गुरुवार, 20 नवंबर 2025

फलित ज्योतिष के अनुसार तलाक य पति-पत्नी में अनबन के कारण।


प्रायः जन साधारण मङ्गल के नाम से भयभीत हैं। और इसका लाभ पुरोहित वर्ग और उनके एजेंट ज्योतिष के नाम पर भय दोहन करने वाले उठाते हैं।
सन 1980 में नासिक के एक पण्डाजी ने कालसर्प दोष नामक नकली योग की खोज कर नागबलि करवा कर कालसर्प दोष की शान्ति का उपाय करवा कर भय दोहन करना शुरू किया।  आजकल काल सर्प दोष के नाम पर ठगी करते हैं।   
आर्किटेक्ट जिसे संस्कृत में वास्तुशास्त्र कहते हैं, उस वास्तुशास्त्र के अनजान लोगों को वास्तु के नाम पर भय दोहन करते हैं ।

दाम्पत्य जीवन में कष्ट के कारण --
कुण्डली में  कुण्डली का सातवाँ खाना जिसमें कोई भी अंक लिखा हो वह सप्तम भाव पति या पत्नी / जीवन-साथी, और विवाह का सूचक है।
सप्तम भाव का सप्तम भाव होने से  कुण्डली का पहला खाना जिसमें कोई भी अंक लिखा हो वह लग्न भाव भी विवाह सूचक है।
द्वितीय भाव दुसरे विवाह को दर्शाता है। तो दुसरे भाव से दुसरा भाव होने से तृतीय भाव भी द्वितीय विवाह का सूचक है। कभी-कभी एक पत्नी के रहते दूसरा विवाह भी तलाक का कारण बन जाता है। द्वितीय भाव सम्पत्ति का सूचक भी है। धन सम्पत्ति के लालच में कुछ लोग धन खोदने जैसी मुर्खतापूर्ण कार्य करने के चक्कर में तान्त्रिकों के चक्कर में फँसकर गृहस्थी बर्बाद कर लेते हैं।
पञ्चम भाव, जीवन-आनन्द (Please of life) और काम-सुख का सूचक है। व्यक्ति व्यभिचारी हो सकता है। और एकाधिक योन सम्बन्ध स्थापित कर दाम्पत्य जीवन नष्ट कर सकता है।
अष्टम भाव लिङ्ग (स्त्री या पुरुष की पहचान करवाने वाला अङ्ग) का सूचक है।
अति कामुकता शारीरिक अक्षमता का कारण बन कर तलाक का कारण बन सकता है।
नवम भाव बिना कर्म किए भाग्य से मिलने वाले सुख अर्थात भाग्य का सूचक है। भारत में पति को पत्नी का सौभाग्य (सुहाग) माना जाता है। जिसका पति जीवित है, वह स्त्री सौभाग्यवती (सुहागिन) कहलाती है। अतः स्त्री की कुण्डली में नवम भाव भी महत्वपूर्ण है।
लेकिन भाग्य भरोसे बैठने वाले पति परिवार का समुचित भरण-पोषण नहीं कर पाते हैं और व्यक्ति लालच में आकर टोने-टोटके और तान्त्रिकों के चक्कर में फँस कर घर गृहस्थी बर्बाद कर बैठते हैं। यह भी तलाक का कारण बन सकता है।
एकादश भाव आय और लाभ का सूचक है। विवाह द्वारा परिवार में एक सदस्य बढ़ता है,  लेकिन पति पर उत्तरदायित्व बढ़ जाता है, इसलिए वह अधिकतम आय अर्जित कर पत्नी और बच्चों तथा मात-पिता आदि की सुख-सुविधाओं के लिए अधिकतम धनार्जन करने के चक्कर में परिवार वालों को समय नहीं दे पाता, और परिवार में मतभेद, क्लेश-कलह उत्पन्न हो जाते हैं। और तलाक हो जाता है। निकाह और अन्य कई फिल्मों में यह तथ्य दिखाया गया है।
अर्थात एकादश भाव जो आवक का भाव है वह भी तलाक का कारण बन सकता है।
या कभी-कभी व्यक्ति लालच में आकर टोने-टोटके और तान्त्रिकों के चक्कर में फँस कर घर गृहस्थी बर्बाद कर बैठते हैं।

द्वादश भाव शय्या सुख (आराम, भोग, और व्यभिचार ) का सूचक है। अत्यधिक कामुकता भी पति-पत्नी में दूरियाँ उत्पन्न कर देती है। ता तो जीवनसाथी परेशान हो जाता है या असन्तुष्ट रहकर कर अवसाद ग्रस्त हो जाता है।
ऐसे में कुछ लोग टोने-टोटके और तान्त्रिकों के चक्कर में फँस कर घर गृहस्थी बर्बाद कर बैठते हैं।

इन (2, 7, 8, 9, 11 और 12) भावों में स्थित ग्रह, इन (2, 7, 8, 9, 11 और 12) भावों में लिखे राशि के अङ्क का स्वामी ग्रह, इन भावों में स्थित ग्रहों के नक्षत्र में स्थित ग्रह, और इन (2, 7, 8, 9, 11 और 12) भावों में लिखे राशि के अङ्क का स्वामी ग्रह के नक्षत्र में स्थित ग्रहों में से वक्री या अस्त ग्रह के नक्षत्र में स्थित ग्रह तथा जो ग्रह स्वयम् वक्री या अस्त हो उन ग्रहों को छोड़कर शेष ग्रह विवाह और पति - पत्नी और विवाह के सूचक ग्रह होते हैं।
इनकी दशा/ अन्तर्दशा/ प्रत्यन्तर दशा में जब ये विवाह सूचक ग्रह गोचर में इन्हीं विवाह सूचक भावों में और इन विवाह सूचक ग्रहों के राशि नक्षत्र में में भ्रमण करते हैं तब विवाह होता है। इन राशियों/नक्षत्रों और ग्रहों के स्वभाव, दिशा, स्थान आदि तथा राशियों/नक्षत्रों और ग्रहों के स्वभाव आदि के अनुसार ही पति/ पत्नी (जीवन-साथी) मिलता है।
इसी प्रकार इन भावों से षष्ठ (शत्रु या रोग के सूचक), अष्टम ( मृत्यु या दुर्घटना का सूचक) और द्वादश (दूरी, व्यय और हानि का सूचक) भाव में में स्थित ग्रह, इन भावों में लिखे राशि के अङ्क का स्वामी ग्रह, इन भावों में स्थित ग्रहों के नक्षत्र में स्थित ग्रह, और इन  भावों में लिखे राशि के अङ्क का स्वामी ग्रह के नक्षत्र में स्थित ग्रहों में से वक्री या अस्त ग्रह के नक्षत्र में स्थित ग्रह तथा जो ग्रह स्वयम् वक्री या अस्त हो उन ग्रहों की दशा/ अन्तर्दशा/ प्रत्यन्तर दशा में जब ये तलाक या मृत्यु के सूचक ग्रह गोचर में इन्हीं तलाक या मृत्यु  सूचक भावों में और इन तलाक या मृत्यु  सूचक ग्रहों के राशि नक्षत्र में में भ्रमण करते हैं तब तलाक या मृत्यु होता/ होती है।
सप्तम भाव का द्वादश भाव षष्ठ भाव है। जो झगड़ा करवाना, शत्रु पैदा करवाना आदि का सूचक है।
सप्तम भाव का सप्तम (मारक भाव) लग्न है जो  अहंकार को चोंट पहूँचने के कारण विवाह विच्छेद सूचित करता है।
सप्तम भाव का द्वितीय भाव अष्टम भाव (सम्पत्ति का भाव) है, जो दहेज की मांग के कारण सम्बन्ध विच्छेद दर्शाता है।
सप्तम भाव का अष्टम भाव (द्वितीय भाव) जीवन-साथी की मृत्यु की स्थितियाँ और कारण दर्शाता है।
ऐसे ही सप्तम भाव से द्वितीय (अष्टम भाव)और सप्तम भाव ( लग्न) की दशा, अन्तर्दशा, प्रत्यन्तर दशा जीवन-साथी की मृत्यु का समय दर्शाती है।
इसी प्रकार देख सकते हैं।

