शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2025

हनुमान जी हिमालय के महाशय पर्वत शिखर उखाड़कर सञ्जीव करणी बुटी आदि चार बुटियाँ दो बार लाये और वापस रख आये।

*यह वर्णन वाल्मीकि रामायण/ युद्ध काण्ड/ सर्ग 74 में है। श्लोक 67 और वाल्मीकि रामायण/ लङ्का काण्ड/ सर्ग 101 के आधार पर लिखा गया है।*

मेघनाद ने ब्रह्मास्त्र चला कर एक-एक कर पूरी सेना को घायल कर दिया।
केवल हनुमान जी जैसे कुछेक लोग ही सुरक्षित रह गये।
मेघनाद के ब्रह्मास्त्र की विशेषता थी कि, वह  बम के समान न होकर मशीनगन के समान था जो एक साथ सबको घायल नहीं कर पाता था। बल्कि मध्याह्न से रात के प्रथम प्रहर तक सक्रिय रहा।
दुसरा यह कि, वह सामने पड़ने पर ही वार करता था। एक-एक को अलग-अलग घायल करता था। 
इस ब्रह्मास्त्र से श्री रामचन्द्र जी, लक्ष्मण जी पहले ही घायल हो गए थे।
जाम्बवन्त जी भी घायल पड़े थे, तब उन्हें विभिषण जी मिलने गये, तब उन्होंने हनुमानजी को बुलाया और उन्हें हिमालय पर्वत पर महाशय पर्वत का पता बतलाया। वहाँ अत्यन्त चमकदार चार बुटियों विशल्यकरणी, सञ्जीव करणी,  सावर्ण्य करणी और सन्धानी बुटी का परिचय दिया।
हनुमान जी ने जो छलांग लगाई वह वाल्मीकि रामायण, किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 67 में वर्णित समुद्र तट पर विन्द्याचल के दक्षिण पश्चिम शिखर से लक्ष्यद्वीप (रावण की लङ्का) के लिए लगाईं गई छलाङ्ग जैसी ही थी। जैसे राकेट उड़ता है, तब भूमि पर जैसा दबाव बनाकर उड़ता है, ठीक वैसा ही प्रभाव हनुमानजी की छलाङ्ग लगाने पर हुआ। जिस पर्वत शिखर से उछले वह धँस गया। हनुमान जी के वेग से आसपास खड़े वानर भी उड़ गए।
जब हनुमान जी हिमालय पर पहूँचे तो उन्होंने ब्रह्माजी (सम्भवतः प्रजापति), इन्द्र, वरुणादि आदित्यों, वसुओं, रुद्र शंकर जी और कुबेर को देखा। कैलाश पर्वत देखा।
फिर महाशय पर्वत पर चमकती हुई चारों बुटियाँ दिखी। लेकिन जैसे ही नीचे उतरे वे अदृष्य हो गई। सम्भवतः कोण बदलने से उनका चमकीला पन नही दिखता होगा; इसलिए हनुमान जी उस पर्वत शिखर को ही उखाड़ कर दोनों हथेलियों पर रखकर शीघ्र ही लौट आये। न तो कोई कालनेमी मिला, न कालनेमी ने सभी बुटियों को दीपक  जैसा चमकदार बनाया, बल्कि नीचे उतरने पर कोण बदल जाने पर तो उनकी चमक ही गायब हो जाने के कारण हनुमान जी को पहचानने में भ्रम हुआ तो वे पर्वत शिखर ही उखाड़ लाये।
यह वर्णन वाल्मीकि रामायण/ युद्ध काण्ड/ सर्ग 74 में है। श्लोक 67 में पर्वत शिखर उखाड़ लाना बतलाया है साथ ही श्लोक 77 में वही पर्वत शिखर महाशय पर्वत पर वापस रख आने का वर्णन है।
शल्य विकर्णी बुटी को सुंघाने से शरीर में अन्दर तक धँसे हुए अस्त्र (शायद नुकीले छर्रे जैसे कुछ होंगे) अपने आप बाहर निकल गये, सञ्जीवक बुटी से घाव तुरन्त ठीक हो गये। सावर्ण्य करणी बुटी से त्वचा ठीक पूर्वत हो गई।

वाल्मीकि रामायण/ लङ्का काण्ड/ सर्ग 101 में रावण विभिषण जी पर बर्छी (शक्ति) चलाता है, लक्ष्मण जी विभिषण जी को हटा कर स्वयम् वह बर्छी सीने पर झेल लेते हैं। और घायल हो मुर्छित हो जाते हैं, तब श्लोक 30 में सुषेण हनुमान जी को जाम्बवन्त जी द्वारा पहले बतलाये गए महाशय पर्वत पर जाकर विशल्यकरणी, सञ्जीव करणी, सावर्ण्य करणी और सन्धानी बुटी वापस लाने का कहते हैं। तब भी हनुमान जी पूर्ववत उछल कर गये और श्लोक 38 के अनुसार हनुमान जी ने  पर्वत शिखर को हिलाकर उखाड़कर पूर्ववत ही दोनों हथेलियों पर रखकर वापस ले आये। श्री रामचन्द्र जी ने लक्ष्मण के शरीर से बरछी पहले ही निकाल दी थी, सुषेण जी ने बुटियाँ सुंघाकर तुरन्त घाव अच्छे कर दिए।
इस यात्रा में भी न कालनेमी मिला न भरत जी का तीर लगा, न हनुमानजी लङ्गड़े हुए।

इस प्रकरण में एक कुछ बातें और भी स्पष्ट होती है।

1 जो पर्वत शिखर उखाड़ कर लाये थे वह दोनों हथेलियों पर रखा जा सकता था अर्थात अधिकतम एक वर्ग मीटर आधार वाला था।

2 हनुमान जी का उछलने (न कि, उड़ने) का वर्णन ठीक वैसा है जैसे राकेट लांच होता है।  किष्किन्धा काण्ड सर्ग 67 में विन्द्याचल के दक्षिण पश्चिम शिखर से रावण की लङ्का तक की छलाङ्ग  लगाने का वर्णन भी ठीक इसी प्रकार का है ।

3 पहली बार हनुमान जी महोदय पर्वत शिखर वापस रख आएं थे, ऐसे ही सम्भवतः दुसरी बार भी वापस रख आये होंगे। क्योंकि हिमालय की इतनी उपयोगी जड़ी बूटी को दक्षिण की इतनी गर्मी और समुद्री हवाओं में निश्चित ही खराब हो जाती।

4 हनुमानजी को कालनेमी द्वारा भ्रमित करने और सभी बुकियों को चमकीला बनाने की कहानी मन गड़न्त है। ऐसे ही लौटते समय भरत जी के बाण से घायल होकर लङ्गड़े होने की कहानी भी मन गड़न्त ही है।

5 प्रजापति, इन्द्र, द्वादश आदित्य, अष्ट वसु, शंकर जी सहित एकादश रुद्र इन तैंतीस देवताओं की सभा (स्वर्ग) हिमालय पर कैलाश पर्वत के आस-पास ही है। 

6 सुमेरु के चारो ओर पूर्व में इन्द्र की अमरावती पुरी, पश्चिम में वरुण की वारुणी पुरी, उत्तर में कुबेर की अलका पुरी और दक्षिण में यम की संयमनी पुरी हिमालय पर कैलाश शिखर के आस-पास ही कहीं है।

7 बाल काण्ड, सर्ग 48 में गोतम ऋषि की पत्नी अहिल्या का जार इन्द्र इसी हिमालय की अलका पुरी से आया था।

गुरुवार, 23 अक्टूबर 2025

सेकुलर हिन्दू

जैन, बौद्धों, खालसाओं तथा लिङ्गायतों को हमारे मुर्ख नेताओं की शिक्षा के कारण हम सनातन धर्मी अपना बन्धु, और हिन्दू मानते और कहते हैं।
जबकि वे अपने मत पन्थ सम्प्रदाय के विषय में खुलेआम कहते हैं कि,
हम हिन्दू नहीं हैं।
म्यांमार और श्री लङ्का के थेरवादी बौद्ध भिक्षुओं के शिष्य भीमराव राणाजी सपकाल (अम्बेडकर) के द्वारा स्थापित नव बौद्ध सम्प्रदाय के अनुयाइयों की बाइस प्रतिज्ञाओं की जानकारी तो हो ही गई।
जैन मुर्तियों और चित्रों में भगवान विष्णु, ब्रह्मा जी और शंकर जी जैन तीर्थंकरों पर चँलर डुलाते दिखाये जाते हैं।
रावण को अपना तीर्थंकर मानते हैं और उनकी रामचरिउ के अनुसार भगवान श्री रामचन्द्र जी और भगवान श्रीकृष्ण जी को सिन्हा करने के कारण नर्कवास मिला था।
बादमें जैन दीक्षा लेने पर उनका उद्धार हुआ।
आनन्दपुर साहब घोषणा के अनुसार खालसा पन्थ की स्थापना के साथ ही खालसा स्वयम् को हिन्दू नहीं मानते हैं। महाराज रणजीत सिंह जी की दृष्टि में हिन्दू मुस्लिम और वेद तथा कुरान समान आदरणीय ग्रन्थ थे।

लिङ्गायत पनृथ के संस्थापक का जन्म ब्राह्मण परिवार में ही हुआ था। लेकिन उन्होंने अपने उपदेशों में सदेव ब्राह्मणों के अछूत और सनातन धर्म के देवी-देवताओं के प्रति अपमान जनक बातें ही की।
वे लिङ्ग पूजक है और वीर शैव दर्वन को मानते हैं तथा केदारनाथ को तीर्थ मानते हें इसलिए सनातनी उन्हें शैव समझते हैं ‌
जबकि शंकरजी को भी गालियाँ देते हैं।

बुधवार, 22 अक्टूबर 2025

भगवान श्रीकृष्ण ने बाढ़ग्रस्त ब्रजवासियों को गोवर्धन पर्वत पर ग्वालबालों द्वारा निर्मित झोपड़ियों और वृक्षों पर बने मचानों पर सुरक्षित रखा था, न कि, पर्वत उखाड़कर वापर मैदान में सात दिन खड़े रखा था।

सामान्य तर्क है कि, यदि अत्यधिक वर्षा हो रही हो,  मकान टूट कर बह रहे हों तो आप निकटतम उँचे स्थान अर्थात टीले की ओर जाएँगे? 
या
किसी गुफा में छुपेँगे? गुफा में भी पानी भरने का खतरा रहता है।

ध्यान रखें ---
ग्वाल-बाल सदेव उँचे चरागाहों में अत्यधिक ठण्ड, गर्मी और तेज वर्षा ओला वृष्टि आदि से बचाव हेतु प्रायः झोपड़ियाँ, और वृक्षों पर मचान बनाकर रखते हैं। जहाँ से एक ही स्थान से आस-पास विचर रहे जंगली पशुओं का भी ध्यान रख कर अपने पशुओं की रक्षा करते हुए गाय-बेलों, साण्डों को सुरक्षित चरा सकें और अपने पशुओं पर भी दृष्टि रख सकें ताकि, पशु गुम नहीं जाए।

जब गांव में भयंकर बाढ़ आ जाती है, तब पर्वतीय उँचाई पर बनी झोपड़ियाँ और मचान ही सबसे सुरक्षित शरण स्थल होते हैं।
यदि आप काल्पनिक चमत्कारों के बजाय बुद्धि कौशल के समर्थक हैं तो आप मेरा आशय समझ सकते हैं।

योग कर्मसु कौशलम् समझाने वाले जगद्गुरु श्रीकृष्ण; जरासंध के बारम्बार आक्रमण से बचाव हेतु योजना बद्ध तरीके से पहले से ही राजधानी मथुरा से सुदूर द्वारका में बसाकर मथुरा वासियों को सुरक्षित करदेने वाले श्रीकृष्ण; अपने बुद्धि कौशल से बिना लड़े ही कालनेमी को महाराज मुचकन्द की दृष्टि में लाकर नष्ट करवा देने वाले चतुर शिरोमणि भगवान श्रीकृष्ण; अपने बुद्धि कौशल के बल पर भीम के हाथों जरासंध के दो टुकड़े करवा देने वाले बुद्धिमान भगवान श्रीकृष्ण बाढ़ग्रस्त ब्रजवासियों को गोवर्धन पर्वत उखाड़कर उसकी छतरी के नीचे सात दिन रात खड़े रहने को विवश करने का चमत्कार दिखलाएँगे, या ऐसा उपाय सुझाएँगे कि, गोवर्धन पर्वत पर बनी झोपड़ियों में, मचानों में ब्रजवासी पानी से भी सुरक्षित रह पाएँ और जीव-जन्तुओं से भी सुरक्षित रह पाएँ? और जो भविष्य में भी सबके लिए उपयोगी हो सके ऐसा उपाय बतलाएँगे?
या 
क्या भगवान योगेश्वर श्रीकृष्ण केवल चमत्कार बतलाने के लिए, केवल सिर गीला होने से बचाकर वापस बाढ़ में बहने का खतरा उत्पन्न कर ब्रज वासियों के सुरक्षा कवच गोवर्धन को भूमि से उखाड़कर, कर सपाट मैदान में खड़ा करके गोवर्धन पर्वत की छतरी बनाकर उस छतरी के नीचे सात दिन तक खड़ा रखेंगे?
सोचो बुद्धिमान सनातनियों बनकर बुद्धु बनकर बौद्धों द्वारा गलत समझाये गये चमत्करों के चक्कर में योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण को जादुगर समझने की भूल मत करो।
इतिहास-पुराणों विकृत कर मतान्तरण की गहरी चाल समझो। प्राचीन पुराणों में कांट-छांट कर बनाइ गई अप्राकृतिक और असामान्य चमत्कारी घटनाओं के पीछे छुपी वास्तविक घटनाओं को समझों और समझाओ, ताकि, विधर्मियों के तर्कों का समुचित उत्तर न दे पाने के कारण उनके सामने शीष झुकाकर पराजय स्वीकार न करना पड़े। और परिणाम स्वरूप उनका मत स्वीकार न करना पड़े।
किसी वैज्ञानिक स्तर के सिविल इञ्जिनियर से गणना करना कर देखें कि;
ब्रज क्षेत्र में किसी एक किलोमीटर व्यास वाले गुम्मदाकार पर्वत का कम से कम भार कितना होगा?
इतने भारी पर्वत को बिना क्षति पहूँचाए भूतल से उखाड़ने के लिए कितना बल लगेगा?
फिर उस पर्वत के आधार वृत्त के केन्द्र तक पहूँच कर एक ही छड़ पर टिकाने, और टिकाए रखने का सन्तुलन बनाना और फिर पर्वत को बिना क्षरण के लगभग एक सप्ताह तक ऐसे ही टिकाए रखने हेतु सन्तुलन बनाए रखने के लिए कितना बल लगेगा?
फिर एक सप्ताह बाद उसके केन्द्र से सुरक्षित निकलने के लिए उसका एक सिरा झुकाकर, भूमि से टिकाकर धीरे धीरे आधा किलोमीटर चलकर सुरक्षित बाहर आने के लिए कितना बल लगेगा?
क्या ऐसा कर पाना सम्भव है भी?
ध्यान रखें गोवर्धन पर्वत के धरातल का व्यास लगभग आठ किलोमीटर है।

रविवार, 19 अक्टूबर 2025

क्या नगरीय करण के स्थान पर पुनः स्थानीय कार्यस्थल बनना सम्भव है ?

भविष्य में नगरीय करण असफल हो जाएगा या विवश होकर ग्रह उद्योग, कुटिर उद्योग और लघु उद्योग में कल-पुर्जे निर्मित कर बड़े कारखाने में असेम्बल कर ट्राँस्पोर्टरट के माध्यम से लाजिस्टिक हब तक पहूँचाकर वितरण व्यवस्था किसी सेन्ट्रल ऑफिस से की जाएगी।

आई.टी.कम्पनियों को भी वर्क फ्रॉम होम चालू करना ही पड़ेगा। अन्यथा अधिक वेतन की माँग जोर पकड़ेगी।

प्राचीन भारतीय व्यवस्था अति श्रेष्ठ थी। सौनार, लौहार, सुतार, ताम्बे-पीतल के बर्तन बनाने वाले ठठेरा, मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्हार, रुईं धुनकर गादी- तकिये, रजाई भरने और सूत कातने वाले पिञ्जारे, कपड़े बुनने वाले तन्तुवाय (जुलाहे), बाँस के कारिगर गाँछे जैसे विश्वकर्माओं के घर के आगे उसका कार्यस्थल (वर्कशॉप) होता था, बच्चे और बहुएँ तक हाथ बंटाते हुए प्रशिक्षित हो जाते थे।
व्यापारी के घर के आगे दुकान होती थी घर वाले भी दुकान सम्भाल लेते थे।
केवल किसानों और ईंट निर्माता कुम्हारों को ही गांव से सटे हुए लेकिन बाहर काम करने जाना पड़ता था 
और पचास वर्ष से अधिक अवस्था के विद्वान गाँव के निकट लेकिन गांव से बिल्कुल अलग रहकर गुरुकुल चलाते थे।
कोई बे रोजगार नहीं रहता था। 
केवल उच्च शिक्षा हेतु विद्यार्थियों और व्यापारियों को लम्बी यात्राएँ करना पड़ती थी।

शनिवार, 18 अक्टूबर 2025

दक्ष-प्रसुति रुचि-आकुति और कर्दम-देवहुति प्रजापतियों का क्षेत्र और स्वायम्भुव मनु-शतरूपा का क्षेत्र।

तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान, किर्गिस्तान, पाकिस्तान,  जम्मू कश्मीर, लद्दाख, नेपाल, भूटान, तिब्बत, हिमाचल प्रदेश, पञ्जाब, हरियाणा, पश्चिम उत्तर प्रदेश, उत्तरी राजस्थान तथा उत्तरी मध्य प्रदेश (चम्बल,ग्वालियर सम्भाग) वाले क्षेत्र में दक्ष-प्रसुति, रुचि-आकुति और कर्दम-देवहुति का क्षेत्र था। यहाँ पञ्चायती राज व्यवस्था थी

पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, मध्य भारत और गुजरात स्वायम्भुव मनु-शतरूपा का शासन क्षेत्र था।

ताजिकिस्तान, कश्मीर, पञ्जाब, और हरियाणा के निवासी गोड़ कहलाते थे। हरियाणा में कुरुक्षेत्र के आस-पास का क्षेत्र गोड़ जिला और मालव क्षेत्र कहलाता है। कुरुक्षेत्र पहले धर्म का क्षेत्र था।

