मंगलवार, 30 सितंबर 2025

देवी-देवताओं का आह्वान और विसर्जन।

आह्वान और विसर्जन देवता का होता है। पत्री (पिपल का पत्ता) या प्रतिमा में देवी/ देवता का आह्वान होता है और विसर्जन भी होता है। विसर्जन की क्रिया सम्पन्न कर पत्री या प्रतिमा को का स्थानांतरण (स्थान बदलना या खिसकाने) की क्रिया की जाती है। तत्पश्चात जल या भूमि में विसर्जित किया जाता है (खमाया जाता है।)
आह्वान और विसर्जन की क्रियाओं का उल्लेख चौखम्बा प्रकाशन वाराणसी से प्रकाशित ब्रह्म नित्य कर्म जैसे प्रामाणिक ग्रन्थ में मिलता है। लेकिन जन सामान्य के लिए कठिन है। गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित नित्यकर्म पूजा प्रकाश में आह्वान मन्त्र दिये गए हैं।
मातृभाषा में भी अपनी भावनाओं को व्यक्त किया जा सकता है।

नाम जप

नाम जप की वैदिक परम्परा - प्राणायाम पूर्वक जप है।
प्रत्येक नाम जप की वैदिक परम्परा - प्राणायाम पूर्वक जप है।
प्रत्येक श्वासोच्छवास के साथ परमात्म भाव के साथ ॐ का स्मरण। या अर्थ और भाव सहित सावित्री मन्त्र जप करना है। के साथ परमात्म भाव के साथ ॐ का स्मरण करते रहना कर्तव्य है। या अर्थ और भाव सहित सावित्री मन्त्र जप करना है।
प्रारम्भ में यह बहुत कठिन लगता है। लेकिन निरन्तर अभ्यास से अवधि बढ़ती जाती है और एक समय ऐसा आता है कि, निद्रा में यहाँ तक कि, अचेतावस्था में भी श्वासोच्छवास के साथ ॐ का जप और परमात्मा का स्मरण बना रहता है। लेकिन यह परम सिद्धि की अवस्था है। इसके लिए सदाचारी जीवन, अष्टाङ्ग योग अभ्यास के साथ पञ्च महायज्ञ करते हुए जीवनशैली आवश्यक है।
जो लोग यह नहीं कर पाते हैं उनके लिए स्मृतियों में निरन्तर नाम जप विधान किया गया है।

सोमवार, 29 सितंबर 2025

वैदिक सनातन धर्म और जैन मत।

परमात्मा के ॐ संकल्प से परब्रह्म (विष्णु-माया।)
परब्रह्म से ब्रह्म (प्रभविष्णु- श्री लक्ष्मी या सवितृ - सावित्री)
ब्रह्म से अपर ब्रह्म (नारायण- नारायणी या श्रीहरि- कमलासना गज लक्ष्मी)
अपर ब्रह्म से हिरण्यगर्भ -वाणी (त्वष्टा-रचना)
हिरण्यगर्भ से अर्धनारीश्वर एकरुद्र, सनक, सनन्दन, सनत् कुमार, सनातन और प्रजापति-सरस्वति हुए।
(प्रजापति को दक्ष-प्रसुति, रुचि-आकुति, कर्दम- देवहुति, स्वायम्भुव मनु- शतरुपा के रूप में जानते हैं।)
 स्वायम्भुव मनु -शतरुपा स्वायम्भुव मनु के पुत्र - प्रियव्रत 
प्रियव्रत के पुत्र - आग्नीध्र
आग्नीध्र - के पुत्र अजनाभ या नाभि
अजनाभ के पुत्र ऋषभदेव 
(जैन लोग ऋषभदेव को अपना प्रथम तीर्थंकर मानते हैं।)
ऋषभदेव के पुत्र बाहुबली और भरत चक्रवर्ती 
(जैन बाहुबली को भी मानते हैं क्योंकि बाहुबली ने संन्यास ले लिया था।)
लेकिन कहते हैं कि, हमारा मत-पन्थ सनातन है।
वेद और वैदिक बादमें हुए।

जैन मत वेद विरोधी नास्तिक और अनीश्वरवादी तान्त्रिक मत है, जिसमें यक्ष-यक्षिणी साधना की जाती है।
लेकिन 
विष्णु, प्रभविष्णु, नारायण श्रीहरि, हिरण्यगर्भ, प्रजापति, वाचस्पति-इन्द्र ब्रह्मणस्पति- आदित्य, ब्रहस्पति- वसु को ये इनके तीर्थंकरों के सेवक बतलाते हैं, लेकिन रुद्र, वीरभद्र-भद्रकाली (काली-चामुण्डा), भैरव, विनायक, शीतला, मोतीझरा (टाइफाइड) के मोती बापूजी के उपासक हैं।

गुरुवार, 25 सितंबर 2025

वैदिक धर्म, सनातन धर्म और हिन्दू धर्म।

ब्राह्म धर्म अर्थात श्रोत्रिय या वैदिक धर्म---
सदाचारी जीवन, षोडश संस्कार, पञ्च महायज्ञ, अष्टाङ्ग योग साधना और वर्णाश्रम व्यवस्था पालन करना।
ब्राह्मण ग्रन्थों पर आधारित ब्राह्मण धर्म ---
उक्त के अलावा यज्ञ सत्रों का आयोजन होने लगा था। यथा सामर्थ्य व्यक्ति यज्ञों का आयोजन करता था। 
ब्राह्मण ग्रन्थों पर आधारित सूत्र ग्रन्थों के रचनाकाल में कर्मकाण्ड क्लिष्ट होने लगे थे। विधि- निषेध बढ़ गये थे। यज्ञ कर्ताओं में शास्त्रार्थ होने लगे थे।
स्मार्त मत ---
फिर सूत्र ग्रन्थों के आधार पर स्मृति ग्रन्थ रचे गए। धर्म सूत्रों पर आधारित मनु स्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, पाराशर स्मृति, ब्रहस्पति स्मृति आदि बीस स्मृतियों की रचना हुई। मूलतः ये विधि-विधान (नियम- कानून) के ग्रन्थ थे। आचरण के नियम सख्त हो गये।
यह स्मार्त मत कहलाता है।
आद्य शंकराचार्य जी ने भी सुधन्वा के राज्य के लिए एक स्मृति ग्रन्थ (संविधान) लिखा था।
शंकराचार्य जी द्वारा पञवचदेवोपासना का विधान किया। ताकि, वैष्णव-शैव-शाक्त- गाणपत्य और सौर सभी सन्तुष्ट रहे।
इनमें से कोई एक इष्ट देव हो और शेष चार की पूजा भी करना आवश्यक है। शास्त्रार्थ मे हारने वाले को यह स्वीकार करना पड़ता था।

ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के ब्राह्मण ग्रन्थों के आधार पर रचित षड वेदाङ्ग --- 1 कल्प अर्थात शुल्बसूत्र, श्रोत सूत्र, गृह्यसूत्र और धर्मसूत्र तथा 2 शिक्षा अर्थात उच्चारण का शास्त्र 3 व्याकरण 4 शब्द व्युत्पत्ति का शास्त्र निरुक्त अर्थात भाषाशास्त्र, और निघण्टु या शब्दकोश 5 छन्दशास्त्र, 6 ज्योतिष अर्थात ब्रह्माण्ड विज्ञान के प्राचीन मूल ग्रन्थ और चार उपवेद --- ऋग्वेद का आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद, सामवेद का गन्धर्ववेद (सङ्गीत और नाट्य) तथा अथर्ववेद का स्थापत्य वेद या शिल्पवेद के मूल ग्रन्थों के रचनाकाल तक का समय वैदिक काल कहलाता है। यह वर्णाश्रम व्यवस्था, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष पुरुषार्थ की प्राप्ति हेतु सदाचार, पञचमहायज्ञ, अष्टाङ्ग योग साधना प्रधान काल था।
इसके बाद आता है स्मृति काल या स्मार्तकाल जिसके अन्तर्गत धर्मसूत्रों के आधार पर मनु स्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति आदि बीस स्मृतियों की रचना हुई, तथा इतिहास के ग्रन्थ वाल्मीकि रामायण और महाभारत रचे गए, वेद अर्थात श्रुति और स्मृतियों के वाक्यों में भासने वाले विरुद्ध वाक्यों की मीमांसा कर एकवाक्यता सिद्ध करने वाले जैमिनी की पूर्व मीमांसा दर्शन और बादरायण का उत्तर मीमांसा दर्शन (शारीरिक सूत्र), योग दर्शन (कर्म मीमांसा का मुख्य ग्रन्थ श्रीमद्भगवद्गीता सहित), सांख्य दर्शन (सांख्य कारिकाओं सहित तत्व मीमांसा), तर्क शास्त्र का ग्रन्थ न्याय दर्शन और भौतिक तत्व मीमांसा का का ग्रन्थ वैशेषिक दर्शन आदि षड दर्शन, तथा अर्थशास्त्र के प्राचीन मूल ग्रन्थों तथा मूल पुराणों के रचनाकाल का समय स्मृतिकाल कहलाता है। जिसकी अधिकतम सीमा भगवत्पाद कुमारील भट्ट और भगवान आद्यशंकराचार्य जी के समय तक मानी जा सकती है। यह  सतर्क होकर सदाचारी जीवन युक्त धर्मपालन में दृढ़ता के साथ यज्ञ-याग प्रधान समय था ।
इसके बाद उक्त सभी ग्रन्थों की व्याख्या पतञ्जली का महाभाष्य और भाष्यों की आलोचना के कात्यायन और वररुचि राजा भोज आदि के द्वारा रचित वार्तिक ग्रन्थों तथा उनके आधार पर रचित निबन्ध ग्रन्थों की रचना कर उक्त सभी ग्रन्थों को सरलीकृत किया गया। ये सनातन धर्म के अन्तिम मूल ग्रन्थ हैं। यह कर्मकाण्ड प्रधान समय था लेकिन सदाचार संयम को ही धर्म माना जाता था। ईश्वर समर्पण का भाव मुख्य था।
इसके बाद सनातन धर्म मत, पन्थ और सम्प्रदायों में विभाजित हो गया जिसमें आद्य शंकराचार्य जी के शिष्य विद्यारण्य स्वामी जो श्रङ्गेरी मठ के बारहवें शंकराचार्य थे से लेकर कामकोटि पीठ के आचार्य चिदम्बरम वासी श्री विश्वजीके पुत्र आचार्य अभिनव शंकर जी जो 787ईस्वी से 840 ईस्वी तक 53 वर्षायु तक रहे और तीस वर्षों तक गोवर्धन मठ के 38 वें शंकराचार्य रहे, जिन्होंने कश्मीर के वाक्पति भट को शास्त्रार्थ में पराजित किया था जिन्हें इतिहासकार आदि शंकराचार्य मान बैठे हैं के द्वारा स्थापित अद्वैत सम्प्रदाय, महाराष्ट्र में जन्मे श्री निम्बार्काचार्य जी का अचिन्त्त्य भेदाभेद सम्प्रदाय, तमिलनाडु में जन्मे श्री रामानुजाचार्य का विशिष्ठाद्वैत सम्प्रदाय, तान्त्रिक ग्रन्थ शिव सूत्र के रचयिता कश्मीर के वसुगुप्त का प्रत्यभिज्ञा दर्शन या कश्मीरी शैव सम्प्रदाय, और इसी दर्शन के आधार पर छत्तीसगढ़ के रायपुर निकट जन्मे श्री वल्लभाचार्य जी का शुद्धाद्वैत सम्प्रदाय, बङ्गाल में जन्मे श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु का अचिन्त्त्य भेदाभेद सम्प्रदाय तथा रामानन्द जी का रामानन्दी सम्प्रदाय मुख्य हैं। 
इस अवधि में भजन-कीर्तन, मठ मन्दिर और मूर्ति पूजा प्रचलित हो गई। सदाचारी जीवन केवल आदर्श रह गया लेकिन इष्ट को रीझाने के लिए वैदिक कर्तव्य गौण हो गये।
सन्त कबीर, गुरु नानक देव, रामचरितमानस जी के रचयिता सन्त तुलसीदास, वल्लभाचार्य जी के अनुयाई सन्त सूरदास जी, श्रीकृष्ण चेतन्य के अनुयाई जयदेव जी आदि द्वारा प्रचलित राधावल्लभ सम्प्रदाय, तमिल कवि कम्बन, सन्त ज्ञानेश्वर जी द्वारा स्थापित वारकरी सम्प्रदाय आदि भक्ति सम्प्रदाय ने वर्तमान प्रचलित हिन्दू पन्थ सम्प्रदाय प्रारम्भ हुआ जिसपर तन्त्र मत, ताओ मत, माध्यमिक सम्प्रदाय, अनीश्वरवादी मत, नास्तिक मत और अब्राहमिक मत सभी का भरपूर प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। इसी प्रकार अरबी और यूरोपीय सभ्यता-संस्कृति का भी अत्यधिक प्रभाव है। अब न धर्म रहा न संस्कृति केवल सभ्यता और विधि-विधान अर्थात नियम कानून का ही बोलबाला है। अब ईश्वर श्रद्धा-प्रेम का पात्र न होकर भय कारक हो गया। लोगों के मन में अब्राहमिक सिद्धान्त "ईश्वर से डरो" घर कर गया।
इसलिए शुद्ध सनातनी और आर्य समाजी स्वयम् को हिन्दू के स्थान पर सनातनी और आर्य बोलते हैं।

