गुरुवार, 13 नवंबर 2025

सायन गणना, नक्षत्रिय पद्धति, निरयन और सावन गणना सभी दर्शाने वाली पञ्चाङ्ग/ केलेण्डर ही उचित हैं।

श्री रामचन्द्र जी के जन्म के समय के सम शितोष्ण ऋतु का वर्णन, ऋषि पञ्चमी पर अपामार्ग के पानी से स्नान करना, बालध ककड़ी खाना, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन यमुना नदी में बाढ़ आने का वर्णन, नवरात्र  और शरद पूर्णिमा शब्दों में ही ऋतु का उल्लेख होना, पञ्च दिवसीय दीपावली उत्सव में पूजन सामग्री में ज्वार के भुट्टे और गन्ने, सिंघाड़ा आदि का प्रयोग (नव धान्येष्टि), मकर संक्रान्ति पर तिल-गुड़ का प्रयोग, शिवरात्रि पर शिवजी को बदरीफल (बेर) अर्पित करना, होली पर गेंहू की बालियों का होला सेकना, (नव सस्येष्टि) तथा अमान्त चैत्र कृष्ण एकादशी वरूथिनी एकादशी को खरबुजा का फलाहार।
अमान्त वैशाख कृष्ण एकादशी अपरा एकादशी को खरबुजा ( या ककड़ी) का फलाहार।
अमान्त ज्येष्ठ कृष्ण एकादशी कमला एकादशी को दाख का फलाहार।
ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी निर्जला एकादशी को आम का फलाहार।
श्रावण शुक्ल एकादशी पवित्रा एकादशी को सिंघाड़ा का फलाहार।
 भाद्रपद शुक्ल एकादशी जलझूलनी एकादशी को बालन ककड़ी का फलाहार।
आश्विन शुक्ल एकादशी पापाङ्कुशा एकादशी को फुट काचरी का फलाहार।
अमान्त आश्विन शुक्ल एकादशी पापाङ्कुशा एकादशी को केला का फलाहार।
अमान्त कार्तिक शुक्ल एकादशी सफला एकादशी को तिल शकर का फलाहार।
माघ शुक्ल एकादशी जया एकादशी को गन्ने का रस का फलाहार।
फाल्गुन शुक्ल एकादशी आमलकी एकादशी को आँवला का फलाहार।
संवत्सर की प्रथम ऋतु वसन्त ऋतु होना, शरद ऋतु में ही शरद पूर्णिमा हो सकती है, सायन तुला संक्रान्ति का सम्बन्ध देवताओं की रात्रि प्रारम्भ होने से नवरात्र कहलाना,
ये सब बातें व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहारों का ऋतु आधारित होना प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है।
इसलिए मधु-माधव आदि सायन सौर मासों की संक्रान्तियों पर आधारित चान्द्र मासों में ही उक्त व्रत, पर्व उत्सव और त्यौहार मनाए जाना चाहिए।
सायन मतावलम्बियों के पक्ष में इतने सारे प्रमाण है।
लेकिन रामनवमी पर पुनर्वसु नक्षत्र पर चन्द्रमा होना, श्रीरामचन्द्र जी का राज्याभिषेक चैत्र शुक्ल पक्ष में पूष्य नक्षत्र पर चन्द्रमा होना, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को अमान्त श्रावण कृष्ण अष्टमी को चन्द्रमा रोहिणी नक्षत्र पर होना, भाद्रपद शुक्ल द्वादशी वामन जयन्ती को श्रवण नक्षत्र पर चन्द्रमा होना, बङ्गाल में नवरात्र में सरस्वती आह्वान, पूजन, बलिदान और विसर्जन में चन्द्रमा के नक्षत्र का ही महत्व होना, शिवरात्रि के दिन बहेलिए द्वारा सारी रात मृगशीर्ष नक्षत्र के तारे और लुब्धक (व्याघ) को देखना तथा पश्चिम और मध्य भारत को छोड़कर शेष उत्तर भारत, पूर्वी भारत, बाङ्ग्ला देश और दक्षिण भारत में निरयन सौर संक्रमण से प्रारम्भ होने वाले मेष-वृषभादि मास, वैशाखी, विषु, माघ बिहू आदि पर्व, तथा मेष-वृषभादि मासों में चन्द्रमा के नक्षत्र के अनुसार ही रामनवमी, श्रीकृष्ण जन्मोत्सव और वामन जयन्ती ओणम पर्व वैदिक काल में सायन सौर मधु-माधव आदि मासों में चन्द्रमा किसी विशेष नक्षत्र के साथ होने के आधार पर ही व्रत, पर्व, उत्सव और त्यौहार तथा शुभ कार्यारम्भ और पूर्णाहुति करने का स्मरण करवाते हैं।
ये सभी तथ्य नक्षत्रिय पद्धति के पक्ष में तर्क हैं।
वर्षान्त में  वर्षान्त के पाँच दिन पहले दशा पूजन सावन वर्ष को सायन सौर वर्ष से समायोजित करने का उपक्रम है। ठीक इसी प्रकार दीपावली से लाभ पञ्चमी तक गुजरात में अवकाश रहना भी पारसियों के समान सावन वर्ष को सायन सौर वर्ष से समायोजित करने की व्यवस्था है।
इस लिए आदर्श पञ्चाङ्ग वहीं जो सायन संक्रान्ति आधारित सौर और सौर चान्द्र मास, निरयन संक्रमण और निरयन संक्रमण आधारित सौर मास सौर चान्द्र मासों और सावन वर्ष-मासों तथा दशाह के वासर इन तीनों को दर्शाता हो।

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