गुरुवार, 4 सितंबर 2025

वेदों पर हिन्दी में भाष्य रचकर महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने उपकार किया।

जिस समय भारत में वास्कोडिगामा भी नहीं आया था, तब भी भारतीय यह जानते थे कि, सर्प के कान नहीं होते। वह केवल भूमि का कम्पन्न ही त्वचा के माध्यम से अनुभव करता है।
इसका प्रमाण है - सूरदास जी का पद जो उन्होंने तानसेन की प्रशंसा में लिखा था ---
विधना यह जिय जानि कै, सेसहिं दियें न कान |
 धरा मेरु सब डोलि हैं, तानसेन की तान।

इसीलिए उस समय भी और आज भी सपेरे भी यही कहते रहे कि, साँप/ नाग सुन नहीं सकते फिर भी वे बीन ही बजाते हैं और कोई वाद्य नहीं बजाते हैं। ताकि बीन की ध्वनि से उत्पन्न कम्पन बिल में छुपा सर्प या नाग सह नहीं पाता और तत्काल बाहर आ जाता है।
लेकिन यह तथ्य आज भी वैज्ञानिक नहीं समझ पाये।

इसलिए आधुनिक व्यावसायिक शिक्षा के अलावा हमारे गुरुकुलों में दिया जाने वाला वैदिक मन्त्र संहिताओं, ब्राह्मण ग्रन्थों, षड वेदाङ्गो, चार उप वेदों, अर्थशास्त्र, श्रीमद्भगवद्गीता कर्मयोग शास्त्र, पूर्व मीमांसा और उत्तर मीमांसा दर्शन, योग शास्त्र, सांख्य शास्त्र, न्याय शास्त्र, वैशेषिक शास्त्र, का ज्ञान होना आवश्यक है।
क्योंकि श्रीमद्भगवद्गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा है कि, शास्त्रोक्त विधि से ही केवल शास्त्रोक्त कर्म ही करें, अर्थात केवल निष्काम भाव से (परम के लिए ही अर्थात परमार्थ कर्म) यज्ञ के लिए ही यज्ञ करें। और निषिद्ध कर्मों के विषय में मन में विचार ही उत्पन्न नहीं हो। निषिद्ध कर्मों के प्रति उपरामता हो। यह तभी सम्भव है जब आपको शास्त्र ज्ञान हो।
लेकिन पौराणिकों ने वेदों को अनावश्यक सिद्ध करने के लिए लिखा कि, यह व्रत करने से या केवल यह कथा सुनने से ही हजारों अश्वमेध यज्ञ और राजसूय यज्ञों का फल मिल जाएगा। वेदों का अर्थ नही किया जा सकता। केवल कर्मकाण्ड तक वेद मन्त्रों का विनियोग है। पण्डितों ने प्रचार कर दिया कि,घर में महाभारत नहीं रखना और पढ़ना भी नहीं। नही तो जानकर हो जाओगे तो पुराणों को फैंक दोगे। वाल्मीकि रामायण में सत्य इतिहास मत पड़ो कम्बन और तुलसी कृत मन गढ़न्त रामचरितमानस पढ़ो।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण ने भगवान विष्णु के बीहाफ पर स्पष्ट कहा है कि, सदाचारी अनन्योन्याश्रित भक्त के योग क्षेम मैं स्वयम् वहन करता हूँ।
चमत्कारों के चक्कर में करोड़ों बर्बाद हो चुके हैं।
लेकिन जिन्हें ऋत पर पूर्ण विश्वास है, वे ही सदाचारी अनन्योन्याश्रित भक्त इन चक्करों में कभी नहीं पड़ते। वे केवल ईश्वर पर आस्था रखते हैं क्रियाओं पर नहीं।
जब वेदों का अनुवाद मेक्समूलर ने यूरोपीय जातियों को ही ज्ञानी और श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए किया तो, वैदिक संहिताओं, ब्राह्मण ग्रन्थों, वैदिक भाषा छन्दस, संस्कृत, उच्चारण शास्त्र शिक्षा, पाणिनि अष्टाध्याई, पतञ्जली महाभाष्य, वररुचि का वार्तिक, भोज वृत्ति, यास्क का निरुक्त, पिङ्गल का छन्द शास्त्र, जैमिनी की और बादरायण की मीमांसा, ज्योतिष और शुल्ब सूत्र, धर्म सूत्र, गृह्य सूत्र और श्रोत सूत्र अर्थात कल्प का ज्ञान नहीं होने लेकिन अंग्रेजी शिक्षित, उसके पूर्व सायण, महिधर आदि अनेक विद्वानों के वेद भाष्य होते हुए भी भारतियों को मेक्समूलर के अनुवाद पर आस्था टिक गई ।
मेक्समूलर द्वारा स्थापित गलत अवधारणाओं का व्याकरण, निरुक्त, न्याय शास्त्र के आधार पर वेदों पर हिन्दी भाषा में भाष्य रच कर सशक्त खण्डन कर सांख्य शास्त्र और पूर्व मीमांसा दर्शन पर आधारित मान्यताओं को पुनर्स्थापित करने का कार्य दयानन्द सरस्वती जी ने किया।
यदि वेदों का भाष्य करना अनुचित है तो क्या, पूर्व में हुए भाष्यकार, उपनिषदों पर भाष्य करने वाले भगवान शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, निम्बार्काचार्य आदि सब गलत थे?
या पौराणिक लोग पुराणों द्वारा थोपी गई भ्रामक और गलत अवधारणाओं के खण्डन होने के भय से वेदाध्ययन का विरोध कर रहे हैं?

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