उक्त हिन्दूओं में यह प्रवृत्ति देखी जा रही है कि, मधु-माधव आदि मासों वाला वसन्त सम्पात सायन मेष संक्रान्ति से प्रारम्भ वैदिक संवत, विषुव संवत या कलियुग संवत तो भूल ही गए हैं साथ ही, पञ्जाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, बङ्गाल, उड़ीसा, तमिलनाडु और केरल में अभी भी प्रचलित निरयन मेष संक्रमण से प्रारम्भ मेष, वृषभ आदि मासों के साथ नक्षत्रिय संवत जो युधिष्ठिर संवत और विक्रम संवत के रूप में प्रचलित है, उसके स्थान पर निरयन मेष संक्रमण आधारित चान्द्र शक चैत्रादि मासों के साथ मानते हैं । और गुड़ी पड़वा को नव वर्ष मनाते हैं।
चैत्र मास में श्रीरामचन्द्र जी और हनुमान जी तथा देवी की उपासना करते हैं, श्रावण मास में शंकर जी की उपासना करते हैं, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को श्रीकृष्ण जी की, अमान्त भाद्रपद पूर्णिमान्त आश्विन कृष्ण पक्ष में पितरों के लिए श्राद्ध करते हैं, आश्विन शुक्ल पक्ष में नवरात्र में दुर्गा और भद्रकाली के रूप में महासरस्वती अवतार की पूजा, पूर्णिमा को लक्ष्मी पूजा दीपावली को लक्ष्मी पूजा और महाकाली पूजा करते हैं, कार्तिक मास में विष्णु पूजा करते हैं और अमान्त माघ, पूर्णिमान्त फाल्गुन कृष्ण पक्ष में शिवरात्रि को शंकर जी की उपासना करते हैं। 
रविवार को सूर्य की, सोमवार को शंकर जी की, मङ्गलवार को अष्ट विनायक और हनुमान जी की, बुधवार को मालवा में गजानन की , गुरुवार को दत्तात्रेय की, शुक्रवार को लक्ष्मी आराधना और शनिवार को शनि देव की आराधना करते हैं।
लेकिन इन व्रत पर्वों के अतिरिक्त इन देवी-देवताओं को भूल जाते हैं। इनके मन्दिर तक सूने हो जाते हैं।

सोमवार, 22 सितंबर 2025

पञ्चाङ्ग परिचय।

दो सूर्योदय से सूर्योदय के बीच एक अहोरात्र का वार या वासर होता है।
जबकि भूमि को अपनी धूरी पर पूरा चक्कर लगाने में 23 घण्टे 56 मिनट 4.999 सेकण्ड लगते हैं। (इसको सेडरल रोटेशन पिरियड ऑफ अर्थ कहते हैं।)  

प्रत्येक तिथि सूर्य से चन्द्रमा की बारह-बारह डिग्री की दुरी पर होती है।
एक तिथि की औसत अवधि 23 घण्टे 37 मिनट 28.096 सेकण्ड होती है। लेकिन 
एक तिथि की कालावधि 19 घण्टे 59 मिनट से 26 घण्टे 47 मिनट तक रहती है।
अर्थात 4 घण्टे 01 मिनट क्षय और 2 घण्टे 47 मिनट अधिक हो सकती है। अर्थात 10 घटि 2.5 पल क्षय और 06 घटि 57 पल 30 विपल अधिक हो सकती है। इसे प्रायः सप्त वृद्धि दश क्षय बोला जाता है।
सूर्य से चन्द्रमा की अंशात्मक दूरी 00° से 12° होने पर प्रतिपदा तिथि समाप्त होती है। 12° से 24° अन्तर होने पर द्वितीया तिथि समाप्त होती है। 24° से 36° दूर होने पर तृतीया तिथि समाप्त होती है। ऐसे ही आगे भी पूर्णिमा तक होता है। फिर कृष्ण पक्ष प्रारम्भ होकर पुनः 12°-12° के अन्तर से प्रतिपदा आदि तिथियाँ होती है। सूर्य से चन्द्रमा की अंशात्मक दूरी 192° होने पर कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा समाप्ति, 204° दूरी होने पर कृष्ण पक्ष की द्वितीया समाप्ति। ऐसे ही जब अन्तर 360° अर्थात 000° हो जाता है तो अमावस्या तिथि समाप्त होकर शुक्ल पक्ष प्रारम्भ हो जाता है।

दो चन्द्रोदय के बीच की औसत अवधि 24 घण्टे 48 मिनट 45.838 सेकण्ड होती है।

तिथि का आधा भाग करण कहलाता है। अर्थात प्रत्येक तिथि में दो करण होते हैं। इनमें विष्टि करण को भद्रा बोलते हैं। 

वैदिक काल में क्रान्तिवृत के आस-पास आठ-नौ  अंश उत्तर-दक्षिण में फैले क्षेत्र में नक्षत्र योग तारा के आस-पास की एक निश्चित आकृति के तारा मण्डल को नक्षत्र कहते थे। लेकिन इन नक्षत्रों का विस्तार अर्थात भोगमान भिन्न भिन्न होता था।
वर्तमान में क्रान्तिवृत के सत्ताईसवें भाग 13°20' को नक्षत्र कहा जाता है; जो गलत है।
क्रान्तिवृत के सत्ताईसवें भाग अर्थात एक नक्षत्र में चन्द्रमा के रहने की अवधि अर्थात एक चन्द्र नक्षत्र की औसत अवधि 24 घण्टे 17 मिनट 9.317 सेकण्ड होती है।
बारह राशियों और सत्ताइस नक्षत्रों का समायोजन 000°, 120° और 240° पर होता है अर्थात मीन राशि के अन्तिम बिन्दु 30°अर्थात रेवती नक्षत्र के अन्त और मेषादि बिन्दु मेष राशि के 00° पर अर्थात अश्विनी नक्षत्र के प्रारम्भ बिन्दु पर फिर, कर्क राशि के अन्तिम बिन्दु कर्क 30° अर्थात आश्लेषा नक्षत्र के अन्तिम बिन्दु और सिंह राशि के प्रारम्भ बिन्दु सिंह 00° अर्थात मघा नक्षत्र के आदि बिन्दु और फिर, वृश्चिक राशि के अन्तिम बिन्दु वृश्चिक 30° अर्थात ज्येष्ठा नक्षत्र के अन्तिम बिन्दु और धनु राशि के प्रारम्भ बिन्दु धनु 00° अर्थात मूल नक्षत्र के आदि बिन्दु के मिलन स्थल को गण्डमूल नक्षत्र कहते हैं। जिसमें जन्में बच्चों के लिए सत्ताईसवें दिन उसी नक्षत्र में गण्डमूल नक्षत्र शान्ति करवाई जाती है।

निरयन सूर्य के राशि अंश कला विकला और निरयन चन्द्रमा के राशि अंश कला विकला जोड़ कर सत्ताइस का भाग देने पर विष्कुम्भादि योग बनते हैं। लेकिन सायन सूर्य के राशि अंश कला विकला और सायन चन्द्रमा के राशि अंश कला विकला जोड़ योग यदि 180° हो तो उस समय को व्यतिपात कहते हैं और सायन सूर्य के राशि अंश कला विकला और सायन चन्द्रमा के राशि अंश कला विकला जोड़ योग यदि 360° हो तो उस समय को वैधृतिपात कहते हैं।
ये दोनों चन्द्रमा के पात हैं। संहिता ज्योतिष में व्यतिपात और वैधृतिपात को अशुभ समय मानते हैं। इसलिए शुभ कार्यों में इनके आसपास के छः-छः घण्टे निषिद्ध माने जाते हैं।

सूर्य और चन्द्रमा समान अंशादि पर हो तो तो अमावस्या कहलाती है। इस समय अमावस्या तिथि समाप्त होती है।
दो अमावस्याओं के बीच के लगभग 29 दिन 12 घण्टे 44 मिनट 02.9 सेकण्ड की अवधि को चान्द्रमास कहते हैं।

सूर्य से 180° की दूरी को पूर्णिमा कहते हैं। इस समय पूर्णिमा तिथि समाप्त होती है।

सूर्य से चंद्रमा 120° के अन्तर पर हो तो शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि प्रारम्भ होती है। और 132° का अन्तर हो तब शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि समाप्त होती है। 

