सोमवार, 17 नवंबर 2025

ॐ विष्णवे नमः ही क्यों लिखता हूँ?

🙏🏼 ॐ विष्णवे नमः।🙏🏼

श्रीरामचन्द्र जी के परम भक्त महाकवि, महा नीतिज्ञ तुलसीदास जी महाराज जी के जीवन की यह घटना मुझे सदैव प्रेरणा देती रही है।
जब सन्त तुलसीदास जी को छल पूर्वक ज्ञान गोदड़ी नामक स्थान पर श्रीकृष्ण मन्दिर ले गये।
तुलसीदास जी केवल श्री रामचन्द्र जी के रूप में ही सर्वत्र परमात्मा के दर्शन करना पसन्द करते थे।
लेकिन जैसे ही तुलसीदास जी की दृष्टि मन्दिर में स्थापित प्रतिमा पर पड़ी तो वे हतप्रभ रह गए।
और उन्होंने भगवान से निवेदन किया कि,
*कहा कहो छवि आपकी, भले बिराजे नाथ ।*
*तुलसी मस्तक तब नवै, धनुष बाण लो हाथ॥*

तत्काल ही भगवान ने भक्त की भावना को आदर देते हुए प्रतिमा का स्वरूप बदल दिया। और

 *कित मुरली कित चन्द्रिका कित गोपियन को साथ।*
*अपने जन के कारणे श्री कृष्ण भये रघुनाथ ॥*
मुझे यह भी भली-भांति स्मरण रहता है कि,
*तुलसी नर का क्या बड़ा? समय बड़ा बलवान।*
*भीलां लूटी गोपियाँ वही अर्जुन वही बाण ||*

इसलिए ईश्वरार्पण होकर भगवान से यही प्रार्थना करता हूँ कि, मेरी आस्था परमात्मा के ॐ सञ्कल्प के साथ प्रकट हुए परमात्मा के परब्रह्म स्वरूप जिसे मानवीय बुद्धि के अनुसार परम पुरुष, परमेश्वर, सर्वव्यापी भगवान विष्णु और उनकी माया शक्ति के रूप में जानते हैं।
बस उसी स्वरूप में मेरी मति स्थिर रहे।
🙏🏼

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