मंगलवार, 11 नवंबर 2025

वर्तमान प्रचलित मुहूर्त शास्त्र में मेरी श्रद्धा क्यों नहीं है?

वर्तमान प्रचलित मुहूर्त शास्त्र में मेरी श्रद्धा क्यों नहीं है? 

क्योंकि मेरी श्रद्धा, आस्था और विश्वास केवल वेदों में है।
वैदिक मत, वैदिक वर्णाश्रम धर्म, वैदिक दर्शन, वैदिक कर्म या वैदिक क्रियाओं अर्थात वैदिक कर्मकाण्ड और वैदिक संस्कृति को ही सनातन धर्म मानता हूँ।
जो भी उसके विपरीत और वेद विरुद्ध तन्त्र है उसमें मुझे तनिक मात्र भी श्रद्धा, आस्था और विश्वास नहीं है।

लेकिन गणित, होरा शास्त्र अर्थात फलित ज्योतिष, मुहूर्त, वास्तु शास्त्र, सामुद्रिक शास्त्र, शकुन शास्त्र और धर्म शास्त्र का अध्यन करने और परम्परागत शिक्षा प्राप्त करने के कारण लोग मुझे ज्योतिषी समझते हैं और तत्सम्बन्धी प्रश्न पूछते हैं, राय लेते हैं, मुहूर्त पुछते हैं तो, गुरुदेव का ऋण समझकर मुझे परम्परागत जानकारी के आधार पर उत्तर देना पड़ता है। और बतलाता भी हूँ, लेकिन साथ में वैदिक मत भी बतला देता हूँ।

वर्तमान प्रचलित मुहूर्त शास्त्र में मेरी श्रद्धा क्यों नहीं है? का उत्तर ---

उत्तरायण दक्षिणायन में तीन महीने का तीन महीने आगे खिसका दिया और तीन महीने पहले ही उत्तरायण ले आये। ऋतुओं को एक महीने पहले से मान लिया। इस प्रकार मध्य भारत के मौसम से अनुकूल कर दिया।
फिर भी सन्तोष नहीं हुआ तो शुक्ल पक्ष से प्रारम्भ होने वाले चान्द्र मासों को पन्द्रह दिन पहले कृष्ण पक्ष से प्रारम्भ होना शुरू कर दिया।
वेदों में केवल दोनों प्रतिपदा, चन्द्र दर्शन (द्वितीया समझ सकते हैं), अर्ध चन्द्र (अष्टमी समझ सकते हैं), पूर्ण चन्द्र (पूर्णिमा समझ सकते हैं) और बिना चन्द्रमा वाली रात्रि (अमावस्या समझ सकते हैं) के अलावा किसी तिथि का उल्लेख नहीं है।
वैदिक काल में नक्षत्र असमान विस्तार वाले, चित्रा के समान एक तारा का एक अंश से भी कम विस्तार वाले नक्षत्र, मृगशीर्ष जैसे तीन तारे वाले नक्षत्र, कृतिका जैसे सात तारों वाले नक्षत्र, तो शतभिषा जैसे सौ या वर्तमान में बचे अठासी तारों वाले नक्षत्र तो चित्रा के समान एक तारा का एक अंश से भी कम विस्तार वाले नक्षत्र और
स्वाति जैसे चौबीस अंशों वाले नक्षत्र होते थे। जबकि वर्तमान में सभी नक्षत्रों का एक समान भोग 13°20' मान लिया गया है।
ऐसे ही पश्चिम टर्की, मिश्र, और बेबिलोनिया में पशुओं की आकृति वाली असमान विस्तार वाली राशियाँ मानी जाती थी। वर्तमान एस्ट्रोनॉमी में भी यही मानते हैं। जबकि, गर्गाचार्य और आचार्य वराहमिहिर के समय जब राशियाँ और वार की नई अवधारणा अपनाई गई तो, तीस-तीस अंशों की समान विस्तार वाली राशियाँ बना दी गई। जबकि वेदों में क्रान्तिवृत के बारह समान तीस-तीस अंशों की समान विस्तार वाले सायन प्रधय मधु-माधव आदि मासों की गणना के लिए मानी जाती थी। लेकिन न उनका कोई स्वतन्त्र नाम नहीं दिया और न कोई आकृति बतलाई। क्योंकि सायन प्रधय (राशि) का कोई निश्चित क्षेत्र ही नहीं रहता, छात्राओं से सायन प्रधय का कोई सम्बन्ध ही नहीं रहता है, तो आकृति तो हो ही नहीं सकती।
वेदों में सिद्धान्त (गणित) ज्योतिष के वैधृति पात और व्यतिपात अर्थात सूर्य और चन्द्रमा के अंशों का योग 180° होने और 360° होने को छोड़कर किसी अन्य योग का उल्लेख नहीं है। जबकि वर्तमान में सत्ताईस योग प्रचलित हैं। न भद्रा (विष्टि करण) का उल्लेख है। जबकि वर्तमान में भद्रा को अशुभ मानते हैं।
कुछ महत्वपूर्ण तथ्य स प्रमाण नीचे दिए जा रहे हैं। जिससे प्रमाणित होता है कि वर्तमान में प्रचलित अयन, ऋतु, मास सब गलत हैं।⤵️
‌*संवत्सर व्यवस्था -* 
उत्तरायण की तीन ऋतु - वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा। - 
*देवा ऋतवः वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतु उत्तरायण में होती है।* 
शतपथ ब्राह्मण 2/1/3 तथा तै.सं. 6/5/3 तथा नारायण उपनिषद अनु. 80
*उदगयन शब्द और देवयान / देवलोक शब्द स्पष्ट आये हैं।* 
मैत्रायण्युपनिषद में उत्तरायण और नारायण उपनिषद अनु 80
(भा. ज्यो.पृष्ठ 44 एवम् 45)