सूर्य से चंद्रमा 300° के अन्तर पर हो तो कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि प्रारम्भ होती है। और सूर्य से चन्द्रमा की दूरू 312° का अन्तर हो तब कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि समाप्त होती है।
अर्थात चन्द्रमा से सूर्य की दूरी 60° हो तो कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि प्रारम्भ होती है। और चन्द्रमा से सूर्य की दूरू 48° का अन्तर हो तब कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि समाप्त होती है।

सूर्य और चन्द्रमा में 90° या 270° का अन्तर हो तो आकाश में अर्धचन्द्र दिखता है। इस समय अष्टमी तिथि का मध्य काल होता है। अर्थात 

सूर्य से चंद्रमा 84° के अन्तर पर हो तो शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि प्रारम्भ होती है। और सूर्य से चन्द्रमा की दूरी 96° का अन्तर हो तब शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि समाप्त होती है। 
सूर्य से चंद्रमा 264° के अन्तर पर हो तो शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि प्रारम्भ होती है। और 276° का अन्तर हो तब कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि समाप्त होती है। 


चंद्रमा से सूर्य की दूरी 84° के अन्तर पर हो तो कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि प्रारम्भ होती है। और चन्द्रमा से सूर्य की दूरी 96° का अन्तर हो तब कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि समाप्त होती है। 

पूर्णिमा के दिन चन्द्रमा जिस नक्षत्र पर या जिस नक्षत्र के एक नक्षत्र आगे-पीछे होता है उस नक्षत्र के नाम पर निरयन सौर संक्रमण आधारित चान्द्र मास का नाम करण किया गया है। जैसे चैत्र पूर्णिमा को चन्द्रमा चित्रा नक्षत्र मे, वैशाख पूर्णिमा को चन्द्रमा विशाखा नक्षत्र में, ज्येष्ठ पूर्णिमा को चन्द्रमा ज्येष्ठा नक्षत्र में, आषाढ़ पूर्णिमा को चन्द्रमा पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में, श्रावण पूर्णिमा को चन्द्रमा श्रवण नक्षत्र मे, भाद्रपद पूर्णिमा को चन्द्रमा पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र मे, आश्विन पूर्णिमा को चन्द्रमा अश्विनी नक्षत्र में, कार्तिक पूर्णिमा को चन्द्रमा कृतिका नक्षत्र में, मार्गशीर्ष पूर्णिमा को चन्द्रमा मृगशीर्ष नक्षत्र में, पौष मास में चन्द्रमा पुष्य नक्षत्र में, माघ पूर्णिमा को चन्द्रमा मघा नक्षत्र में और फाल्गुन पूर्णिमा को चन्द्रमा पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में रहता है।
निरयन सौर संक्रमण (संक्रान्तियों) पर आधारित बारह चान्द्र मासों का एक चान्द्र वर्ष होता है जिसको शक या शकाब्द कहते हैं ।

इसलिए एक नियम बनाया गया कि, निरयन सूर्य के जिन दो संक्रमण (संक्रान्तियों) के बीच कोई अमावस्या (समाप्त) न हो वह मास अधिक मास कहलाता है, उस शक में चान्द्रवर्ष तेरह चान्द्र मासों का होता है। 
लगभग 28 माह से 38 माह के बीच अधिक मास पड़ता है।
जिन दो अमावस्याओं के समाप्ति समय के बीच निरयन सूर्य का संक्रमण (संक्रान्ति) न हो वह क्षय मास होता है। लेकिन इस क्षय मास वाले शक में ही क्षय मास के पहले और क्षय मास के बाद एक-एक अधिक मास पड़ता है। इस प्रकार क्षय मास वाला शक भी तेरह चान्द्र मासों का ही होता है। इस प्रकार प्रत्येक 19 वर्ष, 122 वर्ष और 141 वर्ष में एक क्षय मास पड़ता है।

पृथ्वी जिस मार्ग से सूर्य की परिक्रमा करती है उसे क्रान्तिवृत कहते हैं। नक्षत्रिय गणना में चित्रा तारे को क्रान्तिवृत का मध्य बिन्दु माना जाता है। और चित्रा तारे से 180° पर क्रान्तिवृत का प्रारम्भ माना जाता है। किसी समय वहाँ रेवती नक्षत्र का योग तारा विद्यमान था जो अब लगभग 04° से अधिक खिसक गया है, इस कारण क्रान्तिवृत के प्रारम्भ बिन्दु पर कोई तारा नही दिखता है।
क्रान्तिवृत पर सूर्य का एक परिभ्रमण पूर्ण होने को नक्षत्रिय वर्ष कहते हैं। 
एक नक्षत्रिय वर्ष का मान 365 दिन 06 घण्टे 09 मिनट 09.8 सेकण्ड होता है। इस काल में सूर्य से भूमि की दूरी बढ़ने के कारण अत्यल्प वृद्धि होती रहती है।
क्रान्तिवृत के प्रत्येक 30° पर सूर्य के पहूँचने पर नक्षत्रिय सौर मास परिवर्तन होता है। जिसे सूर्य का निरयन संक्रमण कहते हैं। लेकिन बोलचाल की भाषा में संक्रान्ति बोलते हैं।
भूमि की भूमध्य रेखा के समानांतर आकाश में विषुव वृत होता है। 
विषुव वृत्त और क्रान्तिवृत्त दोनों ही एक दूसरे के साथ एक ही तल में नहीं हैं, बल्कि 23.49 डिग्री के झुकाव पर हैं।
इसलिए भूमि सूर्य का परिभ्रमण करते हुए विषुव वृत पर जहाँ मिलती है वह स्थान प्रतिवर्ष गत वर्ष के मिलन स्थल से लगभग 50.2° पीछे पश्चिम में रहता है। इस कारण सायन गणना में वर्ष मान 365 दिन 05 घण्टे48 मिनट 45.2 दिन का होता है ।
अर्थात नक्षत्रिय वर्ष से सायन वर्ष 20 मिनट 24.6 सेकण्ड छोटा है। इसलिए लगभग 71 वर्ष में सायन सौर वर्ष से नक्षत्रिय सौर वर्ष में एक दिन का अन्तर हो जाता है।
25778 से 25779 नाक्षत्रीय (निरयन) सौर वर्ष में 25779 से 25780 सायन सौर वर्ष व्यतीत हो जाते हैं।
लगभग 2148 वर्ष में एक माह का अन्तर हो जाता है।
लगभग 4297 वर्ष में एक ऋतु का अन्तर हो जाता है।
लगभग 8593 वर्ष में एक मौसम का अन्तर हो जाता है। और लगभग 12890 वर्ष में अर्धवर्ष का अन्तर हो जाता है।
22 मार्च 285 ईस्वी में वसन्त सम्पात और चित्रा तारे से 180° पर स्थित निरयन मेषादि बिन्दु या अश्विनी नक्षत्र का प्रारम्भ बिन्दु एक साथ थे। तो 20 मार्च 13175 में वसन्त सम्पात चित्रा तारे पर होगा।
वैदिक समय में संवत्सर वसन्त सम्पात से प्रारम्भ होता था। इस दिन उत्तरायण/ उत्तर गोल, वसन्त ऋतु और मधु मास प्रारम्भ होता था। उस समय ब्रह्मावर्त भारत का भाग होता था। अब  तजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, तिब्बत आदि भारत में नहीं रहे। इससे भारत का केन्द्र उज्जैन हो गया।
लेकिन धार्मिक कार्यों में, व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार और यज्ञ प्रारम्भ करने और पूर्णाहुति का दिन निश्चित करने, संस्कारों के दिन निश्चित करने में, राज्याभिषेक करने में मधुमास से नभस्य मास तक उत्तरायण / उत्तर गोल, ईष मास से तपस्य मास तक दक्षिणायन /दक्षिण गोल, वसन्त आदि ऋतुओं, सायन सौर मास (मधु-माधव में वसन्त, शुक्र-शचि में ग्रीष्म, नभस-नभस्य में वर्षा, ईष-उर्ज में शरद, सहस-सहस्य में हेमन्त और तपस-तपस्य मास में शिशिर) में चन्द्रमा के नक्षत्र के दिन कार्य निर्धारित करते थे। क्योंकि वैदिक काल में व्यषटिका (शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा), चन्द्र दर्शन वाली रात्रि (द्वितीया), एकाष्टका (अर्द्ध चन्द्र वाली रात्रि, शुक्ल पक्ष की अष्टमी), पूर्णिमा ( पूर्ण चन्द्र वाली रात्रि), अष्टका (अर्द्ध चन्द्र वाली रात्रि, कृष्ण पक्ष की अष्टमी) और अमावस्या (बिना चन्द्रमा वाली रात्रि) के अलावा किसी तिथि का उल्लेख ही नहीं है।
वर्तमान में उत्तरायण तीन माह पहले से अर्थात सायन मकर संक्रान्ति 22 दिसम्बर से प्रारम्भ मानते हैं। मधु - माधव आदि मास और वसन्तादि ऋतुएँ भी एक माह पहले से मानते हैं। संवत्सर प्रारम्भ माधव मास से करते हैं। यह संशोधन इसलिए करना पड़ा क्योंकि वर्तमान में ब्रह्मावर्त क्षेत्र भारत से बाहर हो गया और आर्यावर्त तथा दक्षिण भारत मिलाकर ही भारत रह गया।

आज भी दक्षिण भारत में तमिलनाडु, केरल, और पूर्व में बङ्गाल, उड़ीसा, असम, मणिपुर, त्रिपुरा आदि में निरयन सौर मास और चन्द्रमा का नक्षत्र के आधार पर ही व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार मनाते हैं।


वसन्त सम्पात सन 1972 के पहले तक 21 मार्च को होता था। लेकिन सन 1972 से वसन्त सम्पात 20 मार्च को होने लगा। 
पोप ग्रेगरी के द्वारा ईस्वी सन को सायन सौर वर्ष से पूर्णतः समायोजित करने की युक्ति निकाली। जो इस प्रकार है ---
प्रत्येक चार वर्ष में फरवरी माह को 29 दिन का करके सायन सौर वर्ष से समायोजित कर लेते हैं। फिर शताब्दी वर्ष में फरवरी 28 दिन का ही रखा जाता है। इस प्रकार पुनः सायन सौर वर्ष से समायोजित कर लिया जाता है।
पुनः प्रत्येक चार सौ वें वर्ष मे फरवरी 29 दिन का रखा जाता है। इस प्रकार पुनः सायन सौर वर्ष से समायोजित कर लिया जाता है।
इसलिए ही 2000 ईस्वी मे फरवरी 29 दिन की थी।
इस प्रकार ग्रेगोरी केलेण्डर भी सायन सौर वर्ष पर आधारित है।
इसी आधार पर भारत शासन ने 1957 से राष्ट्रीय शक केलेण्डर लागु किया। इसे कुछ सुधार कर वैदिक पञ्चाङ्ग के तुल्य किया जा सकता है।

