मंगलवार, 30 सितंबर 2025
देवी-देवताओं का आह्वान और विसर्जन।
नाम जप
सोमवार, 29 सितंबर 2025
वैदिक सनातन धर्म और जैन मत।
गुरुवार, 25 सितंबर 2025
वैदिक धर्म, सनातन धर्म और हिन्दू धर्म।
सोमवार, 22 सितंबर 2025
पञ्चाङ्ग परिचय।
पञ्चाङ्गों की जानकारी।
सही पञ्चाङ्ग ये हैं ---
वेधशाला प्रमाणित वैधतुल्य दृष्ट ग्रहगणितम् वाली सही पञ्चाङ्ग, स्वीस इफेमेरीज आधारित पञ्चाङ्ग, व्यंकटेश्वर बापूजी केतकर रचित ज्योतिर्गणितम्, ग्रह गणितम, वैजयन्ती ग्रन्थों पर आधारित पञ्चाङ्ग,
है.---
भारत शासन के पोजिशनल एस्ट्रोनॉमी सेंटर, कोलकाता द्वारा वार्षिक रूप से प्रकाशित भारतीय खगोलीय पंचांग (इफ़ेमेरिस) जिसका उद्देश्य खगोलविदों और अन्य उपयोगकर्ताओं को खगोलीय डेटा प्रदान करना है।
*दिल्ली से प्रकाशित भारत शासन की राष्ट्रीय पञ्चाङ्ग*,
श्री जीवाजी वैधशाला से प्रकाशित *Astronomical Ephemeris*
कलकत्ता से प्रकाशित *Lahiri's Indian Ephemeris*, (2022 के बाद बन्द हो गई।)
व्यंकटेश बापुजी शास्त्री केतकर के ज्योतिर्गणितम्, ग्रह गणितम, वैजयन्ती ग्रन्थों पर आधारित पञ्चाङ्ग ---
सुखेड़ा रतलाम से उज्जैन के अक्षांश देशान्तर के लिये प्रकाशित सिद्धविजय डेड़वर्षिय पञ्चाङ्ग,
नीमच से प्रकाशित और नीमच के अक्षांश देशान्तर के लिए श्री *भादवामाता पञ्चाङ्ग* ,
वाराणसी से प्रकाशित
वाराणसी से प्रकाशित वाराणसी के अक्षांश और देशान्तर के लिए चिन्ताहरण पञ्चाङ्ग,
चिन्तामणि पञ्चाङ्ग (प्रकाशन बन्द हो गया),
और
*दिल्ली से प्रकाशित और दिल्ली के अक्षांश और देशान्तर के लिए विश्वविजय पञ्चाङ्ग*
वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय से प्रकाशित महामहोपाध्याय बापूदेव शास्त्री का वाराणसी के अक्षांश देशान्तर के लिए दृक्सिद्ध पंचांग
और दिल्ली से प्रकाशित और दिल्ली के अक्षांश और देशान्तर के लिए *राष्ट्रीय राजधानी पञ्चाङ्ग* लेकिन इसमें निरयन सूर्य संक्रमण का समय सही नहीं रहता है।
संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी भी ऑनलाइन पञ्चाङ्ग प्रकाशित करता है।
मुम्बई से प्रकाशित *कालनिर्णय* कैलेण्डर पञ्चाङ्ग के तिथि नक्षत्र योग, करण का समय सही रहता है।
ऑनलाइन *दृक पञ्चाङ्ग* लेकिन इसमें भी निरयन सूर्य संक्रमण का समय सही नहीं रहता। और साल भर में अपडेट होते रहने के कारण बदलाव होते रहते हैं।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से सुर्यसिद्धान्त के आधार पर बीज संस्कार देकर तैयार होनेवाली विश्व पञ्चाङ्ग भी है। लेकिन यह पूर्णतः मान्य नहीं है।
निम्नलिखित पञ्चाङ्गों की गणना सही नहीं होती है। इसलिए इन्हें उपयोगी नही मानता हूँ।⤵️
ग्रहलाघव और मकरन्द करण ग्रन्थ पर आधारित गलत पञ्चाङ्ग ----उज्जैन की महाकाल पञ्चाङ्ग,
नारायण विजय पञ्चाङ्ग,
नीमच की निर्णय सागर चण्डु पञ्चाङ्ग,
जबलपुर के लाला रामनारायण केलेण्डर पञ्चाङ्ग, लाला रामस्वरूप रामनारायण जीडी एण्ड सन्स कैलेण्डर,
शुक्रवार, 19 सितंबर 2025
क्या ज्योतिष छद्म विज्ञान है?
बुधवार, 17 सितंबर 2025
आश्विन शुक्ल पक्ष के व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार।
रविवार, 14 सितंबर 2025
भारतियों का मुख्य दोष आत्म गौरव का अभाव।
क्या ब्राह्मण ग्रन्थों को श्रुति या वेद कहना उचित है?
श्राद्ध पक्ष में पूजा प्रारम्भ करने या पूजन करने का किसी भी शास्त्र में निषेध नहीं है।
शुक्रवार, 12 सितंबर 2025
मैं शास्त्रोक्त कर्म शास्त्रोक्त विधि से ही करने पर जोर क्यों देता हूँ।
श्राद्ध क्यों आवश्यक है और श्राद्ध ग्रहण कौन करता है? और श्राद से क्या लाभ होगा?
