जबकि भूमि को अपनी धूरी पर पूरा चक्कर लगाने में 23 घण्टे 56 मिनट 4.999 सेकण्ड लगते हैं। (इसको सेडरल रोटेशन पिरियड ऑफ अर्थ कहते हैं।)
प्रत्येक तिथि सूर्य से चन्द्रमा की बारह-बारह डिग्री की दुरी पर होती है।
एक तिथि की औसत अवधि 23 घण्टे 37 मिनट 28.096 सेकण्ड होती है। लेकिन
एक तिथि की कालावधि 19 घण्टे 59 मिनट से 26 घण्टे 47 मिनट तक रहती है।
अर्थात 4 घण्टे 01 मिनट क्षय और 2 घण्टे 47 मिनट अधिक हो सकती है। अर्थात 10 घटि 2.5 पल क्षय और 06 घटि 57 पल 30 विपल अधिक हो सकती है। इसे प्रायः सप्त वृद्धि दश क्षय बोला जाता है।
सूर्य से चन्द्रमा की अंशात्मक दूरी 00° से 12° होने पर प्रतिपदा तिथि समाप्त होती है। 12° से 24° अन्तर होने पर द्वितीया तिथि समाप्त होती है। 24° से 36° दूर होने पर तृतीया तिथि समाप्त होती है। ऐसे ही आगे भी पूर्णिमा तक होता है। फिर कृष्ण पक्ष प्रारम्भ होकर पुनः 12°-12° के अन्तर से प्रतिपदा आदि तिथियाँ होती है। सूर्य से चन्द्रमा की अंशात्मक दूरी 192° होने पर कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा समाप्ति, 204° दूरी होने पर कृष्ण पक्ष की द्वितीया समाप्ति। ऐसे ही जब अन्तर 360° अर्थात 000° हो जाता है तो अमावस्या तिथि समाप्त होकर शुक्ल पक्ष प्रारम्भ हो जाता है।
दो चन्द्रोदय के बीच की औसत अवधि 24 घण्टे 48 मिनट 45.838 सेकण्ड होती है।
तिथि का आधा भाग करण कहलाता है। अर्थात प्रत्येक तिथि में दो करण होते हैं। इनमें विष्टि करण को भद्रा बोलते हैं।
वैदिक काल में क्रान्तिवृत के आस-पास आठ-नौ अंश उत्तर-दक्षिण में फैले क्षेत्र में नक्षत्र योग तारा के आस-पास की एक निश्चित आकृति के तारा मण्डल को नक्षत्र कहते थे। लेकिन इन नक्षत्रों का विस्तार अर्थात भोगमान भिन्न भिन्न होता था।
वर्तमान में क्रान्तिवृत के सत्ताईसवें भाग 13°20' को नक्षत्र कहा जाता है; जो गलत है।
क्रान्तिवृत के सत्ताईसवें भाग अर्थात एक नक्षत्र में चन्द्रमा के रहने की अवधि अर्थात एक चन्द्र नक्षत्र की औसत अवधि 24 घण्टे 17 मिनट 9.317 सेकण्ड होती है।
बारह राशियों और सत्ताइस नक्षत्रों का समायोजन 000°, 120° और 240° पर होता है अर्थात मीन राशि के अन्तिम बिन्दु 30°अर्थात रेवती नक्षत्र के अन्त और मेषादि बिन्दु मेष राशि के 00° पर अर्थात अश्विनी नक्षत्र के प्रारम्भ बिन्दु पर फिर, कर्क राशि के अन्तिम बिन्दु कर्क 30° अर्थात आश्लेषा नक्षत्र के अन्तिम बिन्दु और सिंह राशि के प्रारम्भ बिन्दु सिंह 00° अर्थात मघा नक्षत्र के आदि बिन्दु और फिर, वृश्चिक राशि के अन्तिम बिन्दु वृश्चिक 30° अर्थात ज्येष्ठा नक्षत्र के अन्तिम बिन्दु और धनु राशि के प्रारम्भ बिन्दु धनु 00° अर्थात मूल नक्षत्र के आदि बिन्दु के मिलन स्थल को गण्डमूल नक्षत्र कहते हैं। जिसमें जन्में बच्चों के लिए सत्ताईसवें दिन उसी नक्षत्र में गण्डमूल नक्षत्र शान्ति करवाई जाती है।
