शुक्रवार, 19 सितंबर 2025

क्या ज्योतिष छद्म विज्ञान है?

यह तो सभी ज्योतिष ग्रंथों में सर्वसम्मत मत है कि,गुरुत्वाकर्षण प्रभाव से समुद्र में होने वाले ज्वार-भाटा के समान मानव जीवन पर प्रभाव डालने वाला नहीं माना जाता है अर्थात फलित ज्योतिष होरा शास्त्र में ग्रहों के प्रभाव से घटनाएँ नहीं घटती बल्कि ग्रहों को नक्षत्र मण्डल के डायल पर घड़ी की सुइयों के समान मात्र सूचक माना गया है। 
संहिता ज्योतिष में नक्षत्र मण्डल के तारा मण्डल को असमान भोग वाले निश्चित आकृति बनाने वाले सत्ताइस नक्षत्र के स्वभाव निर्धारित किए गए हैं, उन नक्षत्रों में भ्रमण करने वाले ग्रहों के स्वभाव के अनुसार भविष्य में घटने वाली घटनाओं की सूचना मानी जाती थी। जब इराक, मिश्र और पश्चिम टर्की में प्रचलित बारह राशियों को भारत में लागू किया गया तो तीस अंश की राशि में नक्षत्रों का समायोजन करने के लिए 13°20' के नक्षत्र और 3°20' का एक नक्षत्र चरण मान लिया गया। इस कारण संहिता ज्योतिष के मूल सिद्धांत फलित ज्योतिष होरा शास्त्र में यथावत लागू नहीं हो सकते।
अब बारह राशियों के स्वभाव निर्धारित किए गए। तदनुसार कुण्डली में बारह भावों की अवधारणा विकसित हुई। जातक के जन्म समय में पूर्व दिशा में उदय हो रहे राशि अंश को लग्न तथा ठीक शीर्ष पर स्थित मेरिडियन काइल के राशि अंशादि को दशम भाव माना गया।
लग्न को व्यक्तित्व, शरीर, और सिर का सूचक माना जाता है। तथा दशम भाव को राज्य और कर्म का सूचक माना गया।
तदनुसार अन्य दसों भाव क्या सूचित करेंगे यह निर्धारित किया गया और इन तीनों के परस्पर सम्बन्धों, द्रष्टि योग के आधार पर फलित किया जाने लगा।
फलित ज्योतिष विज्ञान या छद्म विज्ञान?
तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्॥ ऋग्वेद 1/22/20
वह विष्णु का परम पद है, प्रजापति, इन्द्र, द्वादश आदित्य, अष्ट वसु और एकादश रुद्र जिसे सदा निहारते रहते हैं।

विष्णु लिङ्ग अर्थात विष्णु का प्रतीक चिह्न शालिग्राम शिला है।
विष्णु के हाथ में नियति चक्र है । ऋग्वेदोक्त 90×4 =360 अरों का चक्र है। (चार गुणित नब्बे अर्थात 360अरोंं का संवत्सर चक्र है।) तीनसौ साठ सायन सौर दिनों का संवत्सर ही नियति चक्र कहलाता है।

"चतुर्भि: साकं नवतिं च नामभिश्चक्रं न वृत्तं व्यतीँरवीविपत्। बृहच्छरीरो विमिमान ऋक्वभिर्युवाकुमार: प्रत्येत्याहवम् ॥" ऋग्वेद 01/155/06

ऋग्वेद का उक्त मन्त्र ही नीयती वाद का आधार है।
लेकिन वस्तुतः यह मन्त्र जगत् व्यवस्था अर्थात ऋत के सम्बन्ध में है जिससे पूरी सृष्टि और समष्टि निर्धारित क्रमानुसार संचालित हो रही है।
यजुर्वेद अध्याय 40 मन्त्र 02 
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः ।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ।।
और 
मन्त्र 17
वायुरानिलम्मृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम्।
ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर क्रतो स्मर कृतं स्मर ॥

इसका प्रमाण है कि जीवन का आधार कर्म है, नीयती को लेकर बैठना नहीं।

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 16, श्लोक 23 और 24

 शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्‌॥
भावार्थ : *जो पुरुष शास्त्र विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि को प्राप्त होता है, न परमगति को और न सुख को ही ॥* 16-23॥

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥
भावार्थ : इससे *तेरे लिए इस कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है। ऐसा जानकर तू शास्त्र विधि से नियत कर्म ही करने योग्य है ॥* 16-24॥

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 18, श्लोक9

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन।
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः।। 18-9

हे अर्जुन! जो *शास्त्रविहित कर्म करना कर्तव्य है—इसी भाव से आसक्ति और फल का त्याग करके किया जाता है—वही सात्विक त्याग माना गया है।* 

तुलसीदास जी ने भी कहा है कि,
कर्म प्रधान विश्व रचि राखा।
जो जस करहि सो तस फल चाखा।।
सकल पदारथ हैं जग मांही।
कर्महीन नर पावत नाहीं।।

उक्त श्रुति स्मृति वाक्य प्रमाण है कि, वैदिक धर्म कर्म प्रधान है। न कि, प्रारब्ध के भरोसे बैठे रहने का।
लेकिन लोग यह भी कहते हैं कि,
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 09/ श्लोक 22
अनन्याश चिन्तयन्तो माम् ये जनः पर्युपासते
तेषाहं नित्याभियुक्तानां योग-क्षेमं वहाम्यहम्।।
और
सन्त मलूकदास 
अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काज, 
तरुवर करे न चाकरी, सरवर करे न काम।
दास मलूका कह गए, सबके दाता राम।
तो इन दोनों मतों को सही मानते हुए उत्तर यह है कि, ईश्वर पूर्ण रूप से सदाचारी नियमित प्एक निष्ठ पूर्ण समर्पित रहते हुए शास्त्रोक्त विधि से ही शास्त्रोक्त कर्म करने वाले परोपकारी व्यक्ति के ही योगक्षेम स्वयम् वहन करते हैं।
हम तो मनमाना जीवन जीयें, केवल संसार में ही रमें रहें, केवल स्वार्थ कर्म (स्व अर्थ कर्म) ही करें और आशा करें की ईश्वर हमारे सब कार्य सफल करेगा तो यह सोच ही गलत है।

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