*वसन्त को प्रथम ऋतु और संवत्सर का शिर, ग्रीष्म को दक्षिण पक्ष (पंख) और शरद को उत्तर पक्ष कहा है।* 
तै.ब्रा. 1/1/2/6 एवम् 7 एवम् 3/10/4/1
*हेमन्त को संवत्सर का मध्य और वर्षा को पुच्छ कहा है।*
तै.ब्रा. 3/10/4/1
(भा. ज्यो. पृष्ठ 47)
उक्त आधार पर प्रमाणित होता है कि, वसन्त सम्पात से शरद सम्पात तक वैदिक उत्तरायण होता था। और शरद सम्पात से वसन्त सम्पात तक वैदिक दक्षिणायन होता था। वैदिक काल के उत्तरायण में वसन्त, ग्रीष्म और वर्षा ऋतु होती थी। और दक्षिणायन में शरद, हेमन्त और शिशिर ऋतु होती थी।
तदनुसार संवत्सर का प्रारम्भ वसन्त सम्पात, उत्तरायण, वसन्त ऋतु और मधुमास से होता था।

*तीन मौसम / ऋतु के नाम आये हैं।* 
अग्निर्ऋतुः सूर्य ऋतुश्चन्द्रमा ऋतु।
तैत्तिरीय ब्राह्मण 1/10/1
(भा.ज्यो पृष्ठ 49)
इससे प्रमाणित होता है कि, वर्तमान के ही समान वैदिक युग में भी तीन मौसम मुख्य रहते थे १ गर्मी, वर्षा और ठण्ड।
वसन्त सम्पात अर्थात सायन मेष संक्रान्ति। जो प्रायः 20/21 मार्च को होती है। और शरद सम्पात अर्थात सायन तुला संक्रान्ति जो प्रायः 22/23 सितम्बर को होती है।
अतः वैदिक उत्तरायण 21 मार्च से 22 सितम्बर तक होता है। इसे उत्तरगोल भी कहते हैं।
और वैदिक दक्षिणायन 23 सितम्बर से 19/20 मार्च तक होता है। इसे दक्षिण गोल भी कहते हैं।

उत्तर परम क्रान्ति अर्थात सायन कर्क संक्रान्ति प्रायः 22/ 23 जून को होती है। और दक्षिण परम क्रान्ति सायन मकर संक्रान्ति प्रायः 22 दिसम्बर को होती है।
उत्तर परम क्रान्ति अर्थात सायन कर्क संक्रान्ति 23 जून से दक्षिण परम क्रान्ति सायन मकर संक्रान्ति 21 दिसम्बर तक वैदिक उत्तर तोयन कहते हैं। पौराणिक काल में इसे दक्षिणायन कहा जाने लगा।
दक्षिण परम क्रान्ति सायन मकर संक्रान्ति 22 दिसम्बर से उत्तर परम क्रान्ति अर्थात सायन कर्क संक्रान्ति 22 जून तक वैदिक दक्षिण तोयन होता है। पौराणिक काल में इसे उत्तरायण कहा जाने लगा।
इसलिए

*फाल्गुन पूर्णिमा/ पूर्वाफाल्गुनी के दिन को संवत्सर का अन्तिम दिन कहा है। और उसके अगले दिन उत्तराफाल्गुनी को संवतरारम्भ कहा है।*
वैदिक असमान विस्तार वाले नक्षत्र - पूर्वाफाल्गुनी और उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र की सन्धि पर पूर्णिमा का चन्द्रमा होगा तो इससे १८०° पर स्थित नक्षत्र पर सूर्य होगा।
तैत्तिरीय संहिता 7/4/8 में तथा पृष्ठ 51 पर सामवेद के ताण्यब्राह्मण 5/9
 तैत्तिरीय ब्राह्मण 7/4/8
(भा.ज्यो.पृष्ठ 50)

*अधिक मास वर्षान्त में जुड़ता था।*
 वाजसनैय संहिता 22/30 एवम् 31 
ऐतरेय ब्राह्मण 3/1 और 17 और तैत्तिरीय ब्राह्मण 3/8/3
(भा. ज्यो. पृष्ठ 40 एवम् 41)
अर्थात वर्तमान में निरयन सौर वर्ष या सायन सौर वर्ष से चान्द्र वर्ष को बराबर करने के लिए निर्धारित १९ वर्ष, १२२ वर्ष और १४१ वर्ष वाला चक्र प्रचलित नहीं था।
महाभारत काल में हर अट्ठावन माह बाद उनसठवाँ और साठवाँ माह अधिक मास करते थे। ऐसे ही वैदिक काल में वर्षान्त पश्चात तेरहवाँ माह अधिक मास करते थे। सम्भवतः कितने वर्ष पश्चात करते थे यह स्पष्ट नहीं है।

इससे सिद्ध होता है कि, सामान्यतः अमान्त मास भी प्रचलित थे लेकिन संवत्सर आरम्भ के लिए सायन मेष संक्रान्ति ही मुख्य थी। उस दिन पड़ने वाले चन्द्रमा जिस नक्षत्र के साथ होता था उस नक्षत्र से भी इंगित करते थे। 

*शुक्ल पक्ष और कृष्णपक्ष को अर्धमास कहा है।* 
*अर्धमासों के नाम पवित्रादि हैं।* 
अथ यदाह । पवित्रन् पवयिष्यन्त्सहस्वान्त्सहीयानरुणोरणरजा इति। एष एव तत्। ए ह्येव तेर्धमासाः एषः मासाः ।
तैत्तिरीय ब्राह्मण 1/6/3 ।
(भा. ज्यो.पृष्ठ 48)
इससे प्रमाणित होता है कि, छब्बीस पक्षों के भी नामकरण किया गया था।

तिथियाँ प्रचलित नहीं थी। केवल उदृष्टका (शुक्ल प्रतिपदा), एकाष्टका (शुक्लाष्टमी), पूर्णिमा, व्यष्टका (कृष्ण प्रतिपदा) और अष्टका (कृष्णाष्टमी) और अमावस्या तिथि का ही उल्लेख है।

 *कृष्णपक्ष की प्रतिपदा को व्यष्टका और शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को उदृष्ट कहा है।* 
तैत्तिरीय ब्राह्मण 1/8/2 तथा ताण्ड्य ब्राह्मण 10/3/11 ।
 *कृष्णपक्ष की अष्टमी को अष्टका और शुक्ल पक्ष की अष्टमी को एकाष्टका कहा है।* 
तैत्तिरीय ब्राह्मण 1/5/12 तथा ताण्ड्य ब्राह्मण 10/3/11 ।
(भा.ज्यो.पृष्ठ 59)
इससे प्रमाणित होता है कि, तिथियाँ प्रचलित नही थी। लेकिन चन्द्रमा के चारो फेस का निर्धारण गणना करते थे। यानी अमावस्या, उदृष्यका या शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा, एकाष्टका (शुक्ल पक्ष की अष्टमी), पूर्णिमा, व्यष्टका (कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा), अष्टका (कृष्ण पक्ष की अष्टमी), और अमावस्या की गणना की जाती थी।


वैदिक काल में व्यवहार में ३६० दिन का सावन सौर वर्ष भी चलता था, इसमें प्रत्येक महिना ३० दिन का ही होता है ‌ तथा साथ में दशाह के वासर प्रचलित थे।

(१) *संवत्सर*--- संवत्सर नामक सामान्य वर्ष के *बारह महीने में ३६० दिन का संवत्सर* होता था। तथा