निरयन सूर्य के राशि अंश कला विकला और निरयन चन्द्रमा के राशि अंश कला विकला जोड़ कर सत्ताइस का भाग देने पर विष्कुम्भादि योग बनते हैं। लेकिन सायन सूर्य के राशि अंश कला विकला और सायन चन्द्रमा के राशि अंश कला विकला जोड़ योग यदि 180° हो तो उस समय को व्यतिपात कहते हैं और सायन सूर्य के राशि अंश कला विकला और सायन चन्द्रमा के राशि अंश कला विकला जोड़ योग यदि 360° हो तो उस समय को वैधृतिपात कहते हैं।
ये दोनों चन्द्रमा के पात हैं। संहिता ज्योतिष में व्यतिपात और वैधृतिपात को अशुभ समय मानते हैं। इसलिए शुभ कार्यों में इनके आसपास के छः-छः घण्टे निषिद्ध माने जाते हैं।
सूर्य और चन्द्रमा समान अंशादि पर हो तो तो अमावस्या कहलाती है। इस समय अमावस्या तिथि समाप्त होती है।
दो अमावस्याओं के बीच के लगभग 29 दिन 12 घण्टे 44 मिनट 02.9 सेकण्ड की अवधि को चान्द्रमास कहते हैं।
सूर्य से 180° की दूरी को पूर्णिमा कहते हैं। इस समय पूर्णिमा तिथि समाप्त होती है।
सूर्य से चंद्रमा 120° के अन्तर पर हो तो शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि प्रारम्भ होती है। और 132° का अन्तर हो तब शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि समाप्त होती है।
सूर्य से चंद्रमा 300° के अन्तर पर हो तो कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि प्रारम्भ होती है। और सूर्य से चन्द्रमा की दूरू 312° का अन्तर हो तब कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि समाप्त होती है।
अर्थात चन्द्रमा से सूर्य की दूरी 60° हो तो कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि प्रारम्भ होती है। और चन्द्रमा से सूर्य की दूरू 48° का अन्तर हो तब कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि समाप्त होती है।
सूर्य और चन्द्रमा में 90° या 270° का अन्तर हो तो आकाश में अर्धचन्द्र दिखता है। इस समय अष्टमी तिथि का मध्य काल होता है। अर्थात
सूर्य से चंद्रमा 84° के अन्तर पर हो तो शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि प्रारम्भ होती है। और सूर्य से चन्द्रमा की दूरी 96° का अन्तर हो तब शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि समाप्त होती है।
सूर्य से चंद्रमा 264° के अन्तर पर हो तो शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि प्रारम्भ होती है। और 276° का अन्तर हो तब कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि समाप्त होती है।
चंद्रमा से सूर्य की दूरी 84° के अन्तर पर हो तो कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि प्रारम्भ होती है। और चन्द्रमा से सूर्य की दूरी 96° का अन्तर हो तब कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि समाप्त होती है।
पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा जिस नक्षत्र पर या जिस नक्षत्र के एक नक्षत्र आगे-पीछे होता है उस नक्षत्र के नाम पर निरयन सौर संक्रमण आधारित चान्द्र मास का नाम करण किया गया है। जैसे चैत्र पूर्णिमा को चन्द्रमा चित्रा नक्षत्र मे, वैशाख पूर्णिमा को चन्द्रमा विशाखा नक्षत्र में, ज्येष्ठ पूर्णिमा को चन्द्रमा ज्येष्ठा नक्षत्र में, आषाढ़ पूर्णिमा को चन्द्रमा पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में, श्रावण पूर्णिमा को चन्द्रमा श्रवण नक्षत्र मे, भाद्रपद पूर्णिमा को चन्द्रमा पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र मे, आश्विन पूर्णिमा को चन्द्रमा अश्विनी नक्षत्र में, कार्तिक पूर्णिमा को चन्द्रमा कृतिका नक्षत्र में, मार्गशीर्ष पूर्णिमा को चन्द्रमा मृगशीर्ष नक्षत्र में, पौष मास में चन्द्रमा पुष्य नक्षत्र में, माघ पूर्णिमा को चन्द्रमा मघा नक्षत्र में और फाल्गुन पूर्णिमा को चन्द्रमा पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में रहता है।
निरयन सौर संक्रमण (संक्रान्तियों) पर आधारित बारह चान्द्र मासों का एक चान्द्र वर्ष होता है जिसको शक या शकाब्द कहते हैं ।
इसलिए एक नियम बनाया गया कि, निरयन सूर्य के जिन दो संक्रमण (संक्रान्तियों) के बीच कोई अमावस्या (समाप्त) न हो वह मास अधिक मास कहलाता है, उस शक में चान्द्रवर्ष तेरह चान्द्र मासों का होता है।
लगभग 28 माह से 38 माह के बीच अधिक मास पड़ता है।
जिन दो अमावस्याओं के समाप्ति समय के बीच निरयन सूर्य का संक्रमण (संक्रान्ति) न हो वह क्षय मास होता है। लेकिन इस क्षय मास वाले शक में ही क्षय मास के पहले और क्षय मास के बाद एक-एक अधिक मास पड़ता है। इस प्रकार क्षय मास वाला शक भी तेरह चान्द्र मासों का ही होता है। इस प्रकार प्रत्येक 19 वर्ष, 122 वर्ष और 141 वर्ष में एक क्षय मास पड़ता है।
पृथ्वी जिस मार्ग से सूर्य की परिक्रमा करती है उसे क्रान्तिवृत कहते हैं। नक्षत्रिय गणना में चित्रा तारे को क्रान्तिवृत का मध्य बिन्दु माना जाता है। और चित्रा तारे से 180° पर क्रान्तिवृत का प्रारम्भ माना जाता है। किसी समय वहाँ रेवती नक्षत्र का योग तारा विद्यमान था जो अब लगभग 04° से अधिक खिसक गया है, इस कारण क्रान्तिवृत के प्रारम्भ बिन्दु पर कोई तारा नही दिखता है।
क्रान्तिवृत पर सूर्य का एक परिभ्रमण पूर्ण होने को नक्षत्रिय वर्ष कहते हैं।
एक नक्षत्रिय वर्ष का मान 365 दिन 06 घण्टे 09 मिनट 09.8 सेकण्ड होता है। इस काल में सूर्य से भूमि की दूरी बढ़ने के कारण अत्यल्प वृद्धि होती रहती है।
क्रान्तिवृत के प्रत्येक 30° पर सूर्य के पहूँचने पर नक्षत्रिय सौर मास परिवर्तन होता है। जिसे सूर्य का निरयन संक्रमण कहते हैं। लेकिन बोलचाल की भाषा में संक्रान्ति बोलते हैं।
भूमि की भूमध्य रेखा के समानांतर आकाश में विषुव वृत होता है।
विषुव वृत्त और क्रान्तिवृत्त दोनों ही एक दूसरे के साथ एक ही तल में नहीं हैं, बल्कि 23.49 डिग्री के झुकाव पर हैं।