सावन वर्ष और सायन सौर वर्ष का संयोजन।
*1 संवत्सर,2 परिवत्सर, 3 इदावत्सर, 4 अनुवत्सर और 5 इद्वत्सर नामक सावन वर्षों के युगों का 3840 (तीन हजार आठ सौ चालिस) वर्षीय महायुग।* 

1 संवत्सर - बारह मास / तीनसौ साठ दिन का प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ । फिर षष्ट, सप्तम,अष्टम और नवम वर्ष । वर्ष 360 दिन का वर्ष। सामान्य संवत्सर।

2 परिवत्सर - अधिवर्ष / लीप ईयर। वर्षान्त में एक अधिक मास जोड़कर तेरह मास का तीनसौ नब्भे दिन का वर्ष। फिर ऐसे ही दशम वर्ष, पन्द्रहवाँ वर्ष, बीसवाँ, पच्चीसवाँ, तीसवाँ और (3835 वाँ वर्ष छोड़कर ) पैंतीसवाँ वर्ष 390 दिन का वर्ष।
परिवत्सर के अन्त में सायन सौर वर्ष और सावन वर्ष का लगभग मैल हो जाता है।

3 इदावत्सर - द्वादश मास का तीनसौ साठ दिन का वर्ष। लेकिन केवल चालिसवाँ, अस्सीवाँ, एकसौ बीसवाँ .......अर्थात (3840 वाँ वर्ष छोड़ कर) प्रत्येक चालिसवाँ वर्ष । जिसे अधिवर्ष/ लीप इयर होना था लेकिन अपवाद स्वरूप अधिवर्ष/ लीप इयर नही होता।
इदावत्सर के अन्त में सायन सौर वर्ष और सावन वर्ष का लगभग-लगभग मैल हो जाता है।

4 अनुवत्सर - बारह मास का तीनसौ साठ दिन का वर्ष ।लेकिन केवल प्रत्यैक 3835 वाँ वर्ष ही। 
जिसे अधिवर्ष/ लीप इयर होना था लेकिन अपवाद स्वरूप अधिवर्ष/ लीप इयर नही होता।
अनुवत्सर के अन्त में सायन सौर वर्ष और सावन वर्ष का पूर्णमैल हो जाता है।

5 इद्वत्सर - बारह मास का तीनसौ साठ दिन का वर्ष ।लेकिन केवल प्रत्यैक 3840 वाँ वर्ष ही। 
जिसे अधिवर्ष/ लीप इयर होना था लेकिन अपवाद स्वरूप अधिवर्ष/ लीप इयर नही होता।
इस इदवत्सर के अन्त में सायन सौर वर्ष और सावन वर्ष का पूर्णतः मैल हो जाता है।

पञ्चाङ्गों की जानकारी।

सही पञ्चाङ्ग ये हैं ---
वेधशाला प्रमाणित वैधतुल्य दृष्ट ग्रहगणितम् वाली सही पञ्चाङ्ग, स्वीस इफेमेरीज आधारित पञ्चाङ्ग, व्यंकटेश्वर बापूजी केतकर रचित ज्योतिर्गणितम्, ग्रह गणितम, वैजयन्ती ग्रन्थों पर आधारित पञ्चाङ्ग,
है.---

भारत शासन के पोजिशनल एस्ट्रोनॉमी सेंटर, कोलकाता द्वारा वार्षिक रूप से प्रकाशित भारतीय खगोलीय पंचांग (इफ़ेमेरिस) जिसका उद्देश्य खगोलविदों और अन्य उपयोगकर्ताओं को खगोलीय डेटा प्रदान करना है।

*दिल्ली से प्रकाशित भारत शासन की राष्ट्रीय पञ्चाङ्ग*,
श्री जीवाजी वैधशाला से प्रकाशित *Astronomical Ephemeris*
कलकत्ता से प्रकाशित *Lahiri's Indian Ephemeris*, (2022 के बाद बन्द हो गई।)
व्यंकटेश बापुजी शास्त्री केतकर के  ज्योतिर्गणितम्, ग्रह गणितम, वैजयन्ती ग्रन्थों पर आधारित पञ्चाङ्ग ---
सुखेड़ा रतलाम से  उज्जैन के अक्षांश देशान्तर के लिये प्रकाशित सिद्धविजय डेड़वर्षिय पञ्चाङ्ग,
नीमच से प्रकाशित और नीमच के अक्षांश देशान्तर के लिए श्री *भादवामाता पञ्चाङ्ग* ,
वाराणसी से प्रकाशित
 वाराणसी से प्रकाशित वाराणसी के अक्षांश और देशान्तर के लिए चिन्ताहरण पञ्चाङ्ग,
चिन्तामणि पञ्चाङ्ग (प्रकाशन बन्द हो गया),

और 
*दिल्ली से प्रकाशित और दिल्ली के अक्षांश और देशान्तर के लिए विश्वविजय पञ्चाङ्ग*
वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय से प्रकाशित महामहोपाध्याय बापूदेव शास्त्री का वाराणसी के अक्षांश देशान्तर के लिए दृक्सिद्ध पंचांग
और दिल्ली से प्रकाशित और दिल्ली के अक्षांश और देशान्तर के लिए *राष्ट्रीय राजधानी पञ्चाङ्ग* लेकिन इसमें निरयन सूर्य संक्रमण का समय सही नहीं रहता है।
संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी भी ऑनलाइन पञ्चाङ्ग प्रकाशित करता है।
मुम्बई से प्रकाशित *कालनिर्णय* कैलेण्डर पञ्चाङ्ग के तिथि नक्षत्र योग, करण का समय सही रहता है।

ऑनलाइन *दृक पञ्चाङ्ग* लेकिन इसमें भी निरयन सूर्य संक्रमण का समय सही नहीं रहता। और साल भर में अपडेट होते रहने के कारण बदलाव होते रहते हैं।


काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से सुर्यसिद्धान्त के आधार पर बीज संस्कार देकर तैयार होनेवाली विश्व पञ्चाङ्ग भी है। लेकिन यह पूर्णतः मान्य नहीं है।

निम्नलिखित पञ्चाङ्गों की गणना सही नहीं होती है। इसलिए इन्हें उपयोगी नही मानता हूँ।⤵️
ग्रहलाघव और मकरन्द करण ग्रन्थ पर आधारित गलत पञ्चाङ्ग ----उज्जैन की महाकाल पञ्चाङ्ग,
नारायण विजय पञ्चाङ्ग,
नीमच की निर्णय सागर चण्डु पञ्चाङ्ग,
जबलपुर के लाला रामनारायण केलेण्डर पञ्चाङ्ग, लाला रामस्वरूप रामनारायण जीडी एण्ड सन्स कैलेण्डर,


शुक्रवार, 19 सितंबर 2025

क्या ज्योतिष छद्म विज्ञान है?

यह तो सभी ज्योतिष ग्रंथों में सर्वसम्मत मत है कि,गुरुत्वाकर्षण प्रभाव से समुद्र में होने वाले ज्वार-भाटा के समान मानव जीवन पर प्रभाव डालने वाला नहीं माना जाता है अर्थात फलित ज्योतिष होरा शास्त्र में ग्रहों के प्रभाव से घटनाएँ नहीं घटती बल्कि ग्रहों को नक्षत्र मण्डल के डायल पर घड़ी की सुइयों के समान मात्र सूचक माना गया है। 
संहिता ज्योतिष में नक्षत्र मण्डल के तारा मण्डल को असमान भोग वाले निश्चित आकृति बनाने वाले सत्ताइस नक्षत्र के स्वभाव निर्धारित किए गए हैं, उन नक्षत्रों में भ्रमण करने वाले ग्रहों के स्वभाव के अनुसार भविष्य में घटने वाली घटनाओं की सूचना मानी जाती थी। जब इराक, मिश्र और पश्चिम टर्की में प्रचलित बारह राशियों को भारत में लागू किया गया तो तीस अंश की राशि में नक्षत्रों का समायोजन करने के लिए 13°20' के नक्षत्र और 3°20' का एक नक्षत्र चरण मान लिया गया। इस कारण संहिता ज्योतिष के मूल सिद्धांत फलित ज्योतिष होरा शास्त्र में यथावत लागू नहीं हो सकते।
अब बारह राशियों के स्वभाव निर्धारित किए गए। तदनुसार कुण्डली में बारह भावों की अवधारणा विकसित हुई। जातक के जन्म समय में पूर्व दिशा में उदय हो रहे राशि अंश को लग्न तथा ठीक शीर्ष पर स्थित मेरिडियन काइल के राशि अंशादि को दशम भाव माना गया।
लग्न को व्यक्तित्व, शरीर, और सिर का सूचक माना जाता है। तथा दशम भाव को राज्य और कर्म का सूचक माना गया।
तदनुसार अन्य दसों भाव क्या सूचित करेंगे यह निर्धारित किया गया और इन तीनों के परस्पर सम्बन्धों, द्रष्टि योग के आधार पर फलित किया जाने लगा।
फलित ज्योतिष विज्ञान या छद्म विज्ञान?
तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः। दिवीव चक्षुराततम्॥ ऋग्वेद 1/22/20
वह विष्णु का परम पद है, प्रजापति, इन्द्र, द्वादश आदित्य, अष्ट वसु और एकादश रुद्र जिसे सदा निहारते रहते हैं।

विष्णु लिङ्ग अर्थात विष्णु का प्रतीक चिह्न शालिग्राम शिला है।
विष्णु के हाथ में नियति चक्र है । ऋग्वेदोक्त 90×4 =360 अरों का चक्र है। (चार गुणित नब्बे अर्थात 360अरोंं का संवत्सर चक्र है।) तीनसौ साठ सायन सौर दिनों का संवत्सर ही नियति चक्र कहलाता है।

"चतुर्भि: साकं नवतिं च नामभिश्चक्रं न वृत्तं व्यतीँरवीविपत्। बृहच्छरीरो विमिमान ऋक्वभिर्युवाकुमार: प्रत्येत्याहवम् ॥" ऋग्वेद 01/155/06

ऋग्वेद का उक्त मन्त्र ही नीयती वाद का आधार है।
लेकिन वस्तुतः यह मन्त्र जगत् व्यवस्था अर्थात ऋत के सम्बन्ध में है जिससे पूरी सृष्टि और समष्टि निर्धारित क्रमानुसार संचालित हो रही है।
यजुर्वेद अध्याय 40 मन्त्र 02 
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः ।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ।।
और 
मन्त्र 17
वायुरानिलम्मृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम्।
ॐ क्रतो स्मर कृतं स्मर क्रतो स्मर कृतं स्मर ॥

इसका प्रमाण है कि जीवन का आधार कर्म है, नीयती को लेकर बैठना नहीं।

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 16, श्लोक 23 और 24

 शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्‌॥
भावार्थ : *जो पुरुष शास्त्र विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि को प्राप्त होता है, न परमगति को और न सुख को ही ॥* 16-23॥

