प्रजापति के पुत्र दक्ष-प्रसुति, रुचि-आकुति, कर्दम-देवहुति तथा स्वायम्भुव मनु-शतरूपा भूमि के प्रजापति हुए।
धर्म तथा उनकी तेरह पत्नियाँ, अग्नि और स्वाहा तथा पितर और स्वधा भी प्रारम्भ में भूमि पर ही रहे। और प्रजा उत्पन्न की।
इनके अलावा मरीची-सम्भूति, भृगु-ख्याति, अङ्गिरा-स्मृति, वशिष्ट-ऊर्ज्जा, अत्रि-अनसुया, पुलह-क्षमा, पुलस्य-प्रीति, कृतु-सन्तति की सन्तान ब्रह्मर्षि हुए जो मूलतः धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में रहते थे और वहाँ से अन्य स्थानों पर गये।
स्वाम्भुव मनु-शतरूपा की सन्तान - प्रियव्रत के पुत्र आग्नीध्र हुए। आग्नीध्रके पुत्र अजनाभ या नाभि हुए जिन्हें भारतीय उप महाद्वीप का शासनाधिकार मिला। अजनाभ के पुत्र ऋषभदेव हुए, ऋषभदेव के पुत्र भरत चक्रवर्ती हुए जिनके द्वारा इस क्षेत्र को भारतवर्ष नाम दिया। इन्ही भरत चक्रवर्ती की सन्तान परम्परा मुनुर्भरत कहलाई। ये सब क्षत्रिय कहलाते थे। मनुर्भरतों में दिवोदास के पुरोहित पहले भृगु थे। फिर वशिष्ठ जी हुए जो दिवोदास के पुत्र सुदास के समय भी रहे।
मनुर्भरतों का क्षेत्र भी हिमाचल प्रदेश, उत्तराखण्ड, पञ्जाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, उत्तरी राजस्थान तथा उत्तरी मध्य प्रदेश (चम्बल,ग्वालियर सम्भाग) वाले क्षेत्र था। यह क्षेत्र आर्यावर्त कहलाता था।
पञ्जाब, और हरियाणा धर्म क्षेत्र कहलाता था।
हरियाणा के कुरुक्षेत्र अर्थात धर्म का राज्य क्षेत्र था। कुरुक्षेत्र के आस-पास का क्षेत्र धर्मक्षेत्र के अलावा ऋषि देश, गोड़ प्रदेश और मालवा क्षेत्र कहलाता है। गोड़ प्रदेश के निवासी आद्यगोड़, श्रीगोड़, गुजरगोड़ आदि पञगोड़ ब्राह्मण हुए।
विक्रमादित्य के दादाजी नबोवाहन भी इसी क्षेत्र के निवासी मालव गणों के प्रमुख थे। उनके पुत्र महेन्द्रादित्य गन्धर्वसेन ने सोनकच्छ को राजधानी बनाया। महेन्द्रादित्य गन्धर्वसेन के पुत्र भृतहरि - और विक्रमसेन हुए। इन्होंने उज्जैन को राजधानी बनाया। तब से यह पठार मालवा कहलाया।
मनुर्भरतों में तृत्सु वंश में उत्पन्न दिवोदास और उनके पुत्र सुदास के समय शत वर्षीय दशराज युद्ध हुआ।
मरीचि नन्दन कश्यप के पुत्र आदित्य हुए जो तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान, किर्गिस्तान, पाकिस्तान, जम्मू कश्मीर, लद्दाख, नेपाल, भूटान, तिब्बत में बसे, यह क्षेत्र स्वर्ग कहलाता था। ब्रह्मावर्त भी यही क्षेत्र कहलाता था।
इन्ही आदित्यों में से सप्तम आदित्य विवस्वान के पुत्र श्राद्ध देव के समय जल प्रलय हुआ जिसका वर्णन शतपथ ब्राह्मण में भी है और तनख (बाइबल ओल्ड टेस्टामेण्ट) में भी है।
