गुरुवार, 25 सितंबर 2025

वैदिक धर्म, सनातन धर्म और हिन्दू धर्म।

ब्राह्म धर्म अर्थात श्रोत्रिय या वैदिक धर्म---
सदाचारी जीवन, षोडश संस्कार, पञ्च महायज्ञ, अष्टाङ्ग योग साधना और वर्णाश्रम व्यवस्था पालन करना।
ब्राह्मण ग्रन्थों पर आधारित ब्राह्मण धर्म ---
उक्त के अलावा यज्ञ सत्रों का आयोजन होने लगा था। यथा सामर्थ्य व्यक्ति यज्ञों का आयोजन करता था। 
ब्राह्मण ग्रन्थों पर आधारित सूत्र ग्रन्थों के रचनाकाल में कर्मकाण्ड क्लिष्ट होने लगे थे। विधि- निषेध बढ़ गये थे। यज्ञ कर्ताओं में शास्त्रार्थ होने लगे थे।
स्मार्त मत ---
फिर सूत्र ग्रन्थों के आधार पर स्मृति ग्रन्थ रचे गए। धर्म सूत्रों पर आधारित मनु स्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, पाराशर स्मृति, ब्रहस्पति स्मृति आदि बीस स्मृतियों की रचना हुई। मूलतः ये विधि-विधान (नियम- कानून) के ग्रन्थ थे। आचरण के नियम सख्त हो गये।
यह स्मार्त मत कहलाता है।
आद्य शंकराचार्य जी ने भी सुधन्वा के राज्य के लिए एक स्मृति ग्रन्थ (संविधान) लिखा था।
शंकराचार्य जी द्वारा पञवचदेवोपासना का विधान किया। ताकि, वैष्णव-शैव-शाक्त- गाणपत्य और सौर सभी सन्तुष्ट रहे।
इनमें से कोई एक इष्ट देव हो और शेष चार की पूजा भी करना आवश्यक है। शास्त्रार्थ मे हारने वाले को यह स्वीकार करना पड़ता था।

ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के ब्राह्मण ग्रन्थों के आधार पर रचित षड वेदाङ्ग --- 1 कल्प अर्थात शुल्बसूत्र, श्रोत सूत्र, गृह्यसूत्र और धर्मसूत्र तथा 2 शिक्षा अर्थात उच्चारण का शास्त्र 3 व्याकरण 4 शब्द व्युत्पत्ति का शास्त्र निरुक्त अर्थात भाषाशास्त्र, और निघण्टु या शब्दकोश 5 छन्दशास्त्र, 6 ज्योतिष अर्थात ब्रह्माण्ड विज्ञान के प्राचीन मूल ग्रन्थ और चार उपवेद --- ऋग्वेद का आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद, सामवेद का गन्धर्ववेद (सङ्गीत और नाट्य) तथा अथर्ववेद का स्थापत्य वेद या शिल्पवेद के मूल ग्रन्थों के रचनाकाल तक का समय वैदिक काल कहलाता है। यह वर्णाश्रम व्यवस्था, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पुरुषार्थ की प्राप्ति हेतु सदाचार, पञचमहायज्ञ, अष्टाङ्ग योग साधना प्रधान काल था।
इसके बाद आता है स्मृति काल या स्मार्तकाल जिसके अन्तर्गत धर्मसूत्रों के आधार पर मनु स्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति आदि बीस स्मृतियों की रचना हुई, तथा इतिहास के ग्रन्थ वाल्मीकि रामायण और महाभारत रचे गए, वेद अर्थात श्रुति और स्मृतियों के वाक्यों में भासने वाले विरुद्ध वाक्यों की मीमांसा कर एकवाक्यता सिद्ध करने वाले जैमिनी की पूर्व मीमांसा दर्शन और बादरायण का उत्तर मीमांसा दर्शन (शारीरिक सूत्र), योग दर्शन (कर्म मीमांसा का मुख्य ग्रन्थ श्रीमद्भगवद्गीता सहित), सांख्य दर्शन (सांख्य कारिकाओं सहित तत्व मीमांसा), तर्क शास्त्र का ग्रन्थ न्याय दर्शन और भौतिक तत्व मीमांसा का का ग्रन्थ वैशेषिक दर्शन आदि षड दर्शन, तथा अर्थशास्त्र के प्राचीन मूल ग्रन्थों तथा मूल पुराणों के रचनाकाल का समय स्मृतिकाल कहलाता है। जिसकी अधिकतम सीमा भगवत्पाद कुमारील भट्ट और भगवान आद्यशंकराचार्य जी के समय तक मानी जा सकती है। यह  सतर्क होकर सदाचारी जीवन युक्त धर्मपालन में दृढ़ता के साथ यज्ञ-याग प्रधान समय था ।
इसके बाद उक्त सभी ग्रन्थों की व्याख्या पतञ्जली का महाभाष्य और भाष्यों की आलोचना के कात्यायन और वररुचि राजा भोज आदि के द्वारा रचित वार्तिक ग्रन्थों तथा उनके आधार पर रचित निबन्ध ग्रन्थों की रचना कर उक्त सभी ग्रन्थों को सरलीकृत किया गया। ये सनातन धर्म के अन्तिम मूल ग्रन्थ हैं। यह कर्मकाण्ड प्रधान समय था लेकिन सदाचार संयम को ही धर्म माना जाता था। ईश्वर समर्पण का भाव मुख्य था।
इसके बाद सनातन धर्म मत, पन्थ और सम्प्रदायों में विभाजित हो गया जिसमें आद्य शंकराचार्य जी के शिष्य विद्यारण्य स्वामी जो श्रङ्गेरी मठ के बारहवें शंकराचार्य थे से लेकर कामकोटि पीठ के आचार्य चिदम्बरम वासी श्री विश्वजीके पुत्र आचार्य अभिनव शंकर जी जो 787ईस्वी से 840 ईस्वी तक 53 वर्षायु तक रहे और तीस वर्षों तक गोवर्धन मठ के 38 वें शंकराचार्य रहे, जिन्होंने कश्मीर के वाक्पति भट को शास्त्रार्थ में पराजित किया था जिन्हें इतिहासकार आदि शंकराचार्य मान बैठे हैं के द्वारा स्थापित अद्वैत सम्प्रदाय, महाराष्ट्र में जन्मे श्री निम्बार्काचार्य जी का अचिन्त्त्य भेदाभेद सम्प्रदाय, तमिलनाडु में जन्मे श्री रामानुजाचार्य का विशिष्ठाद्वैत सम्प्रदाय, तान्त्रिक ग्रन्थ शिव सूत्र के रचयिता कश्मीर के वसुगुप्त का प्रत्यभिज्ञा दर्शन या कश्मीरी शैव सम्प्रदाय, और इसी दर्शन के आधार पर छत्तीसगढ़ के रायपुर निकट जन्मे श्री वल्लभाचार्य जी का शुद्धाद्वैत सम्प्रदाय, बङ्गाल में जन्मे श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु का अचिन्त्त्य भेदाभेद सम्प्रदाय तथा रामानन्द जी का रामानन्दी सम्प्रदाय मुख्य हैं। 
इस अवधि में भजन-कीर्तन, मठ मन्दिर और मूर्ति पूजा प्रचलित हो गई। सदाचारी जीवन केवल आदर्श रह गया लेकिन इष्ट को रीझाने के लिए वैदिक कर्तव्य गौण हो गये।
सन्त कबीर, गुरु नानक देव, रामचरितमानस जी के रचयिता सन्त तुलसीदास, वल्लभाचार्य जी के अनुयाई सन्त सूरदास जी, श्रीकृष्ण चेतन्य के अनुयाई जयदेव जी आदि द्वारा प्रचलित राधावल्लभ सम्प्रदाय, तमिल कवि कम्बन, सन्त ज्ञानेश्वर जी द्वारा स्थापित वारकरी सम्प्रदाय आदि भक्ति सम्प्रदाय ने वर्तमान प्रचलित हिन्दू पन्थ सम्प्रदाय प्रारम्भ हुआ जिसपर तन्त्र मत, ताओ मत, माध्यमिक सम्प्रदाय, अनीश्वरवादी मत, नास्तिक मत और अब्राहमिक मत सभी का भरपूर प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। इसी प्रकार अरबी और यूरोपीय सभ्यता-संस्कृति का भी अत्यधिक प्रभाव है। अब न धर्म रहा न संस्कृति केवल सभ्यता और विधि-विधान अर्थात नियम कानून का ही बोलबाला है। अब ईश्वर श्रद्धा-प्रेम का पात्र न होकर भय कारक हो गया। लोगों के मन में अब्राहमिक सिद्धान्त "ईश्वर से डरो" घर कर गया।
इसलिए शुद्ध सनातनी और आर्य समाजी स्वयम् को हिन्दू के स्थान पर सनातनी और आर्य बोलते हैं।

उक्त हिन्दूओं में यह प्रवृत्ति देखी जा रही है कि, मधु-माधव आदि मासों वाला वसन्त सम्पात सायन मेष संक्रान्ति से प्रारम्भ वैदिक संवत, विषुव संवत या कलियुग संवत तो भूल ही गए हैं साथ ही, पञ्जाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, बङ्गाल, उड़ीसा, तमिलनाडु और केरल में अभी भी प्रचलित निरयन मेष संक्रमण से प्रारम्भ मेष, वृषभ आदि मासों के साथ नक्षत्रिय संवत जो युधिष्ठिर संवत और विक्रम संवत के रूप में प्रचलित है, उसके स्थान पर निरयन मेष संक्रमण आधारित चान्द्र शक चैत्रादि मासों के साथ मानते हैं । और गुड़ी पड़वा को नव वर्ष मनाते हैं।
चैत्र मास में श्रीरामचन्द्र जी और हनुमान जी तथा देवी की उपासना करते हैं, श्रावण मास में शंकर जी की उपासना करते हैं, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को श्रीकृष्ण जी की, अमान्त भाद्रपद पूर्णिमान्त आश्विन कृष्ण पक्ष में पितरों के लिए श्राद्ध करते हैं, आश्विन शुक्ल पक्ष में नवरात्र में दुर्गा और भद्रकाली के रूप में महासरस्वती अवतार की पूजा, पूर्णिमा को लक्ष्मी पूजा दीपावली को लक्ष्मी पूजा और महाकाली पूजा करते हैं, कार्तिक मास में विष्णु पूजा करते हैं और अमान्त माघ, पूर्णिमान्त फाल्गुन कृष्ण पक्ष में शिवरात्रि को शंकर जी की उपासना करते हैं। 
रविवार को सूर्य की, सोमवार को शंकर जी की, मङ्गलवार को अष्ट विनायक और हनुमान जी की, बुधवार को मालवा में गजानन की , गुरुवार को दत्तात्रेय की, शुक्रवार को लक्ष्मी आराधना और शनिवार को शनि देव की आराधना करते हैं।
लेकिन इन व्रत पर्वों के अतिरिक्त इन देवी-देवताओं को भूल जाते हैं। इनके मन्दिर तक सूने हो जाते हैं।

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