श्राद्ध में ये पितर और विश्वेदेवाः के लिए स्वधा (स्व को धारण करने की शक्ति) समर्पित की जाती है।
जिन सात पीढ़ी के पूर्वजों और ऐसे ही अभीतक मर चुके सर्व पितरों के लिए आप जो श्राद्ध करते हैं उनमें से कोई एक का जन्म लेकर सम्भव है कि, स्वयम् आप ही हो, या आपके परिवार में ही कई व्यक्ति हों, जो उस समय उसी स्थान पर हो, इसलिए सात पीढ़ी के पूर्वजों और ऐसे ही अभी तक मर चुके सर्व पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए आपको जिन भोग पदार्थों के प्रति लगाव है उनको चुंकि वे भोग पदार्थ सृष्टि के आदि से आज तक उत्पन्न लोगों के सहयोग से ही आप तक पहूँची है, इसलिए उसका एक अंश जरुरतमंद लोगों को दान कर अपना कर्तव्य निर्वहन करते हैं। इस प्रकार आप
*(1) अग्निष्वात (2) बहिर्षद (3) कव्यवाह (4) अर्यमा, (5) अनल (6) सोम और (7) यम*
तथा
*1 दक्ष, 2 व्रतु, 3 वसु, 4 काम, 5 सत्य, 6 काल, 7 रोचक, 8 आद्रव, 9 पुरुरवा तथा 10 कुरज*
के प्रति अपनी श्रद्धा समर्पित करते हैं।
ये पितर और विश्वेदेवाः उन पदार्थों में से एक परमाणु भी ग्रहण नहीं करते हैं, वे केवल आपकी श्रद्धा और प्रेम ग्रहण कर अब जो चीजें आपके पास बची है, उन चीजों में उनका अपना स्नेह और प्रेम डाल देते हैं इस कारण अब वे चीजें आपके लिए आयु, पुष्टि, तुष्टि और सन्तुष्टि कारक, बल वर्धक, स्वास्थ्य वर्धक हो जाती है।
और आपने जिन मृतको के निमित्त श्राद्ध किया है उन्हें भी तुष्टि और पुष्टि, बल और सामर्थ्य के रूप में पहूँचा देते हैं।
न कोई देवता, न देव, न भगवान न ईश्वर न परमात्मा कोई भी आपके द्वारा अर्पित भोग का एक परमाणु भी ग्रहण नहीं करते हैं। उसमें से वे केवल आपकी श्रद्धा और प्रेम ग्रहण कर उस भोग में डाल देते हैं इस कारण वह प्रसाद (कृपा) बन जाता है। और आपको अत्यन्त रोचक, स्वादिष्ट लगने लगता है। यह चमत्कार प्रायः सभी ने अनुभव किया है।
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