आजकल एक प्रवृत्ति देखी जा रही है कि, इब्राहीमी पन्थ के आदम को आदिदेव (अर्धनारीश्वर महारुद्र) शंकर बतलाना, राम, कृष्ण आदि अवतारी पुरुषों को नबी (एल यहोवा या अल्लाह का दूत) बतलाना, क्रिसमस को सायन मकर संक्रान्ति/ उत्तरायण संक्रान्ति (22दिसम्बर) से जोड़ना, क्रिसमस ट्री के शंकु आकार को लोहिड़ी के शंकु आकार से जोड़ना, यीशु और प्रेषित मोहमद को विष्णु का अवतार बतलाना आदि-आदि।
वस्तुतः सृष्टि उत्पत्ति का सुत्र पर ध्यान केन्द्रित नहीं होने पर हिरण्यगर्भ ब्रह्मा के रोष से सर्वप्रथम अर्धनारीश्वर स्वरूप नीललोहित वर्णी महारुद्र प्रकट हुए। हिरण्यगर्भ के आदेश पर महारुद्र नें नर रूप और नारी रूप में अलग-अलग शरीर धारण किया, जिन्हें शंकर और उमा कहा जाता है।सनक, सनन्दन, सनत्कुमार , सनातन, प्रजापति, और नारद आदि बाद में हुए। इसलिए शंकर जी को आदिदेव कहते हैं।
प्रजापति ने इन्द्र - शचि, अग्नि - स्वाहा, पितर:- स्वधा, तथा धर्म एवम् दक्ष प्रथम - प्रसुति, रुचि - आकुति, कर्दम- देवहूति तथा स्वायम्भूव मनु-शतरूपा आदि को उत्पन्न किया। तत्पश्चात प्रजापति के कहने पर पुरुष स्वरूप शंकर जी से दस रुद्र और नारी स्वरूप उमा से दस रोद्रियाँ हुई। ये ही ग्यारह रुद्र गण कहलाते हैं। जो अष्टमूर्ति रुद्र से भिन्न है।
इसके बाद प्रजापति ने 1 मरीची, 2 भृगु, 3 अङ्गिरा, 4 वशिष्ट, 5 अत्रि, 6 पुलह,7 पुलस्य, 8 कृतु आदि आठ प्रजापतियों को उत्पन्न किया। दक्ष और प्रसुति की पुत्रियों 1 सम्भूति, 2 ख्याति, 3 स्मृति, 4 ऊर्ज्जा, 5 अनसुया, 6 क्षमा, 7 प्रीति, 8 सन्तति से क्रमशः उक्त आठ प्रजापतियों का विवाह हुआ। जिनकी सन्तान ब्रह्मज्ञानी होने से ब्राह्मण कहलाई। और स्वायम्भूव मनु की सन्तान क्षत्रिय कहलाई। धर्म ने भी दक्ष- प्रसुति की दस कन्याओं से विवाह किया।
अत्रि-अनसुया के पुत्र सोम, दत्तात्रेय और दुर्वासा हुए।
सोम नें ब्रहस्पति की पत्नी तारा का हरण कर बुध को जन्म दिया।
बुध का विवाह स्वायम्भूव मनु की पुत्री इला (इळा) से हुआ। बुध और इला से पुरुरवा का जन्म हुआ। इला का पुत्र होने के कारण पुरुरवा को एल कहते हैं। और अरबी में इलाही कहते हैं। अरामी भाषा में इसी एल, इलाही और अल्लाह को ईश्वर वाचक शब्द माना जाता है।
पुरुरवा ने इराक के उर नगर में जन्मी और बड़ी होकर इन्द्र दरबार की नर्तकी बनी उर्वशी अप्सरा से कुछ अवधि के लिए सशर्त विवाह किया। ऐसे विवाह मुताविवाह कहलाता है। जब उर्वशी गर्भवती थी तब समयावधि पूर्ण होने पर उर्वशी वापस उर चली गई। और पुत्र जन्म होने पर पुत्र को पुरुरवा को सौंप कर इन्द्र दरबार में नर्तकी का कार्य ग्रहण कर लिया।
पुरुरवा ने पुत्र का नाम आयु रखा।
आयु को दक्षिण-पूर्वी टर्की के पठार में युफ्रेटिस घाँटि में ईलाझी शहर में अदन वाटिका में पाला। जहाँ बड़ा होने पर उसे स्वर्भानु (राहु) की पुत्री स्वर्भानवी (प्रभा) नें और सीरिया के नागवंशी ने पुरुरवा को ईश्वर मान कर उसकी आज्ञा पालन की प्रवृत्ति के विरुद्ध भड़काया। आयु नें पुरुरवा के आदेश के विरुद्ध बुद्धि वृक्ष का अधपका फल खा लिया। इससे नाराज होकर पुरुरवा ने आयु को देश निकाला दे दिया। आयु वहाँ से जल मार्ग से सिंहल द्वीप पहूँचा। फिर कुछ समय बाद केरल होते हुए, सिन्ध, अफगानिस्तान, ईरान होते हुए इराक पहूँचा।
यहुदी धर्मग्रन्थ तनख (तोराह) जिसे बाइबल पुराना नियम कहते हैं की प्रथम पुस्तक बेरेशित (उत्पत्ति) में उल्लेख है कि, एल याहवेह के द्वारा आदम को उत्पन्न कर, उसकी बाँयी पसली से हव्वा को उत्पन्न किया। आदम को बुद्धि वृक्ष और अमरता के वृक्ष के फल खाने का इन्कार किया था। आदम ने सर्प (नागवंशी) के कहने पर बुद्धि वृक्ष का फल खा लिया तो याहवेह नें आदम को अदन वाटिका के पूर्वी द्वार से निकाल दिया ऐसा लिखा है।
दम मतलब प्राण, शरीर में जबतक प्राण है उसी अवधि को आयु कहते हैं। आयु को अरबों नें आदम कहा। सीरिया के लोग सूर कहलाते हैं। ये कश्यप ऋषि की पत्नी सुरसा की सन्तान होने से सर्प / नाग वंशीय कहलाते हैं। सीरियाई (नाग) द्वारा आदम को भड़काया गया। ज्ञातव्य है कि, कश्यप और दीति की पुत्री और हिरण्यकशिपु की बहन सिंहिका का भी नाम सुरसा और होलिका था। सिंहिका के वंशज सिंहल द्वीप में बसे।
आयु और स्वर्भानवी (आदम और हव्वा) के वंश में प्रतापी राजा नहूष एक प्रतापी राजा हुआ। जिसने शंकर जी की पुत्री अशोक सुन्दरी से विवाह किया। इसे अस्थाई रूप से स्वर्ग का शासक नियुक्त किया लेकिन सप्तर्षियों से पालकी उठवा कर इन्द्राणी के पास जाने के कारण पतित होकर सर्प वंश में परिगणित किया जाने लगा। इसी नहूष को टर्की, सीरिया, इराक (मेसोपोटामिया) के जल प्रलय का नायक न्यूहु कहा जाता है। नहूष और अशोक सुन्दरी के वंशज ययाति हुए ।इनकी ध्वजा पर मोर का चिह्न बना था इसलिए मोरध्वज कहलाते हैं। ययाति वेदमन्त्रों के आदेश का पालन न कर पाने के कारण ब्राह्मण धर्म से बाहर हो गये थे इसलिए यहुदी, ईसाई अब्राह्म या अब्राहम कहते हैं और मुस्लिम इब्राहीम कहते हैं।
रब्बी परम्परा में ययाति (इब्राहीम) को प्रथम नबी माना जाता है।
वास्तविकता में सनातन और इब्राहिमी मत में इस प्रकार सम्बन्ध है।
भविष्य पुराण के अनुसार यीशु जन्म से बारह वर्ष तक इज्राइल में रहे। बारह वर्ष से तीस वर्ष तक की अवस्था (वय) में भारत में तक्षशिला में बौद्ध शिक्षा ग्रहण की, और तीस से तैंतीस वर्ष तक इज्राइल में रहे।