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥
भावार्थ : इससे *तेरे लिए इस कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है। ऐसा जानकर तू शास्त्र विधि से नियत कर्म ही करने योग्य है ॥* 16-24॥

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 18, श्लोक9

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन।
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः।। 18-9

हे अर्जुन! जो *शास्त्रविहित कर्म करना कर्तव्य है—इसी भाव से आसक्ति और फल का त्याग करके किया जाता है—वही सात्विक त्याग माना गया है।* 

तुलसीदास जी ने भी कहा है कि,
कर्म प्रधान विश्व रचि राखा।
जो जस करहि सो तस फल चाखा।।
सकल पदारथ हैं जग मांही।
कर्महीन नर पावत नाहीं।।

उक्त श्रुति स्मृति वाक्य प्रमाण है कि, वैदिक धर्म कर्म प्रधान है। न कि, प्रारब्ध के भरोसे बैठे रहने का।
लेकिन लोग यह भी कहते हैं कि,
श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 09/ श्लोक 22
अनन्याश चिन्तयन्तो माम् ये जनः पर्युपासते
तेषाहं नित्याभियुक्तानां योग-क्षेमं वहाम्यहम्।।
और
सन्त मलूकदास 
अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काज, 
तरुवर करे न चाकरी, सरवर करे न काम।
दास मलूका कह गए, सबके दाता राम।
तो इन दोनों मतों को सही मानते हुए उत्तर यह है कि, ईश्वर पूर्ण रूप से सदाचारी नियमित प्एक निष्ठ पूर्ण समर्पित रहते हुए शास्त्रोक्त विधि से ही शास्त्रोक्त कर्म करने वाले परोपकारी व्यक्ति के ही योगक्षेम स्वयम् वहन करते हैं।
हम तो मनमाना जीवन जीयें, केवल संसार में ही रमें रहें, केवल स्वार्थ कर्म (स्व अर्थ कर्म) ही करें और आशा करें की ईश्वर हमारे सब कार्य सफल करेगा तो यह सोच ही गलत है।

बुधवार, 17 सितंबर 2025

आश्विन शुक्ल पक्ष के व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार।

*आश्विन शुक्ल पक्ष सितम्बर-अक्टूबर 2025 के व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार।* 



 *_नवरात्रारम्भ, घटस्थापना, मातामह श्राद्ध, शारदीय विषुव 22 सितम्बर 2025 सोमवार को है।_* 

 *घटस्थापना मुहूर्त ---* 
 *इन्दौर में कन्या लग्न सूर्योदय 06:15 से प्रातः 08:07 बजे तक।* 

इन्दौर में निरयन कन्या लग्न उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र प्रातः 06:26 बजे तक। फिर हस्त नक्षत्र प्रातः 06:39 तक। फिर चित्रा नक्षत्र।
 *इन्दौर में* 
सूर्योदय 06:16 बजे।
मध्याह्न 12:19 बजे।
सूर्यास्त 06:22 बजे।
मध्य रात्रि 12:19 बजे
चन्द्रमा अस्त 06:38 बजे, अतः चन्द्र दर्शन नहीं हो पाएगा।
अभिजित मुहूर्त 11:55 से 12:43 बजे तक।
मध्याह्न काल 11:08 से दोपहर 01:34 बजे तक।
सायाह्न 06:22 से रात्रि 07:33 बजे तक।
प्रदोष काल 06:22 से 08:45 बजे तक।
महानिशिथ काल रात्रि 11:55 से 12:43 बजे तक।
 *शारदीय विषुव/सायन तुला संक्रान्ति रात्रि 11:50 बजे।* 
वैदिक दक्षिणायन प्रारम्भ/पौराणिक दक्षिण गोल प्रारम्भ, वैदिक शरद ऋतु प्रारम्भ , वैदिक ईष मास प्रारम्भ, पौराणिक उर्ज मास प्रारम्भ ।

*सञ्कल्प वाचन हेतु जानकारी* 
कलियुग संवत 5126 वैदिक उत्तरायण, उत्तर तोयन, वर्षा ऋतु, नभस्य मास गतांश 29,
पौराणिक उत्तर गोल, दक्षिणायन, शरद ऋतु, ईष मास, गते 31,
विक्रम संवत 2082, कन्या गतांश 05 गते 06, उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र तृतीय चरण।
इन्दौर में निरयन कन्या लग्न 04°15'53" उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र तृतीय चरण प्रातः 06:26 बजे तक। फिर हस्त नक्षत्र प्रातः 06:39 तक।
शके 1947 आश्विन शुक्ल प्रतिपदा, शारदीय 
प्रतिपदा तिथि उत्तर रात्रि 02:55 बजे तक रहेगी। किंस्तुघ्न करण दोपहर 02:06 बजे तक रहेगा। फिर बव करण उत्तर रात्रि 02:55 बजे तक रहेगा।
उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र दोपहर 11:58 बजे तक रहेगा फिर हस्त नक्षत्र रहेगा। शुक्ल योग सायम् 07:58 बजे तक रहेगा ।

 *सार्वजनिक दुर्गोत्सव हेतु इन्दौर में* 
कन्या लग्न सूर्योदय 06:15 से प्रातः 08:07 बजे तक।
स्थिर लग्न वृश्चिक 10:21 से 12:37
द्विस्वभाव लग्न धनु 12:37 से दोपहर 02:42 बजे तक।
स्थिर लग्न कुम्भ अपराह्न 04:29 से 06:02 बजे तक।
द्विस्वभाव लग्न मीन सायं 06:02 से 07:33 बजे तक।
स्थिर लग्न वृषभ रात्रि 09:13 बजे से 11:12 बजे तक।
द्विस्वभाव लग्न मिथुन रात्रि 11:12 बजे से 01:25 बजे तक।

 *चौघड़िया कोई मुहूर्त नहीं होता है।* 
अमृत प्रातः 06:16 से 07:47 बजे तक।
शुभ सुबह 09:18 से 10:48 बजे तक।
लाभ दोपहर 03:20 से 04:51 बजे तक।
अमृत अपराह्न 04:51 बजेसूर्यास्त 06:22 बजे तक।
लाभ रात्रि 10:50 से 12:19 बजे तक।




 *चन्द्र दर्शन* 23 सितम्बर मङ्गलवार को इन्दौर में सायं 07:07 बजे के पहले तक होगा। 

 *सायन तुला संक्रान्ति का पुण्यकाल* सूर्योदय से मध्याह्न तक।
इन्दौर में 
सूर्योदय 06:17 बजे 
मध्याह्न 12:19 बजे।
सूर्यास्त 06:21 बजे।



 *विनायक चतुर्थी* 25 सितम्बर गुरुवार को है।
इन्दौर में 
मध्याह्न 12:18 बजे होगा।
मध्याह्न काल 11:06 से 01:30 बजे तक।



 *ललिता पञ्चमी, उपाङ्ग ललिता व्रत* 26 सितम्बर, शुक्रवार को अपराह्न काल में है।
इन्दौर में अपराह्न काल दोपहर 01:30 से 03:54 बजे तक।
पञ्चमी तिथि प्रारम्भ सुबह 09:33 बजे से (27 सितम्बर शनिवार को दोपहर 12:03 बजे तक रहेगी।)


 *षष्ठी तिथि में* बङ्गालियों का *बिल्वपत्र निमन्त्रण*
 *बिल्वपत्र मे सरस्वती आह्वान कर बिल्वपत्र निमन्त्रण* 
27 सितम्बर शनिवार को दोपहर 03:53 से सायं 06:17 बजे सूर्यास्त के पहले करेंगे।
षष्ठी तिथि दोपहर 12:03 से प्रारम्भ होगी।


बङ्गालियों का *कल्पारम्भ तथा अकाल बोधन* (देवशयन में देवी को असमय जगाना।) 
28 सितम्बर रविवार को होगा।
इन्दौर में सूर्योदय 06:18 बजे और सूर्यास्त सायं 06:16 बजे होगा ।
सप्तमी तिथि प्रारम्भ दोपहर 02:26 बजे से होगी।
मूल नक्षत्र प्रारम्भ उत्तर रात्रि 03:53 बजे से होगा।।



 
*सरस्वती आह्वान*, बङ्गाल में *दूर्गापूजाप्रारम्भ, नवपत्रिका पूजन* 

*सप्तमी तिथि/ मूल नक्षत्र में सरस्वती आह्वान*
29 सितम्बर 2025 सोमवार को मूल नक्षत्र में दिन में 10:30 से सायं 05:06 बजे तक के बीच होगा।
*अरुणोदय में नवपत्रिका पूजन*
अरुणोदय से सूर्योदय समय तक करेंगे।
इन्दौर में *अरुणोदय* समय उत्तर रात्रि 05:55 बजे से अगले सूर्योदय समय 06:19 बजे तक रहेगा।
सप्तमी तिथि अपराह्न 04:30 बजे तक, फिर अष्टमी तिथि रहेगी।
मूल नक्षत्र उत्तर रात्रि 06:16 बजे तक रहेगा।
इन्दौर में 
सूर्योदय 06:19 बजे
सूर्यास्त सायं 06:15 बजे।
सायाह्न सन्ध्या 06:15 से सायं 07:27 बजे तक।




 *दुर्गाष्टमी, महाष्टमी, महाष्टमी उपवास, सरस्वती पूजन* 
30 सितम्बर 2025 मङ्गलवार को होगा।
अष्टमी तिथि सायं 06:05 बजे तक रहेगी।
पूर्वाषाढ़ नक्षत्र अहोरात्र (पूरे दिन-रात) रहेगा।
पूर्वाषाढ़ नक्षत्र 29 उपरान्त 30 सितम्बर सोमवार (Tuesday) को 06:16 बजे से 01 अक्टूबर बुधवार को प्रातः 08:05 बजे तक रहेगा।

 *सरस्वती पूजा* अष्टमी तिथि, पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में दोपहर 12:45 बजे से सायं 06:14 बजे सूर्यास्त तक होगी।
इन्दौर में 
मध्यरात्रि 12:16 बजे।
महानिशिथ काल रात्रि 11:52 बजे से 12:41 बजे तक।
एक मुहूर्त (48 मिनट) की *सन्धि पूजा* सायं 05:41 बजे से 06:29 बजे तक होगी।
सायं 05:41 से अष्टमी समाप्ति सायं 06:05 बजे तक अष्टमी की सन्धि पूजा फिर नवमी की सन्धि पूजा पूजा 06:29 बजे तक होगी।



