शनिवार, 30 अगस्त 2025

ज्येष्ठा, अलक्ष्मी, निऋति और कनिष्ठा लक्ष्मी।

ज्यैष्ठा देवी की तुलना निऋति या निर्ऋति से कर सकते हैं।
निऋति अधर्म और हिन्सा से उत्पन्न, अव्यवस्था (ऋत का अभाव) स्वरूप, अज्ञान, दारिद्र, (कङ्गाली के स्तर की गरीबी), रोग, वृद्धावस्था, बाँझपन (निस्सन्तानत्व), भय, महाभय (आतङ्क) और मृत्यु तथा नर्कवास प्रदाता, दक्षिण-पश्चिम की अधिष्ठात्री देवी है। जिनका स्वरूप दुर्गासप्तशती की चण्ड-मुण्ड विनाशनी काली देवीबर (चामुण्डा) के समान है। इनका वाहन पुरुष का शव है।
पौराणिक मत में समुद्र मन्थन में लक्ष्मी के ठीक पहले प्रादुर्भाव होने के कारण इन्हें ज्येष्ठा कहा जाता है। इन्हें राक्षसों को सोपा गया। निऋति को राक्षसों का शासक माना जाता है।
भय वश लक्ष्मी पूजा के पहले ज्येष्ठा की पूजा की जाती है।

यथार्थ में पहले अलक्ष्मी निस्तारण (अटाला बाहर) करनें के बाद श्री लक्ष्मी का आव्हान करना चाहिए।
इसलिए दीपावली के पहले साफ सफाई करके ही लक्ष्मी पूजा करते हैं।और बची खुची अलक्ष्मी निस्तारण रात में चार-पांच बजे के बीच पुरानी झाड़ू सहित कर दिया जाता है।

लेकिन आदिवासी दीवाली के दिन न तो झाड़ू लगाते हैं, न नहाते हैं। धोते तो कभी नहीं है। उनका मानना है कि, धोने से घर धुल जाता है। इसलिए पत्थर से पोंछ लेते हैं।😃

जैन लोग भी रुद्र देवता की तिथियों अष्टमी और चतुर्दशी को मूंह तक नहीं धोते हैं। अमावस्या को भी नहीं नहाते हैं।

पौराणिक परम्परा में शंकर जी ने लक्ष्मी को बहन माना है।
लक्ष्मी देवी के बहुत से रूप पुराणों में प्रसिद्ध है।--- 
प्रभविष्णु और श्री तथा लक्ष्मी अर्थात नारायण और नारायणी।
श्रीहरि की शक्ति समुद्र मन्थन से निकली कमलासना लक्ष्मी जिन्हें दो गज स्नान कराते रहते हैं।
महर्षि भृगु की पुत्री लक्ष्मी जिसे शंकर जी ने बहन माना है। सम्भवतः इनका विवाह वामन अवतार से हुआ।

गजलक्ष्मी व्रत की कथा 
पूजा विधि ।
 
धर्मशास्त्रों के अनुसार भाद्रपद शुक्ल अष्टमी ज्येष्ठा नक्षत्र युक्त अमान्त भाद्रपद पूर्णिमान्त आश्विन कृष्ण अष्टमी तक हाथी पर सवार देवी गजलक्ष्मी/ मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना की जाती है।  
सोलह दिनों तक चलने वाले इस व्रत में निम्न कथा पढ़ी जाती है। गज लक्ष्मी देवी की पूजा तथा कृपा से अच्छे स्वास्थ्य तथा सुखी जीवन की कामना पूर्ण होती है।  

गजलक्ष्मी व्रत कथा 
 
मान्यतानुसार महाभारत काल में देवी कुंती ने भी यह व्रत किया था। 
एक समय महर्षि श्री वेदव्यास जी हस्तिनापुर पधारे। उनका आगमन सुन महाराज धृतराष्ट्र उनको आदर सहित राजमहल में ले गए। स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान कर उनका पूजन किया। श्री व्यास जी से माता कुंती तथा गांधारी ने हाथ जोड़कर प्रश्न किया- हे महामुने! आप त्रिकालदर्शी हैं अत: आपसे हमारी प्रार्थना है कि आप हमको कोई ऐसा सरल व्रत तथा पूजन बताएं जिससे हमारा राज्यलक्ष्मी, सुख-संपत्ति, पुत्र-पोत्रादि व परिवार सुखी रहें।
 