(२) *परिवत्सर* --- (३८३५ वें वर्ष को छोड़कर) प्रत्येक *पाँचवाँ वर्ष तेरह मास का* अर्थात *३९० दिन का परिवत्सर* होता था। 

(३) *इदावत्सर* --- ( *३८४० वें वर्ष को छोड़* ) *प्रत्येक ४०वाँ वर्ष ३६० दिन* का अर्थात *बारह मास का* ही होता था।

(४) --- *अनुवत्सर* --- *३८३५ वाँ वर्ष ३६० दिन (बारह मास) का अनुवत्सर* होता था। एवम्

(५) *इद्वत्सर* --- *३८४० वाँ वर्ष ३९० दिन (तेरह मास) का इद्वत्सर* होता था।

इस गणना में पारिश्रमिक वितरण में दशाह चलता था। सप्ताह शब्द भी मिलता है लेकिन उपयोग का उल्लेख नहीं है। वासर सूर्योदय से दुसरे सूर्योदय तक को कहते हैं, लेकिन ग्रहों के नाम वाले वार का उल्लेख नहीं है।

क्रान्तिवृत के उत्तर-दक्षिण में आसपास आठ-आठ अंश चोड़ी पट्टी में असमान आकृति वाले तारा मण्डलों को असमान भोगांश वाले नक्षत्र कहते थे। समान भोग वाले नक्षत्र नहीं थे। 
अथर्ववेद में अट्ठाईस नक्षत्र बतलाये गए हैं। जबकि कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तिरीय संहिता ४/४/४० में शुक्ल यजुर्वेद के शतपथ ब्राह्मण/ दशम काण्ड/पञ्चमोऽध्याय/ चतुर्थ ब्राह्मण में और सामवेद के जैमिनी ब्राह्मण में सत्ताईस नक्षत्र ही बतलाए गए हैं लेकिन सभी में एक बात निश्चित है कि, नक्षत्र भोग असमान था। 

 चित्रा नक्षत्र का भोग केवल ००°२३'३१" ही था, स्वाती नक्षत्र का भोग २०°५०'५७" था, जबकि धनिष्ठा नक्षत्र का भोग २५°१४'०८" था; ऐसे ही सभी नक्षत्रों के भोगांश अलग अलग थे।*

 शतपथब्राह्मणम् में सत्ताइस नक्षत्रों का उल्लेख दिया हुआ है।

नक्षत्राणि ह त्वेवैषोऽग्निश्चितः तानि वा एतानि सप्तविंशतिर्नक्षत्राणि सप्तविंशतिः सप्तविंशतिर्होपनक्षत्राण्येकैकं नक्षत्रमनूपतिष्ठन्ते तानि सप्त च शतानि विंशतिश्चाधि षट्त्रिंशत्ततो यानि सप्त च शतानि विंशतिश्चेष्टका एव ताः षष्टिश्चत्रीणि च शतानि परिश्रितः षष्टिश्च त्रीणि च शतानि यजुष्मत्योऽथ यान्यधिषट्त्रिंशत्स त्रयोदशो मासः स आत्मा त्रिंशदात्मा प्रतिष्ठा प्राणा द्वे शिर एव षट्त्रिंश्यौ तद्यत्ते द्वे भवतो द्व्यक्षरं हि शिरोऽथ यदन्तरा नक्षत्रे तत्सूददोहा अथ यन्नक्षत्रेष्वन्नं तत्पुरीषं ता आहुतयस्ताः समिधोऽथ यन्नक्षत्राणीत्याख्यायते तल्लोकम्पृणा तद्वा एतत्सर्वं नक्षत्राणीत्येवाख्यायते तत्सर्वोऽग्निर्लोकम्पृणामभिसम्पद्यते स यो हैतदेवं वेद लोकम्पृणामेनं भूतमेतत्सर्वमभिसम्पद्यते