यीशु को शुक्रवार दोपहर मे क्रूस पर चढ़ाया गया और सूर्यास्त से यहुदियों का शनिवार लग जाता जिस दिन वे कोई कार्य नहीं करते थे इसलिए यीशु को शुक्रवार के सूर्यास्त पूर्व ही क्रूस उतार लिया गया। यीशु को उनके शिष्यों ने क्रूस से उतार कर गुफा में रखा और गुफा में ही चिकित्सा की गई और शनिवार के सूर्यास्त के बाद (यहुदियों का रविवार लग जाने पर) रातों रात उठाकर दुसरे स्थान पर ले गए, जहाँ, रविवार को दिन में यीशु ने खड़े होकर प्रवचन दिए। फिर शिष्यों ने यीशु को पुनः भारत में कश्मीर में पहलगाम अपने पुराने साथियों के पास ले आये। यीशु इसम् मुकाम में भी रहे और यूसा आसफ की दरगाह में आज भी उनका शव गड़ा हुआ है।
बाइबल पढ़ेंगे तो उसमें यीशु के जन्म के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण दो ही साक्ष है ।
प्रथम यीशु के जन्म के समय इज्राइल में जनगणना चल रही थी। इसलिए जनगणना के लिए बाइबल पुराना नियम में यहुदी कैलेण्डर के अनुसार नियम बतलाया है।जनगणना वर्ष की गणना तो सटीक हो गई इससे वर्ष तो सही माना जा सकता है। लेकिन उसमें भी माह में अन्तर हो सकता है। क्योंकि बाइबल में यीशु के जन्म समय का न तो ठीक ठीक मौसम बतलाया है, न आकाशीय ग्रह स्थिति।
और
दुसरा जब यीशु जन्मे तो पूर्व के ज्योतिषियों को एक चमकदार तारा दिखा जिसके पीछे पीछे वे वहाँ पहूँचे, जहाँ ठीक (ख स्वस्तिक) सिर पर तारा दिखाई दे रहा था। सम्भवतः वे बेबीलोन ईराक के ज्योतिषी होंगे। जिनने लोबान भेंट किया। भारतीय होते तो प्रसूता के लिए अजवायन, हल्दी और सोंठ और मेवों के लड्डु ले जाते। जैसे कि, जन्माष्टमी को बनाते हैं।
उन ज्योतिषियों ने भी आकाश में तारों और ग्रहों की ठीक-ठीक स्थिति का वर्णन नहीं किया। केवल एक तारे के आधार पर सटीक गणना सम्भव नहीं है।
लगभग तीन हजार वर्ष पहले तक की सटीक गणना करने वाले एस्ट्रोनॉमीकल सॉफ्टवेयर अभी कुछ वर्ष ही तैयार हुए हैं।
इस तारे को अलग-अलग लोगों ने विभिन्न धूमकेतु मान कर गणना की है। इसलिए पहले लगभग दो हजार वर्ष पहले की ग्रह स्थिति की जो गणना की गई उसे सही नहीं माना जा सकता।
फिर कुछ ज्योतिषियों नें तो इस तारे को शुक्र ग्रह मान लिया, तो किसी नें ब्रहस्पति शुक्र युति तो किसी ने मंगल शुक्र पूर्ण युति मान कर गणना की। तो किसी ने किसी तारे से गुरु ब्रहस्पति की युति मान कर गणना की।
अतः इस आधार पर की गई गणना सही नहीं मानी जा सकती।
इस लिए मुझे इनमें से किसी भी गणना को आधार मानना उचित नहीं लगता।
जो जन्मा उसका जन्मदिन तो होगा ही। चाहे कभी भी हो। यीशु भी होमो सेपियन्स थे। अतः जन्में भी और मरे भी। तो उनका जन्मदिन 25 दिसम्बर भी हो सकता है।
जब पण्डित मदनमोहन मालवीय जी और अटल बिहारी वाजपेई 25 दिसम्बर को पैदा हो सकते हैं तो; यीशु 25 दिसम्बर को पैदा क्यों नहीं हो सकते।
वस्तुतः क्रिसमस को उत्तरायण संक्रान्ति के साथ जोड़कर सनातन धर्मियों को मुर्ख बना कर उनसे क्रिसमस पर्व मनवाने के कुचक्र रचे जा रहे हैं।
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