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन का अर्थ।
शुक्रवार, 5 सितंबर 2025
ईश्वर तथा देवता गण के बारे में वैदिक और इब्राहीमी अवधारणा में अन्तर
सातवें आसमान पर बैठा व्यक्ति निश्चित ही सातवें आसमान से आकार (साइज) मेंं छोटा होगा। अतः गोलाकार हो या दृव और गैस के समान कूटाकृति लेकिन निराकार तो हो ही नही सकता।
निराकार सर्वव्यापक परमात्मा ही हो सकता है।
ॐ कार नाम से ही स्पष्ट है कि ॐ भी साकार ही है। शेष देव हों या देवता निराकार नही मानें गये हैं। चाहे वे तरङ्गाकार हो, कूटाकृति हो, दीर्घगोलाकर (सामान्य भाषा में अण्डाकार) हो, गोलाकार हो या पुरुषाकृति (देह के समान आकार वाले) हों।
यहूदी यहोवा परमेश्वर के अलावा पवित्रात्मा (उनके देवताओं या फरिश्तों) को भी नमन / दण्डवत नमन करते हैं। विद्या ददाति विनयम्, विनयम् ददाति पात्रताम्। विनम्रता गुण है कोई दोष नहीँ। अपने से योग्य और वरिष्ठों का आदर करना सद्गगुण है दोष नही। उनके सामने विनम्र होना ही चाहिए । ठूंठ जैसे खड़े रहना तो ढीठता ही है। पर वे भी देवताओं को परमेश्वर नही मानते। अतः उनके लिये भी यह नही कहा जा सकता कि, वे यहोवा परमेश्वर के समतुल्य किसी देवता फरिश्ते / पवित्र आत्मा को मानते हैं।
ईसाइयों का धर्म भी यहुदियों के ही समान है।केवल कर्मकाण्ड की क्रियाओं में थोड़ा अन्तर है। ईसाई भी यहोवा परमेश्वर के अलावा पवित्रात्मा (उनके देवताओं या फरिश्तों) को भी नमन करते हैं। पर वे भी देवताओं को परमेश्वर नही मानते। साथ ही यीशु को भी परमेश्वर का पुत्र मानते हैं। पर सर्वोच्च स्थान उनके मन में भी यहोवा के प्रति ही है।यीशु दुसरे स्थान पर ही हैं। अतः उनके लिये भी यह नही कहा जा सकता कि, वे यहोवा परमेश्वर के समतुल्य किसी देवता फरिश्ते / पवित्र आत्मा को मानते हैं।
फिर उन्हें मुशरिक कैसे कहा जाता है। यह तो केवल उन्हें मुशरिक कहनें वाले ही जानें।
अब आता हूँ सनातन वेदिक धर्म पर—
सनातन.वेदिक धर्म के सर्वव्यापी परमात्मा की अवधारणा सर्वोच, परमपद परमेश्वर को ही अन्तिम सत्य माननें वाले समझ ही नही पाये।
परमात्मा सबकुछ है। जो सत और असत से भी परे है। ज्ञान और अज्ञान से भी परे है, (वेदोsहम अवेदोsहम )।आनन्द और अनानन्द से भी परे है। अर्थात परमात्मा के बारे में सोचना ही सम्भव नही है। उसे परम आत्म स्वरूप जानकर ही परमात्मा होकर ही समझा जा सकता है। क्योंकि परमात्मा ही वास्तविक मैं / परम आत्म है।
सनातन वेदिक धर्म में (ऋग्वेद में) विष्णु परमपद कहा गया है। परमेश्वर कहा गया है। सवितृ देव को महेश्वर और नारायण को जगदीश्वर कहा गया। हिरण्यगर्भ को भी ईश्वर कहा जाता है। और सनातन वेदिक धर्मी तो अवस्था मेंबड़े, योग्यता मेबड़े, सदाचरण में श्रेष्ठ, पद में बड़े, प्रतिष्ठा में बड़े सबको प्रणाम करते हैं। कहा भी है कि, जो जितना विनमृ हो समझना चाहिए कि, वह उतना ही योग्य और क्षमतावान होगा। क्षमा वीरस्य भूषणम्। विद्या ददाति विनयम्।
मतलब ईश्वरों की श्रेणी है। ईश्वरत्व मात्र पदाधिकारी है। सर्वोच्च सत्य/ परम सत्य नही है। किन्तु इनमें से किसी के भी समतुल्य कोई विरोधी देवता (इब्लीस जैसा शैतान) नही है। और परमात्मा तो परम है/ एब्सोल्यूट है।
यह अवधारणा नही समझपाने के कारण सनातन वेदिक धर्म को बहूदेववादी होनें का आरोप लगाया जाता है।
जबकि देवता/ फरिश्ते तो यहूदी, ईसाई, और इस्लाम अर्थात इब्राहीमी सम्प्रदायों में भी है। यहूदी तो उन्हें दण्डवत प्रणाम भी करते हैं।
खेर अपनी अपनी समझ।