शतपथब्राह्मणम्/काण्डम् १०/अध्यायः ५/ब्राह्मण ४

सामवेद के जैमिनी ब्राह्मण में सत्ताइस नक्षत्र कहे गए हैं।

यास्सप्तपदाश्शक्वर्यो ये सप्त ग्राम्याः पशवो यानि सप्त चतुरुत्तराणि छन्दांसि ये सप्त मुख्याः प्राणा यानि सप्तविंशतिर्दिव्यानि नक्षत्राणि यस्सप्तविंश स्तोमो यत्किं च सप्त सप्त तस्यैषा सर्वस्यर्द्धिस्तस्योपाप्तिः ।)
परवर्ती ज्योतिष ग्रन्थों में इसका समाधान इस प्रकार किया कि,
जब अट्ठाइस नक्षत्रों के बजाय सत्ताइस नक्षत्र लेने का निर्णय लिया, तो उत्तराषाढ़ा की अन्तिम चार घटी और श्रवण नक्षत्र के प्रारम्भ की २५ घटी को मिला कर कुल २९ घटी को अभिजित् नक्षत्र मान लिया।
महर्षि गर्गाचार्य नें गर्ग संहिता और भास्कराचार्य ने सिद्धान्त शिरोमणि में असमान भोगांश वाले नक्षत्रों को मान्यता दी। लेकिन वराहमिहिर ने वृहत् संहिता में १३°२०' के समान भोगांश वाले सत्ताइस को मान्यता दी। साथ ही मिश्र,युनान और बेबीलोन (इराक) में प्रचलित ३०° वाली बारह राशियों को भी मान्यता दी। तथा राशियों और नक्षत्रों में समायोजन स्थापित किया।
योग एवम् करण (तिथ्यार्ध) का उल्लेख नहीं है।
सूर्य से चन्द्रमा के बारह-बारह अंश के अन्तर पर तिथियाँ बदलती है। जैसे 348° से 360° तक अमावस्या रहती है। 00° से 12° अन्तर तक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा, 12° से 24° तक द्वितीया, 24° से 36° तक तृतीया ....…. 168° से 180° तक पूर्णिमा। फिर 180° से 192° तक कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा, 192° से 204° तक कृष्ण पक्ष की द्वितीया 204° से 216° तक कृष्ण पक्ष की तृतीया और पुनः 348° से 360° तक अमावस्या रहती है।
ऐसे ही सूर्य से चन्द्रमा के छः-छः अंश के अन्तर को करण कहते हैं।

इसके अलावा मुहूर्त शास्त्र में अक्षांशो के आधार पर ऋतुओं में अन्तर पड़ता है। 
क्या उत्तर गोल यानी वैदिक उत्तरायण में किये जाने वाले कार्य दक्षिणी गोलार्ध में भी उत्तर गोल यानी वैदिक उत्तरायण में ही किये जाने चाहिए। या वहाँ उनमें से कुछ कार्य जिनका सम्बन्ध वास्तु से है वे कार्य दक्षिण गोल अर्थात वैदिक दक्षिणायन में करना चाहिए? ऐसा कोई स्पष्टीकरण नहीं है।

केवल कर्क रेखा और मकर रेखा के आस-पास ही षड ऋतुएँ होती है। इसी कारण ऋग्वेद में पाँच ऋतुओं का ही उल्लेख किया है। हेमन्त ऋतु का उल्लेख नहीं है।
भूमध्य रेखीय क्षेत्रों में ग्रीष्म ऋतु और वर्षा ऋतु के अलावा कोई ऋतु होती ही नहीं।
उत्तर अक्षांश 66° 40 के उत्तर में जब ग्रीष्म ऋतु होती ही नहीं तब कोई व्यक्ति ग्रीष्म वाले कार्य कैसे करेगा? ऐसे ही 
 दक्षिण अक्षांश 66° 40 के उत्तर में जब ग्रीष्म ऋतु होती ही नहीं तब कोई व्यक्ति ग्रीष्म वाले कार्य कैसे करेगा?

अधिक उत्तर दक्षिण अक्षांशो पर दिनमान 24 घण्टे से भी अधिक होते हैं वहाँ कोई व्रत, व्रत का पारण कैसे किया जाए इस सम्बन्ध में उचित अनुचित की व्यवस्था देने वाले धर्मशास्त्र में भी उल्लेख नहीं है, तो, धर्म शास्त्र के अङ्ग रूप मुहूर्त शास्त्र में सूर्योदय, प्रातः, सङ्गव, पूर्वाह्न, मध्याह्न, अभिजित मुहूर्त, विजय मुहूर्त, अपराह्न, सूर्यास्त, गोधुलि, सायं सन्ध्या, प्रदोषकाल, पूर्व रात्रि, महानिशा, मध्य रात्रि, ब्राह्म मुहूर्त, ब्रह्म मुहूर्त, उषा काल, अरुणोदय, का निर्णय उक्त कालों में कैसे किया जाएगा इसका कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है

