिपात योग व्यतिपात योग जब दो ग्रहों के सायनांश का योग 360° हो।
लोप या अस्त ग्रह जब कोई ग्रह या नक्षत्र का योग तारा सूर्य से अत्यल्प अंशात्मक दूरी पर स्थित हो और ग्रह और सूर्य की क्रान्ति भी समान हो। और ग्रह या तारा का शर भी समान हो।
उदय --- दूरी बढ़ने पर ग्रह या तारा आकाश में दृष्य हो जाता है तो उसे उदय कहते हैं।
वक्री - सूर्य केन्द्रीय ग्रह स्पष्ट में जब ग्रह भूमि के अंशात्मक निकट हो अर्थात भू केन्द्रीय ग्रह स्पष्ट में सूर्य से प्रतियोग कर रहा हो (180° के आस-पास हो) तब आकाश में ग्रह पीछे चलता हुआ दिखता है अर्थात पूर्व से पश्चिम में चलता हुआ दिखता है।
मार्गी - सामान्यतः सभी ग्रह पश्चिम से पूर्व की ओर चलते हुए दिखते हैं, उन्हें मार्गी कहते हैं।
राहु-केतु - चन्द्रमा का भूमि परिभ्रमण पथ जिन दो बिन्दुओं पर भूमि के सूर्य परिभ्रमण पथ पर काटता है, उसमें उत्तरी पात को राहु औश्र दक्षिणी पात को केतु कहते हैं।
इतनी सारी जानकारी के आधार पर फल कथन किया जाता है।
हर सत्ताइस दिन में लगभग सवा दो दिन के बीच जन्मे सभी लोगों की राशि एक ही होती है। इतने सारे लोगों का भविष्य एक जैसा कैसे हो सकता है?
प्रतिदिन लगभग दो घण्टे की एक ही लग्न होता है। एक ही जन्म लग्न वाले सभी लोगों का भविष्य एक जैसा कैसे हो सकता है?
मेने किसी के जीवन के ढाई घण्टे एक जैसे बीतते नहीं देखे। तो शनि के ढय्या और साढ़े साती के साढ़े सात साल एक समान कैसे व्यतीत हो सकते हैं।
जब फल कथन के लिए इतनी सारी चीजें देखना होती है तो, केवल दो बच्चों की जन्मराशि और जन्म नक्षत्र के आधार पर मिले गुण कितने सार्थक हो सकते हैं?
जब बारह भावों (खानों) में बारह राशियाँ, सत्ताइस नक्षत्र, 108 नक्षत्र चरण (नवांश), कृष्णमूर्ति पद्धति के 249 उप नक्षत्र और 360 अंशों (अर्थात 21,600कला या 12,96,000 विकलाओं) में, नौ ग्रह और राहु-केतु के योग से से केवल भाव स्पष्ट और ग्रह स्पष्ट होते हैं, तो कुण्डली के बारह भावों में से लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश (बारहवें) भाव में मङ्गल के बैठने से उसका पति या पत्नी की मृत्यु की भविष्यवाणी की जा सकती है तो इतनी बड़ी कुण्डली देखने की आवश्यकता ही नहीं होती।
जिन्हें फलित ज्योतिष नहीं आता ये उन लोगों की कमाई के साधन मात्र हैं।
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