पहले देव और देवताओं के विषय में भारतीय वैदिक अवधारणा स्पष्ट की जाना आवश्यक है -
भारत में सृष्टि के सभी तत्वों का दृष्य जगत की अनुभूति गम्य आधिभौतिक, भूमि से परे अन्तरिक्ष और ऊर्ध्व लोकिक आधिदैविक तत्व और देहान्तरवर्ती आध्यात्मिक तत्व ऐसे तीन स्तर पर विचार किया जाता है।
जीव, प्राण को देव
तथा अन्तःकरण चतुष्टय अर्थात चित्त, बुद्धि, अहंकार और मन, तथा श्रोत, त्वक, नेत्र, रसना और घ्राण नामक पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ तथा हस्त, पाद, वाक (कण्ठ और जीव्हा), उपस्थ और पायु नामक पञ्च कर्मेंद्रियों को भी देवता कहा गया है। अर्थात देवता भी हमसे एकदम भिन्न नहीं हैं।
परमात्मा सर्वव्यापक, और सबकुछ है। परमात्मा से भिन्न कुछ भी नहीं है।
परमात्मा के कल्याणमयी ॐ सञ्कल्प से ॐ शब्दनाद के साथ सृष्टि का सृजन प्रारम्भ हुआ।
परिणामस्वरूप परमात्मा का ही परब्रह्म स्वरूप प्रकट हुआ। जिसे विष्णु और माया के रूप में जाना जाता है। यह परमेश्वर स्वरूप कहाया। फिर
ब्रह्म स्वरूप में प्रकटीकरण हुआ जिसे प्रभविष्णु (सवितृ) और श्री लक्ष्मी (सावित्री) के रूप में जाना जाता है। यह महेश्वर स्वरूप कहलाया। फिर
अपरब्रह्म स्वरूप प्रकट हुआ जिसे नारायण (श्रीहरि) और नारायणी (कमलासना, गज सेवित कमला या पद्मा) के रूप में जाना जाता है। यह जगदीश्वर कहलाते हैं। फिर
हिरण्यगर्भ स्वरूप प्रकट हुआ जिसे त्वष्टा और रचना के रूप में जाना जाता है। जिन्होंने ब्रह्माण्ड के गोलों की रचना की। ये केवल ईश्वर कहलाते हैं। जगत निर्माता और नियन्ताओं की ये श्रेणी अजयन्त देव कहलाती है।
हिरण्यगर्भ से नील लोहित वर्ण के महारुद्र, सनक, सनन्दन, सनत्कुमार, सनातन और नारद हुए।
फिर प्रजापति के प्रादुर्भाव के साथ जैविक सृष्टि का प्रारम्भ हुआ।
प्रजापति ने देवलोक के प्रजापति इन्द्र -शचि, अग्नि - स्वाहा आदि स्वर्ग स्थानीय प्रजापति हुए। फिर रुद्र - रौद्री और पितरः - स्वधा आदि अन्तरिक्ष स्थानीय प्रजापति हुए। फिर दक्ष (प्रथम) - प्रसुति, रुचि - आकुति और कर्दम- देवहूति नामक भूस्थानीय प्रजापति हुए।
फिर मरीची-सम्भूति, भृगु-ख्याति, अङ्गिरा-स्मृति, वशिष्ट-ऊर्ज्जा, अत्रि-अनसुया, पुलह-क्षमा, पुलस्य-प्रीति, कृतु-सन्तति नामक ब्रह्मर्षि हुए। साथ ही
द्वादश आदित्य और अष्ट वसु के रूप में देवलोक के देवता हुए।
प्रजापति, इन्द्र, द्वादश आदित्य, अष्ट वसु और एकादश रुद्र ये तैंतीस आजानज देवता (जन्मजात देवता) कहलाते हैं।
देवता गण सृष्टि सञ्चालन के प्रशासनिक अधिकारी हैं। ये ईश्वर श्रेणी के देव नहीं हैं।
मानव सदाचार और पञ्च महायज्ञ के द्वारा देवताओं की उन्नति करते हैं, और देवताओं की अधिकृत भोग्य सामग्री भोगने के अधिकारी होते हैं।
आकाश, वायु, अग्नि, जल भूमि ये पञ्च महाभूत प्राकृतिक देवता वैराज देव कहलाते हैं।
दस्र और नासत्य नामक दो अश्विनी कुमार तथा उन्चास मरुद्गण कर्म से देवपद प्राप्त करने वाले कर्मदेव कहलाते हैं।
अब भारत के बाहर के धर्म संस्कृतियों के देवता देखते हैं।
एशिया महाद्वीप में मेसोपोटामिया अर्थात दक्षिण पूर्वी टर्की की मितानिन (वैदिक) संस्कृति,
दक्षिणी और मध्य टर्की की चन्द्रवंशियों की खत्ती या हित्ती संस्कृति,
युफ्रेटस घाटी की युरोपास- ड्युरा संस्कृति, डोरीक संस्कृति, आयोनिक संस्कृति , इलियन संस्कृति,
उत्तरी सीरिया की नागवंशी सुमेरियाई (सूर) संस्कृति,
इराक की अश्शुर की असीरियाई संस्कृति, और बेबिलोन की बालधर्म की संस्कृति,
आर्मिया की अरामियन संस्कृति, इब्राहीम का सबाइन धर्म,
सऊदी अरब की मक्का की संस्कृति, यमन की संस्कृति, अमिरात की एमोराइट्स संस्कृति,
इज्राइल के आसपास की कनानी संस्कृति,
लेबनान की फोनीशियन संस्कृति, सिनाई की पेट्रा की एडोमाइट तवीलीन (एदोमियों) और नाबातियन की दुशारा देव और अल- उज़्ज़ा देवी, अल्लाट देवी ,और मनुतु (मनात) देवी, अल्लाह, एल देव और, वृषभ स्वरूप बाल (सम्भवतः नन्दी) को पूजते थे।
यूरोप की युनान और क्रीट की शाक्त संस्कृति,
सर्बिया की लेपेन्स्की वीर संस्कृति (डेन्युब नदी की दानवी संस्कृति),
प्राग (चेकोस्लोवाकिया) से जर्मनी और इंगलेण्ड, आयरलेण्ड तक और बादमें टर्की तक फैली सेल्ट संस्कृति, रोमन संस्कृति,
अफ्रीका महाद्वीप में मिश्र की संस्कृति,
उत्तर अमेरिका और मध्य अमेरिका महाद्वीप में मेक्सिको की एज़्टेक सभ्यता में क्वेट्ज़ाल्कोट्ल पंख वाला सर्प देवता, हुइत्जिलोपोच्टिलि (दक्षिण की हमिंग चिड़िया) और टेज़्काट्लिपोक (धुँए वाला दर्पण) का देवता प्रमुख थे,
दक्षिण पूर्वी मेक्सिको, ग्वाटेमाला और बेलीज, हाण्डुरास, और पश्चिमी एल साल्वे डोर की माया सभ्यता के इत्जाम्ना सृष्टिकर्ता देवता थे। सूर्य देवता की उपासना भी करते थे। स्वर्ग में तेरह स्तर बीच में मृत्यु लोक और अधो लोकों के नौ स्तर थे।
इक्वाडोर, पेरु और चीली की इंकान सभ्यता में हुआकास या वाका समुदाय से सम्बन्धित थे और पचमामा पर प्रभुत्व स्थापित किया था। इंति और उनके सूर्य देवता की पूजा करते थे। राजा को सूर्य पुत्र मानते थे।
दक्षिणी अमेरिका में बोलिविया की संस्कृति।
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