 *महा नवमी, महा नवमी उपवास, आयुध पूजन, देवी को बलिदान, सरस्वती बलिदान, नवरात्र उत्थापन* 
01 अक्टूबर 2025 बुधवार को होगा।
उदय व्यापिनी नवमी तिथि में *बलिदान* अपराह्न काल में दोपहर 01:27 से 03:50 तक होगा।
*सरस्वती बलिदान* उत्तराषाढ़ नक्षत्र में दोपहर 03:50 बजे से सायं 06:13 बजे सूर्यास्त तक।
*आयुध पूजा* समय विजय मुहूर्त में दोपहर 02:15 से 03:03 बजे तक 
 दक्षिण भारत में सरस्वती पूजा करके *विद्यारम्भ* किया जाता है।
नवमी तिथि सायम् 07:00 बजे तक रहेगी।
पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र प्रातः 08:05 बजे तक रहेगा फिर उत्तराषाढा नक्षत्र 02 अक्टूबर गुरुवार को 09:12 बजे तक रहेगा।
बालव करण प्रातः 06:38 बजे तक रहेगा फिर कौलव करण सायं 07:00 बजे तक रहेगा।




 *दशहरा, विजयादशमी, दसरा, विसर्जन, सरस्वती विसर्जन,श्रीबुद्ध जयन्ती* *, 

*विजया दशमी* इन्दौर में विजय मुहूर्त दोपहर 02:15 से 03:02 बजे तक ।
उत्तर भारत में *अपराह्न पूजा समय* दोपहर 01:27 से 03:49 बजे तक।

 *दुर्गा विसर्जन* दशमी तिथि और श्रवण नक्षत्र में प्रातः काल मे ।
इन्दौर में मध्याह्न सूर्योदय 06:20 बजे से 08:42 के बीच करें। 
इन्दौर में चर और द्विस्वभाव लग्न 
द्विस्वभाव कन्या लग्न 06:20 से प्रातः 07:27 बजे तक।
चर लग्न तुला प्रातः 07:27 से 0842 बजे तक।

 *सरस्वती विसर्जन* *श्रवण नक्षत्र के प्रथम चरण में* श्रवण नक्षत्र प्रारम्भ समय प्रातः 09:12 से श्रवण नक्षत्र के प्रथम चरण समाप्ति समय दोपहर 03:18 बजे तक के बीच चर लग्न में करें।
तुला लग्न 09:13 से 09:42 तक।
धनु लग्न 11:57 से दोपहर 02:03 तक।
मकर लग्न दोपहर 02:03 से 03:18 तक।
श्री बुद्ध जयन्ती दोपहर सायाह्न प्रारम्भ समय 03:49 से 06:12 बजे सूर्यास्त तक।
दशमी तिथि 01 अक्टूबर बुधवार को सायम् 07:00 से 02 अक्टूबर गुरुवार को 07:10 बजे तक रहेगी।
श्रवण नक्षत्र प्रारम्भ 02 अक्टूबर गुरुवार को प्रातः 09:12 से 03 अक्टूबर शुक्रवार को सुबह 09:33 बजे तक रहेगा।

 सुचना--- *श्रीबुद्ध जयन्ती* 
बिहार में गया के निकट किकट नामक स्थान पर सायाह्न में आश्विन शुक्ल दशमी (विजयादशमी/ दशहरे) (मतान्तर से पौष शुक्ल सप्तमी) के दिन पिता अजिन (या मतान्तर से हेमसदन) के घर माता अञ्जना के गर्भ से भगवान श्री बुद्ध का अवतार हुआ ऐसा मानते हैं।
इन्दौर में सायाह्न 03:49 से 06:12 सूर्यास्त तक।



*पापाञ्कुशा एकादशी व्रत* 03 अक्टूबर 2025 शुक्रवार को है।
फलाहार - फुट काँचरी/ फ्रूट काँचरी का।
पारण 04 अक्टूबर शनिवार को प्रातः 06:20 से 08:42 बजे तक। द्वादशी तिथि समाप्ति सायं 05:09 बजे के पहले पारण अवश्य कर लें।




*कोजागिरी पूर्णिमा, शरद पूर्णिमा, लक्ष्मी पूजा, व्रत की पूर्णिमा*,  
06 अक्टूबर 2025 सोमवार को है।
इन्दौर में
 *प्रदोष काल* सूर्यास्त समय सायं 06:08 से रात्रि 08:35 बजे तक।
 *चन्द्रोदय* सायं 05:34 बजे।
 *महानिशिथ काल* रात्रि 11:50 से 12:39 तक।

पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ दोपहर 12:23 बजे होगा।
पूर्णिमा तिथि समाप्ति 07 अक्टूबर मङ्गलवार को सुबह 09:17 बजे।
विष्टि करण (भद्रा) दोपहर 12:23 बजे से रात्रि 10:53 बजे तक रहेगा। फिर बव करण रहेगा।

*कार्तिक पूर्णिमा, नवान्न पूर्णिमा, कार्तिक स्नान प्रारम्भ।*
07 अक्टूबर 2025 मङ्गलवार को है।
पूर्णिमा तिथि समाप्ति सुबह 09:17 बजे होगी।
प्रतिपदा तिथि क्षय है, प्रतिपदा तिथि सुबह 09:17 बजे से उत्तर रात्रि 05:53 बजे रहेगी।

रविवार, 14 सितंबर 2025

भारतियों का मुख्य दोष आत्म गौरव का अभाव।

भारतियों को अपने देश,धर्म,संस्कृति,भाषा और भूषा पर गर्व नहीं अपितु शर्म आती है।इसी कारण लगभग ढाई हजार वर्ष अलग-अलग क्षेत्रों में दासता भोगी। फिर भी नहीं सुधरे।सिंगापुर के लोग इसीलिए भारतियों से घृणा करते हैं क्योंकि, भारतियों ने ही आक्रान्ताओ की सेना में सम्मिलित होकर अपने देशवासियों पर अत्याचार करने, उन्हें दास बनाने में सहयोग दिया।आज भी गर्व से स्वयम् को दास (हिन्दू) कहते हैं।

क्या ब्राह्मण ग्रन्थों को श्रुति या वेद कहना उचित है?

क्या ब्राह्मण ग्रन्थों को श्रुति या वेद कहना उचित है?
किसी से भी पुछो कि, वेद कितने हैं तो चार ही कहेगा।
नाम पूछो तो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद ही कहेगा।
अन्य किसी ब्राह्मण ग्रन्थ को वेद नाम से नहीं पुकारेगा।
जैसे वेद त्रयी या त्रयी विद्या शब्द का अर्थ पद्य, गद्य और गान योग्य वेद है, अथर्ववेद सहित सभी मन्त्र संहिताओं के नाम ऋग्वेद में भी मिलते हैं।  
ब्राह्मण ग्रन्थ मन्त्र संहिताओं की व्याख्या (भाष्य) है, इसलिए उन्हें श्रुति नहीं कहा जाता क्योंकि ब्राह्मण ग्रन्थ ऋषियों की रचना है, इसलिए अपौरुषेय नहीं है।

बत्तीस विद्याएँ, दस महा विद्या नामक देवियाँ, षोडश कला और चौसठ कलाएँ ऐसे प्रयोग भाषा में पाये जाते हैं। इससे कुछ लोग भ्रमित होते हैं।
कुछ लोग अथर्ववेद को वेद नहीं मानते।
तो कुछ लोग ब्राह्मण ग्रन्थों को भी वेद कहते हैं। उनका तर्क रहता है कि, पूर्व मीमांसा दर्शन में महर्षि जैमिनी ने और उत्तर मीमांसा दर्शन में महर्षि बादरायण ने तथा भगवान आद्य श्री शंकराचार्य जी ने उपनिषद भाष्यों में उपनिषदों को श्रुति कहा है।
श्रीमद्भगवद्गीतासुपनिषद कहा जाता है, जिसे गलत भी नहीं कह सकते। लेकिन श्रीमद्भगवद्गीता महाभारत का अङ्ग है।

आदित्यहृदय स्तोत्र जैसे कुछ वाल्मीकि रामायण के भाग हैं।
कुछ उपनिषद अध्यात्म रामायण के भाग हैं।
कुछ उपनिषद योग वाशिष्ठ के भाग हैं।
कई उपनिषद तो पुराणों के भाग भी है।
स्मृति के भाग उक्त सभी उपनिषद 108 उपनिषदों या 209 उपनिषदों में परिगणित किये जाते हैं।
तो क्या पुराणों और रामायण, महाभारत को भी वेद कहोगे?
नही ना।; इसलिए ब्रह्मर्षियों द्वारा श्रुतियो पर किये भाष्य अर्थात व्याख्या ब्राह्मण ग्रन्थों को भी श्रुति नहीं होने के कारण वेद भी नहीं माना जाता हैं।

श्राद्ध पक्ष में पूजा प्रारम्भ करने या पूजन करने का किसी भी शास्त्र में निषेध नहीं है।

श्राद्ध पक्ष में किसी भी देवता की पूजा करने का निषेध नहीं है।
पितृ पक्ष में अर्थात श्राद्ध पक्ष में किसी भी देवता की पूजा प्रारम्भ करने का भी निषेध नहीं है।
उठावने के दिन मन्दिर में जाते हैं।
गरुड़ पुराण सुनने के समय विष्णु पूजा करते हैं।
एकादशाह, द्वादशाह, त्रयोदशाह में, मासिक त्र श्राद्ध में, त्रेमासिक श्राद्ध में, अर्ध वार्षिक श्राद्ध में, वार्षिक श्राद्ध में, दो वर्ष पश्चात श्राद्ध में सम्मिलित करने के समय, प्रतिवर्ष मृत्यु तिथि को होने वाले एकोदिष्ट श्राद्ध में और श्राद्ध पक्ष में होने वाले पार्वण श्राद्ध में विष्णु पूजा करते हैं।
अर्थात श्राद्ध में विष्णु पूजा का विधान है, और विष्णु परम पद है। सर्वोच्च देव हैं। जब उनकी पूजा होती है तो किसी देवता और रामभक्त हनुमान जी की पूजा का निषेध कैसे हो सकता है?
किसी भी शास्त्र में श्राद्ध पक्ष में पूजा प्रारम्भ करने और पूजा करने का निषेध नहीं है।

शुक्रवार, 12 सितंबर 2025

मैं शास्त्रोक्त कर्म शास्त्रोक्त विधि से ही करने पर जोर क्यों देता हूँ।

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 16, श्लोक 23 और 24

 शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्‌॥
भावार्थ : जो पुरुष शास्त्र विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि को प्राप्त होता है, न परमगति को और न सुख को ही ॥16-23॥
 
 
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥
भावार्थ : इससे तेरे लिए इस कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है। ऐसा जानकर तू शास्त्र विधि से नियत कर्म ही करने योग्य है ॥16-24॥

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 18, श्लोक9

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन।
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः।। 18-9

हे अर्जुन! जो शास्त्रविहित कर्म करना कर्तव्य है—इसी भाव से आसक्ति और फल का त्याग करके किया जाता है—वही सात्विक त्याग माना गया है।

श्राद्ध क्यों आवश्यक है और श्राद्ध ग्रहण कौन करता है? और श्राद से क्या लाभ होगा?