जब उत्तर अक्षांश 66° 40 के उत्तर में जब मकर लग्न दिखता ही नहीं तब कोई व्यक्ति मकर लग्न वाले कार्य कैसे करेगा?ऐसे ही 
 दक्षिण अक्षांश 66° 40 के उत्तर में जब कर्क लग्न दिखता ही नहीं तब कोई व्यक्ति कर्क लग्न वाले कार्य कैसे करेगा?
कोई स्पष्टीकरण नहीं है।

इतनी सब विसङ्गतियों का प्रभाव यह पढ़ा कि, मुहूर्त निकलाने वाले भी मुहुर्त में कोई कार्य नहीं कर पाते। या
मन वाञ्छित दिन में मन वाञ्छित समय में ही मुहूर्त चाहते हैं।
वैदिक अग्निहोत्र रात्रि में नहीं होते फिर विवाह में रात्रि में अग्निहोत्र कर फैरे का चक्कर मेरी समझ से अत्यन्त परे है।
मेरे मातृ कुल में ही मेरे भतिजे का विवाह वेदतुल्य गणित वाली पञ्चाङ्ग से उनके जन्म राशि/नक्षत्र/ चरण के आधार पर नहीं निकल रहे थे तो, लड़की के जन्म नाम के स्थान पर बोलते नाम पर मुहूर्त निकलवा लिया गया।
जबकि मेरे अनुज ने मेरे भतिजे का नाम बदलकर चन्द्रमा के राशि नक्षत्र पर अवकहड़ा चक्र के अनुसार कर दिया था। उसी के विवाह के लिए लड़की के जन्म नाम से मुहूर्त जून में निकल रहे थे तो उन्होंने होने वाली पुत्र वधू के आधार कार्ड वाले नाम से मुहूर्त निकलवा लिया।
विवाह लग्न के समय मेरे भतीजे को नवम सूर्य पूज्य है और भतिजा बहू के जन्म कुण्डली की चन्द्र राशि से गुरु ब्रहस्पति तृतीय अर्थात पूज्य है। जबकि मेरा अनुज पूज्य गुरु ब्रहस्पति में सगाई करने को भी तैयार नहीं था।
यह तो सभी ने देखा है कि, जि समय लग्न मुहूर्त में पाणिग्रहण संस्कार (हथलेवा) का समय होता है उसी समय वर का प्रोसेशन निकल रहा होता है और बाराती फुहड़ डान्स कर रहे होते हैं। (नृत्य नहीं कहा जा सकता इसलिए लिख रहा डान्स कर रहे होते हैं ऐसा लिख रहा हूँ)  

पाँच सौ वर्षों के संघर्ष के बाद शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी के अनुचरों, ग्रामीणों की प्रशिक्षित सेना के द्वारा ढाँचा गिराने पर माननीय न्यायालय के समक्ष शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी के वकीलों द्वारा अंग्रेजी शासन के दौरान अयोध्या के अंग्रेज कलेक्टर द्वारा सरयु नदी और अन्राय मन्दिरों आदि लेण्डमार्क से नपती करवा कर बनाये गए नक्शे मे प्राचीन रामजन्म भूमि का स्थान नियत करके रखे गए प्रमाण प्रस्तुत किए जाने और वकील श्री विष्णु जैन के द्वारा प्रस्तुत प्रमाणों के आधार पर हुए पूरा तात्विक सर्वेक्षण को आधार बनाकर माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय और न्याय (फैसले) और आदेश के पालन में राम भक्तों से प्राप्त चन्दे की राशि से बनाए गए अधुरे राम मन्दिर की प्राण प्रतिष्ठा केवल राजनीतिक लाभ की आशा में नीमच की चण्डु पञ्चाङ्ग (निर्णय सागर पञ्चाङ्ग) में बतलाये गए मुहूर्त को मानकर जोड़-तोड़ करके बिना मुहूर्त के दिन कर दी गई। भले ही राजनीतिक लाभ मिला तो मिला नहीं लेकिन मुहूर्त बतलाने वाले शास्त्री जी लगभग छः महीने में ही निपट गए।
ऐसे देश समाज में, कलिकाल मे रहने वाले मेरे भाई के परिवार जनों को क्या दोष दिया जा सकता है।
अब बतलाइये कि, उक्त गलत तथ्यों पर आधारित वर्तमान मुहूर्त शास्त्र पर किस आधार पर और किस कारण से श्रद्धा, आस्था और विश्वास व्यक्त किया जाए?
अतः निर्णय आप पर छोड़ता हूँ।

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