इतना सुन श्री वेद व्यास जी कहने लगे- मैं आप लोगों के समक्ष एक ऐसे व्रत का पूजन व वर्णन करूँगा; जिससे सदा लक्ष्मी जी का निवास होकर सुख-समृद्धि की वृद्धि होती है। 
यह श्री महालक्ष्मी जी का व्रत है, इसे गजलक्ष्मी व्रत भी कहा जाता है। जिसे प्रतिवर्ष अमान्त भाद्रपद पूर्णिमान्त आश्विन कृष्ण अष्टमी को विधिवत किया जाता है।
 
कुन्ती और गान्धारी ने कहा हे महामुने! इस व्रत की विधि हमें विस्तारपूर्वक बताने की कृपा करें। 
तब व्यास जी बोले- 
'हे देवी! यह व्रत ज्येष्ठा नक्षत्र युक्त भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से प्रारंभ किया जाता है। इस दिन स्नान करके सोलह सूत के धागों का डोरा बनाएं, उसमें सोलह गांठ लगाएं, हल्दी से पीला करें। प्रतिदिन डोरे को सोलह दूब व सोलह गेहूं चढ़ाएं। 
 
अमान्त भाद्रपद पूर्णिमान्त आश्विन कृष्ण अष्टमी के दिन उपवास रखकर मिट्टी के हाथी पर श्री महालक्ष्मी जी की प्रतिमा स्थापित कर विधिपूर्वक पूजन करें। इस प्रकार श्रद्धा-भक्ति सहित महालक्ष्मी जी का व्रत, पूजन करने से आप लोगों की राज्यलक्ष्मी में सदा अभिवृद्धि होती रहेगी। इस प्रकार व्रत का विधान बताकर श्री वेदव्यास जी अपने आश्रम को प्रस्थान कर गए।
 
इधर समयानुसार ज्येष्ठा नक्षत्र युक्त भाद्रपद शुक्ल अष्टमी से गांधारी तथा कुंती अपने-अपने महलों में नगर की स्‍त्रियों सहित व्रत का आरंभ करने लगीं। इस प्रकार पन्द्रह दिन बीत गए। सोलहवें दिन अमान्त भाद्रपद पूर्णिमान्त आश्विन कृष्ण अष्टमी के दिन गांधारी ने नगर की स‍भी प्रतिष्ठित महिलाओं को पूजन के लिए अपने महल में बुलवा लिया। माता कुंती के यहां कोई भी महिला पूजन के लिए नहीं आई। साथ ही माता कुंती को भी गांधारी ने नहीं बुलाया। ऐसा करने से माता कुंती ने अपना बड़ा अपमान समझा। उन्होंने पूजन की कोई तैयारी नहीं की एवं उदास होकर बैठ गईं।
 
जब पांचों पांडव युधिष्ठिर, अर्जुन, भीम, नकुल और सहदेव महल में आए तो कुंती को उदास देखकर पूछा- हे माता! आप इस प्रकार उदास क्यों हैं? आपने पूजन की तैयारी क्यों नहीं की?' 
 
तब माता कुंती ने कहा- 'हे पुत्र! आज महालक्ष्मी जी के व्रत का उत्सव गांधारी के महल में मनाया जा रहा है। उन्होंने नगर की समस्त महिलाओं को बुला लिया और उसके सौ पुत्रों ने मिट्टी का एक विशाल हाथी बनाया, जिस कारण सभी महिलाएं उस बड़े हाथी का पूजन करने के लिए गांधारी के यहां चली गईं, लेकिन मेरे यहां नहीं आईं। 
 
यह सुनकर अर्जुन ने कहा- 'हे माता! आप पूजन की तैयारी करें और नगर में बुलावा लगवा दें कि हमारे यहां स्वर्ग के ऐरावत हाथी की पूजन होगी। इधर माता कुंती ने नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया और पूजा की विशाल तैयारी होने लगी। उधर अर्जुन ने बाण के द्वारा स्वर्ग से ऐरावत हाथी को बुला लिया। 
इधर सारे नगर में शोर मच गया कि कुंती के महल में स्वर्ग से इंद्र का ऐरावत हाथी पृथ्वी पर उतार कर पूजा जाएगा। 
 
समाचार को सुनकर नगर के सभी नर-नारी, बालक एवं वृद्धों की भीड़ एकत्र होने लगी। 
उधर गांधारी के महल में हलचल मच गई। वहां एकत्र हुईं सभी महिलाएं अपनी-अपनी थालियां लेकर कुंती के महल की ओर जाने लगीं। देखते ही देखते कुंती का सारा महल ठसाठस भर गया। माता कुंती ने ऐरावत को खड़ा करने हेतु अनेक रंगों के चौक पुरवा कर नवीन रेशमी वस्त्र बिछवा दिए। नगरवासी स्वागत की तैयारी में पुष्प माला, अबीर, गुलाल, केशर हाथों में लिए पंक्तिबद्ध खड़े थे। 
 
जब स्वर्ग से ऐरावत हाथी पृथ्‍वी पर उतरने लगा तो उसके आभूषणों की ध्वनि गूंजने लगी। ऐरावत के दर्शन होते ही जय-जयकार के नारे लगने लगे। सायंकाल के समय इन्द्र का भेजा हुआ हाथी ऐरावत माता कुंती के भवन के चौक में उतर आया, तब सब नर-नारियों ने पुष्प-माला, अबीर, गुलाल, केशर आदि सुगंधित पदार्थ चढ़ाकर उसका स्वागत किया। 

राज्य पुरोहित द्वारा ऐरावत पर महालक्ष्मी जी की मूर्ति स्थापित करके वेद मंत्रोच्चार द्वारा पूजन किया गया। नगरवासियों ने भी महालक्ष्मी पूजन किया। फिर अनेक प्रकार के पकवान लेकर ऐरावत को खिलाए और यमुना का जल उसे पिलाया गया। राज्य पुरोहित द्वारा स्वस्ति वाचन करके महिलाओं द्वारा महालक्ष्‍मी का पूजन कराया गया। सोलह गांठों वाला डोरा लक्ष्मी जी को चढ़ाकर अपने-अपने हाथों में बांध लिया। ब्राह्मणों को भोजन कराया गया। दक्षिणा के रूप में स्वर्ण आभूषण, वस्त्र आदि दिया गया। तत्पश्चात महिलाओं ने मिलकर मधुर संगीत लहरियों के साथ भजन-कीर्तन कर संपूर्ण रात्र‍ि महालक्ष्‍मी व्रत का जागरण किया।

दूसरे दिन प्रात: राज्य पुरोहित द्वारा वेद मंत्रोच्चार के साथ जलाशय में महालक्ष्मी जी की मूर्ति का विसर्जन किया गया। फिर ऐरावत को बिदा कर इंद्रलोक को भेज दिया। इस प्रकार जो स्‍त्रियां श्री महालक्ष्मी जी का विधिपूर्वक व्रत एवं पूजन करती हैं, उनके घर धन-धान्य से पूर्ण रहते हैं तथा उनके घर में महालक्ष्मी जी सदा निवास करती हैं। ऐसी इस गजलक्ष्मी व्रत की महिमा है। 
 
पूजन के समय महालक्ष्मी जी की यह स्तुति अवश्य बोलें-
 
महालक्ष्‍मी नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं सुरेश्वरि।
हरि प्रिये नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं दयानिधे।।

*महाराष्ट्र में प्रचलित ज्येष्ठा कनिष्ठा महालक्ष्मी व्रत*
 *ज्येष्ठागौरी का आह्वान पूजन और विसर्जन* ---

अग्निपुराण एवं देवी भागवत (स्कंद ९.३८/३९) में ‘यमराज – सावित्री’ संवाद में भाद्रपद शुक्ल अष्टमी, ज्येष्ठा नक्षत्र में ‘महालक्ष्मी / गौरी पूजन’ का उल्लेख है |
कुछ ग्रंथो के अनुसार रजोगुण से युक्त ज्येष्ठा गौरी यह ‘अलक्ष्मी’ है, जिसका पूजन प्रथम किया जाता है | और कनिष्ठा यह ‘लक्ष्मी’ है जिसका पूजन बादमे होता है |
यह शिवपरिवार की देवी है और ‘कनौज’ में इसका महापीठ है |
इसने स्त्रियोंके सौभाग्य का असुरोंसे रक्षण किया, तभीसे ‘महालक्ष्मी गौरी पूजन’ की शुरुवात हुई ऐसा भी बताया जाता है |
चैत्र मासमे भी प्रतिपदा से अक्षय तृतीया तक इसका पूजन किया जाता है |
 ‘संगीत पारिजात’ ग्रन्थ के अनुसार ‘गौरी’ यह माता पार्वतीकी ‘रागिनी’ है जिसको संध्याकाल में गाया जाता है | (इसमे ऋषभ,धैवत कोमल बाकी सब स्वर शुद्ध है |)

*भाद्रपद शुक्ल पक्ष में अनुराधा नक्षत्र में आह्वान,अष्टमी तिथियुक्त ज्येष्ठा नक्षत्र में पूजन और मूल नक्षत्र में विसर्जन होता है।*

मैत्रेणावाहये देवीं ज्येष्ठायां तु प्रपूजयेत् | मूले विसर्जये देवीं त्रिदिनं व्रतमुत्तमम् ||
यदाज्येष्ठा द्वितीयदिने मध्यान्हात्पूर्वम् समाप्यते | तदा पूर्वदिनमेव पूजनम् |
परदिने अपराण्हे स्पृशति तदा परैव ||

वैशिष्ट्य
इस उत्सव मे ज्येष्ठा / कनिष्ठा देवी की अपत्यप्राण एकत्रित पूजा की जाती है |
इस पूजा में भी बहुत विविधताए दिखती है |

जैसे मिट्टीके द्वारा बनाए हुए परम्परागत देवियों प्रतिमाओं की पूजा कर आराधना की जाती है जहा आकर्षक आरास (साज-सज्जा) और झांकी (शोभा) बनाई जाती है |
कई बार मटको द्वारा रची आरास (साज-सज्जा) को पोशाक अलंकार आदि पहनाकर उनका पूजन किया जाता है |
दक्षिण भारत के कुछ स्थानों पर यह उत्सव भाद्रपद शुक्ल तृतीया से मनाया जाता है। वहाँ आटे से बनी देवी प्रतिमाओं का पूजन किया जाता है |
कुछ स्थानों पर धान्य राशि पर रची देवियों की छवि की पूजा की जाती है |
कोकण प्रांत में नदी / तालाब से बालू व कंकर लाकर उनकी स्थापना एवं पूजन किया जाता है |
कोली आदि कुछ समाज गुलतेवड़ी (तेरडा) नामक वनस्पति के पौधे लाकर उनमे देवियोकी स्थापना व पूजन करते हैं |

पूजन क्रम
साधारणतः यह उत्सव तीन दिन मनाया जाता है तथा यह नक्षत्र प्रधान माना जाता है |

प्रथम दिन
इस दिन अनुराधा नक्षत्र को ‘गौरी देवि’ का आवाहन किया जाता है | घर की सौभाग्यवती महिलाए द्वार पर इसे लेकर आती है |
पश्चात उनका दुध से पाद प्रक्षालन किया जाता है और कुमकुम से ‘महालक्ष्मी पदचिन्ह’ बनाकर मङ्गल ध्वनी से उन्हें घरका दर्शन कराया जाता है |
बादमे जहा आरास (साज-सज्जा) रची हो वहा इन्हें स्थापित किया जाता है |
कई बार जहा इन्हें स्थापित किया जाता है वहा (जैसे विवाह में मण्डप में धातु या मिट्टी के मटकों से झांकी सजाते हैं वैसे ही) धान्य से भरी हुई मटके पायली या मटके का उपयोग किया जाता है | (सात सेर अनाज मापने के बर्तन को पायली कहते हैं।) 
बादमे ‘भाजी-भाकरी’ (अम्बाडे की सब्जी) का भोग चढाने का भी रिवाज पाया जाता है |

द्वितीय दिन
ज्येष्ठा नक्षत्र में ‘गौरी पूजन’ सम्पन्न किया जाता है | इसकी पूजन विधि इस प्रकार है –

पूजन विधी
वंदन ---
घरके सभी बड़े व बुजुर्गोको, अपने घरमे स्थापित देवता और कुलदेवता को वंदन करे |
आचमन / प्राणायाम : तीन बार जल प्राशन करते हुए चौथी बार पत्र में छोड़े और प्राणायाम करे |
देवतास्मरण :
कुलदेवताभ्यो नमः| ग्रामदेवताभ्यो नमः| एतत् कर्म प्रधान देवताभ्यो नमः| सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमो नमः|

संकल्प --- 
(हाथसे जल छोड़े )
मम सकुटुंबस्य सपरिवारस्य अलक्ष्मी निरसनपूर्वक धनधान्य पुत्रपौत्र सौभाग्यादि अभिवृद्धिद्वारा श्रीज्येष्ठादेवी प्रीत्यर्थं भाद्रपद शुक्लपक्षे ज्येष्ठा नक्षत्रे यथाज्ञानेन यथाशक्ति यथामिलित उपचार द्रव्यैः षोडशोपचार ज्येष्ठादेवी पूजनं अहं करिष्ये |

तत्रादौ निर्विघ्नता सिध्यर्थं महागणपति स्मरणं शरीर शुध्यर्थं षडङ्गन्यासं पृथ्वी, कलश, शङ्ख, घण्टा पूजनं च करिष्ये |

श्रीगणेश पूजन ---
वक्रतुण्ड महाकाय सुर्यकोटि समप्रभ |निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा || श्रीगणेशाय नमः ||

पृथ्वी पूजन ---
पृथ्वी त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता | त्वं च धारय मां देवी पवित्रं कुरु चासनम् || भूम्यै नमः ||

न्यास विधि --- 
विष्णवे नमः | ऐसा १२ बार कहते हुए मस्तक से लेके चरण पर्यंत स्वयं की शरीर शुद्धि करे | 

कलश पूजन --
कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः | मूले तत्रस्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः || कलशाय नमः ||

शङ्ख पूजन ---
त्वं पुरा सागरोत्पन्नो विष्णुना विधृतः करे | नमितः सर्व देवैश्च पाञ्चजन्य नमोस्तुते || शङ्खाय नमः ||

घण्टा पूजन ---
आगमार्थं तु देवानां गमनार्थं तु राक्षसाम् | कुर्वे घण्टारवं तत्र देवताव्हान लक्षणम् || घण्टायै नमः ||

दीप पूजन ---
भो दीप ब्रह्म रूपस्त्वं ज्योतिषां प्रभुरव्ययः | आरोग्यं देहि पुत्रांश्च सर्वान्कामान्प्रयच्छ मे || दीपदेवताभ्यो नमः ||

आत्मशुद्धि---
स्वयं पर एवं पूजा साहित्य पर शंख जल प्रोक्षण करे |
शङ्खोदकेन पूजाद्रव्याणि संप्रोक्ष्य आत्मानं च प्रोक्षेत् |

प्राणप्रतिष्ठा विधी

आवाहित देवता को दाहिने हाथ से स्पर्श करते हुए अग्रिम श्लोको का उच्चारण करे,

अस्यैः प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यैः प्राणाः क्षरन्तु च | अस्यै देवत्वमर्चायै मा महेतिच कच्चन ||
अस्यां मूर्तौ मम प्राण इह प्राणाः | अस्यां मूर्तौ मम जीव इह स्थितः ||

देवता को दर्पण दिखाए तथा अष्टगंध, पुष्प एवं बालभोग (घी-गुड) अर्पण करे |
पात्र में जल छोड़ते हुए बोले,“अनया पूजया अपत्यप्राण सहित श्रीज्येष्ठाकनिष्ठिका: प्रीयताम् |”
अधिक विस्तृत विधी करने हेतु पुरोहितका मार्गदर्शन ले |

पूर्वपूजन
ध्यान ---
हाथ में अक्षत, पुष्प लेकर आवाहित देवता का इस श्लोक से ध्यान करे और उसे अर्पण करे |

त्रिलोचनां शुक्लदन्तीं बिभ्रतीं काञ्चनीं तनुम् |विरक्ता रत्कनयनां ज्येष्ठां ध्यायामि सुन्दरीम् ||
अपत्यप्राण सहित श्रीज्येष्ठाकनिष्ठिकाभ्यां नमः || ध्यानं समर्पयामि ||

पूर्व उपचार--- 
 तत्पश्चात “अपत्यप्राण सहित श्रीज्येष्ठाकनिष्ठिकाभ्यां नमः ||” ऐसा उच्चारण करते हुए या श्रीसूक्त के हरेक मंत्र से आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, पंचामृतस्नान, गंधोदक स्नान, मांगलिक स्नान, शुद्धोदक स्नान आदि सभी पूजा उपचार पुष्प से जल सिंचन करते हुए करे |
धूप, दीप, नैवेद्य ---
 बाद में पुर्वपुजन प्रीत्यर्थ भगवान पर फूल चढ़ाए, धुप – दीप और शेष पंचामृत या घी-गुड का भोग चढ़ाए |
पुर्वपूजन समारोप : अब अभिषेक करने हेतु पहले के पुष्प (निर्माल्य) उतारकर नए पुष्प चढ़ाए और कहे.
“अनेन पुर्वाराधनेन अपत्यप्राण सहित श्रीज्येष्ठाकनिष्ठिका: प्रीयताम् |”
अभिषेक : इस समय श्री देवीस्तुतीपर श्रीसूक्त या देवीस्तोत्र आदिका पठण करे और पुष्प से जलसिंचन करे |
अंग पूजा ---
 प्रत्येक इन्द्रियोपर / प्रत्येक नामके बाद देवीको अक्षत अर्पण करे |
लक्ष्म्यै नमः – पादौ पूजयामि ||, पद्मायै नमः – गुल्फौ पूजयामि ||
कमलायै नमः – जानुनी पूज. ||, क्षिराब्धितनयाय नमः –उरुं पूज.||
इन्दिरायै नमः – कटिं पूज. ||, मन्गलायै नमः – नाभिं पूज. ||
मन्मथवासिन्यै नमः – स्तनौ पूज.||, क्षमायै नमः – हृदयं पूज.||
हरिप्रियाय नमः – कण्ठे पूज. ||, उमायै नमः – नेत्रे पूज. ||
रमायै नमः – शिरं पूज. ||, श्रीमहालक्ष्म्यै नमः – सर्वाङ्गं पूज.||

नामपत्री पूजा --- 
प्रत्येक नाम के साथ उल्लेखित पत्री (ना होने पर अक्षत) अर्पण करे |
श्रीयै नमः – अगस्तीपत्रं समर्पयामि || (अगस्ती वृक्षपान)
श्रीलक्ष्म्यै नमः – केतकीपत्रं समर्प. || (केवड्याचे पान)
श्रीवनमालिकाये नमः – धत्तुरापत्रं समर्प.|| (धोत्र्याचे पान)
बिभिषणायै नमः – तुलसीपत्रं समर्प.|| (तुळशीचे पान)
शाकय नमः – अशोकपत्रं समर्प. || (अशोकाचे पान)
वसुमालिकायै नमः – भृन्गराजपत्रं समर्प. || (माक्याचे पान)
सूर्यायै नमः – किन्वपत्रं समर्प. || (केन्याचे पान)
पन्कजधारिण्यै नमः – पङ्कजपत्रं समर्प. || (कमळाचे पान)
मुक्ता हारसमप्रभायै नमः – दुर्वां समर्प. || (दुर्वा)
पुष्कारिण्यै नमः – जपापत्रं समर्प. || (जास्वंदाचे पान)
पिन्गलिन्यै नमः – बिल्वपत्रं समर्प. || (बेलाचे पान)
हेममालिन्यै नमः – चंपकपत्रं समर्प. || (चाफ्याचे पान)
इन्दिरायै नमः – अपामार्गपत्रं समर्प. || (आघाड्याचे पान)
जमदग्निप्रियाय नमः – ताडपत्रं समर्प. || (ताडाचे पान)
श्रीजगदात्र्यै नमः – नानाविधपत्राणि समर्प. || (इतर सर्व पाने)

उत्तर पूजन

 *अपत्यप्राण सहित श्रीज्येष्ठाकनिष्ठिकाभ्यां नमः |*
 इस श्लोकसे सूती वस्त्र, गंध, अक्षत, पुष्प, हल्दी – कुमकुम, माला, इत्र – सुगंधी द्रव्य, अलंकार आदी उपचार अर्पण करे |
अपने कुलपरम्परा के अनुसार वस्त्र, सूत्र, धान्य-राशि, पत्री आदि अर्पण करे |
कुछ जगहों पर ‘फुलोरा’ बनाया जाता है तथा कुछ जगहों पर ‘कथली आम्बिल’ पूजन किया जाता है |
इसके बाद में गोद भराई /ओटी / वायन दान दिया जाता है |
नैवेद्य में घावन घाटले / पुरणपोली / आंबील / सोलह सब्जी आदि पदार्थोका भोग चढ़ाया जाता है |
आरती व मंत्रपुष्प ---
बाद में आरती व मंत्रपुष्पांजली, प्रदक्षिणा व नमस्कार अर्पण करे,

महालक्ष्मी च विद्महे विष्णुपत्नी च धीमहि | तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ||”मन्त्रपुष्पाञ्जलिं समर्पयामि ||

अर्घ्यप्रदान ---
 दाहिने हाथ में गंध, अक्षत, पुष्प, सुपारी, सिक्का लेकर उसपर जल छोड़ते हुए इस श्लोक से अर्घ्य दे |
ज्येष्ठे श्रेष्ठे तपोनिष्ठे ब्रह्ममिष्ठे सत्यवादिनी |इह्येहित्वं महाभागे अर्घ्यं गृह्य सरस्वती ||श्रीज्येष्ठागौर्यै नमः | इदं अर्घ्यं समर्पयामि ||

प्रार्थना ---
हाथ जोड़कर प्रार्थना करे और तदनन्तर ब्राह्मण-सुवासिनी पूजन करे |
त्वं लक्ष्मीस्त्वं महादेवी त्वं ज्येष्ठे सर्वदामरैः |पूजितोsसि मया देवी वरदाभव मे सदा ||

तृतीय दिन

मूल नक्षत्र में आवाहित देवताका विसर्जन किया जाता है |

आवाहित देवता का पंचोपचार पूजन किया जाता है |
कुल परम्परा के अनुसार दहीभात / मुरडपोली इ. का भोग लगाया जाता है |
बादमे पूजा कथा सुनते है और सूत्र को पीले रंगका और सोलह गाठीयोसे बांधा जाता है | इस प्रसादरुपी सूत्र को महिलाए गलेमे धारण कराती है | कई बार यह सूत्र आश्विन पौर्णिमा तक पहना जाता है |  
ग्रामीण भागो में प्राप्त धान्य का ‘राशि भोज’ कराने की प्रथा दिखाई देती है |
इस श्लोक का उच्चारण करते हुए आवाहित देवताका विसर्जन किया जाता है,
ज्येष्ठे देवी समुत्तिष्ठ स्वस्थानं गच्छ पूजिता |ममाभीष्ट पदानार्थं पुनरागमहेतवे ||



*आचार्य कमल नन्दलाल के अनुसार महाकौशल प्रांत में प्रचलित कथा* ⤵️

*संकल्प मंत्र---* 
करिष्यsहं महालक्ष्मि व्रत में त्वत्परायणा। तदविध्नेन में यातु समप्तिं स्वत्प्रसादत:॥

 *सोलह बोल की कथा---* अमोती दमो तीरानी, पोला पर ऊचो सो परपाटन गांव जहां के राजा मगर सेन दमयंती रानी, कहे कहानी। सुनो हो महालक्ष्मी देवी रानी, हम से कहते तुम से सुनते सोलह बोल की कहानी॥

 *विशिष्ट मंत्र---
* ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं गजलक्ष्म्यै नमः॥

