निरुद्देश्य कर्म तो निषिद्ध कर्म माना जाता है।
अनर्गल चेष्ठाएँ जैसे बैठे बैठे पेर हिलाना, हाथों की उँगलियों से अकारण कुछ करन, फोन पर बात करते हुए कागज पर कुछ चितरना (अनघड़ डिजाइन बनाना, हस्ताक्षर करना आदि) निरुद्देश्य कर्म होने से निषिद्ध कर्म है।
दान देना एक कर्तव्य है।
लेकिन दान देने के पीछे कई मंशा या आशय (इण्टेन्शन) और उद्देश्य हो सकते हैं,
1 किसी जरुरतमंद की आवश्यकता पूर्ति करना।
चूंकि वह वस्तु मेरे पास है और जरुरतमंद व्यक्ति को उस चीज की आवश्यकता मुझ से अधिक है, उसे इसकी आपूर्ति की तत्काल आवश्यकता है इसलिए तत्काल दे देना।
अर्थात कर्तव्य मान कर दान करना। बस यही दान सार्थक है। यही दान है।
शेष व्यापार मात्र है।
2 देखनें वालों में मेरी दानशीलता का प्रभाव पड़ेगा, यश, प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि और प्रचार होगा। इसका फल तत्काल मिल जाता है और कर्मफल पूर्ण हो जाता है।
ये थे कर्म फल जिसमें पहले वाला निष्काम कर्म अर्थात यज्ञ के लिए यज्ञ था।
शेष सभी राजसी तामसी दान केवल बन्धन कारक हैं।
3 अनन्त गुना होकर मेरे अकाउण्ट में जमा रहेगा और आवश्यकता पड़ने पर लौटकर मुझे मिल जाएगा। अर्थात स्वार्थ बुद्धि। खाते में पुण्य संचय होकर इसका फल होता है।
4 स्वर्गादि लोक प्राप्ति।
5 अन्तःकरण शुद्धि - यह नया फण्डा है। जो मेरे मत में केवल मुर्खतापूर्ण सोच है। त्रिगुणात्मक प्रकृति और प्राकृतिक पदार्थ चित्त, बुद्धि, अहंकार और मन कभी शुद्ध नहीं हो सकते। क्योंकि ये प्रकृति में आये विकार का परिणाम है। विकृति ही है। शुद्ध तो केवल प्रज्ञात्मा ही है। मूलतः ये लोग प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) को जीव भाव से मुक्त कर प्रज्ञात्मा की ओर ले जाकर प्रज्ञात्मा में लीन करना चाहते हैं, लेकिन तत्व मीमांसा के ज्ञान के अभाव में गलत शब्द बोलते हैं।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन
का अर्थ लोगों ने गलत किया है। परिणाम की अपेक्षा से ही कर्म होता है, लेकिन कर्मफल ऋत के अनुसार स्वतः होता ही है, कर्मफल की इच्छा रखना या न रखने से ऋत को कोई अन्तर नहीं पड़ता। ऋत की प्रक्रिया नियत है। उसे आपकी सोच नहीं बदल सकती।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें