गुरुवार, 17 अक्टूबर 2024

श्रीरामचरित्र के सच और लोक मान्यताओं में आकाश पाताल का अन्तर है।

 
कृपया देखें -- वाल्मीकि रामायण/ बालकाण्ड/ उनचासवाँ सर्ग/ श्लोक 19 से 21 तक। विशेषकर श्लोक 17 और 18
श्री रामचन्द्र जी ने तपस्या कर रही अहिल्या के चरण छूकर प्रणाम माता जी कहा, लेकिन लोग कहते हैं कि, पत्थर बनी अहिल्या को श्री रामचन्द्र जी ने पैर के अङ्गुष्ठ से छुआ।

कर्नाटक -केरल और लक्ष्यद्वीप का मानचित्र (नक्षा) लेकर वाल्मीकि रामायण/ किष्किन्धाकाण्ड/ पचासवाँ सर्ग/ श्लोक ३,7-8, 21, 24, तिरेपनवाँ सर्ग/ श्लोक 1, 2, 5 एवम् छप्पनवाँ सर्ग / श्लोक 1 एवम् 2, तथा अट्ठावनवाँ सर्ग/ श्लोक 15 से 20 तक, इकतालीसवाँ सर्ग/ श्लोक 19 एवम् 20 और युद्ध काण्ड/ सर्ग/श्लोक 70 -71 , और 92 से 94 तथा 103 एवम् एक सौ एकसौ इक्कीसवाँ सर्ग / श्लोक 17, 45 से 48, 52-53,55,60-61,64-65,69, 71 एवम् 72 पढ़ने पर निश्चित ही समझ आ जाएगा कि, 
*हनुमान जी भरुच के पास से समुद्र पार कर लंका गये थे। लोग धनुषकोडी के पास बतलाते हैं।* 
 *रावण की लंका लक्ष्यद्वीप के स्थान पर श्रीलंका मानते है़। श्री रामचन्द्र जी द्वारा कोझीकोड (केरल) से किल्तान द्वीप तक राम सेतु बनवाया था, लेकिन ,लोग तथाकथित एडम ब्रिज को राम सेतु मानते हैं।* 

 *रावण ने वेदाध्ययन किया था ऐसा कोई उल्लेख नहीं मिलता, लेकिन लोग रावण को वेदज्ञ मानते हैं।* 
तैत्तिरीय संहिता और तैत्तिरीय ब्राह्मण का सम्बन्ध श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यास जी के शिष्य वैशम्पायनजी जी से है, यह वर्णन सर्वत्र उपलब्ध है। 
लेकिन लोग कहते हैं कि, यजुर्वेद पर रावण ने भाष्य किया था, और उस भाष्य और यजुर्वेद को गड्ड-मड्ड कर दिया इसलिए इसे कृष्ण यजुर्वेद कहते हैं। जो दक्षिण भारत में कर्मकाण्ड का आधार है।
*रावण अधर्मी तान्त्रिक था यह उल्लेख किष्किन्धाकाण्ड और युद्ध काण्ड में कई बार मिलता है। लेकिन लोग उसे महान शिवभक्त कहते हैं। *
 
वाल्मीकि रामायण/ किष्किन्धाकाण्ड/ इकतालीसवाँ सर्ग/श्लोक 19-20 देखें ---
 *दक्षिणापथ पर सीताजी की खोज कर्ता दल को स्पष्ट निर्देश देते हैं कि, (तञ्जावुर में) पाण्ड्यदेश का सूचना पट्ट देखकर दक्षिण में आगे बढ़ जाना। (पाण्ड्यदेश में प्रवेश न करना।)* 