*सोलह दिनात्मक गजलक्ष्मी व्रत कथा एवम विधि।*

ऋग्वेद में देवी लक्ष्मी को ‘श्री’ व भूमि प्रिय सखी कहा है। लक्ष्मी को चंचला भी कहते हैं अर्थात जो कभी एक स्थान पर रूकती नहीं। 
श्री का अर्थ है व्यक्ति की हैसियत या औकात। 
शब्द “लक्ष्मी” का अर्थ है लक्ष्य को साधना। शास्त्रों में वर्णित लक्ष्मी के आठ स्वरूपों में से गजलक्ष्मी स्वरूप को कलयुग में सर्वश्रेष्ठ माना गया है क्योंकि इससे गरीबी दूर होती है। इन्हीं देवी गजलक्ष्मी की साधना का महापर्व है सोलह दिनों तक चलने वाला महालक्ष्मी व्रत।

ज्योतिष के पञ्चाङ्ग खंड अनुसार गजलक्ष्मी महापर्व अर्थात महालक्ष्मी व्रत का प्रारंभ भाद्रपद शुक्ल अष्टमी ज्येष्ठा नक्षत्र से होगा व इसका समापन अमान्त भाद्रपद पूर्णिमान्त आश्विन कृष्ण अष्टमी के दिन होगा। अर्थात राधा अष्टमी से कालाष्टमी तक चलने वाला गजलक्ष्मी महापर्व सूर्य के स्थिति से संबंधित है। जब सूर्य निरयन कन्या राशि में आता है इन्हीं सोलह दिनों में महालक्ष्मी के गजलक्ष्मी स्वरूप की पूजा का विधान है। 
इस व्रत का आरम्भ ज्येष्ठा नक्षत्र के चंद्र से करना चाहिए। इस व्रत में षोडश यानि 16 की संख्या का महत्व है जैस 16 वर्षों हेतु, 16 दिन हेतु, 16 नर-नारियों हेतु, 16 पुष्प-फल 16 धागों व 16 गांठों का डोरा इत्यादि।

 *पूजन विधि---* 
शास्त्रनुसार इस व्रत में 16 दिनों तक हाथी पर विराजित लक्ष्मी की स्थापना सूर्यास्त के बाद दो घण्टे चौबीस मिनट में अर्थात प्रदोष काल में नीचे दिए गए संकल्प मंत्र
*संकल्प मंत्र:* 
करिष्यsहं महालक्ष्मि व्रत में त्वत्परायणा। तदविध्नेन में यातु समप्तिं स्वत्प्रसादत:॥ बोलकर संकल्प लेकर करें। 
चौकी पर लाल वस्त्र बिछाकर केसर-चंदन से रंगे अक्षत से अष्टदल बनाकर कलश स्थापित कर मिट्टी से बने 2 हाथियों संग गजलक्ष्मी की मूर्ति प्रतिष्ठित करें। गजलक्ष्मी की 16 उपायों से षोडशुपचार पूजा करें। *गौघ्रत का दीप व सुगंधित धूप करें, रोली, चंदन, ताल, पत्र, दूर्वा, इत्र, सुपारी, नारियल व कमल पुष्प चढ़ाएं। नैवेद्य में गेहूं के आटे से बना मीठा रोट चढ़ाएं व 16 श्रृंगार चढ़ाएं। हल्दी से रंगे 16-16 सूत के 16 सगड़े बनाकर हर सगड़े पर 16 गांठे देकर गजलक्ष्मी पर चढ़ाएं।* 
इस व्रत में 16 बोल की कथा ---
*अमोती दमो तीरानी, पोला पर ऊचो सो परपाटन गांव जहां के राजा मगर सेन दमयंती रानी, कहे कहानी। सुनो हो महालक्ष्मी देवी रानी, हम से कहते तुम से सुनते सोलह बोल की कहानी।* 16 बार कहें ।
कमलगट्टे की माला से इस विशिष्ट मंत्र ---
*ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं गजलक्ष्म्यै नमः।* 
का 16 माला जाप करें। 

*सोलह बोल की कथा---
*अमोती दमो तीरानी, पोला पर ऊचो सो परपाटन गांव जहां के राजा मगर सेन दमयंती रानी, कहे कहानी। सुनो हो महालक्ष्मी देवी रानी, हम से कहते तुम से सुनते सोलह बोल की कहानी।*

 *विशिष्ट मंत्र---
* ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं गजलक्ष्म्यै नमः॥*

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