सम्पूर्ण सृष्टि रचयिता को केवल, श्रद्धा, प्रेम, भक्ति ही अर्पित कर सकते हैं। कोई सन्तान आदि व्यक्ति, रत्न, स्वर्ण, नगद, मनी ट्रांसफर या चेक आदि से रुपये -पैसे, वस्त्र, मिष्ठान आदि वस्तु, भूखण्ड आदि स्थान (संञ्ज्ञा) नहीं दिया जा सकता।
केवल मैं (अहंकार) और मेरा पन (ममत्व/ ममता), संसार और सांसारिक व्यक्ति, वस्तु और स्थान से लगाव (आसक्ति) का त्याग कर पूर्ण समर्पण कर परमात्मा में मन लगाकर एकमेव परमात्मा का ही सदा स्मरण बना रहे ऐसी एकनिष्ठ, अव्यभिचारी भक्ति हो।
बिना लगाव के, केवल कर्तव्य पालन हेतु
सार्वजनिक संस्थानों का सञ्चालन रखरखाव में योगदान आवश्यक है । सकामोपासन का विरोध - कामना रहित होना चाहिए, क्यों कि, जिसने पूरी सृष्टि रचकर "तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा , मा गृधः कस्यस्विद् धनम्।" अर्थात इसका त्याग पूर्वक केवल यथा आवश्यकता भोग करो, किसी के धन का लोभ मत करो क्योंकि यह धन (सृष्टि) केवल माया है। यह किसी की भी नहीं होती, किसी की नहीं रहती कहकर यह सृष्टि हमें सोप दी।
अपनी योग्यता बढ़ाते जाओ आपको स्वयम् प्राप्त हो जाएगी। जैसे जो सुविधाएँ प्रधानमन्त्री को मिलती हैं वह आपको तभी मिलेगी जब आप प्रधानमन्त्री बन जाओ। यह योग्यता वर्धन आपको करना है। इसका उपाय है निष्काम रहना हमारी कामना की सामर्थ्य इतनी नहीं है कि, हम वाञ्छित प्राप्त कर सकें।
विकास के नाम पर विनाश वाली बातें और तीर्थों को उनके मूल स्वरूप में रहने पर ही वे तीर्थ रह पाएंगे। तीर्थो को पर्यटन केन्द्र न बनाया जाए इस विषय में मैं पूर्ण सहमत हूँ।
तीर्थ स्थानों पर मन्दिर में भक्तों, व्रतियो, तपस्वियों और परीक्रमा करने वालों के लिए ही व्यवस्था होती है अतः मन्दिरों आदि में खाने - पीने, ठहरने आदि की व्यवस्था केवल तीर्थ यात्रियों के लिए ही हो न कि, पर्यटकों या सामान्य यात्रियों के लिए।
उनके लिए धर्मशाला, हॉटेल- मोटेल, रेस्टोरेंट आदि ही हैं, न कि, मन्दिर।
असहमति -
गुरुकुल में रहकर वैदिक मन्त्र संहिताओं, ब्राह्मण ग्रन्थों, षड वेदाङ्गो, अर्थशास्त्र, चारों उपवेदों, पूर्व मीमांसा और उत्तर मीमांसा, श्रीमद्भगवद्गीता, तथा योग, सांख्य, न्याय और वैशेषिक दर्शन का अध्ययन के साथ व्यावसायिक शिक्षा ग्रहण करना अत्यावश्यक है क्योंकि,
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण ने स्पष्ट कहा है कि, शास्त्रोक्त विधि से ही शास्त्रोक्त कर्म करते हुए ही जिएँ। निषिद्ध कर्मों के प्रति उपरामता हो। निषिद्ध कर्म के प्रति कभी भी मन में संकल्प ही नहीं उठे; कल्पना भी नहीं हो।
उक्त प्रकार से यज्ञ के लिए यज्ञ करते हुए ही अविरत हरि स्मरण बना रहे। तब ऐसे सदाचारी अनन्य भक्त के योग क्षेम मैं स्वयम् वहन करता हूँ। इसलिए निश्चिन्त रहा जाए।
साथ ही श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण ने स्पष्ट कहा है कि, इस जन्म में व्यक्ति जितनी योग्यता प्राप्त कर जितनी उन्नति कर लेता है उतनी योग्यता के साथ ही उसका अगला जन्म तदनुकूल परिवार में होता है और वह योग भ्रष्ट पुरुष उस अगले जन्म में उससे आगे ही बढ़ता है। योग भ्रष्ट पुरुष का पतन (नाश) नहीं होता है।
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