विष्णु से लेकर प्रजापति तक किसी भी देव- देवता का कोई आवास स्थान नहीं है।

विष्णु मतलब सर्वव्यापी। सर्वव्यापी है तो एकदेशीय; हो एक ही स्थान पर रहे यह तो सम्भव ही नहीं है। यहाँ सिर है वहाँ पेर है,ऐसा भी नहीं है। वे तो हर समय सभी जगह एक समान रूप से रहते हैं। इसलिए विष्णु लोक नामक कोई स्थान नहीं है। 
भु भव मतलब होना। प्रभव मतलब हुआ। प्रभविष्णु और सवितृ मतलब जिससे सृष्टि हुई। जिससे सृजन हुआ। 
सवितृ मतलब जो प्रसवित हुआ। जिससे सृष्टि उत्पन्न हुई। जिसने सृष्टि उत्पन्न की।
सावित्री मन्त्र का देवता इन्हें ही माना गया है।
वैसे इसमें विवाद भी है कि, भर्गो देवस्य धीमहि है, अर्थात ध्यान तो भर्ग देव का किया जा रहा है तो तत् सवितुः वरेण्यम के आधार पर मन्त्र का देवता सवितृ को क्यों मानें।
इसका सीधा-सा उत्तर है कि, यह नियम है कि, जिस सूक्त या जिस मन्त्र में पहले जो नाम आता है, उसे ही सूक्त या मन्त्र का देवता माना जाता है।
अज्ञान नाशक ज्ञान स्वरूप भर्ग किसी देवता नाम नहीं बल्कि सवितृ का विशेषण है। भर्ग शब्द गुण सूचक है संज्ञा नहीं है। छन्दस अर्थात वैदिक संस्कृत में आकारान्त पूर्लिङ्ग शब्द नहीं होता है। जैसे राजन का हिन्दी में राजा, मातृ-पितृ का हिन्दी में माता-पिता हो जाता है, वैसे ही सवितृ का सविता हो जाता है। लेकिन जैसे पञ्चतन्त्र में लौकिक संस्कृत में 
"उदये सविता रक्तो रक्तश्चस्तमये तथा।
सम्पतौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता॥" 
में जहाँ सविता आया है, वहाँ उसे स्त्रीलिङ्ग माना जाता है। इसी कारण नारियों के नाम सविता देखे जाते हैं।
इस लिए प्रभविष्णु प्रकाश स्वरूप देव सवितृ हैं सृष्टि के सृजेता हैं।
जब सृष्टि ही नहीं थी, जिसको स्वयम् सृष्टि की प्रसुति हुई। जिसने स्वयम् सृष्टि को प्रसुत किया उसका कोई स्थान/ लोक कहाँ से आयेगा।
मतलब स्पष्ट है कि, प्रभविष्णु विष्णु के समान सर्वव्यापी तो नहीं लेकिन किसी एक स्थान पर ही रहने वाले एकदेशीय भी नहीं है।
विष्णु की तुलना आकाश से और प्रभविष्णु की तुलना सूर्य से होती है।
सृष्टि प्रसुत हो गई तो उस सृष्टि के रूप में नारायण श्रीहरि ही प्रसुत हुए।  वह सम्पूर्ण सृष्टि नारायण ही है। श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 32 में जिस काल के रूप में अर्जुन ने दर्शन किए थे वह स्वरूप नारायण का ही था।
अब बतलाओ क्या वह काल स्वरूप नारायण किस स्थान पर रहता होगा? लेकिन चूंकि वह स्वरूप है, इसलिए सर्वव्यापी भी नहीं है, रूपवान की सीमा होती ही है, तभी तो वह दृष्य है। वह तरङ्गाकार है।
अतः वह सृष्टि या नारायण ध्रुव तारे के आस-पास लघु सप्तर्षि मण्डल में, या क्षीर सागर में तो नहीं रह सकता। यह तो निश्चित है।😃
उस सृष्टि के केन्द्र या नारायण की नाभि से हिरण्यगर्भ (पञ्चमुख) ब्रह्मा हुएजिन्होंने त्वष्टा के रूप में ब्रह्माण्ड को गढ़ा; सुतार के समान ब्रह्माण्ड के गोलों को घड़ा। अतः हिरण्यगर्भ को भी रहने के लिए कोई स्थान विशेष नहीं था। मतलब हिरण्यगर्भ ब्रह्मा तक किसी भी देव का कोई निवास स्थान नहीं है।हिरण्यगर्भ ब्रह्मा स्वयम् अण्डाकार स्वरूप है। उपर एक सिरा उभरा हुआ होने से पञ्च मुखी कहलाते हैं।
हिरण्यगर्भ ब्रह्मा से प्रजापति ब्रह्मा हुए। ये स्वयम् ब्रह्माण्ड ही हैं। ये भी अण्डाकार ही थे, लेकिन ब्रह्माण्ड का रूप बदलता रहता है,निश्चित रूप नहीं है, इसलिए इन्हें पञ्च मुखी से चतुर्मुखी होना मान लिया गया। ये प्रजापति विश्वरूप हैं।
हिरण्यगर्भ से महारुद्र, सनक, सनन्दन, सनत्कुमार, सनातन और नारद भी हुए।
(पौराणिक कथा है कि, रुद्र ने ब्रह्मा का पाँचवा सिर काट दिया था।)
फिर भी जो स्वयम् ब्रह्माण्ड स्वरूप हो, वह कहाँ रहेगा? मतलब सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही प्रजापति है।

फिर इनका लोक क्यों कहलाता है? इस प्रश्न के उत्तर के लिए लोक का अर्थ समझना होगा।
जहाँ आलोक (प्रकाश) हो, वह लोक कहलाता है। जैसे हमारे सूर्य मार्तण्ड से प्रकाशित समस्त स्थान मृत्यु लोकौ कहलाता है।
इसलिए जहाँ नारायण श्रीहरि का आलोक फैला है, वह पूरी सृष्टि नारायण का लोक, जहाँ हिरण्यगर्भ ब्रह्मा का आलोक फैला है, मतलब समस्त ब्रह्माण्ड वह ब्रह्म लोक, जहाँ प्रजापति का आलोक फैला है वह सत्य लोक कहलाता है।

रहने के लिए ब्रह्माण्ड में बहुत से गोले सृजित हो चुके थे। मतलब प्रजापति ब्रह्मा के द्वारा उत्पन्न प्रजा के निवास के लिए पर्याप्त आवास स्थल हो गये थे। आवास प्रबन्ध हो चुका था इसलिए पहली बार निवासियों के रूप में प्रजापति ने प्रजा का सृजन किया।

भूमि के प्रजापति दक्ष-प्रसुति, रुचि-आकुति, कर्दम-देवहुति, और स्वायम्भुव मनु-शतरूपा हुए। इन्होंने मैथुनिक प्रजा की सृष्टि की। समस्त जीव-जन्तु, वनस्पति, जड़-चेतन योनियाँ इनकी ही सन्तान है।
अन्तरिक्ष के प्रजापति एकादश रुद्र- रौद्रियाँ है, और सप्त पितरः-स्वधा हैं।
स्वर्ग के प्रजापति इन्द्र-शचि, अग्नि -स्वाहा, धर्म और उनकी तेरह पत्नियाँ है।

वेदिक अहोरात्र, मास, ऋतु ,अयन एवम् तोयन तथा संवत्सर चक्रकीय कालगणना के आधार पर भारतीय मौसम विज्ञान

*वेदिक अहोरात्र, मास, ऋतु ,अयन एवम्  तोयन तथा संवत्सर चक्रकीय कालगणना के आधार पर भारतीय मौसम विज्ञान*

वेदिक काल में अयन, तोयन, ऋतुओं, मासों और दिवसों में संवत्सर के विभाग किये गये। 
सुर्य, चन्द्रमा के उदय, अस्त, ग्रहण, दिनमान, रात्रिमान  तथा बुध और शुक्र के पारगमन,व्यतिपात, वैधृतिपात, अलावा बुध,शुक्र,मंगल,ब्रहस्पति और शनि ग्रहों की परस्पर युति, प्रतियोग, दर्शन, लोप, उदय, अस्त, अगस्त तारा उदयास्त ,धुमकेतु दर्शन लोप  से मोसम का सम्बन्ध का अध्ययन गुरुकुलों में कराया जाता था। उक्त सभी  सायन गणना से सिद्ध होते हैं।

इनके साथ नाक्षत्रिय पद्यति / निरयन गणनानुसार आकाश में ताराओं के दर्शन और उनके साथ ग्रहों आदि की युति प्रतियोग, दृष्टि आदि से भी मोसम का सम्बन्ध अध्ययन कराया जाता था।
और आकाश का रंग, सुर्य चन्द्रादि बिम्बों के आसपास बने मण्डल,द्वितीया के चन्द्रमा का उत्तर- दक्षिण में झुकाव का वायु की दिशा, गति, वेग,तथा बादलों के गर्भ, बादलों कारंग-रुप, आकार-प्रकार, उँचाई, गमन, दिशा आदि पर भी सतत ध्यान रखकर इनसे भी मोसम का सम्बन्ध अध्ययन कराया जाता था। 
मोसम को भारतीय पर्वोत्सव से सायन सौर, निरयन सौर एवम् निरयन सौर संस्कृत चान्द्र गणना द्वारा मोसम को सम्बद्ध किया गया था।

इनके अलावा मानवों, पशु-पक्षियों, कीट- पतङ्गों के व्यवहार और व्यवहार परिवर्तनों पर भी ध्यान रखना सिखाया जाता था।
इन सबके आधार पर मोसम की भविष्यवाणी करने के विज्ञान को उपवेद त्रीस्कन्ध ज्योतिष के संहिता स्कन्ध में सिखाया जाता था।

 *घटि, पल विपल* 
साव विपल का एक पल, साठ विपल का एक पल और 3600 विपल अर्थात साठ पल की एक घटि।और साठ घटि का एक अहोरात्र जिसे सावन दिन भी कहते हैं।
दो घटि का एक मुहुर्त होता है। तदनुसार तीस मुहुर्त का एक अहोरात्र (सावन दिन) और तीस सावन दिन का एक सावन मास होता है।

*वेदिक मास,ऋतु ,अयन एवम् तोयन, संवत्सर चक्र* 

 *वेदिक मास --* 

(सुचना -- विगत हजारों वर्षों से कलियुग संवत 5071 के तपस्य मास के अन्त तक  अर्थात 20 मार्च 1971ई. तक ग्रेगोरियन केलेण्डर के अनुसार आरम्भ अगले दिनांक Next dates से आरम्भ होते थे। जैसे  मधुमास 22 मार्च से आरम्भ होता था।) 

वेदिक मास अवधि  निम्नानुसार -  ग्रेगोरियन केलेण्डर के अनुसार आरम्भ की Dates दी जा रही है।
ये Dates ईसवी वर्ष 1972 से लागु होकर आगामी कई हजारों वर्ष तक लगभग यथावत रहेगी।

मधु मास 21 मार्च से 31 दिन। सुर्य की राशि  सायन मेष ।
माधव मास 21 अप्रेल से31 दिन। सुर्य की राशि सायन वृष।
शुक्र मास 22 मई से 31 दिन। सुर्य की राशि  सायन मिथुन।
शचि मास 22 जून से 31दिन। सुर्य की राशि  सायन कर्क।
नभस मास 23 जुलाई से 31दिन। सुर्य की राशि  सायन सिंह।
नभस्य मास 23 अगस्त 31दिन। सुर्य की राशि  सायन कन्या।
ईष मास 23 सितम्बर से 30दिन। सुर्य की राशि सायन तुला।
उर्ज मास 23 अक्टूबर से 30दिन। सुर्य की राशि सायन वृश्चिक।
सहस मास 22 नवम्बर से 30दिन। सुर्य की राशि सायन धनु।
सहस्य मास 22 दिसम्बर से 29 दिन। सुर्य की राशि  सायन मकर।
तपस मास 20 जनवरी से 30 दिन। सुर्य की राशि  सायन कुम्भ।
तपस्य मास 19 फरवरी से 30 या 31 दिन। सुर्य की राशि   सायन मीन।

 *वेदिक ऋतु चक्र* 

ऋग्वेद में मुख्य रुप से पाँच ऋतुओं के ही नाम आये हैं हेमन्त ऋतु का नाम नही आया है। और अधिक मास की छटी ऋतु कहा गया है।
किन्तु यजुर्वेद में छः ऋतुएँ और उनके नाम और अवधि की धारणा स्पष्ट है।
तदनुसार

 *वेदिक उत्तरायण में तीन ऋतुएँ होती है।* 

 *वेदिक वसन्त ऋतु -* 

वेदिक मधु एवम्  माधव मास की वेदिक वसन्त ऋतु  होती थी।21 मार्च से  22 मई तक।
वेदिक मधु मास सायन मेष का सुर्य दिनांक 21 मार्च से 20 अप्रेल तक।
तथा वेदिक माधव मास सायन वृष का सुर्य  21 अप्रेल से 21 मई तक में वेदिक वसन्त ऋतु होती थी। 

 *वेदिक ग्रीष्म ऋतु -* 

वेदिक शुक्र एवम्  शचि मास की वेदिक ग्रीष्म ऋतु  होती थी। 22 मई से 22 जुलाई तक।
वेदिक शुक्र मास सायन मिथुन का सुर्य 22 मई से 21 जून तक
तथा वेदिक शचि मास सायन कर्क के सुर्य  22 जून से 22 जुलाई तक वेदिक ग्रीष्म ऋतु होती थी ।

 *वेदिक वर्षा ऋतु -* 

वेदिक नभस एवम् नभस्य मास  की वेदिक वर्षा ऋतु  होती थी।23 जुलाई से 22 सितम्बर तक।
वेदिक नभस मास सायन  सिंह  का सुर्य दिनांक 23 जुलाई से 22 अगस्त तक 
तथा वेदिक नभस्य मास सायन कन्या का सुर्य 23 अगस्त से 22 सितम्बर तक में वेदिक वर्षा ऋतु होती थी।

तथा *वेदिक दक्षिणायन में तीन ऋतुएँ होती है।

 *वेदिक शरद ऋतु -* 

वेदिक ईष एवम् उर्ज मास की वेदिक शरद ऋतु  होती थी। 23 सितम्बर से 21 नवम्बर तक।
वेदिक ईष मास सायन तुला का सुर्य 23 सितम्बर से 22 अक्टूबर तक 
तथा वेदिक उर्ज मास सायन वृश्चिक का सुर्य 23 अक्टूबर से 21 नवम्बर तक में वेदिक शरद ऋतु होती थी।

 *वेदिक हेमन्त ऋतु -* 

वेदिक सहस एवम् सहस्य मास की वेदिक हेमन्त ऋतु होती थी। 22 नवम्बर से 19 जनवरी तक।
वेदिक सहस मास सायन धनु का सुर्य  22 नवम्बर से 21 दिसम्बर तक
तथा वेदिक सहस्य मास सायन मकर का सुर्य 22 दिसम्बर से 19 जनवरी तक वेदिक हेमन्त ऋतु होती थी।

 *वेदिक शिशिर ऋतु -* 

वेदिक तपस मास एवम् तपस्य मास की वेदिक शिशिर ऋतु होती थी। 20 जनवरी से 20 मार्च तक।
वेदिक तपस मास सायन कुम्भ का सुर्य 20 जनवरी से 18 फरवरी तक
तथा वेदिक तपस्य मास मीन का सुर्य 19 फरवरी से 20 मार्च  तक वेदिक शिषिर ऋतु होती थी।
 

 *वेदिक अयन और वेदिक तोयन* 

 *वेदिक काल में संवत्सर को उत्तरायण  मधु मासारम्भ से से नभस्य मासान्त तक* छः मास का होता था । अर्थात-
 *सायन मेष संक्रान्ति से सायन तुला संक्रान्ति  तक।* 
 *दिनांक 21 मार्च से दिनांक 23 सितम्बर तक उत्तरायण होता था।* 
तथा *वेदिक काल में दक्षिणायन  ईष मासारम्भ से तपस्य मासान्त तक* छः माह का होता था।अर्थात - 
 *सायन तुला संक्रान्ति  से सायन मेष संक्रान्ति तक।* 
 *दिनांक 23 सितम्बर से दिनांक 21 मार्च तक दक्षिणायन होता था।* 

 *पौराणिक काल में वेदिक  उत्तरायण* (सायन मेष संक्रान्ति) दिनांक 21 मार्च से दिनांक 23 सितम्बर (सायन तुला संक्रान्ति) तक *को उत्तर गोल कहा जाने लगा।* 
 और  पौराणिक काल में *वेदिक दक्षिणायन* (सायन तुला संक्रान्ति) दिनांक 23 सितम्बर से दिनांक 21 मार्च (सायन मेष संक्रान्ति) तक *को दक्षिण गोल कहा जाने लगा।* 

इसी प्रकार वेदिक काल में संवत्सर के दो विभाग और थे जिन्हे तोयन कहा जाता था।

 *वेदिक काल मेंं उत्तर तोयन  सहस्य मासारम्भ से से शुक्र मासान्त तक* छः माह का होता था।
अर्थात *वेदिक काल में सायन मकर संक्रान्ति दिनांक 22 दिसम्बर  से सायन कर्क संक्रान्ति दिनांक 23 जून तक उत्तर तोयन कहा जाता था।* 

 तथा *वेदिक काल से दक्षिण तोयन  शचि मासारम्भ से सहस मासान्त तक छः मास का होता था।* अर्थात
 *वेदिक काल में सायन कर्क संक्रान्ति दिनांक  23 जून से सायन मकर संक्रान्ति दिनांक 22 दिसम्बर तक दक्षिण तोयन कहा जाता था।* 

 *वेदिक संवत्सर वसन्त विषुव सम्पात से अर्थात सायन मेष संक्रान्ति 20/21 मार्च से आरम्भ होता था।* 

सावन वर्षान्त के बाद के पाँच दिन यज्ञ पुर्वक उत्सव मनाये जाते थे।
आज भी वसन्त पञ्चमी, दशापुजा, होला या होली पर्वोत्सव, तथा गुड़ीपड़वाँ , अक्षय तृतीया इसी के अवशेष हैं।

वैदिक सायन सौर वर्ष देवताओं का एक दिन कहा गया है। वैदिक उत्तरायण देवताओं का दिन एवम् वैदिक दक्षिणायन देवताओं की रात्रि कही गई है।
वैदिक उत्तर तोयन आरम्भ दिवस (या ऋग्वेदोक्त निरयन दिवस) सायन मकर संक्रान्ति देवताओं की मध्यरात्रि होती है और वैदिक दक्षिण तोयन आरम्भ दिवस सायन कर्क संक्रान्ति देवताओं का मध्याह्न होता है।

 *पौराणिक सायन सौर संवत्सर, वेदिक तोयन को अयन नाम देना, वेदिक अयन को गोल नाम देना।और ऋतुओं को एक मास पहले आरम्भ करना। वेदिक मासों को भी एक मास पहले आरम्भ करना।* 

पौराणिक काल से वेदिक उत्तर तोयन दिनांक 22 दिसम्बर से  दिनांक 23 जून तक को उत्तरायण कहा जाने लगा तथा वेदिक दक्षिण तोयन दिनांक  23 जून से दिनांक 22 दिसम्बर तक को   दक्षिणायन कहा जाने लगा।
क्योंकि,शुभ कार्य उत्तरायण में यानि सायन मेष के सुर्य से सायन कन्या के सुर्य तक  21मार्च से 23 सितम्बर तक  में किये जाते थे। किन्तु इसी अवधि में जून से सितम्बर तक वर्षा होती है।
इस कारण पौराणिक काल में धर्मशास्त्रियों ने विकल्प खोजा । और 
सायन मकर के सुर्य से सायन मिथुन के सुर्य  दिनांक 22 दिसम्बर से 23 जून तक उत्तर तोयन को उत्तरायण घोषित कर दिया। तथा - 
सायन कर्क के सुर्य से सायन धनु के सुर्य दिनांक 23 जून से 22 दिसम्बर तक दक्षिण तोयन को दक्षिणायन  घोषित कर दिया।
इससे वर्षाकाल की समस्या हल होगयी। कलियुग का प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।

किन्तु जब वेदिक उत्तर तोयन को पौराणिक उत्तरायण कहा जाने लगा और वेदिक दक्षिण तोयन को पौराणिक दक्षिणायन कहा जाने लगा तो ऋतुओं के आरम्भ माह को एक मास पहले खिसकाना पड़ा। इसके लिये मासों का आरम्भ भी एक माह पहले से करना पड़ा। इसके लिये सावन वर्ष के स्थान पर निरयन सौर वर्ष सें संस्कारित चान्द्र वर्ष लागु किया जिसमें अधिक मास और क्षय मास का लाभ लिया गया। ताकि, प्रजा / जनता समझ नही पाये ।
 किन्तु वसन्त ऋतु का प्रथम मास मधुमास गत संवत्सर में और माधव मास वर्तमान संवत्सर में आने लगा। ऐसे ही पौराणिक उत्तरायण के तीन मास गत संवत्सर गत वर्ष में तो शेष तीन मास वर्तमान संवत्सर में आते है। वेदिक पद्यति में छः मास का वर्ष और दौ वर्ष का एक संवत्सर वाली पद्यति बन्द कर संवत्सर और वर्ष पर्यायवाची मानना पड़े। मधुमास के स्थान पर माधवमास से संवत्सर का आरम्भ  मानना पड़ा।
स्पष्ट ही गोलमाल  दृष्टगोचर हो रहा है।
खेर जो उस अवधि में होगया वह इतिहास तो बदला नही जा सकता पर आगे तो वापस सुधार होना ही चाहिए। 

वर्तमान में प्रचलित मासारम्भ की ग्रेगोरियन केलेण्डर से Dates और अवधि निम्नानुसार है -- 
 *पौराणिक अयन, पौराणिक गोल, पौराणिक ऋतुएँ और पौराणिक मासारम्भ की  Dates .।* 

 *पौराणिक उत्तरायण। पौराणिक दक्षिण गोल। पौराणिक वसन्त ऋतु।* 

मधु मास 19 फरवरी से 30 या 31 दिन। सायन मीन।

 *पौराणिक उत्तरायण। पौराणिक उत्तर गोल आरम्भ। पौराणिक वसन्त ऋतु।* 

माधव मास 21 मार्च से 31 दिन। सायन मेष ।

 *पौराणिक ग्रीष्म ऋतु।* 

शुक्र मास 21 अप्रेल से31 दिन। सायन वृष।
शचि मास 22 मई से 31 दिन। सायन मिथुन।

 *पौराणिक दक्षिणायन आरम्भ। पौराणिक उत्तर गोल। पौराणिक वर्षा ऋतु।* 

नभस मास 22 जून से 31दिन। सायन कर्क।
नभस्य मास 23 जुलाई से 31दिन। सायन सिंह।

 *पौराणिक दक्षिणायन ।  पौराणिक उत्तर गोल । पोराणिक शरद ऋतु।* 
ईष मास 23 अगस्त 31दिन। सायन कन्या।

 *पौराणिक दक्षिणायन। पौराणिक दक्षिण गोल आरम्भ। शरद ऋतु* 

उर्ज मास 23 सितम्बर से 30दिन। सायन तुला।

 *पौराणिक हेमन्त ऋतु।* 

सहस मास 23 अक्टूबर से 30दिन। सायन वृश्चिक।
सहस्य मास 22 नवम्बर से 30दिन। सायन धनु।

 *पौराणिक उत्तरायण आरम्भ। पौराणिक दक्षिण गोल।.पौराणिक शिषिर ऋतु।* 

तपस मास 22 दिसम्बर से 29 दिन। सायन मकर।
तपस्य मास 20 जनवरी से 30 दिन। सायन कुम्भ।

 *पौराणिक उत्तरायण। पौराणिक दक्षिण गोल। पौराणिक वसन्त ऋतु।* 

मधु मास 19 फरवरी से 30 या 31 दिन। सायन मीन।


 *संवत्सर, अयन,तोयन, ऋतुओं और मासों के लिए  वेदिक काल में सायन सौर गणना ही प्रयुक्त होती थी।* 
किन्तु *आकाशीय विवरण के लिए वेदिक काल में नाक्षत्रिय निरयन गणनाएँ  प्रचलित थी।जैसी की आजतक भी है।* 

सायन गणनानुसार और नाक्षत्रिय निरयन गणनानुसार सौर वर्ष  में लगभग इकहत्तर सायन वर्ष में एक दिन का और 25780 सायन वर्षों में पुरे एक वर्ष का अन्तर पड़ता है। जब सायन सौर युग संवत्सर 25780 होगा तब निरयन सौर युग संवत्सर 25779 होगा।

चुँकि ग्रेगोरियन केलेण्डर सायन सौर गणनाधारित है अतः यही अन्तर ग्रेगोरियन केलेण्डर ईयर में भी लागु होता है। इस कारण लगभग 71 वर्ष में निरयन संक्रान्तियों की एक तारीख (Date) बढ़ जाती है। निरयन मेष संक्रान्ति 13 अप्रेल के स्थान पर 14 अप्रेल को होने लगती है।

वर्तमान में निरयन मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु मकर, कुम्भ और मीन मास का आरम्भ की ग्रेगोरियन केलेण्डर के दिनांक निम्नानुसार है।

 *वर्तमान में निरयनमास का आरम्भ की ग्रेगोरियन केलेण्डर के दिनांक--* 

मेष         14 अप्रेल से          30 दिन।
वृष          14 मई से               31 दिन।
मिथुन     15 जून से             32 दिन। 
कर्क        16 जुलाई से         31 दिन।
सिंह        17 अगस्त से       31 दिन।
कन्या      17 सितम्बर से    30 दिन।
तुला        17 अक्टोबर से   30 दिन।
वृश्चिक  16 नवम्बर से      30 दिन।
धनु          16 दिसम्बर से    30 दिन।
मकर       14 जनवरी से      29 दिन।    
कुम्भ        13 फरवरी से      30 दिन।
मीन          14 मार्च से            31 दिन।

सुचना -- 
जब सुर्य और भूमि के केन्द्रों की दूरी जिस अवधि में अधिक होती है उस शिघ्रोच्च   (Apogee एपोजी) के  समय 30° की कोणीय दूरी पार करने में भूमि को अधिक समय लगता है अतः उस अवधि में पड़ने वाला सौर मास 31 दिन से भी अधिक 32 दिन का होता है। इसके आसपास के दो -तीन मास भी 31 होते हैं। इससे विपरीत उससे 180° पर शीघ्रनीच (Perigee  पेरिजी) वाला सौर मास 28 या 29 दिन का छोटा होता है। इसके आसपास के सौर मास भी 30- 30 दिन के होते हैं।
वर्तमान में 05 जनवरी को सुर्य सायन मकर  13°16' 20" या निरयन धनु 19° 08'25 " पर शिघ्रनीच का रहता है इस कारण यह मास 29 दिन का और इसके आसपास  तीन महिनें 30-30 दिन के  होते हैं। इसी कारण निरयन सौर संस्कृत चान्द्र संवत्सर में यह मास क्षय नही होता।
इसके 180° पर 04 जुलाई को सुर्य सायन कर्क  13°16' 20" या निरयन मिथुन 19° 08'25 " पर शिघ्रोच्च का रहता है इसी कारण यह मास 32 दिन का और इसके आसपास तीन तीन महिनें 31-31 दिन के  होते हैं।इसी कारण निरयन सौर संस्कृत चान्द्र संवत्सर में इस अवधि में ही कोई  मास  अधिक  होता है।

 निरयन सौर वर्ष और सायन सौर वर्ष में 25780 वर्षों में पुरे एक संवत्सर का अन्तर पड़ जाता है। इस अवधि में एक निरयन सौर संवत्सर से   सायन सौर संवत्सर एक वर्ष अधिक होता है। अर्थात यदि निरयन सौर संवत्सर 25780 है तो सायन सौर संवत्सर 25781 होगा। या यों भी कह सकते हैं कि,जब सायन सौर युग संवत्सर  
 25781होगा तब निरयन सौर युग 25780 रहेगा।
 लगभग 71 वर्षों में एक दिन का अन्तर एवम् 2148 वर्षों में एक मास का अन्तर पड़ जाता है। लगभग 4296 वर्षों में एक ऋतु का अन्तर, 6445 वर्षों में तीन मास का अन्तर पड़ता है।तथा 12890 वर्षों में एक अयन यानि छः मास का अन्तर पड़ जाता है। 

 लगध के ऋग्वेदीय वेदाङ्ग ज्योतिष के समय संवत्सरारम्भ सायन मेष संक्रान्ति के समय निरयन मकर संक्रान्ति भी पड़ती थी।
तो श्रीमद्भगवद्गीता में ऋतुओं में वसन्त और माहों में मार्गशीर्ष मास को विभूतिमय बतलाया है। क्यों कि किसी समय  संवत्सरारम्भ सायन मेष संक्रान्ति के समय निरयन सौर वृश्चिक संक्रान्ति पड़ती थी।

इसी कारण कभी संवत्सरारम्भ सायन मेष संक्रान्ति के समय निरयन सिंह संक्रान्ति भी पड़ती थी।
इसकारण केरल में निरयन सिंह संक्रान्ति को संवत्सर परिवर्तन होता है। 

 *निरयन सौर युधिष्ठिर संवत* 

महाभारत काल के चान्द्र मास आधारित हर उनसाठवें और साठवें मास को अधिक मास कर फिर सामान्य मास वाली क्लिष्ट गणना को बन्द कर शुद्ध निरयन सौर युधिष्ठिर संवत लागु किया।
युधिष्ठिर नें निरयन सौर गणनानुसार  संवत्सर गणना आरम्भ करवा दी। ता कि, तारामंडल देखकर भी चलते रास्ते भी व्यक्ति संवत्सर और मास गणना कर सके।
किन्त इस गणना में 2248 वर्ष में एक मास का, 4296 वर्ष में एक ऋतु का अन्तर पड़ जाता है। इस कारण यह भी विशेष लोकप्रिय नही हुई। 
युधिष्ठिर संवत 3044 पुर्ण होने पर उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य ने निरयन सौर विक्रम संवत  चला दिया। 


*वेदिक सावन वर्ष गणना।* 

एक  सावन दिन दो सुर्योदय के बीच के समय को सावन दिन कहते हैं।
एक अहोरात्र या एक सावन दिन लगभग 60 घटिका का होता है।  
घटीका को घटी, घड़ी और नाड़ी भी कहते हैं। 
वर्तमान गणनानुसार एक सावन दिन 24 घण्टे का होता है।
एक सावन मास 30 सावन दिन का सावन मास होता है।
सामान्य सावन वर्ष  में बारह मास होते हैं अतः सामान्य सावन वर्ष में 360 सावन दिन होते हैं। 
पाँचवेँ वर्ष में एक अधिकमास किया जाता था अर्थात पाँचवा सावन वर्ष तेरह सावन मास का होता था। इसकारण पाँचवा वर्ष 390 सावन दिन का होता था।
किन्तु चालिसवाँ सावनवर्ष,और 3835 वाँ सावनवर्ष और 3840 वाँ सावन वर्ष 360 दिन का सामान्य वर्ष होता था। चालिसवाँ सावन वर्ष , तीन हजार आठ सौ पेंतीसवें सावन वर्ष और  तीन हजार आठ सौ चालिसवाँ सावन वर्ष बारह सावन मास का ही सामान्य सावन वर्ष होता था। फिर 7308 वाँ (सात हजार तीन सौ आठवाँ) सावन वर्ष भी 360 दिन का होता था।
इस प्रकार इन युग वर्षों में सायन वर्ष और सावन वर्षारम्भ एकसाथ हो जाते थे। यह गणना गणितागत न होकर मुलतः वेध आधारित थी । किन्तु गणीतीय सुत्र उपर्युक्तानुसार बनते हैं यह ऋषि गण जानते थे। 

                  *वेदिक चान्द्र मास* 

 *वेदिक काल में भी अमावास्या से अमावस्या तक वाले चान्द्रमास भी प्रचलित थे। किन्तु संवत्सर आरम्भ का आधार सायन सौर मेष संक्रान्ति ही थी।* 
मा शब्द चन्द्रमा सुचक है। चन्द्रमा के मा से ही अमा अर्थात बिना चन्द्रमा वाली रात अमावस्या शब्द बना। और पुरे चन्द्रमा वाली रात पुर्णिमा से पुर्णिमा शब्द बना ।
मास यानि चन्द्रमा की एक सत्र पुर्ण होना। यह अवास्या से अमावस्या तक लगभग 29. 531 दिन का चान्द्रमास हो या पुर्णिमा से पुर्णिमा तक 29. 531 दिन का होता है।
तदनुसार बारह चान्द्रमास  354.367 दिन की अवधि को शुद्ध चान्द्र वर्ष कहते हैं। जो निरयन सौर वर्ष / नाक्षत्रीय वर्ष से 10.889 वर्ष छोटा है।और सायन सौर वर्ष से 10.875 दिन छोटा है।
बारह शुद्ध चान्द्रमास वाले शुद्ध चान्द्रवर्ष को सायन सौर वर्ष या निरयन सौर वर्ष से संगति बिठाने हेतु लगभग 32 चान्द्र  मास से 38 चान्द्र मास पश्चात अधिक मास करते हैं। इसकारण प्रायः अधिक मास वाला चान्द्र वर्ष तेरह चान्द्र मास का होता है। यानि अधिक मास वाला चान्द्र वर्ष 383.898 दिन का होता है।
इस पद्यति में चान्द्र मासों का नामकरण  चान्द्रमास के मध्य में  पुर्णिमा तिथि को चन्द्रमा जिस नक्षत्र में रहता है उस नक्षत्र के नाम के अनुसारं चैत्र, वैशाख, ज्यैष्ठ, आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद, आश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फाल्गुन  नामकरण किया गया है। जो पुर्णिमा को होने वाले चन्द्र नक्षत्रानुसार  क्रमशः चित्रा से चैत्र, विशाखा से वैशाख, ज्यैष्ठा से ज्यैष्ठ, पूर्वाषाढ़ा से आषाढ़, श्रवण से श्रावण, उत्तराभाद्रपद से भाद्रपद, अश्विनी से आश्विन, कृतिका से कार्तिक, मृगशिर्ष से मार्गशीष, पुष्य से पौष, मघा से माघ और उत्तराफाल्गुनी से फाल्गुन मास नाम पड़े।

चान्द्र मास में अमावस्या से पुर्णिमा तक शुक्ल पक्ष और पुर्णिमा से अमावस्या तक कृष्णपक्ष कहलाता है। साथ ही चान्द्र मास मे अर्ध चन्द बिम्ब  रात्रि यानि शुक्ल पक्ष की साढ़े सप्तमी (अष्टमी) से कृष्णपक्ष की साढ़े सप्तमी  तिथी  (साढ़े बाईसवीँ तिथी) / (अष्टमी) तक उज्वल निषा से  अर्ध चन्द्र बिम्ब यानि कृष्णपक्ष की साढ़े सप्तमी तिथी  (साढ़े बाईसवीँ तिथी)/ (अष्टमी)  से शुक्ल पक्ष की साढ़े सप्तमी (अष्टमी) तक अन्धियारी रात वाले  के विभाग किये गये थे। यह प्रथक ईकाई है।
एक (तन्त्र की) मान्यतानुसार अमावस्या पिशाचों का मध्यान्ह होता है। और पूर्णिमा गन्धर्वों का मध्याह्न है।

सुर्य से चन्द्रमा की 12° के अन्तर वाली  तिथियाँ  नही थी। केवल अमावस्या , पुर्णिमा तथा अर्धचन्द्र बिम्ब वाली रात्रि  अष्टमी तिथी तथा तेईसवीँ चन्द्रकला  (अष्टका - एकाष्टका)  ही प्रचलित थी।

 सुर्य से चन्द्रमा की 06° के अन्तर वाले करण भी प्रचलित नही थे।  सुर्य के सायन भोगांशों और चन्द्रमा के सायन भोगांशों के योग 180° और 369° या 00° होने पर व्यतिपात और वैधृतिपात योग प्रचलित थे।
चान्द्रमास को पितरों का एक दिन माना गया है। कृष्णपक्ष पितरों का दिन होता है तथा  शूक्लपक्ष पितरों की रात्रि होती है।

     *महाभारत काल में* 

महाभारत काल मे निरयन सौर गणना और  चान्द्र मास तथा सावन दिन और चन्द्र नक्षत्र से तिथि गणना  प्रचलित हो गये थे।
 हर अट्ठावन चान्द्र मास के बाद दो अधिक मास होते थे।अर्थात हर उनसाठवाँ और साठवाँ चान्द्र मास अधिक होकर फिर अगले माह सामान्य होकर वर्ष षुर्ण किया जाता था।
यह बहुत असहज गणना थी जो केवल भीष्म,विदुर, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, और युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण जैसे धर्मशास्त्री ही समझ पाते थे। दुर्योधन एवम् उसके साथी लोग भी समझाने पर भी नही समझ पाते थे।

*पौराणिक चान्द्र वर्ष/ शकाब्द या शक संवत।* अर्थात
*निरयन सौर संक्रान्तियों से संस्कारित अमावस्या से अमावस्या तक वाले चान्द्र मास वाला निरयन सौर संस्कृत चान्द्र संवत्सर* 

निरयन सौर संस्कृत चान्द्र संवत्सर जिस चान्द्र मास में दो निरयन सक्रान्तियाँ  पड़े अर्थात दो अमावस्याओं के बीच यदि दो निरयन सक्रान्तियाँ  पड़े  तो वह चान्द्रमास क्षय मास कहाता है। यह प्रायः 30 दिन वाले शीघ्र नीच वाले सौर मास के पहले वाले चान्द्रमास और बाद वाले चान्द्र मास में ही सम्भव होता है।  ऐसे क्षय मास 19 वें वर्ष,122 वें वर्ष और 141वें वर्ष मे पड़ते हैं।और
जिस निरयन सौर मास में दो अमावस्या पड़े अर्थात जब दो निरयन संक्रान्तियों के बीच दो अमावस्या पड़े तो वह चान्द्रमास अधिक मास कहलाता है। यह प्रायः 31 दिन वाले शिघ्रोच्च वाले सौर मास के पहले वाले चान्द्रमास और बाद वाले चान्द्र मास में ही सम्भव होता है।
जिस संवत्सर में क्षय मास आता है उस संवतसर में क्षय मास के पहले अधिक मास और क्षयमास के बाद पुनः अधिक मास होता है। इस प्रकार क्षय संवत्सर में दो अधिक मास होते हैं। इस कारण क्षय मास वाला संवत्सर और अधिक मास वाला संवत्सर दोनों ही  संवत्सर में तेरह चान्द्र मास होते हैं। इसकारण प्रायः क्षय मास वाला और अधिक मास वाले वर्ष भी 383.898 दिन का ही होता है। जबकि बिना अधिक मास बिना क्षयमास वाला सामान्य चान्द्रवर्ष शुद्ध चान्द्रवर्ष ही होता है इस कारण यह शुद्ध चान्द्र वर्ष 354.367   दिन का होता है।

 *निरयन सौर संस्कृत चान्द्र शकाब्द* 

फिर विक्रम संवत 135 पुर्ण होनें पर  पेशावर, पटना और मथुरा में कुषाण वंशी सम्राट कनिष्क के राज्यारोहण पर कनिष्क नें शक संवत चला दिया। और उसी समय  दक्षिण में पैठण महाराष्ट्र में गोतमी पुत्र शातकर्णि  ने निरयन सौर संस्कृत चान्द्र गणनाधारित शकाब्द चला दिया गया। शक संवत चला दिया।जो लगभग अधिकांश.भारत में प्रचलित है।
अर्थात, 
युधिष्ठिर संवत 3178 वर्ष पश्चात युधिष्ठिर संवत 3179 के स्थान पर  और विक्रम संवत 135 समाप्त होने पर विक्रम संवत136 के स्थान पर शक संवत एक के साथ  निरयन सौर संस्कृत चान्द्र गणनाधारित शकाब्द चला दिया गया। जो आजतक चल रहा है।
ईस गणना से पुर्णिमा, अमावस्या तिथियों  और अष्टका एकाष्टका पर्व के अलावा चतुर्थी,  एकादशी, प्रदोष, शिवरात्रि आदि वृत आरम्भ हो गये।

 *चन्दमा का भू परिभ्रमण* 

 चन्द्रमा के एक परिभ्रमण अवधि निरयन मेषादि बिन्दु / अश्विनी नक्षत्र आरम्भ बिन्दु से आरम्भ होकर पुनः निरयन मेषादि बिन्दु /अश्विनी नक्षत्र आरम्भ बिन्दु पर पहूँचने की  27. 322 दिन कीअवधि होती है। इस अवधि में चन्द्रमा सम्पूर्ण नक्षत्र मण्डल का परिभ्रमण पूर्ण कर लेता है। इसे नाक्षत्रिय मास भी कहते हैं। यह आकाश अवलोकन में चन्द्रमा का नक्षत्रों में परिभ्रमण दर्शन में उपयोगी है।