इसलिए भूमि सूर्य का परिभ्रमण करते हुए विषुव वृत पर जहाँ मिलती है वह स्थान प्रतिवर्ष गत वर्ष के मिलन स्थल से लगभग 50.2° पीछे पश्चिम में रहता है। इस कारण सायन गणना में वर्ष मान 365 दिन 05 घण्टे48 मिनट 45.2 दिन का होता है ।
अर्थात नक्षत्रिय वर्ष से सायन वर्ष 20 मिनट 24.6 सेकण्ड छोटा है। इसलिए लगभग 71 वर्ष में सायन सौर वर्ष से नक्षत्रिय सौर वर्ष में एक दिन का अन्तर हो जाता है।
25778 से 25779 नाक्षत्रीय (निरयन) सौर वर्ष में 25779 से 25780 सायन सौर वर्ष व्यतीत हो जाते हैं।
लगभग 2148 वर्ष में एक माह का अन्तर हो जाता है।
लगभग 4297 वर्ष में एक ऋतु का अन्तर हो जाता है।
लगभग 8593 वर्ष में एक मौसम का अन्तर हो जाता है। और लगभग 12890 वर्ष में अर्धवर्ष का अन्तर हो जाता है।
22 मार्च 285 ईस्वी में वसन्त सम्पात और चित्रा तारे से 180° पर स्थित निरयन मेषादि बिन्दु या अश्विनी नक्षत्र का प्रारम्भ बिन्दु एक साथ थे। तो 20 मार्च 13175 में वसन्त सम्पात चित्रा तारे पर होगा।
वैदिक समय में संवत्सर वसन्त सम्पात से प्रारम्भ होता था। इस दिन उत्तरायण/ उत्तर गोल, वसन्त ऋतु और मधु मास प्रारम्भ होता था। उस समय ब्रह्मावर्त भारत का भाग होता था। अब तजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, तिब्बत आदि भारत में नहीं रहे। इससे भारत का केन्द्र उज्जैन हो गया।
लेकिन धार्मिक कार्यों में, व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार और यज्ञ प्रारम्भ करने और पूर्णाहुति का दिन निश्चित करने, संस्कारों के दिन निश्चित करने में, राज्याभिषेक करने में मधुमास से नभस्य मास तक उत्तरायण / उत्तर गोल, ईष मास से तपस्य मास तक दक्षिणायन /दक्षिण गोल, वसन्त आदि ऋतुओं, सायन सौर मास (मधु-माधव में वसन्त, शुक्र-शचि में ग्रीष्म, नभस-नभस्य में वर्षा, ईष-उर्ज में शरद, सहस-सहस्य में हेमन्त और तपस-तपस्य मास में शिशिर) में चन्द्रमा के नक्षत्र के दिन कार्य निर्धारित करते थे। क्योंकि वैदिक काल में व्यषटिका (शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा), चन्द्र दर्शन वाली रात्रि (द्वितीया), एकाष्टका (अर्द्ध चन्द्र वाली रात्रि, शुक्ल पक्ष की अष्टमी), पूर्णिमा ( पूर्ण चन्द्र वाली रात्रि), अष्टका (अर्द्ध चन्द्र वाली रात्रि, कृष्ण पक्ष की अष्टमी) और अमावस्या (बिना चन्द्रमा वाली रात्रि) के अलावा किसी तिथि का उल्लेख ही नहीं है।
वर्तमान में उत्तरायण तीन माह पहले से अर्थात सायन मकर संक्रान्ति 22 दिसम्बर से प्रारम्भ मानते हैं। मधु - माधव आदि मास और वसन्तादि ऋतुएँ भी एक माह पहले से मानते हैं। संवत्सर प्रारम्भ माधव मास से करते हैं। यह संशोधन इसलिए करना पड़ा क्योंकि वर्तमान में ब्रह्मावर्त क्षेत्र भारत से बाहर हो गया और आर्यावर्त तथा दक्षिण भारत मिलाकर ही भारत रह गया।