इसी प्रकार ग्रहों के स्वभाव भी तलाक का या अनबन का कारण दर्शाते हैं।
सूर्योदय के समय जन्में बच्चों में -- लग्न में सूर्य।
जैसे --
सूर्यदेव का तेज उनकी पत्नी सरण्यु (संज्ञा) सहन नहीं कर पाई। और सूर्यदेव को छोड़कर चली गई। (अश्विनी के रूप में बाद में मिली। तब अश्विनी कुमार हुए।)
हनुमान जी ने विवाह नहीं किया।
ऐसे ही तलाक की सम्भावना बनती है।

सूर्यास्त के समय जन्में बच्चों में भगवान नृसिंह के समान क्रोधी स्वभाव कष्टकारी होकर क्रोध के कारण एसीडिटी बढ़ती है। गेस के कारण क्षमता कम हो जाती है। तलाक करवा देता है। 

चन्द्रमा -- सत्ताइस पत्नियों में से केवल रोहिणी के साथ ही लगाव रहने के कारण श्वसुर दक्ष प्रजापति (द्वितीय) द्वारा शाप देने के कारण क्षय रोग ग्रस्त हो गये।
स्वयम् की सत्ताईस पत्नियाँ होते हुए देवगुरु ब्रहस्पति की पत्नी तारा का हरण कर लिया और बुध को जन्म दिया।
मतलब व्यभिचारी प्रवृत्ति के कारण अलगाव हो जाता है।
स्त्री का मायके वालों से ही लगाव और ससुराल वालों से द्वेष का स्वभाव।

बुध -- नपुंसक ग्रह है। इसलिए अक्षमता अलगाव का कारण बनता है।

गुरु ब्रहस्पति -- जहाँ बेठता है, वहाँ की हानि करता है।
स्वयम् की पत्नी (तारा) को नहीं सम्भाल पाये। तारा को चन्द्रमा हरण कर ले गया। और बुध को जन्म दिया।
ऐसे ही सप्तम भाव का गुरु गृहस्थ जीवन में विशेष रुचि नहीं होने के कारण दाम्पत्य सम्बन्ध खराब कर देता है।
पति का अपने परिवार वालों से ही लगाव और ससुराल वालों से द्वेष का स्वभाव।

शुक्र -- अत्यधिक काल्पनिक, फिल्म नवरङ्ग जैसे कवि, चित्रकार, मूर्तिकार, गायक, नर्तक, अभिनेता होने के कारण दाम्पत्य जीवन में सफल नहीं होते।
प्रायः अभिनेताओं - अभिनेत्रियों मे तलाक अधिक देखे जाते हैं।
कुटील स्वभाव, दुष्ट सङ्गति भी दाम्पत्य जीवन में बाधक होता है।
द्वादश भावस्थ शुक्र व्यभिचारी बनाता है।
स्त्री हो या पुरुष दोनों का अपने स्वजनों से ही लगाव और ससुराल वालों से द्वेष का स्वभाव।

शनि -- कठोर अनुशासन, न्याय के लिए दण्ड देने की प्रवृत्ति दाम्पत्य जीवन सफल नहीं होने देती।
हत्या- मार-पीट कुछ भी कर सकते हैं।
ससुराल वालों से द्वेष का स्वभाव।

राहु -- भ्रम, भ्रमित करने का स्वभाव, अत्यधिक छल-कपट, षड़यंत्र करना, नीच सङ्गति, जुआ-सट्टा में ही दिमाग व्यस्त रहना आदि कारणों से दाम्पत्य जीवन में पूर्ण असफलता पैदा करता है।
परिवार वालों के प्रति द्वेष का स्वभाव।


केतु -- त्याग प्रवृत्ति, पत्नी का विवाह पत्नी के पूर्व प्रेमी या विवाहेतर सम्बन्ध रखने वाली पत्नी का उसके प्रेमी से विवाह करवाने वाले, घर बेंच कर तीर्थ करने वाले। भक्त नृसिंह मेहता जैसे लोगों का दाम्पत्य जीवन में लगाव ही नहीं होता।
इसलिए तलाक हो जाता है।
द्वादश भावस्थ केतु -- केतु के नक्षत्र में स्थित ग्रह की दशा -अन्तर्दशा में व्यक्ति, नौकरी - धन्धा, या घर गृहस्थी कुछ भी छोड़ देता है। तलाक भी हो सकता है।
परिवार वालों के प्रति द्वेष का स्वभाव।

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