इन श्राद्ध देव को महामत्स्य की कृपा से सभी मूल जीवों और ऋषियों सहित कश्मीर क्षेत्र में हिमालय के किसी शिखर पर सुरक्षित पहूँचाया।
इन्ही श्राद्ध देव को विवस्वान का पुत्र होने के कारण नामकरण वैवस्वत मनु हुआ । और इनके काल को वैवस्वत मन्वन्तर कहते हैं।इन वैवस्वत मनु की सन्तान सूर्य वंशी कहलाए; कश्यप ऋषि की सन्तान होने के कारण महर्षि कश्यप ने इन्हें कश्मीर में बसाया था। ये ऋषि सन्तान होने के कारण मनुर्भरतों के समान भारतीय मूल के ही थे। सूर्यवंश में इक्ष्वाकु वंश प्रमुख रहा। इक्ष्वाकु वंश में भी रघुवंश प्रमुख रहा। ये भी क्षत्रिय कहलाए। इस वंश की राजधानी अयोध्या थी।
भरत चक्रवर्ती की सन्तान मुनुर्भरतों में तृत्सु वंश में उत्पन्न दिवोदास और उनके पुत्र सुदास के समय टर्की से आये चन्द्रवंशी अनु, दुह, यदु, पुरु और तुर्वसु के वंशजों से सौ वर्ष तक दशराज युद्ध हुआ। इसमें वैवस्वत मनु की सन्तान आदित्यों ने दिवोदास और सुदास का साथ दिया। जबकि, सीरिया के नागों ने चन्द्रवंशियों का साथ दिया।
शत वर्षीय दशराज युद्ध में समझौता हुआ। इसके अन्तर्गत कश्मीर में बसे सूर्यवंशियों को अयोध्या सोपा गया। चन्द्र वंशियों को और नागों को कश्मीर में बसने की अनुमति दी गई।
हिमाचल प्रदेश, पञ्जाब, हरियाणा, पश्चिम उत्तर प्रदेश, उत्तरी राजस्थान तथा उत्तरी मध्य प्रदेश (चम्बल,ग्वालियर सम्भाग) वाले क्षेत्र में दक्ष-प्रसुति, रुचि-आकुति और कर्दम-देवहुति का क्षेत्र था। यहाँ पञ्चायती राज व्यवस्था थी।
पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, मध्य भारत और गुजरात स्वायम्भुव मनु-शतरूपा का शासन क्षेत्र था। जिसमें गणतन्त्र था।
दक्षिण भारत में धर्म के पुत्र दृविण और उनकी सन्तानों का शासन था।
मनुर्भरतों वंश का स्वतन्त्र अस्तित्व समाप्त हो गया। अयोध्या वैवस्वत मन्वन्तर में सूर्यवंशियों की राजधानी बनी।
बाद में चन्द्रवंशी बिहार के गया क्षेत्र और झारखण्ड तरफ फैल गये। जब नाग कश्मीर में प्रबल हो गये तो तो वे भी भारत के अन्य क्षेत्रों में यथा नगालैण्ड, मध्यभारत, नागपुर, राजस्थान तक फैल गये।
चन्द्रवंशियों ने प्रयागराज को राजधानी बनाया।
द्वापर युग में तो पहले हस्ति ने हस्तिनापुर बसाया फिर अजमीढ़ ने पुष्कर के पास अजमेरु (अजमेर) बसाया। पाण्डवों ने इन्द्रप्रस्थ बसाया। जिसे पृथ्वीराज चौहान ने दहली नाम दिया।
मनुर्भरतों का तो नाम ही नहीं रहा। किसी समय मनुर्भरतों को क्षत्रिय कहते थे। फिर सूर्य वंशी भी क्षत्रिय कहलाए। चन्द्रवंशियों का वर्चस्व बढ़ा तो भी क्षत्रिय कहलाने लगे। फिर नागों को भी क्षत्रिय मान लिया गया। जो अब कालबेलिया कहलाते हैं।
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