शरीरान्तर्वर्ती प्रज्ञानात्मा और प्रत्यागात्मा दो पक्षी का अर्थ।


शरीरान्तर्वर्ती प्रज्ञानात्मा और प्रत्यागात्मा दो पक्षी का अर्थ।

कठोपनिषद अध्याय 01/वल्ली 03/ मन्त्र 01 , 

ऋतम् पिबन्तौ सुकृतस्य लोके, गुहाम् प्रविष्टौ परमें परार्धे ;
छाँयातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति, पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः।

तीनबार नचिकेता अग्नि चयनकर्ता पञ्चाग्निसेवी  आत्मज्ञ, ब्रह्मवेत्ता ,परमगति को प्राप्त धीर पुरुष यह कहते हैं कि,
सुकर्मों (पुण्यों) के फलस्वरूप प्राप्त लोक में,(देश, कुटुम्ब,परिवार और योनि, तथा देह /प्रकारान्तर से मानव देह में  अंगुष्ठ प्रमाण पुरुष या बुद्धि आकाश में चित्त मे प्रविष्ट होकर ऋत का पान करने वाले अर्थात परम सत्य परमेश्वरीय विधि के पालन करने वाले छाँया और धूप के समान प्रत्यागात्मा (पुरुष-प्रकृति) (अन्तरात्मा) ब्रह्म (सवितृ  -सावित्री) और  प्रज्ञात्मा  (प्रज्ञानात्मा)  परब्रह्म (परमपुरुष/ दिव्य पुरुष - पराप्रकृति) (विष्णु - माया) हैं।

सुकर्मों (पुण्यों) के फलस्वरूप प्राप्त लोक में, अर्थात, कुटुम्ब,परिवार और योनि मे, तथा देह /प्रकारान्तर से मानव देह में 
अंगुष्ठ प्रमाण पुरुष अर्थात बुद्धि आकाश में चित्त 
ऋत का पान करने वाले अर्थात परम सत्य परमेश्वरीय विधि के पालन करने वाले 
छाँया और धूप के समान अर्थात प्रत्यागात्मा (पुरुष-प्रकृति) (अन्तरात्मा) ब्रह्म (सवितृ  -सावित्री) और  प्रज्ञात्मा  (प्रज्ञानात्मा)  परब्रह्म (परमपुरुष/ दिव्य पुरुष - पराप्रकृति) (विष्णु - माया)। जिसेे वेदान्तती बिम्ब और प्रति
ऋग्वेद मण्डल 01/सुक्त 164/ मन्त्र 20, 
अथर्ववेद काण्ड 09/ सुक्त14/मन्त्र 20, 
मुण्डकोपनिषद मुण्डक 03/खण्ड01/ मन्त्र 01
श्वेताश्वतरोपनिषद अध्याय 04/ मन्त्र 06

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया, समानम् वृक्षम् परिषस्वजाते ;
तयोरन्यः पिप्पलम्  स्वादन्त्यनश्नन्नन्यो, अभिचाकशीति।

प्रत्यागात्मा (पुरुष-प्रकृति) (अन्तरात्मा) ब्रह्म (सवितृ  -सावित्री) और  प्रज्ञात्मा  (प्रज्ञानात्मा)  परब्रह्म (परमपुरुष/ दिव्य पुरुष - पराप्रकृति) (विष्णु - माया) ये दो पक्षी एकसाथ/ युक्त होकर मित्रता पुर्वक एक ही (पिप्पल) वृक्ष का आश्रय लेकर  अर्थात प्रत्यैक देह में यानि एक ही शरीर में रहते हैं।
उनमें से प्रत्यागात्मा (पुरुष-प्रकृति) (अन्तरात्मा) ब्रह्म (सवितृ  -सावित्री)  जो  पिप्पल वृक्ष के फल यानि कर्मफल भोगकर्ता पुरुष गुणों के सङ्ग के कारण गुण सङ्गानुसार विभिन्न योनियों में प्रवेश करता है। और दुसरा पक्षी प्रज्ञात्मा  (प्रज्ञानात्मा)  परब्रह्म (परमपुरुष/ दिव्य पुरुष - पराप्रकृति) (विष्णु - माया)  केवल दृष्टाभाव से केवल देखता रहता है।

मुण्डकोपनिषद मुण्डक 03/खण्ड01/मन्त्र 02
श्वेताश्वतरोपनिषद अध्याय 04/ मन्त्र 07

समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नोनीशया, शोचति मुह्यमान;
जुष्टम् यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य , महिमानमिति वीतशोकः।

(संगति --- प्रत्यागात्मा (पुरुष-प्रकृति) (अन्तरात्मा) ब्रह्म (सवितृ  -सावित्री) और  प्रज्ञात्मा  (प्रज्ञानात्मा)  परब्रह्म (परमपुरुष/ दिव्य पुरुष - पराप्रकृति) (विष्णु - माया) ये दो पक्षी एकसाथ/ युक्त होकर मित्रता पुर्वक एक ही (पिप्पल) वृक्ष का आश्रय लेकर  अर्थात प्रत्यैक देह में / एक ही शरीर में रहते हैं।
उनमें से प्रत्यागात्मा (पुरुष-प्रकृति) (अन्तरात्मा) ब्रह्म (सवितृ  -सावित्री)  जो  पिप्पल वृक्ष के फल यानि कर्मफल भोगकर्ता पुरुष गुणों के सङ्ग के कारण गुण सङ्गानुसार विभिन्न योनियों में प्रवेश करता है।)

अर्थ --- इस समान वृक्ष पर (शरीर में) प्रत्यागात्मा (अन्तरात्मा) भोगों में निमग्न होकर अनीश होकर (आत्मसंयम स्वनियन्त्रण नही होने के कारण अनीश अर्थात ऐश्वर्य रहित होकर) मोहित होकर (गलत को ही सही मानकर / अनात्मा में आत्मभाव होने से) शोचनीय अवस्था में रहता है। वही प्रत्यागात्मा (अन्तरात्मा)  जब प्रज्ञात्मा  (प्रज्ञानात्मा)  परब्रह्म (परमपुरुष/ दिव्य पुरुष - पराप्रकृति) (विष्णु - माया) की महिमा को देखता है तब संसर्ग के प्रभाव से वीतशोक  (शोकरहित) होक जाता है। आनन्द का अनुभव करता है तब प्रत्यागात्मा (अन्तरात्मा)  जब प्रज्ञात्मा  (प्रज्ञानात्मा)  परब्रह्म से जुड़ जाता है। युक्त हो जाता है। अब वह अनुभव करता है कि मूलतः पहले से ही युक्त था ही।

त्रीस्कन्द ज्योतिष

1 त्रीस्कन्द ज्योतिष का मूल भाग तो सिद्धान्त ज्योतिष ही था। उसके दो भाग गणिताध्याय  और दुसरा गोलाध्याय थे।तथा तिसरा स्कन्द संहिता था। जिसके प्रमाण हर वेद सहिंताओं, ब्राह्मण ग्रन्थों,उपवेद, वेदाङ्ग, शुल्बसुत्रों, स्मृतियों, रामायण, महाभारत, और पुराणों में बिखरे पड़े हैं।
किन्तु होराशास्त्र के सुत्र कहीँ देखनें में नही आये। तो त्रिस्कन्द ज्योतिष में होरा कैसे आ गया यह समझ नही आया।
2 वराहमिहिर नें स्वीकार किया है कि, होरा और ताजिक यवनों की देन है।
अवकहड़ा चक्र, कुण्डली के भावों की संख्या और भावों की संज्ञा से यह बात प्रमाणित भी होती है। ताजिक तो पूर्णतः इराक की ही खोज लगता है। किन्तु सेडरल ईयर से जोड़नें की खोज निस्संदेह भारतीय ही है। यदि जातक होराशास्त्र भारतीय होता तो कुण्डली में 28 भाव होते। बारह भाव कदापि नही होते।
3 फलित करनें वालों को मूलतः देवज्ञ कहा जाता है। इसमें मूलतः सामुद्रिक शास्त्र के प्रमाण ही प्राचीन शास्त्रों में पाये जाते हैं। और दुसरा शकुन शास्त्र के प्रमाण मिलते हैं। होराशास्त्र के प्रमाण नही मिलते।
ज्योतिषी शब्द प्रचलन बहुत अर्वाचीन है। फलित विद्या या देवज्ञान में सामुद्रिक, शकुन के अलावा अंकविद्या,रमल  होराशास्त्र के अन्तर्गत जातक,ताजिक, प्रश्न कुण्डली प्रचलित हैं। पर फलित विद्या बहुत अर्वाचीन है।

4 व्यंकटेश बापजी केतकर के पहले भारत में प्रचलित किसी भी सिद्धान्त ग्रन्थ के गति, लम्बन आदि के शुद्धमान और स्थिरांक   (ज्योतिष की भाषा में ध्रुवे) से ग्रहगणित या सुर्य ग्रहण, चन्द्र ग्रहण, लोप - दर्शन, अगस्तोदय जैसे तारों के उदय अस्त की शुद्ध गणना सम्भव ही नही है। सुर्य केन्द्र के वसन्त सम्पात  पर होनें की गणना हेतु ट्रोपिकल ईयर का शुद्धमान (ध्रुवा) आवश्यक है। किन्तु पुरानें किसी सिद्धान्त ग्रन्थ में एकदम शुद्धमान उपलब्ध नही है। 
सुर्य के स्पष्ट भोगांश और स्पष्ट क्रान्ति के बिना चरान्तर ज्ञात नही हो सकता। और चरान्तर के बिना सुर्योदयास्त गणना भी नही हो सकती थी। 
5 ग्रहण की भविष्यवाणी के आधार पर होरा शास्त्र को प्रामाणिक ठहराने का तर्क निश्चित ही सोशल मिडिया की ही खोज होगी। सोशल मिडिया में ऐसे ऐसे बे सिर-पेरके तर्क दिये जाते हैं। अतः ध्यान देनें योग्य और विचारणीय तर्क नही

वैश्विक भविष्यवाणियों की यथार्थ स्थिति।

सन 1970-71 से मैं यह पढ़ते आया हूँ कि, 1979 या 1981 के आसन्न में विश्वयुद्ध होगा, प्रलय जैसी स्थिति होगी, विश्व की जनसंख्या एक चौथाई से भी कम रह जाएगी। 
फिर सन 1999 तक अखण्ड भारत बनेगा। संयुक्त राष्ट्र संघ का मुख्यालय भारत में होगा। भारत की सम्प्रभुता लगभग पूरे भारतीय उपमहाद्वीप से अधिक बड़े क्षेत्र में होगी। भारत विश्व गुरु होगा। आर्थिक और सामरिक शक्तियों में भारत प्रथम स्थान पर होगा।
भारत और रूस में दूरियाँ बड़ेगी। भारत अमेरिका में घनिष्ठता बड़ेगी। चीन लगभग खत्म हो जाएगा। 
इसमें हर साल कुछ अवधि बढ़ती जाती है। अब 2032 तक पहूँच गए हैं।

जो हे सो सामने है।
इसलिए मुझे इन भविष्यवाणियों में रत्ती मात्र भी भरोसा नहीं रहा।

भगवत्कृपा

भगवान तो अकारण करुणाकरन, करुणाकरनिधि हैं।
 वे श्रद्धालु या घ्रणा करने वाले, प्रेमी भक्त और द्वेषी- वेर पालने वाले का भेद ध्यान नहीं रखते। सबपर समान कृपा करते हैं।
लेकिन सभी अपनी-अपनी पात्रतानुसार प्राप्त कर पाते हैं।
इसी प्रकार 
भगवान विष्णु की माया, भगवान प्रभविष्णु की श्री लक्ष्मी और भगवान नारायण श्रीहरि की गज सेवित कमलासना नारायणी पद्मा देवी की कृपा तो सबपर समान रूप से रहती है, लेकिन सभी अपनी-अपनी योग्यता, निष्ठा, कर्मठता और पात्रतानुसार प्राप्त कर पाते हैं।

शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2025

जीवन पद्यति

बिना वेद मन्त्रों के कण्ठस्थ किये आगे दर्शाये गए कोई भी कार्य नहीं किए जा सकते। इसलिए सर्वप्रथम वेद मन्त्र कण्ठस्थ कराये जाते थे।
निरुक्त, व्याकरण और छन्द के ज्ञान बिना छन्दस (वैदिक संस्कृत) में गति नहीं हो सकती।
वेदाङ्ग और उप वेदों के ज्ञान बिना वेद, ब्राह्मण, और दर्शन में कोई गति नहीं हो सकती यह बात गत कुछ वर्षों में समझ आ गई।
शिक्षा के ज्ञान बिना उच्चारण नहीं कर सकते। उच्चारण बदलने पर शब्द का अर्थ बदल जाता है।
निरुक्त के बिना शब्दों के अर्थ समझ नहीं आते तो वाक्य कैसे समझेंगे?
निघण्टु के बिना लगभग समानार्थी शब्दों का कहाँ क्या अर्थ होगा यह समझ नहीं आता।
व्याकरण के बिना वाक्य समझ नहीं आते। 
छन्द शास्त्र के ज्ञान के बिना काव्य का अर्थ का अनर्थ हो सकता है।
ज्योतिष के ज्ञान के बिना उचित स्थान (वास्तु) और उचित समय (मुहूर्त) के ज्ञान के बिना धर्म पालन सम्भव नहीं है, धर्म सूत्रों के ज्ञान बिना क्या करना, कैसे करना, क्या मानकर करना? क्या समझ कर करना? कैसे करना का ज्ञान सम्भव नहीं है। मतलब जीवन जीना ही सम्भव नहीं है।
(ये जीना भी कोई जीना है लल्लू😃, जीना तो है उसी का जिसने ये ज्ञान जाना, है काम मानवों का, औरों के काम आना।पर हित सरिस धरम नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहीं अधमाई।) 
धर्म ज्ञान के बिना अर्थ और काम पुरुषार्थ सिद्ध हो ही नहीं सकते। तो मौक्ष की तो कल्पना ही बहुत दूर की बात हो गई।
बिना शुल्ब सूत्र के ज्ञान के न आवास बन सकता है, न कार्यस्थल, न कृषि क्षेत्र निर्धारित किया जा सकता है। न बेदी बन सकती है, न मण्डप। बेदी और मण्डप के बिना कर्म नहीं हो सकते।
गृह्य सूत्रों के ज्ञान बिना संस्कारित नहीं हुआ जा सकता, न व्रत, पर्व, उत्सव मनाये जा सकते हैं।
श्रोत सूत्रों के ज्ञान के बिना परमार्थ (यज्ञ) नहीं हो सकता। यज्ञ मतलब विष्णु अर्थ कर्म अर्थात सर्वव्यापी विष्णु के निमित्त कर्म अर्थात सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय कर्म श्रोत सूत्रों के ज्ञान बिना सम्भव नहीं है।
इन सबके ज्ञान होने पर भी आयुर्वेद के ज्ञान के बिना उपयुक्त जीवन शैली, उचित औषधि (जड़ी-बुटी, वनस्पति, रसायन) का ज्ञान नहीं हो सकता, बिना पदार्थ ज्ञान और उनके समुचित उपयोग जाने बिना उचित कर्म कैसे हो सकते हैं?
अस्त्र-शस्त्र निर्माण, रखरखाव और सञ्चालन के ज्ञान के बिना बिना परेशानी परमार्थ कर्म (निर्बाध यज्ञ) नहीं कर सकते।
वाद्य यन्त्र निर्माण, रखरखाव, वादन और गायन सीखे बिना सामगान नहीं हो सकता, सामगान सुनकर भी तदनुसार भाव मन में नहीं आ सकते तो आपकी स्तुति निरर्थक ही हो जाएगी। साथ ही मञ्च निर्माण, रख रखाव और सञ्चालन के ज्ञान बिना मञ्च तैयार नहीं हो सकता। और अभिनय के ज्ञान के बिना भावाभिव्यक्ति सम्भव नहीं है।
मतलब गायन, वादन, अभिनय (बॉडी लैंग्वेज) जाने बिना न आप किसी को प्रसन्न कर सकते हो, न प्रसन्न रख सकते हो, न आकर्षित कर सकते हो, न अनुकूल कर सकते हो। 
पथ, सेतु, भवन, दुर्ग, मूर्ति , प्रतिमा गढ़ना और यान (परिवहन संसाधन) के निर्माण, रखरखाव एवम् सदुपयोग का ज्ञान स्थापत्य के बिना सामान्य जीवन सम्भव नहीं है। अन्यथा कोई भी आपके अज्ञान का लाभ उठा लेगा। और
व्यवहार के ज्ञान के बिना तो जीवन का हर क्षेत्र अधूरा ही होगा। न सामाजिक जीवन, न उद्यम, न व्यवसाय, न कृषि, न राजनीति आदि कोई भी कार्य नहीं कर सकते अतः अर्थशास्त्र का ज्ञान प्रत्येक कदम पर आवश्यक है।
आपने देखा होगा कि, शुल्ब सूत्रों में सैद्धांतिक और व्यावहारिक गणित, और ब्रह्माण्ड विज्ञान, धनुर्वेद और स्थापत्य और गन्धर्व वेद (सङ्गीत और नाट्य शास्त्र) में भौतिकी तथा सैन्य शास्त्र, आयुर्वेद में रसायन शास्त्र, जीव विज्ञान तथा चिकित्सा शास्त्र तथा अर्थ शास्त्र में वाणिज्य का सम्पूर्ण ज्ञान निहित है।
शिक्षा,निरुक्त, व्याकरण और छन्द शास्त्र में सम्पूर्ण भाषा शास्त्र निहित है।
पञ्च महायज्ञ के ब्रह्मयज्ञ के अन्तर्गत अष्टाङ्ग योग निहित है।

इतना समस्त ज्ञानार्जन पश्चात ही आपके द्वारा बाल्यावस्था में कण्ठस्थ कये गए वेद मन्त्रों को समझ पाने का प्राथमिक ज्ञान प्राप्त हो पाएगा।

ब्रह्मचर्य आश्रम से ही पञ्च महायज्ञ का अभ्यास (जिसमें योगाभ्यास सम्मिलित है।) के कारण शरीर के अङ्ग प्रत्यङ्ग, संस्थान, और इन्द्रियाँ आपके वश में रहतीं हैं।अन्तःकरण चतुष्ठय पूर्णतः एकाग्र और शान्त रहते हैं। चित्तवृत्तियों का निरोध हो जाता है।
इस कारण समाधि अभ्यास करके वेद मन्त्रों का अर्थ, और आशय समझ आने लगता है। तब कर्म कौशल और व्यावहारिकता आ जाती है। इससे ग्रहस्थ आश्रम में  व्यवहार में तनिक भी कठिनाई नहीं होती है। जीवन सहज और सरल हो जाता है। 
व्यक्ति सफल ग्रहस्थ जीवन जी कर अगली पीढ़ी के मार्गदर्शन के लिए सक्षम हो जाता है।
तब वानप्रस्थाश्रम में प्रवेश कर सकता है। और आरण्यकों का अध्ययन कर श्रेष्ठ गुरु मुख से उपनिषद सुन समझ कर आत्मज्ञान लब्ध कर संन्यास के योग्य हो पाता है।
इसके बिना तन्त्र ज्ञान प्राप्त कर तामसिक तप करके जैन साधु, या ध्यान के नाम पर मानसिक जिम्नास्टिक करके बौद्ध श्रमण, या उपरी थोथा शास्त्राध्ययन कर कथावाचक बाबा बन सकते हैं।

विभिन्न संस्कृतियाँ

पहले देव और देवताओं के विषय में भारतीय वैदिक अवधारणा स्पष्ट की जाना आवश्यक है - 
भारत में सृष्टि के सभी तत्वों का दृष्य जगत की अनुभूति गम्य आधिभौतिक, भूमि से परे अन्तरिक्ष और ऊर्ध्व लोकिक आधिदैविक तत्व और देहान्तरवर्ती आध्यात्मिक तत्व ऐसे तीन स्तर पर विचार किया जाता है। 
  जीव, प्राण को देव
तथा अन्तःकरण चतुष्टय अर्थात चित्त, बुद्धि, अहंकार और मन, तथा श्रोत, त्वक, नेत्र, रसना और घ्राण नामक पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ तथा हस्त, पाद, वाक (कण्ठ और जीव्हा), उपस्थ और पायु नामक पञ्च कर्मेंद्रियों को भी देवता कहा गया है। अर्थात देवता भी हमसे एकदम भिन्न नहीं हैं।
परमात्मा सर्वव्यापक, और सबकुछ है। परमात्मा से भिन्न कुछ भी नहीं है। 
परमात्मा के कल्याणमयी ॐ सञ्कल्प से ॐ शब्दनाद के साथ सृष्टि का सृजन प्रारम्भ हुआ।

परिणामस्वरूप परमात्मा का ही परब्रह्म स्वरूप प्रकट हुआ। जिसे विष्णु और माया के रूप में जाना जाता है। यह परमेश्वर स्वरूप कहाया। फिर

ब्रह्म स्वरूप में प्रकटीकरण हुआ जिसे प्रभविष्णु (सवितृ) और श्री लक्ष्मी (सावित्री) के रूप में जाना जाता है। यह महेश्वर स्वरूप कहलाया। फिर 
अपरब्रह्म स्वरूप प्रकट हुआ जिसे नारायण (श्रीहरि) और नारायणी (कमलासना, गज सेवित कमला या पद्मा) के रूप में जाना जाता है। यह जगदीश्वर कहलाते हैं। फिर 

हिरण्यगर्भ स्वरूप प्रकट हुआ जिसे त्वष्टा और रचना के रूप में जाना जाता है। जिन्होंने ब्रह्माण्ड के गोलों की रचना की। ये केवल ईश्वर कहलाते हैं। जगत निर्माता और नियन्ताओं की ये श्रेणी अजयन्त देव कहलाती है। 

हिरण्यगर्भ से नील लोहित वर्ण के महारुद्र, सनक, सनन्दन, सनत्कुमार, सनातन और नारद हुए।
फिर प्रजापति के प्रादुर्भाव के साथ जैविक सृष्टि का प्रारम्भ हुआ। 

प्रजापति ने देवलोक के प्रजापति इन्द्र -शचि, अग्नि - स्वाहा आदि स्वर्ग स्थानीय प्रजापति हुए। फिर रुद्र - रौद्री और पितरः - स्वधा आदि अन्तरिक्ष स्थानीय प्रजापति हुए। फिर दक्ष (प्रथम) - प्रसुति, रुचि - आकुति और कर्दम- देवहूति नामक भूस्थानीय प्रजापति हुए। 
फिर मरीची-सम्भूति, भृगु-ख्याति, अङ्गिरा-स्मृति, वशिष्ट-ऊर्ज्जा, अत्रि-अनसुया, पुलह-क्षमा, पुलस्य-प्रीति, कृतु-सन्तति नामक ब्रह्मर्षि हुए। साथ ही 
द्वादश आदित्य और अष्ट वसु के रूप में देवलोक के देवता हुए।

प्रजापति, इन्द्र, द्वादश आदित्य, अष्ट वसु और एकादश रुद्र ये तैंतीस आजानज देवता (जन्मजात देवता) कहलाते हैं।
देवता गण सृष्टि सञ्चालन के प्रशासनिक अधिकारी हैं। ये ईश्वर श्रेणी के देव नहीं हैं। 

मानव सदाचार और पञ्च महायज्ञ के द्वारा देवताओं की उन्नति करते हैं, और देवताओं की अधिकृत भोग्य सामग्री भोगने के अधिकारी होते हैं।

आकाश, वायु, अग्नि, जल भूमि ये पञ्च महाभूत प्राकृतिक देवता वैराज देव कहलाते हैं।

दस्र और नासत्य नामक दो अश्विनी कुमार तथा उन्चास मरुद्गण कर्म से देवपद प्राप्त करने वाले कर्मदेव कहलाते हैं।

अब भारत के बाहर के धर्म संस्कृतियों के देवता देखते हैं।

एशिया महाद्वीप में मेसोपोटामिया अर्थात दक्षिण पूर्वी टर्की की मितानिन (वैदिक) संस्कृति, 
दक्षिणी और मध्य टर्की की चन्द्रवंशियों की खत्ती या हित्ती संस्कृति, 
युफ्रेटस घाटी की युरोपास- ड्युरा संस्कृति, डोरीक संस्कृति, आयोनिक संस्कृति , इलियन संस्कृति,

उत्तरी सीरिया की नागवंशी सुमेरियाई (सूर) संस्कृति, 
इराक की अश्शुर की असीरियाई संस्कृति, और बेबिलोन की बालधर्म की संस्कृति, 
आर्मिया की अरामियन संस्कृति, इब्राहीम का सबाइन धर्म, 
सऊदी अरब की मक्का की संस्कृति, यमन की संस्कृति, अमिरात की एमोराइट्स संस्कृति, 

इज्राइल के आसपास की कनानी संस्कृति,

लेबनान की फोनीशियन संस्कृति, सिनाई की पेट्रा की एडोमाइट तवीलीन (एदोमियों) और नाबातियन की दुशारा देव और अल- उज़्ज़ा देवी, अल्लाट देवी ,और मनुतु (मनात) देवी, अल्लाह, एल देव और, वृषभ स्वरूप  बाल (सम्भवतः नन्दी)  को पूजते थे।

यूरोप की युनान और क्रीट की शाक्त संस्कृति, 

सर्बिया की लेपेन्स्की वीर संस्कृति (डेन्युब नदी की दानवी संस्कृति),

प्राग (चेकोस्लोवाकिया) से जर्मनी और इंगलेण्ड, आयरलेण्ड तक और बादमें टर्की तक फैली सेल्ट संस्कृति, रोमन संस्कृति, 

अफ्रीका महाद्वीप में मिश्र की संस्कृति, 

उत्तर अमेरिका और मध्य अमेरिका महाद्वीप में मेक्सिको की एज़्टेक सभ्यता में क्वेट्ज़ाल्कोट्ल पंख वाला सर्प देवता, हुइत्जिलोपोच्टिलि (दक्षिण की हमिंग चिड़िया) और टेज़्काट्लिपोक (धुँए वाला दर्पण) का देवता प्रमुख थे, 

दक्षिण पूर्वी मेक्सिको, ग्वाटेमाला और बेलीज, हाण्डुरास, और पश्चिमी एल साल्वे डोर की माया सभ्यता के इत्जाम्ना सृष्टिकर्ता देवता थे। सूर्य देवता की उपासना भी करते थे। स्वर्ग में तेरह स्तर बीच में मृत्यु लोक और अधो लोकों के नौ स्तर थे।

इक्वाडोर, पेरु और चीली की इंकान सभ्यता में हुआकास या वाका समुदाय से सम्बन्धित थे और पचमामा पर प्रभुत्व स्थापित किया था। इंति और उनके सूर्य देवता की पूजा करते थे। राजा को सूर्य पुत्र मानते थे।

दक्षिणी अमेरिका में बोलिविया की संस्कृति।

गुरुवार, 16 अक्टूबर 2025

भगवान श्री मन्नारायण (श्रीहरि), भगवान श्रीरामचन्द्र जी और भगवान श्रीकृष्ण जी तीनों अलग-अलग व्यक्तित्व।


विष्णु पुराण अध्याय 09 श्लोक 01 से 08 तक में ज्योतिष चक्र और शिशुमार चक्र का वर्णन में उल्लेख के अनुसार भगवान नारायण श्रीहरि का वास स्थान शिशुमार चक्र के हृदय (केन्द्र) में है। यही वैकुण्ठ लोक कहलाता है।
(कृपया देखें विष्णु पुराण अध्याय 09 श्लोक 01 से 08 तक में ज्योतिष चक्र और शिशुमार चक्र का वर्णन। )
शिशुमार चक्र को लघु सप्त ऋषि चक्र या ध्रुवमत्स्य तारामंडल भी कहते हैं, अंग्रेजी में इसे अर्सा माइनर कांस्टेलेशन (Ursa Major
Constellation) कहते हैं। इस वैकुण्ठ लोक में भगवान श्रीमन्नारायण श्रीहरि का वास स्थान है।

इसी वेकुण्ठ लोक के अन्तर्गत ही साकेत धाम से उत्तर प्रदेश के अयोध्या नगर में भगवान श्रीरामचन्द्र जी का अवतरण (उतरना) हुआ था और काल द्वारा उनके कार्यकाल समाप्त होने की सुचना देने पर तीनों भाइयों सहित सरयु नदी में उतरकर वापस साकेत धाम ही पधारे थे।
इसी वेकुण्ठ लोक के अन्तर्गत ही गोलोक धाम से महा तपस्वी नर नारायण में से एक नारायण ऋषि भगवान श्रीकृष्ण के रूप में उत्तर प्रदेश के मथुरा नगर में उनके मामा कंस के कारागार में अवतरण (उतरना) हुआ था। 
कृपया देखें विष्णु पुराण,पञ्चम अंश/ प्रथम अध्याय/ श्लोक 60 से 82 तक में उल्लेख के अनुसार
 
क्षीर सागर के तट पर हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के नेतृत्व में नारायण की स्तुति करने पर प्रकट होकर नारायण ने देवताओं के समक्ष एक श्वेत और एक कृष्ण केश उखाड़कर भूमि पर पटके और कहा ये दोनों पृथ्वी पर अवतार लेकर दैत्यों का नाश करेंगे।
देवगण भी अपने अपने अंश से अवतार लेकर दैत्यों से युद्ध करें। श्लोक 60 से 63 तक।
वसुदेव के घर देवकी के आठवें गर्भ से यह श्याम केश अवतार लेगा। और कालनेमी के अवतार कंस का वध करेगा। श्लोक  64-65
फिर नारायण ने  योगनिद्रा को आदेश दिया कि, शेष नामक मैरा अंश अपने अंशांश से देवकी के सातवें गर्भ में स्थित होगा। उसे वसुदेव की दुसरी पत्नी रोहिणी के गर्भ में स्थापित कर देना। और लोग समझेंगे कि, देवकी का गर्भपात हो गया। रोहिणी के गर्भ में संकर्षित होने से वह संकर्षण कहलाएगा। श्लोक 72 से 76 तक।
तदन्तर मैं देवकी के आठवें गर्भ में स्थित होऊँगा। उस समय तू यशोदा के गर्भ से चली जाना। श्लोक 77 तक।
श्लोक 78 --- वर्षा ऋतु में नभस मास  (प्रकारान्तर से अमान्त श्रावण मास) में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को निशा (रात्रि) में जन्म लूँगा। और तू नवमी को उत्पन्न होगी। श्लोक 78
 वासूदेव जी मुझे यशोदा जी के शयन गृह में ले जाएंगे और तुझे देवकी के शयनगृह में लेजाएँगे।
कंस द्वारा शिला पर पटकने पर तू आकाश मे स्थित हो जाएगी। श्लोक 79 एवम् 80
इन्द्र तुम्हें प्रणाम करेगा। फिर तुम्हें भगिनी रूप से स्वीकार करेगा। श्लोक 81 
तू शुम्भ-निशुम्भ आदि सहस्रों दैत्यों का संहार कर समस्त पृथ्वी को सुशोभित करेगी। श्लोक 82

विष्णु पुराण,पञ्चम अंश/ तृतीय अध्याय/ श्लोक 26 और 27  में उल्लेख के अनुसार

योग निद्रा को कन्स द्वारा पाषाण शिला पर पटकने के प्रयत्न के समय कन्स के हाथ से छूटकर योगनिद्रा देवी आकाश में शस्त्र युक्त, अष्टभुजा देवी के स्वरूप में प्रकट हुई। श्लोक 26
 और कन्स को फटकारते हुए कहा कि, तेरा वध करने वाला अन्यत्र जन्म ले चुका है। श्लोक 27

मिर्जापुर उत्तरप्रदेश मे स्थित *महामाया, योगमाया आद्य शक्ति, एकानंशा, विन्ध्यवासनी देवी* का मन्दिर है।
वैष्णव परंपरा में महामाया, योगमाया *आद्य शक्ति* , एकानंशा देवी को  *नारायणी* की संज्ञा दी गई है, और वह विष्णु की माया की शक्तियों के अवतार के रूप में कार्य करती हैं। 
ऐसे ही भागवत पुराण दशम स्कन्ध अध्याय 89 श्लोक 59 से 60 तक में शेषशाई भूमा नारायण ने अर्जून और श्रीकृष्ण को पूर्व जन्म में महातपस्वी नर और नारायण ऋषि बतलाया है। कृपया देखें भागवत पुराण दशम स्कन्ध अध्याय 89 श्लोक 52 से 65 तक ।
जरा नामक एक बहेलिए ने गलती से उन पर तीर चला देने को निमित्त बनाकर गुजरात के प्रभास क्षेत्र में एक पीपल के पेड़ के नीचे विश्राम करते समय अपने नश्वर शरीर का त्याग कर वापस गोलोक धाम पधारे थे।  (यह स्थान सोमनाथ के निकट है।)
अर्थात भगवान श्रीमन्नारायण श्रीहरि से भगवान श्रीरामचन्द्र जी और भगवान श्रीकृष्ण अलग-अलग व्यक्तित्व थे।
यों तो ईशावास्यम् जगत सर्वम् यत् किञ्चित जगत्याम् जगत शुक्ल यजुर्वेद अध्याय 40 का प्रथम मन्त्र के अनुसार और
 सर्व खल्विदम् ब्रह्म, अयम् आत्मा ब्रह्म, तत् त्वम् असि के अनुसार तो सब-कुछ परमात्मा ही है। परमात्मा के अलावा कुछ है ही नहीं।

भक्त ध्रुव और प्रहलाद भगवान नारायण श्रीहरि के भक्त थे, जिनका वास स्थान शिशुमार चक्र के हृदय (केन्द्र) में है। 

ऋष्यमूक पर्वत के पास ऋषि मतङ्ग के आश्रम में गुरु मतङ्ग ऋषि की सेवा रत शबरी को अपने गुरु मतङ्ग ऋषि के देहावसान के समय माता सीताजी की खोज में निकले भगवान श्रीरामचन्द्र जी के मतङ्ग आश्रम पधारने की सूचना के आधार पर शबरी ने वन गमन के दौरान माता सीताजी की खोज में निकले भगवान श्रीरामचन्द्र जी की प्रतीक्षा की थी। और भगवान श्रीरामचन्द्र जी के आगमन पर उनका स्वागत कर उनकी सेवा सुश्रुषा की थी और सुग्रीव का नाम-पता बतला कर उनसे सहयोग लेने का सुझाव दिया था।

द्रुपद पुत्री अग्निजा महाराज युधिष्ठिर की धर्मपत्नी द्रोपदी को अपने सखा भगवान श्रीकृष्ण का अनन्य आश्रय प्राप्त था। वे जब भी असाधारण सङ्कट अनुभव करतीं थीं तत्काल भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण कर (आह्वान कर) सङ्कट मुक्त करने की प्रार्थना करतीं थीं। और भगवान श्रीकृष्ण तत्काल उपस्थित होकर उनकी यथायोग्य सहायता कर उन्हें उस सङ्कट से मुक्त कर देते थे।
भक्त नृसिंह मेहता, भक्त सूरदास और मीरा बाई भी इन्हीं भगवान श्रीकृष्ण की अनन्य भक्त थी।

उपलब्ध शुल्ब सूत्र

*शुल्ब सुत्र* - 

*संस्कार और यज्ञ सत्र के लिए* *सृष्टि ,ब्रह्माण्ड, सोलह भुवन और अठारह लोक, आकाश गङ्गा, सौर मण्डलों तथा नक्षत्रों तथा तारा (ग्रहों) के नक्शों के आधार पर मण्डप, मण्डल और यज्ञ बेदी बनाने की विधि- विधान और निषेध का वर्णन।* अर्थात यज्ञवेदीनिर्माणप्रक्रिया ।*



निम्नलिखित शुल्ब सूत्र इस समय उपलब्ध हैं:

आपस्तम्ब शुल्ब सूत्र
बौधायन शुल्ब सूत्र
मानव शुल्ब सूत्र
कात्यायन शुल्ब सूत्र
मैत्रायणीय शुल्ब सूत्र (मानव शुल्ब सूत्र से कुछ सीमा तक समानता है)
वाराह (पाण्डुलिपि रूप में)
वधुल (पाण्डुलिपि रूप में)
हिरण्यकेशिन (आपस्तम्ब शुल्ब सूत्र से मिलता-जुलता)

वास्तुशास्त्र, वास्तुकला विशेषज्ञ बनने के लिए शिल्पवेद या स्थापत्य वेद के साथ शुल्बसूत्रों का ज्ञान आवश्यक है।

सोमवार, 13 अक्टूबर 2025

कुण्डली देखकर फलित कथन विधि।

फल कथन के लिए पहले यह देखा जाता है कि,
जातक का जन्म यदि जातक का जन्म यदि शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा के होरा में हुआ हो, या कृष्ण पक्ष में और सूर्य के होरा में हुआ है तो उसपर विंशोत्तरी महादशा लागू होगी। 
इससे विपरीत जातक का जन्म यदि
शुक्ल पक्ष में सूर्य के होरा में हुआ हो, या कृष्ण पक्ष में और चन्द्रमा के होरा में हुआ है तो उसपर षोडषोत्तरी महादशा लागू होगी।  

यदि विंशोत्तरी महादशा  लागू हो तो ---
विंशोत्तरी महादशा अंतर्दशा प्रत्यन्तर दशा किन ग्रहों की चल रही है यह देखते हैं। 
विंशोत्तरी महादशा 

1 महादशेश, अन्तर्दशेश और प्रत्यन्तर दशा स्वामी  जिस ग्रह के नक्षत्र में है, वह ग्रह चलित चक्र में जिस भाव में स्थित हो उस भाव का फल ग्रह अपनी प्रकृति और ग्रह जिस राशि और नक्षत्र में स्थित है, उस राशि और नक्षत्र के स्वभाव के अनुसार सूचित करता है। 

2 महादशेश, अन्तर्दशेश और प्रत्यन्तर दशा स्वामी  जिस चलित चक्र में जिस भाव में स्थित हो, उस भाव का फल ग्रह अपनी प्रकृति और ग्रह जिस राशि और नक्षत्र में स्थित है, उस राशि और नक्षत्र के स्वभाव के अनुसार सूचित करता है। 

3 महादशेश, अन्तर्दशेश और प्रत्यन्तर दशा स्वामी जिस ग्रह के नक्षत्र में है, वह ग्रह जिन-जिन भावों का स्वामी हो उन-उन भावों का फल ग्रह अपनी प्रकृति और ग्रह जिस राशि और नक्षत्र में स्थित है, उस राशि और नक्षत्र के स्वभाव के अनुसार सूचित करता है। 

4 महादशेश, अन्तर्दशेश और प्रत्यन्तर दशा स्वामी ग्रह जिन-जिन भावों का स्वामी हो उन-उन भावों का फल ग्रह अपनी प्रकृति और ग्रह जिस राशि और नक्षत्र में स्थित है, उस राशि और नक्षत्र के स्वभाव के अनुसार सूचित करता है।  

5 महादशेश, अन्तर्दशेश और प्रत्यन्तर दशा स्वामी ग्रह जिन जिन भावों में स्थित ग्रह तथा जिन जिन भावों के स्वामी ग्रहों द्वारा दखा जात है , उन-उन भावों का फल भी ग्रह अपनी प्रकृति और ग्रह जिस राशि और नक्षत्र में स्थित है, उस राशि और नक्षत्र के स्वभाव के अनुसार सूचित करता है। 
वक्री अस्त आदि स्थिति भी ध्यान रखना होता है। वक्री और अस्त ग्रहों के नक्षत्र में स्थित ग्रह फल सूचित नहीं कर पाते हैं।
ऐसे ही अस्त ग्रह भी फल सूचित नहीं कर पाते हैं। मङ्गल, और शनि वक्री हो तो उनका अशुभ फल कम हो जाता है। गुरु बृहस्पति और शुक्र ग्रह अतिचार हो तो उनका शुभ फल कम हो जाता है।

 फिर उक्त ग्रहों का गोचर देखा जाता है। कि वे महादशा, अन्तर्दशा और प्रत्यन्तर दशा के स्वामी ग्रह जिस भाव में, जिस राशि और नक्षत्र में भ्रमण कर रहे हैं, उस भाव और राशि-नक्षत्र के अनुसार फल सूचित करता है। फिर यह देखते हैं कि, 
महादशा, अन्तर्दशा और प्रत्यन्तर दशा के स्वामी उस भाव और राशि-नक्षत्र में कब-तक रहेंगे। वक्री अस्त आदि स्थिति भी ध्यान रखना होता है।
ग्रहों और भावों का बलाबल भी षडबल में देखकर ध्यान रखना चाहिए।
षोडश वर्गों की विभिन्न सञ्ज्ञाओं के फल भी ध्यान रखना चाहिए। तथा मैत्री चक्र और उच्च-नीच, मूल त्रिकोण और स्व राशि और अधिमित्र, मित्र, सम, शत्रु और अधिशत्रु के वर्ग में स्थिति का षड बल में स्थान बल में समावेश हो जाता है, फिर भी प्रथक से भी ध्यान रखना चाहिए।

जैमिनी पद्धति के कारक और रश्मि आदि पर भी ध्यान देना चाहिए। जैमिनी पद्धति में चर दशा चलती है, अतः चर दशा भी देखना चाहिए।
गोचर में ग्रहों के बलाबल के विचार हेतु अष्टक वर्ग का ध्यान रखना आवश्यक है।

यदि षोडषोत्तरी महादशा लागू हो रही हो तो
षोडषोत्तरी महादशेश, अन्तर्दशेश और प्रत्यन्तर दशा स्वामी जिन भावों के स्वामी हैं और चलित चक्र में जिस भाव में स्थित हैं (बैठे हैं) और उन ग्रहों की दृष्टि जिन भावों पर है, तथा उन ग्रहों पर जिन ग्रहों की दृष्टि है, वे ग्रह जिन भावों के स्वामी हैं और जिन भावों में स्थित है उन भावों के अनुसार उन भावों का ही फल ग्रह अपनी प्रकृति के अनुसार सूचित करेगा।
वक्री अस्त आदि स्थिति भी ध्यान रखना होता है। वक्री और अस्त ग्रहों के नक्षत्र में स्थित ग्रह फल सूचित नहीं कर पाते हैं।
ऐसे ही अस्त ग्रह भी फल सूचित नहीं कर पाते हैं। मङ्गल, और शनि वक्री हो तो उनका अशुभ फल कम हो जाता है। गुरु बृहस्पति और शुक्र ग्रह अतिचार हो तो उनका शुभ फल कम हो जाता है।

फिर उक्त ग्रहों का गोचर देखा जाता है। कि वे महादशा, अन्तर्दशा और प्रत्यन्तर दशा के स्वामी ग्रह किस भाव में भ्रमण कर रहे हैं, उस भाव में कब-तक रहेंगे, वक्री अस्त आदि स्थिति भी ध्यान रखना होता है।
षोडषोत्तरी महादशा के अलावा उत्तर भारत में विंशोत्तरी महादशा भी सर्वमान्य है। इसलिए षोडषोत्तरी महादशा के अलावा  विंशोत्तरी महादशा अंतर्दशा प्रत्यन्तर दशा देखते हैं।
गम्भीर रोग और मरणासन्न अवस्था हो तो कालचक्र दशा भी देखना चाहिए।
इन सब का कॉमन फल जातक को बतलाया जाता है।
विशेष --- कुण्डली देखने के लिए बलाबल और भृगु पद्यति के योग आदि का ज्ञान भी आवश्यक है। 
स्थान बल ग्रहों का मित्र की राशि में < अधिमित्र की राशि में < स्व राशि में < मूल त्रिकोण मे और < उच्च राशि में < उच्चांश मे स्थान बल बढ़ता रहता है।
शत्रु की राशि में > अधिशत्रु की राशि में > नीच राशि में > नीचांश मे स्थान बल घटता रहता है।

दिग्बल - लग्न (पूर्व) , चतुर्थ भाव (पाताल, गहराई/ उत्तर), सप्तम भाव (पश्चिम) और दशम भाव (आकाश, उँचाई/ दक्षिण) की दिशाओं तथा ग्रहों तथा राशियों की दिशा के आधार पर गणना करते हैं।
भाव स्पष्ट के जितने निकट ग्रह स्पष्ट हो तो ग्रह और भाव बली होते हैं, लेकिन यदि ग्रह स्पष्ट भाव सन्धि में हो तो भाव और ग्रह निर्बल हो जाता है।

ऐसे ही ग्रह और भाव समान कारकत्व दर्शाते हों तो उन भावों में वह ग्रह और भाव बली होता है। विपरित स्थिति में ग्रह और भाव बल क्षीण हो जाताहै  है।
सूर्य पूर्व में, चंद्रमा उत्तर-पश्चिम (वायव्य कोण) में, मंगल दक्षिण में, बुध उत्तर में, बृहस्पति उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) में, शुक्र दक्षिण-पूर्व (आग्नेय कोण) में, शनि पश्चिम में, राहु दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य कोण) दिशा को सूचित करता है। 
मेष, सिंह, धनु राशि पूर्व का, वृषभ, कन्या, मकर राशि दक्षिण का, मिथुन, तुला, कुम्भ राशि पश्चिम को सूचित करतीं हैं।

 काल बल -- 
उत्तर गोल,  शुक्ल पक्ष, दिन में सूर्य, मङ्गल, गुरु ब्रहस्पति और नेपच्यून सर्वाधिक बली होते हैं। और चन्द्रमा, शनि, युरेनस और राहु-केतु ग्रह सर्वाधिक निर्बल रहते हैं।
दक्षिण गोल,  कृष्ण पक्ष,  और रात्रि में चन्द्रमा , शुक्र, शनि, युरेनस और राहु-केतु बली होते हैं। और सूर्य, मङ्गल, गुरु ब्रहस्पति और नेपच्यून निर्बल रहते हैं।
बुध सम (न्युट्रल) ग्रह है।
दृग्बल ग्रहों पर पड़ने वाली शुभ दृष्टि की गणना करके ज्ञात किया जाता है।
चेष्टा बल - ग्रह की वक्री, मार्गी, अतिचार आदि गति के आधार पर  विस्तृत गणनाओं द्वारा ज्ञात किया जाता है।

वृत के 360° के विभिन्न भागों के दृष्टियोग
युति 000° अन्तर।
बारहवाँ भाग 30° अन्तर।
प्रथम नवांश 40° अन्तर।
अष्टमांश 45° अन्तर।
षष्ठांश 45° अन्तर।
पञ्चमांश 72° अन्तर।
द्वितीय नवांश 80° अन्तर।
चतुर्थांश 90° अन्तर।
तृतियांश 120° अन्तर।
135° अन्तर।
150° अन्तर।
चतुर्थ नवांश 160° अन्तर।
प्रतियोग 180° अन्तर।
समक्रान्ति समान दिशा में और
समक्रान्ति विपरीत दिशा में
व्यतिपात योग जब दो ग्रहों के सायनांश  का योग 180° हो।
वैधृतिपात योग व्यतिपात योग जब दो ग्रहों के सायनांश  का योग 360° हो।
लोप या अस्त ग्रह जब कोई ग्रह या नक्षत्र का योग तारा सूर्य से अत्यल्प अंशात्मक दूरी पर स्थित हो और ग्रह और सूर्य की क्रान्ति भी समान हो। और ग्रह या तारा का शर भी समान हो।
उदय --- दूरी बढ़ने पर ग्रह या तारा आकाश में दृष्य हो जाता है तो उसे उदय कहते हैं।
वक्री - सूर्य केन्द्रीय ग्रह स्पष्ट में जब ग्रह भूमि के  अंशात्मक निकट हो अर्थात भू केन्द्रीय ग्रह स्पष्ट में सूर्य से प्रतियोग कर रहा हो (180° के आस-पास हो) तब आकाश में ग्रह पीछे चलता हुआ दिखता है अर्थात पूर्व से  पश्चिम में चलता हुआ दिखता है।
मार्गी - सामान्यतः सभी ग्रह पश्चिम से पूर्व की ओर चलते हुए दिखते हैं, उन्हें मार्गी कहते हैं।
राहु-केतु - चन्द्रमा का भूमि परिभ्रमण पथ जिन दो बिन्दुओं पर भूमि के सूर्य परिभ्रमण पथ पर काटता है, उसमें उत्तरी पात को राहु औश्र दक्षिणी पात को केतु कहते हैं।
इतनी सारी जानकारी के आधार पर फल कथन किया जाता है।
हर सत्ताइस दिन में लगभग सवा दो दिन के बीच जन्मे सभी लोगों की राशि एक ही होती है। इतने सारे लोगों का भविष्य एक जैसा कैसे हो सकता है?
प्रतिदिन लगभग दो घण्टे की एक ही लग्न होता है। एक ही जन्म लग्न वाले सभी लोगों का भविष्य एक जैसा कैसे हो सकता है?
मेने किसी के जीवन के ढाई घण्टे एक जैसे बीतते नहीं देखे। तो शनि के ढय्या और साढ़े साती के साढ़े सात साल एक समान कैसे व्यतीत हो सकते हैं।
जब फल कथन के लिए इतनी सारी चीजें देखना होती है तो, केवल दो बच्चों की जन्मराशि और जन्म नक्षत्र के आधार पर मिले गुण कितने सार्थक हो सकते हैं?
जब बारह भावों (खानों) में बारह राशियाँ, सत्ताइस नक्षत्र, 108 नक्षत्र चरण (नवांश), कृष्णमूर्ति पद्धति के 249 उप नक्षत्र और 360 अंशों (अर्थात 21,600कला या 12,96,000 विकलाओं) में, नौ ग्रह और राहु-केतु के योग से से केवल भाव स्पष्ट और ग्रह स्पष्ट होते हैं, तो कुण्डली के बारह भावों में से लग्न, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश (बारहवें) भाव में मङ्गल के बैठने से उसका पति या पत्नी की मृत्यु की भविष्यवाणी की जा सकती है तो इतनी बड़ी कुण्डली देखने की आवश्यकता ही नहीं होती।
जिन्हें फलित ज्योतिष नहीं आता ये उन लोगों की कमाई के साधन मात्र हैं।

शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2025

जाति व्यवस्था, जाति प्रथा और जातिवाद।

जाति व्यवस्था मतलब जो लोग जिस कार्य में दक्ष थे तदनुसार उनकी जाति बन गई। लेकिन बाद में यह जन्म के आधार पर नियत होने लगी। तो जाति प्रथा कहलाने लगी।
जब राजनीति में इस व्यवस्था और प्रथा का दुरुपयोग होने लगा तब यह जातिवाद कहलाता है।
जाति व्यवस्था वर्ण व्यवस्था का विकृत रूप हुआ। फिर भी प्रारम्भ में किसान का बेटा विश्वकर्मा (सुनार, सुतार, लोहार, धातु के बर्तन बनाने वाले ठठेरा, कुम्भकार, शिल्पी, राज मिस्त्री) या वैद्य, शल्यकर्मी (नापित), व्यापारी, सैनिक आदि कुछ भी बन सकता था। आज भी कई कृषक परिवारों में यह होता रहा है।
विश्वकर्मा का पुत्र भी किसान,वैद्य, शल्यकर्मी (नापित), व्यापारी, सैनिक आदि कुछ भी बन सकता था।
आपने देखा होगा कि, पान की खेती कुमरावत (तम्बोली) करते हैं जो मातृ वंश से कुम्भकार (कुम्हार) और पितृ वंश से सूर्यवंशी (क्षत्रिय) थे।
विश्वकर्मा लोगों के परिवार में थोड़ी बहुत कृषि भूमि होती है और वे उसपर कृषि करते भी हैं। 
लेकिन हर एक परिवार यह चाह रखता है कि, हमारी बहु हमारे परिवार के काम-काज, प्रथाओं की समझ और जानकारी रखती हो। इस कारण यह जाति व्यवस्था जाति प्रथा में बदल गई।
नेता तन्त्र की खोज जातिवाद तो हमारे सामने ही पनपा।

शनिवार, 4 अक्टूबर 2025

सृष्टि उत्पत्ति वर्णन संक्षिप्त में।

*वेदिक मत पुरुष सूक्त के अनुसार सर्वप्रथम केवल परमात्मा ही था। परमात्मा ने ही अपने आप को ही सृष्टि के रूप में सृजित किया।*
परमात्मा से स्व (सदसस्पति) तक क्रमशः चेतना कम होती जाती है, इसलिए इसे चेतना का पतनवाद कह सकते हैं।
फिर 
स्व-स्वभाव (सदसस्पति- मही) से एटम, कोशिका, तन तक जैविक विकासवाद कहा जा सकता है।



 जो सम्पूर्ण सृष्टि में कुछ सोचा जा रहा है, व्यक्त किया जा रहा है, व्यक्त नहीं हो पा रहा है, दृष्य है, अदृष्ट है, हुआ है, हो चुका है, हो रहा है, होगा, सबकुछ परमात्मा ही है। अतः उसके बारे में न कुछ सोचा जा सकता है, न अभिव्यक्ति की जा सकती है, न कुछ किया जा सकता है। इस कारण वेदों में न इति, न इति अर्थात नेति-नेति कहते हैं।




 *सर्वप्रथम केवल परमात्मा ही था। परमात्मा में सृष्टि का संकल्प हुआ जो विश्वात्मा है। जो ॐ कहलाता है।* परमात्मा और विश्वात्मा ॐ के बारे में भी कितना ही विचार किया जाए, व्यक्त किया जाए, कहा जाए सब अपूर्ण ही है। नेति-नेति।




 *परमात्मा के इस ॐ संकल्पके साथ ही (विश्वात्मा ॐ के अंशमात्र में) प्रज्ञात्मा हुआ जिसे आधिदैविक दृष्टि से परब्रह्म कहते हैं ।* 
 *यह तत्व शरीरस्थ आत्म तत्व (वास्तविक मैं) है, अधियज्ञ है, सनातन अक्षर है, कुटस्थ है, परम गति है, निर्गुण है, सर्वव्यापी हैं अतः निराकार है, क्षेत्रज्ञ है।
 *प्रज्ञात्मा परब्रह्म स्वरूप को समझने के लिए परम पुरुष और पराप्रकृति के रूप मे जानते/ समझते हैं। आधिदैविक वचनों में इन्हे ही दिव्य पुरुष विष्णु और माया कहते हैं। ये परमेश्वर हैं। अर्थात वास्तविक शासक हैं।* 
 ऋग्वेद और एतरेय ब्राह्मण ग्रन्थ में विष्णु को परम पद कहा है। और कहा है कि, देवता भी विष्णु परम पद को (टकटकी लगाकर) देखते हैं।

तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्॥ ऋग्वेद 1/22/20

विष्णु लिङ्ग अर्थात विष्णु का प्रतीक चिह्न शालिग्राम शिला है।
विष्णु के हाथ में नियति चक्र है । ऋग्वेदोक्त 90×4 =360 अरों का चक्र है। (चार गुणित नब्बे अर्थात 360अरोंं का संवत्सर चक्र है।)  तीनसौ साठ सायन सौर दिनों का संवत्सर ही नियति चक्र कहलाता है।

"चतुर्भि: साकं नवतिं च नामभिश्चक्रं न वृत्तं व्यतीँरवीविपत्। बृहच्छरीरो विमिमान ऋक्वभिर्युवाकुमार: प्रत्येत्याहवम् ॥" ऋग्वेद 01/155/06
 यही संवत्सर चक्र काल है। (आगे बतलाया जायेगा कि जीवात्मा अपरब्रह्म को महाकाल कहते हैं। वे यही नियति चक्र हैं।)




 *प्रज्ञात्मा परब्रह्म ने स्वयम् को प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) स्वरूप में प्रकट किया। यह तत्व अधिष्ठान है अर्थात आधार है या कहें शासन है।* 
 *प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) को आधिदैविक दृष्टि से ब्रह्म कहते हैं। ये  विधाता है,* ये ही महा-आकाश है। ये *अधिदेव हैं, क्षेत्र हैं*। प्रथम सगुण तत्व होने से सर्वगुण सम्पन्न हैं, कालातीत हैं, दृष्टा हैं। 
 *प्रत्यगात्मा ब्रह्म को पुरुष और प्रकृति के स्वरूप में जानते हैं। पुरुष अधिष्ठान है। इन्हें आधिदैविक दृष्टि से सवितृ और सावित्री कहते हैं। लोक में इन्हें  प्रभविष्णु कहते हैं। और  श्री लक्ष्मी इनकी शक्ति है।
 *प्रभविष्णु  और श्री लक्ष्मी अजयन्त देव (जन्मजात देवता) हैं।  ये महेश्वर कहे जाते हैं।* 
 सुचना - गुण- धर्म, सत्ता, साख, स्थाई सम्पत्ति, भूमि श्री का क्षेत्र है और चल सम्पत्ति रत्न, स्वर्ण, नगदी लक्ष्मी का क्षेत्र है। 

व्यक्तिगत स्वरूप प्रत्यगात्मा यानी अन्तरात्मा।
प्रत्यगात्मा में (जीवभाव के बजाय) केवल प्रज्ञात्म भाव ही रहे तो प्रत्यगात्मा सद्योमुक्त अवस्था में ही आयु पर्यन्त रहते हुए सद्यो मुक्त ही देह त्यागता है। देह धारण कर आयु समाप्त होने पर जीवादि तत्व अपनें कारण प्रत्गात्मा में लय होजाते है।
प्रत्गात्मा का झुकाव यदि जीव की ओर हो जाता है तो संचित कर्मों में से कर्म फल भोग हेतु प्रारब्ध का उदय होकर नवीन योनि में जन्म लेना पड़ता है।




 *प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) ब्रह्म ने स्वयम् को जीवात्मा स्वरूप में प्रकट किया जीवात्मा   अधिकरण है।
 *जीवात्मा को आधिदैविक दृष्टि से अपर ब्रह्म कहते हैं। पुरुष सुक्त में उल्लेखित विराट यही है। ये स्वभाव (स्व भाव) हैं, अध्यात्म हैं, यही महाकाल है। प्रथम साकार तत्व, महा तरङ्गाकार हैं, प्रकृति जनित गुणों का भोक्ता होने से गुण सङ्गानुसार योनि में जन्मते हैं।  ये क्षर हैं, वेद वक्ता हैं।
 *जीवात्मा अपरब्रह्म को अपर पुरुष जीव और आयु त्रिगुणात्मक अपरा प्रकृति के रूप में जाना जाता है। जीव अधिकरण है। (दुसरा अधिकरण प्राण अर्थात चेतना अर्थात देही है।) अधिकरण मतलब मुख्य यन्त्र या प्रमुख इंस्ट्रूमेंट।* 
जिन्हे आधिदैविक दृष्टि से *चतुर्भुज नारायण श्री हरि और नारायणी कमला (पद्मा) कहते हैं। ये जिष्णु भी कहलाते हैं मतलब स्वाभाविक विजेता या अजेय भी कहते हैं।* 
*नारायण श्री हरि अजयन्त देव (ईश्वर श्रेणी के देवता) हैं। ये जगदीश्वर कहे जाते हैं इनको शिशुमार चक्र (उर्सा माइनर) में क्षीर सागर में स्थित बतलाया जाता है।* 
 *जिसकी आयु निश्चित है वह जीव। जिसके देह त्याग पर शरीर की मृत्यु हो जाती है। निर्धारित आयु जीव की ही विशेषता है। मानव आयु की गणना समय में करता है जबकि प्रकृति आयु गणना श्वाँसों की संख्या में करती है। इसी कारण प्राणायाम के फलस्वरूप धृति वृद्धि (प्राण की धारण करने की शक्ति में वृद्धि)  होनें से व्यक्ति दीर्घायु (चिरञ्जीवी) हो जाता है। मृत्यु के तत्काल बाद या तो उर्ध्व लोकों मे या अधो लोकों मे या भूमि पर ही नवीन योनि धारण कर लेता है। यात्रा में अधिकतम बारह दिन लग सकते हैं या अधिकतम दस दिनों तक तक जीव मृतदेह के आसपास रह सकता है और बारह दिन तक भूमि पर रह सकता है। इसलिए रुचि प्रजापति और महर्षि भरद्वाज आदि ने मृत्यु उपरान्त दस दिन का अशोच और बारह दिनों तक श्राद्ध कर्म का नियम बनाए।*




 *जीवात्मा अपरब्रह्म ने स्वयम् को भूतात्मा स्वरूप में प्रकट किया।
*भूतात्मा को आधिदैविक दृष्टि से हिरण्यगर्भ ब्रह्मा कहा है। हिरण्यगर्भ की पत्नी (शक्ति) वाणी कहलाती है। पुरुषसूक्त के विश्वकर्मा यही हैं। ये  अजयन्त देव (ईश्वर श्रेणी के देवता) हैं।* 
ये महादिक हैं। *इन्हे "क" भी कहते हैं। अभिभूत, अति विशाल आकार, दीर्घगोलाकार (लगभग अण्डाकार होने से पञ्चमुखी कहलाते हैं।  इनकी आयु दो परार्ध (इकतीस नील,दस खरब, चालिस अरब वर्ष) है। ये प्रथम अनुभव गम्य तत्व हैं।* कास्मिक सूप से तुलना करें।
 *भूतात्मा को समझने के लिए प्राण और धारयित्व अथवा चेतना और धृति अथवा देही और अवस्था के रूप में जाना जाता है। प्राण भी अधिकरण है। अर्थात मुख्य करण है।
 *आधिदैविक दृष्टि से (हिरण्यगर्भ को) त्वष्टा और रचना कहते हैं। त्वष्टा भी अजयन्त देव (ईश्वर श्रेणी के देवता) हैं। ये ईश्वरीय सत्ता मे मात्र ईश्वर ही कहे जाते हैं। ये भौतिक जगत के रचियता हैं।* ऋग्वेद के अनुसार त्वष्टा नें ब्रहाण्ड के गोलों को सुतार की भाँति घड़ा।

 *जो बालक, कुमार, किशोर, युवा, अधेड़ वृद्धावस्था में परिवर्तनशील दिखता है वह प्राण ही देही और शरीरी कहलाता  है। शरीर से प्राण (देही) निकल जाने पर वापसी भी सम्भव है।  जबतक शरीर में प्राण है तभीतक आन्तरिक शारिरीक क्रियाएँ चलती है। शरीर में संज्ञान रहता है, शरीर सचेष्ट रहता है।* 

हिरण्यगर्भ ब्रह्मा की मानस सन्तान (1) त्वष्टा-रचना के अलावा (2) सनक, (3) सनन्दन, (4) सनत्कुमार और (5) सनातन तथा (6) नारद , (7) प्रजापति, और (8) एकरुद्र हैं।




 सुचना - इन अर्धनारीश्वर एकरुद्र ने ही कालान्तर में स्वयम् को नर और नारी स्वरूपों में अलग-अलग विभाजित  कर  शंकर और उमा के स्वरूप में प्रकट किया। बादमें शंकर ने स्वयम् को दश रुद्रों के रूप में प्रकट किया और उमा भी दश रौद्रियों के स्वरूप में प्रकट हुई। ये सब एकादश रुद्र कहलाये। अतःएव एकरुद्र भी प्रजापति आदि के तुल्य हैं और शंकरजी, दक्ष (प्रथम), रुचि  और कर्दम आदि  प्रजापतियों के तुल्य हुए। एवम् शेष दश रुद्र तो प्रजापति की सन्तानों (मरीचि, भृगु आदि) के तुल्य हुए।




 *भूतात्मा हिरण्यगर्भ ब्रह्मा नें स्वयम् को सुत्रात्मा स्वरूप में प्रकट किया।* 
*सुत्रात्मा को आधिदैविक रूप से प्रजापति कहते हैं। क्योंकि ये जैविक सृष्टि के रचियता हैं। प्रजापति की पत्नी (शक्ति) सरस्वती कहलाती है। प्रजापति भी अजयन्त देव (ईश्वर श्रेणी के देवता) हैं।*
 प्रजापति विश्वरूप (अर्थात ब्रह्माण्ड स्वरूप) हैं। इनकी आयु एक कल्प (चार अरब, बत्तीस करोड़, वर्ष) है। ये प्रथम जीव वैज्ञानिक तत्व हैं। विशाल अण्डाकार हैं।  लेकिन शीर्ष चपटे होने के कारण चतुर्मुख कहलाते हैं।
ये देवताओं में सबसे वरिष्ठ होने से पितामह और महादेव कहलाते हैं। लेकिन शैवमत में एकरुद्र प्रजापति से पहले उत्पन्न होने के कारण महादेव मानेगये। (बादमें पुराणों में शंकरजी को महादेव कहने लगे।)
 *सुत्रात्मा प्रजापति को समझने की दृष्टि से ओज और आभा (Ora) या रेतधा और स्वधा कहा जाता है।* 
 *ओज (तीनों प्रजापति) अभिकरण है। (दुसरा अभिकरण तेज है।) अभिकरण अर्थात अधिनस्थ करण या निकटस्थ करण।* अधिनस्थ औजार या इंस्ट्रूमेंट।
 *ओज को आधिदैविक दृष्टि से इन्हें मुख्यरूप से तीन प्रजापतियों की जोड़ी बतलाया गया है।*
*(1) दक्ष प्रजापति (प्रथम)-प्रसुति, (2) रुचि प्रजापति-आकुति और (3) कर्दम प्रजापति-देवहूति।*
प्रसुति, आकुति और देवहूति भी ब्रह्मा की मानस सन्तान है किन्तु इन्हे स्वायम्भुव मनु-शतरूपा की पुत्री भी कहा जाता है। 
प्रजापति ब्रह्मा के इन मानस पुत्रों के अलावा ग्यारह मानस पुत्र और भी हैं। जिनमें से दो देवस्थानी प्रजापति (1) इन्द्र - शचि और (2) अग्नि - स्वाहा एवम् एक (3) पितर - स्वधा।  
आठ भूस्थानी प्रजापति ये हैं (4) मरीची-सम्भूति, (5) भृगु-ख्याति, (6) अङ्गिरा-स्मृति, (7) वशिष्ट-ऊर्ज्जा, (8) अत्रि-अनसुया, (9) पुलह-क्षमा, (10) पुलस्य-प्रीति, (11) कृतु-सन्तति। ये सभी ब्रह्मर्षि भूस्थानी प्रजापति हुए। और इनकी पत्नियाँ दक्ष प्रजापति (प्रथम) और उनकी पत्नी प्रसुति की पुत्रियाँ थी। इन *ब्रह्मर्षियों का वासस्थान ब्रह्मर्षि देश कहलाता है। (ब्रह्मर्षि देश यानी हरियाणा में गोड़ देश अर्थात कुरुक्षेत्र के आसपास का क्षेत्र) एवम इनकी सन्तान ब्रह्मज्ञ ब्राह्मण हुए।* 
 इन्द्र - शचि और  अग्नि - स्वाहा और नारद जी के अलावा निम्नलिखित स्वर्गस्थानी देवगण हुए 
 (12) रुद्र- रौद्री (शंकर - सति पार्वती) - रुद्र मूलतः अन्तरिक्ष स्थानी देवता है लेकिन भूलोक में हिमालय में शंकरजी कैलाश वासी भी हैं।
(13) धर्म - और उनकी तेरह पत्नियाँ । (१) श्रद्धा, (२) लक्ष्मी, (३) धृति, (४) तुष्टि, (५) पुष्टि, (६) मेधा, (७) क्रिया, (८) बुद्धि, (९) लज्जा, (१०) वपु, (११) शान्ति, (१२) सिद्धि, (१३) कीर्ति ) ये देवस्थानी प्रजापति हैं। इनकी पत्नियाँ दक्ष प्रजापति (प्रथम) और प्रसुति की कन्याएँ थी । धर्म द्युलोक का अर्थात स्वर्गस्थानी देवता है। लेकिन भूमि पर कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र कहाजाता है। इनके अलावा (14) पितरः - स्वधा अन्तरिक्ष स्थानी प्रजापति हुए। पितरः ने स्वयम् सप्त पितरों और उनकी शक्ति (पत्नी) को में प्रकट किया। जिनमें से (१) अग्निष्वात (२) बहिर्षद और (३) कव्यवाह  तीन निराकार और (४) अर्यमा, (५) अनल (६) सोम और (७) यम चार साकार हैं। अर्यमा इनमें मुख्य हैं।
हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के मानस पुत्र नारद बाल ब्रह्मचारी ही रहे। अतः प्रजापति के स्थान पर मुनि और देवर्षि ही कहे जाते हैं।




 *सुत्रात्मा प्रजापति नें स्वयम् को अणुरात्मा स्वरूप में प्रकट किया। आधिदैविक रूप से ये वाचस्पति कहे जाते हैं। वाचस्पति की पत्नी (शक्ति) वाक कहलाती है।  ये आजानज देव (जन्मजात देवता) हैं।  इन्हें "ख" भी कहते हैं।*
*ये परमाणु तुल्य, परम अणु आकार हैं। आयु एक मन्वन्तर (तीस करोड़, सड़सठ लाख, बीस हजार वर्ष) है।*
 *अणुरात्मा वाचस्पति को समझने के लिए इन्हे तेज और विद्युत के रूप में समझते हैं। जिन्हें आधिदैविक दृष्टि से इन्द्र और शचि कहते हैं।*
*(ओज के साथ) तेज भी अभिकरण है। अर्थात अधिनस्थ करण या निकटस्थ करण।* अधिनस्थ औजार या इंस्ट्रूमेंट।
*जबतक शरीर में ओज-आभा और तेज-विद्युत है तबतक शरीर  सक्रिय रहता है।* 

आधिदैविक दृष्टि से ये द्युलोक में (1) (शतकृतु / शक्र) इन्द्र - शचि, (2) त्रिलोक में अग्नि-स्वधा, (3) भूवर्लोक (अन्तरिक्ष) में पितरः (पितृ अर्यमा) - स्वधा और (4) भूलोक में स्वायम्भुव सोम- वर्चा और मतान्तर से मनु- शतरूपा के रूप में जाने जाते है। *इन्द्र आजानज देव (जन्मजात देवता) हैं।* जबकि अग्नि वैराज देव (प्राकृतिक देवता) हैं।




 "सुत्रात्मा  (एवम्  अणुरात्मा) आनन्दमय कोष एवं कारण शरीर  कहलाते है।"
 
*अणुरात्मा से विज्ञानात्मा हुआ जिसे आधिदैविक में ब्रह्मणस्पति कहते हैं। ब्रह्मणस्पति की पत्नी (शक्ति) सुनृता है। ये भी सुक्ष्मातिसुक्ष्म होकर सम्पूर्ण देह में व्याप्त रहते हैं।*
*अणुरात्मा को चित्त और चेत या चित्त और वृत्तियों के रूमें समझा जा सकता है। चित्त में ही सारे संस्कार, प्रत्येक घटना अंकित रहती है। अन्तःकरण चतुष्ठय (चित्त, बुद्धि, अहंकार और मन) का यह प्रथम तत्व है।*
 *आधिदैविक दृष्टि से इन्हे इनकी शक्तियों सहित द्वादश आदित्य   (1) विष्णु, (2) सवितृ, (3) त्वष्टा, (4) इन्द्र, (5) वरुण, (6) विवस्वान, (7) पूषा, (8) भग, (9) अर्यमा, (10) मित्र, (11) अंशु और (12) धातृ) के नाम से जाना जाता है।
(सुचना --- इन विष्णु की पत्नी महर्षि भृगु की पुत्री श्री लक्ष्मी है। और इन्द्र पत्नी को भी शचि ही कहा जाता है। इससे भ्रम उत्पन्न होता है।)

भूमि पर आदित्यों का वासस्थान कश्मीर, उत्तराखण्ड, हिमाचल प्रदेश, तिब्बत, तुर्किस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान, कजाकिस्तान, पश्चिम चीन और युक्रेन तक था। विवस्वान की सन्तान वैवस्वतमनु नें अयोध्या को राजधानी बनाया।
उपनिषदों का महत (और सांख्य दर्शन का  महत्तत्व) (महत् तत्व) चित्त ही है। हृदयस्थ बुद्धि गुहा में अतिसुक्ष्म  चित्त का निवास माना जाता है।
वस्तुतः ये सब तत्व वैशेषिक के परमाणु अर्थात इलेक्ट्रॉन,फोटॉन आदि मूल कणों का भी मूल  परम अणु में स्थित हैं। क्योंकि, तथाकथित जड़ योनियों में भी ये समस्त तत्व होते हैं। मात्रात्मक अन्तर से सक्रीयता और चेतन्य दिखता है। किन्तु कम हो या ज्यादा पर सभीमें होता ही है ।

जबतक चित्त स्थिर है, चित्त में तरङ्ग नही उठ रही तब तक शरीर समाधिस्थ है।
जैसे ही तरङ्गे लहराने लगे/उठनें लगे जागृत कहलाता है।
तरङ्गे तो है, लेकिन ताल में है तो तन्द्रावस्था।
तरङ्गे बहूत मन्द मन्द हैं तो निन्द्रा /सुषुप्ति अवस्था। 
यदि तरङ्गे बे तरतीब हो तो अशान्त चित्त होता है। विक्षिप्त कहलाता है।

*विज्ञानात्मा से ज्ञानात्मा हुआ। ज्ञानात्मा अङ्गुष्ठ तुल्य,अङ्गुष्ठ आकर के हैं। विज्ञानात्मा के लिए देह के समान है।*
 *ज्ञानात्मा अधिदेवता ब्रहस्पति हैं। ब्रहस्पति की तीन पत्नियाँ (शक्ति) है - १ शुभा, २ ममता और ३ तारा।* 
*इसे बुद्धि और बोध या बुद्धि और मेधा के रूप में समझा जाता है। आधिदैविक दृष्टि से इन्हे शक्तियों सहित अष्ट वसु [(1) प्रभास, (2) प्रत्युष, (3) धर्म, (4) ध्रुव, (5) अर्क, (6) अनिल, (7) अनल और (8) अप् )] और के नाम से जाना जाता है।*(1) प्रभास (आकाश) -  प्रभासा।
(2) प्रत्युष (सूर्य/देव) - प्रत्युषा या दीक्षा 
(3) धर्म (वसु-पुत्र) -  धृति ।
(4) ध्रुव (अचल/ध्रुव तारा) -  ध्रुवा या धरणी
(5) अर्क (सूर्य/देव) - अर्का
(6) अनिल (वायु) - अनिला या शिवा 
(7) अनल (अग्नि) - अनला या शांडिली 
(8) अप् (जल) - आप (या सरिता)
वसुगण मूलतः आदित्यों के सहचारी रहे लेकिन इनकी सन्तान पूर्ण भारतवर्ष में फैल गई।

केवल नापतोल आदि मापन का विश्लेषण कर बुद्धि चित्त को सुचनाएँ देती है। चित्त जब संस्कार रूप तदाकार वृत्ति से तुलना कर निर्णय करता है कि, यह क्या पदार्थ या वस्तु है। तब, तदानुसार ओज निर्णय करता है कि, इसके प्रति क्या प्रतिक्रिया देना है और कार्यादेश का सिगनल तेज को भेजदेता है।
"विज्ञानात्मा (एवं ज्ञानात्मा ) विज्ञानमय  कोष एवं सुक्ष्म शरीर कहलाते हैं।"





 *ज्ञानात्मा से लिङ्गात्मा हुआ । लिङ्गात्मा भी अङ्गुष्ठ तुल्य,अङ्गुष्ठ आकर के हैं। ज्ञानात्मा के लिए देह के समान है। लिङ्गात्मा को आधिदैविक दृष्टि से पशुपति के नाम से जाना जाता है।  हिरण्यगर्भ के प्रथम मानस पुत्र एकरुद्र  का तपस्या से जब उत्थान हुआ तब उन्हें पशुपति पद सोपा गया।*
*लिङ्गात्मा पशुपति को अहंकार और अस्मिता के रूप में समझा जा सकता है। इन्हे आधिदैविक दृष्टि से शंकर और उमा के रूप में जानते हैं।*
*इन्होंने स्वयम्  शक्तियों/ रौद्रियों सहित एकादश रुद्र [(1) हर, (2) त्र्यम्बकं, (3) वृषाकपि, (4) कपर्दी, (5) अजैकपात, (6) अहिर्बुधन्य, (7) अपराजित, (8) रैवत, (9) बहुरूप, (10) कपाली और (11) शम्भु (शंकर))] के रूप में प्रकट किया।  ये अधिकांशतः कैलाश से टर्की तक, और अफ्रीका महाद्वीप कै उत्तर पूर्व में फैलेहुए थे।
(एकादश रुद्र भी कई प्रकार के हैं। इसलिए इन्हे आदि एकादश रुद्र लिखा है।)*

अहङ्कार उसमें अहन्ता- ममत्व (मैं - मेरा) जोड़ कर क्रियाओं का स्वरूप में तो कोई परिवर्तन नही करता। किन्तु अहंकार क्रियाओं में अहन्ता - ममता (मैं-मेरा) जोड़कर क्रिया को कर्म में परिवर्तित कर देता है।
कर्म के हेतु, आशय और उद्देश्य के अनुरूप संस्कार बनकर चित्त के स्वरूप में विकृति उत्पन्न करता है। जिसका प्रभाव देही (प्राण) पर भी पड़ता है। जीव के जन्म मृत्यु का कारण ये कर्म ही होते हैं।

*लिङ्गात्मा से मनसात्मा  हुआ। मनसात्मा भी अङ्गुष्ठ तुल्य,अङ्गुष्ठ आकर के हैं।  लिङ्गात्मा के लिए मनसात्मा देह के समान है।*
*मनसात्मा को आधिदैविक दृष्टि से गणपति कहते हैं। गणपति की पत्नियाँ (शक्ति) ऋद्धि और सिद्धि कही जाती है।  प्रमथ गणों के गणपति विनायक को गणाधिपति शंकर जी नें रुद्रगणों का गणपति पद पर नियुक्त किया । और निधिपति के पद पर कुबेर को नियुक्त किया जबकि, गणानान्त्वाम्ँ गणपति हवामहे वाले ये गणपति सभी गणों के अध्यक्ष हैं। निधिपति भी हैं, प्रियपति भी हैं अर्थात स्वयम् शंकर ही हो सकते हैं; विनायक नही। इनकी तुलना राष्ट्रपति से कर सकते हैं। अतः सोम राजा और वर्चा या मतान्तर से स्वायम्भूव मनु और शतरूपा प्रथम गणपति रहे।*
*मनसात्मा गणपति को मन और संकल्प के रूप में समझ सकते है। मन की संकल्प शक्ति के बराबर और विपरीत विकल्प शक्ति भी है।* *विकल्प भी सृष्टि संचालन में आवश्यक तत्व है। किन्तु विवेक (निश्चयात्मिका बुद्धि) के अभाव में संकल्प की दृढ़ता न होनें पर यही विकल्प पारसी धर्म का शैतान कहलाता है।*
आधिदैविक दृष्टि से मन और संकल्प विकल्प का अधिदेवता अन्तरिक्ष में सप्तवीश नक्षत्र के रूप में सोम राजा  या वैवस्वत मनु को जाना जाता है। सोम का वास मृगशीर्ष नक्षत्र में है। जैसे श्रोत्रियों/वैदिको के मुख्य देवता नारायण हैं ऐसे ही मिश्र के मुख्य देवता सोम हैं। ऐसा माना जाता है कि, अवेस्ता के होम मूलतः वैदिक देवता सोम ही हैं। सेमेटिक वंश सोमवंश भी कहलाता है। जबकि भूस्थानीय स्वायम्भूव मनु और शतरूपा (या मन्वन्तर के मनु) मन और संकल्प के अधिदेवता हैं।

