यही स्थिति बारह राशियों की भी है।
गलती वराहमिहिर के समय हुई कि, क्रान्तिवृत में या विषुव वृत में तीस-तीस अंश की सायन प्रधि को राशि मान लिया गया। और तीस-तीस अंश की राशियों में नक्षत्रों को समायोजित करने के लिए 800'- 800' कला (13°20') के नक्षत्र बना दिये गए।
मूलतः न राशियाँ एक समान 30° भोगांश की है न ही वैदिक नक्षत्र 800'- 800' कला (13°20') के थे।
इसलिए इस नये राशि नक्षत्र का कोई स्वभाव मानने का कोई आधार नहीं है। चित्रा नक्षत्र तो मात्र 01° से भी कम क्षेत्र का है।
इस लिए नक्षत्र चरण यानी नवांश और कृष्ण मुर्ति पद्धति के उप नक्षत्र (सब लॉर्ड) और उप-उप नक्षत्र (सब सब लॉर्ड) भी बेमतलब हैं।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें