सातवें आसमान पर बैठा व्यक्ति निश्चित ही सातवें आसमान से आकार (साइज) मेंं छोटा होगा। अतः गोलाकार हो या दृव और गैस के समान कूटाकृति लेकिन निराकार तो हो ही नही सकता।
निराकार सर्वव्यापक परमात्मा ही हो सकता है।
ॐ कार नाम से ही स्पष्ट है कि ॐ भी साकार ही है। शेष देव हों या देवता निराकार नही मानें गये हैं। चाहे वे तरङ्गाकार हो, कूटाकृति हो, दीर्घगोलाकर (सामान्य भाषा में अण्डाकार) हो, गोलाकार हो या पुरुषाकृति (देह के समान आकार वाले) हों।
यहूदी यहोवा परमेश्वर के अलावा पवित्रात्मा (उनके देवताओं या फरिश्तों) को भी नमन / दण्डवत नमन करते हैं। विद्या ददाति विनयम्, विनयम् ददाति पात्रताम्। विनम्रता गुण है कोई दोष नहीँ। अपने से योग्य और वरिष्ठों का आदर करना सद्गगुण है दोष नही। उनके सामने विनम्र होना ही चाहिए । ठूंठ जैसे खड़े रहना तो ढीठता ही है। पर वे भी देवताओं को परमेश्वर नही मानते। अतः उनके लिये भी यह नही कहा जा सकता कि, वे यहोवा परमेश्वर के समतुल्य किसी देवता फरिश्ते / पवित्र आत्मा को मानते हैं।
ईसाइयों का धर्म भी यहुदियों के ही समान है।केवल कर्मकाण्ड की क्रियाओं में थोड़ा अन्तर है। ईसाई भी यहोवा परमेश्वर के अलावा पवित्रात्मा (उनके देवताओं या फरिश्तों) को भी नमन करते हैं। पर वे भी देवताओं को परमेश्वर नही मानते। साथ ही यीशु को भी परमेश्वर का पुत्र मानते हैं। पर सर्वोच्च स्थान उनके मन में भी यहोवा के प्रति ही है।यीशु दुसरे स्थान पर ही हैं। अतः उनके लिये भी यह नही कहा जा सकता कि, वे यहोवा परमेश्वर के समतुल्य किसी देवता फरिश्ते / पवित्र आत्मा को मानते हैं।
फिर उन्हें मुशरिक कैसे कहा जाता है। यह तो केवल उन्हें मुशरिक कहनें वाले ही जानें।
अब आता हूँ सनातन वेदिक धर्म पर—
सनातन.वेदिक धर्म के सर्वव्यापी परमात्मा की अवधारणा सर्वोच, परमपद परमेश्वर को ही अन्तिम सत्य माननें वाले समझ ही नही पाये।
परमात्मा सबकुछ है। जो सत और असत से भी परे है। ज्ञान और अज्ञान से भी परे है, (वेदोsहम अवेदोsहम )।आनन्द और अनानन्द से भी परे है। अर्थात परमात्मा के बारे में सोचना ही सम्भव नही है। उसे परम आत्म स्वरूप जानकर ही परमात्मा होकर ही समझा जा सकता है। क्योंकि परमात्मा ही वास्तविक मैं / परम आत्म है।
सनातन वेदिक धर्म में (ऋग्वेद में) विष्णु परमपद कहा गया है। परमेश्वर कहा गया है। सवितृ देव को महेश्वर और नारायण को जगदीश्वर कहा गया। हिरण्यगर्भ को भी ईश्वर कहा जाता है। और सनातन वेदिक धर्मी तो अवस्था मेंबड़े, योग्यता मेबड़े, सदाचरण में श्रेष्ठ, पद में बड़े, प्रतिष्ठा में बड़े सबको प्रणाम करते हैं। कहा भी है कि, जो जितना विनमृ हो समझना चाहिए कि, वह उतना ही योग्य और क्षमतावान होगा। क्षमा वीरस्य भूषणम्। विद्या ददाति विनयम्।
मतलब ईश्वरों की श्रेणी है। ईश्वरत्व मात्र पदाधिकारी है। सर्वोच्च सत्य/ परम सत्य नही है। किन्तु इनमें से किसी के भी समतुल्य कोई विरोधी देवता (इब्लीस जैसा शैतान) नही है। और परमात्मा तो परम है/ एब्सोल्यूट है।
यह अवधारणा नही समझपाने के कारण सनातन वेदिक धर्म को बहूदेववादी होनें का आरोप लगाया जाता है।
जबकि देवता/ फरिश्ते तो यहूदी, ईसाई, और इस्लाम अर्थात इब्राहीमी सम्प्रदायों में भी है। यहूदी तो उन्हें दण्डवत प्रणाम भी करते हैं।
खेर अपनी अपनी समझ।
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