बुधवार, 12 नवंबर 2025

वेदों में लिङ्ग पूजक शिश्नेदेवाः से रक्षा हेतु महर्षि वशिष्ठ जी द्वारा इन्द्र से प्रार्थना।

*ऋग्वेद, मंडल 07, सूक्त 21, मंत्र 05 का अर्थ और व्याख्या*

प्रसङ्ग और सन्दर्भ ---
*ऋग्वेद सप्तम मण्डल/ सूक्त 21 मन्त्र 05 में कहा है कि,*
मन्त्र ---
*न यातव इन्द्र जुजुवुर्ना न वन्दना शविष्ठ वेद्यभि।न श्रीरर्द्धयो विष्णुनस्य जन्तोर्मा शिश्नदेवाः अपि गुऋतम् नः।।*

 *ऋषि वसिष्ठ इंद्र से शिश्नेदैवाः अर्थात लिङ्ग और भग (शिवलिङ्ग) की पूजा करने वाले यातुधान अर्थात (असुर, दैत्य दानव, आदि शत्रुओं से सुरक्षा की प्रार्थना कर रहे हैं।*

मन्त्र का अर्थ ---

*"हे बलवान इंद्र!* 
(दुष्ट, कृतघ्न, अधार्मिक, विलासी) *शिश्नेदैवाः अर्थात लिङ्ग और भग (शिवलिङ्ग) की पूजा करने वाले यातुधानों * अर्थात (असुर, दैत्य दानव, आदि) शत्रुओं से हमारी रक्षा कीजिए।*
*लिङ्गपूजक असूर लोग हमें परेशान न कर सकें; उन पर हमारी दृष्टि पड़ने, उनकी छाया पड़ने, उनके स्पर्श दोष से, हमारी समृद्धि को आधी न हो पाए। हे सर्वव्यापी विष्णु देव! उनसे हमारी रक्षा कीजिए।*

शब्दार्थ:
1. *यातवः* – यातुधान अर्थात (दुष्ट,पीड़क,शत्रु) *असुर दैत्य, दानव, राक्षस।* 
2 *शविष्ठ* – *अत्यंत बलवान* , (इन्द्र का विशेषण)।
 3 *वेद्यभिः* – *ज्ञानी, विद्वान*,(इन्द्र का विशेषण)।
4 *इन्द्र* – *देवताओं के राजा* (शक्ति के प्रतीक) ।
5. *न जुजुवुः* – *तंग न करें, पीड़ित न करें* ।
6. *न वन्दना* – *नमन न करने वाले, कृतघ्न* ।

7. *श्रीः* – *समृद्धि, सौभाग्य* ।
8. *अर्द्धयः* – *आधा* , अधूरा।
9. *विष्णुनस्य* – व्यापक, *सर्वव्यापी विष्णु* ।
10. *जन्तोः* – *प्राणियों के।* 
11. *शिश्नदेवाः* – (विलासी, कामुक, अधर्मी) *शिश्न और भग रूप में शिवलिङ्ग पूजक* ।
12. *अपि गुऋतम् नः* – *हमसे दूर करे, बचाएं या हमें दूर रखें* ।

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