हम आज जो पानी पीते हैं, इस पानी से प्यास बुझती है यह खोज करने वाले वैज्ञानिक, जल स्त्रोत की खोज करने वाले वैज्ञानिक, जल स्रोत तसे हमारे मुख तक पहूंचाने के लिए संसाधन की खोज करने वाले अनेक वैज्ञानिकों (जिन्होंने बाल्टी, मटका, ग्लास से लेकर नर्मदा जल हमारे घर तक पहूँचने में प्रयुक्त विद्युत निर्माण से पारेषण तक, पाइप लाइन, फिटिंग्स , लगने वाले औजार आदि की खोज करने वाले वैज्ञानिक) ऐसे अरबों खरबों लोगों के योगदान और कृपा से हम पानी पी पा रहे हैं, उन सबके प्रति श्रद्धा समर्पण सर्वपितृ अमावस्या को हम जरासा त्याग कर एहसान नहीं करते हैं। यह तो हमारा दायित्व बनता है, कर्तव्य है।
श्राद्ध में ये पितर और विश्वेदेवाः के लिए स्वधा (स्व को धारण करने की शक्ति) समर्पित की जाती है।
जिन सात पीढ़ी के पूर्वजों और ऐसे ही अभीतक मर चुके सर्व पितरों के लिए आप जो श्राद्ध करते हैं उनमें से कोई एक का जन्म लेकर सम्भव है कि, स्वयम् आप ही हो, या आपके परिवार में ही कई व्यक्ति हों, जो उस समय उसी स्थान पर हो, इसलिए सात पीढ़ी के पूर्वजों और ऐसे ही अभी तक मर चुके सर्व पितरों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए आपको जिन भोग पदार्थों के प्रति लगाव है उनको चुंकि वे भोग पदार्थ सृष्टि के आदि से आज तक उत्पन्न लोगों के सहयोग से ही आप तक पहूँची है, इसलिए उसका एक अंश जरुरतमंद लोगों को दान कर अपना कर्तव्य निर्वहन करते हैं। इस प्रकार आप
*(1) अग्निष्वात (2) बहिर्षद (3) कव्यवाह (4) अर्यमा, (5) अनल (6) सोम और (7) यम* 
तथा
 *1 दक्ष, 2 व्रतु, 3 वसु, 4 काम, 5 सत्य, 6 काल, 7 रोचक, 8 आद्रव, 9 पुरुरवा तथा 10 कुरज*
के प्रति अपनी श्रद्धा समर्पित करते हैं। 
ये पितर और विश्वेदेवाः उन पदार्थों में से एक परमाणु भी ग्रहण नहीं करते हैं, वे केवल आपकी श्रद्धा और प्रेम ग्रहण कर अब जो चीजें आपके पास बची है, उन चीजों में उनका अपना स्नेह और प्रेम डाल देते हैं इस कारण अब वे चीजें आपके लिए आयु, पुष्टि, तुष्टि और सन्तुष्टि कारक, बल वर्धक, स्वास्थ्य वर्धक हो जाती है।
और आपने जिन मृतको के निमित्त श्राद्ध किया है उन्हें भी तुष्टि और पुष्टि, बल और सामर्थ्य के रूप में पहूँचा देते हैं।
न कोई देवता, न देव, न भगवान न ईश्वर न परमात्मा कोई भी आपके द्वारा अर्पित भोग का एक परमाणु भी ग्रहण नहीं करते हैं। उसमें से वे केवल आपकी श्रद्धा और प्रेम ग्रहण कर उस भोग में डाल देते हैं इस कारण वह प्रसाद (कृपा) बन जाता है। और आपको अत्यन्त रोचक, स्वादिष्ट लगने लगता है। यह चमत्कार प्रायः सभी ने अनुभव किया है।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन का अर्थ।

परिणाम प्राप्त्यर्थ ही कर्म का आरम्भ होता है। गन्तव्य तक पहूँचने के लिए ही पहला कदम उठाया जाता है। 
निरुद्देश्य कर्म तो निषिद्ध कर्म माना जाता है।
अनर्गल चेष्ठाएँ जैसे बैठे बैठे पेर हिलाना, हाथों की उँगलियों से अकारण कुछ करन, फोन पर बात करते हुए कागज पर कुछ चितरना (अनघड़ डिजाइन बनाना, हस्ताक्षर करना आदि) निरुद्देश्य कर्म होने से निषिद्ध कर्म है।
दान देना एक कर्तव्य है।
लेकिन दान देने के पीछे कई मंशा या आशय (इण्टेन्शन) और उद्देश्य हो सकते हैं,
1 किसी जरुरतमंद की आवश्यकता पूर्ति करना।
चूंकि वह वस्तु मेरे पास है और जरुरतमंद व्यक्ति को उस चीज की आवश्यकता मुझ से अधिक है, उसे इसकी आपूर्ति की तत्काल आवश्यकता है इसलिए तत्काल दे देना।
अर्थात कर्तव्य मान कर दान करना। बस यही दान सार्थक है। यही दान है।
शेष व्यापार मात्र है।
2 देखनें वालों में मेरी दानशीलता का प्रभाव पड़ेगा, यश, प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि और प्रचार होगा। इसका फल तत्काल मिल जाता है और कर्मफल पूर्ण हो जाता है।
ये थे कर्म फल जिसमें पहले वाला निष्काम कर्म अर्थात यज्ञ के लिए यज्ञ था।
शेष सभी राजसी तामसी दान केवल बन्धन कारक हैं।

3 अनन्त गुना होकर मेरे अकाउण्ट में जमा रहेगा और आवश्यकता पड़ने पर लौटकर मुझे मिल जाएगा। अर्थात स्वार्थ बुद्धि। खाते में पुण्य संचय होकर इसका फल होता है।
4 स्वर्गादि लोक प्राप्ति। 
5 अन्तःकरण शुद्धि - यह नया फण्डा है। जो मेरे मत में केवल मुर्खतापूर्ण सोच है। त्रिगुणात्मक प्रकृति और प्राकृतिक पदार्थ चित्त, बुद्धि, अहंकार और मन कभी शुद्ध नहीं हो सकते। क्योंकि ये प्रकृति में आये विकार का परिणाम है। विकृति ही है। शुद्ध तो केवल प्रज्ञात्मा ही है। मूलतः ये लोग प्रत्यगात्मा (अन्तरात्मा) को जीव भाव से मुक्त कर प्रज्ञात्मा की ओर ले जाकर प्रज्ञात्मा में लीन करना चाहते हैं, लेकिन तत्व मीमांसा के ज्ञान के अभाव में गलत शब्द बोलते हैं।
 
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन
का अर्थ लोगों ने गलत किया है। परिणाम की अपेक्षा से ही कर्म होता है, लेकिन कर्मफल ऋत के अनुसार स्वतः होता ही है, कर्मफल की इच्छा रखना या न रखने से ऋत को कोई अन्तर नहीं पड़ता। ऋत की प्रक्रिया नियत है। उसे आपकी सोच नहीं बदल सकती।

शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

ईश्वर तथा देवता गण के बारे में वैदिक और इब्राहीमी अवधारणा में अन्तर

सातवें आसमान पर बैठा व्यक्ति निश्चित ही सातवें आसमान से आकार (साइज) मेंं छोटा होगा। अतः गोलाकार हो या दृव और गैस के समान कूटाकृति लेकिन निराकार तो हो ही नही सकता।

निराकार सर्वव्यापक परमात्मा ही हो सकता है।

ॐ कार नाम से ही स्पष्ट है कि ॐ भी साकार ही है। शेष देव हों या देवता निराकार नही मानें गये हैं। चाहे वे तरङ्गाकार हो, कूटाकृति हो, दीर्घगोलाकर (सामान्य भाषा में अण्डाकार) हो, गोलाकार हो या पुरुषाकृति (देह के समान आकार वाले) हों।

यहूदी यहोवा परमेश्वर के अलावा पवित्रात्मा (उनके देवताओं या फरिश्तों) को भी नमन / दण्डवत नमन करते हैं। विद्या ददाति विनयम्, विनयम् ददाति पात्रताम्। विनम्रता गुण है कोई दोष नहीँ। अपने से योग्य और वरिष्ठों का आदर करना सद्गगुण है दोष नही। उनके सामने विनम्र होना ही चाहिए । ठूंठ जैसे खड़े रहना तो ढीठता ही है। पर वे भी देवताओं को परमेश्वर नही मानते। अतः उनके लिये भी यह नही कहा जा सकता कि, वे यहोवा परमेश्वर के समतुल्य किसी देवता फरिश्ते / पवित्र आत्मा को मानते हैं।

ईसाइयों का धर्म भी यहुदियों के ही समान है।केवल कर्मकाण्ड की क्रियाओं में थोड़ा अन्तर है। ईसाई भी यहोवा परमेश्वर के अलावा पवित्रात्मा (उनके देवताओं या फरिश्तों) को भी नमन करते हैं। पर वे भी देवताओं को परमेश्वर नही मानते। साथ ही यीशु को भी परमेश्वर का पुत्र मानते हैं। पर सर्वोच्च स्थान उनके मन में भी यहोवा के प्रति ही है।यीशु दुसरे स्थान पर ही हैं। अतः उनके लिये भी यह नही कहा जा सकता कि, वे यहोवा परमेश्वर के समतुल्य किसी देवता फरिश्ते / पवित्र आत्मा को मानते हैं।

फिर उन्हें मुशरिक कैसे कहा जाता है। यह तो केवल उन्हें मुशरिक कहनें वाले ही जानें।

अब आता हूँ सनातन वेदिक धर्म पर—

सनातन.वेदिक धर्म के सर्वव्यापी परमात्मा की अवधारणा सर्वोच, परमपद परमेश्वर को ही अन्तिम सत्य माननें वाले समझ ही नही पाये।

परमात्मा सबकुछ है। जो सत और असत से भी परे है। ज्ञान और अज्ञान से भी परे है, (वेदोsहम अवेदोsहम )।आनन्द और अनानन्द से भी परे है। अर्थात परमात्मा के बारे में सोचना ही सम्भव नही है। उसे परम आत्म स्वरूप जानकर ही परमात्मा होकर ही समझा जा सकता है। क्योंकि परमात्मा ही वास्तविक मैं / परम आत्म है।

सनातन वेदिक धर्म में (ऋग्वेद में) विष्णु परमपद कहा गया है। परमेश्वर कहा गया है। सवितृ देव को महेश्वर और नारायण को जगदीश्वर कहा गया। हिरण्यगर्भ को भी ईश्वर कहा जाता है। और सनातन वेदिक धर्मी तो अवस्था मेंबड़े, योग्यता मेबड़े, सदाचरण में श्रेष्ठ, पद में बड़े, प्रतिष्ठा में बड़े सबको प्रणाम करते हैं। कहा भी है कि, जो जितना विनमृ हो समझना चाहिए कि, वह उतना ही योग्य और क्षमतावान होगा। क्षमा वीरस्य भूषणम्। विद्या ददाति विनयम्।