आज भी दक्षिण भारत में तमिलनाडु, केरल, और पूर्व में बङ्गाल, उड़ीसा, असम, मणिपुर, त्रिपुरा आदि में निरयन सौर मास और चन्द्रमा का नक्षत्र के आधार पर ही व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार मनाते हैं।
वसन्त सम्पात सन 1972 के पहले तक 21 मार्च को होता था। लेकिन सन 1972 से वसन्त सम्पात 20 मार्च को होने लगा।
पोप ग्रेगरी के द्वारा ईस्वी सन को सायन सौर वर्ष से पूर्णतः समायोजित करने की युक्ति निकाली। जो इस प्रकार है ---
प्रत्येक चार वर्ष में फरवरी माह को 29 दिन का करके सायन सौर वर्ष से समायोजित कर लेते हैं। फिर शताब्दी वर्ष में फरवरी 28 दिन का ही रखा जाता है। इस प्रकार पुनः सायन सौर वर्ष से समायोजित कर लिया जाता है।
पुनः प्रत्येक चार सौ वें वर्ष मे फरवरी 29 दिन का रखा जाता है। इस प्रकार पुनः सायन सौर वर्ष से समायोजित कर लिया जाता है।
इसलिए ही 2000 ईस्वी मे फरवरी 29 दिन की थी।
इस प्रकार ग्रेगोरी केलेण्डर भी सायन सौर वर्ष पर आधारित है।
इसी आधार पर भारत शासन ने 1957 से राष्ट्रीय शक केलेण्डर लागु किया। इसे कुछ सुधार कर वैदिक पञ्चाङ्ग के तुल्य किया जा सकता है।
सावन वर्ष और सायन सौर वर्ष का संयोजन।
*1 संवत्सर,2 परिवत्सर, 3 इदावत्सर, 4 अनुवत्सर और 5 इद्वत्सर नामक सावन वर्षों के युगों का 3840 (तीन हजार आठ सौ चालिस) वर्षीय महायुग।*
1 संवत्सर - बारह मास / तीनसौ साठ दिन का प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ । फिर षष्ट, सप्तम,अष्टम और नवम वर्ष । वर्ष 360 दिन का वर्ष। सामान्य संवत्सर।
2 परिवत्सर - अधिवर्ष / लीप ईयर। वर्षान्त में एक अधिक मास जोड़कर तेरह मास का तीनसौ नब्भे दिन का वर्ष। फिर ऐसे ही दशम वर्ष, पन्द्रहवाँ वर्ष, बीसवाँ, पच्चीसवाँ, तीसवाँ और (3835 वाँ वर्ष छोड़कर ) पैंतीसवाँ वर्ष 390 दिन का वर्ष।
परिवत्सर के अन्त में सायन सौर वर्ष और सावन वर्ष का लगभग मैल हो जाता है।
3 इदावत्सर - द्वादश मास का तीनसौ साठ दिन का वर्ष। लेकिन केवल चालिसवाँ, अस्सीवाँ, एकसौ बीसवाँ .......अर्थात (3840 वाँ वर्ष छोड़ कर) प्रत्येक चालिसवाँ वर्ष । जिसे अधिवर्ष/ लीप इयर होना था लेकिन अपवाद स्वरूप अधिवर्ष/ लीप इयर नही होता।
इदावत्सर के अन्त में सायन सौर वर्ष और सावन वर्ष का लगभग-लगभग मैल हो जाता है।
4 अनुवत्सर - बारह मास का तीनसौ साठ दिन का वर्ष ।लेकिन केवल प्रत्यैक 3835 वाँ वर्ष ही।
जिसे अधिवर्ष/ लीप इयर होना था लेकिन अपवाद स्वरूप अधिवर्ष/ लीप इयर नही होता।
अनुवत्सर के अन्त में सायन सौर वर्ष और सावन वर्ष का पूर्णमैल हो जाता है।
5 इद्वत्सर - बारह मास का तीनसौ साठ दिन का वर्ष ।लेकिन केवल प्रत्यैक 3840 वाँ वर्ष ही।
जिसे अधिवर्ष/ लीप इयर होना था लेकिन अपवाद स्वरूप अधिवर्ष/ लीप इयर नही होता।
इस इदवत्सर के अन्त में सायन सौर वर्ष और सावन वर्ष का पूर्णतः मैल हो जाता है।
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