शुक्रवार, 14 नवंबर 2025

अष्टमी, एकादशी, पूर्णिमा और अमावस्या आदि पर व्रत क्यों रखते हैं?

वास्तविकता यह है कि, दोनों अष्टमी तिथि (अर्ध चन्द्रमा) के समय भूमि के केन्द्र पर सूर्य और चन्द्रमा 90° का कोण बनाते हैं।
शुक्ल पक्ष की दशमी समाप्ति और एकादशी प्रारम्भ के समय सूर्य और चन्द्रमा 120° का कोण बनाते हैं। यही स्थिति कृष्ण पक्ष में पञ्चमी तिथि समाप्ति पर बनती है) लेकिन कृष्ण पक्ष की एकादशी को 60° या 300° का कोण बनता है।
इसलिए नारद पुराण में शुक्ल पक्ष की एकादशी को अधिक महत्व दिया है। और एकभक्त- एकासना (एक बार ही बिना आसन से उठे भोजन करना।) करने को लिखा है।
 इसी प्रकार पूर्णिमा तिथि समाप्ति पर सूर्य और चन्द्रमा 180° का सरल कोण बनाते हैं।और
अमावस्या तिथि समाप्ति पर 000° का कोण बनाते हैं।
इसलिए अर्ध चन्द्र के समय , शुक्ल पक्ष की एकादशी प्रारम्भ के समय और कृष्ण पक्ष की पञ्चमी तिथि समाप्ति के समय तथा पूर्णिमा समाप्ति के समय सूर्य और चन्द्रमा के बल अलग-अलग दिशाओं में खींचते हैं। और अमावस्या समाप्ति के समय सूर्य और चन्द्रमा दोनों का बल एक ही दिशा में खींचता है।
भौतिकी के बल समानान्तर चतुर्भुज के नियम आदि के अनुसार इस खींच-तान का प्रभाव भूमि के सागरों पर पड़ता है जिससे ज्वार-भाटा उत्पन्न होते हैं।
परिणाम स्वरूप भूमि की घूर्णन गति तथा परिभ्रमण पर भी पड़ता है।
इन सब का प्रभाव मानव मन पर भी पड़ता है, जिसे लुनेटिक लोगों पर स्पष्ट देखा जा सकता है।
इस कारण पाचनशक्ति कमजोर हो जाती है, चित्त भ्रम होते है, इसलिए आपराधिक मानसिकता उत्पन्न होती है।
इनसे बचाव हेतु, लङ्घन (भूखे रहना) और आराधना-उपासना में दिन व्यतीत करना, जागरण (अलर्ट रहना) आदि के निर्देश धर्मशास्त्रों में दिये गए हैं।

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