मतलब ईश्वरों की श्रेणी है। ईश्वरत्व मात्र पदाधिकारी है। सर्वोच्च सत्य/ परम सत्य नही है। किन्तु इनमें से किसी के भी समतुल्य कोई विरोधी देवता (इब्लीस जैसा शैतान) नही है। और परमात्मा तो परम है/ एब्सोल्यूट है।

यह अवधारणा नही समझपाने के कारण सनातन वेदिक धर्म को बहूदेववादी होनें का आरोप लगाया जाता है।

जबकि देवता/ फरिश्ते तो यहूदी, ईसाई, और इस्लाम अर्थात इब्राहीमी सम्प्रदायों में भी है। यहूदी तो उन्हें दण्डवत प्रणाम भी करते हैं।

खेर अपनी अपनी समझ।

गुरुवार, 4 सितंबर 2025

वेदों पर हिन्दी में भाष्य रचकर महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने उपकार किया।

जिस समय भारत में वास्कोडिगामा भी नहीं आया था, तब भी भारतीय यह जानते थे कि, सर्प के कान नहीं होते। वह केवल भूमि का कम्पन्न ही त्वचा के माध्यम से अनुभव करता है।
इसका प्रमाण है - सूरदास जी का पद जो उन्होंने तानसेन की प्रशंसा में लिखा था ---
विधना यह जिय जानि कै, सेसहिं दियें न कान |
 धरा मेरु सब डोलि हैं, तानसेन की तान।

इसीलिए उस समय भी और आज भी सपेरे भी यही कहते रहे कि, साँप/ नाग सुन नहीं सकते फिर भी वे बीन ही बजाते हैं और कोई वाद्य नहीं बजाते हैं। ताकि बीन की ध्वनि से उत्पन्न कम्पन बिल में छुपा सर्प या नाग सह नहीं पाता और तत्काल बाहर आ जाता है।
लेकिन यह तथ्य आज भी वैज्ञानिक नहीं समझ पाये।

इसलिए आधुनिक व्यावसायिक शिक्षा के अलावा हमारे गुरुकुलों में दिया जाने वाला वैदिक मन्त्र संहिताओं, ब्राह्मण ग्रन्थों, षड वेदाङ्गो, चार उप वेदों, अर्थशास्त्र, श्रीमद्भगवद्गीता कर्मयोग शास्त्र, पूर्व मीमांसा और उत्तर मीमांसा दर्शन, योग शास्त्र, सांख्य शास्त्र, न्याय शास्त्र, वैशेषिक शास्त्र, का ज्ञान होना आवश्यक है।
क्योंकि श्रीमद्भगवद्गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा है कि, शास्त्रोक्त विधि से ही केवल शास्त्रोक्त कर्म ही करें, अर्थात केवल निष्काम भाव से (परम के लिए ही अर्थात परमार्थ कर्म) यज्ञ के लिए ही यज्ञ करें। और निषिद्ध कर्मों के विषय में मन में विचार ही उत्पन्न नहीं हो। निषिद्ध कर्मों के प्रति उपरामता हो। यह तभी सम्भव है जब आपको शास्त्र ज्ञान हो।
लेकिन पौराणिकों ने वेदों को अनावश्यक सिद्ध करने के लिए लिखा कि, यह व्रत करने से या केवल यह कथा सुनने से ही हजारों अश्वमेध यज्ञ और राजसूय यज्ञों का फल मिल जाएगा। वेदों का अर्थ नही किया जा सकता। केवल कर्मकाण्ड तक वेद मन्त्रों का विनियोग है। पण्डितों ने प्रचार कर दिया कि,घर में महाभारत नहीं रखना और पढ़ना भी नहीं। नही तो जानकर हो जाओगे तो पुराणों को फैंक दोगे। वाल्मीकि रामायण में सत्य इतिहास मत पड़ो कम्बन और तुलसी कृत मन गढ़न्त रामचरितमानस पढ़ो।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण ने भगवान विष्णु के बीहाफ पर स्पष्ट कहा है कि, सदाचारी अनन्योन्याश्रित भक्त के योग क्षेम मैं स्वयम् वहन करता हूँ।
चमत्कारों के चक्कर में करोड़ों बर्बाद हो चुके हैं।
लेकिन जिन्हें ऋत पर पूर्ण विश्वास है, वे ही सदाचारी अनन्योन्याश्रित भक्त इन चक्करों में कभी नहीं पड़ते। वे केवल ईश्वर पर आस्था रखते हैं क्रियाओं पर नहीं।
जब वेदों का अनुवाद मेक्समूलर ने यूरोपीय जातियों को ही ज्ञानी और श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए किया तो, वैदिक संहिताओं, ब्राह्मण ग्रन्थों, वैदिक भाषा छन्दस, संस्कृत, उच्चारण शास्त्र शिक्षा, पाणिनि अष्टाध्याई, पतञ्जली महाभाष्य, वररुचि का वार्तिक, भोज वृत्ति, यास्क का निरुक्त, पिङ्गल का छन्द शास्त्र, जैमिनी की और बादरायण की मीमांसा, ज्योतिष और शुल्ब सूत्र, धर्म सूत्र, गृह्य सूत्र और श्रोत सूत्र अर्थात कल्प का ज्ञान नहीं होने लेकिन अंग्रेजी शिक्षित, उसके पूर्व सायण, महिधर आदि अनेक विद्वानों के वेद भाष्य होते हुए भी भारतियों को मेक्समूलर के अनुवाद पर आस्था टिक गई ।
मेक्समूलर द्वारा स्थापित गलत अवधारणाओं का व्याकरण, निरुक्त, न्याय शास्त्र के आधार पर वेदों पर हिन्दी भाषा में भाष्य रच कर सशक्त खण्डन कर सांख्य शास्त्र और पूर्व मीमांसा दर्शन पर आधारित मान्यताओं को पुनर्स्थापित करने का कार्य दयानन्द सरस्वती जी ने किया।
यदि वेदों का भाष्य करना अनुचित है तो क्या, पूर्व में हुए भाष्यकार, उपनिषदों पर भाष्य करने वाले भगवान शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, निम्बार्काचार्य आदि सब गलत थे?
या पौराणिक लोग पुराणों द्वारा थोपी गई भ्रामक और गलत अवधारणाओं के खण्डन होने के भय से वेदाध्ययन का विरोध कर रहे हैं?

बुधवार, 3 सितंबर 2025

भक्ति कैसे करें। तीर्थ सेवन कैसे हो।

सम्पूर्ण सृष्टि रचयिता को केवल, श्रद्धा, प्रेम, भक्ति ही अर्पित कर सकते हैं। कोई सन्तान आदि व्यक्ति, रत्न, स्वर्ण, नगद, मनी ट्रांसफर या चेक आदि से रुपये -पैसे, वस्त्र, मिष्ठान आदि वस्तु, भूखण्ड आदि स्थान (संञ्ज्ञा) नहीं दिया जा सकता।
केवल मैं (अहंकार) और मेरा पन (ममत्व/ ममता), संसार और सांसारिक व्यक्ति, वस्तु और स्थान से लगाव (आसक्ति) का त्याग कर पूर्ण समर्पण कर परमात्मा में मन लगाकर एकमेव परमात्मा का ही सदा स्मरण बना रहे ऐसी एकनिष्ठ, अव्यभिचारी भक्ति हो। 
बिना लगाव के, केवल कर्तव्य पालन हेतु 
सार्वजनिक संस्थानों का सञ्चालन रखरखाव में योगदान आवश्यक है । सकामोपासन का विरोध -  कामना रहित होना चाहिए, क्यों कि, जिसने पूरी सृष्टि रचकर  "तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा , मा गृधः कस्यस्विद् धनम्।" अर्थात इसका त्याग पूर्वक केवल यथा आवश्यकता भोग करो, किसी के धन का लोभ मत करो क्योंकि यह धन (सृष्टि) केवल माया है। यह किसी की भी नहीं होती, किसी की नहीं रहती कहकर यह सृष्टि हमें सोप दी। 
अपनी योग्यता बढ़ाते जाओ आपको स्वयम् प्राप्त हो जाएगी। जैसे जो सुविधाएँ प्रधानमन्त्री को मिलती हैं वह आपको तभी मिलेगी जब आप प्रधानमन्त्री बन जाओ। यह योग्यता वर्धन आपको करना है। इसका उपाय है निष्काम रहना हमारी कामना की सामर्थ्य इतनी नहीं है कि, हम वाञ्छित प्राप्त कर सकें।

विकास के नाम पर विनाश वाली बातें और तीर्थों को उनके मूल स्वरूप में रहने पर ही वे तीर्थ रह पाएंगे। तीर्थो को पर्यटन केन्द्र न बनाया जाए इस विषय में मैं पूर्ण सहमत हूँ।

तीर्थ स्थानों पर मन्दिर में भक्तों, व्रतियो, तपस्वियों और परीक्रमा करने वालों के लिए ही व्यवस्था होती है अतः मन्दिरों आदि में  खाने - पीने, ठहरने आदि की व्यवस्था केवल तीर्थ यात्रियों के लिए ही हो न कि, पर्यटकों या सामान्य यात्रियों के लिए।
उनके लिए धर्मशाला, हॉटेल- मोटेल, रेस्टोरेंट आदि ही हैं, न कि, मन्दिर।

 असहमति -
गुरुकुल में रहकर वैदिक मन्त्र संहिताओं, ब्राह्मण ग्रन्थों, षड वेदाङ्गो, अर्थशास्त्र, चारों उपवेदों, पूर्व मीमांसा और उत्तर मीमांसा, श्रीमद्भगवद्गीता, तथा  योग, सांख्य, न्याय और वैशेषिक दर्शन का अध्ययन के साथ व्यावसायिक शिक्षा ग्रहण करना अत्यावश्यक है क्योंकि,

श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण ने स्पष्ट कहा है कि, शास्त्रोक्त विधि से ही शास्त्रोक्त कर्म करते हुए ही जिएँ। निषिद्ध कर्मों के प्रति उपरामता हो। निषिद्ध कर्म के प्रति कभी भी मन में संकल्प ही नहीं उठे; कल्पना भी नहीं हो।
उक्त प्रकार से यज्ञ के लिए यज्ञ करते हुए ही अविरत हरि स्मरण बना रहे। तब ऐसे सदाचारी अनन्य भक्त के योग क्षेम मैं स्वयम् वहन करता हूँ। इसलिए निश्चिन्त रहा जाए।

साथ ही श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण ने स्पष्ट कहा है कि, इस जन्म में व्यक्ति जितनी योग्यता प्राप्त कर जितनी उन्नति कर लेता है उतनी योग्यता के साथ ही उसका अगला जन्म तदनुकूल परिवार में होता है और वह योग भ्रष्ट पुरुष उस अगले जन्म में उससे आगे ही बढ़ता है। योग भ्रष्ट पुरुष का पतन (नाश) नहीं होता है।