मन उस कर्म के प्रति अपनें सङ्कल्प विकल्प तैयार कर अगली क्रियाओं के लिये मान्सिकता तैयार कर लेता है। जो रिफ्लेक्स के रूप में प्रकट होती है। 
तब मस्तिष्क की तन्त्रिकाएँ कर्मेन्द्रियों को व्यवहार करनें के सिगनल दे देती है। लेकिन चेहरे के हावभाव बदलदेता है जिससे देखनें वालों को वह क्रिया कर्म के रूप में समझ आनें लगती है।और देखने समझने वाले तदनुसार प्रतिक्रिया करते हैं।

*(लिंगात्मा एवं) मनसात्मा मनोमय कोष एवं लिंग शरीर कहलाते हैं।*




 *मनसात्मा से "स्व" हुआ। स्व अङ्गुष्ठ तुल्य पुरुषाकृति है। मनसात्मा के लिए स्व देह के समान है।*
 *मनसात्मा को सदसस्पति (सभापति) के रूप में जानते हैं। लोकसभा अध्यक्ष से इनकी तुलना हो सकती है।*
*स्व की शक्ति "स्वभाव" है।  "स्वभाव" का अधिदेवता मही देवी हैं। भूमि को भी मही कहा जाता है। भू देवी को वराह की पत्नी भी कहते हैं।*
*स्व और स्वभाव तत्व भौतिकि के डार्क मेटर  (Dark  matter)  और डार्क इनर्जी (Dark Energy) से भी मैल रखते हैं और भौतिकि  की सिंग्युलरिटी (Singularity) और इनर्जी Energy से भी स्व और स्वभाव की तुलना कर सकते हैं। पर इसका अर्थ यह नही कि, ये यही भौतिक तत्व हैं।*

"शुचिर्देवेष्वर्पिता होत्रा मरुत्सु भारती। इळा सरस्वती मही बर्हिः सीदन्तु यज्ञिया: ॥" ऋग्वेद 01/142/09
इळा सरस्वती मही तिस्रो देवीर्मयोभुवः । बर्हिः सीदन्त्वस्रिधः।। ऋग्वेद 01/13/09

 स्वभाव तीन स्वरूप में विभक्त हुआ ---
(1) वैकारिक स्वभाव अर्थात स्वाहा (स्व का हनन या समर्पण)। स्वाहा का अधिदेवता भारती देवी  हैं। यह भौतिकि विज्ञान की दृष्टि से यह आधिदैविक शक्ति कहाती है। मनोविज्ञान में इसे में सुपर ईगो कहते है।

(2) तेजस स्वभाव या वषटकार (मस्तिष्क सम्बन्धी/ वैचारिक) का अधिदेवता सरस्वती देवी है। भौतिकि में अध्यात्मिक शक्ति और मनोविज्ञान में यह ईगो कहाता है। येही  मान्सिकता शक्ति (क्षमता) (willpower) है।

(3) भूतादिक स्वभाव अर्थात स्वधा (स्व को धारण करना है अर्थात स्वार्थ) का अधिदेवता ईळादेवी हैं। मनोवैज्ञानिक इड (Id) और भौतिकि की कास्मिक ईनर्जी (Cosmetic Energy) की तुलना स्वधा से कर सकते हैं।

(1) सात्विक स्वभाव / स्वाहा भारती से अधिदेव हुआ का अधिदेव का अधिदेवता अष्टादित्य [ (1)मार्तण्ड {विवस्वान}, (2) इन्द्र, (3) वरुण, (4) मित्र, (5) धाता, (6) भग, (7) अंश और (8) अर्यमा)] हैं इसे भौतिकि में दृष्य़ आकाश (Sky)  और मनोविज्ञान में साक्षात या प्रत्यक्ष अनुभूति (कांशियस Councious) कहते है। (कृपया इसे चेतना न समझें। चेतना प्राण को कहते हैं‌।)

(2) राजसी स्वभाव/ वषट सरस्वती से अध्यात्म हुआ जिसे दुसरे अष्ट वसु [(1) द्रोण, (2) प्राण, (3) ध्रुव, (4) अर्क, (5) अग्नि (6) दोष, (7) वसु और (8) विभावसु )] कहते हैं। ये पूर्वकथित अष्ट वसु से भिन्न हैं। इसे भौतिकि में समय (Time) या तथा मनोविज्ञान का आंशिक प्रकट या तन्द्रा (सब कांशियस Subcouncious) कहते है।

(3) तामसी स्वभाव/ स्वधा/  ईळा से अधिभूत हुआ। अधिभूत का अधिदेवता दुसरे एकादश रुद्र [(1) मन्यु, (2) मन , (3) महिनस, (4) महान, (5) शिव, (6) उग्ररेता, (7) भव, (8) काल, (9) वामदेव, (10) धृतवृत और (11) मृगव्याध या मतान्तर] से अन्य नाम [(1) सर्प, (2) निऋति,(3) पिनाकी, (4) कपाली, (5) स्थाणु, (6) ईशान नाम और (7) दहन भी।] हैं। जो पूर्व कथित एकादश रुद्रों से भिन्न हैं। इसे भौतिकि में अन्तरिक्ष (Spece) और मनोविज्ञान में परोक्ष या सुप्त (अन् कांशियस Uncouncious) कहते हैं। 

(1) अधिदेव को हम पञ्च मुख्य प्राण और पञ्च उपप्राण  [(1) उदान -देवदत्त, (2) व्यान - धनञ्जय, (3) प्राण - कृकल, (4) समान - नाग, (5) अपान -कुर्म)]   के रूप में जानते हैं। इनके अधिदेवता द्वादश तुषितगण [(1) बुद्धि, (2) मन, (3) उदान, (4) व्यान, (5) प्राण, (6) समान, (7) अपान, (8) श्रोत, (9) स्पर्ष, (10) चक्षु,  (11) रसना और (12) घ्राण ] के रूप में भी जाने जाते हैं। 
2 अध्यात्म को हम पञ्चज्ञानेन्द्रिय तथा पञ्च कर्मेन्द्रिय  [(१)श्रोत - वाक (कण्ठ) , (२) त्वक - हस्त , (३) चक्षु - पाद , (४) रसना - उपस्थ (शिश्न या भग) और (५) घ्राण - पायु (गुदा)]   के रूप में जानते हैं। 
अध्यात्म के अधिदेवता शक्तियों सहित दुसरे उनचास मरुद्गण है। 
उनचास मरुद्गणों में सात प्रमुख माने गये हैं 
(1) आवह, (2) प्रवह, (3) संवह, (4) उद्वह, (5) विवह, (6) परिवह और (7) परावह है। ये सातों सैन्य प्रमुख के समान गणवेश धारण करते है। इनके प्रत्येक के छः छः स्वरूप (या पुत्र) अर्थात बयालीस मिलाकर उनचास मरुद्गण हुए।
 ये भी सुकर्मों के फलस्वरूप देवता श्रेणी में पदोन्नत हुए।अतः कर्मदेव कहलाते हैं।

(3) अधिभूत को हम पञ्च महाभूत और पञ्च तन्मात्रा [(1)आकाश -शब्द, (2) वायु - स्पर्ष, (3) अग्नि - रूप, (4) जल - रस और (5)  भूमि - गन्ध ] के रूप में जानते हैं।
तन्मात्राओं का सम्बन्ध उर्जाओं से जोड़ा जा सकता है --[(1) शब्द -ध्वनि से, (2) स्पर्ष विद्युत से, (3) रूप प्रकाश से सीधे सम्बंधित हैं, (4) रस  का सम्बन्ध भी पकानें के रूप में  ऊष्मा से लगता है।   किन्तु (5) गन्ध का ही सीधा सम्बन्ध चुम्बकत्व नही दिखता है )] 
 दुसरे एकादश रुद्रों का ही स्वरूप इनके अधिदेवता अनेकरुद्र (विशेले कीट पतङ्ग, सर्प, बिच्छू, घोघा (कपर्दी) और सीपी (युनियो, पाईला),  सिंह, व्याघ्र आदि हिन्सक प्राणी, आतंकी, गुण्डे, बदमाश, चोर, उचक्के, डाकु, लुटेरे, वनवासी, पुलिस, सेना आदि रुलाने वाले सभी अनेकरुद्र हैं।)




 (1) अधिदेव (अष्टादित्य) से कारण-शरीर हुआ कारण - शरीर के आधिदैवता  द्वादश साध्यगण[ (1) मन, (2) अनुमन्ता, (3) प्राण, (4) अपान, (5) विति , (6) हय, (7) हन्स, (8) विभु, (9) प्रभु, (10) नय, (11) नर और (12) नारायण )]  हैं। 
कारण शरीर को हम हटयोग और तन्त्रमत के चार् मुख्य चक्र और चार उप चक्र [(1) ब्रह्मरन्ध्र चक्र - आज्ञा चक्र, (2) अनाहत- विशुद्ध चक्र, (3) मणिपुरचक्र - स्वाधिस्ठानचक्र और  (4) मूलाधार चक्र - कुण्डलिनी)]  के रूप में जानते हैं। कुण्डलिनी को चक्र नाम नही दिया गया किन्तु चक्रों से सीधा सम्बन्ध कुण्डलिनी को उपचक्र के रूप में ही दर्शाता है। चक्रों के अधिदेवता चौरासी सिद्धगण हैं।

(2) अध्यात्म (द्वितीयअष्टवसु) से सुक्ष्म शरीर हुआ जिसके अधिदेवता प्रभास वसु और (ब्रहस्पति की बहन) वरस्त्री के पुत्र देवशिल्पी विश्वकर्मा हैं।
सुक्ष्म शरीर  को हम  संस्थान और तन्त्र के रूप में जानते हैं।[(1)मस्तिष्क - तन्त्रिका तन्त्र, (2) हृदय - श्वसन तन्त्र, (3) यकृत - पाचन तन्त्र और (4) लिङ्ग - जनन तन्त्र) के रूप में जानते है।] इन ग्रन्थियों / अङ्गो - तन्त्रों के अधिदेवता (शुक्राचार्य के पुत्र) त्वष्टा हैं।

(3) अधिभूत (अष्टमूर्ति एकादश रुद्र) से लिङ्ग शरीर हुआ। लिङ्ग शरीर के अधिदेवता यह्व ( महादेव) हैं। ऋग्वेद में अग्नि को भी यह्व कहा है।(यह्व का मतलब महादेव है।) यह्व शब्द से ही यहुदियों के परमेश्वर यहोवा या याहवेह (शब्द) बना है।
लिङ्गशरीर को हम अष्ट सिद्धि (चार मुख्य सिद्धि एवम चार उप सिद्धि)  [(1) ईशित्व- वशित्व, (2) अणिमा-लघिमा, (3)  महिमा- गरिमा और (4) प्रकाम्य - प्राप्ति) के रूप में जानते हैं। सिद्धियों के अधिदेवता अष्ट विनायक हैं। [(1)सम्मित-उस्मित, (2) मित- देवयजन, (3) शाल - कटंकट और (4) कुष्माण्ड - राजपुत्र हैं] ये आठों पिशाच हैं और शिवगण हैं।)  
(सुचना - ये मूलतः पिशाच हैं। ये शुभकार्यों में विघ्नकर्ता ग्रह (ग्रसने वाले) हैं। तन्त्र में विनायक शान्ति प्रयोग द्वारा विघ्नबाधाएँ दूर करनें का विधान है। )




 1 कारण-शरीर (साध्यगण) से सुशुम्ना (नाड़ी) हुई। सुशुम्ना के अधिदेवता दस  विश्वैदेवगण (विश्वैदेवगणों के प्रमुख प्रचेताओं के पुत्र और सति के पिता, शंकरजी के श्वसुर दक्ष द्वितीय हैं।)
दस विश्वैदेवगण - [(1) दक्ष (द्वितीय), (2) कृतु, (3) सत्य, (4) काल (यम), (5) काम, (6) मुनि, (7) एल पुरुरवा, (8) श्रव, (9) रोचमान, (10) आर्द्रवान हैं।

(2) सुक्ष्मशरीर से पिङ्गला (नाड़ी) हुई। पिङ्गला के अधिदेवता शुक्राचार्य के पौत्र , त्वष्टापुत्र त्रिशिरा विश्वरूप हैं। जो देवताओं के पुरोहित होकर भी चुपके से असुरों को यज्ञभाग देते थे। जिनका वध इन्द्र नें किया था। ये वत्रासुर के अग्रज भाई थे।

(ईळा से ईड़ा तक के क्रम में।)   
(3) लिङ्ग शरीर (यह्व) से ईड़ा (नाड़ी) हुई। ईड़ा के अधिदेवता ईला नामक रौद्री के पुत्र  एल भैरव हैं। ( या वैवस्वतमनु की पुत्री ईला और बुध के पुत्र  एल पुरुरवा हैं)। 
(यहुदियों में एल शब्द ईश्वरवाचक है। तथा इला से इलाही और एल से अल और अल से ही अल्लाह शब्द बना है। भैरव और अल्लाह दोनों उग्र (जलाली) और शीघ्र प्रसन्न होने वाले (रहीम  और करीम) भी हैं। (ह्रीम् क्लीम् / क्रीम्  से तुलना करें)

(1)सुशुम्ना (2) पिङ्गला और (3) ईड़ा का संयुक्त संघात ही ---
 पिण्ड (पदार्थ) है जिसे भौतिकि में एलिमेण्ट का एटम कहते हैं। जीव विज्ञान में कोषिका ( सेल Cell) कहते हैं। तथा मेडिकल साइन्स की दृष्टि से तन (शरीर) है।
इस प्रकार परमात्मा ने स्वयम् को सृष्टि के रूप में प्रकट किया।




 तत्व मीमांसा प्रकरण में उक्त आलेख का आधार ऋग्वेद एवं यजुर्वेद सामवेद और विशेषकर मुख्य रुप से उनके निम्नलिखित  सुक्त हैं -
ऋग्वेद का पुरुष सूक्त, (यजुर्वेद का अध्याय ३१ उत्तर नारायण सुक्त सहित पुरुष सूक्त), नासदीय सुक्त और  अस्यवामिय सुक्त और ,श्री सुक्त, लक्ष्मी सुक्त,और देवी सुक्त और शुक्लयजुर्वेद का एकतीसवां और बत्तीसवां और चालिसवां अध्याय में  वर्णित  सृष्टि रचना  विवरण  एवम् वर्णन ;
और निम्नांकित ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद / ब्राह्मणोपनिषद / आरण्यकोपनिषदों  में  प्रमुख ब्रह्म सुत्र (अर्थात उपनिषद) ये हैं -
ईशावास्योपनिषद (शुक्ल यजुर्वेद संहिता का अन्तिम / चालिसवां अध्याय), श्वेताश्वतरोपनिषद (कृष्ण यजुर्वेद संहिता का अन्तिम अध्याय) , केनोपनिषद, कठोपनिषद, प्रश्नोपनिषद,  एतरेयोपनिषद, तैत्तरियोपनिषद, मण्डुकोपनिषद, माण्डुक्योपनिषद, छान्दोग्योपनिषद, वृहदारण्यकोपनिषद, कौशितकी ब्राह्मणोपनिषद और इन ब्राह्मण ग्रन्थों, आरण्यकों, उपनिषदों के आधार पर रचित पुर्व मिमांसा दर्शन , उत्तर मिमांसा दर्शन (शारीरिक सुत्र) के अलावा सांख्य कारिकाएँ, कपिल का सांख्य दर्शन, पतञ्जली का योग दर्शन, अक्षपाद गोतम का न्याय दर्शन, कणाद का वैशेषिक दर्शन में  वर्णित  सृष्टि रचना  विवरण।
इसके अलावा स्वभाव के बाद के विवरण हेतु  इसमें विष्णु पुराण, (भागवत पुराण), तन्त्र शास्त्रों, भौतिक विज्ञान, मनोविज्ञान की शब्दावली हेतु सम्बन्धित शास्त्रों से जानकारी जुटाई गई है।
विशेष --- विष्णु पुराण महर्षि कृष्ण द्वैपायन व्यास जी के पिता महर्षि पराशर की रचना मानी जाती है, इसलिए इसे सबसे प्राचीन पुराण माना जाता है।
क्वोरा एप के सर्वाधिक लोकप्रिय और प्रसिद्ध विद्वान लेखक श्री अरविन्द कुमार व्यास महोदय के द्वारा पुराणों के बारे में कुछ जानकारी सहित उनके कुछ विवादास्पद तथ्यों पर जानकारी प्रस्तुत है शीर्षक से लिख गए आलेख में उन्होंने विष्णु पुराण की प्राचीनता के सम्बन्ध में लिखा है कि,---
"विष्णु पुराण में ध्रुव तारे का विवरण उसके थुबन होने का परिचायक है; तथा इसके अनुसार यह लगभग चार हजार वर्ष से अधिक प्राचीन (2600–1900 ईसा पूर्व) खगोलीय परिस्थिति है; जोकि विशाखा नक्षत्र में शारदीय विशुव (2000–1500 ईसा पूर्व) तथा दक्षिण अयनान्त के श्रवण नक्षत्र में (लगभग 2000 ईसा पूर्व) से सुदृढ़ होता है।"
 अर्थात विष्णु पुराण कम-से-कम 2600ईसा पूर्व से 2000 ईसा पूर्व में रचा गया है।
इसलिए पुराणों में ऐतिहासिक महत्व विष्णु पुराण का अधिक है।

आगे कर्म मीमांसा और ज्ञान मीमांसा में कई प्रकरणों को समझने के लिए भूमिका रूप में इस जानकारी को स्मरण रखना आवश्यक है। यथा ---
 श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण नें भी कहा है कि, सांख्यदर्शन के अनुसार यह माना जाना जाता है कि, विश्व के समस्त कर्म और भोग वास्तव में प्रकृति के सत्व, रज, तम इन त्रिगुणों का पारस्परिक अन्तःसम्बन्ध और आपसी व्यवहार  ही होते हैं। अर्थात त्रिगुणों के पारस्परिक अन्तःसम्बन्ध और आपसी व्यवहार को हम भ्रम वश ही स्वयम् द्वारा किये गये कर्म मे अपना अहम् जोड़ कर स्वकर्म समझ बैठते हैं और इन्ही के द्वारा भोगे जाने की क्रियाओं को स्वयम् द्वारा भोगे जाने वाले भोग मानते रहते हैं। यही बन्धन है। और इसका विवेक होना ही निर्वाण है।
त्रिगुण संयोजन ठीक ऐसा ही है जैसे लाल, हरा और बैंगनी रंगों के समायोजन से ही अगणित सभी रंग बने हैं। और लम्बाई चौड़ाई और ऊँचाई से ही सभी आकार बने हैं।
मतलब हम जो आकार देख रहे हैं वह मात्र  त्रिआयामी संरचना मात्र है। पदार्थों के जो रंग देख रहे हैं वह मात्र तीन रंगों का समायोजन भर है। और जो कर्म और भोग देख रहे हैं वह मात्र प्रकृति के त्रिगुणों का आपसी व्यवहार मात्र है।
इस प्रकार की ज्ञान मीमांसा तैयार की जा रही है।