 और वाल्मीकि रामायण/ युद्धकाण्ड/ चौथा सर्ग देखें --- *किष्किन्धा से पश्चिम घाट पर ही चलते चलते वे सह्य पर्वत पर पहूँच कर सब वानर सह्य पर्वत पर चड़ गये। - 70
श्रीरामचन्द्रजी सह्य और.मलय पर्वत के विचित्र काननों, नदियों, तथा झरनों की शोभा देखते हुए यात्रा कर रहेथे। - 71 
श्री रामचंद्र जी महेन्द्र पर्वत (शायद कण्णूर का ईजीमाला पर्वत) के पास पहूँच कर उसके शिखर पर चढ़ गये। - 92 
महेन्द्र पर्वत पर आरुढ़ हो श्री राम जी ने समुद्र को देखा। -93 
इस प्रकार वे सह्य और मलय को लाँघखर महेन्द्र पर्वत के समीपवर्ती समुद्र के तट पर जा पहूँचे। - 94 
उस (महेन्द्र पर्वत) से उतरकर शीघ्र ही सागर तटवर्ती वन में जा पहूँचे।रामचन्द्रजी की आज्ञा से सुग्रीव ने समुद्र तटीय वन में सेना को ठहरा दिया। पड़ाव डाला। - 103* 
*श्री रामचन्द्र जी कभी तमिलनाडु गये ही नहीं और न कहीं भी कोई शिवलिङ्ग स्थापित किया, लेकिन लोग रामेश्वरम श्री रामचन्द्र जी द्वारा स्थापित बतलाते हैं।* 

 *रावण को सिविल इंजीनियरिंग का भी ज्ञान नहीं था, नल नील द्वारा पाँच दिन में राम सेतु तैयार कर दिया इसपर उसे घोर आश्चर्य हुआ। गुप्तचर बतलाते रहे, लेकिन वह उपहास करते हुए दारु पी कर रंगरेलियां करता रहा। ऐसे मुर्ख को राजनीति का पण्डित कहते हैं।* 

वाल्मीकि रामायण/ युद्ध काण्ड/ बानवेंवाँ सर्ग/ श्लोक 66-67 के अनुसार 
 *मेघनाद वध से दुःखी और क्रुद्ध रावण को दी गई राय के आधार पर अमान्त फाल्गुन पूर्णिमान्त चैत्र कृष्ण पक्ष अमावस्या को रावण द्वारा पूर्ण तैयारी से श्री रामचन्द्र जी के विरुद्ध युद्ध होना निश्चित हुआ।* 
और 
वाल्मीकि रामायण/ युद्ध काण्ड/ एकसौ आठवाँ सर्ग/ श्लोक 17-23 के अनुसार
 *अमान्त फाल्गुन पूर्णिमान्त चैत्र कृष्ण पक्ष अमावस्या को सन्ध्या समय हुए इस अन्तिम युद्ध में ही श्री रामचन्द्र जी द्वारा रावण की छाती पर मारा बाण रावण का हृदय वेधता हुआ आर-पार हो गया और पहले धरती में धँस गया। फिर तरकस मे लौट आया।* 
 *रावण की मृत्यु होते ही रावण की मृत शरीर रथ से धरती पर गिर पड़ा।*
*अमान्त फाल्गुन पूर्णिमान्त चैत्र कृष्ण पक्ष की अमावस्या को ब्रह्मास्त्र से हृदय विदीर्ण हो जाने से रावण तत्काल ही मर गया, लेकिन लोग कहते हैं कि, रावण आश्विन शुक्ल दशमी को मरा और उसके मरने से पहले श्रीरामचन्द्र जी ने लक्ष्मण को रावण से राजनीति सीखने भेजा।* 

ऐसे ही
वाल्मीकि रामायण/ युद्ध काण्ड/ एकसौ चौबीसवाँ सर्ग/ श्लोक १ देखें ---
*श्री रामचन्द्र जी वनवास पूर्ण कर चैत्र शुक्ल पञ्चमी को भरद्वाज आश्रम पहूँचे और चैत्र शुक्ल षष्ठी को अयोध्या पहुँचे। लेकिन* 
 *लोग कहते हैं कि, श्री अमान्त आश्विन पूर्णिमान्त कार्तिक कृष्ण अमावस्या को रामचन्द्र जी के अयोध्या लौटने की खुशी में दीपावली मनाई जाती है।*

*ऐसे ही सप्रमाण शास्त्र मत पहले ही भेज चुका हूँ। कि,* 

 *दीपावली लक्ष्मी पूजा 01 नवम्बर 2024 शुक्रवार को है लेकिन* 
*लोग 31 अक्टूबर 2024 गुरुवार को ही मनाएंगे।*

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